Wednesday, 18 April 2018

बलात्कार, सजा, समाज और मनोविज्ञान

बलात्कार के कई रूप हैं- शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक| और हैरानी की बात हैं कि इन तीनो ही तलो पर समाज स्त्रियों के साथ बलात्कार कर रहा है| शारीरिक बलात्कार- बिना मर्जी के संबंध बनाना, मानसिक बलात्कार- वैवाहिक बंधन के आड़ में संबंध बनाना, आध्यात्मिक बलात्कार- प्रगति के नाम पर स्त्रियों को दूसरे दर्जे कर पुरुष बना देना| 
हमारी समझ ऐसी है कि 'बिना 'मर्जी' के किसी स्त्री के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार है'| यह बलात्कार की आम और क़ानूनी व्याख्या है| लेकिन 'मर्जी' बहुत ही है जटिल चीज है, क्योंकि 'मर्जी' को Manipulate किया जा सकता है| हज़ार तरीके से 'मर्जी' का शोषण किया जा सता है| लोभ देकर मर्जी का शोषण हो सकता है, डरा कर मर्जी का शोषण हो सकता है| और फिर विवाह क्या है? विवाह मर्जी का manipulation है| वाहयात धार्मिक और सामाजिक नियम/बंधन में बाँध कर स्त्री को पत्नी (गुलाम) बना लेना और ख़ुद उसका पति( मालिक) बन जाना क्या है? 'मर्जी' का manipulation है! 
तो हमें बलात्कार की व्याख्या बदलनी होगी, मेरे हिसाब से 'बिना 'प्रेम' के संबंध बनाना बलात्कार है', सेक्स अधिकार की उद्घोषणा नहीं बल्कि प्रेम की अभिव्यक्ति होनी चाहिए|' विवाह दासप्रथा का परिष्कृत रूप है| पहले अमीर लोग स्त्रियों को खरीद कर लाते थे और फिर उसका भोग करते थे| बाद में बुद्धिजीवियों ने जब इसका विरोध किया तो लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए चालबाज़ लोगों ने इस खरीद-बिक्री को 'विवाह' का नाम दे दिया और इसको धार्मिक ढंग से करने लगे| 
जब तक स्त्रियों को वैवाहिक बंधन से मुक्त हो कर संबंध बनाने की आजादी नहीं मिलेगी तब तक बलात्कार को खत्म नहीं किया जा सकता है| विवाह सभी प्रकार के व्यभिचार का जनक है| किसी व्यक्ति पर आप एकाधिकार कैसे कर सकते हैं? किसी व्यक्ति को अपनी बपौती बना लेना कैसी मानवता है? 
दूसरी बात, बलात्कार का दोषी सिर्फ व्यक्ति नहीं है, 'समाज' भी  है| एक व्यक्ति को अपराधी सवित कर देने से बलात्कार को कभी नहीं रोका जा सकता है| सजा देकर तो कभी भी नहीं| सजा देकर कभी भी किसी को भी सुधारा नहीं जा सकता है| क्योंकि पहली तो बात यह कि 'सजा का कोई भी संबंध अपराध से नहीं है, अगर सजा का संबंध अपराध से हो तो पूरा-का-पूरा समाज जेलखाने में बंद नजर आए| सजा का संबध 'पकड़े' जाने से है', कोई भी अपराधी यह नहीं मानता कि उसे अपराध की सजा मिली है, गहरे में वह जानता है कि सजा 'पकड़े' जाने की मिली है, अगर पकड़ा नहीं जाता तो कुछ भी नहीं होता |' वह जानता है कि हजारों ऐसे लोग हैं जो उससे भी बड़ी अपराध करके आजाद घूम रहे हैं, और जानता उनको पूजती है| फिर अपराध से तो बचने का तो मतलब नहीं, कोशिश बस इतनी होनी चाहिए कि पकड़े ना जाएं| 
और व्यक्ति कोई इकाई नहीं है, कोई भी व्यक्ति आसमान से नहीं टपकता है, जैसे पेड़ से पत्ता निकलता है, वैसे व्यक्ति समाज से निकलता है| अगर पत्ते में कोई दोष है तो दोष पेड़ का है, पत्ते का नहीं| एक व्यक्ति को व्यभिचारी बनाने में पुरे समाज का योगदान है| जब एक पुरुष बलात्कार करता है, तो वह सिर्फ 'एक' पुरुष नहीं है वह पुरे पुरुष समाज का प्रतिनिधित्व कर रहा है| सारे पुरुष उसके अपराध में शामिल हैं, और वे लोग तो ख़ासकर जो जो उसका विरोध करते हैं, और उसकी जान लेने के लिए पागल हैं| एक पुरुष जब किसी बलात्कारी का विरोध करता है तो जरूरी नहीं है कि उसके विरोध में इमानदारी हो, हो सकता है दूसरे के पाप का सहारा लेकर वह अपने पुण्य को निखार रहा हो| और यह भी हो सकता है कि उसका विरोध इर्ष्य से निकल रहा हो, कि भाई मैं तो सोचता ही रह गया और तुम ने कर दिखाया| 
मोविज्ञान की माने तो 'विरोध' हमेशा इस बात का सूचक है कि कहीं गहरे में विरोधी को अपराधी से लगाव है, और इस 'लगाव' तो छुपाने के लिए वह विरोध का सहारा ले रहा है| जीवन बड़ा जटिल है, मनुष्य के मन के कई तल हैं| कुछ भी 2 + 2 =4 की तरह सीधा और सरल नहीं है|
चित्र साभार- गूगल
भूल कहाँ हो रही है? भूल यह हो रही है कि रक्षक और भक्षक दोनों एक ही है इसकी पहचान नहीं हो पा रही है| एक पुरुष जो बलात्कार कर रहा है और दूसरा जो स्त्री की लाज बचा रहा है दोनों एक ही है| एक थोड़ा बेवक़ूफ़ है इसीलिए पकड़ में आ जा रहा है, दूसरा शातिर है इसीलिए छुप जा रहा है| फिर कैसे पहचान हो? पहचान करने के लिए हमें यह समझना होगा कि 'स्त्री' होना या 'पुरुष' होना सिर्फ शारीरिक घटना नहीं है| शरीर के साथ-साथ चेतना के भी दो प्रकार होते हैं, 'स्त्री चित और पुरुष चित है', इसीलिए हो सकता है कि एक व्यक्ति के पास शरीर पुरुष का हो लेकिन उसका चित स्त्री का हो-जैसे बुद्ध, जीसस, दादू, कबीर, रामकृष्ण, लओत्जु, दरिया, रूमी...ये सब ऐसे व्यक्ति हैं जिनका शरीर तो पुरुष का है लेकिन चित स्त्री का है| और इसका विपरीत भी हो सकता है शरीर स्त्री का हो लेकिन चित पुरुष का हो, जैसे- सभी आधुनिक स्तिर्याँ जो जींस पहन कर और हाथ में सिगरेट लिए घूम रही हैं, और संसद, में बॉर्डर पर और तमाम इस तरह के जगहों पर पुरुष के साथ कंधे-से-कन्धा मिला कर चल रही हैं| ये सब दुसरे दर्जें की पुरुष हैं| 
जितने भी मानवीय और सुन्दर गुण हैं- क्षमा, प्रेम, समर्पण, दान, करुणा, दया यह सब स्त्री-चित के गुण हैं| जब भी किसी पुरुष की चेतना का विकास होगा वह 'स्त्रैण (feminine) होने लगेगा| और जब भी किसी स्त्री का पतन होगा उसके भीतर पुरुष-चित के गुण बढ़ने लगेंगे- क्रोध, द्वेष, बदले की भावना, प्रतिस्पर्धा, महत्वाकांक्षा, लोभ इत्यादि| सो असली सवाल शरीर का नहीं चित का है| बुद्ध के पास शरीर पुरुष का है लेकिन फिर भी वे लाखों स्त्रियों से ज्यादा स्त्री हैं, और रानी लक्ष्मीबाई के पास शरीर स्त्री का है, लेकिन वह लाखों पुरुष से ज्यादा पुरुष हैं| इसीलिए जबतक स्त्री होने के लिए राजी नहीं हो जाती हैं, और पुरुष अपने भीतर स्त्रैण चित पैदा करने की कोशिश नहीं करते हैं, तब तक मामला नहीं सलट सकता है| अभी हमने स्त्रियों की कोमलता को कमजोरी और पुरुषों की कठोरता को ताकत मान लिया है| हम गुलाब की कोमलता को पत्थर की कठोरता से तौल रहे हैं, यह पागलपन है| जहाँ पुरुषों हाथ से हथियार छीन करके उनके हाथों में गुलाब देना था, वहां हमने  स्त्रियों के साथ से गुलाब छीन कर उनके हाथ में बन्दूक पकड़ा रहे हैं, और उनसे कह रहे हैं कि यह उनकी तरक्की है| पुराने समय में, स्त्रियों को जब पुरुषों ने दासी बनाया तब उनका उतना नुक्सान नहीं हुआ था, जितना आज हम उन्हें युद्ध में मैदान में खड़ा करके कर रहे हैं| स्त्रियों का पतन यानि पूरी मानव जाति का पतन| 
उचित हो कि हम स्त्री पुरुष का बंटवारा शरीर के आधार पर नहीं, बल्कि चित के आधार पर करें| तभी एक सम्यक समाज का निर्माण हो सकता है| अभी तक हमारा समाज पुरुष प्रधान रहा है, अब जरूरी है कि इसे हम स्त्री प्रधान बनाएं| स्त्री चित के मूल्यों की बुनियाद पर सामाज निर्माण हो| दो लोग किसी नियम या बंधन के तहत साथ ना रहें और ना ही प्रेम करें| ऐसे किसी भी संबंध को गैरकानूनी करार दिया जाए जिसका आधार प्रेम नहीं हो| पति-पत्नी जैसे अमानवीय-मानवीय संबंध को ख़त्म कर दिया जाए| फिर देखिए कैसे सारे व्यभिचार पलक झपकते ही ख़त्म हो जाते हैं| विवाह और वैश्यावृति एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, एक के जाते ही दूसरा गायब हो जाएगा| फिर प्रेम के बीज से जो बच्चा पैदा होगा वो कैसे किसी का बलात्कार कर पाएगा, आम के पेड़ में कैसे कडवे नीम लगेंगे? 
-इक्क्यु केंशो तजु 

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