Running Day-1 (09/12/2017)
अभी जब मनाली में था तभी क़सद किया था कि मेहसाना पहुंचकर दौड़ना शुरू करूँगा. पता नहीं कैसे दौड़ने का ख्याल आया. फिट रहने के लिए योग का और जिम का सहारा कई बार ले चुका हूँ, दौड़ना पहली बार शुरू किया है. आज सुबह जब दौड़ रहा था तो याद आया कि बचपन में हम चलते कम और दौड़ते ज्यादा थे. कहीं भी जाना होता था तो दौड़ कर जाते थे. घरवालों को भी जब हमसे कोई काम करवाना होता था तो यही कहते थे, “दौड़ कर जाओ...”. फिर धीरे-धीरे वक़्त के साथ जब बड़े हुए तो दौड़ना कम हो गया. दौड़ना थोड़ा अजीब सा लगने लगा, क्योंकि कोई भी बड़ा व्यक्ति कभी दौड़ता नहीं था. शुरू-शुरू में हैरान भी होता था कि ये बड़े-बूढ़े कभी दौड़ते क्यों नहीं हैं?
सुबह जब दौड़ना शुरू किया तो थोड़ी देर बड़ा अजीब सा लगा, ‘लोग क्या सोचेंगे इतना बड़ा आदमी दौड़ क्यों रहा है?’, सिर झटक कर विचार को तर्क किया. ‘सोचेंगे कि फिट रहने के लिए दौड़ रहा है, और भी लोग दौड़ते हैं मैं कोई अकेले थोड़े हूँ.’ फिर कान में लीड लगा कर दौड़ने लगा. लेकिन थोड़ी देर बाद ही फिट रहने के लिए दौड़ने का ख्याल बड़ा बेहूदा लगने लगा. इस ख्याल के साथ मैं ज्यादा देर नहीं दौड़ सकता था.
चित्र साभार- गूगल
पांच मिनट बाद मैं ट्रैक छोड़ कर खेत में उतर गया और खेत की मुंडेर पर उसी तरह दौड़ने लगा जैसे 20 साल पहले बचपन में दौड़ा करता था-सिर्फ दौड़ने के लिए. दौड़ने का अंदाज़ एकदम से बदल गया. अभी पांच मिनट पहले समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कदम उठाऊँ, हाथ को कैसे और कहाँ रखूं, बड़ा अटपटा सा लग रहा था सब कुछ. लेकिन जैसे ही खेत में दौड़ना शुरू किया सब याद आ गया. दोनों होठों को थरथराते हुए गाड़ी स्टार्ट की और हाथ को हवा में लहराते हुए फुर्रर्रर्रर्रर...हो गया.

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