Sunday, 23 September 2018

इस दिन को मैं कभी नहीं भूलूंगा

#सन्यास-3
                                  माँ-पिताजी @आश्रम 
घटना-1
मेरे ख्याल से 7 या 8 साल का रहा होऊंगा| आम का महीना था| पिता जी साइकल चला रहे थे, और मैं पीछे कैरियर पर बैठा हुआ था| मुझे बड़ा मजा आ रहा था| ‘3 इडियट’ के आमिर खान की तरह मैं मुस्कुराए जा रहा था| पिताजी के साथ कहीं जाना मेरे लिए उत्सव जैसा होता था| हालाँकि, ‘पिता पुत्र को घर से एक साथ नहीं निकलना चाहिए’, अपनी इस धारणा की वजह से बहुत कम ही अपने साथ कहीं ले जाते थे| लेकिन जब भी ले जाते थे, मेरे आनंद की कोई सीमा नहीं रहती थी| किसी चीज़ के लिए कभी डांटते नहीं थे, बड़ा भयमुक्त फील करता था| माँ के साथ कहीं जाना बड़ी मुसीबत हो जाती थी| हमेशा आँख दिखाती रहती थी| लोगों के सामने तो कुछ नहीं बोलती थी, लेकिन घर आने के बाद बड़ा सुनाती थी, बाज़दफा अच्छे से धोया भी करती थी| घंटों प्रवचन सुनना पड़ता था|
तो, उस दिन पिताजी की साइकल पर बैठे हुए, अपने सुख को साक्षी मान कर, मैंने कुछ प्रण लिये थे| ‘इस दिन को मैं कभी नहीं भूलूंगा, बड़ा होकर भी याद रखूँगा, पिताजी को कभी कष्ट नहीं पहुंचाउंगा|’ अभी आँखों के सामने वो पूरा दृश्य उभर रहा है, आम्रकुंज से आती मंजरो की गंध, पिताजी की गंजी में बना छेद, पहिया के घूमने की आवाज़, और पीछे बैठा प्रमुदित मैं| आह...कितना आल्हादित था मैं...!!!!!!
ऐसे ही कुछ प्रण मैंने उस दिन भी लिए थे, जब पिताजी दिल्ली के लिए मुझे विदा करने आए थे| आगे की पढाई के लिए बेटे को दिल्ली भेजते समय उनके आँखों में उम्मीद की एक अपूर्व चमक थी| उस दिन (12, अक्टूबर 2008) सन्यास लेने के लिए जाते समय, बस में बैठे-बैठे पिताजी के आँखों की उस चमक को मैं मलिन होते हुए देख रहा था| ‘क्या मेरे सन्यासी हो जाने से पिता जी खुश होंगे?’ फिर सोचा, बुद्ध के पिता भी तो कितने दुखी हुए थे, जब बुद्ध उस रात पत्नी और नवजात राहुल को सोता हुआ छोड़ कर जंगल चले गए थे| मेरे बच्चा पैदा न करने के निर्णय में बहुत से कारणों में से एक कारण मैं ख़ुद भी हूँ| बेटे के तौर पर मैं असफल रहा| न चाहते हुए भी कई तरह के कष्ट अपने माता-पिता को देते आया हूँ| कभी-कभी सोचता हूँ बुद्ध का जंगल भागना ज्यादा ठीक था| कुछ दिन बाद घर के लोग उन्हें भूल गए होंगे| लेकिन ओशो ने अपने सन्यासियों को घर पर बिठाकर ठीक नहीं किया| घरवालों के लिए एक चौबीस घंटे की मुसीबत पैदा कर दी| रोब उतार कर और भी मुसीबत कर दी| कभी-कभी मैं ख़ुद को जासूस जैसा महसूसता हूँ| जंगल सिर्फ जंगल नहीं है, जैसे पागलों के लिए पागलखाना होता है, वैसे ही सन्यासियों के लिए जंगल है| घर छोड़कर भागने वाले सन्यासियों के माँ-बाप कम-से-कम गर्व से यह तो कह पाते थे कि मेरा बेटा त्यागी है, अपरिग्रही है, सन्यासी है| हमारे माता-पिता को यह सुख भी नहीं मिला| कहने को घर पर हूँ, लेकिन घर का नहीं हूँ, दिखने में नार्मल हूँ, लेकिन नार्मल बिलकुल भी नहीं हूँ| घर वालों के लिए एक बिनामतलब का उपद्रव हूँ|    
   
घटना-2 

उन दिनों (2007 में) मैं अपने दो भाईयों (गोविंद, और निकेश) और एक दोस्त ‘शंकर’ के साथ कृष्णा पार्क में रह रहा था| 2005 में अंग्रेज़ी सीखते हुए, सोनू नाम के एक बन्दे से मिला था, उसकी अंग्रेज़ी (ख़ासकर उसका RP accent) से बड़ा प्रभावित हुआ था| पूछने पर बताया कि उसने ब्रिटिश कौंसिल से अंग्रेज़ी सीखा था| तभी से मेरा भी ब्रिटिश कौंसिल से अंग्रेज़ी सीखने का बड़ा मन था| लेकिन फ़ी इतनी ज्यादा थी कि मन मसोस कर रह जाता था| 2007 में जब जॉब करना शुरू किया तो, लगा कि अब शायद फ़ी पे कर सकता हूँ| एक दिन ऑफिस से छुट्टी लेकर BC गया| वहां जाकर पता चला कि एडमिशन लेने से पहले एक टेस्ट देना होता है, फिर रिजल्ट से पता चलता है कि किस कोर्स में एडमिशन मिल सकता है| टेस्ट फ़ी 5 हंड्रेड था| मैंने टेस्ट दे दिया| मुझे जो कोर्स सजेस्ट किया गया उसकी फ़ी 8 हज़ार थी| 22 फ़रवरी तक मुझे एडमिशन ले लेना था| मेरी सेलरी 7 मार्च को आने वाली थी| एकदम से इतने पैसे जुटना मेरे लिए क़रीब-क़रीब असंभव था| अभी-अभी जॉब शुरू ही किया था, और घर से पैसे लेना बंदकर दिया था| गोविन्द ने आश्वासन दिया कि पैसे का जुगाड़ हो जाएगा, लेकिन नहीं हो पाया|
22 तारिख़ को मुरझाया हुआ चेहरा लिए मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था| निकेश मेरी बुआ का बेटा है, बचपन से हम दोनों में अच्छी दोस्ती थी| लेकिन हमउम्र होने की वजह से हमारे बीच हमेशा एक तनाव की स्थिति बनी रहती थी| हमेशा शीत युद्ध चलता रहता था| किसी-न-किसी बात को लेकर आए दिन हम में बहस हो जाती थी| गोविन्द मेरा चचेरा भाई है, बचपन से ही हम दोनों साथ रह रहे थे| वो उम्र में मुझसे थोड़ा बड़ा है, इसलिए मामला थोड़ा ठीक रहता था| सो, गोविन्द से मैंने पैसे के लिए कहा था, लेकिन निकेश से कुछ नहीं बोला था| वैसे मुझे लगा था कि अगर इसके पास होगा भी तो यह मुझे नहीं देगा| एक ताज़ा घटना है, जो आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ, इससे पता चलेगा कि हमारे (निकेश और मेरे) बीच किस तरह के शीत युद्ध होते थे| अभी पिछले महीने फ्रेंडशिप दिवस पर, गोविन्द और मैं निकेश से मिलने उसके घर (राजस्थान) गए थे| धनौल्टी से आकर मैं दिल्ली में गोविन्द के यहाँ रुका हुआ था| उसी दौरान एक दिन गोविन्द को निकेश का फोन आया| वह अपनी पत्नी, जो गाँव से आ रही थी, को स्टेशन से पिक करने दिल्ली आ रहा था| गोविन्द ने उसे मेरे दिल्ली में होने की बात बताई| थोड़ी देर बाद मुझे निकेश का कॉल आया, फिर उसके इसरार पर हम उसकी कर में बैठकर एक दिन के लिए राजस्थान गए| इससे पहले आखरी बार हम तीनो 2015 में गोविन्द की शादी पर मिले थे| 
संयोग से उस दिन पीसाजी (निकेश के पिताजी) का जन्मदिन भी था| घर पहुँचने पर, हमें खिलाने के लिए निकेश मिठाई लेकर आया| डाइटिंग के चक्कर में मैंने मिठाई खाने से इंकार कर दिया, बोला डॉक्टर ने मना कर रखा है| फिर थोड़ी देर बाद, इस घटना को भूल-भाल कर जब हम बाहर घूमने के लिए गए, तो एक जगह मैंने एक ब्लैक चोकलेट खरीदा| जब चोकलेट को तीन भाग में तोड़कर एक भाग उसकी ओर बढ़ाया, तो लेने से मना करते हुए बोला, “मैं चोकलेट नहीं खाता”, मुझे एकदम से समझ नहीं आया कि यह क्या बोल रहा है, चोकॉलेट कबसे नहीं खाने लगा| फिर याद आया ससुर यह मिठाई का बदला ले रहा है|
उस दिन मुझे लेटा देखकर निकेश मेरे पास आया, “तू जा नहीं रहा है एडमिशन के लिए?” मुझे लगा यह मेरे जले पर नमक छिड़कने आया है| ‘पैसा नहीं हो पाया, नहीं ले रहा एडमिशन|’ मैंने आवाज़ नार्मल करके कहा| वह ‘हम्म्म....’ बोलकर थोड़ी देर तक मेरे बगल में बैठा रहा फिर अपने जेब से IDBI का एक ATM कार्ड निकाल कर मेरी ओर बढ़ाते हुए बोला, “यह ATM पापाजी ने मुझे दे रखा है, तू इसमें से पैसा निकाल ले, मैं उनको बोल दूंगा कि मेरे किसी दोस्त को एमरजेंसी थी, सो उसे कुछ दिन के लिए पैसा दिया है|” मैं एकदम से भरोसा नहीं कर पाया| बड़ी मुश्किल से मैंने अपने आंसू को रोका| इस घटना के बाद से मेरे भीतर कुछ बदलने लगा था| उस दिन घर से निकल कर ATM जाते समय भी मैंने कई प्रण लिए थे| 
                               गोविन्द और निकेश के साथ

घटना-3 (जागरण)

संभवतः यह 2010 कि बात है| गोविन्द और मैंने साथ मिलकर एक कोर्स करने का निर्णय लिया| जब खर्चे का पता किया तो पता चला 30 से पैंतीस हज़ार का खर्चा आएगा| उन दिनों मैं ट्यूशन पढाया करता था| मेरी आमदनी बहुत कम थी| जो भी कमाता था खर्च कर देता था, बचता कुछ भी नहीं था| 8 हज़ार की तरह ये तीस हज़ार जुटाना भी मेरे लिए असंभव ही था| घर से पैसा लेना कब का बंद कर दिया था| खैर, मैं पैसे जुटाने की कोशिश करने लगा| गोविन्द ने अपने घर से पैसा मंगा लिया| एडमिशन का डेट नज़दीक आती जा रही थी, कहीं से भी पैसे का कोई जुगाड़ नहीं हो पा रहा था| गोविन्द उन दिनों देवली रोड पर एक कंप्यूटर इंस्टीट्यूट चला रहा था| लास्ट डेट से एक दिन पहले कॉल कर के मुझे अपने इंस्टीट्यूट पर बुलाया| “पैसे का जुगाड़ हुआ”, पानी का ग्लास मेरी ओर सरकाते हुए मुझसे पूछा|
'नहीं हो पाया, तुम एडमिशन ले लो, मैं अगले साल ले लूँगा', मैंने दुखी मन से गोविन्द से कहा|
“मैं नहीं तुम एडमिशन ले लो|”
‘लेकिन मेरे पास तो पैसा नहीं है’, मैंने थोड़ा असहज होते हुए कहा|
“मेरे पास जो पैसा से उससे ले लो”
‘और तुम?’, मैंने हैरान होते हुए पूछा|
“मैं नहीं लूँगा, मेरी चिंता मत लो, कोर्स के बाद जब तुम जॉब करोगे, तब मैंने ले लूँगा, अभी तुम एडमिशन ले लो|” यह क्या सुन रहा था मैं| दो साल का कोर्स था| दो साल बाद मैं जॉब करूँगा, तब पैसा आएगा, फिर ये एडमिशन लेगा| मुझे काटो तो खून नहीं| उसके इंस्टिट्यूट से नीचे उतरते वक़्त खोपड़ी में भयंकर उत्पात मचा हुआ था| उस दिन भी मैंने कई प्रण लिए थे|
                                    गोविन्द के साथ



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