Thursday, 5 September 2019

जीवन के सभी सुख विकल्पों से आते हैं!


मुसलसल मसाफ़त से बहुत थक गया हूँ| और शहरों की तरह बेंगलोर भी बहुत आपाधापी वाला शहर है| बड़े शहरों की बेचैनी मुझे अच्छी नहीं लगती है| आश्रम से निकलने के बावजूद भी दो साल मेहसाणा में सिर्फ इसलिए टिक गया क्योंकि वहां सब-कुछ बहुत ठहरा-ठहरा-सा है| इस साल अभी तक जितनी भी यात्राएं की है, उसमे पोंडिचेरी मुझे सबसे अच्छा लगा| सिक्किम में ठहराव तो बहुत था, लेकिन सुविधाएँ कम थी| हम एक गाँव में रुके हुए थे| सबकुछ बहुत ही उत्तम और सुन्दर था, लेकिन खाना बनाने की आजादी नहीं थी| हम जिनके यहाँ रुके थे उन्ही के यहाँ खाना खाने के लिए हम वाध्य थे| गाँव में कहीं कोई भोजनालय वगैरह नहीं था| 
जिनके यहाँ हम रुके थे वे बहुत ही अच्छा, परंपरागत, और आर्गेनिक खाना बेहद प्यार से खिलाते थे| लेकिन, जबतक नर्क का विकल्प मौजूद ना हो, स्वर्ग दो कौड़ी का लगता है| जीवन के सभी सुख विकल्पों से आते हैं| जीत आपको तभी ख़ुशी देती है, जब आपको यह पता होता है कि आप हार भी सकते थे| अगर कभी ऐसा हो जाए कि आपका हारना असंभव हो जाए, तो तत्क्षण जीत का सारा गौरव और सौदंर्य विलीन हो जाएगा| मिसेज दोरजी के उत्तम-से-उत्तम भोजन का स्वाद हमें फीका लगने लगा था, क्योंकि हमारे पास उन भोजनों के अलावा और कोई विकल्प नहीं था| हम यह भी नहीं तय कर सकते थे कि आज हमें क्या खाना है, किसी के घर में मेन्यु नहीं होता है| कितने बजे खाना है, हम ये तय करने के लिए भी स्वतंत्र नहीं थे| ऐसा भी नहीं था कि हमारे निवास पर खाना पहुँचा दिया जाए, और हमें जैसे मर्जी हो हम खा लें| हमें प्रॉपर उनके डाइनिंग हॉल में जाना पड़ता था, 20 तरीके के पकवानों से टेबल सजा होता था| भोजन के दौरान हमें अकेला भी नहीं छोड़ा जाता था, बात करने के लिए हमेशा कोई न कोई मौजूद होता था| हमारे यहाँ दामाद की जैसी खातिरदारी होती है, वैसी ही खातिरदारी हमारी हो रही थी| तीन-चार दिन बाद हम सुख-सुविधा और उत्तम मेहमानवाजी से इतने उब गए कि लताड़े जाने, उपेक्षित होने, अनअटेंडेड छोड़े जाने के लिए तरसने लगे| पहली बार मुझे ऐसा लगा कि गरीबी से ज्यादा ख़तरनाक अमीरी होती है| दुःख की अतिरेकता को सुख की उम्मीद में काटा जा सकता है, लेकिन सुख की अतिरेकता से बच कर कहाँ जाए आदमी| एक पॉइंट के बाद सुखी आदमी के लिए आत्महत्या के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है|
मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं अपने किसी बहुत ही अमीर रिश्तेदार के यहाँ मेहमान हूँ| सब कुछ टॉप क्लास का था, लेकिन फिर भी दो-तीन दिन के बाद सब कुछ बोझ जैसा लगने लगा| हम पैसा पे कर रहे थे, फिर भी भूटिया फेमली के एहसानों तले दबे जा रहे थे| राव साहब कुछ ज्यादा ही दब गए थे| मिसेज दोरजी जब कभी भी चाय लेकर आती, और तिबतन स्टाइल में दोनों हाथों से कप को उठा कर माथे के पास ले जा कर हमारे सामने रखती थीं, तो राव साहब एकदम से जमीन पर बिछ जाते थे| बाद में तो राव साहब हमेशा बिछे-बिछे से ही रहने लगे| एक शाश्वत मुस्कान जो उनके चेहरे से हमेशा चिपकी रहती थी, भूटिया परिवार के किसी सदस्य को देख कर और भी चौड़ी हो जाती थी| मेरी और दिव्या की हालत भी कुछ-कुछ राव साहब जैसी ही थी, लेकिन ‘हम इस सबके लिए पैसा पे कर रहे हैं’ सोच कर हम दोनों ज़मीन पर फैलने से ख़ुद को थोड़ा बचा लेते थे| 
सुविधा के साथ अगर थोड़ी भी स्वतंत्रता होती तो, सिक्किम यात्रा को मैं सबसे ऊपर रखता| धर्मकोट में स्वतंत्रता और सुविधा दोनों थी, लेकिन दोनों की मात्रा बहुत कम थी| दोनों में से यदि एक को भी बढ़ाने की सोचो तो कीमत आसमान छू लेती थी| नेपाल में चूँकि हम आश्रम में ठहरे थे, इसलिए उसको लेखाजोखा में शामिल करना मैं ठीक नहीं समझता| एक आश्रम की तुलना सिर्फ दूसरे किसी आश्रम से हो सकती है| आश्रम का शहर से कोई लेना-देना नहीं होता है| इसलिए इस साल की पोरबंदर यात्रा के बारे में भी यहाँ बात नहीं करूँगा| पुणे के बारे में भी यही हाल है| दिल्ली को मैं बस बेस-कैंप मानता हूँ| इसीलिए बात सिर्फ सिक्किम, धर्मकोट, पोंडिचेरी, त्रिरूवन्नामलाई और बेंगलोर की हो सकती हैं| इन पांच जगहों में पोंडिचेरी को में 10 में से 10 स्टार दे सकता हूँ| सब कुछ इतना सही और सटीक था, कि इससे ज्यादा की आप मांग ही नहीं कर सकते हैं| सुख, दुःख, सुविधा और स्वंत्रता का ऐसा सुन्दर समन्वय इससे पहले मैंने कहीं और नहीं जाना था|

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