Friday, 28 September 2018

कॉफ़ी और किताब

“Zorba, sitting in front of me, sniffed his coffee in a sensual way which was quite oriental.” – Zorba the Greek
24, Sep. 2018
घर से जब जेब में किताब (ज़ोरबा द ग्रीक) और हाइलाइटर डालकर निकला निकला था, तो यह सोचा नहीं था कि पढ़ने के लिए सही जगह तलाशते-तलाशते घर से 22 किलोमीटर दूर CCD चला जाऊंगा| 

साइकल लेकर जब मुख्य सड़क पर आया तो कुछ सेकंड के लिए सोच में पड़ गया कि कहाँ जाऊं| फिर ध्यान आया कि यहाँ से एक किलोमीटर दूर एक मंदिर है, वहां मंदिर के पास बने बैंच पर बैठकर पढ़ सकता हूँ| जब वहां पहुंचा तो देखा कि कुछ बुजुर्ग वहां पहले-से बैठे थे, और आपस में बातचीत कर रहे थे| सोचा, यहाँ अगर इन लोगों (बुजुर्गों) के बीच बैठकर पढूंगा तो ज़ोरबा नाराज़ हो जाएगा, “Many are the joys of this world—women, fruit, ideas.” और यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था- No women, no fruit..! वहां से थोड़ी दूर हटकर एक और मंदिर है| वो मंदिर यहाँ से ज्यादा शांत जगह पर है, वहीं जाने का तय किया| लेकिन रास्ते में फिर ख्याल आया कि वहीं मंदिर के पास भूरी बाई का तबेला भी है, वो देखेगी तो गुजरती में पूछेगी, “ભાઈ, હવે દૂધ લેવા કેમ નથી આવતાં?”, मैं हिंदी में जवाब दूंगा, “आज कल दूध का इस्तेमाल बंद कर दिया है, दूध खाने से पेट में तकलीफ होती है|”, और वो कुछ-भी नहीं समझेगी| मैं इन सब झमेले में नहीं पड़ना चाहता था| अगर वहां नहीं जाना है, तो कहाँ जाना है? यह यक्ष प्रश्न फिर से खड़ा हो गया| उस वक़्त मैं जहाँ खड़ा था, वहां से सात किलोमीटर दूर मेरे एक मित्र रहते हैं, सोचा उन्ही से मिल लिया जाए| मौसम सही था, साइकल चलाने में मजा आ रहा था| 
दो किलोमीटर साइकल चलाने के बाद, दिमाग फिर से चलने लगा- उनसे मिलना तो हो जाएगा, लेकिन किताब पढ़ना नहीं हो पाएगा| असली सवाल किताब पढ़ना है| और वैसे भी वे अभी ऑफिस में होंगे, ऑफिस के टाइम उनको डिस्टर्ब करना ठीक बात नहीं है| फिर कहाँ जाऊं? किंकर्तव्यविमूढ़ हो थोड़ी देर राह किनारे साइकल रोककर खड़ा रहा| फिर अचानक से दिमाग की बत्ती जली- CCD जाना कैसा रहेगा? मौसम सही है, एक घंटे में पहुँच जाऊँगा| वहीं बैठकर पढूंगा| पूरे शरीर में जान आ गई| पैरे अपने आप पैडल पर तेज़ी से घूमने लगे| सबकुछ अच्छा-अच्छा और नया-सा लगने लगा| - “Zorba sees everything every day as if for the first time.” 
आधे घंटे बाद हौसला पस्त होने लगा- सिर्फ जाना ही नहीं है, आना भी है| क्यों न दोस्त से मिलकर उससे उसकी बाइक ले लूं, साइकल वहीं उसके ऑफिस के बाहर खाड़ी कर दूंगा, और फिर लौटते में साइकल से आ जाऊंगा| ये आईडिया सही लगा, लेकिन एक्सिटिंग नहीं लगा| -इस में स्टोरी कहाँ है? नाह...मजा नहीं आया..! साइकल से ही जाना चाहिए, तभी मजा है| मैं फिर से पैडल मारने लगा| अपने बचपन के उन दिनों को याद करने लगा, जब घर से तीस किलोमीटर दूर दरभंगा चला जाता था, और फिर दिन भर घूमने के बाद शाम तक लौट भी आता था- यह तो कुछ भी नहीं है| 
नए जोश के साथ फिर कुछ देर साइकल चलाया| अब थोड़ी-थोड़ी धूप भी निकल आई थी| मंजिल का दूर-दूर तक कुछ पता नहीं था| गाड़ी से आते समय कभी सोचा नहीं था कि सीसीडी इतनी दूर है| रास्ते में कई बार ख्याल आया कि यहीं कहीं किसी पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ लूं| घर से 10:15 पर निकला था, अभी 11:30 हो रहा था| खोपड़ी की दलीलों से शरीर राजी नहीं हो रहा था| अब ग़जब हालात हो गई थी, मन दो पैडल आगे मारता था, तो शारीर चार पैडल पीछे मारता था| लिल्लाह, किस चक्कर में फंस गया..!!

तभी, दूर पेड़ के नीचे एक गन्ने वाला दिखा| एज़ यू नो, गन्ने का जूस मुझे बहुत पसंद है, जूस वाले को देखते ही जान-में-जान आ गई| सोचा, अब जूस पी कर ही आगे का निर्णय लिया जाएगा| साइकल खड़ी करके जूस वाले को बिना बर्फ के दो गिलास जूस बनाने को बोला| 3 मिनट बाद जूस बनकर तैयार हो गया| आह..नींबू और पुदीने से सजा गन्ने का जूस| एक घंटा साइकल चलाने के बाद जूस का स्वाद अमृत जैसा लग रहा था| वाह...!! एक ग्लास ख़त्म करने के बाद दिमाग सही तरीके से काम करने लगा- ससुर, जब संजू सिनेमा में संजय दत्त 18 दिन तक भटक सकता है ड्रग्स के लिए, तो तुम कुछ किलोमीटर साइकल नहीं चला सकते हो किताब और कॉफ़ी के लिए| मुझे बात जंची| जूस वाले को पैसा देने के बाद मैंने नए जोश और उत्साह के साथ साइकल चलाने लगा| 
ठीक 12 बजे मैं सीसीडी के सामने खड़ा था| एक मिनट तक मुग्ध होकर मंजिल को देखता रहा| फिर नीम के पेड़ के नीचे साइकल खड़ी करके भीतर गया| बहार भी चेअर्स लगे थे, लेकिन बाहर धूप आ रही थी| पूरा कैफ़े खाली था| काउंटर पर खड़ी लड़की मैगज़ीन के पन्ने पलट रही थी| बैठने के लिए सही जगह का चुनाव करके मैंने टेबल पर किताब और हाइलाइटर रखा| फिर काउंटर पर आया, “paytm से पेमेंट एक्सेप्ट करती हैं आप?”, मैंने उससे पूछा| उसने 'हाँ' में सिर हिलाया| घर से निकलते समय सिर्फ 160 रुपया कैश लेकर निकला था| सो, थोड़ा वरीड था कि यदि paytm से पेमेंट नहीं हुआ तो कैश की तंगी हो सकती है| कहीं कैश कम न पड़ जाए इसी डर से तेज़ प्यास के बावजूद भी रस्ते में पानी नहीं खरीदा था| जूस यह सोच कर पीया था कि इससे प्यास भी मिट जाएगी और थोड़ी उर्जा भी मिल जाएगी| लेकिन जूस के बाद प्यास उल्टा बढ़ गई थी| ‘पानी रखती हैं, आप?’, मेनू देखते हुए मैंने पूछा| “RO तो नहीं है, लेकिन नार्मल पानी आपको पीने के लिए मिल सकता है”, उसने जवाब दिया| ‘कोई नहीं, एक ग्लास दे दीजिए|’
एक Classic Cappuccino (King Size) का आर्डर देकर मैं अपनी टेबल पर आ गया| मेरे पीठ पीछे लगी टीवी पर जॉन अब्राहम की कोई फिल्म चल रही थी| मेरे राईट में रोड व्यू, और लेस्फ़ में कैफ़े का इंटीरियर था| सामने दीवाल पर ‘Nobody loves coffee like we do.’ लिखा हुआ था| दो मिनट बाद मेरा कॉफ़ी आ गया| जैसे बाबा भारती अपने घोड़े को देखकर मुस्कुराते थे, वैसे ही मैं कॉफ़ी को देखकर मुस्कुराने लगा| बड़े कप में कॉफ़ी पीने का मजा ही कुछ और है| ज़ोरबा, कॉफ़ी, साइकल, और बादल इससे सुंदर दिन और क्या हो सकता था..! ख़ुशी के मारे में हाथ-पैर में सनसनी होने लगी| 

“I too felt a great happiness in delivering myself up, silently, to the rosy transformation of sunrise. In those magic minutes, the whole of life seems as light as down. The earth constantly changes shape in the wind, like a soft and billowy cloud.” - Zorba the Greek

Wednesday, 26 September 2018

मैं कौन हूँ, ये कहाँ हूँ मैं... ???

#सन्यास'- 5
जब माँ धर्मज्योति ने कहा कि रोब और माला पहनना अब अनिवार्य नहीं है, तो मैं बड़ा उदास हो गया| जिस चीज़ के लिए सन्यास लिया था, उसी चीज़ को गैर-ज़रूरी बता दिया| सोचा था रोब पहनकर घर आऊंगा, लोग देखकर चौंकेंगे, खूब नौटंकी होगी, मजा आएगा| लेकिन, सब उल्टा हो गया|
घर आकर मैं बड़ा दुखी हो गया| रास्ते भर यही सोचता रहा था कि 'ऐसे सन्यास का क्या फायदा जिसका किसी को पता ही नहीं चलेगा'| नियम के नाम पर बस रोज़ एक घंटा ध्यान करने के लिए कहा गया था| -यह भी कोई नियम हुआ, एक घंटा ध्यान करो, ये तो ऐसे ही कर लेता, इसके लिए सन्यासी बनने की क्या ज़रूर थी| 'नाम भी कितना अजीब दिया 'स्वामी ध्यान विराम'..हुंह...| नाम सुनकर मुझे एकदम मजा नहीं आ रहा था| सोचा था कोई भारी भरकम नाम मिलेगा 'स्वामी चैतन्य कृति, ध्यान मुहम्मद, ऐसा कुछ बड़ा-सा, यह क्या पिद्दी नाम दे दिया 'ध्यान विराम'| बिना मतलब रोब में तीन सौ रुपया और खर्च करवा दिया, अरे जब रोब था ही तो नया खरीदवाने की क्या ज़रूरत थी? और ऐसा क्या है इस माला में जिसका सौ रुपया ले लिया....
घर आकर मैंने ध्यान-व्यान कुछ भी नहीं किया-कितना डरा हुआ, कितना कुछ सोचा था, और हुआ क्या? एक बस नाम का सन्यास...!! यह एकदम खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसा मामला था| एक-दो दिन में मैं सन्यास-वन्यास सब भूल-भालकर अपनी रूटीन लाइफ में व्यस्त हो गया| सब कुछ पहले की तरह चलने लगा|
एक सप्ताह बाद, एक शाम मैं अपने इंस्टीट्यूट से घर जा रहा था| राह चलते हुए अचानक मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मैं अपने शरीर से अलग हूँ| एक बहुत ही अनूठे ढंग से पूरे शरीर का बोध होने लगा| ऐसा पहले कभी कुछ नहीं हुआ था| घर पहुंचे-पहुँचते एक और नई चीज़ घटने लगी| सब कुछ अजनबी-सा लगने लगा- मैं कौन हूँ, ये कहाँ हूँ मैं, कौन हैं ये लोग, क्या है यह सब, यहाँ आने से पहले मैं कहाँ था... ??? इस तरह के कई सवाल भीतर उठने लगे| भाई को देखा तो ऐसा लगा जैसे पहली बार इसे देख रहा हूँ, एकदम अजनबी लग रहा था भाई| बड़ी देर तक यह सब खेल चलता रहा| ऐसा लग रहा था जैसे शरीर बहुत ही नाज़ुक हो गया हो| इस तरह से शारीर का कभी पता नहीं चला था|
खाना खाकर मैं सोने के लिए छत पर चला गया| बिस्तर पर लेटा, लेकिन नींद नहीं आ रही थी, शरीर में बड़ी बेचैनी हो रही थी| मैंने सारे कपड़े उतार दिए और बिस्तर पर लेट कर सांस को देखने लगा (सांस को देखने का ध्यान प्रयोग आश्रम में सीखा था)| थोड़ी देर बाद, ऐसा लगने लगा जैसे मैं शरीर से बहुत दूर हूँ और शरीर को देख रहा हूँ, सांसें अपने आप आ और जा रही है| फिर तो ऐसा लगने कि यदि अभी मैं उठ कर खड़ा हुआ तो मैं उठ जाऊँगा और शरीर पड़ा रह जाएगा| थोड़ा डर भी लगने लगा| बड़ी देर तक यही सब चलता रहा, फिर कब नींद आ गई पता नहीं चला|

अगली सुबह जब आँख खुली तो सब कुछ नार्मल था| बस हृदय में ठंडा-ठंडा लग रहा था| दिन भर इंस्टीट्यूट में काम करता रहा| शाम में किसी काम से कैफ़े गया| इंस्टीट्यूट के पास ही कैफ़े था, एक घंटा का दस रुपया लगता था| सन्यास लेने से पहले से www.oshoworld.com पर जा कर कुछ-कुछ देखता रहता था| डिस्कोर्स वाले टैब पर जब भी click करता था तो प्रवचनों का लिस्ट आता था| जब उन पर click करता था तो एक औरत गाना गाने लगती थी| सोचता था-पता नहीं प्रवचन के नाम पर इन लोगों ने गाना क्यों डाल रखा है| उस दिन भी किसी अंतर प्रेरणा से मैं वेबसाइट पर गया और प्रवचन पर click किया, फिर से उसी औरत की आवाज़ आई..कुछ सेकेंड सुन कर मैंने हैडफोन रख दिया और कैफ़े वाले से कुछ पूछने के लिए केबिन से बाहर आ गया| थोड़ी देर बाद जब लौटकर अपने केबिन में आया और हेडफोन उठाकर कान में लगाया, तो मैं हैरान रह गया ओशो बोल रहे थे| मैंने दूसरा प्रवचन प्ले करके देखा| फिर मुझे खेला समझ में आया, शुरू में एक स्त्री श्लोक को गाती थी, फिर ओशो बोलते थे|
कुछ प्रवचन डाउनलोड कर के अपने पैन ड्राइव में रख लिया| घर आकर खाना खाने के बाद PC में प्रवचन को डाल कर प्ले किया| बातें कुछ ज्यादा समझ में नहीं आती थी, लेकिन ओशो के आवाज़ की जादू में मैं खो जाता था| एक दो दिन बाद नेहरु प्लेस से एक छोटा सा 2 GB का MP3 प्लेअर 1300 में खरीद कर लाया| फिर तो कैफ़े से प्रवचन डाउनलोड करके लाता था, और दिन भर प्लेयर में डाल कर सुनता रहता था|

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...