25-Aug, 2019
एक विडंबना-
दुनिया के ज्यादातर प्रसिद्ध लेखक/कवि स्त्री प्रेमी हैं (या कम-से-कम ऐसा उनकी लेखनी से प्रगट होता है), जबकि अक्सर स्त्री कवयित्री/लेखिकाएँ पुरुष विरोधी होती हैं|
25-Aug,2019
जबसे पुदुच्चेरी आया हूँ, हिंदी पढ़ने के लिए तरस गया हूँ| अपने साथ बस एक किताब लेकर आया हूँ-वॉर एंड पीस| 'लाल टीन की छत' पढ़ने के बाद से निर्मल को पढ़ने की तलब बहुत बढ़ गई है| परसों यहाँ के लिब्रेरी में गया था| बड़ी मुश्किल से निर्मल की एक किताब मिली वो भी वही जो पहले से पढ़ रखी थी-लाल टीन की छत|
कृष्णनाथ की 'अरुणाचल यात्रा' और मनोहर श्याम जोशी की 'क्या हाल हैं चीन के', लेकर पढ़ने के लिए बैठा| दोनों यात्रा-संस्मरण है| 'अरुणाचल यात्रा' कुछ ख़ास नहीं लगी| जोशी जी को पढ़ने में मज़ा आने लगा| कोई आधा घंटा मैंने किताब पढ़ी होगी कि सामने वाली कुर्सी पर दिव्या को पाउलो केओलो की किताब पर उंघते हुए पाया| जबसे उसने अलकेमिस्ट पढ़ी है, जहाँ कही भी जाती है, पाउलो की कोई किताब उठा लेती है| पाउलो की एडल्ट्री भी उसे अच्छी लगी थी|
उसे ऊँघता देख मन-मसोस कर मुझे उठाना पड़ा| उठते-उठते मैंने किताब के कुछ पन्नो की फोटो खींच ली, सोचा रूम पर जा कर पढेंगे| सीढ़ियों से नीचे उतरते समय मेरी नज़र नेहरु जी की एक पेंटिंग पर अटक गई| पेंटिंग में मुझे कुछ अटपटा लगा| गौर करने पर पाया कि उनके नाक और होंठ के बीच जो मूंछ वाली जगह है, वह कुछ ज्यादा ही बड़ी हो गई है| मूर्ति और रास्ते पर लगे पोस्टरों से मेरा ऐसा अनुमान है कि यहाँ के लोगों को नेहरु परिवार से विशेष लगाव है|
रास्ते में एक किताब की दुकान दिखी, अन्दर जाकर पता किया तो पाया कि उनके पास हिंदी की एक भी किताब नहीं थी|
रूम पर पहुँचते-पहुँचते हिंदी में कुछ पढ़ने के लिए मन इतना अधीर हो उठा कि कमरे में घुसते ही 'हिंदीसमय.कॉम' खोल कर बैठ गया| एक घंटा राहुल सांकृतयान को पढ़ने के बाद थोडा आराम मिला|
पढ़ने की ऐसी भीषण अभीप्सा इससे पहले मैंने पहले कभी नहीं जानी थी|
26-Aug, 2019
लेखक होना स्त्री के किए और स्त्री होना है, जबकि पुरुष के लिए लेखक होना अपने मूल स्वभाव से दूर जाना है। इसी में वह टूट जाता है, तलवार उठाना उसके लिए क़लम उठाने से ज़्यादा सहज है। जैसे ही पुरुष किसी भी प्रकार के कला में उत्सुक होने लगता है वह स्त्री जैसा होने लगता है। स्त्री हुए बिना सृजन संभव नहीं है। विध्वंस करना उसका/पुरुष का मूल स्वभाव है। अक्सर लेखक और कवि थोड़े पागल हो जाते हैं, यह स्वभाव से दूर जाने की वजह से होता है। इसी तरह वे स्त्रियाँ भी टूट जाती हैं, जो अपने स्वभाव से दूर जा कर पुलिस, आर्मी और इसी तरह के और पागलपन में पुरुषों के कंधे-से-कंधा मिलाने लगती हैं।
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