11 अगस्त, 2014
घर से ई सोच कर आते हैं कि आज खूब काम करेंगे...लेकिन रोज़ फालतू के काम सब में ओझरा जाते हैं...ई इंटरनेट बड़का आफत हो गया है...रोज़ अपना जाल में हमको फसा लेता है....ससुरा खाली समय का जियान करबाता है...और होता-ओता कुछो नई है।
ससुरा... हमरे ऑफिस में पता नहीं कहाँ से मच्छर ढूक गया...पैर नीचे करके बैठते हैं तो सउंसे पैर-गोर को भंभोर लेता है।
To fool one is easy, to fool hundred is very easy and to fool thousands is the easiest thing possible.
22 जुलाई, 2014
You're God's, He is never yours.
21 जुलाई, 2014
You're having many things that you don't have at all.
16 जुलाई, 2014
जब से प्यार हुआ है जीवन में उरी-बीरी लग गया है। भकलोल नाहित दिन भए बौराए रहते हैं। न दाना-पानी नीक लगता है और न ही ठीक से नींद आती है। प्यार क्या किए आफत मोल ले लिए हैं।
हे छठ्ठी मैया ई भयंकर दुःख से हमको उबार दीजिये. अगिला साल दू घंटा पानी में ठाड़ होंगे हम...!!
2 जुलाई 2014
सुबह से खाली फूंही पड़ रहा है..एक बार झमक कर बरस जायेगा सो नहीं...ई फूं-फा से का होगा जी इंद्र महराज...एक बार कस के बरसाइये तब्बे कुछ होगा....
4 मई, 2014
क्यों हो गए हालात से मज़बूर तुम? अगर हालात से ही मज़बूर थे तो मौत चुन लेते, ज़िन्दगी ही को क्यों चुना तुमने? तुम तो कहते थे कि मैं तुम्हारी ज़िन्दगी हूँ, फिर ये जो तुम जी रहे हो....किसकी जिन्दगी जी रहे हो तुम? अच्छा ये सब छोड़ो... ये बताओ वो जो तुम्हारी वाली है.. वो दिखने में कैसी है...? मुझसे अच्छी है क्या...? तुम कभी उसकी कोई फोटो मुझे क्यों नहीं भेजते हो? डर लगता है कि कहीं मैं मजाक उड़ाउंगी उसकी... कुछ नहीं बोलूंगी रे मैं... सूरत भले ही अच्छी न हो उसकी... तकदीर में तो मुझसे अच्छी है ही.... पता है, रवि मेरा बहुत ख्याल रखते हैं.... बहुत प्यार करते हैं मुझसे...तुमसे तो बहुत ही अच्छे हैं....तुम्हे तो कभी मेरी परवाह ही नहीं थी...तुम्हारे साथ तो बीमार पड़ने में बिल्कुल मज़ा नहीं आता था... मेरी बीमारी का भी मजाक बना देते थे तुम.....मुझसे सर्दी भी हो जाती है तो रवि परेशान हो जाते है...इतना प्यार करते हैं वे मुझसे.... क्या सोचने लगे..? मैं भी वही सोच रही हूँ जो तुम सोच रहे हो.... यही सोच रहे हो न कि उन्हें मेरी ज़रुरत है...इसलिए मेरे बीमार होने से परेशान हो जाते हैं....उन्हें डर लगता है कि अगर मुझे कुछ हो गया तो उनके बच्चों को कौन संभालेगा...?? अच्छा सुनो... तुम्हारी वाली तुम्हारा ख्याल रखती है कि नहीं...?? मेरे बारे में उसे कभी कुछ बताते हो कि नहीं....???
पता है...मैं अपने पति के साथ तभी खुश हो पाती हूँ, जब उनमे तुमको देखने लगती हूँ... हर किसी में तुमको ढूंढती रहती हूँ.....अपने छोटे वाले बेटे का नाम मैंने सत्यम रखा है.... हंसो मत चोट्टा... वह बिल्कुल तुम्हारी तरह दीखता है, इसीलिए मैंने तुम्हारा नाम रख दिया है उसे......बस यही एक सुख है जीवन में....पत्नी न सही कम-से-कम तुम्हारी माँ तो बन गई....हाहाहा ..हहहाह...जब भी तुम पर गुस्सा आता है उसका कान ऐंठ लेती हूँ...!! वैसे, तुम्हारी बेटी का क्या नाम है...?
3 मई, 2014
'Kya Dilli Kya Lahaur'. It's not just a movie, it's a work of art..a pure poetry.. a poetry which stirs all the chords of your heart..it makes u think.. it makes you cry... it makes you emotional..it makes you laugh... and makes you miss your beloved.. Never had I seen a movie of this sort.. I don't remember ever stepping out of the cinema with tears-filled eyes...!! Never before was I touched so deeply.
28, अप्रैल 2014
I can read mind. It goes like this 'm' fir 'I', then 'n' aur end mein 'd'.
२७ अप्रैल, २०१४
अजीब पागलपन में जी रहा हूँ. जब भावुक या प्रेम में होता हूँ, तो ऐसा अजीब-सा हो जाता हूँ कि क्या कहूं... मतलब बिल्कुल छोटे बच्चों-सी हालत हो जाती है. कुछ भी बोलने लगता हूँ, कुछ भी करने लगता हूँ. आप सोच भी नहीं सकते कि क्या कुछ करने लगता हूँ, जोम्बी हो जाता हूँ बिल्कुल.
और जब कुछ समय बाद सबकुछ नार्मल हो जाता है, भावनाओं का ज्वर शांत हो चूका होता है, तब एकदमसे आसमान में पहुचं जाता हूँ. अब मैं गौतम बुद्ध हो जाता हूँ. फिर 'जब we met' की करीना कपूर की तरह सोचने लगता हूँ, 'क्या मैं इतना बड़ा गधा था, इतना चोमू कैसे हो सकता हूँ मैं?' अब मुझे ज्ञान का दौरा पड़ने लगता है. जीवन माया और ब्रह्म सत्य लगने लगता है.
यही खेल चलता रहता है..कुछ दिन हाथ-पैर सब छोड़कर, आँखे बंद किए, भावनाओं की गंगा में बह रहा होता हूँ. फिर एकदिन अचानक ज्ञान की गौरीशंकर पर बैठ जाता हूँ.
चित्र साभार- गूगल
26 अप्रैल, २०१४
गर्दन में मोच आ गई है, पीछे नहीं देख सकता हूँ. काश! ज़िन्दगी को भी मोच आ जाती.
26 अप्रैल, २०१४
'रिवाल्वर रानी' देखने गया था| कंगना ने कमाल की एक्टिंग की है, पीयूष मिश्रा की एक्टिंग भी दमदार थी| कहानी में भी दम था, लेकिन डायरेक्ट ने फिल्म की बैंड बजा दी है| एडिटिंग में भी खोट था| मूवी बहुत अच्छी हो सकती थी, in fact बहुत ही अच्छी हो सकती थी| लेकिन कई मामलों को एक साथ लेकर चलने की वजह से सबकुछ गुह-गोबर हो गया|
खैर, फिल्म देखने लायक है, इमोशन है, डार्क कॉमेडी है, एक्शन है..और poor ड्रामा भी है| गाने कुछ खास नहीं है|
23 अप्रैल २०१४
(ऐसे ही कुछ लिख दिया है, अगर बकवास पढ़ी हो तो आगे बढ़ें...अन्यथा टाइम ख़राब न करें..)
कल इलेक्शन की वजह से ऑफिस बंद है. वोट गिरना(बटन दबाना) मुझे पसंद नहीं है, और जो चीज पसंद न हो उससे मैं ख़ुद को दूर ही रखता हूँ. वैसे मेरा परिवार काफी राजनीतिक है, दादा जी गाँव के सपंच थे, पिता जी भी राजनीतिक मामलों में काफी सक्रीय रहते हैं, लेकिन मुझे राजनीति का झोल-झाल बचपन से ही पसंद नहीं है. जबतक वोट देने योग्य नहीं हुआ था, वोट देने की बड़ी इच्छा होती थी. पहली बार बिना वोटर आई.डी. कार्ड के किसी और के नाम पर वोट गिराया था. चतुरानन मिश्र को हंसुआ गेंहू पर वोट दिया था. मेरी उम्र उस समय तेरह-चौदह साल की रही होगी. उसके बाद भी एक दो बार वोट गिराया, माँ और पिता जी जब भी मुखिया के लिए खड़े हुए हैं, मजबूरन मैंने वोट गिराया है.
सोच रहा हूँ कल किताब पढ़ कर दिन गुज़ारूंगा, कई किताबें हैं जिन्हें पढ़ना है, जैसे 'चार्ली चैप्लिन' की आत्मकथा, आज ही अपने ऑफिस के एक दोस्त से मांग कर लाया हूँ. 'सत्यजीत राय की कहानियाँ' भी पड़ी हुई है, उनकी एक कहानी दो दिन पहले पढ़ी थी लेकिन मजा नहीं आया था. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की कहानी की किताब है, उसकी एक पढ़ी मुझे बेहद पसंद आई. देव साब की आत्मकथा भी पढ़नी है, दस पेज पढ़ी थी, मजेदार लिखी है उन्होंने. लेकिन किताब इतनी मोटी है कि देख कर ही हौसला पस्त हो जाता है, पता नहीं कबतक उसे खत्म कर पाउँगा. इसके अलावा भी कई किताबें हैं लिस्ट में इन्हें दस-पन्द्रह दिन में समाप्त करनी है. कुछ दिन पहले गुलज़ार साहब की 'रावी पार' पढ़ी थी, बहुत अच्छी किताब थी. इस्मत चुगताई की आत्मकथा 'काग़ज़ी है पैरहन' भी हाल में ही पढ़ी थी, पढ़कर एकदम से हिल गया था. राही मासूम रज़ा की 'आधा गाँव' अभी कुछ दिन पहले मंगाई थी, बहुत तारीफ़ सुनी है इसकी, देखना है पढ़ने के बाद कैसी लगती है. एक और किताब है शालिग्राम की 'किनारे के लोग', दो चार पेज पढ़ी थी, अच्छी लगी थी, उसे भी समाप्त करनी है. ऑफिस में सारा दिन लिखने-पढ़ने के बाद घर पर कुछ भी नया पढ़ने की हिम्मत नहीं रह जाती है. ऑफिस जाते आते टाइम बस में जो थोड़ा बहुत पढ़ लेता हूँ उसके अलावा पढ़ने का मौका नहीं मिलता है. कभी-कभी अपनी मर्ज़ी की किताब पढ़ने के लिए टाइम न निकाल पाने की वजह से कोफ़्त भी होती है. कई फ़िल्में है जो देखनी है, आज कल जैसी फिल्मे हॉल में देख रहा हूँ उससे सन्तुष्ट नहीं हो पता हूँ.
आज ऑफिस किशोर कुमार पर शोध करते वक्त उनकी एक इंटरव्यू पढ़ने को मिला, पढ़ते वक्त मैं हंस-हंस के पागल हुआ जा रहा था. मजेदार आदमी थे किशोर दा. फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों की जीवनी लिख-लिख कर थोड़ा उब भी गया हूँ...अब दार्शनिकों और विचारकों के बारे में लिखना चाहता हूँ.
व्यक्तिगत जीवन में बहुत उथल-पुथल चल रहा है आजकल. अपनी लव लाइफ से सन्तुष्ट नहीं हूँ. चित हमेशा शिकायतों से भरा रहता है. मैं चाहता कुछ हूँ, हो कुछ और रहा है. मानसिक रूप से बहुत ही ज्यादा परेशान रहता हूँ. प्रेम में असफल होकर मैं जीवन में सफल नहीं होना चाहता हूँ.
21 अप्रैल, 2014
वो जो मैं लिखना चाहता हूँ, उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। और जो मैं लिखता हूँ उसमे मेरा कुछ भी नहीं है.. सिर्फ शब्द हैं। यही मेरा दुःख है।
21 अप्रैल, २०१४
'तुम कभी क्यों नहीं कहते कि मैं चाँद जैसी हूँ, कि मेरी आँखें झील-सी गहरी है, और मेरे होंठ गुलाब की पंखुड़ियों-सी नाज़ुक है, वगैरह-वगैरह. क्या मैं तुम्हे अच्छी नहीं लगती हूँ...या फिर तुम्हे मुझसे मोहब्बत ही नहीं है?', लड़की ये सब बोलकर लड़के की आँखों को पढ़ने की कोशिश करने लागती है.
लड़का, लड़की की हाथ को पकड़ कर उसे पास खिचता है, और फिर उसके चेहरे को हाथ में लेकर निहारने लगता है. लड़की जैसे ही कुछ बोलने को होती है, वह अपने होठों को उसके होठों पर धर देता है. फिर जब थोड़ी देर बाद दोनों अलग होते हैं, तो लड़का, लड़की के दोनों हाथों को अपने हाथ में लेते हुए कहता है, " वो और लोग होंगे जिन्हें चाँद में महबूब दीखता था.. या फिर महबूब में चाँद .. मुझे तो तुम्हारे सिवा कहीं कुछ नहीं दीखता है... सब तुम्हारे जैसा है, लेकिन फिर भी तुम किसी के जैसी नहीं हो. मैं सब की तुलना तुमसे कर सकता हूँ, लेकिन तुमारी तुलना मैं किसी से नहीं कर सकता हूँ...मैं जब भी तुम्हे देखता हूँ अवाक् रह जाता हूँ, मेरी सांसे रुकने लगती है, इसीलिए तुमसे कभी कुछ कह नहीं पाता हूँ." अब लड़की की बारी थी लड़के को चुप करने की..
20 अप्रैल, 2014
'2 स्टेट्स' एक बकवास मूवी है... परसों देखने गया था...मूड ख़राब हो गया..!! खुछ भी नया नही सबकुछ किताब से डिट्टो उठा लिया है...डायरेक्टर भोंदू लगता है...!! पहले आधे घंटे में लगता जैसे मूवी बहुत फ़ास्ट जा रही है...जहाँ मूवी को स्लो करना था वहां फ़ास्ट कर दिया है...और फ़ास्ट करना था वहां एक दम स्लो कर दिया है... इंटरवल के तो बाद मूवी उबाऊ हो जाती है.! अलिया अच्छी लगती है लिकिन अभिनय उससे ठीक से नहीं हो रहा था..अर्जुन कपूर कहीं से भी 'गीक' नहीं लग रहा था. रोनित रॉय तो ऐसा लगा जैसे 'उड़ान' से उठकर सीधे यहीं आ गए हैं. अमृता सिंह तो एकदम बेकार लगी...सब-कुछ ठूसा हुआ लग रहा था. मूवी देखने से अच्छा है किताब एकबार फिर से पढ़ लें...!
19 अप्रैल, २०१४
जिस तरह वोट गिराने के लिए वोटर आई.डी. कार्ड की ज़रुरत होती है, उसी तरह बाप बनने के लिए भी फादर आई.डी कार्ड होना चाहिए. ऐसे लोग जो मानसिक और आर्थिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं, उन्हें बच्चा पैदा करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए.
2 दिसम्बर, २०१५
बेसी नियम मत पादो....दारु बंद हो गया तो क्या....हम ताड़ी पीकर उमकेंगे..वैसे भी 1 अप्रैल तक एतना न ढकस लेंगे कि साला दू साल तक निसा नहीं उतरेगा।
-खिसियानी बिल्ली की भांति खंभा नोचता एक बिहारी शराबी
घर से ई सोच कर आते हैं कि आज खूब काम करेंगे...लेकिन रोज़ फालतू के काम सब में ओझरा जाते हैं...ई इंटरनेट बड़का आफत हो गया है...रोज़ अपना जाल में हमको फसा लेता है....ससुरा खाली समय का जियान करबाता है...और होता-ओता कुछो नई है।
ससुरा... हमरे ऑफिस में पता नहीं कहाँ से मच्छर ढूक गया...पैर नीचे करके बैठते हैं तो सउंसे पैर-गोर को भंभोर लेता है।
To fool one is easy, to fool hundred is very easy and to fool thousands is the easiest thing possible.
22 जुलाई, 2014
You're God's, He is never yours.
21 जुलाई, 2014
You're having many things that you don't have at all.
16 जुलाई, 2014
जब से प्यार हुआ है जीवन में उरी-बीरी लग गया है। भकलोल नाहित दिन भए बौराए रहते हैं। न दाना-पानी नीक लगता है और न ही ठीक से नींद आती है। प्यार क्या किए आफत मोल ले लिए हैं।
हे छठ्ठी मैया ई भयंकर दुःख से हमको उबार दीजिये. अगिला साल दू घंटा पानी में ठाड़ होंगे हम...!!
2 जुलाई 2014
सुबह से खाली फूंही पड़ रहा है..एक बार झमक कर बरस जायेगा सो नहीं...ई फूं-फा से का होगा जी इंद्र महराज...एक बार कस के बरसाइये तब्बे कुछ होगा....
4 मई, 2014
क्यों हो गए हालात से मज़बूर तुम? अगर हालात से ही मज़बूर थे तो मौत चुन लेते, ज़िन्दगी ही को क्यों चुना तुमने? तुम तो कहते थे कि मैं तुम्हारी ज़िन्दगी हूँ, फिर ये जो तुम जी रहे हो....किसकी जिन्दगी जी रहे हो तुम? अच्छा ये सब छोड़ो... ये बताओ वो जो तुम्हारी वाली है.. वो दिखने में कैसी है...? मुझसे अच्छी है क्या...? तुम कभी उसकी कोई फोटो मुझे क्यों नहीं भेजते हो? डर लगता है कि कहीं मैं मजाक उड़ाउंगी उसकी... कुछ नहीं बोलूंगी रे मैं... सूरत भले ही अच्छी न हो उसकी... तकदीर में तो मुझसे अच्छी है ही.... पता है, रवि मेरा बहुत ख्याल रखते हैं.... बहुत प्यार करते हैं मुझसे...तुमसे तो बहुत ही अच्छे हैं....तुम्हे तो कभी मेरी परवाह ही नहीं थी...तुम्हारे साथ तो बीमार पड़ने में बिल्कुल मज़ा नहीं आता था... मेरी बीमारी का भी मजाक बना देते थे तुम.....मुझसे सर्दी भी हो जाती है तो रवि परेशान हो जाते है...इतना प्यार करते हैं वे मुझसे.... क्या सोचने लगे..? मैं भी वही सोच रही हूँ जो तुम सोच रहे हो.... यही सोच रहे हो न कि उन्हें मेरी ज़रुरत है...इसलिए मेरे बीमार होने से परेशान हो जाते हैं....उन्हें डर लगता है कि अगर मुझे कुछ हो गया तो उनके बच्चों को कौन संभालेगा...?? अच्छा सुनो... तुम्हारी वाली तुम्हारा ख्याल रखती है कि नहीं...?? मेरे बारे में उसे कभी कुछ बताते हो कि नहीं....???
पता है...मैं अपने पति के साथ तभी खुश हो पाती हूँ, जब उनमे तुमको देखने लगती हूँ... हर किसी में तुमको ढूंढती रहती हूँ.....अपने छोटे वाले बेटे का नाम मैंने सत्यम रखा है.... हंसो मत चोट्टा... वह बिल्कुल तुम्हारी तरह दीखता है, इसीलिए मैंने तुम्हारा नाम रख दिया है उसे......बस यही एक सुख है जीवन में....पत्नी न सही कम-से-कम तुम्हारी माँ तो बन गई....हाहाहा ..हहहाह...जब भी तुम पर गुस्सा आता है उसका कान ऐंठ लेती हूँ...!! वैसे, तुम्हारी बेटी का क्या नाम है...?
3 मई, 2014
'Kya Dilli Kya Lahaur'. It's not just a movie, it's a work of art..a pure poetry.. a poetry which stirs all the chords of your heart..it makes u think.. it makes you cry... it makes you emotional..it makes you laugh... and makes you miss your beloved.. Never had I seen a movie of this sort.. I don't remember ever stepping out of the cinema with tears-filled eyes...!! Never before was I touched so deeply.
28, अप्रैल 2014
I can read mind. It goes like this 'm' fir 'I', then 'n' aur end mein 'd'.
२७ अप्रैल, २०१४
अजीब पागलपन में जी रहा हूँ. जब भावुक या प्रेम में होता हूँ, तो ऐसा अजीब-सा हो जाता हूँ कि क्या कहूं... मतलब बिल्कुल छोटे बच्चों-सी हालत हो जाती है. कुछ भी बोलने लगता हूँ, कुछ भी करने लगता हूँ. आप सोच भी नहीं सकते कि क्या कुछ करने लगता हूँ, जोम्बी हो जाता हूँ बिल्कुल.
और जब कुछ समय बाद सबकुछ नार्मल हो जाता है, भावनाओं का ज्वर शांत हो चूका होता है, तब एकदमसे आसमान में पहुचं जाता हूँ. अब मैं गौतम बुद्ध हो जाता हूँ. फिर 'जब we met' की करीना कपूर की तरह सोचने लगता हूँ, 'क्या मैं इतना बड़ा गधा था, इतना चोमू कैसे हो सकता हूँ मैं?' अब मुझे ज्ञान का दौरा पड़ने लगता है. जीवन माया और ब्रह्म सत्य लगने लगता है.
यही खेल चलता रहता है..कुछ दिन हाथ-पैर सब छोड़कर, आँखे बंद किए, भावनाओं की गंगा में बह रहा होता हूँ. फिर एकदिन अचानक ज्ञान की गौरीशंकर पर बैठ जाता हूँ.
चित्र साभार- गूगल
26 अप्रैल, २०१४
गर्दन में मोच आ गई है, पीछे नहीं देख सकता हूँ. काश! ज़िन्दगी को भी मोच आ जाती.
26 अप्रैल, २०१४
'रिवाल्वर रानी' देखने गया था| कंगना ने कमाल की एक्टिंग की है, पीयूष मिश्रा की एक्टिंग भी दमदार थी| कहानी में भी दम था, लेकिन डायरेक्ट ने फिल्म की बैंड बजा दी है| एडिटिंग में भी खोट था| मूवी बहुत अच्छी हो सकती थी, in fact बहुत ही अच्छी हो सकती थी| लेकिन कई मामलों को एक साथ लेकर चलने की वजह से सबकुछ गुह-गोबर हो गया|
खैर, फिल्म देखने लायक है, इमोशन है, डार्क कॉमेडी है, एक्शन है..और poor ड्रामा भी है| गाने कुछ खास नहीं है|
23 अप्रैल २०१४
(ऐसे ही कुछ लिख दिया है, अगर बकवास पढ़ी हो तो आगे बढ़ें...अन्यथा टाइम ख़राब न करें..)
कल इलेक्शन की वजह से ऑफिस बंद है. वोट गिरना(बटन दबाना) मुझे पसंद नहीं है, और जो चीज पसंद न हो उससे मैं ख़ुद को दूर ही रखता हूँ. वैसे मेरा परिवार काफी राजनीतिक है, दादा जी गाँव के सपंच थे, पिता जी भी राजनीतिक मामलों में काफी सक्रीय रहते हैं, लेकिन मुझे राजनीति का झोल-झाल बचपन से ही पसंद नहीं है. जबतक वोट देने योग्य नहीं हुआ था, वोट देने की बड़ी इच्छा होती थी. पहली बार बिना वोटर आई.डी. कार्ड के किसी और के नाम पर वोट गिराया था. चतुरानन मिश्र को हंसुआ गेंहू पर वोट दिया था. मेरी उम्र उस समय तेरह-चौदह साल की रही होगी. उसके बाद भी एक दो बार वोट गिराया, माँ और पिता जी जब भी मुखिया के लिए खड़े हुए हैं, मजबूरन मैंने वोट गिराया है.
सोच रहा हूँ कल किताब पढ़ कर दिन गुज़ारूंगा, कई किताबें हैं जिन्हें पढ़ना है, जैसे 'चार्ली चैप्लिन' की आत्मकथा, आज ही अपने ऑफिस के एक दोस्त से मांग कर लाया हूँ. 'सत्यजीत राय की कहानियाँ' भी पड़ी हुई है, उनकी एक कहानी दो दिन पहले पढ़ी थी लेकिन मजा नहीं आया था. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की कहानी की किताब है, उसकी एक पढ़ी मुझे बेहद पसंद आई. देव साब की आत्मकथा भी पढ़नी है, दस पेज पढ़ी थी, मजेदार लिखी है उन्होंने. लेकिन किताब इतनी मोटी है कि देख कर ही हौसला पस्त हो जाता है, पता नहीं कबतक उसे खत्म कर पाउँगा. इसके अलावा भी कई किताबें हैं लिस्ट में इन्हें दस-पन्द्रह दिन में समाप्त करनी है. कुछ दिन पहले गुलज़ार साहब की 'रावी पार' पढ़ी थी, बहुत अच्छी किताब थी. इस्मत चुगताई की आत्मकथा 'काग़ज़ी है पैरहन' भी हाल में ही पढ़ी थी, पढ़कर एकदम से हिल गया था. राही मासूम रज़ा की 'आधा गाँव' अभी कुछ दिन पहले मंगाई थी, बहुत तारीफ़ सुनी है इसकी, देखना है पढ़ने के बाद कैसी लगती है. एक और किताब है शालिग्राम की 'किनारे के लोग', दो चार पेज पढ़ी थी, अच्छी लगी थी, उसे भी समाप्त करनी है. ऑफिस में सारा दिन लिखने-पढ़ने के बाद घर पर कुछ भी नया पढ़ने की हिम्मत नहीं रह जाती है. ऑफिस जाते आते टाइम बस में जो थोड़ा बहुत पढ़ लेता हूँ उसके अलावा पढ़ने का मौका नहीं मिलता है. कभी-कभी अपनी मर्ज़ी की किताब पढ़ने के लिए टाइम न निकाल पाने की वजह से कोफ़्त भी होती है. कई फ़िल्में है जो देखनी है, आज कल जैसी फिल्मे हॉल में देख रहा हूँ उससे सन्तुष्ट नहीं हो पता हूँ.
आज ऑफिस किशोर कुमार पर शोध करते वक्त उनकी एक इंटरव्यू पढ़ने को मिला, पढ़ते वक्त मैं हंस-हंस के पागल हुआ जा रहा था. मजेदार आदमी थे किशोर दा. फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों की जीवनी लिख-लिख कर थोड़ा उब भी गया हूँ...अब दार्शनिकों और विचारकों के बारे में लिखना चाहता हूँ.
व्यक्तिगत जीवन में बहुत उथल-पुथल चल रहा है आजकल. अपनी लव लाइफ से सन्तुष्ट नहीं हूँ. चित हमेशा शिकायतों से भरा रहता है. मैं चाहता कुछ हूँ, हो कुछ और रहा है. मानसिक रूप से बहुत ही ज्यादा परेशान रहता हूँ. प्रेम में असफल होकर मैं जीवन में सफल नहीं होना चाहता हूँ.
21 अप्रैल, 2014
वो जो मैं लिखना चाहता हूँ, उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। और जो मैं लिखता हूँ उसमे मेरा कुछ भी नहीं है.. सिर्फ शब्द हैं। यही मेरा दुःख है।
21 अप्रैल, २०१४
'तुम कभी क्यों नहीं कहते कि मैं चाँद जैसी हूँ, कि मेरी आँखें झील-सी गहरी है, और मेरे होंठ गुलाब की पंखुड़ियों-सी नाज़ुक है, वगैरह-वगैरह. क्या मैं तुम्हे अच्छी नहीं लगती हूँ...या फिर तुम्हे मुझसे मोहब्बत ही नहीं है?', लड़की ये सब बोलकर लड़के की आँखों को पढ़ने की कोशिश करने लागती है.
लड़का, लड़की की हाथ को पकड़ कर उसे पास खिचता है, और फिर उसके चेहरे को हाथ में लेकर निहारने लगता है. लड़की जैसे ही कुछ बोलने को होती है, वह अपने होठों को उसके होठों पर धर देता है. फिर जब थोड़ी देर बाद दोनों अलग होते हैं, तो लड़का, लड़की के दोनों हाथों को अपने हाथ में लेते हुए कहता है, " वो और लोग होंगे जिन्हें चाँद में महबूब दीखता था.. या फिर महबूब में चाँद .. मुझे तो तुम्हारे सिवा कहीं कुछ नहीं दीखता है... सब तुम्हारे जैसा है, लेकिन फिर भी तुम किसी के जैसी नहीं हो. मैं सब की तुलना तुमसे कर सकता हूँ, लेकिन तुमारी तुलना मैं किसी से नहीं कर सकता हूँ...मैं जब भी तुम्हे देखता हूँ अवाक् रह जाता हूँ, मेरी सांसे रुकने लगती है, इसीलिए तुमसे कभी कुछ कह नहीं पाता हूँ." अब लड़की की बारी थी लड़के को चुप करने की..
20 अप्रैल, 2014
'2 स्टेट्स' एक बकवास मूवी है... परसों देखने गया था...मूड ख़राब हो गया..!! खुछ भी नया नही सबकुछ किताब से डिट्टो उठा लिया है...डायरेक्टर भोंदू लगता है...!! पहले आधे घंटे में लगता जैसे मूवी बहुत फ़ास्ट जा रही है...जहाँ मूवी को स्लो करना था वहां फ़ास्ट कर दिया है...और फ़ास्ट करना था वहां एक दम स्लो कर दिया है... इंटरवल के तो बाद मूवी उबाऊ हो जाती है.! अलिया अच्छी लगती है लिकिन अभिनय उससे ठीक से नहीं हो रहा था..अर्जुन कपूर कहीं से भी 'गीक' नहीं लग रहा था. रोनित रॉय तो ऐसा लगा जैसे 'उड़ान' से उठकर सीधे यहीं आ गए हैं. अमृता सिंह तो एकदम बेकार लगी...सब-कुछ ठूसा हुआ लग रहा था. मूवी देखने से अच्छा है किताब एकबार फिर से पढ़ लें...!
19 अप्रैल, २०१४
जिस तरह वोट गिराने के लिए वोटर आई.डी. कार्ड की ज़रुरत होती है, उसी तरह बाप बनने के लिए भी फादर आई.डी कार्ड होना चाहिए. ऐसे लोग जो मानसिक और आर्थिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं, उन्हें बच्चा पैदा करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए.
2 दिसम्बर, २०१५
बेसी नियम मत पादो....दारु बंद हो गया तो क्या....हम ताड़ी पीकर उमकेंगे..वैसे भी 1 अप्रैल तक एतना न ढकस लेंगे कि साला दू साल तक निसा नहीं उतरेगा।
-खिसियानी बिल्ली की भांति खंभा नोचता एक बिहारी शराबी

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