Tuesday, 16 July 2019

सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है

मित्र,
मानसिक हानि जैसी कोई चीज नहीं होती है| शरीर बच गया तो समझिये सब बच गया| शरीर और मन दो अलग-अलग चीज़े नहीं हैं| मन को ठीक करने की ज्यादा फिकिर मत लीजिए| मन जैसा भी, उसे वैसे ही स्वीकार कीजिए| ‘मन’ गंदे पानी जैसा है| गंदे पानी को जितना आप साफ़ करने की कोशिश कीजिएगा, वह उतना ही गंदा हो जाएगा है| कोशिश करने की वजह से ही गन्दा हो जाएगा| बस उदासीन होकर ‘विचारों’ को देखिए, करना कुछ भी नहीं है| ‘मन’ यानि भीतर चलने वाला विचार| आप कहते हैं, "ख़ुद को बदलना है, मन को ठीक करना है, मुझे अच्छा आदमी बनना है, बहुत हानि हो गई है", यह सब भी तो विचार ही है, की नहीं है? जो मन को बदलना चाहता है, वह भी मन ही है| चेतना सदा द्रष्टा है, साक्षी है| ‘उस’ साक्षी तत्व के प्रति जागिये| मन के प्रति उदासीन होइए| बस यह जानते रहिए कि मेरे भीतर अभी इस तरह के विचार चल रहे हैं| विचार का संबंध हमेशा भूत और भविष्य से होता| और शरीर सदा वर्तमान में होता है| इसीलिए जैसे ही आप शरीर के प्रति बोध से भरेंगे, विचार कम होने लगेंगे| ‘इनर बॉडी ध्यान’ की भी यही उपयोगिता है| शरीर का एंकर की तरह इसेमल कीजिए| जैसे एंकर जहाज को किनारे से बाँध कर रखता है, वैसे ही शरीर का बोध आपको वर्तमान से बाँध कर रखेगा|
अपने सुनने की क्षमता को विकसित कीजिए| कभी, आप जहाँ भी बैठे हों, उसके आसपास जितनी भी आवाज़े हो उसको सुनिये| सुनना बहुत ही अद्भुत चीज है, क्योंकि सुनना और सोचना एक साथ नहीं हो सकता है| इसी तरह कान के साथ साथ आपनी बांकी इन्द्रियों के प्रति भी होश को साधिये| शरीर जितना शुद्ध होगा, मन उतना ही पारदर्शी हो जाएगा| इसीलिए मैंने आपसे योग़ और प्राणायाम करने को कहा| किसी अच्छे योगी से अगर आप योग सीखते हैं, तो वह आपको हर क्रिया को होशपूर्वक करने और सांस के प्रति जागरूक रहना सिखाएगा|
पोर्न से मुक्त हो कर आपने ख़ुद को नया जन्म दिया है| पूरी दुनिया में लाखो लोग हैं, जो अपनी इस आदत की वजह से सड़ रहे हैं| शारीरिक का सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है| क्योंकि ‘मन’ ही रोग है|
आप, अब, अपने बारे में ज्यादा चिंता मत लीजिए| आप इस नर्क से निकल चुके हैं| अब अपना अनुभव लोगों के साथ शेयर करके, उनको इस नर्क से निकालने की कोशिश में लगिए| आपने दोस्तों, परिचितों को पोर्न देखने के ख़तरनाक परिणाम के बारे में बताइए| जो बोध और ज्ञान आपको मिला है, उसे दूसरों से बांटिये...
जो प्राणायाम आप कर रहे हैं, वो पर्याप्त है| उसको जारी रखिये| बस यह सब गंभीर हो कर मत कीजिए, हल्के होइए| दिन में कुछ समय अगर संभव हो तो, छोटे बच्चों के साथ बिताइये| उनके साथ खेलिए...इससे आपकी गंभीरता थोड़ी कम होगी..


योग के मामले में बाबा रामदेव सही हैं| लेकिन चूँकि आप उनकी विडियो देख कर करते हैं, इसीलिए आप ग़लत कर रहे हैं, या सही, इसका पता लगाना मुशिकल है| अगर समय हो तो किसी प्रतिष्ठित योग-स्कूल से कुछ दिन का कोर्स कर लीजिये| संदीप महेश्वरी के संबध में मेरे विचार कुछ ज्यदा अच्छे नहीं हैं| इसलिए उनकी विधि के बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं दूंगा|
सुनने की क्षमता विकसित करने से मेरा मतलब था, आवाज़ के प्रति जागरूक होना| निरंतर आ रही आवाज़ को धीरे-धीरे हम भूल जाते हैं, जैसे जब आप फैन on करते हैं, तो आपको फैन की आवाज़ सुनाई देती है, लेकिन थोड़े समय बाद आप उसे भूल जाते हैं| इसी तरह ‘शब्द’ को हम सुनते हैं, लेकिन दो शब्दों के बीच जो अन्तराल होता है, उसे के प्रति हम जागरूक नहीं होते हैं, जबकि अंतराल उनता ही महत्वपूर्ण है, जितना कि ‘शब्द’| ओशो का एक 15 मिनट का ‘सुनना ध्यान’ है, शायद उसकी ऑडियो आपको यूटूब पर मिल जाए, अगर ना मिले तो मुझे बताइयेगा, मैं मेल कर दूंगा| उस प्रयोग को कभी-कभी कीजिए|
एक और प्रयोग है, जिसे आप लोगों से बात करते समय कर सकते हैं| बात-चीत के दौरान, दो वाक्यों के बीच जो गैप होता है, उसके प्रति जागरूक होइए, उसको भी नोटिस में लीजिए| जैसे-जैसे आप बाहर के गैप के प्रति जागेंगे, वैसे-वैसे ही आपके भीतर भी एक गैप बनने लगेगा| आमतौर पर हमारा मन ‘ऑफ बीट’ को नहीं सुनता है, जैसे यदि में टेबल पीटता हूँ, तो टेबल को पीटने से जो आवाज़ पैदा होगी, वो तो आप सुनेंगे, लेकिन दो ध्वनियों के बीच जो मौन अन्तराल होगा, वह आपके नोटिस में नहीं आएगा| और अगर मैं टेबल लगातार पीटता ही चला जाऊं, तो थोड़ी देर में आपको वो भी सुनाई नहीं देगा|

Monday, 15 July 2019

जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं..

(प्रश्न लम्बा और बहुत ही ज़्यादा व्यक्तिगत था, इसीलिए प्रश्न छोड़कर उत्तर का कुछ अंश आपके साथ share कर रहा हूँ।)
इक्क्यू-अपनी ग़लती को स्वीकारना, इस जगत की बड़ी-से-बड़ी घटनाओं में से एक| यह अघट सदियों में कभी एकाध बार घटता है| अपनी ग़लती स्वीकारना यानि बुद्धत्व की ओर कदम बढ़ाना| 'मेरे साथ जो भी हो रहा है, और जैसे भी हो रहा है, इसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ', यह बुद्धत्व से ठीक पहले की उद्घोष है... इस के बाद बस एक ही घोषणा रह जाती है, 'अहम् ब्रह्मास्मि'| बस बात खत्म हो गई..अपनी ग़लती को स्वीकारना ब्रह्म होने की तैयारी है...! आप अपने पिता की छोड़िये... क्या आप इस बात के लिए अभी तैयार हैं कि अपनी ग़लती को स्वीकार लें...? 'मेरे पिता मेरे साथ जैसा भी कर रहे हैं, उसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ, और-तो-और मेरे पिता जैसे भी हैं, इनके यहाँ जन्म लेने का निर्णय मेरा ही था, चाहे यह बात मुझे पता हो या न हो..', ऐसा कह पाएँगे आप? मिरदाद कहते हैं, "तुम्हारी नाक पर अगर एक मक्खी भी बैठती है, तो वह तुम्हारी मर्ज़ी से बैठती है| जैसे तुम को पता नहीं है कि तुम कैसे खाना पचाते हो, लेकिन तुम ही पचाते हो, तुमको मालूम नहीं कैसे तुम बाल बढ़ाते हो, लेकिन बढ़ाते हो, तुमको मालूम नहीं कि कैसे तुम लहू को नसों में दौड़ते हो, लेकिन तुम ही दौड़ते हो? इसी तरह बहुत कुछ है जो तुम अचेतन रूप से चाह लेते हो, जिसक तुम्हे कुछ पता ही नहीं| तुम्हारे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है, जो तुमने कभी चेतन और अचेतन रूप से नहीं चाहता हो...यह जगत तुम्हारी वासनाओं का विस्तार है|"... मिरदाद ठीक ही कहते हैं... यह जगत हमारी वासनाओं का विस्तार है.. इसे हमने अपनी मर्ज़ी से चुना है... दुःख हमारा चुनाव है, आपके पिता आपके चुनाव है... वह आपके साथ जैसा भी व्यवहार करते हैं, उस व्यवहार को स्वीकार करना या फिर अस्वीरकर करना आपका चुनाव है.. फिर वो गाली दे सकते हैं, गाली आपको लेनी है या नहीं लेनी है यह आपके निर्णय पर निर्भर करता है.. कोई भी इस जगत में आपको आपकी मर्ज़ी के बगैर सुखी या दुखी नहीं कर सकता है.. | 


अब प्रश्न यह उठता है कि अगर सब कुछ हमारा चुनाव ही है, और जो भी हमारे साथ हो रहा है उसको हमने अचेतन रूप से चुना है.. तब तो हम अचेतन रूप से कुछ भी चुन सकते हैं... हम आत्मघात चुन सकते हैं.. फिर इससे मुक्ति कैसे मिले? मुक्ति का मार्ग है..और वह है स्वीकार... जैसे ही आप जो है उसको स्वीकार कर लेते हैं, तो आपकी लड़ने में जो उर्जा खर्च हो रही थी, वह जागरण बनने लगता है... और धीरे-धीरे आप उन सब वासनाओं के प्रति जागने लगते हैं, जिन्हें अब तक आप अचेतन रूप से चाह रहे थे| इसीलिए साधक को जो भी है, उसे बिना किसी शिकायत के अहोभाव के साथ चुनाव करना चाहिए... अगर आपको देखकर कोई गाली देता है, तो सोचना चाहिए मैंने ही चाहा होगा.. दोस्तोवस्की तो यहाँ तक कहते थे कि दुनियां में अगर भी कुछ भी गड़बड़ हो रहा है, गलत हो रहा है, उस सब में आपकी जिम्मेवारी है| ऐसा होना भी चाहिए... हम सब में हैं, और सब हम में है... स्वामी राम कहते थे कि सूरज और चाँद को भी हम ही चला रहे हैं, सब हमारी मर्ज़ी से चल रहे हैं.... | 
जब तक हम अशांत हैं तब तक लोग हमें अशांत करते हैं, जिस दिन बुद्ध की भांति हम स्थिति-प्रज्ञ होकर अंगुलिमाल के सामने खड़े हो जाते हैं, उस दिन अंगुलिमाल ठिटक जाता है, और उसे हाथ से कटार गिर जाता है.. 
सुख और दुःख दोनों में अपने भीतर उस तत्व की तलाश कीजिए जो दोनों से विचलित नहीं होता है... अपने दुश्मन का चुनाव होश पूर्वक करना चाहिए.. क्योंकि जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं... अपने पिता में ज्यादा मत उलझिए अन्यथा अंत में आप उन्ही के जैसे हो जाएंगे...

Sunday, 14 July 2019

चीज़ों को ऐसे देखो मानो तुम उन्हें पहलीबार देख रहे हो


14-जुलाई 2019 
रात 11:30 की पठान कोट से दिल्ली की मेरी ट्रेन थी, ‘धौलाधार एक्सप्रेस”| धर्मकोट से धर्मशाला पहुँचने में 20-से-30 मिनट लगते है| हमारे पास दो विकल्प था| एक हम जिनके यहाँ रुके थे, उन्हीं की टैक्सी से धर्मशाला जाएँ, और दूसरा हम ऑटो से पहले मेक्लोड आ जाएँ, फिर वहां से बस या टैक्सी लेकर धर्मशाला चले जाएँ| दूसरा विकल्प पहले के अपेक्षा बहुत ही सस्ता था| अगर हम धर्मकोट से सीधा टैक्सी लेते हैं, तो उसका भाड़ा होता है 500/- और धर्मकोट से मेक्लोडल का ऑटो से 70 रुपया लगता है, फिर वहां से यदि आप बस से जाते हैं, तो 20 रुपया किराया है, और अगर टैक्सी लेते हैं तो उसका भाड़ा 250/- रुपया है| साफ़ है, हमने दूसरा विकल्प चुना था, लेकिन निकलने से ठीक 30 मिनट पहले हमने अपना इरादा बदला और जिनके यहाँ हम रुके थे उन्ही की टैक्सी में बैठकर बारह बजकर बीस मिनट पर हम धर्मकोट से निकल गए|

ऐन वक़्त पर निर्णय बदलने के पीछे तीन कारण था| एक सुबह से ही लगातार बारिश हो रही थी| बारिश में सामान लेकर ऑटो स्टेंड, जो कि बौद्ध ध्यान केंद्र ‘तुषिता’ के सामने है, तक पहुंचना कवायत हो जाता| दूसरा, शनिवार होने की वजह से ट्राफिक जाम में फसने के भी आसार थे| ऐसा भी हो सकता था कि हमें ऑटो मिलता ही नहीं, क्योंकि रोड जाम होने पर ऑटो को रोक दिया जाता है| धर्मशाला से 2:40 की हमारी बस थी, हमने हिमाचल परिवहन की वेबसाइट से एक दिन पहले ही टिकट बुक कर ली थी| इसीलिए समय से पहले हमें धर्मशाला पहुँच जाना था| तीसरा, 40 दिन तक प्रकाश भाई (बदला हुआ नाम) के यहाँ ठहरने के बाद, उनके टैक्सी से धर्मशाला न जाते हुए, थोड़ा अजीब लग रहा था| सो, ऑर्गेनिक थाली (यह रेस्तरां का नाम है) में नाश्ता करते हुए हमने तय किया की हम प्रकाश भाई की टैक्सी से ही धर्मशाला जाएँगे|
धर्मकोट से निकलने से पहले दिव्या को थोड़ी घबराहट हो रही थी, किसी भी जगह पर लम्बे समय तक ठहरने के बाद, उस जगह को छोड़ने से पहले उसे इस तरह की घबराहट पकड़ लेती है| वो कल कह रही थी, “पहले जब मैं जॉब करती थी, तब सुबह ऑफिस जाने से पहले भी मुझे ऐसी ही घबराहट पकड़ लेती थी, अब तो बहुत कम हो गया है| पहले मेरे पेट में तेज़ दर्द होने लगता था|” मुझे इस तरह की कोई घबराहट नहीं पकड़ती है, लेकिन मन थोड़ा बोझिल जरूर हो जाता है| ऐसे नाज़ुक वक़्त को मैं बहुत ही सजगता पूर्वक जागते हुए जीने की कोशिश करता हूँ| ओशो कहते हैं, “जब कोई तुम्हारा बहुत ही करीबी मित्र तुमसे दूर जा रहा हो, या फिर जब तुम किसी ऐसे जगह को छोड़कर जा रहे हो, जिस जगह से तुम्हे बहुत ही प्यार और लगाव है, तो स्वाभाविक है कि उस क्षण में तुम्हारे मन को अवसाद घेरेगा| तुम दुखी होओगे कि क्या पता अब कभी दुबारा मिलना (या लौट कर आना) हो भी या नहीं| उस क्षण को गंवाना मत, वह क्षण मृत्यु का क्षण है, कुछ है जो छूट रहा है, जो ज्ञात है उससे तुम दूर जा रहे है, यही तो मृत्यु में होगा| ज्ञात छूटेगा और तुम अज्ञात में प्रवेश करोगे| इन क्षणों में जागो| इन्ही छोटे-छोटे क्षणों में जागते-जागते तुम एक दिन मृत्यु के लिए तैयार हो पाओगे|” तो, ऐसे क्षण मेरे लिए साधना के क्षण होते हैं| पीछे जब मास्टर उगवे और राव साहब जा रहे थे, तब भी ऐसा शुभ क्षण आया था| ऐसे क्षण रोज़ ही हमारे जीवन में आते रहते हैं| जब भी नोन को छोड़ कर अनोन में जाना होता है, मन कंपता है| मन हमेशा ‘अज्ञात’ व नए से घबराता है| इसी घबराहट की वजह से बहुत से लोग, कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल घुमते हुए जीवन को घसीटते रहते हैं| विज्ञान भैरव तंत्र में शिव का एक ऐसा ही सूत्र है, वह सूत्र भी मुझे बहुत पसंद हैं| शिव कहते हैं, On joyously seeing a long absent friend permeate this joy”. पहला सूत्र अगर मृत्यु का अभ्यास है, तो यह सूत्र जीवन का अभ्यास है|

रास्ते में सिर्फ एक जगह, मेक्लोड से थोड़ा पहले, हमें ट्राफिक जाम का सामना करना पड़ा| गाड़ी में, मैं आगे की सीट पर प्रकाश भाई (गुजरात में रहने की वजह से नाम के पीछे ‘भाई’ लगाने की आदत पड़ गई है) के बगल में बैठा था, और दिव्या पीछे सामान के साथ बैठी थी| ‘हमारा 20 तक रुकने का प्लान था, लेकिन परसों इंडक्शन ख़राब हो गया, इसीलिए हम आज ही निकल रहे हैं’, मैंने प्रकाश जी से कहा| “अरे.. आपने मुझे क्यों नहीं बताया,” प्रकाश जी हमसे कहने लगे, “मैं आपको गैस दे देता, या फिर आप हमारे किचन में खाना बना लेते”, बोलते हुए उन्होंने आगे वाली गाड़ी को रास्ते देने के लिए अपनी गाड़ी को पीछे लिया| एकबार को मुझे लगा कहीं ये हमें घर वापिस तो नहीं ले जा रहे हैं| मैंने गर्दन घूमा कर पीछे दिव्या को देखा, वो आँखे बड़ी करके मुझे देख रही थी, मानो कह रही हो, “मैंने तुम्हे पहले ही कहा था, एक बार बात करके देख लो, क्या पता कुछ जुगाड़ हो जाए|” मैंने झट से गर्दन सीधी कर ली| ‘मैंने पहले ही कहा था’ दिव्या का पसंदीदा तकियाकलाम है| लालबुझकर की तरह इसको पहले से ही सब पता होता है| हालाँकि, जब भी कोई निर्णय लेने की बात होती है, तो इसका जुमला होता है, “तुम देख लो, जैसा ठीक लगे”|

हम 12:45 पर, बस की समय से करीब दो घंटा पहले, धर्मशाला पहुँच गए| घर से जल्दी निकलने का हमारा निर्णय गलत साबित हुआ| और टैक्सी से आने का निर्णय तो और अभी ज्यादा| जब हम धर्मकोट से निकल रहे थे, तब बारिश भी थम गई थी| और जब हम टैक्सी से तुषिता के पास से गुजर रहे थे, तब हमने एक लाइन से 6 ऑटो को एक साथ खड़ा देखा| खैर, अब कुछ भी नहीं किया जा सकता था| कोई भी निर्णय लेने से पहले कोई यह कैसे तय करे कि वह जो निर्णय ले रहा है वही सही ही होगा, There is no means of testing which decision is better; because there is no basis for comparison. We live everything as it comes, without warning, like an actor going on cold. And, what can life be worth if the first rehearsal for life is life itself?”  पिछे लौटकर, दिव्या की तरह, सही गलत का फैसला करना बहुत आसान है| लेकिन, जीवन में सही और गलत दोनों ही संयोग की बात है| और बहुत गहरा देखा जाए तो, जीवन में न तो कुछ सही होता है, न ही गलत| क्योंकि दोनों के लिए जो आधार चाहिए वह है ‘शुरूआत और अंत’| और जीवन में से यही दोनों चीज़ गायब है| किसी उपन्यास के बीच के 100 पेज पढ़कर आप किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँच सकते हैं| निर्णय लेने के लिए शुरुआत और अंत जानना अपरिहार्य है| जीवन घटनाओं का अनंत प्रवाह, और सब कुछ एक दूसरे पर पारस्परिकरूप से निर्भर है, लाओत्से कहा करते थे, 'जब तुम यहाँ एक पत्ता तोड़ते हो, तो उसकी झानाहट को वो जो दूर आकाश में तारे तुम्हे दिख रहे हैं, वे भी महसूस करते हैं|, ऐसे में किसी भी निर्णय पर पहुंचना असंभव है| इसीलिए, जिन्हें पूरे सत्य का पता होता है, वे कभी निर्णय नहीं देते हैं|

धर्मशाला से पठानकोट पहुँचने में करीब तीन घंटा लगता है| और हमारी ट्रेन 11:30 की थी, इसलिए हमने सोचा था की पांच बजे के करीब हम धर्मकोट से निकलेंगे, और फिर 6 के आसपास धर्मशाला से बस लेकर पठानकोट जाएँगे| लेकिन परसों सुबह जब मैंने हिमाचल परिवहन का वेबसाइट चेक किया तो पाया कि दो बजकर चालीस मिनट पर धर्मशाला से पठानकोट की आखरी बस है| इसका मतलब अगर हम धर्मकोट से शाम को निकलने की सोचते, तो हमें सीधा धर्मकोट से पठानकोट की टैक्सी करना पड़ता, जिसका भाड़ा करीब 45,00 होता| यह ऐसा ही होता जैसा हमारे यहाँ कहते हैं, “जतेक के बोहु’अ नै, तते के लहठी” (जितने की पत्नी नहीं उससे ज्यादा का उसका गहना)| इसलिए अब दो घंटे धर्मशाला में, और करीब 6 पठानकोट में बैठकर इंतज़ार करने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था|
प्रकाश जी के टैक्सी से उतरने के बाद हम बस स्टैंड से थोड़ी दूर रास्ते के किनारे बने लोहे के बैंच पर बैठने चले गए| बैठने से पहले हमने सुनिश्चित किया कि आसपास बारिश से बचने की कोई जगह है भी या नहीं| पास ही रोड के उस तरफ हमें एक घर दिख गया| तेज़ बारिश में हम वहां भाग कर जा सकते थे| लोहे के दो बैंच बने हुए थे, एक टूटा हुआ था और दूसरा थोड़ा दुरुस्त| टूटा हुआ बैंच काफी पुराना हो चला था| लोहे पर जंग लगना शुरू हो गया था| आधा से ज्यादा बैंच जंगली लताओं से घिरा हुआ था| दूसरा बैंच हरे रंग से पुता हुआ था और पहले की तुलना में काफी अच्छी हालत में था| टूटे हुए बैंच पर हमने अपना सामान रख दिया| और हरे रंग वाले बैंच को पेपर से पोछकर उस पर बैठ गए| सामने हिमालय का उतुंग शिखर दिख रहा था| जाने से पहले मैं अपनी आँखों को हिमालय की अलौकिक सौन्दर्य से भर लेना चाहता था| संयोग ऐसा था कि ठीक दस दिन पहले मैं इसी बैंच पर राव साहब के साथ बैठा हुआ था| उनकी बस सुबह 7:50 की थी, मैं उन्हें छोड़ने आया था| उस दिन हम एक घंटा पहले पहुँच गए थे| यहीं बैठकर हमने अपने तीन महीने के तवील सफ़र का आखरी घंटा बिताया था| समय बीतते देर नहीं लगती है, “दिवस जात नहिं लागिहि बारा”|

छः बजकर दस मिनट पर हम पठानकोट पहुंचे| जब हम बस स्टेंड में घुस ही रहे थे, तभी हमें दाहिनी ओर ‘कार्निवल’ सिनेमा दिख गया| बस से उतरते ही हम सीधा सिनेमा हॉल पर पहुँच गए| दिव्या ने पहले से सिनेमा देखने के मन बना रखा था| अक्टूबर टूर के दौरान जब मैंने सोशल मिडिया से दूरी बनाई थी, तब से मैंने सिनेमा देखना भी बंद कर दिया था| इस बीच सिर्फ दिल्ली में ही गोविन्द के साथ ‘गल्ली बॉय’ देखा था| उसके बाद धर्मकोट छोड़ने से पहले एक शाम हमने ‘दिल तो बच्च्चा है जी, और आखरी शाम ‘चश्मे बद्दूर’ (पुराना वाला) लैपटॉप पर देखा था| माफ कीजिए कुछ दिन पहले तुषिता के प्रभाव में आकर दलाई लामा की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘कुनदून’ भी देखी थी| 6:50 पर ‘सुपर 30’ शुरू होने वाला था|
टिकट बुक करने से पहले मैंने सामान का कन्फर्म कर लिया था, आपका लैपटॉप ऑफिस में जमा हो जाएगा, और बांकी सामान गार्ड अपने पास रख लेगा| पैसा और कार्ड आप अपने साथ अन्दर ले जा सकते हैं” मैंने दो टिकट कटाया और फिर सामान गार्ड को सुपुर्द करके खाने के लिए कुछ ढूंढने बाहर निकल गया| सुबह जो ऑर्गनिक थाली पर हमने नाश्ता किया था, उसके बाद अभी तक हमने कुछ नहीं खाया था| बाहर कुछ ही दूरी पर हमें एक जूस वाला दिख गया|
फिल्म अच्छी थी, लेकिन ऋतिक की एक्टिंग से मैं प्रभावित नहीं हुआ| डायरेक्शन भी मुझे थोड़ी कमज़ोर लगी| इतनी अच्छी कहानी थी, क्या कुछ नहीं किया जा सकता था, लेकिन ख़राब डायरेक्शन, पुअर स्क्रिप्ट और ऋतिक की कमज़ोर एक्टिंग की वजह से सब गोबर हो गया| खैर, सेकंड हाफ में फिल्म थोड़ी ग्रीपिंग है| हॉल से निकलने के बाद हम रेलवे स्टेशन का पता करने लगे, अभी घड़ी में 9:20 बज रहा था| हालाँकि टिकट बाबु ने हमें बताया था कि स्टेशन पास ही है, पैदल जाया सकता है| लेकिन फिर भी किधर है, और कैसे जाना है, यह हमें नहीं पता था| मैं एक दूकानदार से स्टेशन का पूछ ही रहा था कि एक ऑटो वाला आ गया, और कहने लगा, “बैठीये 20 रूपये में हम छोड़ देंगे”| हमने सोचा पता नहीं कितना चलना पड़े, सामान भी कम नहीं है, बैठ ही जाते हैं| हमारे ऑटो में बैठने के 20 सेकेण्ड बाद ही ऑटो वाला एक जगह गाडी रोक कर बोला, ‘वो रहा स्टेशन’| ऐसा हादसा हमारे साथ एक दो बार और घट चुका है|
स्टेशन पहुँचने के थोड़ी देर बाद, मैंने खाना दूंढने के लिए निकला| पठान कोट बहुत ही छोटा स्टेशन है| पुरे स्टेशन पर सिर्फ चार दूकाने हैं, एक सरकारी भोजनालय, जिसमे छोले भटूरे के अलावा और कुछ भी नहीं मिलता है, एक किताब घर, एक अमूल पारलर, और एक छोटा शॉप जिसमे पैकेट बंद चीज़ें मिलती है| मैं सकारी दूकान से हल्दीराम का एक चिप्स लेकर आया, दिव्या ने खाने से इंकार कर दिया| थोड़ी देर बाद मैं स्टेशन से बाहर खाना ढूँढने निकला| रोड किनारे दो ढाबा दिखा, भीड़ काफी थी उनके यहाँ, लेकिन रोटी की शक्ल देखकर ही लगा की यहाँ सही खाना नहीं मिलेगा| थोड़ा आगे बढ़ने पर मुझे एक और ढाबा दिखा, लेकिन वहां की हालत भी मुझे ठीक नहीं लगी| थोड़ा और आगे बढ़ने पर मैंने एक दवाई दूकानदार से पूछा, ‘यहाँ आस-पास सही खाना कहाँ मिल जाएगा|’ “थोड़ा और आगे जाइए बाएँ में ‘खालसा हिन्दू ढाबा’ है, वहां आपको सही खाना मिल जाएगा, हम भी वही से खाते है”, हाथ से आगे की ओर इशारा करते हुए दुकानदार ने मुझसे कहा| 100 कदम चलने के बाद ढाबा आ गया| काफ़ी बड़ा ढाबा था| गेट पर दो गार्ड खड़े थे| अन्दर पंहुचा तो काउंटर पर दो सरदार जी खड़े हैं| हॉल में कोई 25 स्थानिए निवासी बैठकर खा रहे थे| मैंने अपना आर्डर दिया और वही पास लगे चेयर पर बैठकर इंतजार करने लगा| 20 मिनट बाद मेरा खाना तैयार होकर आया| भुगतान करने के बाद, मैं तेजी से स्टेशन की और भागा| 11 बजने में अभी कुछ मिनट बांकी थे|
जब मैं स्टेशन पर पहुंचा तो देखा, दिव्या बेसब्री से खाने का इंतजार कर रही थी| वह गर्दन टेढ़ी करके बार-बार जिस गेट से मैं खाना लाने गया था, उस गेट की ओर देख रही थी| मैं दूसरी गेट से वापिस आया था, इसीलिए उसे पीछे से देख सकता था| उसके पास पहुँच कर मैंने पीछे से उसके सिर को हल्के से छुआ| वह चौंकते हुए पीछे मुड़ी और मेरे हाथ में खाने की थैली देखकर अकाल के कव्वे की तरह खुश हो गई| खाने को लेकर जैसी दीवानगी मैं इसमें और मास्टर उगवे में देखता हूँ, वैसी मैंने आज तक किसी में नहीं देखी है| सुबह का नाश्ता करते समय ही मास्टर उगवे रात के खाने में क्या खाना यह तय करने बैठ जाते थे| उनके खाऊँपन से हम इतने परेशान हो गए थे, जब वे हमारे पास से गए, तो उनकी जाने की ख़ुशी में हमने एक दिन का उपवास रखा था| खाने के मामले में मेरे मरहूम मित्र धर्मेद्र स्वामी बहुत अच्छे थे| हालाँकि मरने से कुछ दिन पहले खाने को लेकर उनका रवैया भी थोड़ा बदल गया था| जैसे मास्टर उगवे खाने के दीवाने हैं, वैसे ही धर्मेद्र स्वामी न खाने के दीवाने हो गए थे| कुछ लोग उनकी इसी दीवानगी को उनके मौत का जिम्मेवार मानते हैं| हालाँकि  मैं इस आम-राय से जरा भी इत्तेफाक नहीं रखता हूँ| मैं आज भी मानता हूँ कि उनकी मौत बंदगी करते वक़्त हुई थी| भक्त आदमी थे, भाव में आकर जान दे दिये| खाने के मामले में राव साहब का मामला थोड़ा ठीक है, लेकिन नमकीन और भजिये के प्रति उनकी दीवानगी अनूठी है| खाने को लेकर मेरा मामला भी गड़बड़ ही है| मीठा मेरी कमज़ोरी है| और अगर घर में मेरे पसंद की कोई चीज़ रखी हो, तो जबतक वह खत्म न हो जाए, मुझे चैन नहीं पड़ता है|
खाना खाने के बाद हम लोग ट्रेन में आकर बैठ गए| अभी ट्रेन खुलने में 15 मिनट का समय था| खाना खाने के बाद दिव्या का अमूल से आइस-क्रीम खाने का मन था, मैंने मना कर दिया| इसीलिए वह मुंह बनाकर बैठी थी| लेकिन मुझे मलाल नहीं था| ऐसी जिद को मैं नहीं समझ पाता हूँ, “मैं तभी खाऊँगी जब तुम भी खाओगे”| (इस जुमले का असली अर्थ यह है- क्योंकि अगर तुम नहीं खाओगे तो तुम मुझे सुनाओगे, तो इससे अच्छा है कि मैं नहीं खाती हूँ, और अगले तीन महीने तक तुम्हे सुनाती रहूंगी)| मैं अपने बैग से टॉलस्टॉय की ‘War and Peace’ निकालकर पढ़ने लगा|
जब भी सुबह साढ़े पांच के आसपास मेरी आँख खुलती है, और ऐसा करीब-करीब रोज़ होता है, तो मुझे आश्रम की याद आ जाती है| सुबह सक्रीय ध्यान की म्यूजिक चलाने के लिए मुझे रोज़ 5:30 पर उठाना पड़ता था| वह आदत आज भी कायम है| जब गावं में था, तब भी इतने बजे ही उठ जाया करता था| दरभंगा, दिल्ली और मुंबई के निवास के दौरान सोने और जागने के समय में काफी हेर-फेर हो गया था| मुंबई में रात के 3-4 बजे सोता था, और दिन के 1 बजे उठता था| बहुत बेकार हो गया था सब कुछ| जैसे ही मेरी आँख खुली मैंने सामान चेक किया| सब कुछ अपनी जगह पर मौजूद था| सिर्फ एक-दो लोग जागे थे, और बांकी सब सो रहे थे| मैंने अपना फ़ोन ऑन किया, वैसे इन दिनों मैं 10 बजे से पहले फोन ऑन नहीं करता हूँ, चूँकि कल यात्रा में था इसलिए ख़ुद को थोड़ी रियात दे दी| अन्यथा, आजकल मैं 4 आर्य कर्मों का पालन कर रहा हूँ| जबतक मेरे सुबह के तीन आर्य कर्म पूरे नहीं हो जाते हैं मैं फोन या लैपटॉप ऑन नहीं करता हूँ| (वो 4 आर्य कर्म क्या हैं, इसका जिक्र किसी दुसरे लेख में तफसील से करूँगा)| मोबाइल ऑन होने पर पता चला सुबह के 5:40 बज रहे थे| मैंने अपनी सीट से उतर कर नीचे आ गया और खिड़की के बहार का नज़ारा देखने लगा| पंजाब की सुबह बहुत ही हसीन थी| एक सरदार जी को पिली पगड़ी बाँध कर धान के खेत में टहलते देखकर बहुत कुछ याद आ गया|
दस बज कर बीस मिनट पर ट्रेन सराय रोहिल्ला पहुंची| स्टेशन से बाहर निकल कर हमने ओला बुक किया| और 11:15 पर हम अपने निवास स्थान पर पहुँच गए| इस बार मैंने पहाड़ पर ही तय कर लिया था कि दिल्ली को ऐसे देखूंगा जैसे ज़ोरबा दुनिया को देखता था, “लोगों और चीज़ों को ऐसे देखो मानो तुम उन्हें पहलीबार देख रहे हो” (नोट-विज्ञान भैरव तंत्र के एक सूत्र में शिव पार्वती से ऐसे ही जगत को देखते के लिए कहते हैं- See as if for the first time A beauteous person Or an ordinary object.”) रास्ते में सबकुछ नया-नया दिख रहा था| दिल्ली इससे ज्यादा खूबसूरत कभी नहीं दिखी थी| पूरे रास्ते को मैंने अलग ही ढंग से एन्जॉय किया| अपने निवास स्थान पर पंहुचा तो दो नए मेहमान, एक मिलान कुण्डेरा की ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ और दूसरी गाबरीयल गर्सीया मारकेस की ‘वन हण्ड्रेड यर्स ऑफ़ सॉलीत्युड’ बेड पर बंद पैकेट में मेरा इंतजार कर रहे थे| अभी 5 दिन पहले ही अमेज़न से मैंने इन्हें मंगाया था| पहाड़ पर मंगा नहीं सकता था, इसीलिए अपने अगले ठिकाने पर इन्हें मंगा लिया था| आते ही सबसे पहले मैंने रवायत के हिसाब से किताबों को पैकेट से निकाला और उन पर साइन किया|
खाना खाने के बाद थोड़ी देर सोया, फिर दोनों किताब को अलट-पलट कर देखने लगा| ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ की पहली ही लाइन पढ़कर मैं आगे पढ़ने से ख़ुद को रोक नहीं पाया| हालाँकि मैं ऐसा नहीं करना चाहता था| धर्मकोट पहुँचते ही ‘वार एंड पीस’ शुरू किया था| लेकिन दो दिन बाद तुषिता की लाइब्रेरी में ‘तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाईंग’ दिख गई| उसको समाप्त किया फिर रमण महर्षि ‘बी एज़ यू आर’ पढ़ने लगा| अब सोचा था कि जबतक इस 1400 पेज की ग्रन्थ को समाप्त न कर लूं, दूसरी कोई किताब बीच में शुरू नहीं करूँगा| लेकिन आज फिर फिसल गया| ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ की अभी तक 50 पेज पढ़ी है, आई लव दिस बुक, अब इसको समाप्त किए बगैर नहीं रह सकता हूँ| ऊपर जो आपके साथ अंग्रेजी में एक कोट शेयर किया है, वह इसी किताब से है (There is no means of testing which decision is better; because there is no basis for comparison. We live everything...)| चालीस दिन पहाड़ पर बिताने के बाद मैं सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकता था कि दिल्ली में मेरा पहला दिन इतना अच्छा बीतेगा| इससे पहले जब भी दिल्ली आता था दिन आपाधापी में ही बीत जाता था|


ख़त- #3 राव साहब की शाश्वत बीमारी का सनातन इलाज

प्रिय आत्मन, 
[28 June, 2019]
कल राव साहब ने एक नई बात बताईज़ुकाम की वजह से मेरा पेट ख़राब हो गया है।  क्या ग़ज़ब की बात कही! कल से ही इस बात को सोच-सोच कर मैं सिर और दाढ़ी खुजा रहा हूँ।( मुझे इस तरह से सिर खुजाता देखदिव्या को लग रहा है कि शायद मैं डैन्ड्रफ की वजह से इतना सिर खुजा रहा हूँ। वह सुबह से मुझे चार बार डैन्ड्रफ का इलाज बता चुकी है। अब उसको क्या बताऊँ कि खुजली के इस भयंकर उत्पात का कारण डैन्ड्रफ नहीं हैयह दिमाग़ी चक्कर का असर है। ख़ैरजो चीज़ जिसके पास नहीं होउस चीज के बारे उससे बात करना मैं ठीक नहीं समझता हूँ)
पेट ख़राब का ज़ुकाम से मुझे कोई भी संबंध नहीं दिख रहा है। उनका कहना है कि,”जिस बेक्टीरिया की वजह से मुझे ज़ुकाम हुआ हैलूज़ मोशन के ज़रिए शरीर उसे बाहर फ़ेक रहा है। यह मैं पहली बार सुन रहा हूँ। उनका ज़ुकाम भी मुझे समझ नहीं आता हैन तो नाक से पानी बह रहा हैन ही तीन दिन में एक बार भी उन्होंने छींका है। इतनी ठंड में लूज़ मोशन का होना भी मुझे बड़ा असंभव-सा लगता है। इस मामले में राव साहब मुझे कोई बहुत बड़े कलाकार मालूम पड़ रहे है।
कल सुबह पानी भरते समय कहने लगेइस वीराने अब मेरा मन नहीं लग रहा हैलगता है मुझे बुख़ार हो गया है।” मैं सुनकर बड़ा हैरान हुआ। सुबह-सुबह राव साहब क्या अलबल बोल रहे हैं। मन नहीं लगने का बुख़ार से क्या संबंध है। और धर्मकोट वीरान कब से हो गया।  मुझे कुछ शक हुआ मैंने कहालाइए अपना हाथ दिखाइएदेखूँ बुख़ार है भी या आप यूँ ही माहौल बना रहे हैं। कहने लगेबुख़ार हाथ से नहीं माथा छूकर देखा जाता है। मैंने कहाठीक है माथा ही छू लेते हैं।  मैंने माथा छूकर देखाकोई बुख़ार नहीं था। कहने लगेआपको बुख़ार देखना आता ही नहीं है।  मैंने कहाबच्चूमेरे पास आपकी इस मनरोग का भी इलाज है। मैं झट अपने कमरे से थरमामीटर निकाल लाया। बुख़ार जाँचकर देखा 97.7 निकला। उनका चेहरा उतर गया। मुझे भांति-भांति का (कु)तर्क देकर यह समझाने की कोशिश करने लगे कि बुख़ार न होने के बावजूद भी उन्हें बुख़ार जैसा क्यों लग रहा है। मैंने उनसे कहादेखिए राव साहबसौ बात की एक बात अगर मास्टर उगवे जैसा अनुभवी और बुज़ुर्ग आदमी किसी को बबूचक’ बोलता हैतो ऐसे ही मुँह उठाकर कुछ भी नहीं बोल देता। कुछ आगे पीछे का सोच कर बोलता है। आज से आप मेरी नज़र में भी बबूचक’ ही हैं। मेरी बात सुनकर थोड़ी देर तक मुँह लटकाए बैठे रहेफिर उठकर अपने कमरे में चले गए। और अंदर से गेट बंद करके लड़कियों से चैट करने लगे। 
डीजी को जब राव साहब की बीमारी के बारे में लिखातो उन का जवाब आया राव साहेब की यह पुरानी बीमारी हैवह जो चाहते हैअगर वह नहीं हो पाता हैतो वह बीमार पड़ जाते है। मुझे लगता है इस बार इनकी बीमारी की वजह प्रेमिका का न मिलना है।” मुझे डीजी की बातों में थोड़ी सच्चाई नज़र आती है। अभी दो दिन पहले ही मैंने मेहुल के ख़त का जवाब देते हुए लिखा था‘कल का पूरा दिन Salvation Cafe में किताब (तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाइंग) पढ़ते हुए बितायासुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना वहीं खायायह कैफ़े ज़ोस्टल वाले चलाते हैखाना और कॉफ़ी दोनों बहुत सही था(सैल्वेशन कैफ़े की कॉफ़ी से याद आया। दो दिन पहलेशुक्रवार को, Joy food पर जो कॉफ़ी पी थी उसकी वजह से सुबह पाँच बजे तक सो नहीं पाया था। कुछ अलग ही तरह का कैपेचीनो पिला दिया था। ऊपर साबुन के जैसा झाग थाऔर नीचे पेंदी में एक इंच मोटा खड़ा कॉफ़ी बीन। पैसा लगा था इसीलिए जैसे-तैसे निगल गया था| वर्ना, कॉफ़ी गिलोई के जूस से कम न था)
वहां कैफ़े के काउंटर पर जो लकड़ी बैठी थीउससे बात-चीत की तो पता चला कि वह वहां वालंटियर हैदिन में ४-५ घंटा काम करना होता हैउसके बदले रहना और खाना फ्री होता है|उसी से पता चला की भारत और नेपाल को मिलाकर ज़ोस्टेल के कुल 38 ब्रांच हैं (नेपाल में दो ब्रांच है, एक काठमांडू और दूसरा पोखरा में। धर्मकोट के अलावा Zostel का दूसरा ब्रांच हमने खजुराहो में देखा था)वह लड़की दिल्ली से थीकमला नेहरु कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक करके यहाँ थोड़ा समय बिताने आई हैहमेशा की तरह इस बार भी राव साहब को कल उससे एकतरफ़ा प्यार हो गयाअब परसों से वे उसके चक्कर में ज़ोस्टल में रहने जा रहे हैं| ” लेकिन अफ़सोसअपनी अनोखी बीमारी की वजह से शायाद अब उनका जोस्टल जाना संभव नहीं हो पाएगा। 

पुनश्च- आज सुबह राव साहब को तिब्बतन हॉस्पिटल ‘DELEK’ ले गया था| खून और स्टूल जांच करके डॉक्टर ने बता कि कुछ गड़बड़ खा लेने की वजह से पेट में इन्फेक्शन हो गया है| उम्मीद है, कल तक ठीक हो जाएँगे, और शुक्रवार को Zostel जा पाएँगे|
आज जब मास्टर उगवे को राव साहब की बीमारी के बारे में बताया तो उनका कमेंट आया, “राव एक नंबर का ढकोसलाबाज़ है, कोई तबियत ख़राब नहीं है इसकी... प्रेम नहीं मिलने के कारण यह बौरा गया है|”

पुनश्च- अभी-अभी डीजी का मेल आया है, “राव साहेब से जब मैंने कल वीडियो कॉल पर बात की तो उनके हाथ में मैंने ORS के दो पाउच देखे। उससे मुझे अंदाजा आया की शायद उनको दस्त हो गए है।पर तुरंत मुझे आभास हुआ की मेडिकल साईन्स भले ही इसे दस्त लगना कहती होपर मेरे ख़याल में वह दस्त नहीं हैबल्किप्रेमिका के अभाव में जो स्ख(beep).. आगे से नहीं हो पाया और दमित रह गयावही reservior के उन्माद ने अपना निकलने का कोई और ही मार्ग खोज लिया। ख़ैरहकीकत क्या हैवह तो राव साहेब जाने।“

बारिश, पहाड़ और आरुषी


iKKyuTzu Kensho, [24.06.19 20:19]
आरुषी, मैं जिनके यहाँ ठहरा हुआ हूँ उनके बड़े बेटे विकास (बदला हुआ नाम) की ४ वर्षीया बेटी, अपने बुआ से लड़ रही है। कभी किसी बात पर चिल्लाने लगती है, तो कभी कोई गीत गाने लगती है। ले.. अब अपनी गाड़ी में बैठकर दादी के आस-पास चक्कर लगा रही है। वहीं उसकी माँ गेहूँ से कंकड़ निकाल रही हैं। और उसकी दादी खुले आँगन में बैठकर ऊन का स्वेटर बुन रही है। और मैं, इक्क्यु केंशो तजु, बरामदे में बैठकर ग्रीन-टी पी रहा हूँ। अभी बस दो मिनट पहले राव साहब यहाँ से उठकर अपने कमरे में गए हैं। तबियत ख़राब होने की वजह से उन्हें बाहर ठंड लग रही थी। दिव्या भी कमरे में बैठी है, शायद लैप्टॉप पर कुछ काम कर रही हैं। ये देखिए...., अदिति के दादा हाथ में बाल्टी लिए कहीं से लहराते हुए आ रहे है। शायद गाय को पानी पिला कर आ रहे हैं। आरुषी की मम्मी ने अपने ससुर को देखकर सिर पल्लू से ढक लिया है। आरुषी के दो चाचा हैं, और दोनो अपने आप में एक केरेक्टर हैं। बड़ा चाचा प्रकाश (बदला हुआ नाम), जिस दिन से मैं यहाँ आया हूँ (मुझे यहाँ आए आज २२ दिन हो गया), पिली टीशर्ट और छोटा वाला चाचा पप्पू एक ग्रीन टीशर्ट पहनकर घूम रहा है। राव साहब ने दोनों का नाम चमड़ी रख दिया है। वैसे यहाँ आकर राव साहब को भी एक नया नाम मिला है। उनकी दिलफेंकी वाली आदत को देखते हुए, मास्टर उगवे ने उन्हें बबूचक’ बुलाना शुरू कर दिया है। अल्लाह जाने ये ‘बबूचक’ का क्या अर्थ होता है।
आरुषी की बड़ी बुआ की भी मुझे कोई कहानी लगती है। छोटी के बिल्कुल विपरीत वह अक्सर शांत-शांत और थोड़ी उदास जैसी रहती है। उनके चेहरे को देखकर लगता हैं कि वो किसी गहरे ग़म में जी रही है| हो सकता है, मेरा अनुमान ग़लत हो..गॉड नोज़ क्या सच है| अरे....ये देखिए बारिश शुरू हो गई। पूरा पहाड़ बादलों से ढक गया है। मेरे मेज़बान यानि आरुषी के दादा पानी गिरता देख कोई पहाड़ी गीत गुनगुना रहे हैं। वैसे उनके मयनोशी का वक़्त भी हो चला है। आप रोज़ शाम को जाम पीते हैं। ७० के क़रीब उनकी उम्र है, सिर पर पहाड़ी टोपी पहनते हैं, और अक्सर हाथ में सिगरेट जलाए इधर-से-उधर घुमते रहते है, सेहत से बड़े फ़िट और दुरुस्त हैं। बारिश से बचने के लिए आरुषी की दादी भी आँगन से उठकर अपने कमरे में जा रही है| आरुषी ऊन का गोला उठाए उनके पीछे-पीछे चल रही है| अपने नन्हे हाथों से बड़ी मुश्किल से गोले को संभाल पा रही है| मुझे अपना बचपन याद आ गया| माँ को स्वेटर बुनने का बहुत शौक है| कभी जब ऊन का गोला उनकी गोद से लुढ़ककर नीचे चला जाता था, तो हमें उठाकर लाने के लिए कहती थी| आरुषी की तरह मैं भी बड़ी मुश्किल से बड़े गोले को अपने हाथों में संभाल पाता था| वो कथई रंग की स्वेटर जो माँ ने मेरे लिए बुनी थी, मुझे आज भी याद है| माँ ने गलती से गला छोटा बुन दिया था| बड़ी मुश्किल से मेरा सिर उसमे घुस पाता था, पहना और निकालना दोनों किसी कवायत से कम नहीं था| फिर भी बहुत सालों तक मैंने उसे पहनता रहा था| साइकल सीखते समय जिस दिन मेरा हाथ टूटा था, उस दिन भी मैंने वही स्वेटर पहन रखा था| बाद में जब स्वेटर मुझे छोटा होने लगा, तो माँ ने उसे उधेड़कर साकेत के लिए, नहीं शायद सुरुचि के लिए उसका स्वेटर और टोपी बुन दिया| जब हम थोड़े बड़े हो गए, तो हमें हाथ से बुना हुआ स्वेटर पहनने में शर्म आने लगी| अब सब बाजार से स्वेटर खरीद कर पहनने को अच्छा मानने लगे थे| जमाना बड़ी तेजी से बदल रहा था| कुछ दिनों तक माँ जबरदस्ती हाथ से बुना हुआ स्वेटर और टोपी पहना देती थी| लेकिन बाद में हमारे जिद के आगे हार मान गई| और फिर ऐसा भी हुआ कि ज्यादा देर बुनाई करने से उनको आँखों में तकलीफ होने लगती थी|
मेरे सामने टेबल पर आज का अख़बार (जिसे पढ़कर मैं सुबह से दुखी हूँ), केले का छिलका, चाक़ू, ग्रीन-टी का कप और सोग्यल रिंपोचे की विश्व प्रसिद्ध किताब ‘The Tibetan book of Living and dying’ पड़ी है। आधी से ज़्यादा किताब ख़त्म कर चुका हूँ। १० दिन पहले तुषिता की लाइब्रेरी से ६०० रुपया जमा कर के, १० रुपये सप्ताह किराए पर किताब इशू कराया था। सोचा था ४०० पेज की किताब है ४ दिन में पढ़कर लौटा दूँगा। लेकिन किताब इतनी प्रफ़ाउंड है कि एकदम से निगल नहीं पाया।
किताब पूरी करने के बाद तबसिरा (www.ikkyutalk.blogspot.com) पर किताब का अनुभव आपसे शेयर करूँगा। रुकिए मुझे शाम के खाने के लिए दही लाने जाना होगा। दिव्या का आज पंजाबी करी बनाने का प्लान है। दही लेकर आता हूँ, फिर आपको आगे की कहानी सुनाऊँगा।
लीजिए मैं दही लेकर आ गया। अरूषी अब फूल के गुलदस्ते से खेल रही। गुलदस्ते में दो फूल है, एक का रंग हरा है दूसरे का पीला। मज़ा यह है कि आरूषी ने जो कपड़े पहन रखें हैं, उसका रंग भी हरा और पीला है।
दही लाने दिव्या भी मेरे साथ गई थी। हम तुषिता तक गए थे। अभी जहाँ हम ठहरे हुए हैं, वहां से तुषिता पहुँचने में २ से ३ मिनट लगते हैं| तुषिता के मेन गेट के बाहर ही हिमालय टी शॉप है (धर्म कोट में सबसे अच्छी और सस्ती चाय यहीं मिलती है), वहीं से दही लिया। जाते समय रास्ते में एक चीज़ देख कर बड़ा हैरान हुआ कि अपनी छतरी के नीचे दिव्या आरुषी के दादा की तरह गाना गुनगुनाने लगी, ‘घर से निकलते ही कुछ दूर.....’। ऐसे तो कभी नहीं गाती है। लगता है बारिश और संगीत का कोई गहरा व अनूठा सम्बंध है। रुकिए अँधेरा घिरने लगा है, कान और पैर को ढकने के लिए कुछ पहन लेता हूँ। वैसे भी यहाँ नंगे पैर घूमना ठीक नहीं है। कुछ दिन पहले मेरे बिस्तर पर एक बिच्छू बैठा हुआ था। रास्ते पर बिच्छू को कई बार यूँ ही टहलते हुए देख चुका हूँ।
चित्र साभार-गूगल
ओह! झींगुर की आवाज़ आनी शुरू हो गई..रात के सन्नाटे में मुझे झिंगरों का ब्रह्मनाद सुनना बहुत पसंद है। गाने की आवाज़ थोड़ा कम करना, ये मैं दिव्या से कह रहा हूँ। वह अंदर कमरे में जगजीत सिंह को सुन रही है। खाना बनाते समय उसे संगीत सुनने की आदत है। मुझे याद है जिस दिन जगजीत सिंह ने इस दुनिया से विदा लिया था, मैं मुंबई में था। कांदीवली से चारकोप सेक्टर -८ की बस में बैठने के लिए, बस स्टॉप पर लाइन में खड़ा था। मेरे एक दोस्त ने तभी फ़ोन करके मुझे जगजीत सिंह जी के शरीर छोड़ने की ख़बर दी। (खो..खो...खो... माफ़ कीजिएगा, किसी दोस्त ने फ़ोन नहीं किया था, वो वही थी जिसकी कहानी मैंने 'डोंट आस्क मी वेन' में लिखा है|) मैं वहीं बस की लाइन में खड़े-खड़े रोने लगा। काफ़ी दिनों तक उनकी मौत पर उदास रहा था। लेकिन, इस वक़्त पहाड़ के इस गहन मौन में उनकी गीतों से ज़्यादा मैं झींगुरों सुनना पसंद करूँगा।
आरुषी के बड़े चाचा, प्रकाश जी (अभी नाम देखकर याद आया पी-से पीला, पी से प्रकाश), अभी उसे गोद में उठाकर आँगन में घूमा रहे हैं। इस वक़्त उन्होंने अपने पीले टीशर्ट के ऊपर एक पीला जैकेट पहन रखा है। लगता है जैसे कर्ण को वरदान में कवच मिला था, वैसे ही किसी ने इनको पीला टीशर्ट दे दिया है। कमरे से पकौड़ों की ख़ुशबू आ रही है, अब मैं और नहीं लिख सकता हूँ। लाइव राइटिंग यहीं बंद करके पकौड़े खाने जा रहा हूँ।

पुनश्च- बारिश थम गई है। आरुषी अपनी दादी के साथ भंसाघर में बैठी है| राव साहब अपने कमरे में बीमारी का बहाना करके लेटे हैं, और लड़कियों से चैट कर रहे हैं। अदिति की छोटी बुआ गाय को चारा खिलाने जा रही है। आरुषी के दादा अपने दोस्त के साथ जाम का मज़ा ले रहे हैं। पहाड़ बिल्कुल शांत और मौन खड़ा है। आकाश में काले बादल छाए हुए हैं। मेरे सामने खड़े पेड़ का एक भी पत्ता नहीं हिल रहा है। शायद वह अभी ओशो सक्रिय ध्यान के चौथे चरण में खड़ा है। दिव्या अभी कमरे में गाना सुन रही है, ‘मैंने सोचा न था....। आरुषी के आँगन में बने मंदिर की बल्ब टिमटिमा रहे हैं। बल्ब की टिमटिमाहट देखकर मुझे अपनी बा (दादी) की याद आ रही, वो भी सालों से इसी तरह टिमटिमा रही ही, ख़ुदा जाने कब ऑफ हो जाएगी|


Friday, 12 July 2019

This too shall pass.

Question- Swamiji, a few days back I broke up with my girlfriend. Now, I am in great sadness and distress. What should I do? Will meditation help me? Which meditation should I do?
Answer- “Not letting even a single thought go unnoticed is meditation” J. Krishnamurti.
It often happens that people start practising meditation after heartbreak to escape from the loneliness. It is highly deplorable that we always become interested in religion at the wrong moment and for the wrong reasons only. Kabir is right when he says’

”दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोई, जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होई”
Always remember this ’Anything that you do to escape from reality is not meditation.’ Technically, there is no difference between the people who take drugs, and who meditate. One thing is common between them that they are escaping from reality. Whether you go to a movie or Mandir, it is all the same. 
So, if you are actually interested in spirituality and would like to bring about a radical change in your life, you must learn to learn from 'that which is', instead of hankering after 'that which is not'.
Before doing anything, one must ask, 'why am I doing this or going to do this..?' 'Why I want to meditate?' Ask this question to yourself and it will be the beginning of meditation. Know your motive of doing meditation. And this very knowledge is meditation not what you do in the name of meditation.

Sitting silently is not meditation, watching breath or chanting mantra is not meditation. There is no such thing, action or activities as meditation. Meditation is not an act. Hence, there is no technique or shortcut. 
Knowing the motive, especially the hidden-motive of every action that you do is meditation. So, when you ask how to meditate, you basically are asking a wrong question. There is no 'how-to-ism' in the realm of spirituality. Anybody who is answering your 'how-to' is fooling you, in fact exploiting you, be it your Guru or Google. These days, Google is fooling people more than any Guru or God. 

Your heartbreak can become a great spiritual breakthrough if you don't make an escape from it. As we say in Zen, "If the fool would persist in his folly, he would become wise." So, learn to persist, don't escape. It is rightly said in Lazy men’s guide to enlightenment ”when in hell, keep going. The road to heaven goes through hell.” So, keep going. ”This too shall pass. 

रडिंग और traveling से मेरे गूँगेपन को शब्द मिलता है

प्रश्न- आज आप हर सवाल का जवाब और किसी भी समस्या का समाधान बता रहे हो, ऐसी समझ आपने कैसे प्राप्त की, इसके लिए क्या किया?
इक्क्यू-जितनी समस्याएँ हमें दिखती हैं, उतनी असल में है नहीं।समस्या एक ही और वह यह है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं। बाँकी सभी समस्याएँ एक इसी समस्या की प्रतिछवि है। सो, यदि आप इस एक समस्या का समाधान ढूँढने निकलते हैं, तो उसी यात्रा में बाँकी सभी समस्याओं का समाधान मिल जता है।
और, ख़ुद को जनाने का जो सूत्र है वह है ‘self-study’ (स्वाध्याय), यानी अपने शरीर, विचार और भाव का चुनाव रहित अवलोकन। 

यही मैं करता हूँ , और यही मैं चाहता हूँ कि आप भी करिये। यही वह सूत्र है। 
‘सक्षित्व या स्वाध्याय’ वो चाभी है जिससे अस्तित्व के सभी राज़ खुल जाते हैं।


एक विशेष बात- अनुभव कई बार आपको गूँगा भी बना सकता है। इसीलिए, निरंतर आपको, जो आपने जाना है उसको जनाने के लिए, अभिव्यक्ति के नए-नए माध्यम तलाशते रहना चाहिए। रडिंग और traveling से मेरे गूँगेपन को शब्द मिलता है।

Wednesday, 10 July 2019

इस जगत में कोई भी ‘आर्डिनरी’ नहीं है..


प्रश्न- बुद्ध की वाईफ अच्छी थी,. He had a small child. He was king, but still, he left his house and went to the jungle because he wanted to find his truth. I don't love my husband because I m selfish. I want to find my truth. I need someone as a catalytic agent in my religious journey and that person is perfect for that I feel. I can't leave my journey for my husband n family. I don't want to die like ordinary people die. I don't want to die without finding the meaning of my life.

इक्क्यु- सबसे पहले, आप जो ऐतिहासिक भूल कर रही हैं, मैं उसको सुधार दूंघर छोड़ कर गौतम भागा था बुद्धनहीं| इस बात को आप सदा याद रखिए| बुद्ध घर लौट कर आए थे, और घर आते ही सबसे पहले अपनी पत्नी और बेटे से मिले थे| उनसे माफ़ी मांगी थी, उस भूल के लिए जो गौतमने किया थाबुद्ध भगोड़े नहीं थे, भगौड़ा गौतम था| दूसरी बात जहाँ तक मैंने बौद्ध ग्रंथों को पढ़ा है, मुझे इस बात का जिक्र कहीं नहीं मिला है कि घर छोड़ने से पहले गौतम ने किस से राय-मश्वरा किया था| आपका मेरे से सवाल पूछना इस बात का सूचक है कि घर छोड़ने से पहले गौतम की जो मनःस्थिति थी, उससे आपकी मनःस्थिति बिलकुल भिन्न है| गौतम ने अपने बोध से घर छोड़ा था, किसी के अनुकरण में नहीं| इसीलिए, घर छोड़ने के ६ वर्ष बाद ही वह प्रबुद्ध हो गया| अगर आपकी भी ऐसी ही संभावना है, तो शौक से घर छोड़िए| अगर ६ वर्ष बाद आप भी उस प्रकाश को उपलब्ध हो जाएंगी, जो ज्ञान का प्रकाश गौतम को मिला था, तो इतिहास आपके भी घर छोड़ने की भूल को माफ़ कर देगा| लेकिन जैसा मैं जानता हूँ, बुद्ध के पीछे हजारों लोगों ने घर छोड़ा, और उन हजारों में से एक भी आज तक उस ऊंचाई को नहीं छू पाया, जिस ऊंचाई को गौतम ने २६,०० पहले छुआ था|
अगर आप बुद्ध से ही प्रभावित हैं, तो उनकी सूत्रों पर भी जरा ध्यान दीजिए| उन्होंने निर्वाण के लिए जो सूत्र और विधि दिया है, उसका पालन करने के लिए घर छोड़ने की कहीं भी अनिवार्यता नहीं है| बुद्ध के बाद भी सैकड़ों ऐसे जागृत पुरुष/स्त्रियाँ हुई हैं, जिनके टीचिंग में घर छोड़ने की अनिवार्यता नहीं हैं| पिछली सदी में ही, रामकृष्ण, रमण, कृष्णमूर्ति और ओशो जैसे अनेकों ऐसे बुद्ध पुरुष हुए हैं, जिनका पूरा जोर इस बात पर है कि घर छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है| मैं नहीं मानता कि आप इन सब से परिचित नहीं होंगी|

जिस हालात और परिस्थिति में आप घर छोड़ने का निर्णय ले रही, उससे ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा है कि आपका घर छोड़ने का कारण/निर्णय कहीं से भी धार्मिक है| आपका घर छोड़ने का निर्णय नितांत रूप से मानसिक है| आपके इस वक्तव्य, “I don't want to die like ‘ORDINARY people die.” से यह साफ़ जाहिर होता है कि आप श्रेष्टता की ग्रंथिका शिकार हो गई हैं| हीनता और श्रेष्टता दोनों रोग हैअपने को हीन या श्रेष्ठ मानना मानसिक रुग्णता का लक्षण है| एक अति से दूसरी अति में डोलना मन का स्वाभाव है| भारत में शास्त्र के लिए हम एक शब्द का प्रयोग करते हैं ‘ग्रंथ’, ग्रन्थ का अर्थ होता है जो ग्रंथि खोल दें| इसीलिए, जैन परम्परा में उपलब्ध व्यक्ति के लिए ‘निग्रंथ’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है| ‘निग्रंथ’ का अर्थ होता है, एक ऐसा व्यक्ति जो न तो अपने को किसी से श्रेष्ठ मानता, और न ही किसी को अपने हीन मानता है| वह superiority और inferiority दोनों complex से मुक्त होता है| 
इस जगत में कोई भी आर्डिनरी नहीं है| इसीलिए, ‘असाधारणबनने की चाह से बड़ी मुर्खतापूर्ण चाह और कोई है ही नहीं| यह चाह ऐसे ही जैसे कोई परुष कहे कि वह पुरुष बनना चाहता है| और फिर वह पुरुष बनने की दिशा में कोशिश भी करने लगे| परमात्मा की फैक्ट्री में कुछ भी साधारण नहीं बनता है|
ख़ुद को असाधारण, दूसरों को साधारण या फिर ख़ुद को साधारण और दूसरों को असाधारण देखना बंद कीजिए| दोनों ही दृष्टि में भूल है|  तिब्बत में ऐसी कहावत हैराजा मरता है, तो सबको पता चलता है, साधारण आदमी मरता है, तो गावं वालों को पता चलता है| और जब कोई बुद्ध पुरुष या भिखारी मरता है, तो शायद ही किसी को पता चलता है|”  ग़ालिब का एक शेर हैहुए मरके हम जो रुस्वा, हुए क्यों न गर्के-दरिया, न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं माजर होता साधक ऐसी मौत मरने की कामना करता है, न जनाजा उठे न मज़ार बने, किसी को कानो कान ख़बर भी लगे| बुढा तलोत्जु अकेले मरने के लिए हिमालय की बर्फ में चला गया था|
"पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार,
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो"
अपनी दृष्टि को बदिलिए, सृष्टि अपने आप बदल जाएगी| जगह बदलने से अगर सत्य मिलता, तो मामला बहुत आसन होता| ग़ालिब का एक शेर है
“कतरे में दिजला दिखाई ना दे और जुज़्व में कुल,
खेल लड़कों का हुआदीदा-ऐ-बीना ना हुआ
जबतक बूंद में सागर और अंड में ब्रह्म ने दिखाई दे, तब तक सब बचकानी बाते है, तब तक समझिए दृष्टि अभी गहरी नहीं हुई है|
I don't want to die without finding the meaning of my life.” कहाँ खो गया है मीनिंगजिसको आप दूंढ़ रही हैं? और अगर खो ही गया है, तो आपको कैसे पता कि बाहरखोया? पहले तो यह पता कीजिए कि खोया भी या नहीं, और फिर अगर खोया है, तो कहाँ खोया है भीतर या बाहर’| जब तक यह तय न हो जाए कि बहार खोया है, या भीतर,  तब तक अँधेरे में टटोलने से कुछ भी नहीं मिलेगा| दूसरी बात यह कौन है जो यह कह रहा है की बिना अर्थ जाने मैंमरना नहीं चाहती हूँ’, ये मैंकौन है? इस खोजने वाले को खोजिए’, क्योंकि अगर खोजने वाले का ही पता नहीं है, तो खोजेगा कौन?





जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...