परसों (12, Sep, 2018) सुबह-सुबह उठकर जब ब्लैक कॉफ़ी पी रहा था, तो अनायास ही कहीं घूमने जाने का कीड़ा काटने लगा..। एक दो जगहों के बारे में सोचने के बाद, बिना बहुत सोचे हमने आनन-फ़ानन में बस से माधवपुर की टिकट बुक कर ली। टिकट बुक करने के बाद ख़याल आया कि इस रविवार से पहले तीन बेहद ज़रूरी काम को अंजाम देना था। कुछ घंटों बाद तो पच्चीस चीज़ें सामने उभर कर सामने आने लगी, लेकिन अब कुछ किया नहीं जा सकता था। बहुत गहरे में, टिकट कटाने से पहले ही मुझे पता था कि अगर तय करने में देर की तो मन कोई-न-कोई बखेड़ा ज़रूर खड़ा कर देगा। बहुत-सी उलझनो में एक उलझन यह भी था कि शनिवार को हमने zen cafe में एक बार फिर कॉफ़ी पीने का प्लान बनाया था (यह within month पाँचवा कॉफ़ी होने वाला था)। कॉफ़ी न पी पाने का बड़ा दुःख हो रहा था। ख़ैर...अब कुछ नहीं किया जा सकता था।
इसीलिए, मैं सारे महत्वपूर्ण फ़ैसले जल्दबाज़ी में लेता हूँ, सोच-विचार कर सही निर्णय लेना क़रीब-क़रीब असंभव है।गुरजेईफ कहा करते थे, “शुभ करने की हमेशा जल्दी करना, और अशुभ को जितना हो सके उतना टालते जाना।”
हमारी बस रात ११ बजे starबाज़ार, अहमदाबाद से थी। कुणाल को कॉल करके इत्तिला दिया कि हम ADI आ रहे हैं। कुणाल आजकल थिएटर कर रहे हैं, शाम सात बजे से वे थिएटर में व्यस्त हो जाते हैं।सो, उन्होंने थिएटर का हवाला देकर मिलने की असमर्थता जतलाई। सोचा था अगर कुणाल से मिलना हो पाता तो कॉफ़ी न सही लेकिन गन्ने का जूस ही पी लेता।
थोड़ा मायूस था, ऐसे में ग़म ग़लत करने के लिए ग्रीन-टी तैयार करने लगा। पानी स्टोव पर रख कर, किचन में ही पंखे के नीचे बैठ गया, और पानी के गर्म होने का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर में पानी सिरसिराने लगा। पानी में खौल रहे अदरक और तुलसी की सुगंध से किचन सुवासित होने लगा। आँखें बंद कर के मैं गंध और आवाज़ को अपने भीतर आत्मसात करने लगा। तभी हॉल में रखे फ़ोन से आवाज़ आई “कुणाल कॉलिंग”, किचन से उठकर में हॉल में आया। जैसे ही कॉल उठाया उधर से कुणाल की आवाज़ आई, “सुनिये...मैंने थिएटर जाना केन्सल कर दिया है। आप २:३० की ट्रेन से अहमदाबाद आ जाइए, शाम 5-8 हम Zen-Cafe पर बैठेंगे, फिर रात में कहीं खाना खाएँगे, और अंत में मैं आपको बस स्टैंड छोड़ दूँगा।” कुणाल के फ़ोन रखने के बाद मैं सोचने लगा,” यह आदमी कितना बड़ा नशेड़ी है, कॉफ़ी के चक्कर में थिएटर छोड़ रहा है।” मैं यह सब सोच ही रहा था कि पीछे कुर्सी में कुछ चुभने लगा। अचानक ऐसा लगने लगा कि जैसे कुर्सी में समा नहीं पा रहा हूँ। उत्सुकतावस मैंने पीछे मुड़ कर देखा....OMG मेरी बाँछें खिल गई थी..!!!!
चित्र साभार- गूगल
तो, जैसा कि तय हुआ था हम 2:30 की ट्रेन (जो कि आई 3 बजे और चली तीन दस पर) पकड़ कर ठीक 5 बजे साबरमती पहुँचे। अगर ट्रेन समय से होती तो हम 4:15 तक सबरमती पहुँच चुके होते। ट्रेन पूरे रास्ते जहाँ-तहाँ रुकते हुए आई थी। मैं बड़ा बेचैन रहा था, कभी बैठ जाता था, तो कभी गेट पर आ कर बाहर झाँकने लगता था। भीतर बार-बार गीत चतुर्वेदी जी की एक पंक्ति, “बैठ कर किए गए इंतज़ार में भी, इंतज़ार तो खड़ा ही रहता है।”, दुहराए जा रहा था। ख़ैर, साबरमती से मैंने ओला बुक किया और हम अख़बारनगर आ गाए।5 मिनट के इंतज़ार के बाद स्कूटर हड़हराते हुए कुणाल हाज़िर हुए। भाग करके हम गन्ने का जूस पीने के लिए गए। रास्ते भर हम इसी बात का अफ़सोस करते रहे कि अब हमें कॉफ़ी हाउस में एक घंटा कम बैठने को मिलेगा। इस बात का मलाल हमें पहले दिन से रहा है कि कॉफ़ी हाउस इतनी जल्दी क्यूँ बंद हो जाता है। 8 बजे कोई बंद होने का टाइम है। एक घंटा तो हमें सेटल होने में लग जाता है। तीन घंटा से कम बैठने का कोई मतलब नहीं है। इसीलिए हमारी कोशिश रहती है कि किसी भी सूरत पर हम 5 बजे तक कॉफ़ी हाउस पहुँच जाएँ, ताकि हमें तीन घंटे बैठने का मौक़ा मिले।
गन्ने वाले के यहाँ पहुँच कर हमने चार ग्लास रस का ऑर्डर दिया। जब से कॉफ़ी हाउस में बैठना शुरू किया है तभी से गन्ने का रस पीना रिचूअल जैसा बन गया है। जहाँ से हम जूस पीते हैं वहाँ की कुछ विशेषताएँ है- यहाँ गन्ने को पेरा नहीं जाता है, बल्कि अंगूर की तरह पूरे गन्ने को मशीन में डाल कर जूस निकाला जाता है। स्टिक को पहले से ही वे फ़्रीज़ में रखते हैं, इसीलिए अलग से बर्फ़ डाल कर जूस को ठंडा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। पूरे गन्ने का जूस होने की वजह जूस का स्वाद बहुत ही बेहतरीन हो जाता है। एक तरह का हरापन होता है स्वाद में, जो आपको वैसे पूरे गन्ने को दाँत से चूसने पर ही मिल सकता है।
जूस पीने के बाद हम ट्रैफ़िक के सभी नियमों का उल्लंघन करते हुए तीर की तरह कॉफ़ी हाउस पहुँचे। जब कुणाल गाड़ी पार्क कर रहे थे, घड़ी में ठीक 6 बज रहा था, यानी हम पूरे एक घंटा लेट थे..शिट..!
हमारे पसंदीदा टेबल पर एक जोड़ा पहले से बैठा हुआ था। हम थोड़े मायूस हुए...ख़ैर मन मसोस कर हम अपनी-अपनी पसंदीदा कुर्सी पर बैठ गए, टेबल की तरह हम सबका अपना-अपना पसंदीदा कुर्सी भी है। अपने सामने हमने अपनी-अपनी किताबें रखी-एक चिथड़ा सुख, courage और अडल्ट्री। थोड़ी देर बैठने के बाद कुणाल ने राजूभाई को कॉल करके हमारा ऑर्डर दिया “3 Cappuccino”. 10 मिनट बाद एक नया लड़का जिसे हम नाम से नहीं जानते हैं कॉफ़ी लेकर आया। हम झाग के ऊपर बने दिल को कम्पेर करने लगे कि किसका दिल ज़्यादा नुमाया है।
At कॉफ़ी हाउस
दो घूँट सुड़कने के बाद जान में जान आई। आधी कॉफ़ी समाप्त होते-होते भीतर का सारा ऊहापोह शांत हो गया। अंदर बस एक ही नाद उठ रहा था ‘कॉफ़ीयम ब्रह्म’....! 7:30 पर हमने zen टी का ऑर्डर दिया। zen टी के आते-आते हम ब्रह्म चर्चा में पूरी तरीक़े से डूब चुके थे। बार-बार बस दाग़ साहब को दोहराए जा रहे थे,
“वो और होंगे तेरी महफ़िल से उभरने वाले, हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए” ।
चित्र साभार- गूगल
"Never trust anyone who doesn't drink coffee."
-AJ Lee
कॉफ़ी हाउस से निकल कर हम डोसा खाने के लिए गए। रास्ते में TP से बचने के लिए रेड लाइट से पहले कुणाल हमें उतार देते थे। बीच में जब-जब हमें मौक़ा मिलता था, हम कॉफ़ी हाउस पर किए गए डिस्कशन का सिरा फिर से पकड़ लेते थे। कॉफ़ी हाउस पर हमने कई मुख़्तलिफ़ मुद्दों पर चर्चा की थी। सारी बात-चीत का हासिल यह निकला कि हमने अपने शग़ल को विस्तार देने का निर्णय लिया। पाँच बैठक के बाद हमें यह साफ़ हो गया था कि इस युग में अगर कहीं बुद्धत्व घट सकता है, तो वह है कॉफ़ी हाउस।काफ़ी घमर्थन के बाद हमने यह तय किया कि अपने जैसे और लोगों को हमें इससे जोड़ना चाहिए। इसी सिलसिले में हमने यह तय पाया कि zen टी ध्यान का आयोजन किया जाय। फिर हम इसकी रूपरेखा के बारे में काफ़ी देर तक तजकिरा करते रहे।
चित्र साभार- गूगल
डोसा हाउस पहुँच कर मैंने अपने लिए रवा चीज़ मसाला डोसा ऑर्डर दिया, कुणाल और दिव्या ने मैसूर डोसा मँगाया। उनके डोसे का स्वाद मेरे डोसे बेहतर था। खाने के मामले में मेरा निर्णय अक्सर ग़लत निकलता है।
डोसा हाउस से निकल कर हम रीवर फ़्रंट गए। घड़ी में सवा नौ बज रहा था। रीवर फ़्रंट पहुँच कर कुणाल ने बताया कि दिन में कोई ऊटपटाँग जूस पी लेने की वजह से ऊन के पेट में भयंकर गैस बन रहा है। हम तत्काल गैस की समस्या से निजात पाने की कोशिश में लग गए। पहले कुछ देर ब्रजासन में बैठे, फिर गूलगल की मदद से एक्यूप्रेसर points का पता करके उसको दबाने लगे। इन सब कवायत से थोड़ा लाभ तो हुआ लेकिन पूर्ण आराम नहीं मिला। फिर हम नदी किनारे टहलने लगे। टहलते-टहलते कुणाल की कुछ शाश्वत समस्या पर बात-चीत होती रही। कुणाल को मैं पिछले तीन साल से जानता हूँ, डे वन से उनकी सुई एक ही जगह अँटकी हुई है। इसीलिए जब भी हम मिलते हैं घूम-फिर कर दिन में एक बार तो उनकी समस्या के बारे में बात हो ही जाती है। उनकी समस्या क्या है, यह अभी आपको नहीं बताऊँगा, इसके बारे में कभी तफ़सील बात करेंगे। टहलते-टहलते हम जगह पर भी गए जहाँ से पिछले साल मेरे दोस्त की भाभी ने कूद कर आत्महत्या ली थी।
दस बजे रीवर फ़्रंट बंद हो जाता है। वहाँ से हम सीधा बस स्टैंड के लिए निकले। रास्ते में कुणाल ने गैस की दवाई ख़रीदी, मैंने भी सफ़र के लिए एक दो सामान लिया। बस स्टैंड पहुँच कर हमने बस का पता किया फिर id का फ़ोटो कॉपी करवाने के लिए दूकान ढूँढने लगा। सुबह जब माधोपुर, पवन स्वामी को, कॉल किया तो उन्होंने ख़ास हिदायत दी थी कि सभी आगंतुकों के पास अपने id प्रूफ़ का फ़ोटो कॉपी होना चाहिए। लेकिन रात को साढ़े दस बजे सारी दूकाने बंद हो गयी थी। सुबह 8 बजे हम माधोपुर पहुँचने वाले थे, इतनी सुबह वहाँ भी कुछ हो पाना मुश्किल था। ख़ैर, हमने सोचा कि पवन स्वामी से मोहलत ले कर हम कल दिन में कहीं से फ़ोटो कॉपी करवा लेंगे।
इस बीच कुणाल को प्रेसर आ गया, वे भाग कर पासवाले बाथरूम में गए। थोड़ी देर बाद उनका कॉल आया, “यहाँ पानी नहीं है, आप कहीं से एक बोतल पानी ख़रीद कर ले कर आइये...peeeuh!”
बाथरूम बहुत ही ज़्यादा गंदा था। गेट के नीचे बने छेद से मैंने कुणाल को पानी दे दिया। बाहर आ कर मैं किसी साफ़ बाथरूम की तलाश करने लगा। जबतक कुणाल बाथरूम से आए, बस का टाइम हो गया था। हमें see off करने के बाद कुणाल चले गए। हम अपने भीतर एक मुकम्मल सुकून का अनुभव कर रहे थे। कॉफ़ी हाउस पर जो एक घंटा कम मिला था, उसकी कमी हमने रीवर फ़्रंट पर पूरी कर ली थी। किसी चीज़ का कोई मलाल नहीं था।
At Coffee House
”Three hundred years ago, during the Age of Enlightenment, the coffee house became the center of innovation."
-Peter Diamonde
चित्र साभार- गूगल
कुणाल के जाने के पाँच मिनट बाद, अपने निर्धारित समय से बीस मिनट लेट, बस अहमदाबाद से चली। चलती बस में मैंने ड्रेस चेंज किया और सोने की कोशिश करने लगा।
काफ़ी देर तक बस के अंदर की लाइट जलती रही थी। ज़रा भी रोशनी हो तो मुझे नींद नहीं आती है। मुझे हैरानी होती है उन लोगों पर जो लाइट जला कर सोते हैं। खजुराहो से लौटते समय बस में हुए भयानक अनुभव (पानी के बोतल का मुँह काट कर उसमें पेशाब करना पड़ा था, इस अनुभव का ज़िक्र ‘खजुराहो की खोज’ में मैंने विस्तार से किया है) के बाद अब मैं बस में बैठने से पहले काफ़ी कम पानी पीता हूँ। लेकिन चीज़ डोसा खाने की वजह से कंठ बहुत सूख रहा था। पानी पीने से बड़ा डर लग रहा था। बस कंठ को गीला करने के लिए एक घूँट पी लेता था। बड़ी देर बाद जब लाइट बंद हुई तो मैं सो पाया। अभी ठीक से सो भी नहीं पाया था कि आवाज़ आने लगी, “अभी दस मिनट के लिए बस यहाँ रुकेगी, जिनको फ़ारिग़ होना है, हो लें।” नीचे जाने जैसा लग नहीं रहा था, लेकिन सोचा हो आना ही सही रहेगा। फ़ारिग़ होने के बाद ढाबे के आगे लगी दूकान से एक दो चीज़ें ख़रीदी, एक पैकेट सिकंदर का मूँगफली, एक डब्ब हींग गोली (कुणाल का गैस ठीक करते-करते मुझे ख़ुद गैस बनने लगा था) और एक पैकेट रामलड्डू।
सारा सामान लेकर हम बस के अंदर आ गाए। बाहर से आने के बाद अंदर बड़ी गर्मी लगने लगी। मैंने बाहर वाला शीशा खोल दिया। पाँच मिनट बाद बस चलने गई। ठंडी हवा सनसनाते हुए चेहरे पर लग रही थी। डोलते-डोलते कब नींद आ गयी पता ही न चला। सुबह जब आँख खुली तो पाया ठंड की वजह से नाक बंद हो गयी और बालों पर धूल की एक परत जमी हुई थी। मोबाइल में समय देखा 6:30, मतलब माधोपुर आने में अभी एक घंटा और लगना था। दस मिनट तक फिर से सोने की असफल कोशिश करने के बाद उठ कर बैठ गया और किताब पढ़ने लगा। 7:15 बजे अपनी सीट से उतर कर संचालक की केबिन तक गया और उन्हें आगाह किया कि हमें माधोपुर ओशो आश्रम के सामने उतरना है। संचालक से मिल कर जब लौट रहा था तो अचानक मेरी निगाह एक यात्री पर अटक गयी। उनके चेहरे पर पसरे शांति को देख कर मुझे लगा संभवत वे एक सन्यासी हैं, और वे भी हमारे साथ ही उतरेंगे। स्टॉप आने पर मेरा यक़ीन सच सावित हुआ, वे हमारे साथ ही उतरे। बस से उतर कर जब मैं एक स्थानीय दुकानदार से राह पूछने लगा, तो वे मेरे पास आ गए और मुझे गाइड करने लगे। बाद में जब वे क़दम-क़दम पर हमें गाइड करने लगे तो मजबूरन मुझे उन्हें बताना पड़ा कि मैं पहले भी एक बार यहाँ आ चुका हूँ, हालाँकि मैं उनके मदद करने की भावना को ठेस नहीं पहुँचना चाहता था।
बस स्टॉप से आश्रम की दूरी बस एक मिनट की है। सुबह-सुबह वेल्कम-सेंटर बंद था। पूछने पर पता चला कि वेल्कम प्रवचन के बाद खुलेगा। फिर याद आया कि last टाइम जब हम आए थे, तब भी ऐसा ही हुआ था। हमने वेल्कम के बाहर सामान रख दिया और वहीं पास बने बाथरूम में फ़्रेश होने के लिए चले गए। नित्यक्रिया से निवृत होने के बाद हम किचन में नाश्ता करने गए। हालाँकि प्रवचन के लिए हम लेट हो रहे थे। सुबह के प्रवचन का टाइम 8:30 है। नियम से नाश्ता हमें प्रवचन से लौट कर आने के बाद करना चाहिए था। लेकिन पिछली बार के अनुभव के बाद मैं सुबह के प्रवच में जाने के बहुत पक्ष में नहीं था। पिछली बार 2015 में जब हम सत्यम स्वामी के साथ आए थे, तो बस ने हमें ठीक अपने ठीक समय पर 7:30 बजे छोड़ दिया था। (इस बार बस 20 मिनट लेट चली थी, सो पहुँचने में भी आधा घंटा देर से पहुँची। ) प्रवचन के समय से पहले हम तैयार हो गए थे। भगवान (स्वामी ब्रह्म वेदांत जी) के आने से पहले हम बुद्ध हॉल में पहुँच गए थे। लेकिन जैसे ही प्रवचन शुरू हुआ मुझे भयंकर नींद आने लगी। पूरा समय नींद से लड़ने में ही गुज़र गया था। इस बार भी मुझे पता था, ऐसा ही होने वाला था। इसीलिए नाश्ते को टालना मैंने उचित नहीं समझा। नाश्ता करने के बाद जब प्रवचन के लिए निकले तो घड़ी में 9 बज रहा था।
At माधवपुर
किचन से निकल कर जब बुद्ध हॉल की तरफ़ जा रहा था, तो रास्ते में एक जगह सही राह पहचानने में दिक़्क़त होने लगी। लेकिन थोड़े से शुरुआती स्ट्रगल के बाद पुरानी सारी यादें फिर से ताज़ा हो गई। रास्ते में जब एक जन से पूछा कि प्रवचन कहाँ चल रहा है, तो रास्ता बताते हुए उसने कहा, “लेकिन आप जब तक पहुँचेंगे तब तक प्रवचन समाप्त हो चुका होगा।” और हुआ भी ऐसा ही। हमारे पहुँचने के एक मिनट बाद ही प्रवचन समाप्त हो गया। तीन साल में भगवान में कुछ ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा था। इन फ़ैक्ट मैं बड़ा हैरान हुआ यह देख कर कि पिछले तीन साल में आश्रम में कुछ भी नहीं बदला था।
बुद्ध सभागार से जब हम लौट कर आए, तो वेल्कम सेंटर खुल गया था। पवन स्वामी भी तीन साल में बिलकुल भी नहीं बदले थे। एंट्री करने के बाद जब पहचान पत्र देने की बारी आई, तो मैं अपनी फ़ोटो कॉपी न करा पाने की असमर्थता की दास्ताँ उनको सुनाई। मेरी कहानी सुनकर उन्होंने बड़े ही सहज भाव से मुझसे कहा, “कोई नहीं, वहाँ नहीं हो पाया तो यहाँ हो जाएगा, दिन में यहाँ करा लीजिएगा।”
रजिस्ट्रेशन के बाद हम अपना बिस्तर लेकर अपने कमरे में आ गए। नींद इतनी आ रही थी कि दोपहर, 12:30, के प्रवचन में भी नहीं जा पाया। 1:45 पर खाना खाने गया। किचन में भी सब कुछ वैसा-का-वैसा था। खाने बाद हम थोड़ी देर तक टहलते रहे, फिर कमरे पर आ गए। रास्ते में किसी ने बताया शाम में 5:30 स्टडी होता है। सो, स्टडी में जाने का तय करके फिर से सो गए।
सुबह जिस सभागार में प्रवचन हुआ था, स्टडी उसी में होना। हम समय से 10 मिनट पहले ही पहुँच गए थे। धीरे-धीरे पूरा हॉल भर गया। कुछ मित्र अपने साथ किताब लेकर आए थे। ठीक 5:30 पर भगवान की पोती आई, और सामने रखे माईक के पास बैठ गयी। थोड़ी देर बाद एक और महानुभाव आए और दूसरी माइक के पास बैठ गए। दोनो ने अपनी-अपनी किताबें खोली। पहले भगवान की पोती ने अपनी किताब में से एक लाइन अंग्रेज़ी में पढ़ा, फिर सामने वाले महानुभाव ने उसका गुजराती अनुवाद किया और साथ ही उसकी व्याख्या भी की। मुझे स्टडी का यह तरीक़ा बहुत ही सतही और अनावश्यक लगा।
गुरजेईफ को समझने का यह तरीक़ा देख कर मुझे पी.D ओस्पेनसकी की याद आ गई, वे भी गुरजेईफ से अलग होने के बाद श्यामपट पर लोगों को सत्य समझाते थे। यह बहुत ही कुरूप था।
स्टडी के तुरंत बाद, भगवान के घर पर ‘संगीत’ होने वाला था। सब लोग सभागार से उठ कर वहीं चले गए।
भगवान को गाते हुए सुनना एक चमत्कार को अपनी आँखों के सामने घटते हुए देखना है। यह एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में नहीं समेटा जा सकता है। वो कान, कान नहीं है जिसने ब्रह्म वेदांत जी को गाते हुए नहीं सुना है।
भगवान को मोबाइल पर बात करते हुए देख कर मैं बड़ा रोमांचित हो उठा था। सोचने लगा, क्या बुद्ध (गौतम बुद्ध) ने कभी इस बात की परिकल्पना की होगी कि भविष्य में कोई बुद्ध इस तरह से मोबाइल पर बात कर रहा होगा??
At माधवपुर








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