Friday, 9 March 2018

प्रेम का सुमन अर्पित करता हूँ

आज, महिला दिवस के पावन अवसर पर, मैं, इक्क्यु केंशो तजु, इश्क़ और इबादत की प्रतिमूर्ति मीरा, भक्ति और श्रधा की पराकाष्ठा सहजो और दया बाई, ममता की देवी मरियम, मेगदालिन, महामाया, एनी बेसेंट, क्रांतिकारी स्त्री लल्ला, मैडम ब्लावट्स्की, ओशो की छाया माँ विवेक, बुद्ध की धर्म पत्नी यशोधरा, मौन की मंदिर संत भूरीबाई, सुकरात की पत्नी जेंथीप, बौध भिक्षुणी आम्रपाली, बुद्धि की मीनार-ए-आजम गार्गी, सहनशीलता की उतुंग शिखर पर बैठी तीन चोटी की स्त्री सीता, द्रोपदी और अहिल्या, पैगम्बर मोहम्मद की पहली पत्नी हजरत ख़दीजा, जुदास की वंशज माँ आनंद शीला, गाँधी की पत्नी बा कस्तूरबा, कृष्णमूर्ति की अनाम प्रेमिका, ब्रह्मवादिनी माँ मदालसा, पहली औरत देवी हव्वा, मेरी वकील माँ धर्मज्योति, तीर्थंकर मल्लीबाई, और अंत में वो तमाम औरत जिन्होंने मनुष्य की चेतना को नई उंचाई दी है, उन सबके चरणों में श्रधा और प्रेम का सुमन अर्पित करता हूँ.
चित्र साभार-गूगल

               https://www.facebook.com/dhyan.viram/videos/989450467874392/

Wednesday, 7 March 2018

बुद्ध पुरुष का भी दुबारा जन्म होता है.! (बुद्धत्व बंधन है-2)


पत्थर और परमात्मा के होश में सिर्फ मात्रा का भेद है. ना तो पत्थर पूर्ण बेहोशी में है, और ना ही परमात्मा पूर्ण होश में. 'पूर्ण' जैसा अस्तित्व में कुछ है ही नहीं. पत्थर भी इतना बेहोश नहीं है कि होश में ना आ सके, और परमात्मा भी इतने होश में नहीं है कि बेहोश ना हो सके. अस्तित्व में सब कुछ एक वर्तुल में घूमता है, पत्थर यात्रा करके परमात्मा हो जाता है, और फिर परमात्मा गिरते-गिरते पत्थर हो जाता है. पांच अध्यात्मिक झूठ है जो लोगों से कहा जाता है. 1. बुद्ध पुरुष जन्म-और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं. 2. बुद्धत्व की अवस्था है 3. ज्ञान स्थाई चीज है. 4. ज्ञान अनंत है. 5. हर कोई ज्ञानी हो सकता है. 

पदार्थ से लेकर परमात्मा तक सब एक वर्तुल में घूमते हैं, इस वर्तुल से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है. और बुद्धत्व कोई अवस्था नहीं है..ऐसी कोई स्थिथि नहीं आती जहाँ पहुंच कर कोई यह कह दे कि 'अब मैं पहुँच गाया मंजिल पर, इससे आगे अब कोई यात्रा नहीं होगी' ऐसा कभी नहीं होता है. 

जागरण के एक पॉइंट पर पहुँचने के बाद, परमात्मा फिर से पदार्थ की तरफ गिरने लगता है. यात्रा सदा जारी रहती है. और ज्ञान/जागरण हमेशा सिमित है. ऐसा कभी नहीं होगा कि एक साथ और एक समय पर लाखों लोग ज्ञान को उपलब्ध हो जाएँगे. एक समय में ज्यादा-से-ज्यादा आठ लोग जाग सकते हैं. और पूरा ज्ञान कभी किसी पर नहीं उतरता है. 
चित्र साभार- गूगल 
अगर आप नोटिस करेंगे तो पाएँगे कि यदि तीस की उम्र में कोई व्यक्ति ज्ञान की घोषणा करता है, और 60 की उम्र तक जिंदा रहता है, तो उसकी जीवन को यदि आप गौर से देखेंगे तो आप उसकी चेतना में स्पष्ट गिरावट पाएँगे. और यदि वही व्यक्ति 100 की उम्र तक जिन्दा रहता है, तो गिरावट इतना स्पष्ट हो जाएगा कि आपको यकीन ही नहीं आएगा कि 30 की उम्र में जो चेतना का स्तर था, और 100 के उम्र में जो चेतना है, वह दोनों एक ही व्यक्ति के हैं. 
उदाहण के लिए ओशो को लीजिये, उनके 60 और 70 के दशक के प्रवचनों को सुनिये, फिर आप 85 के बाद उनको सुनिये, एक स्पष्ट अंतर पाएंगे आप. यही सब के साथ होता है, कृष्णमूर्ति, गुरजिएफ. बुद्ध, महावीर, कृष्ण सबके जीवन में आप ऐसा ही पाएँगे.यही सनातन नियम है.

Tuesday, 6 March 2018

'बुद्धत्व बंधन है'

आप से यह तो सबने कहा कि पत्थर में भी परमात्मा है, लेकिन परमात्मा भी पत्थर है यह किसी ने नहीं कहा. सदियों से इसे छुपाया गया है. अगर इस जगत में कुछ भी पूरा अचेतन नहीं है, तो वो जो पूरा चेतन है, जिसे आप 'परमात्मा' कहते हैं, वह भी पूरा चेतन नहीं हो सकता है. अगर पत्थर पूरा बेहोश नहीं है, तो इस यह अर्थ हुआ कि 'बुद्ध' भी पूरे होश में नहीं है. यह मैं आपसे नई बात कह रहा हूँ, जो लोग ज्ञान, ध्यान, और बुद्धत्व का धंधा लगा कर बैठे हैं, वे कभी आप से यह नहीं कहेंगे.
इसको ठीक से समझिये, अनुभव सदा विपरीत का होता है, पूर्ण का कोई अनुभव नहीं हो सकता. और 'अस्तित्व' में कुछ भी पूर्ण नहीं है, सब कुछ प्रोसेस में है. 'मुक्ति' संभव नहीं है, मुक्त होने या बुद्ध होने की चाह असंभव की चाह है. मुक्ति का अनुभव ही तभी हो सकता है जब कुछ बंधन शेष हो. और यदि हमें बंधन का अनुभव होता है, तो वो सिर्फ इसलिए क्योंकि हम पूरे बंधे हुए नहीं है, कुछ है हम में जो मुक्त है.
चित्र साभार- गूगल
इसीलिए, बुद्ध, महावीर, ओशो, कृष्ण, और शिव कोई भी पूर्ण मुक्त नहीं है. और ना ही हो सकते हैं. जो भी आपसे यह कह रहा कि मैं बुद्ध हूँ, मुक्त हूँ, स्वतंत्र हूँ, वो सब आपको बेवक़ूफ़ बना रहे हैं. और आप भी जब यह कहते हैं कि मैं बंधा हूँ, अज्ञानी हूँ, अबुद्ध हूँ, अन्धकार में हूँ, तब आप ख़ुद को और दूसरे को ठग रहे हैं. 'मैं बुद्धू हूँ और मैं बुद्ध हूँ' दोनों ही स्टेटमेंट नासमझी की है. न तो यहाँ कोई बुद्ध है और ना ही कोई बंधा हुआ है.

Saturday, 3 February 2018

तुम कौन हो?


यह तो नहीं पता लेकिन कुछ बातें जो पता है, वो आपको बता  देता हूँ.
ओशो मेरे गुरु तथा कृष्णमूर्ति मेरे पथप्रदर्शक हैं. जॉर्ज गुरजिएफ से मेरा अंतरंग संबंध है. लाओत्से से मैंने जीवन के गूढ़तम रहस्यों को जाना है. मीरा से मैंने नाचना सीखा है. कबीर को मैंने फ़ुर्सत में गुनगुनाया है. जीसस से मैं परिचित हूँ. बुद्ध से प्रेम है. शिव को पूजता हूँ. नानक को पढ़ा है. दरिया से कुछ शब्द उधार लिये हैं. सहजो के साथ मस्ती में झुमा हूँ. पलटू से प्रेम का पाठ सीखा है. लल्ला से पागलपन सिखा है. एलन वॉट्स से गहरी दोस्ती है. रमन से आत्मअनुसन्धान का पाठ पढ़ा है. महावीर से ब्रह्मचर्य पर चर्चा की है. कृष्ण को जन्म से जानता हूँ. मोहम्मद को राह चलते हुए कई बार सलाम किया है. एकहार्ट टोले को देखकर मुस्कुराता हूँ. मूजी से मौन संवाद किया है. नीत्शे को समझता हूँ. मिरदाद से मिला हूँ. ग़ालिब को तकिये के नीचे रखकर सोता हूँ. अहमद फ़राज़ को दिल का दर्द सुनाया है. गुलज़ार के साथ चाय पी है. मीर को जिया हूँ. मुल्लानसरुद्दीन के साथ हँसा हूँ. रूमी से एक बार आँसू पोछने के लिए रूमाल लिया था. आम्रपाली के घर एक रात ठहरना चाहता हूँ, हरमनहेस को तर्पण देता हूँ. इर्विंग स्टोन को चाय पर आमंत्रित करना चाहता हूँ. रेणु के साथ एक बार बिहार घूमना चाहता हूँ. अमृता प्रीतम से प्रेम पत्र लिखवाना चाहता हूँ. इस्मत आपा से एक बार हाथ मिलाना चाहता हूँ. फ्रायड को एक बार सक्रीय ध्यान करते हुए देखना चाहता हूँ, सत्यजीत रे के साथ बैठकर एक फिल्म देखना चाहता हूँ. बच्चन की मधुशाला में एक बार शराब पी थी. गोपालदास नीरज के साथ रोया हूँ. मंटो से एक बार मिलना चाहता हूँ. रवींद्रनाथ के पैर छूना चाहता हूँ. टिच नहत हनह के साथ सत्यसंग करना चाहता हूँ. रिन्झाई के साथ चांदनी रात में नौकाविहार करना चाहता हूँ. मैडम बलवात्सकी को डाँटना चाहता हूँ. टोलस्टोय को धन्यवाद देना चाहता हूँ. इवान तुर्गनेव के कंधे पर हाथ रखकर थोड़ी दूर चलना चाहता हूँ. दोस्तोवसकी की पीठ ठोकना चाहता हूँ. ख़लील जिबरान से जलता हूँ. मंसूर की तरह मरना चाहता हूँ. विमलकृति से प्रभावित हूँ. मखलीगोशाल को मिस करता हूँ. विवेकानंद से लगाव है. रामकृष्ण के चरणों में श्रध्दा का सुमन अर्पित करता हूँ. संसार से ऊब गया हूँ. सन्यास को त्याग दिया है. ध्यान नहीं करता हूँ. भक्ति जमता नहीं है. प्रेम अपने बस की नहीं है. तर्क करने में कुशल हूँ. लेकिन गुरु नहीं बनना है (हालाँकि इच्छा बहुत है). बुद्धत्व के बारे में बुद्ध से भी ज़्यादा पता है लेकिन फिर भी बुद्धू हूँ. और क्या जानना है आपको?

Friday, 2 February 2018

बुद्धत्व की घोषणा


एक दोस्त कल वहत्सप पर मुझसे कह रहा था, “तुम अपने बुद्धत्व की घोषणा क्यों नहीं कर देते हो? ”अब क्या बोलूँ उसको....,

भाई मेरे, दो-चार ज्ञान की और अच्छी-अच्छी बातें कर लेने से कोई बुद्ध नहीं हो जाता है. तुम भी दर्शन और मनोविज्ञान की चार किताबें पढ़ लो, मेरे जैसे हो जाओगे. फिर चाहो तो तुम अपने ज्ञान की घोषणा कर देना..

लेकिन एक बात जो मुझे समझ नहीं आती है,वह यह कि यदि कोई व्यक्ति अपने बुद्धत्व की घोषणा करता है, तो मैं देखता हूँ कि लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं यह समझाने के लिए कि वह कोई बुद्ध नहीं है, बस उसे भ्रम हो गया है. और उन्ही लोगों को मैं देखता हूँ किसी से ये कहते हुए कि ‘भाई आप तो बुद्ध हैं, आपको ज्ञान घट गया, मुझसे मत छुपाईये, मैं सब समझता हूँ.!’ कमाल है!
क्या बुद्धत्व से ऊपर की भी कोई ऐसी अवस्था है जहाँ आदमी को यह पता चल जाता है कि कौन सच में बुद्ध है और कौन नक़ली है?

Saturday, 27 January 2018

यहाँ की शांति में भी शोर है

गोवा में एक तरह की बेचैनी है, जो सिर्फ गोवा जैसी जगहों में ही होती है. यहाँ पंद्रह दिन बिताने के बाद मुझे ऐसा महसूस हो रहा कि शास्त्रों में जिस तरह के स्वर्ग का वर्णन है, अगर वैसे किसी स्वर्ग में मुझे कभी भेजा गया, तो मैं निश्चित ही उब जाऊंगा. यहाँ की शांति में भी शोर है. हंसी की पृष्ठभूमि में अगर उदासी का महासागर ना हो, तो हंसी ओछी व छिछली हो जाती है. किसी मरघट की शांति जैसी है यहाँ की चहलपहल-डरावनी और व्यर्थ. यहाँ की सार्थकता बस इतनी है कि लंबे समय तक रुकने के बाद इसकी निरर्थकता सिद्ध हो जाती है. और फिर जब आप यहाँ से पलायन करते हैं तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखते हैं. इसको मैं उपलब्धी मानता हूँ. किसी चीज़ को इतनी समग्रता से जी लेना कि उसकी व्यर्थता नज़र आने लगे.

"अब आए हो तो यहाँ क्या है देखने के लिए
ये शहर कब से है वीराँ वो लोग कब के गए"

स्वर्ग यहीं और अभी है

‘गंदी राजनीति, भ्रष्ट नेता, पागल भीड़, इत्यादि-इत्यादि.. इन शब्दों से ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं कोई राजनीति ऐसी भी होगी जो अच्छी होगी, कोई नेता ऐसा भी होगा जो भ्रष्ट नहीं होगा, या फिर कोई भीड़ ऐसी भी होगी जो पागल नहीं होगी.ये सभी शब्द इसी तरह का भ्रम पैदा करते हैं. लेकिन, जैसे शांत तूफ़ान नहीं होता, उजली रातें नहीं होती, वैसे ही नेता जब भी होगा भ्रष्ट ही होगा, अच्छा नेता हो ही नहीं सकता, भीड़ मतलब पगलों की जमात, और राजनीति मतलब गंदगी. इसीलिए मेरे हिसाब से इन सब की निंदा करने का कोई अर्थ नहीं है- जो लोग ऐसा करते हैं वे बहुत गहरे में इन से प्रभावित हैं. विरोध से सिर्फ़ आकर्षण का पता चलता है- केजरीवाल राजनीति और भ्रष्टाचार का विरोध करते थे, आज वह ख़ुद वही सब कर रहे हैं. रामदेव जिस मार्केट की निंदा करते थे, आज उसी में कंठ तक डूबे हुए हैं. सदा ऐसा ही होता है, और ऐसा ही होता रहेगा, हम विरोध उसी का करते हैं जिससे हमारा लगाव होता है, यानी मौका मिलने पर जिसके जैसा हम बनना चाहते हैं. एक गरीब, अमीरों के खिलाफ तभी तक बोलता है, जब तक कि वह ख़ुद अमीर नहीं बन जाता है. अमीर बनते ही वह वही सब करने लगता है जिसकी वह विरोध किया करता था. यही सनातन नियम है. 
इस दुनिया में जितने बुरे लोग है, उससे कई गुणा ज़्यादा भले लोग हैं. सिर्फ़ ३३ % लोग बुरे हैं पूरी दुनिया में. लेकिन पत्रकार, टीवी वाले, धर्मगुरु, कवि, शायर, लेखक और तथाकथित समाज सुधारक सिर्फ़ इन्हीं ३३% की भाटगिरी करते नज़र आते हैं. ऐसा क्यों.......? क्योंकि ये उसी ३३% के हिस्सा हैं. दोनो एक-दूसरे के सहयोगी है-एक को ख़बर में रहना है और दूसरे को ख़बर बेचना हैं. एक के बिना दूसरा नहीं टिक सकता है. 
लेकिन, इन दोनो के अलावा एक और भी है. सिर्फ़ बंदर और मदारी से खेल नहीं हो सकता है. दर्शक की उपस्तिथिती अपरिहार्य है.असल में खेल दर्शक के लिए ही होता है. अगर दर्शक ना हो तो, ना तो ज्यादा देर डुगडुगी बजेगी, और ना ही बन्दर का ताथैया चलेगा. 
चित्र साभार-गूगल 
असली गुनहगार 'हम' और आप' हैं-हम से मेरा तात्पर्य उन लोगों से हैं जो नकारात्मक ख़बरों, कविताओं, नगमों, किताबों, फिल्मों, साहित्यों, गीतों, इत्यादि में रस लेते हैं. जिस दिन हम रस लेना बंद कर देंगे उस दिन यह सब समाप्त हो जाएगा. जिस भी चीज़ पर हम ध्यान देते हैं वही बढ़ने लगता है. हम दंगा, फसादों, बलात्कारों, हंगामाओं पर ध्यान देते हैं, इन में रस लेते हैं, इसके बारे में अच्छा-बुरा बोलते हैं, इसलिए यह सब जिन्दा है. 
तो क्या अगर हम कल से अनादं के गीत गाने लगे, आनंद की बात करने लगें, तो यह जो दुनिया में घट रहा है समाप्त हो जएगा? नहीं...ऐसा कुछ भी नहीं होगा. ना तो नकारात्मकताएं ख़त्म होंगी और ना ही आनंद बढेगा. बस इतना होगा कि आप 33% की जमात से निकल कर 67% की जमात में आ जाएँगे. फिर आपको 33% लोगों से कोई शिकायत नहीं होगी, बल्कि सहानुभूति होगी.. तब आप जानेंगे कि 67% की शांति 33% लोगों की पागलपन पर टिकी हुई है. फिर आप पाएँगे कि अशांति, शांति विरोधी नहीं है, बल्कि सहयोगी है. 
जब तक आप 33% में शामिल है, तब इस दुनिया में सिर्फ अंधकार, ही अंधकार है, दुःख-ही-दुःख है, चोर-ही-चोर है, लुटेरे-ही-लुटेरे हैं. सब गलत हो रहा है यहाँ, सब बेकार है. फिर आपके लिए 'संसार दुःख है, फिर आपका सुख इस संसार से बाहर कहीं स्वर्ग(भविष्य) में है. लेकिन जैसे भी आप 67% में शामिल होते हैं. स्वर्ग यहीं और अभी है, यह युग सत्युग है. फिर जीवन आपके लिए उत्सव है, हर दिन आपके लिए परमात्मा से मिला प्रसाद है, जिसे आप अहोभाव से ग्रहण करते यानी जीते हैं. फिर आप रवीन्द्रनाथ की तरह यहाँ बार-बार आने की परमात्मा से प्राथना करते हैं. फिर आप असरारुल हक़ मजाज़ की तरह गाते हैं..........

"हर आन यहाँ सहबा-ए-कुहन, इक सागर-ए-नौ में ढलती है।
कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है। 
याँ हुस्न की बर्क़ चमकती है, या नूर की बारिश होती है।
हर आह यहाँ एक नग़मा है, हर अश्क़ यहाँ इक मोती है।

हर शाम है, शाम-ए-मिस्र यहाँ, हर शब है, शब-ए-शीराज़ यहाँ।
है सारे जहाँ का सोज़ यहाँ, और सारे जहाँ का साज़ यहाँ।

ये दश्ते जुनूं दीवानों का, ये बज़्मे वफ़ा परवानों की।
ये शहर-ए-तरब रूमानों का, ये ख़ुल्द-ए-बरीं अरमानों की।
इस फ़र्श से हमने उड़-उड़कर, अफ़लाक के तारे तोड़े हैं।
नाहीद से की है सरगोशी, परवीन से रिश्ते जोड़े हैं।

इस बज़्म में तेगें खींची हैं, इस बज़्म में सागर तोड़े हैं।
इस बज़्म में आँख बिछाई है, इस बज़्म में दिल तक जोड़े हैं।

इस बज़्म में नेजे़ फेंके हैं, इस बज़्म में ख़ंजर चूमे हैं।
इस बज़्म में गिरकर तड़पे हैं, इस बज़्म में पीकर झूमे हैं।
ज़र्रात का बोसा लेने को, सौ बार झुका आकाश यहाँ।
ख़ुद आँख से हमने देखी है, बातिल की शिकस्त-ए-फाश यहाँ।

इस गुल कदा-ए-पारीना में फिर आग भड़कने वाली है।
फिर अब्र गरजने वाला है, फिर बर्क़ कड़कने वाली है।

जो अब्र यहाँ से उठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा।
हर जू-ऐ-रवां पर बरसेगा, हर कोहे गरां पर बरसेगा।"

Monday, 11 December 2017

और प्यार का भूत उतर गया........

Day-3 Running in the Evening 
और प्यार का भूत उतर गया........

पता नहीं अब ऐसा होता है या नहीं. लेकिन उन दिनों हमने किसी का भी नंबर या पता हासिल करने का नयाब तरीका ढूंढ निकाला था. MTNL के कस्टमर केयर में कॉल करके पता बताने पर वे लोग उस पते पर लगा MTNL का फ़ोन नंबर बता देते थे. और यदि आपके पास फोन नंबर है तो वो आपको पता बता देते थे. इसी तरीके से मैंने मीनाक्षी के घर का नंबर निकाल लिया था. दो चार दिन तक उस नंबर को मोबाइल के सेव करके मैं इतराता रहा, लेकिन कॉल करने की हिम्मत नहीं हुई. उन दिनों प्यार के मामले में मेरी हालत उन कुत्तों की तरह थी जो कार के पीछे बिना यह जाने भागते हैं कि अगर कार उन्हें मिल गया तो करेंगे क्या? “शादी-मुझे करनी नहीं है, सेक्स-बाप रे! ऐसा मैं सोच भी कैसे सकता हूँ,.

एक महीना तक हमारा बस देखा-देखी चलता रहा. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि आगे और क्या करना है. “हो तो गया वह मुझे देखती है, मैं उसे देखता हूँ, अब और इससे आगे क्या चाहिए...?” लेकिन मीनाक्षी को इससे आगे भी कुछ चाहिए था, एक दिन अपने छत के रेलिंग के एकदम पास आ कर, गर्दन उपर करके मुझसे बोली, “तुम कुछ बोलते क्यों नहीं हो...?”. भाई साहब यकीन मानिये मेरी तो एकदम से सिटीपिटी गुम हो गई. मैं नीचे उसकी ओर देखता है, गले से थूक सटका, लाख कोशिश के बावजूद भी मेरे अन्दर से एक शब्द भी नहीं निकला. थोड़ी देर तक मेरी ओर देखते रहने के बाद वह वहां से कुछ बुदबुदा कर चली गई, शायद मुझे गाली देकर चली गई.
रात मुझे तेज़ बुखार हो गया, पूरी रात नींद नहीं आई. अगले दिन फिर से हमेशा की तरह शाम का इंतजार करने लगा. लेकिन आज उसके सामने जाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. पता नहीं किस चीज़ से डर गया था मैं, अपने कमरे में दुबका बैठा रहा. अगले दो दिन तक यही किस्सा चला. तीसरे दिन सुबह मेरे ऊपर किसी जादूई शक्ति का इल्हाम हुआ और मैंने तय किया कि आज मैं उससे बात करूँगा. और उसे दिखा दूंगा कि मैं कोई डरपोक और बुजदिल नहीं हूँ. मजीद इंतजार के बाद वह वक़्त आया जब वह क्लास लेने के लिए अपने घर से निकली. मैं उसके पीछे हो लिया. पांच मिनट बाद हम मेन रोड पर आ गए. उसने अभी तक एक बार भी मुझे पीछे मुड़ कर नहीं देखा था. शायद उसे इस बात का इल्म नहीं था कि मैं उसका पीछा कर रहा हूँ या उसके पीछे चल रहा हूँ.
चित्र साभार-गूगल 
“Excuse me!”, मैंने पीछे से आवाज़ लगाईं. उसने पलट कर देखा. “क्या है..” उसने हडबडी दिखाते हुए कहा. “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है..’’, तेज़ कदमो से पीछे चलते हुए मैंने कहा. वह अचानक तेज-तेज चलने लगी थी. “जो भी कहना है जल्दी कहो..” बिना मेरी तरफ देखे बोली और आगे बढ़ती रही. इससे पहले कि मैं उसे कह पता कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ, तुझसे दोस्ती करना चाहता हूँ. एक कार ठीक मेरे बगल में आ कर रुकी. शीशा खुला, ड्राइविंग सीट पर बैठे लड़के ने मुझसे पूछा, “क्या है भाई, क्यों परेशान कर रहा है उसे, कहाँ रहता है तूं....?” मुझे काटो तो खून नहीं. “यहीं लालबाग में रहता हूँ...” मैंने हकलाते हुए गलत पता बताया. और तेज़ी से वहां से भागा...बिलकुल वैसे ही जैसे आजकल सुबह खेत में भागता हूँ. बीस मिनट तक भगने के बाद एक घर के नीचे बैठ गया. आधा घंटा तक चिंतन-मनन करने के बाद सीधा नाई के पास गया और अपने अर्जुनरामपाल कट बाल को फौजी कट करवा कर घर लौट आया. बाल के साथ सिर से प्यार का भूत भी उतर गया. दो चार दिन बाद घर खाली कर के दूसरे मोहल्ले में चला गया.

Saturday, 9 December 2017

‘म’ की महिमा (डायरी)

Running Day-2 (10-12-2017)

2014 के सितम्बर में जब तीन दिन के लिए मुंबई से मेहसाणा आया था तो किसने सोचा था कि 3 दिन तीन साल में बदल जाएगा. मेहसाणा में तीन दिन बिताने के बाद वापिस जाते समय अहमदाबाद स्टेशन पर हमने यह तय किया था कि जॉब छोड़ कर तीन महीना मेहसाना में रहेंगे. 
अक्टूबर में 7 को दरमाहा मिलने के बाद जॉब छोड़ दिया और 9 को मुंबई से रवाना हो लिए मेहसाना के लिए. म-से मुंबई छोड़ा और म-से मेहसाना आया और म-से मनुजी के आश्रम म-से मनन में रहने लगा. शुरू में प्लान यह था कि तीन महीना मेहसाना में रह कर कहीं और चला जाऊंगा और फिर वहां तीन महीना रहूँगा. और इसी तरह तीन-तीन महीना करके अलग-अलग शरह में बिताऊंगा. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, मेहसाना का तीन महीना आज तीन साल में बदल चुका है. 


म-से मनाली से आने के बाद जबसे (मतलब दो दिन से) मैंने दौड़ना शुरू किया है मेरे अन्दर नए-नए विचारों का जन्म हो रहा है. उनमे से एक ताज़ा विचार यह है कि ‘अब मेहसाना में नहीं रहना है.’ अभी जनवरी में 7 दिन के लिए Goa जाने का प्लान था, लेकिन अब सोच रहा हूँ कि मेहसाना छोड़कर तीन-चार महीना Goa में ही बिताऊँ. 
‘म’ की महिमा का बखान करते हुए याद आया कि मेरे बचपन के पहले दोस्त का नाम भी म-से मुकेश है. और हैरानी की बात है कि जिस लड़की से मुझे पहली दफ़ा मोहब्बत हुआ था, यानि जिसको देख कर यह एहसास हुआ कि दिल सच में धड़कता है, का नाम भी म-से मीनाक्षी था. और जिस चीज़ की तलाश में मैं पिछले कई सालों से भटक रहा हूँ क़िबला वह भी म-से मोक्ष है. और कमाल है कि जीवन की गंगोत्री भी तो म-से माँ है. और मैं और भी अचंभित हो रहा हूँ क्योंकि मेरी माँ नाम भी म-से मीरा है.

नोट- इस पुरे लेख में ‘म’ का कुल 61 बार इस्तेमाल हुआ है

फुर्रर्रर्रर्रर...


Running Day-1 (09/12/2017)
अभी जब मनाली में था तभी क़सद किया था कि मेहसाना पहुंचकर दौड़ना शुरू करूँगा. पता नहीं कैसे दौड़ने का ख्याल आया. फिट रहने के लिए योग का और जिम का सहारा कई बार ले चुका हूँ, दौड़ना पहली बार शुरू किया है. आज सुबह जब दौड़ रहा था तो याद आया कि बचपन में हम चलते कम और दौड़ते ज्यादा थे. कहीं भी जाना होता था तो दौड़ कर जाते थे. घरवालों को भी जब हमसे कोई काम करवाना होता था तो यही कहते थे, “दौड़ कर जाओ...”. फिर धीरे-धीरे वक़्त के साथ जब बड़े हुए तो दौड़ना कम हो गया. दौड़ना थोड़ा अजीब सा लगने लगा, क्योंकि कोई भी बड़ा व्यक्ति कभी दौड़ता नहीं था. शुरू-शुरू में हैरान भी होता था कि ये बड़े-बूढ़े कभी दौड़ते क्यों नहीं हैं?

सुबह जब दौड़ना शुरू किया तो थोड़ी देर बड़ा अजीब सा लगा, ‘लोग क्या सोचेंगे इतना बड़ा आदमी दौड़ क्यों रहा है?’, सिर झटक कर विचार को तर्क किया. ‘सोचेंगे कि फिट रहने के लिए दौड़ रहा है, और भी लोग दौड़ते हैं मैं कोई अकेले थोड़े हूँ.’ फिर कान में लीड लगा कर दौड़ने लगा. लेकिन थोड़ी देर बाद ही फिट रहने के लिए दौड़ने का ख्याल बड़ा बेहूदा लगने लगा. इस ख्याल के साथ मैं ज्यादा देर नहीं दौड़ सकता था. 

चित्र साभार- गूगल 
पांच मिनट बाद मैं ट्रैक छोड़ कर खेत में उतर गया और खेत की मुंडेर पर उसी तरह दौड़ने लगा जैसे 20 साल पहले बचपन में दौड़ा करता था-सिर्फ दौड़ने के लिए. दौड़ने का अंदाज़ एकदम से बदल गया. अभी पांच मिनट पहले समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कदम उठाऊँ, हाथ को कैसे और कहाँ रखूं, बड़ा अटपटा सा लग रहा था सब कुछ. लेकिन जैसे ही खेत में दौड़ना शुरू किया सब याद आ गया. दोनों होठों को थरथराते हुए गाड़ी स्टार्ट की और हाथ को हवा में लहराते हुए फुर्रर्रर्रर्रर...हो गया.

Friday, 8 December 2017

खजुराहो की खोज (यात्रा-वृतांत)

               'टिकट बुक ट्रेन की थी, लेकिन पहुंचे हम खजुराहो बस से.' 
कोई 15 दिन पहले जब हमने टिकट बुक किया था तो वेटिंग 40, 41 और 42 था. सो सोचा कि शायद कन्फर्म हो जाएगा और यदि नहीं भी हुआ तो तत्काल से बुकिंग करके चले जाएँगे. लेकिन सब गड़बड़ हो गया. ऐन वक्त पर वेटिंग 3, 2, और 1 पर आकर अटक गया. हमने सोचा था कि ट्रेन सोमनाथ से 9:30 पर खुलती है, तो सुबह 5 बजे के आस-पास चार्ट तैयार होगा और हमें हमारे टिकट का स्टेटस पता चल जाएगा. अगर टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो 11 बजे अगले दिन यानि 11 अगस्त के लिए तत्काल से बुक कर लेंगे या फिर बस से चले जाएँगे.
रात को चार बजे मेरी नींद खुली गई, तभी से जगकर मैं चार्ट तैयार होने का इंतजार करने लगा. जाने की उत्सुकता व उत्तेजना ने नींद उड़ा दी थी. उम्मीद था की 6 बजे तक रेलवे से मेसेज आ जागेगा. लेकिन 6 क्या 8 बजे तक भी कुछ नहीं हुआ. फिर 9 बजे के क़रीब इस आशंका से घबरा कर कि कहीं ट्रेन रद्द न हो गया हो 139 पर कॉल किया. वहां से पता चला कि ट्रेन अपने समय से सोमनाथ से चलेगी. और हमारा चार्ट 2:30 के आस-पास तैयार होगा. यानि हमारे बोर्डिंग समय, जो कि अहमादाबाद से 6:30 का था, से क़रीब चार घंटा पहले. मतलब अब हम आज तत्काल बुक नहीं कर सकते थे. और अभी वेटिंग केंसल करने का मतलब एक भी पैसा वापिस नहीं मिलेगा. अब हमारे लिए दूध और माछ दोनों बांतर था.
खैर, अल्लाह-अल्लाह करते हुए हमने पैकिंग कर ली और सारा सामान बाँध कर ढाई बजने का इंतज़ार करने लगे. और अंत में वही हुआ जो अपेक्षित नहीं था, टिकट कन्फर्म नहीं हुआ. अब तीन बजे तो तत्काल बुक नहीं हो सकता था. मतलब अब हम 12 अगस्त से पहले ट्रेन से नहीं जा सकते थे. और इतना लेट जाने का कोई मतलब भी नहीं था. 12 को जाना यानि 13 पहुंचना, और 14 को वापिस आ जाना, तभी मेरे दो कामकाजू मित्र 16 को ऑफिस ज्वाइन कर सकते थे. तो ऐसे कुछ घंटों के लिए खजुराहो को धप्पा मार का आने का कोई मतलब नहीं था.
इधर पिछले एक घंटे से कुणाल का फोन स्विच ऑफ जा रहा था, सो अब हमें आगे क्या करना है यह भी तय नहीं हो पा रहा था. बिना कुणाल से बात किए हम कोई भी स्टेप नहीं ले सकते थे. हमें मेहसाणा से अहमदबाद पहुंचना था, कुणाल वहीँ रहते हैं, सो वो वहीँ से सीधा स्टेशन आने वाले थे.  
अब सामान बाँध कर हम इस सोच में डूबे हुए थे जो कहीं के नहीं रह जाते हैं वो कहाँ जाते हैं? पिछले १० साल से मैं खजुराहो जाने का ख़्वाब पाले हुआ था. तीन-चार बार पूरी शिद्दत से जाने की कोशिश कर चूका था, हर बार कोई न कोई अरंगा खड़ा हो जाता था और जाना रद्द हो जाता था. इस बार भी यही लग रहा था. टिकट का ऐन एक-दो-तीन पर आकर अटक जाना, अचानक कुणाल के फ़ोन का स्विच ऑफ हो जाना कुछ शुभ संकेत नहीं लग रहा था. इन सब प्रतिकूल स्थिति में सुकून सिर्फ इस बात का था कि टिकट ख़ुद से केंसल न करा कर हमने 180 रुपए बचा लिया था. लेकिन यह ख़ुशी भी फूस की आग की तरह ज्यादा देर टिक नहीं पाई. 3 बजे के क़रीब IRCTC मेसेज आया कि आपका टिकट केंसल हो गया है और आपका 180 रुपया कट गया है. दरयाफ्त करने पर पता चला कि अब ऑटो-ऑटोकेंसेलेशन पर भी पैसा कटता है. मन खिन्न हो गया. यही 180 रुपया बचाने के लिए तो हमने टिकट केंसल नहीं किया था. अगर यह 180 गवाना ही था तो हम कब का टिकट केंसल करके तत्काल से बुक लिए होते. 
खैर, कोई ३ बजे, कुणाल का फ़ोन आया, पता चला कि बेट्री डाउन हो जाने की वजह से भाई साहब का दोनों फोन ऑफ हो गया था. ये भी खूब रहा, अगर ऐन मौके पर बेट्री डाउन ही हो जाए तो लानत है नोकिया फ़ोन पर, दो-दो मोबाइल रखने का क्या मतलब है फिर? खैर कोई नहीं यह कुणाल का जाति मामला है कि इस घटना के बाद उन्हें दो फ़ोन रहना चाहिए या नहीं. चलिए आगे बढ़ते हैं... काफी देर तक घमर्थन करने के बाद हमने ये तय पाया कि अहमदाबाद से आज रात की कोई बस लेकर हम भोपाल जाएँगे और फिर वहां पहुँच कर तय करेंगे आगे क्या और कैसे करना हैं. यह भी कुछ तय करना हुआ? बस की टिकट बुक करने का जिम्मा कुणाल ने अपने सिर लिया. हमें दिलासा दिया कि तुरंत टिकट बुक करके इत्लिया करता हूँ. सुरंग के उस तरफ मुझे रौशनी दिखने लगा, उम्मीद का बुझता हुआ दिया फिर से टिमटिमाने लगा. और खुली आँखों से मैं खाजुरोहों के देवी-देवताओं का दर्शन करने लगा. एक घंटे बाद जब मैं ये पता करने के लिए कुणाल को कॉल किया कि टिकट बुक हुआ कि नहीं, कुणाल का फ़ोन एक बार फिर से ऑफ जा रहा था. अब हमें अपने भाग्य के साथ-साथ कुणाल के इरादे पर भी संदेह होने लगा था. हम सामान बाँध कर घर के बाहर बैठे हुए थे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें. पीछे घर अच्छा नहीं लग रहा था, आगे कोई मंजिल नहीं दिख रही थी. घनघोर अवसाद के क्षण में हमने ये तय किया कि अब हम माउंट आबू जाएँगे और वहीँ ग़म ग़लत करेंगे. लेकिन अगले ही क्षण इस विचार पर उलटी आने  लगा. कहाँ खजुराहो जाने का सुनहरा ख्वाब और कहाँ आबू की घिसीपिटी गलियां. मन ओकिया-सा  गया.

अगर सिर्फ पांच मिनट और देर हो गया होता कुणाल का कॉल आने में तो हम अपने घर के पंखे से लटक कर जान दे दिए होते. और विदेह खजुराहो की ओर रवाना हो लिए होते. लेकिन, जैसे अभी तक सभी कुछ ऐन वक्त पर होता आ रहा था, उसी तरह ठीक ऐन वक्त पर कुणाल का कॉल आ गया, और शरीर छोड़ने के पाप और विदेह खजुराहो जाने के सुख से हम वंचित रह गए. 1714/- रुपया में कुणाल ने अहमादाबाद से भोपाल की टिकट, रेड बस के थ्रू, बुक कर लिया था. कुणाल ने जब टिकट वाला मेसेज फॉरवर्ड किया तो थोड़ी तसल्ली मिली. और हम आनन-फानन में घर से बस स्टैंड की ओर अहमादाबाद के लिए बस लेने निकल पड़े.
“खजुराहो जा रहे हैं, इसका ये मतलब नहीं कि आप अहमादाबाद को हलके में लेंगे”, कुणाल ने खिड़की से बाहर एक पुरानी इमारत की ओर इशारा करते हुए मुझसे कहा. हम महासागर परिवहन की शानदार एसी बस में बैठे..नहीं ...नहीं.. लेटे हुए थे. ट्रेन टिकट के रद्द हो जाने और 180 रुपए कटने का अब हमें कोई मलाल नहीं था. हम तीनो अपनी-अपनी खिड़की के बाहर का नज़ारा देखने मैं व्यस्त थे. तभी अचानक वो पॉइंट आगया जहाँ से कूद कर मेरे एक दोस्त की भाभी अभी एक महीना पहले आत्महत्या की थी. पीछे छुट गए दो टुअर बच्चे की मनोस्थिति को सोचकर मैं थोड़ी देर के लिए अवसाद में चला गया. और जीवन और मृत्यु के विषय में गंभीरता से सोच-विचार करने लगा. लेकिन मेरी ये सधुकड़ी ज्यादा देर नहीं चल पाई. कुणाल के लतीफ़ों ने विचारों की अनवरत धारा को तोड़ दिया. और फिर हम ख़ुशगप्पी की नशिस्त लगाकर बैठ गए.
बात-चीत करते-करते कब हमें नींद आ गई और कब हम सो गए, कुछ पता था. हमारी बस भी कुछ अलग टाइप की थी. रात कहीं रुकी ही नहीं. कुणाल ने सुबह से कुछ खाया नहीं था. हमने, हालाँकि, दोपहर में खाना का लिया था, लेकिन फिर भी थोड़ी भूख थी, सो हमने सोचा था कि अगर बस कहीं रुकेगी तो हलझप्पी करेंगे. लेकिन बस कहीं रुई ही नहीं. शायद जैसे हम खजुराहो पहुँचने के लिए अधीर थे, वैसे बस भोपाल पहुँचने के लिए बेचैन थी. भोपाल पहुँचते-पहुँचते 12 बज गया, अगर समय से पहुँचते तो शयद 9 बजे के आस-पास हम भोपाल पहुँच गए होते. लेकिन भारतीय धावक की तरह बस अपनी अनवरत गतिशीलता के वावजूद बस मंजिल पर समय से नहीं पहुँच सका.
ISBT में घुसते के साथ ही मेरी निगाहे सुलभ-शौचालय को ढूँढने लगी. मेरा एक….. (क्रमशः)


जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...