#सन्यास -1
बाहर से देखने पर तो सब कुछ संयोग ही लगता है, लेकिन जब पीछे मुड़ कर देखता हूँ, तो लगता है शायद सब कुछ पहले से ही तय था। बचपन में गर्दन झुका कर चलता था। घर के लोग बड़ा डाँटते थे, “चोर हो क्या तुम, गर्दन झुका कर क्यों चलते हो? सर उठा कर चलो और सीना तान कर रखो?” पिता जी कहते थे, “तीन पुश्त् के बाद ख़ानदान बदलता है, यह लगता है अपने परदादा, दादा और पिता से अलग होगा।”
बहुत कोशिशों के बाद भी मैं कभी सीना तान कर और गर्दन उठा कर नहीं चल सका। बहुत दिनों तक समझ नहीं आता था कि मैं अपने ख़ानदान के तथकथित महापुरुषों से अलग क्यों हो गया। मेरे ददिहाल से लेकर ननिहाल तक मेरे पूरे ख़ानदान में मेरे जैसा गोबर पुरुष (घर वालों के हिसाब से) कोई नहीं था।
(ऐसा मैंने सुना है कि) मेरे पितामह के डर से, जब वे राह से निकलते थे, लोग घर में घुस जाते थे। दादाजी, पिता जी, और चाचा जी सबने कमोबेस अपने ख़ानदान का नाम उजागर किया था। ननिहाल का भी यही हाल था, एक से बढ़कर एक सूरमा उधर भी थे। ऐसे बाहुवलियों के ख़ानदान में मैं एक ऐसा गोबर पैदा हुआ था जो लोगों से पिटकर आ जाता था। माँ बहुत चिंतित रहती थी, “आज तक मेरा कोई भाई कभी किसी से पिटकर नहीं आया, पता नहीं यह किसके जैसा हो गया।”
एक बार ऐसा हुआ कि मेरी लड़ाई एक टिड्डे जैसे लड़के से हो गई, बस संयोग कहिए कि मैंने उसे पटकनी देदी और उसके सीने पर चढ़ बैठा। पता नहीं कैसे मेरे पिता जी ने मुझे यह पुरुषार्थ का कार्य करते हुए कहीं से देख लिया। उसके बाद से महीनों तक लोगों के सामने मेरे इस पराक्रम का गुणगान करते रहते थे। लेकिन जल्द ही फिर मैं जब कहीं से पिट कर आ गया तो उन्होंने लोगों को गाथा सुनानी बंद करदी।
घर वालों की अपेक्षाओं पर खड़ा न उतर पाने की वजह से मैं काफ़ी चिंतित रहता था। मेरे सारे रिश्तेदार मेरी माँ से कहा करते थे, “आपका यह बेटा बोलता भी है? हमने कभी इसे बोलते नहीं सुना।” माँ बड़ा चिंतित रहती थी। ननिहाल में भी उसे सबसे मेरे व्यहार के बारे में सफ़ाई देनी पड़ती थी, “थोड़ा शांत है, पढ़ाई लिखाई करता है न इसीलिए थोड़ा अलग है, बड़ा होकर ठीक हो जाएगा।”
एक बार तो एक आदमी ने मेरी माँ से यहाँ तक कह दिया कि “आपका बेटा मंदबुद्धि है क्या? इसे कभी और लड़कों की तरह बोलते या खेलते हुए कभी नहीं देखा।” कभी-कभी माँ इन सब चीज़ों को लेकर बहुत दुखी हो जाती थी। और मैं भी बड़ा परेशान रहता था। सोचा करता था कि मैं ऐसा क्यूँ हूँ..?
2008 तक मेरे पास किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था। 2008 में 20 अक्टूबर को जब सन्यास लिया और साधना शुरू की तो धीरे-धीरे मुझे सारे प्रश्नो के उत्तर मिलने लगा। शुरू-शुरू में अपने सन्यासी हो जाने पर मुझे बड़ा अचरज होता था। समझ नहीं आता था कि अच्छा भला नॉर्मल इंसान इन सब चक्करों में कैसे फँस गया। लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें साफ़ होने लगी। फिर दिखने लगा कि शुरू से ही चीज़ें साफ़ थीं। ‘धम्मपद में जब बुद्ध से भिक्षुओं को कहते हुए सुना, “भिक्षुओं, राह पर चलते समय हमेशा गर्दन झुका कर रखो, तीन क़दम से आगे मत देखो।” तो, मैं रोने लगा। फिर समझ में आया कि ससुर मैं घंटों अकेले क्यूँ बैठा रहता था, कम क्यों बोलता था। पिट कर घर क्यों आता था।
विवेकानंद से जब एक पत्रकार अमेरिका में पूछता है, “आप इतने अलग क्यों हैं?”, तो विवेकानंद हँसते हुए जवाब देते हैं, “मैं अलग नहीं हूँ, तुम सब एक जैसे हो ।” पहली बार जब मैं यह पढ़ा तो बड़ी देर तक हँसता रहा।
मैं अलग नहीं था, I was a born monk.
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