Monday, 30 April 2018

क्षमा, सज़ा और मनोविज्ञान

“He that is without sin among you, let him first cast a stone at her.” John, Viii, 7
दो विकल्प है अपने पास- सज़ा और क्षमा और दोनों ही आजमाया हुआ है, किसी से भी कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आता है| पुराने दिनों में इंगलैंड में लोगों को सबक सिखाने के लिए अपराधी को चौराहे पर खड़ा करके सजा दिया जाता था| इरादा यह था कि अपराधी को सजा पाते देख कर बांकी लोगों को सबक मिलेगा| लेकिन इस प्रयोग के कुछ ही दिन बाद पता चला कि जब अपराधी को सजा पता देखने के लिए लोग चौराहे पर इक्कठे होते तब पीछे उनके घरों में कोई चोरी कर रहा होता था| इतना ही नहीं जब लोग तमाशा देखने में खोये होते थे तब कोई उनका जेब काट रहा होता था| यह बहुत ही चौंकाने वाला मामला था| जल्दी ही इस प्रयोग को बंद कर दिया गया|
एक आदमी को जितने भी संभव और असंभव तरीके से सताया जा सकता है, अब तक उन सब तरीकों का इस्तेमाल किया जा चुका है, लेकिन अभी तक कोई भी उपाय कारगर सवित नहीं हुआ है, और ना ही आगे कभी हो सकता है| फिर भी पता नहीं क्यूं लोगों का अभी तक ‘सज़ा’ पर आस्था कैसे कायम है? जहाँ तक मेरी समझ है, मुझे ऐसा लगता है कि जिस तरह की मानसिकता वाले लोग अपराध करते हैं, ठीक उसी प्रकार की मानसिकता वाले लोग ‘सज़ा’ देने में रस लेते हैं| अपराधी की मानसिकता क्या है? कसाब ने कहा था, “जब मैं लोगों को खून में लथपथ तड़पता देखता हूँ तो मुझे मजा आता है”| ठीक यही मजा उन लोगों को भी मिलता है जो लोग न्या के नाम पर अपराधी को सज़ा देते हैं| हमारा सारा सुख दूसरों को दुखी देखने में हैं| यदि सजा देना सम्यक व स्वस्थ्य चित का लक्ष्ण होता तो फिर बुद्ध, महावीर, जीसस, रमण, और रामकृष्ण इत्यादि ‘क्षमा’ की बात नहीं करते| फिर जीसस नहीं कहते कि ‘पिटर अनंत बार माफ़ करना’| “Then came Peter, and said to him, Lord, how oft shall my brother sin against me, and I forgive him? Until seven times? Jesus saith unto him, I say not unto thee, Until seven times; but, Until seventy times seven.” Matthew, xviii, 21-22
नहीं, सजा देना या सजा देने की बात सोचना सभ्य चित का लक्षण नहीं है| एक सम्यक चित वाला व्यक्ति किसी को भी सज़ा देने से पहले हज़ार बार सोचेगा| हज़ार पहलुओं पर विचार करेगा, और जो भी विचार करेगा वह अंत में पाएगा कि सजा देना अमानवीय है| एक उदाहण से इसको समझते हैं, एक व्यक्ति पर चोरी का इल्जाम है, क़ानून के हिसाब से चोर को सज़ा मिलनी चाहिए| लेकिन क्या सजा देने से पहले यह सोचना ज़रूरी नहीं है कि उस व्यक्ति ने चोरी क्यूं किया, उसे चोरी क्यूं करना पड़ा? और इससे भी बड़ा सवाल जिसके यहाँ उसने चोरी की है वह कैसा व्यक्ति है, अगर जिसके यहाँ उसने चोरी की है वह ख़ुद चोर है, और बड़ा चोर है तो फिर इस व्यक्ति को सजा देना कितना उचित होगा? और यह कहने की ज़रूरत नहीं कि जिस समाज में 90 फीसदी लोग भूखे मर रहे हों, वहां धन इक्कठा करना चोरी है| इसी तरह जब कोई बलात्कार करता हैं तो वे सारे लोग जिम्मेवार हैं, जिन्होंने स्त्रियों पर अपनी मालकियत जमा रखी है|
चित्र सभार-गूगल 
संपत्ति पर किसी की मालकियत नहीं होनी चाहिए| आपके घर में जो अनाज की बोरी सड़ रही है, उस पर उन सब लोगों का हक़ है, जो भूखे मर रहे हैं| आपके बंगले में उन सब का हक़ है, जो खुले आसमां के नीचे ठंड से काँप रहे हैं| आपकी बपौती ज़मीन पर उन किसानो का हक़ है, जो अनाज के बिना भूखे मर रहे हैं| जब तक इस दुनिया में विवाह रहेगा तब तक वेश्यावृत्ति, व्यभिचार और बलात्कार को ख़त्म नहीं किया जा सकता है| जब तक ज़मीन और धन पर कुछ लोगों की मालकियत रहेगी तब तक चोरी और डकैती होते रहेंगे| कोई क़ानून, सजा, नरक, जेल, और शाशन व्यवस्था इनको ख़त्म नहीं कर सकता है| जैसे डॉक्टर का कुल काम इतना है कि कैसे स्वस्थ्य आदमी को बीमार बनाया जाए, ताकि उससे धन एंठा जा सकते, उसी तरह न्या व्यवस्था का कुल काम इतना है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपराधी की घोषित कर दिया जाए|
तो, सज़ा कोई विकल्प ही नहीं है| लेकिन मैं यह भी कह रहा हूँ कि क्षमा भी अब तक कारगर सवित नहीं हुआ है| फिर क्या करना चाहिए? फिर हमें क्षमा के मनोविज्ञान को समझना चाहिए| क्षमा के कई प्रकार हो सकते हैं| अगर क्षमा समझ से नहीं निकला हो तो उसका कोई परिणाम नहीं होता है| बल्कि संभावना यह है कि विपरीत परिणाम पैदा हो जाए| एक क्षमा ऐसा भी हो सकता है जिसमे आप यह माने कि सामने वाला अपराधी है, सज़ा का हक़दार है, लेकिन आपनी उदारता से उसे क्षमा कर रहे हैं| ऐसे क्षमा का उदेश्य ख़ुद को महान और दूसरे को तुक्ष्य सवित करना होता है| इस तरह के चालबाजी वाले क्षमा से कोई फर्क नहीं पड़ता है| अभी तक इसी तरह के क्षमा का उपयोग हम करते आए हैं|
असली ‘क्षमा’ चालबाजी से नहीं बल्कि इस समझ से पैदा होता कि ‘हम किसी को सजा देने के अधिकारी नहीं हैं, हम इतने पाप रहित नहीं हैं कि दूसरे को सजा दे सकें| और हम इतने समझदार भी नहीं हैं कि दूसरे के निर्णायक बन सकें”, इस समझ से ‘क्षमा’ पैदा होता है वो बड़ा ही शक्तिशाली होता है, इसी क्षमा से बुद्ध ने अंगुलिमाल को रूपांतरित कर दिया था| यह ‘क्षमा’ बुद्धि की चालबाजी से नहीं बल्कि हृदय की गहराई से निकलता है|
“An eye for an eye leaves the whole world blind”

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