एक दोस्त कल वहत्सप पर मुझसे कह रहा था, “तुम अपने बुद्धत्व की घोषणा क्यों नहीं कर देते हो? ”अब क्या बोलूँ उसको....,
भाई मेरे, दो-चार ज्ञान की और अच्छी-अच्छी बातें कर लेने से कोई बुद्ध नहीं हो जाता है. तुम भी दर्शन और मनोविज्ञान की चार किताबें पढ़ लो, मेरे जैसे हो जाओगे. फिर चाहो तो तुम अपने ज्ञान की घोषणा कर देना..
लेकिन एक बात जो मुझे समझ नहीं आती है,वह यह कि यदि कोई व्यक्ति अपने बुद्धत्व की घोषणा करता है, तो मैं देखता हूँ कि लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं यह समझाने के लिए कि वह कोई बुद्ध नहीं है, बस उसे भ्रम हो गया है. और उन्ही लोगों को मैं देखता हूँ किसी से ये कहते हुए कि ‘भाई आप तो बुद्ध हैं, आपको ज्ञान घट गया, मुझसे मत छुपाईये, मैं सब समझता हूँ.!’ कमाल है!
क्या बुद्धत्व से ऊपर की भी कोई ऐसी अवस्था है जहाँ आदमी को यह पता चल जाता है कि कौन सच में बुद्ध है और कौन नक़ली है?

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