Friday, 6 September 2019

‘आत्मा की बात’(बेंगलोर डायरी)

सुख के गीत गाता हूँ, आनंद की बातें करता हूँ, इसका यह मतलब नहीं है कि जीवन के दुखों से, ग़रीबों की पीड़ाओं से, बीमारों की आँसुओं से, स्त्रियों की आहों से, अबलाओं की चाहों से अपरिचित हूँ। सबके प्रति सजग हूँ, जागरुक हूँ और जितना जागरुक हूँ उससे ज़्यादा होने की कोशिश में निरंतर लगा रहता हूँ। 
ख़ुद की सीमाओं और पाखंडों का भी बोध है मुझे। ख़ुद के भीतर कथनी और करनी का जो भेद है, उससे भी भली भाँति परिचित हूँ। 
ध्यान और अहिंसा की बातें कर लेता हूँ, फिर किसी होटल में जाकर मछली और मुर्ग़ा खा लेता हूँ। सादा जीवन पर एक घंटा लेक्चर दे देता हूँ, फिर चार हज़ार की जींस ख़रीद लेता हूँ। इसी तरह की हज़ार विरोधी तत्वों को ख़ुद के भीतर पाता हूँ। राम और रावण को एक साथ अपने भीतर सक्रीय पाता हूँ। कभी कोई घट जाता है, तो कभी कोई बढ़ जाता है, लेकिन मौजूद हमेशा दोनों होते हैं। एक पूरी भीड़ है मेरे भीतर, अगले क्षण मैं क्या करूँगा, या फिर मुझसे क्या हो जाएगा, इसका मुझे कुछ भी पता नहीं होता है। कल तक जिस चीज़ का विरोध कर रहा था, हो सकता है आज उसकी पूजा करने लगूँ। बहुत ही अजीब है सबकुछ।

इन दिनों, जब भी ज़रूरत से ज़्यादा सुख-सुविधाओं में ख़ुद को पाता हूँ, अंदर से बेचैन होने लगता हूँ। मुझे उन मासूम बच्चों की तस्वीरें दिखने लगती हैं, जो रोड किनारे भूख से बिलखते रहते हैं। रेल की पटरियों के किनारे जलती धूप में प्लास्टिक की छतों के नीचे सोये लोगों की याद आने लगती है। अस्पताल के बाहर बिना इलाज के दम तोड़ते मज़दूरों के चेहरे दिखाई पड़ने लगते हैं। हवस की शिकार स्त्रियों की चीख़ें सुनाई देने लगती है। बहुत सोचता हूँ इन सब के बारे, क्या हो सकता क्या किया जा सकता है, इसके बारे में अपने क़रीबी मित्रों से बातें करता हूँ, उनके साथ घंटों बहस करता हूँ। अपने लेवल पर जितना कर सकता हूँ उतना करने की कोशिश करता हूँ। बिजली की बचत करता हूँ, पानी बचाता हूँ, पलस्टिक का इस्तेमाल बहुत कम करता हूँ, बच्चा पैदा नहीं किया है, पेड़ लगाता रहता हूँ, खाना खाते समय सजग रहने की कोशिश करता हूँ, और ऐसी ही बहुत सी चीज़ें हैं जो करता रहता हूँ। लेकिन बहुत गहरे में जानता हूँ कि इस सबसे कुछ नहीं बदलेगा। 
मैं यहाँ घर में पानी और बिजली बचाता हूँ, और वहाँ बड़े-बड़े शोपिंग भवन में दिन दहाड़े हज़ारों लाइटें जल रही होती है। मैं पैदल चलता हूँ, और लोग महँगी कारों से तीन किलोमीटर जाने में एक लीटर पेट्रोल जला देते हैं। 
किसी भी क्रांति या आंदोलन से इस दुनिया को ठीक नहीं किया जा सकता है। जितना सोचता हूँ उतना पाता हूँ कि आध्यात्मिक समझ के अलावा इस दुनिया को और ख़ुद को किसी भी चीज़ से ठीक नहीं किया जा सकता है। आज अगर मैं ख़ुद के दोषों को देख पा रहा हूँ, उन्हें स्वीकार कर पा रहा हूँ, तो सिर्फ़ इस लिए कि मेरे भीतर होश का एक छोटा-सा दिया टिमटिमाने लगा है। 
जब तक होश का यह दिया कम-से-कम दुनिया के ३३ फ़ीसदी लोगों के भीतर नहीं जलने लगता है। इस पृथ्वी पर स्वर्ग को नहीं उतारा जा सकता है। धर्म आख़री विकल्प है। धर्म से मेरा मतलब हिंदू धर्म या इस्लाम धर्म या ऐसे ही किसी अन्य धार्मिक परंपरा और संगठन से नहीं है। धर्म से मेरा मतलब बोध की उस अवस्था से है, जब हम यह जान लेते हैं कि हमारा कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है। जब तक हमारे भीतर से ‘मैं और तू’ का भेद नहीं मिट जाता है, तब तक हम विरोधाभासों और पाखंडों से ख़ुद को नहीं बचा सकते हैं।

No comments:

Post a Comment

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...