Tuesday, 6 March 2018

'बुद्धत्व बंधन है'

आप से यह तो सबने कहा कि पत्थर में भी परमात्मा है, लेकिन परमात्मा भी पत्थर है यह किसी ने नहीं कहा. सदियों से इसे छुपाया गया है. अगर इस जगत में कुछ भी पूरा अचेतन नहीं है, तो वो जो पूरा चेतन है, जिसे आप 'परमात्मा' कहते हैं, वह भी पूरा चेतन नहीं हो सकता है. अगर पत्थर पूरा बेहोश नहीं है, तो इस यह अर्थ हुआ कि 'बुद्ध' भी पूरे होश में नहीं है. यह मैं आपसे नई बात कह रहा हूँ, जो लोग ज्ञान, ध्यान, और बुद्धत्व का धंधा लगा कर बैठे हैं, वे कभी आप से यह नहीं कहेंगे.
इसको ठीक से समझिये, अनुभव सदा विपरीत का होता है, पूर्ण का कोई अनुभव नहीं हो सकता. और 'अस्तित्व' में कुछ भी पूर्ण नहीं है, सब कुछ प्रोसेस में है. 'मुक्ति' संभव नहीं है, मुक्त होने या बुद्ध होने की चाह असंभव की चाह है. मुक्ति का अनुभव ही तभी हो सकता है जब कुछ बंधन शेष हो. और यदि हमें बंधन का अनुभव होता है, तो वो सिर्फ इसलिए क्योंकि हम पूरे बंधे हुए नहीं है, कुछ है हम में जो मुक्त है.
चित्र साभार- गूगल
इसीलिए, बुद्ध, महावीर, ओशो, कृष्ण, और शिव कोई भी पूर्ण मुक्त नहीं है. और ना ही हो सकते हैं. जो भी आपसे यह कह रहा कि मैं बुद्ध हूँ, मुक्त हूँ, स्वतंत्र हूँ, वो सब आपको बेवक़ूफ़ बना रहे हैं. और आप भी जब यह कहते हैं कि मैं बंधा हूँ, अज्ञानी हूँ, अबुद्ध हूँ, अन्धकार में हूँ, तब आप ख़ुद को और दूसरे को ठग रहे हैं. 'मैं बुद्धू हूँ और मैं बुद्ध हूँ' दोनों ही स्टेटमेंट नासमझी की है. न तो यहाँ कोई बुद्ध है और ना ही कोई बंधा हुआ है.

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