‘गंदी राजनीति, भ्रष्ट नेता, पागल भीड़, इत्यादि-इत्यादि.. इन शब्दों से ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं कोई राजनीति ऐसी भी होगी जो अच्छी होगी, कोई नेता ऐसा भी होगा जो भ्रष्ट नहीं होगा, या फिर कोई भीड़ ऐसी भी होगी जो पागल नहीं होगी.ये सभी शब्द इसी तरह का भ्रम पैदा करते हैं. लेकिन, जैसे शांत तूफ़ान नहीं होता, उजली रातें नहीं होती, वैसे ही नेता जब भी होगा भ्रष्ट ही होगा, अच्छा नेता हो ही नहीं सकता, भीड़ मतलब पगलों की जमात, और राजनीति मतलब गंदगी. इसीलिए मेरे हिसाब से इन सब की निंदा करने का कोई अर्थ नहीं है- जो लोग ऐसा करते हैं वे बहुत गहरे में इन से प्रभावित हैं. विरोध से सिर्फ़ आकर्षण का पता चलता है- केजरीवाल राजनीति और भ्रष्टाचार का विरोध करते थे, आज वह ख़ुद वही सब कर रहे हैं. रामदेव जिस मार्केट की निंदा करते थे, आज उसी में कंठ तक डूबे हुए हैं. सदा ऐसा ही होता है, और ऐसा ही होता रहेगा, हम विरोध उसी का करते हैं जिससे हमारा लगाव होता है, यानी मौका मिलने पर जिसके जैसा हम बनना चाहते हैं. एक गरीब, अमीरों के खिलाफ तभी तक बोलता है, जब तक कि वह ख़ुद अमीर नहीं बन जाता है. अमीर बनते ही वह वही सब करने लगता है जिसकी वह विरोध किया करता था. यही सनातन नियम है.
इस दुनिया में जितने बुरे लोग है, उससे कई गुणा ज़्यादा भले लोग हैं. सिर्फ़ ३३ % लोग बुरे हैं पूरी दुनिया में. लेकिन पत्रकार, टीवी वाले, धर्मगुरु, कवि, शायर, लेखक और तथाकथित समाज सुधारक सिर्फ़ इन्हीं ३३% की भाटगिरी करते नज़र आते हैं. ऐसा क्यों.......? क्योंकि ये उसी ३३% के हिस्सा हैं. दोनो एक-दूसरे के सहयोगी है-एक को ख़बर में रहना है और दूसरे को ख़बर बेचना हैं. एक के बिना दूसरा नहीं टिक सकता है.
लेकिन, इन दोनो के अलावा एक और भी है. सिर्फ़ बंदर और मदारी से खेल नहीं हो सकता है. दर्शक की उपस्तिथिती अपरिहार्य है.असल में खेल दर्शक के लिए ही होता है. अगर दर्शक ना हो तो, ना तो ज्यादा देर डुगडुगी बजेगी, और ना ही बन्दर का ताथैया चलेगा.
चित्र साभार-गूगल
असली गुनहगार 'हम' और आप' हैं-हम से मेरा तात्पर्य उन लोगों से हैं जो नकारात्मक ख़बरों, कविताओं, नगमों, किताबों, फिल्मों, साहित्यों, गीतों, इत्यादि में रस लेते हैं. जिस दिन हम रस लेना बंद कर देंगे उस दिन यह सब समाप्त हो जाएगा. जिस भी चीज़ पर हम ध्यान देते हैं वही बढ़ने लगता है. हम दंगा, फसादों, बलात्कारों, हंगामाओं पर ध्यान देते हैं, इन में रस लेते हैं, इसके बारे में अच्छा-बुरा बोलते हैं, इसलिए यह सब जिन्दा है.
तो क्या अगर हम कल से अनादं के गीत गाने लगे, आनंद की बात करने लगें, तो यह जो दुनिया में घट रहा है समाप्त हो जएगा? नहीं...ऐसा कुछ भी नहीं होगा. ना तो नकारात्मकताएं ख़त्म होंगी और ना ही आनंद बढेगा. बस इतना होगा कि आप 33% की जमात से निकल कर 67% की जमात में आ जाएँगे. फिर आपको 33% लोगों से कोई शिकायत नहीं होगी, बल्कि सहानुभूति होगी.. तब आप जानेंगे कि 67% की शांति 33% लोगों की पागलपन पर टिकी हुई है. फिर आप पाएँगे कि अशांति, शांति विरोधी नहीं है, बल्कि सहयोगी है.
जब तक आप 33% में शामिल है, तब इस दुनिया में सिर्फ अंधकार, ही अंधकार है, दुःख-ही-दुःख है, चोर-ही-चोर है, लुटेरे-ही-लुटेरे हैं. सब गलत हो रहा है यहाँ, सब बेकार है. फिर आपके लिए 'संसार दुःख है, फिर आपका सुख इस संसार से बाहर कहीं स्वर्ग(भविष्य) में है. लेकिन जैसे भी आप 67% में शामिल होते हैं. स्वर्ग यहीं और अभी है, यह युग सत्युग है. फिर जीवन आपके लिए उत्सव है, हर दिन आपके लिए परमात्मा से मिला प्रसाद है, जिसे आप अहोभाव से ग्रहण करते यानी जीते हैं. फिर आप रवीन्द्रनाथ की तरह यहाँ बार-बार आने की परमात्मा से प्राथना करते हैं. फिर आप असरारुल हक़ मजाज़ की तरह गाते हैं..........
"हर आन यहाँ सहबा-ए-कुहन, इक सागर-ए-नौ में ढलती है।
कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है।
याँ हुस्न की बर्क़ चमकती है, या नूर की बारिश होती है।
हर आह यहाँ एक नग़मा है, हर अश्क़ यहाँ इक मोती है।
हर शाम है, शाम-ए-मिस्र यहाँ, हर शब है, शब-ए-शीराज़ यहाँ।
है सारे जहाँ का सोज़ यहाँ, और सारे जहाँ का साज़ यहाँ।
ये दश्ते जुनूं दीवानों का, ये बज़्मे वफ़ा परवानों की।
ये शहर-ए-तरब रूमानों का, ये ख़ुल्द-ए-बरीं अरमानों की।
इस फ़र्श से हमने उड़-उड़कर, अफ़लाक के तारे तोड़े हैं।
नाहीद से की है सरगोशी, परवीन से रिश्ते जोड़े हैं।
इस बज़्म में तेगें खींची हैं, इस बज़्म में सागर तोड़े हैं।
इस बज़्म में आँख बिछाई है, इस बज़्म में दिल तक जोड़े हैं।
इस बज़्म में नेजे़ फेंके हैं, इस बज़्म में ख़ंजर चूमे हैं।
इस बज़्म में गिरकर तड़पे हैं, इस बज़्म में पीकर झूमे हैं।
ज़र्रात का बोसा लेने को, सौ बार झुका आकाश यहाँ।
ख़ुद आँख से हमने देखी है, बातिल की शिकस्त-ए-फाश यहाँ।
इस गुल कदा-ए-पारीना में फिर आग भड़कने वाली है।
फिर अब्र गरजने वाला है, फिर बर्क़ कड़कने वाली है।
जो अब्र यहाँ से उठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा।
हर जू-ऐ-रवां पर बरसेगा, हर कोहे गरां पर बरसेगा।"

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