Friday, 6 September 2019

इमरोज मेरी दृष्टि में शरीर हैं! साहिर आत्मा और अमृता मन।

कल अमृता प्रीतम के बारे कुछ लिखना चाह रहा था। लेकिन उनकी वो दो किताबें जो मैंने पढ़ी है, उन में से एक का नाम याद ही नहीं आया। अभी भक से दूसरा नाम याद आ गया- मन मिर्ज़ा, तन साहिबा! इसके अलावा ‘रसीदी टिकट’ मैंने पढ़ी है, कुछ कहानियाँ भी पढ़ी है। मेरे एक मित्र ने तीन साल पहले अमृता प्रीतम की 17 किताबें मुझे गिफ़्ट की थीं। अभी तक उनमें से एक भी नहीं पढ़ी है। उनकी आत्मकथा मुझे कुछ ख़ास नहीं लगी थी-रसीदी टिकट कुछ ख़ास होती भी नहीं है। इस अर्थ में किताब ने मुझे बहुत प्रभावित किया। साहिर-अमृता और इमरोज में शरीर, मन और आत्मा जैसा भेद दिखा। इमरोज मेरी दृष्टि में शरीर हैं! साहिर आत्मा और अमृता मन। 
इमरोज का व्यक्तित्व मुझे हमेशा से आकर्षित करता है। रात को एक बजे उठकर चाय बनाना-किसी साधना से कम नहीं है। अमृता की छायावादी लेखन से इमरोज का चायवादी होना मुझे ज़्यादा प्रभावित करता है। जैसे थीयो के बिना मैं वानगोग के अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकता हूँ, वैसे ही इमरोज के बिना अमृता नहीं हो सकती हैं।

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