31-Aug, 2019
रमणाश्रम के बहुत से अनुभवों और घटनाओं के बारे में लिखना बाँकी रह गया है। लिखना कभी-कभी मुझे मछली फाँसने वाले जाल से हाथी को पकड़ने की कोशिश जैसा लगता है।
बेंगलोर के लिए बस में बैठा हूँ| दो बजे तक बस बेंगलोर छोड़ देगी। बेंगलोर सिर्फ़ जाने के लिए जा रहा हूँ। इधर से गुज़र रहा तो सोचा इस शहर को भी सलाम करता चलूँ। अभी तक मन में कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं है। तिरुवन्नामलाई की तरह बेंगलोर को भी धप्पा मार कर, एक-दो दिन बाद, आगे निकल जाऊँगा।
जीवन में पहली बार किसी लड़की से दिल्ली में क़ुतुबमीनार पर हाथ मिलाया था। लड़की विदेशी थी। अंग्रेज़ी सीखने के चक्कर में फिरंगियों से बात करने क़ुतुबमीनार पर जाया करता था। वही हाथ मिलाने वाली लकड़ी ने, मैं BCA कर रहा हूँ, जानने के बाद, मुझे बताया था कि बेंगलोर इलेक्ट्रोनिक सिटी है। तभी शायद मेरे अचतेन में एक बार बेंगलोर जाने की ललक उठी थी। 2005 में जो मन के अंदर बीज पड़ा है, आज 14 साल बाद वह अंकुरित हो रहा है। मिरदाद कहते हैं, “एक मक्खी भी हमारी मर्ज़ी के बिना हमारे नाक पर नहीं बैठ सकती है।”
31-Aug, 2019
हवा में खुनकी है, बादल छाए हुए हैं, शाम में थोड़ी विष्टि हुई थी। शहर का नाम बेंगलोर है। मैं अभी किसी कॉफ़ी हाउस में बैठा हूँ। शहर से अभी दोस्ती नहीं हुई है। वैसा ही महसूस कर रहा हूँ जैसा पहले दिन पोंडिचेरी में लगा था। थकान इतनी है कि कुछ भी अभी लिखने का मन नहीं कर रहा है।
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