Wednesday, 7 March 2018

बुद्ध पुरुष का भी दुबारा जन्म होता है.! (बुद्धत्व बंधन है-2)


पत्थर और परमात्मा के होश में सिर्फ मात्रा का भेद है. ना तो पत्थर पूर्ण बेहोशी में है, और ना ही परमात्मा पूर्ण होश में. 'पूर्ण' जैसा अस्तित्व में कुछ है ही नहीं. पत्थर भी इतना बेहोश नहीं है कि होश में ना आ सके, और परमात्मा भी इतने होश में नहीं है कि बेहोश ना हो सके. अस्तित्व में सब कुछ एक वर्तुल में घूमता है, पत्थर यात्रा करके परमात्मा हो जाता है, और फिर परमात्मा गिरते-गिरते पत्थर हो जाता है. पांच अध्यात्मिक झूठ है जो लोगों से कहा जाता है. 1. बुद्ध पुरुष जन्म-और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं. 2. बुद्धत्व की अवस्था है 3. ज्ञान स्थाई चीज है. 4. ज्ञान अनंत है. 5. हर कोई ज्ञानी हो सकता है. 

पदार्थ से लेकर परमात्मा तक सब एक वर्तुल में घूमते हैं, इस वर्तुल से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है. और बुद्धत्व कोई अवस्था नहीं है..ऐसी कोई स्थिथि नहीं आती जहाँ पहुंच कर कोई यह कह दे कि 'अब मैं पहुँच गाया मंजिल पर, इससे आगे अब कोई यात्रा नहीं होगी' ऐसा कभी नहीं होता है. 

जागरण के एक पॉइंट पर पहुँचने के बाद, परमात्मा फिर से पदार्थ की तरफ गिरने लगता है. यात्रा सदा जारी रहती है. और ज्ञान/जागरण हमेशा सिमित है. ऐसा कभी नहीं होगा कि एक साथ और एक समय पर लाखों लोग ज्ञान को उपलब्ध हो जाएँगे. एक समय में ज्यादा-से-ज्यादा आठ लोग जाग सकते हैं. और पूरा ज्ञान कभी किसी पर नहीं उतरता है. 
चित्र साभार- गूगल 
अगर आप नोटिस करेंगे तो पाएँगे कि यदि तीस की उम्र में कोई व्यक्ति ज्ञान की घोषणा करता है, और 60 की उम्र तक जिंदा रहता है, तो उसकी जीवन को यदि आप गौर से देखेंगे तो आप उसकी चेतना में स्पष्ट गिरावट पाएँगे. और यदि वही व्यक्ति 100 की उम्र तक जिन्दा रहता है, तो गिरावट इतना स्पष्ट हो जाएगा कि आपको यकीन ही नहीं आएगा कि 30 की उम्र में जो चेतना का स्तर था, और 100 के उम्र में जो चेतना है, वह दोनों एक ही व्यक्ति के हैं. 
उदाहण के लिए ओशो को लीजिये, उनके 60 और 70 के दशक के प्रवचनों को सुनिये, फिर आप 85 के बाद उनको सुनिये, एक स्पष्ट अंतर पाएंगे आप. यही सब के साथ होता है, कृष्णमूर्ति, गुरजिएफ. बुद्ध, महावीर, कृष्ण सबके जीवन में आप ऐसा ही पाएँगे.यही सनातन नियम है.

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