Saturday, 9 December 2017

‘म’ की महिमा (डायरी)

Running Day-2 (10-12-2017)

2014 के सितम्बर में जब तीन दिन के लिए मुंबई से मेहसाणा आया था तो किसने सोचा था कि 3 दिन तीन साल में बदल जाएगा. मेहसाणा में तीन दिन बिताने के बाद वापिस जाते समय अहमदाबाद स्टेशन पर हमने यह तय किया था कि जॉब छोड़ कर तीन महीना मेहसाना में रहेंगे. 
अक्टूबर में 7 को दरमाहा मिलने के बाद जॉब छोड़ दिया और 9 को मुंबई से रवाना हो लिए मेहसाना के लिए. म-से मुंबई छोड़ा और म-से मेहसाना आया और म-से मनुजी के आश्रम म-से मनन में रहने लगा. शुरू में प्लान यह था कि तीन महीना मेहसाना में रह कर कहीं और चला जाऊंगा और फिर वहां तीन महीना रहूँगा. और इसी तरह तीन-तीन महीना करके अलग-अलग शरह में बिताऊंगा. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, मेहसाना का तीन महीना आज तीन साल में बदल चुका है. 


म-से मनाली से आने के बाद जबसे (मतलब दो दिन से) मैंने दौड़ना शुरू किया है मेरे अन्दर नए-नए विचारों का जन्म हो रहा है. उनमे से एक ताज़ा विचार यह है कि ‘अब मेहसाना में नहीं रहना है.’ अभी जनवरी में 7 दिन के लिए Goa जाने का प्लान था, लेकिन अब सोच रहा हूँ कि मेहसाना छोड़कर तीन-चार महीना Goa में ही बिताऊँ. 
‘म’ की महिमा का बखान करते हुए याद आया कि मेरे बचपन के पहले दोस्त का नाम भी म-से मुकेश है. और हैरानी की बात है कि जिस लड़की से मुझे पहली दफ़ा मोहब्बत हुआ था, यानि जिसको देख कर यह एहसास हुआ कि दिल सच में धड़कता है, का नाम भी म-से मीनाक्षी था. और जिस चीज़ की तलाश में मैं पिछले कई सालों से भटक रहा हूँ क़िबला वह भी म-से मोक्ष है. और कमाल है कि जीवन की गंगोत्री भी तो म-से माँ है. और मैं और भी अचंभित हो रहा हूँ क्योंकि मेरी माँ नाम भी म-से मीरा है.

नोट- इस पुरे लेख में ‘म’ का कुल 61 बार इस्तेमाल हुआ है

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