Monday, 30 April 2018

उरी-बीरी लग गया है

11 अगस्त, 2014
घर से ई सोच कर आते हैं कि आज खूब काम करेंगे...लेकिन रोज़ फालतू के काम सब में ओझरा जाते हैं...ई इंटरनेट बड़का आफत हो गया है...रोज़ अपना जाल में हमको फसा लेता है....ससुरा खाली समय का जियान करबाता है...और होता-ओता कुछो नई है। 

ससुरा... हमरे ऑफिस में पता नहीं कहाँ से मच्छर ढूक गया...पैर नीचे करके बैठते हैं तो सउंसे पैर-गोर को भंभोर लेता है।

To fool one is easy, to fool hundred is very easy and to fool thousands is the easiest thing possible.

22 जुलाई, 2014 
You're God's, He is never yours.

21 जुलाई, 2014 
You're having many things that you don't have at all.

16 जुलाई, 2014 
जब से प्यार हुआ है जीवन में उरी-बीरी लग गया है। भकलोल नाहित दिन भए बौराए रहते हैं। न दाना-पानी नीक लगता है और न ही ठीक से नींद आती है। प्यार क्या किए आफत मोल ले लिए हैं। 
हे छठ्ठी मैया ई भयंकर दुःख से हमको उबार दीजिये. अगिला साल दू घंटा पानी में ठाड़ होंगे हम...!!

2 जुलाई 2014 
सुबह से खाली फूंही पड़ रहा है..एक बार झमक कर बरस जायेगा सो नहीं...ई फूं-फा से का होगा जी इंद्र महराज...एक बार कस के बरसाइये तब्बे कुछ होगा....

4 मई, 2014 
क्यों हो गए हालात से मज़बूर तुम? अगर हालात से ही मज़बूर थे तो मौत चुन लेते, ज़िन्दगी ही को क्यों चुना तुमने? तुम तो कहते थे कि मैं तुम्हारी ज़िन्दगी हूँ, फिर ये जो तुम जी रहे हो....किसकी जिन्दगी जी रहे हो तुम? अच्छा ये सब छोड़ो... ये बताओ वो जो तुम्हारी वाली है.. वो दिखने में कैसी है...? मुझसे अच्छी है क्या...? तुम कभी उसकी कोई फोटो मुझे क्यों नहीं भेजते हो? डर लगता है कि कहीं मैं मजाक उड़ाउंगी उसकी... कुछ नहीं बोलूंगी रे मैं... सूरत भले ही अच्छी न हो उसकी... तकदीर में तो मुझसे अच्छी है ही.... पता है, रवि मेरा बहुत ख्याल रखते हैं.... बहुत प्यार करते हैं मुझसे...तुमसे तो बहुत ही अच्छे हैं....तुम्हे तो कभी मेरी परवाह ही नहीं थी...तुम्हारे साथ तो बीमार पड़ने में बिल्कुल मज़ा नहीं आता था... मेरी बीमारी का भी मजाक बना देते थे तुम.....मुझसे सर्दी भी हो जाती है तो रवि परेशान हो जाते है...इतना प्यार करते हैं वे मुझसे.... क्या सोचने लगे..? मैं भी वही सोच रही हूँ जो तुम सोच रहे हो.... यही सोच रहे हो न कि उन्हें मेरी ज़रुरत है...इसलिए मेरे बीमार होने से परेशान हो जाते हैं....उन्हें डर लगता है कि अगर मुझे कुछ हो गया तो उनके बच्चों को कौन संभालेगा...?? अच्छा सुनो... तुम्हारी वाली तुम्हारा ख्याल रखती है कि नहीं...?? मेरे बारे में उसे कभी कुछ बताते हो कि नहीं....???
पता है...मैं अपने पति के साथ तभी खुश हो पाती हूँ, जब उनमे तुमको देखने लगती हूँ... हर किसी में तुमको ढूंढती रहती हूँ.....अपने छोटे वाले बेटे का नाम मैंने सत्यम रखा है.... हंसो मत चोट्टा... वह बिल्कुल तुम्हारी तरह दीखता है, इसीलिए मैंने तुम्हारा नाम रख दिया है उसे......बस यही एक सुख है जीवन में....पत्नी न सही कम-से-कम तुम्हारी माँ तो बन गई....हाहाहा ..हहहाह...जब भी तुम पर गुस्सा आता है उसका कान ऐंठ लेती हूँ...!! वैसे, तुम्हारी बेटी का क्या नाम है...?


3 मई, 2014 
'Kya Dilli Kya Lahaur'. It's not just a movie, it's a work of art..a pure poetry.. a poetry which stirs all the chords of your heart..it makes u think.. it makes you cry... it makes you emotional..it makes you laugh... and makes you miss your beloved.. Never had I seen a movie of this sort.. I don't remember ever stepping out of the cinema with tears-filled eyes...!! Never before was I touched so deeply.

28, अप्रैल 2014 
I can read mind. It goes like this 'm' fir 'I', then 'n' aur end mein 'd'.

२७ अप्रैल, २०१४
अजीब पागलपन में जी रहा हूँ. जब भावुक या प्रेम में होता हूँ, तो ऐसा अजीब-सा हो जाता हूँ कि क्या कहूं... मतलब बिल्कुल छोटे बच्चों-सी हालत हो जाती है. कुछ भी बोलने लगता हूँ, कुछ भी करने लगता हूँ. आप सोच भी नहीं सकते कि क्या कुछ करने लगता हूँ, जोम्बी हो जाता हूँ बिल्कुल. 
और जब कुछ समय बाद सबकुछ नार्मल हो जाता है, भावनाओं का ज्वर शांत हो चूका होता है, तब एकदमसे आसमान में पहुचं जाता हूँ. अब मैं गौतम बुद्ध हो जाता हूँ. फिर 'जब we met' की करीना कपूर की तरह सोचने लगता हूँ, 'क्या मैं इतना बड़ा गधा था, इतना चोमू कैसे हो सकता हूँ मैं?' अब मुझे ज्ञान का दौरा पड़ने लगता है. जीवन माया और ब्रह्म सत्य लगने लगता है. 
यही खेल चलता रहता है..कुछ दिन हाथ-पैर सब छोड़कर, आँखे बंद किए, भावनाओं की गंगा में बह रहा होता हूँ. फिर एकदिन अचानक ज्ञान की गौरीशंकर पर बैठ जाता हूँ.


चित्र साभार- गूगल 

26 अप्रैल, २०१४ 
गर्दन में मोच आ गई है, पीछे नहीं देख सकता हूँ. काश! ज़िन्दगी को भी मोच आ जाती.


26 अप्रैल, २०१४ 
'रिवाल्वर रानी' देखने गया था| कंगना ने कमाल की एक्टिंग की है, पीयूष मिश्रा की एक्टिंग भी दमदार थी| कहानी में भी दम था, लेकिन डायरेक्ट ने फिल्म की बैंड बजा दी है| एडिटिंग में भी खोट था| मूवी बहुत अच्छी हो सकती थी, in fact बहुत ही अच्छी हो सकती थी| लेकिन कई मामलों को एक साथ लेकर चलने की वजह से सबकुछ गुह-गोबर हो गया| 
खैर, फिल्म देखने लायक है, इमोशन है, डार्क कॉमेडी है, एक्शन है..और poor ड्रामा भी है| गाने कुछ खास नहीं है|

23 अप्रैल २०१४ 
(ऐसे ही कुछ लिख दिया है, अगर बकवास पढ़ी हो तो आगे बढ़ें...अन्यथा टाइम ख़राब न करें..)

कल इलेक्शन की वजह से ऑफिस बंद है. वोट गिरना(बटन दबाना) मुझे पसंद नहीं है, और जो चीज पसंद न हो उससे मैं ख़ुद को दूर ही रखता हूँ. वैसे मेरा परिवार काफी राजनीतिक है, दादा जी गाँव के सपंच थे, पिता जी भी राजनीतिक मामलों में काफी सक्रीय रहते हैं, लेकिन मुझे राजनीति का झोल-झाल बचपन से ही पसंद नहीं है. जबतक वोट देने योग्य नहीं हुआ था, वोट देने की बड़ी इच्छा होती थी. पहली बार बिना वोटर आई.डी. कार्ड के किसी और के नाम पर वोट गिराया था. चतुरानन मिश्र को हंसुआ गेंहू पर वोट दिया था. मेरी उम्र उस समय तेरह-चौदह साल की रही होगी. उसके बाद भी एक दो बार वोट गिराया, माँ और पिता जी जब भी मुखिया के लिए खड़े हुए हैं, मजबूरन मैंने वोट गिराया है.
सोच रहा हूँ कल किताब पढ़ कर दिन गुज़ारूंगा, कई किताबें हैं जिन्हें पढ़ना है, जैसे 'चार्ली चैप्लिन' की आत्मकथा, आज ही अपने ऑफिस के एक दोस्त से मांग कर लाया हूँ. 'सत्यजीत राय की कहानियाँ' भी पड़ी हुई है, उनकी एक कहानी दो दिन पहले पढ़ी थी लेकिन मजा नहीं आया था. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की कहानी की किताब है, उसकी एक पढ़ी मुझे बेहद पसंद आई. देव साब की आत्मकथा भी पढ़नी है, दस पेज पढ़ी थी, मजेदार लिखी है उन्होंने. लेकिन किताब इतनी मोटी है कि देख कर ही हौसला पस्त हो जाता है, पता नहीं कबतक उसे खत्म कर पाउँगा. इसके अलावा भी कई किताबें हैं लिस्ट में इन्हें दस-पन्द्रह दिन में समाप्त करनी है. कुछ दिन पहले गुलज़ार साहब की 'रावी पार' पढ़ी थी, बहुत अच्छी किताब थी. इस्मत चुगताई की आत्मकथा 'काग़ज़ी है पैरहन' भी हाल में ही पढ़ी थी, पढ़कर एकदम से हिल गया था. राही मासूम रज़ा की 'आधा गाँव' अभी कुछ दिन पहले मंगाई थी, बहुत तारीफ़ सुनी है इसकी, देखना है पढ़ने के बाद कैसी लगती है. एक और किताब है शालिग्राम की 'किनारे के लोग', दो चार पेज पढ़ी थी, अच्छी लगी थी, उसे भी समाप्त करनी है. ऑफिस में सारा दिन लिखने-पढ़ने के बाद घर पर कुछ भी नया पढ़ने की हिम्मत नहीं रह जाती है. ऑफिस जाते आते टाइम बस में जो थोड़ा बहुत पढ़ लेता हूँ उसके अलावा पढ़ने का मौका नहीं मिलता है. कभी-कभी अपनी मर्ज़ी की किताब पढ़ने के लिए टाइम न निकाल पाने की वजह से कोफ़्त भी होती है. कई फ़िल्में है जो देखनी है, आज कल जैसी फिल्मे हॉल में देख रहा हूँ उससे सन्तुष्ट नहीं हो पता हूँ.
आज ऑफिस किशोर कुमार पर शोध करते वक्त उनकी एक इंटरव्यू पढ़ने को मिला, पढ़ते वक्त मैं हंस-हंस के पागल हुआ जा रहा था. मजेदार आदमी थे किशोर दा. फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों की जीवनी लिख-लिख कर थोड़ा उब भी गया हूँ...अब दार्शनिकों और विचारकों के बारे में लिखना चाहता हूँ.
व्यक्तिगत जीवन में बहुत उथल-पुथल चल रहा है आजकल. अपनी लव लाइफ से सन्तुष्ट नहीं हूँ. चित हमेशा शिकायतों से भरा रहता है. मैं चाहता कुछ हूँ, हो कुछ और रहा है. मानसिक रूप से बहुत ही ज्यादा परेशान रहता हूँ. प्रेम में असफल होकर मैं जीवन में सफल नहीं होना चाहता हूँ.


21 अप्रैल, 2014 
वो जो मैं लिखना चाहता हूँ, उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। और जो मैं लिखता हूँ उसमे मेरा कुछ भी नहीं है.. सिर्फ शब्द हैं। यही मेरा दुःख है।

21 अप्रैल, २०१४ 
'तुम कभी क्यों नहीं कहते कि मैं चाँद जैसी हूँ, कि मेरी आँखें झील-सी गहरी है, और मेरे होंठ गुलाब की पंखुड़ियों-सी नाज़ुक है, वगैरह-वगैरह. क्या मैं तुम्हे अच्छी नहीं लगती हूँ...या फिर तुम्हे मुझसे मोहब्बत ही नहीं है?', लड़की ये सब बोलकर लड़के की आँखों को पढ़ने की कोशिश करने लागती है. 
लड़का, लड़की की हाथ को पकड़ कर उसे पास खिचता है, और फिर उसके चेहरे को हाथ में लेकर निहारने लगता है. लड़की जैसे ही कुछ बोलने को होती है, वह अपने होठों को उसके होठों पर धर देता है. फिर जब थोड़ी देर बाद दोनों अलग होते हैं, तो लड़का, लड़की के दोनों हाथों को अपने हाथ में लेते हुए कहता है, " वो और लोग होंगे जिन्हें चाँद में महबूब दीखता था.. या फिर महबूब में चाँद .. मुझे तो तुम्हारे सिवा कहीं कुछ नहीं दीखता है... सब तुम्हारे जैसा है, लेकिन फिर भी तुम किसी के जैसी नहीं हो. मैं सब की तुलना तुमसे कर सकता हूँ, लेकिन तुमारी तुलना मैं किसी से नहीं कर सकता हूँ...मैं जब भी तुम्हे देखता हूँ अवाक् रह जाता हूँ, मेरी सांसे रुकने लगती है, इसीलिए तुमसे कभी कुछ कह नहीं पाता हूँ." अब लड़की की बारी थी लड़के को चुप करने की..

20 अप्रैल, 2014 
'2 स्टेट्स' एक बकवास मूवी है... परसों देखने गया था...मूड ख़राब हो गया..!! खुछ भी नया नही सबकुछ किताब से डिट्टो उठा लिया है...डायरेक्टर भोंदू लगता है...!! पहले आधे घंटे में लगता जैसे मूवी बहुत फ़ास्ट जा रही है...जहाँ मूवी को स्लो करना था वहां फ़ास्ट कर दिया है...और फ़ास्ट करना था वहां एक दम स्लो कर दिया है... इंटरवल के तो बाद मूवी उबाऊ हो जाती है.! अलिया अच्छी लगती है लिकिन अभिनय उससे ठीक से नहीं हो रहा था..अर्जुन कपूर कहीं से भी 'गीक' नहीं लग रहा था. रोनित रॉय तो ऐसा लगा जैसे 'उड़ान' से उठकर सीधे यहीं आ गए हैं. अमृता सिंह तो एकदम बेकार लगी...सब-कुछ ठूसा हुआ लग रहा था. मूवी देखने से अच्छा है किताब एकबार फिर से पढ़ लें...!

19 अप्रैल, २०१४ 
जिस तरह वोट गिराने के लिए वोटर आई.डी. कार्ड की ज़रुरत होती है, उसी तरह बाप बनने के लिए भी फादर आई.डी कार्ड होना चाहिए. ऐसे लोग जो मानसिक और आर्थिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं, उन्हें बच्चा पैदा करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए.

2 दिसम्बर, २०१५ 
बेसी नियम मत पादो....दारु बंद हो गया तो क्या....हम ताड़ी पीकर उमकेंगे..वैसे भी 1 अप्रैल तक एतना न ढकस लेंगे कि साला दू साल तक निसा नहीं उतरेगा।
-खिसियानी बिल्ली की भांति खंभा नोचता एक बिहारी शराबी


क्षमा, सज़ा और मनोविज्ञान

“He that is without sin among you, let him first cast a stone at her.” John, Viii, 7
दो विकल्प है अपने पास- सज़ा और क्षमा और दोनों ही आजमाया हुआ है, किसी से भी कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आता है| पुराने दिनों में इंगलैंड में लोगों को सबक सिखाने के लिए अपराधी को चौराहे पर खड़ा करके सजा दिया जाता था| इरादा यह था कि अपराधी को सजा पाते देख कर बांकी लोगों को सबक मिलेगा| लेकिन इस प्रयोग के कुछ ही दिन बाद पता चला कि जब अपराधी को सजा पता देखने के लिए लोग चौराहे पर इक्कठे होते तब पीछे उनके घरों में कोई चोरी कर रहा होता था| इतना ही नहीं जब लोग तमाशा देखने में खोये होते थे तब कोई उनका जेब काट रहा होता था| यह बहुत ही चौंकाने वाला मामला था| जल्दी ही इस प्रयोग को बंद कर दिया गया|
एक आदमी को जितने भी संभव और असंभव तरीके से सताया जा सकता है, अब तक उन सब तरीकों का इस्तेमाल किया जा चुका है, लेकिन अभी तक कोई भी उपाय कारगर सवित नहीं हुआ है, और ना ही आगे कभी हो सकता है| फिर भी पता नहीं क्यूं लोगों का अभी तक ‘सज़ा’ पर आस्था कैसे कायम है? जहाँ तक मेरी समझ है, मुझे ऐसा लगता है कि जिस तरह की मानसिकता वाले लोग अपराध करते हैं, ठीक उसी प्रकार की मानसिकता वाले लोग ‘सज़ा’ देने में रस लेते हैं| अपराधी की मानसिकता क्या है? कसाब ने कहा था, “जब मैं लोगों को खून में लथपथ तड़पता देखता हूँ तो मुझे मजा आता है”| ठीक यही मजा उन लोगों को भी मिलता है जो लोग न्या के नाम पर अपराधी को सज़ा देते हैं| हमारा सारा सुख दूसरों को दुखी देखने में हैं| यदि सजा देना सम्यक व स्वस्थ्य चित का लक्ष्ण होता तो फिर बुद्ध, महावीर, जीसस, रमण, और रामकृष्ण इत्यादि ‘क्षमा’ की बात नहीं करते| फिर जीसस नहीं कहते कि ‘पिटर अनंत बार माफ़ करना’| “Then came Peter, and said to him, Lord, how oft shall my brother sin against me, and I forgive him? Until seven times? Jesus saith unto him, I say not unto thee, Until seven times; but, Until seventy times seven.” Matthew, xviii, 21-22
नहीं, सजा देना या सजा देने की बात सोचना सभ्य चित का लक्षण नहीं है| एक सम्यक चित वाला व्यक्ति किसी को भी सज़ा देने से पहले हज़ार बार सोचेगा| हज़ार पहलुओं पर विचार करेगा, और जो भी विचार करेगा वह अंत में पाएगा कि सजा देना अमानवीय है| एक उदाहण से इसको समझते हैं, एक व्यक्ति पर चोरी का इल्जाम है, क़ानून के हिसाब से चोर को सज़ा मिलनी चाहिए| लेकिन क्या सजा देने से पहले यह सोचना ज़रूरी नहीं है कि उस व्यक्ति ने चोरी क्यूं किया, उसे चोरी क्यूं करना पड़ा? और इससे भी बड़ा सवाल जिसके यहाँ उसने चोरी की है वह कैसा व्यक्ति है, अगर जिसके यहाँ उसने चोरी की है वह ख़ुद चोर है, और बड़ा चोर है तो फिर इस व्यक्ति को सजा देना कितना उचित होगा? और यह कहने की ज़रूरत नहीं कि जिस समाज में 90 फीसदी लोग भूखे मर रहे हों, वहां धन इक्कठा करना चोरी है| इसी तरह जब कोई बलात्कार करता हैं तो वे सारे लोग जिम्मेवार हैं, जिन्होंने स्त्रियों पर अपनी मालकियत जमा रखी है|
चित्र सभार-गूगल 
संपत्ति पर किसी की मालकियत नहीं होनी चाहिए| आपके घर में जो अनाज की बोरी सड़ रही है, उस पर उन सब लोगों का हक़ है, जो भूखे मर रहे हैं| आपके बंगले में उन सब का हक़ है, जो खुले आसमां के नीचे ठंड से काँप रहे हैं| आपकी बपौती ज़मीन पर उन किसानो का हक़ है, जो अनाज के बिना भूखे मर रहे हैं| जब तक इस दुनिया में विवाह रहेगा तब तक वेश्यावृत्ति, व्यभिचार और बलात्कार को ख़त्म नहीं किया जा सकता है| जब तक ज़मीन और धन पर कुछ लोगों की मालकियत रहेगी तब तक चोरी और डकैती होते रहेंगे| कोई क़ानून, सजा, नरक, जेल, और शाशन व्यवस्था इनको ख़त्म नहीं कर सकता है| जैसे डॉक्टर का कुल काम इतना है कि कैसे स्वस्थ्य आदमी को बीमार बनाया जाए, ताकि उससे धन एंठा जा सकते, उसी तरह न्या व्यवस्था का कुल काम इतना है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपराधी की घोषित कर दिया जाए|
तो, सज़ा कोई विकल्प ही नहीं है| लेकिन मैं यह भी कह रहा हूँ कि क्षमा भी अब तक कारगर सवित नहीं हुआ है| फिर क्या करना चाहिए? फिर हमें क्षमा के मनोविज्ञान को समझना चाहिए| क्षमा के कई प्रकार हो सकते हैं| अगर क्षमा समझ से नहीं निकला हो तो उसका कोई परिणाम नहीं होता है| बल्कि संभावना यह है कि विपरीत परिणाम पैदा हो जाए| एक क्षमा ऐसा भी हो सकता है जिसमे आप यह माने कि सामने वाला अपराधी है, सज़ा का हक़दार है, लेकिन आपनी उदारता से उसे क्षमा कर रहे हैं| ऐसे क्षमा का उदेश्य ख़ुद को महान और दूसरे को तुक्ष्य सवित करना होता है| इस तरह के चालबाजी वाले क्षमा से कोई फर्क नहीं पड़ता है| अभी तक इसी तरह के क्षमा का उपयोग हम करते आए हैं|
असली ‘क्षमा’ चालबाजी से नहीं बल्कि इस समझ से पैदा होता कि ‘हम किसी को सजा देने के अधिकारी नहीं हैं, हम इतने पाप रहित नहीं हैं कि दूसरे को सजा दे सकें| और हम इतने समझदार भी नहीं हैं कि दूसरे के निर्णायक बन सकें”, इस समझ से ‘क्षमा’ पैदा होता है वो बड़ा ही शक्तिशाली होता है, इसी क्षमा से बुद्ध ने अंगुलिमाल को रूपांतरित कर दिया था| यह ‘क्षमा’ बुद्धि की चालबाजी से नहीं बल्कि हृदय की गहराई से निकलता है|
“An eye for an eye leaves the whole world blind”

सज़ा, समाज और मनोविज्ञान

पिछले लेख में मैंने बलात्कार के प्रकार (शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक) और सज़ा और समाधान के बारे बात की, साथ ही स्त्री-चित और पुरुष-चित की बात की, सज़ा के संबंध में बात करते हुए मैंने कहा कि अपराधी हो सजा ‘पकड़े’ जाने की मिलती है, अपराध की नहीं| इसी संबंध में कुछ और बातों की तरह आपका ध्यान खीचना चाहता हूँ|
1. अपराधी को सजा के रूप में शारीरक यातना देना और फांसी देने की परंपरा सदियों से चलता आ रहा है, लेकिन आज तक कहीं ऐसा उल्लेख नहीं कि है सजा पा कर कोई एक भी व्यक्ति सुधर गया हो| उल्टा सज़ा पाने के बाद और बिगड़ जाने के हजारों उल्लेख हैं| और इसके कई मनोवैज्ञानिक कारण हैं, अवल तो यह कि ‘कोई भी अपराधी यह नहीं मानता है कि उसे अपराध की सजा मिल रही है, गहरे में हर कोई जानता है कि सजा ‘पकड़े’ जाने की मिल रही है, अगर पकड़ा नहीं जाता तो कुछ नहीं होता| इसीलिए जेल से आने के बाद हर अपराधी और भी शातिर हो जाता है, जेल उसके लिखे ट्रेनिंग सेंटर का काम करता है| क्योंकि जेल में जिन लोगों के बीच उसे रखा जाता है वे कोई साधू-महात्मा नहीं होते हैं, चोर को चोरों की संगति में रखा जाता है, तो स्वाभाविक है कि संगति का असर होगा| दोयम, हर अपराधी यह जानता है कि जिन लोगों के द्वारा उसे सजा मिली है, वे लोग उससे बेहतर लोग नहीं है, और यह बात बहुत ही चोट पहुँचाने वाली है| इस बात का बोध कि जिन लोगों ने उसे सजा दी वे लोग ना सिर्फ उसी के जैसे हैं, बल्कि उनमे से कुछ ऐसे भी हैं जो उससे भी ज्यादा गये-बीते हैं, उससे भी बड़े अपराधी है| उसमे और जो लोग उससे सजा दे रहे हैं उनमे सिर्फ इतना फर्क हैं, वे लोग अपने अपराध को छिपाने में कुशल रहे हैं, और यह पकड़ा गया है| इसके बारे में ठीक से विचार कीजिये, यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है, इसके बहुत ही घातक मनोवैज्ञानिक परिणाम होते हैं| 
ऐसे में यह एक बहुत ही स्वभाविक सवाल बन जाता है कि वे लोग जो ख़ुद अपराधी हैं उन्हें कैसे यह ‘अधिकार’ मिल जाता है कि वे दूसरे लोगों को सजा दें? किसी को सजा देने का अधिकार बहुत ही बड़ा ‘अधिकार’ है, और संभवतः इस दुनिया में कोई भी इतना पवित्र/पाप-रहित नहीं है कि वह किसी और को सजा दे सके| इसीलिए जिसे भी सज़ा दी जाती है वह बदला लेगा, बदला लेना सुनिश्चित है, और स्वभाविक भी| अगर कोई बदलता नहीं लेता है तो समझ जाइए कि वह मनुष्य नहीं देवता है|

2. हमारे जेल में जितने लोग क़ैद हैं, उनमे बड़ी संख्या उन लोगों की हैं जो बिलकुल ही निर्दोष हैं| या तो किसी गलतफहमी की वजह से उन्हें क़ैद कर लिया गया है या फिर वे मोहरा बन गए हैं| दूसरी बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनसे ‘अनजाने में ग़लती हो गई है’, किसी कमज़ोर क्षण में, नशे में या फिर उन्हें पता है नहीं था कि वे जो कर रहे हैं वह कानून की नजर में सजा योग्य है| तीसरी बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनका अपराध निर्दोष है| निर्दोष–अपराध मतलब जिस परिस्थीती उन्होंने ने अपराध किया था, अगर उनकी जगह आप और मैं होते तो हम भी वही करते| चौथे वे लोग हैं जो भीड़ के साथ फिट नहीं बैठते हैं, जिनकी चेतना भीड़ से ऊपर की चेतना है, ये वो अपराधी हैं जिनको इनके समसामयिक पीटते हैं, लेकिन भविष्य इनको पूजता है, जीसस, सुकरात, बुद्ध, ओशो, महावीर, और कृष्ण इत्यादि चौथे तरह के अपराधी हैं| पांचवे वे लोग हैं जिनकी चेतना भीड़ से नीचे की चेतना हैं, जिनको आप ‘सच्चे अपराधी’ कह सकते हैं, लेकिन जितना अपराध इन्होने समाज के खिलाफ किया है उससे कम-से-कम दस गुना ज्यादा अपराध समाज ने इनके साथ किया है| बस इतने ही तरह के लोग हमारे क़ैदख़ानों में बंद हैं|
चित्र साभार- गूगल
3. मतलब जिस तरह लोगों को हमने सजा देने के नाम पर कैदखानों में बंद कर रखा है, उससे हज़ार गुना ज्यादा खतरनाक लोग आजाद घूम रहे हैं| मामला क़रीब-क़रीब ऐसा है कि बड़े चोरों ने छोटे चोरों को अपनी होशियारी से अपराधी घोषित करके जेलख़ानों में बंद कर दिया है| अब इस तरह की अमानवीय व्यवस्था से किसी को सुधार देंगे यह तो भूल ही जाइये| सदियों से सजा देने की परम्परा रही है, आज तक कुछ नहीं बदला, उल्टा अपराधी और जेलखाने दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं|
4. निदान क्या है? निदान सरल है, हमें सजा देने की परंपरा को ख़त्म करना होगा और समाज के व्यवस्था को बुनियादी रूप से बदलना होगा| पुलिस, कोर्ट-कचहरी, वकील, न्या-व्यवस्था ये सब फ़ालतू के बवाल हैं, बिलकुल ही यूज़लेस और अमानवीय हैं| इन सब से समाज को कोई फायदा नहीं हो रहा है| समाज में जो व्यवस्था आपको दिख रही है वह इनकी वजह से नहीं बल्कि इन सबे बावजूद है| जिन पांच तरह के अपराधियों की मैंने आपसे बात की हैं उनमे से चार को तो बिना किसी विलंब के माफ़ करके छोड़ देना चाहिए, और साथ ही अभी तक उनसे उनके साथ जो हमने अमानवीय व्यवहार किया है उसके लिए उनसे मांफी मांग लेनी चाहिए हैं| मतलब 90 फीसदी लोग जिनको हमने अपराधी मान रखा वे किसी भी अर्थों में अपराधी नहीं है| सिर्फ दस फीसदी लोग यानि पांचवे तरह के लोगों के बारे में सोचने की जरूरत हैं| सोचना सिर्फ इतना है कि उनको पनिशमेंट की नहीं ट्रीटमेंट की जरूरत है| उनके संग-साथ को बदलना है और बहुत ही मानवीय, धार्मिक और वैज्ञानिक तरीके से उनको कुछ बातें समझानी है|
5. सो, मेरी दिर्ष्टि में (और सिर्फ मेरी नहीं यह इस दुनिया में सभी बुद्धिजीवियों और विवेकशील लोगों की दृष्टि है), हमें बलात्कार रोकने के लिए क़ानून मजबूत करने की नहीं क़ानून व्यवथा को ख़त्म करने की ज़रूरत है| और एक ऐसी व्यवस्था को लाने की जरूरत है जिसकी बुनियाद स्त्री-चित के गुणों पर रखी गई हो|

Wednesday, 18 April 2018

बलात्कार, सजा, समाज और मनोविज्ञान

बलात्कार के कई रूप हैं- शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक| और हैरानी की बात हैं कि इन तीनो ही तलो पर समाज स्त्रियों के साथ बलात्कार कर रहा है| शारीरिक बलात्कार- बिना मर्जी के संबंध बनाना, मानसिक बलात्कार- वैवाहिक बंधन के आड़ में संबंध बनाना, आध्यात्मिक बलात्कार- प्रगति के नाम पर स्त्रियों को दूसरे दर्जे कर पुरुष बना देना| 
हमारी समझ ऐसी है कि 'बिना 'मर्जी' के किसी स्त्री के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार है'| यह बलात्कार की आम और क़ानूनी व्याख्या है| लेकिन 'मर्जी' बहुत ही है जटिल चीज है, क्योंकि 'मर्जी' को Manipulate किया जा सकता है| हज़ार तरीके से 'मर्जी' का शोषण किया जा सता है| लोभ देकर मर्जी का शोषण हो सकता है, डरा कर मर्जी का शोषण हो सकता है| और फिर विवाह क्या है? विवाह मर्जी का manipulation है| वाहयात धार्मिक और सामाजिक नियम/बंधन में बाँध कर स्त्री को पत्नी (गुलाम) बना लेना और ख़ुद उसका पति( मालिक) बन जाना क्या है? 'मर्जी' का manipulation है! 
तो हमें बलात्कार की व्याख्या बदलनी होगी, मेरे हिसाब से 'बिना 'प्रेम' के संबंध बनाना बलात्कार है', सेक्स अधिकार की उद्घोषणा नहीं बल्कि प्रेम की अभिव्यक्ति होनी चाहिए|' विवाह दासप्रथा का परिष्कृत रूप है| पहले अमीर लोग स्त्रियों को खरीद कर लाते थे और फिर उसका भोग करते थे| बाद में बुद्धिजीवियों ने जब इसका विरोध किया तो लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए चालबाज़ लोगों ने इस खरीद-बिक्री को 'विवाह' का नाम दे दिया और इसको धार्मिक ढंग से करने लगे| 
जब तक स्त्रियों को वैवाहिक बंधन से मुक्त हो कर संबंध बनाने की आजादी नहीं मिलेगी तब तक बलात्कार को खत्म नहीं किया जा सकता है| विवाह सभी प्रकार के व्यभिचार का जनक है| किसी व्यक्ति पर आप एकाधिकार कैसे कर सकते हैं? किसी व्यक्ति को अपनी बपौती बना लेना कैसी मानवता है? 
दूसरी बात, बलात्कार का दोषी सिर्फ व्यक्ति नहीं है, 'समाज' भी  है| एक व्यक्ति को अपराधी सवित कर देने से बलात्कार को कभी नहीं रोका जा सकता है| सजा देकर तो कभी भी नहीं| सजा देकर कभी भी किसी को भी सुधारा नहीं जा सकता है| क्योंकि पहली तो बात यह कि 'सजा का कोई भी संबंध अपराध से नहीं है, अगर सजा का संबंध अपराध से हो तो पूरा-का-पूरा समाज जेलखाने में बंद नजर आए| सजा का संबध 'पकड़े' जाने से है', कोई भी अपराधी यह नहीं मानता कि उसे अपराध की सजा मिली है, गहरे में वह जानता है कि सजा 'पकड़े' जाने की मिली है, अगर पकड़ा नहीं जाता तो कुछ भी नहीं होता |' वह जानता है कि हजारों ऐसे लोग हैं जो उससे भी बड़ी अपराध करके आजाद घूम रहे हैं, और जानता उनको पूजती है| फिर अपराध से तो बचने का तो मतलब नहीं, कोशिश बस इतनी होनी चाहिए कि पकड़े ना जाएं| 
और व्यक्ति कोई इकाई नहीं है, कोई भी व्यक्ति आसमान से नहीं टपकता है, जैसे पेड़ से पत्ता निकलता है, वैसे व्यक्ति समाज से निकलता है| अगर पत्ते में कोई दोष है तो दोष पेड़ का है, पत्ते का नहीं| एक व्यक्ति को व्यभिचारी बनाने में पुरे समाज का योगदान है| जब एक पुरुष बलात्कार करता है, तो वह सिर्फ 'एक' पुरुष नहीं है वह पुरे पुरुष समाज का प्रतिनिधित्व कर रहा है| सारे पुरुष उसके अपराध में शामिल हैं, और वे लोग तो ख़ासकर जो जो उसका विरोध करते हैं, और उसकी जान लेने के लिए पागल हैं| एक पुरुष जब किसी बलात्कारी का विरोध करता है तो जरूरी नहीं है कि उसके विरोध में इमानदारी हो, हो सकता है दूसरे के पाप का सहारा लेकर वह अपने पुण्य को निखार रहा हो| और यह भी हो सकता है कि उसका विरोध इर्ष्य से निकल रहा हो, कि भाई मैं तो सोचता ही रह गया और तुम ने कर दिखाया| 
मोविज्ञान की माने तो 'विरोध' हमेशा इस बात का सूचक है कि कहीं गहरे में विरोधी को अपराधी से लगाव है, और इस 'लगाव' तो छुपाने के लिए वह विरोध का सहारा ले रहा है| जीवन बड़ा जटिल है, मनुष्य के मन के कई तल हैं| कुछ भी 2 + 2 =4 की तरह सीधा और सरल नहीं है|
चित्र साभार- गूगल
भूल कहाँ हो रही है? भूल यह हो रही है कि रक्षक और भक्षक दोनों एक ही है इसकी पहचान नहीं हो पा रही है| एक पुरुष जो बलात्कार कर रहा है और दूसरा जो स्त्री की लाज बचा रहा है दोनों एक ही है| एक थोड़ा बेवक़ूफ़ है इसीलिए पकड़ में आ जा रहा है, दूसरा शातिर है इसीलिए छुप जा रहा है| फिर कैसे पहचान हो? पहचान करने के लिए हमें यह समझना होगा कि 'स्त्री' होना या 'पुरुष' होना सिर्फ शारीरिक घटना नहीं है| शरीर के साथ-साथ चेतना के भी दो प्रकार होते हैं, 'स्त्री चित और पुरुष चित है', इसीलिए हो सकता है कि एक व्यक्ति के पास शरीर पुरुष का हो लेकिन उसका चित स्त्री का हो-जैसे बुद्ध, जीसस, दादू, कबीर, रामकृष्ण, लओत्जु, दरिया, रूमी...ये सब ऐसे व्यक्ति हैं जिनका शरीर तो पुरुष का है लेकिन चित स्त्री का है| और इसका विपरीत भी हो सकता है शरीर स्त्री का हो लेकिन चित पुरुष का हो, जैसे- सभी आधुनिक स्तिर्याँ जो जींस पहन कर और हाथ में सिगरेट लिए घूम रही हैं, और संसद, में बॉर्डर पर और तमाम इस तरह के जगहों पर पुरुष के साथ कंधे-से-कन्धा मिला कर चल रही हैं| ये सब दुसरे दर्जें की पुरुष हैं| 
जितने भी मानवीय और सुन्दर गुण हैं- क्षमा, प्रेम, समर्पण, दान, करुणा, दया यह सब स्त्री-चित के गुण हैं| जब भी किसी पुरुष की चेतना का विकास होगा वह 'स्त्रैण (feminine) होने लगेगा| और जब भी किसी स्त्री का पतन होगा उसके भीतर पुरुष-चित के गुण बढ़ने लगेंगे- क्रोध, द्वेष, बदले की भावना, प्रतिस्पर्धा, महत्वाकांक्षा, लोभ इत्यादि| सो असली सवाल शरीर का नहीं चित का है| बुद्ध के पास शरीर पुरुष का है लेकिन फिर भी वे लाखों स्त्रियों से ज्यादा स्त्री हैं, और रानी लक्ष्मीबाई के पास शरीर स्त्री का है, लेकिन वह लाखों पुरुष से ज्यादा पुरुष हैं| इसीलिए जबतक स्त्री होने के लिए राजी नहीं हो जाती हैं, और पुरुष अपने भीतर स्त्रैण चित पैदा करने की कोशिश नहीं करते हैं, तब तक मामला नहीं सलट सकता है| अभी हमने स्त्रियों की कोमलता को कमजोरी और पुरुषों की कठोरता को ताकत मान लिया है| हम गुलाब की कोमलता को पत्थर की कठोरता से तौल रहे हैं, यह पागलपन है| जहाँ पुरुषों हाथ से हथियार छीन करके उनके हाथों में गुलाब देना था, वहां हमने  स्त्रियों के साथ से गुलाब छीन कर उनके हाथ में बन्दूक पकड़ा रहे हैं, और उनसे कह रहे हैं कि यह उनकी तरक्की है| पुराने समय में, स्त्रियों को जब पुरुषों ने दासी बनाया तब उनका उतना नुक्सान नहीं हुआ था, जितना आज हम उन्हें युद्ध में मैदान में खड़ा करके कर रहे हैं| स्त्रियों का पतन यानि पूरी मानव जाति का पतन| 
उचित हो कि हम स्त्री पुरुष का बंटवारा शरीर के आधार पर नहीं, बल्कि चित के आधार पर करें| तभी एक सम्यक समाज का निर्माण हो सकता है| अभी तक हमारा समाज पुरुष प्रधान रहा है, अब जरूरी है कि इसे हम स्त्री प्रधान बनाएं| स्त्री चित के मूल्यों की बुनियाद पर सामाज निर्माण हो| दो लोग किसी नियम या बंधन के तहत साथ ना रहें और ना ही प्रेम करें| ऐसे किसी भी संबंध को गैरकानूनी करार दिया जाए जिसका आधार प्रेम नहीं हो| पति-पत्नी जैसे अमानवीय-मानवीय संबंध को ख़त्म कर दिया जाए| फिर देखिए कैसे सारे व्यभिचार पलक झपकते ही ख़त्म हो जाते हैं| विवाह और वैश्यावृति एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, एक के जाते ही दूसरा गायब हो जाएगा| फिर प्रेम के बीज से जो बच्चा पैदा होगा वो कैसे किसी का बलात्कार कर पाएगा, आम के पेड़ में कैसे कडवे नीम लगेंगे? 
-इक्क्यु केंशो तजु 

Friday, 9 March 2018

प्रेम का सुमन अर्पित करता हूँ

आज, महिला दिवस के पावन अवसर पर, मैं, इक्क्यु केंशो तजु, इश्क़ और इबादत की प्रतिमूर्ति मीरा, भक्ति और श्रधा की पराकाष्ठा सहजो और दया बाई, ममता की देवी मरियम, मेगदालिन, महामाया, एनी बेसेंट, क्रांतिकारी स्त्री लल्ला, मैडम ब्लावट्स्की, ओशो की छाया माँ विवेक, बुद्ध की धर्म पत्नी यशोधरा, मौन की मंदिर संत भूरीबाई, सुकरात की पत्नी जेंथीप, बौध भिक्षुणी आम्रपाली, बुद्धि की मीनार-ए-आजम गार्गी, सहनशीलता की उतुंग शिखर पर बैठी तीन चोटी की स्त्री सीता, द्रोपदी और अहिल्या, पैगम्बर मोहम्मद की पहली पत्नी हजरत ख़दीजा, जुदास की वंशज माँ आनंद शीला, गाँधी की पत्नी बा कस्तूरबा, कृष्णमूर्ति की अनाम प्रेमिका, ब्रह्मवादिनी माँ मदालसा, पहली औरत देवी हव्वा, मेरी वकील माँ धर्मज्योति, तीर्थंकर मल्लीबाई, और अंत में वो तमाम औरत जिन्होंने मनुष्य की चेतना को नई उंचाई दी है, उन सबके चरणों में श्रधा और प्रेम का सुमन अर्पित करता हूँ.
चित्र साभार-गूगल

               https://www.facebook.com/dhyan.viram/videos/989450467874392/

Wednesday, 7 March 2018

बुद्ध पुरुष का भी दुबारा जन्म होता है.! (बुद्धत्व बंधन है-2)


पत्थर और परमात्मा के होश में सिर्फ मात्रा का भेद है. ना तो पत्थर पूर्ण बेहोशी में है, और ना ही परमात्मा पूर्ण होश में. 'पूर्ण' जैसा अस्तित्व में कुछ है ही नहीं. पत्थर भी इतना बेहोश नहीं है कि होश में ना आ सके, और परमात्मा भी इतने होश में नहीं है कि बेहोश ना हो सके. अस्तित्व में सब कुछ एक वर्तुल में घूमता है, पत्थर यात्रा करके परमात्मा हो जाता है, और फिर परमात्मा गिरते-गिरते पत्थर हो जाता है. पांच अध्यात्मिक झूठ है जो लोगों से कहा जाता है. 1. बुद्ध पुरुष जन्म-और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं. 2. बुद्धत्व की अवस्था है 3. ज्ञान स्थाई चीज है. 4. ज्ञान अनंत है. 5. हर कोई ज्ञानी हो सकता है. 

पदार्थ से लेकर परमात्मा तक सब एक वर्तुल में घूमते हैं, इस वर्तुल से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है. और बुद्धत्व कोई अवस्था नहीं है..ऐसी कोई स्थिथि नहीं आती जहाँ पहुंच कर कोई यह कह दे कि 'अब मैं पहुँच गाया मंजिल पर, इससे आगे अब कोई यात्रा नहीं होगी' ऐसा कभी नहीं होता है. 

जागरण के एक पॉइंट पर पहुँचने के बाद, परमात्मा फिर से पदार्थ की तरफ गिरने लगता है. यात्रा सदा जारी रहती है. और ज्ञान/जागरण हमेशा सिमित है. ऐसा कभी नहीं होगा कि एक साथ और एक समय पर लाखों लोग ज्ञान को उपलब्ध हो जाएँगे. एक समय में ज्यादा-से-ज्यादा आठ लोग जाग सकते हैं. और पूरा ज्ञान कभी किसी पर नहीं उतरता है. 
चित्र साभार- गूगल 
अगर आप नोटिस करेंगे तो पाएँगे कि यदि तीस की उम्र में कोई व्यक्ति ज्ञान की घोषणा करता है, और 60 की उम्र तक जिंदा रहता है, तो उसकी जीवन को यदि आप गौर से देखेंगे तो आप उसकी चेतना में स्पष्ट गिरावट पाएँगे. और यदि वही व्यक्ति 100 की उम्र तक जिन्दा रहता है, तो गिरावट इतना स्पष्ट हो जाएगा कि आपको यकीन ही नहीं आएगा कि 30 की उम्र में जो चेतना का स्तर था, और 100 के उम्र में जो चेतना है, वह दोनों एक ही व्यक्ति के हैं. 
उदाहण के लिए ओशो को लीजिये, उनके 60 और 70 के दशक के प्रवचनों को सुनिये, फिर आप 85 के बाद उनको सुनिये, एक स्पष्ट अंतर पाएंगे आप. यही सब के साथ होता है, कृष्णमूर्ति, गुरजिएफ. बुद्ध, महावीर, कृष्ण सबके जीवन में आप ऐसा ही पाएँगे.यही सनातन नियम है.

Tuesday, 6 March 2018

'बुद्धत्व बंधन है'

आप से यह तो सबने कहा कि पत्थर में भी परमात्मा है, लेकिन परमात्मा भी पत्थर है यह किसी ने नहीं कहा. सदियों से इसे छुपाया गया है. अगर इस जगत में कुछ भी पूरा अचेतन नहीं है, तो वो जो पूरा चेतन है, जिसे आप 'परमात्मा' कहते हैं, वह भी पूरा चेतन नहीं हो सकता है. अगर पत्थर पूरा बेहोश नहीं है, तो इस यह अर्थ हुआ कि 'बुद्ध' भी पूरे होश में नहीं है. यह मैं आपसे नई बात कह रहा हूँ, जो लोग ज्ञान, ध्यान, और बुद्धत्व का धंधा लगा कर बैठे हैं, वे कभी आप से यह नहीं कहेंगे.
इसको ठीक से समझिये, अनुभव सदा विपरीत का होता है, पूर्ण का कोई अनुभव नहीं हो सकता. और 'अस्तित्व' में कुछ भी पूर्ण नहीं है, सब कुछ प्रोसेस में है. 'मुक्ति' संभव नहीं है, मुक्त होने या बुद्ध होने की चाह असंभव की चाह है. मुक्ति का अनुभव ही तभी हो सकता है जब कुछ बंधन शेष हो. और यदि हमें बंधन का अनुभव होता है, तो वो सिर्फ इसलिए क्योंकि हम पूरे बंधे हुए नहीं है, कुछ है हम में जो मुक्त है.
चित्र साभार- गूगल
इसीलिए, बुद्ध, महावीर, ओशो, कृष्ण, और शिव कोई भी पूर्ण मुक्त नहीं है. और ना ही हो सकते हैं. जो भी आपसे यह कह रहा कि मैं बुद्ध हूँ, मुक्त हूँ, स्वतंत्र हूँ, वो सब आपको बेवक़ूफ़ बना रहे हैं. और आप भी जब यह कहते हैं कि मैं बंधा हूँ, अज्ञानी हूँ, अबुद्ध हूँ, अन्धकार में हूँ, तब आप ख़ुद को और दूसरे को ठग रहे हैं. 'मैं बुद्धू हूँ और मैं बुद्ध हूँ' दोनों ही स्टेटमेंट नासमझी की है. न तो यहाँ कोई बुद्ध है और ना ही कोई बंधा हुआ है.

Saturday, 3 February 2018

तुम कौन हो?


यह तो नहीं पता लेकिन कुछ बातें जो पता है, वो आपको बता  देता हूँ.
ओशो मेरे गुरु तथा कृष्णमूर्ति मेरे पथप्रदर्शक हैं. जॉर्ज गुरजिएफ से मेरा अंतरंग संबंध है. लाओत्से से मैंने जीवन के गूढ़तम रहस्यों को जाना है. मीरा से मैंने नाचना सीखा है. कबीर को मैंने फ़ुर्सत में गुनगुनाया है. जीसस से मैं परिचित हूँ. बुद्ध से प्रेम है. शिव को पूजता हूँ. नानक को पढ़ा है. दरिया से कुछ शब्द उधार लिये हैं. सहजो के साथ मस्ती में झुमा हूँ. पलटू से प्रेम का पाठ सीखा है. लल्ला से पागलपन सिखा है. एलन वॉट्स से गहरी दोस्ती है. रमन से आत्मअनुसन्धान का पाठ पढ़ा है. महावीर से ब्रह्मचर्य पर चर्चा की है. कृष्ण को जन्म से जानता हूँ. मोहम्मद को राह चलते हुए कई बार सलाम किया है. एकहार्ट टोले को देखकर मुस्कुराता हूँ. मूजी से मौन संवाद किया है. नीत्शे को समझता हूँ. मिरदाद से मिला हूँ. ग़ालिब को तकिये के नीचे रखकर सोता हूँ. अहमद फ़राज़ को दिल का दर्द सुनाया है. गुलज़ार के साथ चाय पी है. मीर को जिया हूँ. मुल्लानसरुद्दीन के साथ हँसा हूँ. रूमी से एक बार आँसू पोछने के लिए रूमाल लिया था. आम्रपाली के घर एक रात ठहरना चाहता हूँ, हरमनहेस को तर्पण देता हूँ. इर्विंग स्टोन को चाय पर आमंत्रित करना चाहता हूँ. रेणु के साथ एक बार बिहार घूमना चाहता हूँ. अमृता प्रीतम से प्रेम पत्र लिखवाना चाहता हूँ. इस्मत आपा से एक बार हाथ मिलाना चाहता हूँ. फ्रायड को एक बार सक्रीय ध्यान करते हुए देखना चाहता हूँ, सत्यजीत रे के साथ बैठकर एक फिल्म देखना चाहता हूँ. बच्चन की मधुशाला में एक बार शराब पी थी. गोपालदास नीरज के साथ रोया हूँ. मंटो से एक बार मिलना चाहता हूँ. रवींद्रनाथ के पैर छूना चाहता हूँ. टिच नहत हनह के साथ सत्यसंग करना चाहता हूँ. रिन्झाई के साथ चांदनी रात में नौकाविहार करना चाहता हूँ. मैडम बलवात्सकी को डाँटना चाहता हूँ. टोलस्टोय को धन्यवाद देना चाहता हूँ. इवान तुर्गनेव के कंधे पर हाथ रखकर थोड़ी दूर चलना चाहता हूँ. दोस्तोवसकी की पीठ ठोकना चाहता हूँ. ख़लील जिबरान से जलता हूँ. मंसूर की तरह मरना चाहता हूँ. विमलकृति से प्रभावित हूँ. मखलीगोशाल को मिस करता हूँ. विवेकानंद से लगाव है. रामकृष्ण के चरणों में श्रध्दा का सुमन अर्पित करता हूँ. संसार से ऊब गया हूँ. सन्यास को त्याग दिया है. ध्यान नहीं करता हूँ. भक्ति जमता नहीं है. प्रेम अपने बस की नहीं है. तर्क करने में कुशल हूँ. लेकिन गुरु नहीं बनना है (हालाँकि इच्छा बहुत है). बुद्धत्व के बारे में बुद्ध से भी ज़्यादा पता है लेकिन फिर भी बुद्धू हूँ. और क्या जानना है आपको?

Friday, 2 February 2018

बुद्धत्व की घोषणा


एक दोस्त कल वहत्सप पर मुझसे कह रहा था, “तुम अपने बुद्धत्व की घोषणा क्यों नहीं कर देते हो? ”अब क्या बोलूँ उसको....,

भाई मेरे, दो-चार ज्ञान की और अच्छी-अच्छी बातें कर लेने से कोई बुद्ध नहीं हो जाता है. तुम भी दर्शन और मनोविज्ञान की चार किताबें पढ़ लो, मेरे जैसे हो जाओगे. फिर चाहो तो तुम अपने ज्ञान की घोषणा कर देना..

लेकिन एक बात जो मुझे समझ नहीं आती है,वह यह कि यदि कोई व्यक्ति अपने बुद्धत्व की घोषणा करता है, तो मैं देखता हूँ कि लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं यह समझाने के लिए कि वह कोई बुद्ध नहीं है, बस उसे भ्रम हो गया है. और उन्ही लोगों को मैं देखता हूँ किसी से ये कहते हुए कि ‘भाई आप तो बुद्ध हैं, आपको ज्ञान घट गया, मुझसे मत छुपाईये, मैं सब समझता हूँ.!’ कमाल है!
क्या बुद्धत्व से ऊपर की भी कोई ऐसी अवस्था है जहाँ आदमी को यह पता चल जाता है कि कौन सच में बुद्ध है और कौन नक़ली है?

Saturday, 27 January 2018

यहाँ की शांति में भी शोर है

गोवा में एक तरह की बेचैनी है, जो सिर्फ गोवा जैसी जगहों में ही होती है. यहाँ पंद्रह दिन बिताने के बाद मुझे ऐसा महसूस हो रहा कि शास्त्रों में जिस तरह के स्वर्ग का वर्णन है, अगर वैसे किसी स्वर्ग में मुझे कभी भेजा गया, तो मैं निश्चित ही उब जाऊंगा. यहाँ की शांति में भी शोर है. हंसी की पृष्ठभूमि में अगर उदासी का महासागर ना हो, तो हंसी ओछी व छिछली हो जाती है. किसी मरघट की शांति जैसी है यहाँ की चहलपहल-डरावनी और व्यर्थ. यहाँ की सार्थकता बस इतनी है कि लंबे समय तक रुकने के बाद इसकी निरर्थकता सिद्ध हो जाती है. और फिर जब आप यहाँ से पलायन करते हैं तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखते हैं. इसको मैं उपलब्धी मानता हूँ. किसी चीज़ को इतनी समग्रता से जी लेना कि उसकी व्यर्थता नज़र आने लगे.

"अब आए हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए
ये शहर कब से है वीराँ वो लोग कब के गए"

स्वर्ग यहीं और अभी है

‘गंदी राजनीति, भ्रष्ट नेता, पागल भीड़, इत्यादि-इत्यादि.. इन शब्दों से ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं कोई राजनीति ऐसी भी होगी जो अच्छी होगी, कोई नेता ऐसा भी होगा जो भ्रष्ट नहीं होगा, या फिर कोई भीड़ ऐसी भी होगी जो पागल नहीं होगी.ये सभी शब्द इसी तरह का भ्रम पैदा करते हैं. लेकिन, जैसे शांत तूफ़ान नहीं होता, उजली रातें नहीं होती, वैसे ही नेता जब भी होगा भ्रष्ट ही होगा, अच्छा नेता हो ही नहीं सकता, भीड़ मतलब पगलों की जमात, और राजनीति मतलब गंदगी. इसीलिए मेरे हिसाब से इन सब की निंदा करने का कोई अर्थ नहीं है- जो लोग ऐसा करते हैं वे बहुत गहरे में इन से प्रभावित हैं. विरोध से सिर्फ़ आकर्षण का पता चलता है- केजरीवाल राजनीति और भ्रष्टाचार का विरोध करते थे, आज वह ख़ुद वही सब कर रहे हैं. रामदेव जिस मार्केट की निंदा करते थे, आज उसी में कंठ तक डूबे हुए हैं. सदा ऐसा ही होता है, और ऐसा ही होता रहेगा, हम विरोध उसी का करते हैं जिससे हमारा लगाव होता है, यानी मौका मिलने पर जिसके जैसा हम बनना चाहते हैं. एक गरीब, अमीरों के खिलाफ तभी तक बोलता है, जब तक कि वह ख़ुद अमीर नहीं बन जाता है. अमीर बनते ही वह वही सब करने लगता है जिसकी वह विरोध किया करता था. यही सनातन नियम है. 
इस दुनिया में जितने बुरे लोग है, उससे कई गुणा ज़्यादा भले लोग हैं. सिर्फ़ ३३ % लोग बुरे हैं पूरी दुनिया में. लेकिन पत्रकार, टीवी वाले, धर्मगुरु, कवि, शायर, लेखक और तथाकथित समाज सुधारक सिर्फ़ इन्हीं ३३% की भाटगिरी करते नज़र आते हैं. ऐसा क्यों.......? क्योंकि ये उसी ३३% के हिस्सा हैं. दोनो एक-दूसरे के सहयोगी है-एक को ख़बर में रहना है और दूसरे को ख़बर बेचना हैं. एक के बिना दूसरा नहीं टिक सकता है. 
लेकिन, इन दोनो के अलावा एक और भी है. सिर्फ़ बंदर और मदारी से खेल नहीं हो सकता है. दर्शक की उपस्तिथिती अपरिहार्य है.असल में खेल दर्शक के लिए ही होता है. अगर दर्शक ना हो तो, ना तो ज्यादा देर डुगडुगी बजेगी, और ना ही बन्दर का ताथैया चलेगा. 
चित्र साभार-गूगल 
असली गुनहगार 'हम' और आप' हैं-हम से मेरा तात्पर्य उन लोगों से हैं जो नकारात्मक ख़बरों, कविताओं, नगमों, किताबों, फिल्मों, साहित्यों, गीतों, इत्यादि में रस लेते हैं. जिस दिन हम रस लेना बंद कर देंगे उस दिन यह सब समाप्त हो जाएगा. जिस भी चीज़ पर हम ध्यान देते हैं वही बढ़ने लगता है. हम दंगा, फसादों, बलात्कारों, हंगामाओं पर ध्यान देते हैं, इन में रस लेते हैं, इसके बारे में अच्छा-बुरा बोलते हैं, इसलिए यह सब जिन्दा है. 
तो क्या अगर हम कल से अनादं के गीत गाने लगे, आनंद की बात करने लगें, तो यह जो दुनिया में घट रहा है समाप्त हो जएगा? नहीं...ऐसा कुछ भी नहीं होगा. ना तो नकारात्मकताएं ख़त्म होंगी और ना ही आनंद बढेगा. बस इतना होगा कि आप 33% की जमात से निकल कर 67% की जमात में आ जाएँगे. फिर आपको 33% लोगों से कोई शिकायत नहीं होगी, बल्कि सहानुभूति होगी.. तब आप जानेंगे कि 67% की शांति 33% लोगों की पागलपन पर टिकी हुई है. फिर आप पाएँगे कि अशांति, शांति विरोधी नहीं है, बल्कि सहयोगी है. 
जब तक आप 33% में शामिल है, तब इस दुनिया में सिर्फ अंधकार, ही अंधकार है, दुःख-ही-दुःख है, चोर-ही-चोर है, लुटेरे-ही-लुटेरे हैं. सब गलत हो रहा है यहाँ, सब बेकार है. फिर आपके लिए 'संसार दुःख है, फिर आपका सुख इस संसार से बाहर कहीं स्वर्ग(भविष्य) में है. लेकिन जैसे भी आप 67% में शामिल होते हैं. स्वर्ग यहीं और अभी है, यह युग सत्युग है. फिर जीवन आपके लिए उत्सव है, हर दिन आपके लिए परमात्मा से मिला प्रसाद है, जिसे आप अहोभाव से ग्रहण करते यानी जीते हैं. फिर आप रवीन्द्रनाथ की तरह यहाँ बार-बार आने की परमात्मा से प्राथना करते हैं. फिर आप असरारुल हक़ मजाज़ की तरह गाते हैं..........

"हर आन यहाँ सहबा-ए-कुहन, इक सागर-ए-नौ में ढलती है।
कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है। 
याँ हुस्न की बर्क़ चमकती है, या नूर की बारिश होती है।
हर आह यहाँ एक नग़मा है, हर अश्क़ यहाँ इक मोती है।

हर शाम है, शाम-ए-मिस्र यहाँ, हर शब है, शब-ए-शीराज़ यहाँ।
है सारे जहाँ का सोज़ यहाँ, और सारे जहाँ का साज़ यहाँ।

ये दश्ते जुनूं दीवानों का, ये बज़्मे वफ़ा परवानों की।
ये शहर-ए-तरब रूमानों का, ये ख़ुल्द-ए-बरीं अरमानों की।
इस फ़र्श से हमने उड़-उड़कर, अफ़लाक के तारे तोड़े हैं।
नाहीद से की है सरगोशी, परवीन से रिश्ते जोड़े हैं।

इस बज़्म में तेगें खींची हैं, इस बज़्म में सागर तोड़े हैं।
इस बज़्म में आँख बिछाई है, इस बज़्म में दिल तक जोड़े हैं।

इस बज़्म में नेजे़ फेंके हैं, इस बज़्म में ख़ंजर चूमे हैं।
इस बज़्म में गिरकर तड़पे हैं, इस बज़्म में पीकर झूमे हैं।
ज़र्रात का बोसा लेने को, सौ बार झुका आकाश यहाँ।
ख़ुद आँख से हमने देखी है, बातिल की शिकस्त-ए-फाश यहाँ।

इस गुल कदा-ए-पारीना में फिर आग भड़कने वाली है।
फिर अब्र गरजने वाला है, फिर बर्क़ कड़कने वाली है।

जो अब्र यहाँ से उठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा।
हर जू-ऐ-रवां पर बरसेगा, हर कोहे गरां पर बरसेगा।"

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...