गोवा में एक तरह की बेचैनी है, जो सिर्फ गोवा जैसी जगहों में ही होती है. यहाँ पंद्रह दिन बिताने के बाद मुझे ऐसा महसूस हो रहा कि शास्त्रों में जिस तरह के स्वर्ग का वर्णन है, अगर वैसे किसी स्वर्ग में मुझे कभी भेजा गया, तो मैं निश्चित ही उब जाऊंगा. यहाँ की शांति में भी शोर है. हंसी की पृष्ठभूमि में अगर उदासी का महासागर ना हो, तो हंसी ओछी व छिछली हो जाती है. किसी मरघट की शांति जैसी है यहाँ की चहलपहल-डरावनी और व्यर्थ. यहाँ की सार्थकता बस इतनी है कि लंबे समय तक रुकने के बाद इसकी निरर्थकता सिद्ध हो जाती है. और फिर जब आप यहाँ से पलायन करते हैं तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखते हैं. इसको मैं उपलब्धी मानता हूँ. किसी चीज़ को इतनी समग्रता से जी लेना कि उसकी व्यर्थता नज़र आने लगे.
"अब आए हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए
ये शहर कब से है वीराँ वो लोग कब के गए"
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