Monday, 30 April 2018

सज़ा, समाज और मनोविज्ञान

पिछले लेख में मैंने बलात्कार के प्रकार (शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक) और सज़ा और समाधान के बारे बात की, साथ ही स्त्री-चित और पुरुष-चित की बात की, सज़ा के संबंध में बात करते हुए मैंने कहा कि अपराधी हो सजा ‘पकड़े’ जाने की मिलती है, अपराध की नहीं| इसी संबंध में कुछ और बातों की तरह आपका ध्यान खीचना चाहता हूँ|
1. अपराधी को सजा के रूप में शारीरक यातना देना और फांसी देने की परंपरा सदियों से चलता आ रहा है, लेकिन आज तक कहीं ऐसा उल्लेख नहीं कि है सजा पा कर कोई एक भी व्यक्ति सुधर गया हो| उल्टा सज़ा पाने के बाद और बिगड़ जाने के हजारों उल्लेख हैं| और इसके कई मनोवैज्ञानिक कारण हैं, अवल तो यह कि ‘कोई भी अपराधी यह नहीं मानता है कि उसे अपराध की सजा मिल रही है, गहरे में हर कोई जानता है कि सजा ‘पकड़े’ जाने की मिल रही है, अगर पकड़ा नहीं जाता तो कुछ नहीं होता| इसीलिए जेल से आने के बाद हर अपराधी और भी शातिर हो जाता है, जेल उसके लिखे ट्रेनिंग सेंटर का काम करता है| क्योंकि जेल में जिन लोगों के बीच उसे रखा जाता है वे कोई साधू-महात्मा नहीं होते हैं, चोर को चोरों की संगति में रखा जाता है, तो स्वाभाविक है कि संगति का असर होगा| दोयम, हर अपराधी यह जानता है कि जिन लोगों के द्वारा उसे सजा मिली है, वे लोग उससे बेहतर लोग नहीं है, और यह बात बहुत ही चोट पहुँचाने वाली है| इस बात का बोध कि जिन लोगों ने उसे सजा दी वे लोग ना सिर्फ उसी के जैसे हैं, बल्कि उनमे से कुछ ऐसे भी हैं जो उससे भी ज्यादा गये-बीते हैं, उससे भी बड़े अपराधी है| उसमे और जो लोग उससे सजा दे रहे हैं उनमे सिर्फ इतना फर्क हैं, वे लोग अपने अपराध को छिपाने में कुशल रहे हैं, और यह पकड़ा गया है| इसके बारे में ठीक से विचार कीजिये, यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है, इसके बहुत ही घातक मनोवैज्ञानिक परिणाम होते हैं| 
ऐसे में यह एक बहुत ही स्वभाविक सवाल बन जाता है कि वे लोग जो ख़ुद अपराधी हैं उन्हें कैसे यह ‘अधिकार’ मिल जाता है कि वे दूसरे लोगों को सजा दें? किसी को सजा देने का अधिकार बहुत ही बड़ा ‘अधिकार’ है, और संभवतः इस दुनिया में कोई भी इतना पवित्र/पाप-रहित नहीं है कि वह किसी और को सजा दे सके| इसीलिए जिसे भी सज़ा दी जाती है वह बदला लेगा, बदला लेना सुनिश्चित है, और स्वभाविक भी| अगर कोई बदलता नहीं लेता है तो समझ जाइए कि वह मनुष्य नहीं देवता है|

2. हमारे जेल में जितने लोग क़ैद हैं, उनमे बड़ी संख्या उन लोगों की हैं जो बिलकुल ही निर्दोष हैं| या तो किसी गलतफहमी की वजह से उन्हें क़ैद कर लिया गया है या फिर वे मोहरा बन गए हैं| दूसरी बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनसे ‘अनजाने में ग़लती हो गई है’, किसी कमज़ोर क्षण में, नशे में या फिर उन्हें पता है नहीं था कि वे जो कर रहे हैं वह कानून की नजर में सजा योग्य है| तीसरी बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनका अपराध निर्दोष है| निर्दोष–अपराध मतलब जिस परिस्थीती उन्होंने ने अपराध किया था, अगर उनकी जगह आप और मैं होते तो हम भी वही करते| चौथे वे लोग हैं जो भीड़ के साथ फिट नहीं बैठते हैं, जिनकी चेतना भीड़ से ऊपर की चेतना है, ये वो अपराधी हैं जिनको इनके समसामयिक पीटते हैं, लेकिन भविष्य इनको पूजता है, जीसस, सुकरात, बुद्ध, ओशो, महावीर, और कृष्ण इत्यादि चौथे तरह के अपराधी हैं| पांचवे वे लोग हैं जिनकी चेतना भीड़ से नीचे की चेतना हैं, जिनको आप ‘सच्चे अपराधी’ कह सकते हैं, लेकिन जितना अपराध इन्होने समाज के खिलाफ किया है उससे कम-से-कम दस गुना ज्यादा अपराध समाज ने इनके साथ किया है| बस इतने ही तरह के लोग हमारे क़ैदख़ानों में बंद हैं|
चित्र साभार- गूगल
3. मतलब जिस तरह लोगों को हमने सजा देने के नाम पर कैदखानों में बंद कर रखा है, उससे हज़ार गुना ज्यादा खतरनाक लोग आजाद घूम रहे हैं| मामला क़रीब-क़रीब ऐसा है कि बड़े चोरों ने छोटे चोरों को अपनी होशियारी से अपराधी घोषित करके जेलख़ानों में बंद कर दिया है| अब इस तरह की अमानवीय व्यवस्था से किसी को सुधार देंगे यह तो भूल ही जाइये| सदियों से सजा देने की परम्परा रही है, आज तक कुछ नहीं बदला, उल्टा अपराधी और जेलखाने दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं|
4. निदान क्या है? निदान सरल है, हमें सजा देने की परंपरा को ख़त्म करना होगा और समाज के व्यवस्था को बुनियादी रूप से बदलना होगा| पुलिस, कोर्ट-कचहरी, वकील, न्या-व्यवस्था ये सब फ़ालतू के बवाल हैं, बिलकुल ही यूज़लेस और अमानवीय हैं| इन सब से समाज को कोई फायदा नहीं हो रहा है| समाज में जो व्यवस्था आपको दिख रही है वह इनकी वजह से नहीं बल्कि इन सबे बावजूद है| जिन पांच तरह के अपराधियों की मैंने आपसे बात की हैं उनमे से चार को तो बिना किसी विलंब के माफ़ करके छोड़ देना चाहिए, और साथ ही अभी तक उनसे उनके साथ जो हमने अमानवीय व्यवहार किया है उसके लिए उनसे मांफी मांग लेनी चाहिए हैं| मतलब 90 फीसदी लोग जिनको हमने अपराधी मान रखा वे किसी भी अर्थों में अपराधी नहीं है| सिर्फ दस फीसदी लोग यानि पांचवे तरह के लोगों के बारे में सोचने की जरूरत हैं| सोचना सिर्फ इतना है कि उनको पनिशमेंट की नहीं ट्रीटमेंट की जरूरत है| उनके संग-साथ को बदलना है और बहुत ही मानवीय, धार्मिक और वैज्ञानिक तरीके से उनको कुछ बातें समझानी है|
5. सो, मेरी दिर्ष्टि में (और सिर्फ मेरी नहीं यह इस दुनिया में सभी बुद्धिजीवियों और विवेकशील लोगों की दृष्टि है), हमें बलात्कार रोकने के लिए क़ानून मजबूत करने की नहीं क़ानून व्यवथा को ख़त्म करने की ज़रूरत है| और एक ऐसी व्यवस्था को लाने की जरूरत है जिसकी बुनियाद स्त्री-चित के गुणों पर रखी गई हो|

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