29-Aug,2019
11 रातें बिताने के बाद पोंडिचेरी को विदा बोलते हुए तिरुवन्नामलाई (भगवान श्री रमण महर्षि आश्रम) जा रहा हूँ। उदासी की मलिन चादर मन के ऊपर सुबह से तनी हुई है। भारी साँसों की बोझ से हृदय बैठा जा रहा है।
बुद्ध कहते हैं, “प्रिय से बिछड़ना और अप्रिय से मिलना दुख है।” इन ११ दिनों में मन ने पुद्दूचेरी से गहरी प्रीत गाढ़ ली थी।
रमण आश्रम यहाँ 110 किलोमीटर दूर है।
29-Aug,2019
“रजनीश कैसा है?”, महर्षि ने ख़ुद को पंखा झलते हुए मुझसे पूछा। एक बड़े से हॉल में, जिसमें ६ खिड़कियाँ और दो दरवाज़े थे, भगवान सोफ़े पर लेटे हुए थे। मेरे बाईं ओर दिव्या और दाएँ मे पॉल ब्रंटन बैठे थे। हाल में ही मैंने पॉल की किताब ‘गुप्त भारत की खोज’ पढ़ी थी। इसीलिए पॉल को मैं थोड़ा जानता था। बाँकी हॉल में बैठे सारे लोग मेरे लिए अजनबी थे। कोई तीस लोग बैठे थे। तीस में से बीस आँखे बंद किए हुए थे। जिनकी आँखे बंद नहीं थी, उनकी नज़रें भगवान पर टिकी हुई थी।
‘अच्छे हैं, आपको बहुत याद कर रहे थे। उनकी बड़ी इच्छा थी आपसे मिलने की, लेकिन नहीं आ पाए। इससे पहले कि वो आते १९५० में १४ अप्रैल की शाम ८ बजकर ४५ मिनट पर आप महापरिनिर्वाण को उपलब्ध हो गए।’, मैंने भगवान श्री से कहा। “वो मुझसे मिलने नहीं आ पाया, लेकिन महापरिनिर्वाण के बाद मैं उससे मिलने गया था। ‘सक्रीय ध्यान’ के तीसरे चरण में ‘मैं कौन हूँ-मैं कौन हूँ’ पूछने का सुझाव उसे मैंने ही दिया था।’, भगवान तमिल में अपने अनुवादक से बोले, अनुवादक ने इंग्लिश में ट्रांसलेट करके मुझे बताया।
बोलने के बाद बड़ी देर तक मौन बैठे रहे हैं। मैं उनके चेहरे पर अपनी नज़रें टिका नहीं पा रहा था। “जब पुणे गए ही थे, तो मेहर से मिलने क्यूँ नहीं गए”, मौन से लौटते हुए भगवान मुझसे बोले। ‘पॉल ने अपनी किताब में मेहर बाबा के बारे में जो कुछ लिखा है, उसे पढ़ने के बाद से बाबा पर से मेरा भरोसा उठ गया है’, बोलते समय मेरी नज़रें नीचे थी। मेरे मुँह से आपना नाम सुनकर पॉल मेरी और देखने लगा। भगवान बिना कुछ बोले मौन लेटे रहे।
भगवान के पास से उठकर मैं लक्ष्मी(भगवान की गाय) की समाधि पर गया। लक्ष्मी भगवान से दो साल पहले १९४८ में देह त्यागी थी। लक्ष्मी के बग़ल में एक कव्वे, कुत्ते और हिरण की समाधि भी थी।
सात बजने में बस १५ मिनट रह गए थे। अँधेरा घिर गया था। “जल्दी चलो, ऑफ़िस बंद हो जाएगा तो हमें चप्पल नहीं मिलेगा, बाँकी आश्रम कल देखेंगे”, दिव्या मुझसे बोली। आश्रम से हमारा डेरा थोड़ा दूर है, हमें पैदल आना था। सो, हम आश्रम से निकल गए।
“अगर आश्रम में रहना हो, तो दो महीना पहले बुकिंग करनी होती है। सिर्फ़ तीन के लिए अलाउ करते हैं। रहने का कोई चार्ज नहीं है,” आश्रम से निकलते समय दिव्या मुझसे बोली। ‘वो महर्षि की समाधि पर जो आचानक से गाने लगे, उनकी आवाज़ कितनी अच्छी थी’, रोड पार करते हुए मैंने दिव्या से कहा। “हाँ, मैं तो एकदम से खो गई थी।”
कल सुबह वो गुफा देखने जाऊँगा जहाँ रमण ध्यान किया करते थे। आश्रम से १.५ किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह ८ से शाम ४ बजे तक आप वहाँ जा सकते हैं।
30-Aug, 2019
महापरिनिर्वाण रूम में भगवान के बेड पर उनकी खाने-पीने के पात्र, छड़ी और पंखा पड़ा हुआ था। कमरा बहुत छोटा लेकिन सुंदर था। ध्यान हॉल में रखे सोफ़े की तरह यहाँ भी भगवान का बेड बस पर्याप्त था, न ज़रूरत से एक इंच बड़ा और न ही एक इंच छोटा। कमरे के ऊपर दो विशाल पेड़ों की छाया थी। छड़ी और पंखे के अलावा कमरे में क़रीब-क़रीब वो सब कुछ था जिसे भगवान अपने जीवन काल में उपयोग में लाते थे।
‘महर्षि, इतने छोटे-से बेड पर आप कैसे सो लेते हैं?’, मैंने पूछा। भगवान बेड पर लेटे हुए थे, और मैं उनके पैरों के पास ज़मीन पर बैठा हुआ था। कमरे में मेरे और दिव्या के अलावा और कोई नहीं था। महर्षि ने कोई उत्तर नहीं दिया। बहुत देर तक जब महर्षि चुप रहे, तो हम वहाँ से उठकर बाहर आ गए। रूम से निकलते ही बाएँ में उनके दो प्रमुख शिष्यों की समाधि थी। सामने एक नारियल का पेड़ फलों से लदा खड़ा था।
महर्षि की समाधि पर पूजा चल रही थी। कुछ लड़के, जिनके शरीर का ऊपरी हिस्सा निवस्त्र था और माथे व शरीर पर जगह-जगह विभूत का तिलक लगा हुआ था, मंत्रोउच्चार के साथ शिवलिंग की पूजा कर रहे थे। हॉल के बाईं दीवार से लगकर पुरुष साधक बैठे थे, और दायीं दीवार के पास महिलाएँ बैठी थीं। निरपवाद रूप से देशी और विदेशी सभी साधक भारतीय परिधान में थे।
पूजा समाप्त होने के बाद रमण के वचनों का पाठ शुरू हुआ। पाठ तमिल में हो रहा था, हमें कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जिस लय में वे पढ़ रहे थे, वह बड़ा अच्छा लगा।
महर्षि की समाधि से लगी हुई उनकी माँ की समाधि है। भगवान की समाधि की तरह उनकी समाधि में भी शिवलिंग स्थापित है।
माँ की समाधि में शिविलिंग के अलावा रमण की भी एक प्रतिमा रखी हुई है। जैसे ही आप समाधि में प्रवेश करते हैं, अपने बाईं ओर एक बेड पर आप रमण को बैठा हुआ देखते हैं-काले पत्थर से बनी मूर्ति बहुत ही भव्य और आकर्षक है।
दोनों समधियों (रमण और उनकी माँ की) पर लोग पूजा-अर्चना और परिक्रमा कर रहे थे। हमने भी रमण की समाधि का दो बार परिक्रमा की।
समाधि के ठीक सामने वह रूम (महापरिनिर्वाण रूम) है जिसमें रमण ने देह त्यागा था। जब हम वहाँ गए थे, रूम का गेट बंद था। गेट में लगे शीशे से झाँकने पर हमने देखा कि उस पार बेड के नीचे पीतल का एक दिया जल रहा है।
समाधि हॉल से सटा हुआ ही वह कक्ष है, जहाँ रमण दर्शन दिया करते थे। कक्ष में जिस सोफ़े पर रमण लेटा करते थे, वह आज भी यथावत-यथा-स्थान सुरक्षित रखा हुआ है। सोफ़े के ऊपर रमण की एक बहुत ही बड़ी पेंटिंग रखी हुई है। सोफ़े वाली जगह को लकड़ी के बाड़े से घेर दिया गया है। फ़ेंस के बाहर बैठ कर लोग ध्यान करते हैं। कक्ष में साधकों की सुविधा के लिए दो पंखे लटके हुए हैं। पंखा देखते समय मैंने नोटिस किया कि खिड़कियों की तरह लकड़ी के छत को संभालने वाले बरेरी(बीम) भी ६ हैं।
कक्ष का दोनों गेट आमने सामने है। एक गेट अब शायद हमेशा बंद रहता है। गेट से लग कर कुछ लोग ध्यान में बैठे हुए थे। शाम के बाद रूम के अंदर पीली रौशनी जलने लगती है।
हॉल के पास ही पुराना कुआँ और पुराना भोजनालय है। भोजनालय के सामने पुराना चिकित्सालय है, जिसके हर कमरे में अब बस रमण की तस्वीरें सजी हुई है। चिकित्सालय से बाहर निकलते ही बाएँ में नीम पेड़ के नीचे लक्ष्मी की समाधि है।
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