Thursday, 20 September 2018

मैं अलग नहीं हूँ, तुम सब एक जैसे हो


#सन्यास -1

बाहर से देखने पर तो सब कुछ संयोग ही लगता है, लेकिन जब पीछे मुड़ कर देखता हूँ, तो लगता है शायद सब कुछ पहले से ही तय था। बचपन में गर्दन झुका कर चलता था। घर के लोग बड़ा डाँटते थे, “चोर हो क्या तुम, गर्दन झुका कर क्यों चलते हो? सर उठा कर चलो और सीना तान कर रखो?” पिता जी कहते थे, “तीन पुश्त् के बाद ख़ानदान बदलता है, यह लगता है अपने परदादा, दादा और पिता से अलग होगा।” 

बहुत कोशिशों के बाद भी मैं कभी सीना तान कर और गर्दन उठा कर नहीं चल सका। बहुत दिनों तक समझ नहीं आता था कि मैं अपने ख़ानदान के तथकथित महापुरुषों से अलग क्यों हो गया। मेरे ददिहाल से लेकर ननिहाल तक मेरे पूरे ख़ानदान में मेरे जैसा गोबर पुरुष (घर वालों के हिसाब से) कोई नहीं था। 

(ऐसा मैंने सुना है कि) मेरे पितामह के डर से, जब वे राह से निकलते थे, लोग घर में घुस जाते थे। दादाजी, पिता जी, और चाचा जी सबने कमोबेस अपने ख़ानदान का नाम उजागर किया था। ननिहाल का भी यही हाल था, एक से बढ़कर एक सूरमा उधर भी थे। ऐसे बाहुवलियों के ख़ानदान में मैं एक ऐसा गोबर पैदा हुआ था जो लोगों से पिटकर आ जाता था। माँ बहुत चिंतित रहती थी, “आज तक मेरा कोई भाई कभी किसी से पिटकर नहीं आया, पता नहीं यह किसके जैसा हो गया।” 
एक बार ऐसा हुआ कि मेरी लड़ाई एक टिड्डे जैसे लड़के से हो गई, बस संयोग कहिए कि मैंने उसे पटकनी देदी और उसके सीने पर चढ़ बैठा। पता नहीं कैसे मेरे पिता जी ने मुझे यह पुरुषार्थ का कार्य करते हुए कहीं से देख लिया। उसके बाद से महीनों तक लोगों के सामने मेरे इस पराक्रम का गुणगान करते रहते थे। लेकिन जल्द ही फिर मैं जब कहीं से पिट कर आ गया तो उन्होंने लोगों को गाथा सुनानी बंद करदी। 
घर वालों की अपेक्षाओं पर खड़ा न उतर पाने की वजह से मैं काफ़ी चिंतित रहता था। मेरे सारे रिश्तेदार मेरी माँ से कहा करते थे, “आपका यह बेटा बोलता भी है? हमने कभी इसे बोलते नहीं सुना।” माँ बड़ा चिंतित रहती थी। ननिहाल में भी उसे सबसे मेरे व्यहार के बारे में सफ़ाई देनी पड़ती थी, “थोड़ा शांत है, पढ़ाई लिखाई करता है न इसीलिए थोड़ा अलग है, बड़ा होकर ठीक हो जाएगा।” 
एक बार तो एक आदमी ने मेरी माँ से यहाँ तक कह दिया कि “आपका बेटा मंदबुद्धि है क्या? इसे कभी और लड़कों की तरह बोलते या खेलते हुए कभी नहीं देखा।” कभी-कभी माँ इन सब चीज़ों को लेकर बहुत दुखी हो जाती थी। और मैं भी बड़ा परेशान रहता था। सोचा करता था कि मैं ऐसा क्यूँ हूँ..? 
2008 तक मेरे पास किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था। 2008 में 20 अक्टूबर को जब सन्यास लिया और साधना शुरू की तो धीरे-धीरे मुझे सारे प्रश्नो के उत्तर मिलने लगा। शुरू-शुरू में अपने सन्यासी हो जाने पर मुझे बड़ा अचरज होता था। समझ नहीं आता था कि अच्छा भला नॉर्मल इंसान इन सब चक्करों में कैसे फँस गया। लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें साफ़ होने लगी। फिर दिखने लगा कि शुरू से ही चीज़ें साफ़ थीं। ‘धम्मपद में जब बुद्ध से भिक्षुओं को कहते हुए सुना, “भिक्षुओं, राह पर चलते समय हमेशा गर्दन झुका कर रखो, तीन क़दम से आगे मत देखो।” तो, मैं रोने लगा। फिर समझ में आया कि ससुर मैं घंटों अकेले क्यूँ बैठा रहता था, कम क्यों बोलता था। पिट कर घर क्यों आता था। 
विवेकानंद से जब एक पत्रकार अमेरिका में पूछता है, “आप इतने अलग क्यों हैं?”, तो विवेकानंद हँसते हुए जवाब देते हैं, “मैं अलग नहीं हूँ, तुम सब एक जैसे हो ।” पहली बार जब मैं यह पढ़ा तो बड़ी देर तक हँसता रहा। 
मैं अलग नहीं था, I was a born monk. 🧘‍♂️

Tuesday, 18 September 2018

एक चिथड़ा सुख



मुझे याद है, बचपन में जब कभी बहुत देर बाद किताब पढ़ कर उठता था, या फिर लंबे समय तक बंद कमरे में बैठकर फिल्म देखने के बाद बहार निकलता था, तो ऐसा लगता था मनो दुनिया एक दम से बदल गई हो | सब कुछ नया-नया और अजनबी-सा लगने लगता था| ऐसा लगता था मनो हर चीज़ को पहली बार देख रहा हूँ | धीरे-धीरे यह एहसास कम होने लगा, और बाद में कब मैं इसको पूरी तरह से भूल गया पता भी नहीं चला | इधर जब 2007 में जब ध्यान में बैठना शुरू किया तो फिर से वैसा ही घटित होने लगा| एक घंटे के झाजेन के बाद जब बहार निकलता था, तो बहुत देर तक खोया-खोया रहता था, ऐसा लगता था मनो सब कुछ बहुत धीरे-धीरे घटित हो रहा हो | धीरे-धीरे अनुभव में आया कि ऐसा तब होता है, जब हम किसी चीज़ में कुछ देर के लिए पूरी तरह से खो जाते हैं, और फिर जब उससे बहार निकलते हैं, तो सब कुछ बदला-बदला-सा प्रतीत होने लगता है| दोपहर में कभी यदि आपको गहरी नींद आ जाए, और आप एकदम से शाम में उठें, तो इस चीज़ को आप बहुत ही सघनता से महसूस कर सकते हैं | इन दिनों यात्रा से लौट कर आने के बाद भी मुझे कई दिनों तक ऐसा ही महसूस होता रहता है| जब से माधोपुर से आया हूँ, ऐसा लग रहा जैसे मैं किसी अजनबी लोक में टहल रहा हूँ, कुछ भी ठीक से समझ नहीं आ रहा है|
                                                                      पृथ्वी थियेटर

अभी पीछे जब मुंबई गया था तो वहां पृथ्वी थियेटर के बुक शॉप से निर्मल वर्मा की एक किताब 'एक चिथड़ा सुख' खरीदा था| मुंबई में रहते हुए 90 पेज पढ़ा था, लेकिन यहाँ आकर जब आगे पढ़ना शुरू किया तो कुछ भी समझ में ही नहीं आ रहा था | 110 पेज तक जब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा, तो फिर से शुरू किया| आज शाम में किताब खत्म किया है| भीतर सब कुछ ठहरा-ठहरा लग रहा है| दादा जी के मरने के बाद कई दिनों तक ऐसा ही महसूस होता रहा था, न सुख, न दुःख, बस एक उदास और रिक्त खालीपन | एक तरह की उदास शांति | सत्य कल्पना सा प्रतीत हो रहा है, और कल्पना सत्य जैसा| 
                            "आगे इतनी संकरी जगह थी कि वहां से न सच गुज़र सकता था, न झूठ" 
                                                                          पृथ्वी थियेटर
कल (17, Sep 2018) सुबह 6:30 के क़रीब अहमदबाद पहुंचा | शिवरंजनी उतर कर BRT से रानिप आया| नित्य क्रिया से फारिग होने के बाद, कुणाल को कॉल किया| उस दिन जब हमें कुणाल बस में बिठाने आए थे, तब तय हुआ था कि माधोपुर से लौटने पर सुबह हम लोग 'शंभू' पर कॉफ़ी पिएंगे| जब मैंने कॉल किया, तब कुणाल ब्रश कर रहे थे, 'दस मिनट में पहुँचता हूँ' कह कर उन्होंने कॉल काट दिया| दस मिनट बाद जब उनका कॉल आया, तो उन्होंने हमें पांच मिनट के लिए बहार आने को कहा| मुझे यह समझ नहीं आया कि जब कॉफ़ी हाउस अंदर है, तो ख़ुद अन्दर आने के वजाए वो हमें बहार क्यों बुला रहे हैं| खैर, हम समान उठा कर बाहर आ गए| बहार आया तो दूर से देखा कि कुणाल एक खंभे के नीचे तीन गिलास निकाल कर उसमे बोतल से कुछ डाल रहे हैं| 'ससुर, ये क्या नौटंकी है', मैंने सोचा | जब पास पहुंचा तो देखा, वो घर से गुनगुने पानी में शहद और नींबू मिला कर लाए थे| यह बहुत ही सुन्दर सरप्राइज था| वहीं खंभे के नीचे बैठ कर हमने नींबू पानी पिया | 
नींबू पानी पीने के बाद हम कॉफ़ी पीने के लिए अन्दर आ गए| हमारे उम्मीद के विपरीत 'शम्भू-24' बंद था| बड़ा गुस्सा आया, 'फिर 24 hrs लिखने का क्या मतलब है? दिये गए नंबर पर हमने कॉल भी किया लेकिन किसी ने रिंग का जवाब नहीं दिया| गूगल की मदद से आसपास दूसरा कॉफ़ी हाउस ढूंढन शुरू किया, लेकिन कोई भी 9:30 से पहले ओपन नहीं हो रहा था| इतना लम्बा इंतजार मुश्किल था| बड़ी देर तक हम शम्भू के ओपन होने का इंतजार करते रहे, लेकिन 9 बजे तक शम्भू वाले का कभी कोई अता-पता नहीं था| अंत में हम बिना कॉफ़ी पिए ही 9:10 बस में बैठ गए| खुश था कि सुबह-सुबह नीबू-शहद मिला हुआ गुनगुना पानी पीने को मिला, उदास था कॉफ़ी पीने को नहीं मिला| बस में बैठते के साथ ही मैं बैग से किताब (एक चिथड़ा सुख) निकाल कर पढ़ने लगा| 
"कुछ लोग अपने अकेलेपन में काफी सम्पूर्ण दिखाई देते हैं- उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत महसूस नहीं होती| किन्तु बिट्टी में कोई ऐसा मुक म्मिलपन नहीं दिखाई देता था|- वह जैसे कहीं बीच रस्ते में 'ठिठकी-सी' दिखाई देती थी, जबकि दूसरे लोग आगे बढ़ गए हों| बीच में जो लोग ठहर जाते हैं, उनमे अकेलापन उतना नहीं, जितना अधूरापन दिखाई देता है|"  क्या मैं भी कॉफ़ी के बिना अधूरा हो गया था? 
                                                                रीडिंग 'एक चिथड़ा सुख' @ माधोपुर
कुछ समझ नहीं आ रहा है, कुछ से कुछ लिख रहा हूँ| अभी-अभी निर्मल वर्मा की चार और किताब की आर्डर दी है| ऐसे में ग़ालिब याद आ रहे हैं 'बक रहा हूँ जुनूं में क्या-क्या कुछ, कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई' विचारों की गति इतनी धीमी हो गई है कि कुछ भी ठीक से सोच नहीं पा रहा हूँ| नियम से जब इस तरह का कोई भाव भीतर पैदा हो तो उसे पहले जी लेना चाहिए, ऐसे में लिखने की जल्दी करना बेवकूफी है| लेकिन फिर सोचता हूँ अगर कहीं सच में सिफर हो गया तो लिखेगा कौन? इसीलिए जो भी समझ में आ राह है, अनापसनाप लिख दे रहा हूँ| क्या पता इस शून्य से कभी बहार ही न निकल पाऊं | भागते भूत की लंगोट ही सही| 

किताब की शुरुआत निर्मल कामू की एक कोट से करते हैं, 
"There is always a part of man that refuses love. It is the part that wants to die. It is the part which needs to be forgive." 

और किताब के अंत में कहीं कहते हैं, "उसको रह-रहकर बाबू की बात याद हो आती- बिट्टी की ज़िन्दगी में दखल मत देना; वहां ऐसे रहना, जैसे तुम हो ही नहीं| होकर भी नहीं होना, पिछले तीन महीनो में उसने यह सीखा है, कोशिश की है कि अपने को एक सिफर में बदल डाले, उस बंद घड़ी की सुई की तरह, जो एक जगह ठहर जाति है; हिलाओ तो भी नहीं हिलती| "

जैसे ही मैं  यह लाइन पढ़ता हूँ मुझे Max Ehrmann की Desiderata याद आ जाती है| 
    Go placidly amid the noise and haste,
    and remember what peace there may be in silence.

    निर्मल को पढ़ना मृत्यु को जीने जैसा है| किताब समाप्त होने के बाद कुछ, जो आपके भीतर था, हमेशा के लिए मर जाता है| आप थोड़े रिक्त हो जाते हैं| इस रिक्ता को भरने का कोई उपाय नहीं है| शायद मृत्यु के अतरिक्त और कुछ इसे नहीं भर सकता है| 


    "एक लम्बी नोटबुक, जिसे माँ ने उसे बारहवीं वर्षगांठ पर दी थी | पहले पन्ने पर लिखा था- 'Write what you see, but what you see may not be right.' यह शायद उन्होंने हंसी में लिखा था, क्योंकि देखना गलत कैसे हो सकता है? तुम देखे को न समझो, यह बात दूसरी है, लेकिन एक बार देख लेने पर दुनिया एक कीड़े की तरह सुई की नोंक पर बिंध जाती है, तिलमिलाती है, लेकिन कोई उसे छुड़ा नहीं सकता| देखना तभी खत्म होता है, जब मरना होता है, और मरने पर भी आँखे खुली रहती हैं- जैसे माँ की आँखें थीं - कांच के दो कंचे- जिन पर दुनिया एक पथराई छाया की तरह चिपकी रहती है..." - एक चिथड़ा सुख

Monday, 17 September 2018

इंतज़ार तो खड़ा ही रहता है...

परसों (12, Sep, 2018) सुबह-सुबह उठकर जब ब्लैक कॉफ़ी पी रहा था, तो अनायास ही कहीं घूमने जाने का कीड़ा काटने लगा..। एक दो जगहों के बारे में सोचने के बाद, बिना बहुत सोचे हमने आनन-फ़ानन में बस से माधवपुर की टिकट बुक कर ली। टिकट बुक करने के बाद ख़याल आया कि इस रविवार से पहले तीन बेहद ज़रूरी काम को अंजाम देना था। कुछ घंटों बाद तो पच्चीस चीज़ें सामने उभर कर सामने आने लगी, लेकिन अब कुछ किया नहीं जा सकता था। बहुत गहरे में, टिकट कटाने से पहले ही मुझे पता था कि अगर तय करने में देर की तो मन कोई-न-कोई बखेड़ा ज़रूर खड़ा कर देगा। बहुत-सी उलझनो में एक उलझन यह भी था कि शनिवार को हमने zen cafe में एक बार फिर कॉफ़ी पीने का प्लान बनाया था (यह within month पाँचवा कॉफ़ी होने वाला था)। कॉफ़ी न पी पाने का बड़ा दुःख हो रहा था। ख़ैर...अब कुछ नहीं किया जा सकता था। 

इसीलिए, मैं सारे महत्वपूर्ण फ़ैसले जल्दबाज़ी में लेता हूँ, सोच-विचार कर सही निर्णय लेना क़रीब-क़रीब असंभव है।गुरजेईफ कहा करते थे, “शुभ करने की हमेशा जल्दी करना, और अशुभ को जितना हो सके उतना टालते जाना।” 
हमारी बस रात ११ बजे starबाज़ार, अहमदाबाद से थी। कुणाल को कॉल करके इत्तिला दिया कि हम ADI आ रहे हैं। कुणाल आजकल थिएटर कर रहे हैं, शाम सात बजे से वे थिएटर में व्यस्त हो जाते हैं।सो, उन्होंने थिएटर का हवाला देकर मिलने की असमर्थता जतलाई। सोचा था अगर कुणाल से मिलना हो पाता तो कॉफ़ी न सही लेकिन गन्ने का जूस ही पी लेता। 
थोड़ा मायूस था, ऐसे में ग़म ग़लत करने के लिए ग्रीन-टी तैयार करने लगा। पानी स्टोव पर रख कर, किचन में ही पंखे के नीचे बैठ गया, और पानी के गर्म होने का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर में पानी सिरसिराने लगा। पानी में खौल रहे अदरक और तुलसी की सुगंध से किचन सुवासित होने लगा। आँखें बंद कर के मैं गंध और आवाज़ को अपने भीतर आत्मसात करने लगा। तभी हॉल में रखे फ़ोन से आवाज़ आई “कुणाल कॉलिंग”, किचन से उठकर में हॉल में आया। जैसे ही कॉल उठाया उधर से कुणाल की आवाज़ आई, “सुनिये...मैंने थिएटर जाना केन्सल कर दिया है। आप २:३० की ट्रेन से अहमदाबाद आ जाइए, शाम 5-8 हम Zen-Cafe पर बैठेंगे, फिर रात में कहीं खाना खाएँगे, और अंत में मैं आपको बस स्टैंड छोड़ दूँगा।” कुणाल के फ़ोन रखने के बाद मैं सोचने लगा,” यह आदमी कितना बड़ा नशेड़ी है, कॉफ़ी के चक्कर में थिएटर छोड़ रहा है।” मैं यह सब सोच ही रहा था कि पीछे कुर्सी में कुछ चुभने लगा। अचानक ऐसा लगने लगा कि जैसे कुर्सी में समा नहीं पा रहा हूँ। उत्सुकतावस मैंने पीछे मुड़ कर देखा....OMG मेरी बाँछें खिल गई थी..!!!!
चित्र साभार- गूगल

तो, जैसा कि तय हुआ था हम 2:30 की ट्रेन (जो कि आई 3 बजे और चली तीन दस पर) पकड़ कर ठीक 5 बजे साबरमती पहुँचे। अगर ट्रेन समय से होती तो हम 4:15 तक सबरमती पहुँच चुके होते। ट्रेन पूरे रास्ते जहाँ-तहाँ रुकते हुए आई थी। मैं बड़ा बेचैन रहा था, कभी बैठ जाता था, तो कभी गेट पर आ कर बाहर झाँकने लगता था। भीतर बार-बार गीत चतुर्वेदी जी की एक पंक्ति, “बैठ कर किए गए इंतज़ार में भी, इंतज़ार तो खड़ा ही रहता है।”, दुहराए जा रहा था। ख़ैर, साबरमती से मैंने ओला बुक किया और हम अख़बारनगर आ गाए।5 मिनट के इंतज़ार के बाद स्कूटर हड़हराते हुए कुणाल हाज़िर हुए। भाग करके हम गन्ने का जूस पीने के लिए गए। रास्ते भर हम इसी बात का अफ़सोस करते रहे कि अब हमें कॉफ़ी हाउस में एक घंटा कम बैठने को मिलेगा। इस बात का मलाल हमें पहले दिन से रहा है कि कॉफ़ी हाउस इतनी जल्दी क्यूँ बंद हो जाता है। 8 बजे कोई बंद होने का टाइम है। एक घंटा तो हमें सेटल होने में लग जाता है। तीन घंटा से कम बैठने का कोई मतलब नहीं है। इसीलिए हमारी कोशिश रहती है कि किसी भी सूरत पर हम 5 बजे तक कॉफ़ी हाउस पहुँच जाएँ, ताकि हमें तीन घंटे बैठने का मौक़ा मिले।

गन्ने वाले के यहाँ पहुँच कर हमने चार ग्लास रस का ऑर्डर दिया। जब से कॉफ़ी हाउस में बैठना शुरू किया है तभी से गन्ने का रस पीना रिचूअल जैसा बन गया है। जहाँ से हम जूस पीते हैं वहाँ की कुछ विशेषताएँ है- यहाँ गन्ने को पेरा नहीं जाता है, बल्कि अंगूर की तरह पूरे गन्ने को मशीन में डाल कर जूस निकाला जाता है। स्टिक को पहले से ही वे फ़्रीज़ में रखते हैं, इसीलिए अलग से बर्फ़ डाल कर जूस को ठंडा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। पूरे गन्ने का जूस होने की वजह जूस का स्वाद बहुत ही बेहतरीन हो जाता है। एक तरह का हरापन होता है स्वाद में, जो आपको वैसे पूरे गन्ने को दाँत से चूसने पर ही मिल सकता है। 
जूस पीने के बाद हम ट्रैफ़िक के सभी नियमों का उल्लंघन करते हुए तीर की तरह कॉफ़ी हाउस पहुँचे। जब कुणाल गाड़ी पार्क कर रहे थे, घड़ी में ठीक 6 बज रहा था, यानी हम पूरे एक घंटा लेट थे..शिट..! 
हमारे पसंदीदा टेबल पर एक जोड़ा पहले से बैठा हुआ था। हम थोड़े मायूस हुए...ख़ैर मन मसोस कर हम अपनी-अपनी पसंदीदा कुर्सी पर बैठ गए, टेबल की तरह हम सबका अपना-अपना पसंदीदा कुर्सी भी है। अपने सामने हमने अपनी-अपनी किताबें रखी-एक चिथड़ा सुख, courage और अडल्ट्री। थोड़ी देर बैठने के बाद कुणाल ने राजूभाई को कॉल करके हमारा ऑर्डर दिया “3 Cappuccino”. 10 मिनट बाद एक नया लड़का जिसे हम नाम से नहीं जानते हैं कॉफ़ी लेकर आया। हम झाग के ऊपर बने दिल को कम्पेर करने लगे कि किसका दिल ज़्यादा नुमाया है। 
At कॉफ़ी हाउस 
दो घूँट सुड़कने के बाद जान में जान आई। आधी कॉफ़ी समाप्त होते-होते भीतर का सारा ऊहापोह शांत हो गया। अंदर बस एक ही नाद उठ रहा था ‘कॉफ़ीयम ब्रह्म’....! 7:30 पर हमने zen टी का ऑर्डर दिया। zen टी के आते-आते हम ब्रह्म चर्चा में पूरी तरीक़े से डूब चुके थे। बार-बार बस दाग़ साहब को दोहराए जा रहे थे,

“वो और होंगे तेरी महफ़िल से उभरने वाले, हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए” ।
चित्र साभार- गूगल
"Never trust anyone who doesn't drink coffee."

-AJ Lee
कॉफ़ी हाउस से निकल कर हम डोसा खाने के लिए गए। रास्ते में TP से बचने के लिए रेड लाइट से पहले कुणाल हमें उतार देते थे। बीच में जब-जब हमें मौक़ा मिलता था, हम कॉफ़ी हाउस पर किए गए डिस्कशन का सिरा फिर से पकड़ लेते थे। कॉफ़ी हाउस पर हमने कई मुख़्तलिफ़ मुद्दों पर चर्चा की थी। सारी बात-चीत का हासिल यह निकला कि हमने अपने शग़ल को विस्तार देने का निर्णय लिया। पाँच बैठक के बाद हमें यह साफ़ हो गया था कि इस युग में अगर कहीं बुद्धत्व घट सकता है, तो वह है कॉफ़ी हाउस।काफ़ी घमर्थन के बाद हमने यह तय किया कि अपने जैसे और लोगों को हमें इससे जोड़ना चाहिए। इसी सिलसिले में हमने यह तय पाया कि zen टी ध्यान का आयोजन किया जाय। फिर हम इसकी रूपरेखा के बारे में काफ़ी देर तक तजकिरा करते रहे। 
चित्र साभार- गूगल
डोसा हाउस पहुँच कर मैंने अपने लिए रवा चीज़ मसाला डोसा ऑर्डर दिया, कुणाल और दिव्या ने मैसूर डोसा मँगाया। उनके डोसे का स्वाद मेरे डोसे बेहतर था। खाने के मामले में मेरा निर्णय अक्सर ग़लत निकलता है। 
डोसा हाउस से निकल कर हम रीवर फ़्रंट गए। घड़ी में सवा नौ बज रहा था। रीवर फ़्रंट पहुँच कर कुणाल ने बताया कि दिन में कोई ऊटपटाँग जूस पी लेने की वजह से ऊन के पेट में भयंकर गैस बन रहा है। हम तत्काल गैस की समस्या से निजात पाने की कोशिश में लग गए। पहले कुछ देर ब्रजासन में बैठे, फिर गूलगल की मदद से एक्यूप्रेसर points का पता करके उसको दबाने लगे। इन सब कवायत से थोड़ा लाभ तो हुआ लेकिन पूर्ण आराम नहीं मिला। फिर हम नदी किनारे टहलने लगे। टहलते-टहलते कुणाल की कुछ शाश्वत समस्या पर बात-चीत होती रही। कुणाल को मैं पिछले तीन साल से जानता हूँ, डे वन से उनकी सुई एक ही जगह अँटकी हुई है। इसीलिए जब भी हम मिलते हैं घूम-फिर कर दिन में एक बार तो उनकी समस्या के बारे में बात हो ही जाती है। उनकी समस्या क्या है, यह अभी आपको नहीं बताऊँगा, इसके बारे में कभी तफ़सील बात करेंगे। टहलते-टहलते हम जगह पर भी गए जहाँ से पिछले साल मेरे दोस्त की भाभी ने कूद कर आत्महत्या ली थी। 
दस बजे रीवर फ़्रंट बंद हो जाता है। वहाँ से हम सीधा बस स्टैंड के लिए निकले। रास्ते में कुणाल ने गैस की दवाई ख़रीदी, मैंने भी सफ़र के लिए एक दो सामान लिया। बस स्टैंड पहुँच कर हमने बस का पता किया फिर id का फ़ोटो कॉपी करवाने के लिए दूकान ढूँढने लगा। सुबह जब माधोपुर, पवन स्वामी को, कॉल किया तो उन्होंने ख़ास हिदायत दी थी कि सभी आगंतुकों के पास अपने id प्रूफ़ का फ़ोटो कॉपी होना चाहिए। लेकिन रात को साढ़े दस बजे सारी दूकाने बंद हो गयी थी। सुबह 8 बजे हम माधोपुर पहुँचने वाले थे, इतनी सुबह वहाँ भी कुछ हो पाना मुश्किल था। ख़ैर, हमने सोचा कि पवन स्वामी से मोहलत ले कर हम कल दिन में कहीं से फ़ोटो कॉपी करवा लेंगे। 
इस बीच कुणाल को प्रेसर आ गया, वे भाग कर पासवाले बाथरूम में गए। थोड़ी देर बाद उनका कॉल आया, “यहाँ पानी नहीं है, आप कहीं से एक बोतल पानी ख़रीद कर ले कर आइये...peeeuh!” 
बाथरूम बहुत ही ज़्यादा गंदा था। गेट के नीचे बने छेद से मैंने कुणाल को पानी दे दिया। बाहर आ कर मैं किसी साफ़ बाथरूम की तलाश करने लगा। जबतक कुणाल बाथरूम से आए, बस का टाइम हो गया था। हमें see off करने के बाद कुणाल चले गए। हम अपने भीतर एक मुकम्मल सुकून का अनुभव कर रहे थे। कॉफ़ी हाउस पर जो एक घंटा कम मिला था, उसकी कमी हमने रीवर फ़्रंट पर पूरी कर ली थी। किसी चीज़ का कोई मलाल नहीं था। 
At Coffee House 
”Three hundred years ago, during the Age of Enlightenment, the coffee house became the center of innovation."
-Peter Diamonde
चित्र साभार- गूगल
कुणाल के जाने के पाँच मिनट बाद, अपने निर्धारित समय से बीस मिनट लेट, बस अहमदाबाद से चली। चलती बस में मैंने ड्रेस चेंज किया और सोने की कोशिश करने लगा। 
काफ़ी देर तक बस के अंदर की लाइट जलती रही थी। ज़रा भी रोशनी हो तो मुझे नींद नहीं आती है। मुझे हैरानी होती है उन लोगों पर जो लाइट जला कर सोते हैं। खजुराहो से लौटते समय बस में हुए भयानक अनुभव (पानी के बोतल का मुँह काट कर उसमें पेशाब करना पड़ा था, इस अनुभव का ज़िक्र ‘खजुराहो की खोज’ में मैंने विस्तार से किया है) के बाद अब मैं बस में बैठने से पहले काफ़ी कम पानी पीता हूँ। लेकिन चीज़ डोसा खाने की वजह से कंठ बहुत सूख रहा था। पानी पीने से बड़ा डर लग रहा था। बस कंठ को गीला करने के लिए एक घूँट पी लेता था। बड़ी देर बाद जब लाइट बंद हुई तो मैं सो पाया। अभी ठीक से सो भी नहीं पाया था कि आवाज़ आने लगी, “अभी दस मिनट के लिए बस यहाँ रुकेगी, जिनको फ़ारिग़ होना है, हो लें।” नीचे जाने जैसा लग नहीं रहा था, लेकिन सोचा हो आना ही सही रहेगा। फ़ारिग़ होने के बाद ढाबे के आगे लगी दूकान से एक दो चीज़ें ख़रीदी, एक पैकेट सिकंदर का मूँगफली, एक डब्ब हींग गोली (कुणाल का गैस ठीक करते-करते मुझे ख़ुद गैस बनने लगा था) और एक पैकेट रामलड्डू। 
सारा सामान लेकर हम बस के अंदर आ गाए। बाहर से आने के बाद अंदर बड़ी गर्मी लगने लगी। मैंने बाहर वाला शीशा खोल दिया। पाँच मिनट बाद बस चलने गई। ठंडी हवा सनसनाते हुए चेहरे पर लग रही थी। डोलते-डोलते कब नींद आ गयी पता ही न चला। सुबह जब आँख खुली तो पाया ठंड की वजह से नाक बंद हो गयी और बालों पर धूल की एक परत जमी हुई थी। मोबाइल में समय देखा 6:30, मतलब माधोपुर आने में अभी एक घंटा और लगना था। दस मिनट तक फिर से सोने की असफल कोशिश करने के बाद उठ कर बैठ गया और किताब पढ़ने लगा। 7:15 बजे अपनी सीट से उतर कर संचालक की केबिन तक गया और उन्हें आगाह किया कि हमें माधोपुर ओशो आश्रम के सामने उतरना है। संचालक से मिल कर जब लौट रहा था तो अचानक मेरी निगाह एक यात्री पर अटक गयी। उनके चेहरे पर पसरे शांति को देख कर मुझे लगा संभवत वे एक सन्यासी हैं, और वे भी हमारे साथ ही उतरेंगे। स्टॉप आने पर मेरा यक़ीन सच सावित हुआ, वे हमारे साथ ही उतरे। बस से उतर कर जब मैं एक स्थानीय दुकानदार से राह पूछने लगा, तो वे मेरे पास आ गए और मुझे गाइड करने लगे। बाद में जब वे क़दम-क़दम पर हमें गाइड करने लगे तो मजबूरन मुझे उन्हें बताना पड़ा कि मैं पहले भी एक बार यहाँ आ चुका हूँ, हालाँकि मैं उनके मदद करने की भावना को ठेस नहीं पहुँचना चाहता था। 
बस स्टॉप से आश्रम की दूरी बस एक मिनट की है। सुबह-सुबह वेल्कम-सेंटर बंद था। पूछने पर पता चला कि वेल्कम प्रवचन के बाद खुलेगा। फिर याद आया कि last टाइम जब हम आए थे, तब भी ऐसा ही हुआ था। हमने वेल्कम के बाहर सामान रख दिया और वहीं पास बने बाथरूम में फ़्रेश होने के लिए चले गए। नित्यक्रिया से निवृत होने के बाद हम किचन में नाश्ता करने गए। हालाँकि प्रवचन के लिए हम लेट हो रहे थे। सुबह के प्रवचन का टाइम 8:30 है। नियम से नाश्ता हमें प्रवचन से लौट कर आने के बाद करना चाहिए था। लेकिन पिछली बार के अनुभव के बाद मैं सुबह के प्रवच में जाने के बहुत पक्ष में नहीं था। पिछली बार 2015 में जब हम सत्यम स्वामी के साथ आए थे, तो बस ने हमें ठीक अपने ठीक समय पर 7:30 बजे छोड़ दिया था। (इस बार बस 20 मिनट लेट चली थी, सो पहुँचने में भी आधा घंटा देर से पहुँची। ) प्रवचन के समय से पहले हम तैयार हो गए थे। भगवान (स्वामी ब्रह्म वेदांत जी) के आने से पहले हम बुद्ध हॉल में पहुँच गए थे। लेकिन जैसे ही प्रवचन शुरू हुआ मुझे भयंकर नींद आने लगी। पूरा समय नींद से लड़ने में ही गुज़र गया था। इस बार भी मुझे पता था, ऐसा ही होने वाला था। इसीलिए नाश्ते को टालना मैंने उचित नहीं समझा। नाश्ता करने के बाद जब प्रवचन के लिए निकले तो घड़ी में 9 बज रहा था।

At माधवपुर
किचन से निकल कर जब बुद्ध हॉल की तरफ़ जा रहा था, तो रास्ते में एक जगह सही राह पहचानने में दिक़्क़त होने लगी। लेकिन थोड़े से शुरुआती स्ट्रगल के बाद पुरानी सारी यादें फिर से ताज़ा हो गई। रास्ते में जब एक जन से पूछा कि प्रवचन कहाँ चल रहा है, तो रास्ता बताते हुए उसने कहा, “लेकिन आप जब तक पहुँचेंगे तब तक प्रवचन समाप्त हो चुका होगा।” और हुआ भी ऐसा ही। हमारे पहुँचने के एक मिनट बाद ही प्रवचन समाप्त हो गया। तीन साल में भगवान में कुछ ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा था। इन फ़ैक्ट मैं बड़ा हैरान हुआ यह देख कर कि पिछले तीन साल में आश्रम में कुछ भी नहीं बदला था। 
बुद्ध सभागार से जब हम लौट कर आए, तो वेल्कम सेंटर खुल गया था। पवन स्वामी भी तीन साल में बिलकुल भी नहीं बदले थे। एंट्री करने के बाद जब पहचान पत्र देने की बारी आई, तो मैं अपनी फ़ोटो कॉपी न करा पाने की असमर्थता की दास्ताँ उनको सुनाई। मेरी कहानी सुनकर उन्होंने बड़े ही सहज भाव से मुझसे कहा, “कोई नहीं, वहाँ नहीं हो पाया तो यहाँ हो जाएगा, दिन में यहाँ करा लीजिएगा।” 
रजिस्ट्रेशन के बाद हम अपना बिस्तर लेकर अपने कमरे में आ गए। नींद इतनी आ रही थी कि दोपहर, 12:30, के प्रवचन में भी नहीं जा पाया। 1:45 पर खाना खाने गया। किचन में भी सब कुछ वैसा-का-वैसा था। खाने बाद हम थोड़ी देर तक टहलते रहे, फिर कमरे पर आ गए। रास्ते में किसी ने बताया शाम में 5:30 स्टडी होता है। सो, स्टडी में जाने का तय करके फिर से सो गए। 
सुबह जिस सभागार में प्रवचन हुआ था, स्टडी उसी में होना। हम समय से 10 मिनट पहले ही पहुँच गए थे। धीरे-धीरे पूरा हॉल भर गया। कुछ मित्र अपने साथ किताब लेकर आए थे। ठीक 5:30 पर भगवान की पोती आई, और सामने रखे माईक के पास बैठ गयी। थोड़ी देर बाद एक और महानुभाव आए और दूसरी माइक के पास बैठ गए। दोनो ने अपनी-अपनी किताबें खोली। पहले भगवान की पोती ने अपनी किताब में से एक लाइन अंग्रेज़ी में पढ़ा, फिर सामने वाले महानुभाव ने उसका गुजराती अनुवाद किया और साथ ही उसकी व्याख्या भी की। मुझे स्टडी का यह तरीक़ा बहुत ही सतही और अनावश्यक लगा। 
गुरजेईफ को समझने का यह तरीक़ा देख कर मुझे पी.D ओस्पेनसकी की याद आ गई, वे भी गुरजेईफ से अलग होने के बाद श्यामपट पर लोगों को सत्य समझाते थे। यह बहुत ही कुरूप था। 
स्टडी के तुरंत बाद, भगवान के घर पर ‘संगीत’ होने वाला था। सब लोग सभागार से उठ कर वहीं चले गए। 
भगवान को गाते हुए सुनना एक चमत्कार को अपनी आँखों के सामने घटते हुए देखना है। यह एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में नहीं समेटा जा सकता है। वो कान, कान नहीं है जिसने ब्रह्म वेदांत जी को गाते हुए नहीं सुना है। 
भगवान को मोबाइल पर बात करते हुए देख कर मैं बड़ा रोमांचित हो उठा था। सोचने लगा, क्या बुद्ध (गौतम बुद्ध) ने कभी इस बात की परिकल्पना की होगी कि भविष्य में कोई बुद्ध इस तरह से मोबाइल पर बात कर रहा होगा??

At माधवपुर

Thursday, 6 September 2018

उन लोगों में बाँट दीजिए, जो आज भूखें हैं

अर्थ(धन) की दृष्टि से मनुष्य के तीन प्रकार हैं-
अमीर- अमीरी का कोई भी संबंध इस बात से नहीं है कि आपके पास कितना है| अमीरी का संबंध खर्च करने की क्षमता से है| अगर आप महीने में एक लाख कमाते हैं, और पूरा का पूरा खर्च कर देते हैं, कल के लिए कुछ भी बचा कर नहीं रखते हैं,तो आप अमीर है| आमतौर पर धन के बढ़ने के साथ ही लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो जाती है.. मतलब जैसे-जैसे धन बढ़ता है, वैसे-वैसे धन को खर्च करने की क्षमता कम होने लगती है| अमीर कल की चिंता नहीं करता है, उसकी आमदनी और खर्च दोनों सम्यक होता है, एक सामंजस्य होता है| वह जितना कमाता है, उतना खर्च कर देता है.. कल के लिए कुछ भी बचा कर नहीं रखता है| अगर वह पाता है, उसे आज जितने की जरूरत है, उससे ज्यादा उसके पास है, तो वह अपने अतिरिक्त धन को उन लोगों में बाँट देता है, जिनके पास नहीं है| कल के लिखे वह कुछ भी बचा कर नहीं रखता है|
"आई मौज फकीर की , दिया झोपड़ा फूंक"
गरीब- गरीब वह इंसान होता है- जिसकी खर्च करने की क्षमता क़रीब-क़रीब खत्म हो चुकी है| गरीब आदमी अगर एक लाख रुपया कमेगा, तो वह दस हज़ार खर्च करेगा और 90 हज़ार बचा कर रख लेगा| इन्हीं लोगों की वजह से दुनियां में हजारों लोग भूखे मर रहे हैं| लाखों लोगों के आज को बर्बाद करके गरीब अपने कल को सुरक्षित रखते हैं|


"धन इकठ्ठा करना पाप है| आज अगर आपके पास ज़रूरत से ज्यादा है, तो उसे कल के लिए मत बचाइये, उन लोगों में बाँट दीजिए, जो आज भूखें हैं|"

मंदबुद्धि- ये वे लोग हैं जो एक लाख कमाते हैं, और सवा लाख खर्च करते हैं| मतलब 25 हज़ार का कर्जा कर लेते हैं| जितना नुकसान गरीब समाज को पहुंचता है, उतना ही ये लोग भी पहुंचाते हैं| इसीलिए कभी किसी को कर्ज न दें, कर्ज देना और लेना दोनों पाप है| अगर आपके पास अधिक हैं तो उनके साथ शेयर करें जिनके पास नहीं है... कर्ज देकर कभी किसी की मदद न करें.. अमीर आदमी न तो कभी किसी से कर्ज लेता है, और न ही कभी किसी को कर्ज देता है...! वह सिर्फ बांटना जानता है.. सिर्फ गरीब लोग कर्ज देते हैं... और मंदबुद्धि कर्ज लेते हैं...


ज़रूरत से ज्यादा कुछ भी पाप है

इस संसार को मैंने जैसा पाया है, जाते-जाते इसे उससे थोड़ा और सुंदर करके जाना चाहता हूँ| इस प्रयास में कुछ चीजें जो मैं कर रहा हूँ, उसकी जानकारी आपको देना चाहता हूँ...शायद आपके किसी काम आजाए...!
1. जनसंख्या वृद्धि में मैं किसी भी प्रकार का कोई सहयोग नहीं कर रहा हूँ| मेरा ऐसा मानना है कि अगले बीस साल तक इस दुनिया में एक भी बच्चा पैदा नहीं होना चाहिए|  जार्ज गुरजिएफ  ने पाप की परिभाषा देते हुए कहा है, "ज़रूरत से ज्यादा कुछ भी पाप है"| इस हिसाब से आज 'बच्चा पैदा करने से बड़ा पाप और कोई भी नहीं है'| विश्व की जनसंख्या 1 अरब से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और अभी यह संख्या 10 अरब के क़रीब है| 

नोट- सब के माँ-बाप की तरह मेरे माता-पिता की भी यह ख्वाहिश है कि वे मरने से पहले अपने पोते/पोती का मुंह देख लें, लेकिन विश्व हित का ध्यान रखते हुए मैं उनकी यह ख्वाहिश कभी पूरा नहीं करूँगा| 

2. जनसंख्या के बाद जो सबसे अहम् चीज़ है, वह है 'पर्यावरण'| कहीं आने-जाने के लिए मैं 'साइकल' या पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करता हूँ| मेरे घर में न तो AC है, न ही टीवी, फ्रिज़, और वाशिंग मशीन है| साल के किसी भी महीने में मेरा बिजली बिल 300 से ज्यादा नहीं आता है|

3. सरकार ने आज प्लास्टिक बंद किया है, लेकिन मैं पिछले 4 साल से घर से छोला लेकर सामान खरीदने जाता हूँ|
4. फिलहाल मैं किराये के मकान में रह रहा हूँ, और संभवतः हमेशा किराए के मकान में ही रहूँगा| लेकिन यदि कभी अपना घर बनाया, तो मेरा घर आम के पेड़ से ऊँचा नहीं होगा| मेरे घर में टाइल्स नहीं होगा, अनावश्यक लकड़ी का फर्नीचर नहीं होगा| अभी जिस घर में रह रहा हूँ, उसमे भी फर्नीचर के नाम पर चार कुर्सियां हैं बस| जमीन पर चटाई बिछा कर सोता हूँ|
5. पिछले दो साल से मैंने कपड़े की ख़रीदारी क़रीब-क़रीब बंद कर दिया है| एक जींस बनाने में हजारों लीटर पानी लगता है| जल्द ही मेरे पास सिर्फ दो जोड़ी कपड़े होंगे, जब तक फट नहीं जाता दूसरा नहीं लूँगा|
6. पिछले तीन साल से वृक्षारोपण कर रहा हूँ| पिछले साल ख़ुद के पैसे से हमने अपने शहर में कोई 100 पेड़ लगाए थे| इस साल भी इस दिशा में प्रयास जारी है| 'i do my bit' के नाम से पिछले दो साल से हम वृक्षारोपण अभियान में सक्रीय हैं|
7. मेरी आर्थिक स्थिति बहुत ही अच्छी है, 30 से 50 हज़ार रूपया हर महीने घर बैठे-बैठे बड़े आराम से कमा लेता हूँ| (जिस शहर में मैं रहता हूँ वहां के लिए तीस हजार रुपया बहुत होता है, जैसा घर आपको यहाँ 4 हजार में मिल जाता है, वैसा आपको दिल्ली मुंबई में 2 लाख में भी नहीं मिलेगा) एसी, कार, टीवी, फ्रिज, बाइक, और वाशिंग मशीन सब अफ़्फोर्ड कर सकता हूँ| लेकिन अपनी कमाई का 70% मैं किताब और घूमने में खर्च करता हूँ| सेविंग क़रीब-क़रीब जीरो है.. सेविंग के नाम पर हर महीने 5 हज़ार बचाता हूँ| साल के अंत में जब ६०००० इकठ्ठा जो जाता है, तब एक लंबी छुट्टी पर निकल जाता हूँ| एकाध महीने में साकिम बन कर लौट आता है| कोई LIC नहीं है, मेडिकल इंश्योरेंस नहीं है| यह सब आपको इसलिए बताया ताकि आप यह समझ सकें कि 'इक्कट्ठा करने की प्रवृति' और जरूरत से ज्यादा कमाना पाप है| आपको शायद इल्म नहीं होगा कि अपने भविष्य को सुरक्षित करने के चक्कर में आप कितने लोगों को भूखे मार रहे हैं|
9. उपवास नहीं करता हूँ, लेकिन पहले जितना खाता था, अब उसके आधे से भी कम खाता हूँ| उम्मीद करता हूँ कि जितना अन्न मैं बचा रहा हूँ, उससे किसी का पेट भर रहा होगा|
10. यह मेरा अजीब सा नाम इस बात का सूचक है कि मैं जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की सीमाओं से खुद को तोड़ देना चाहता हूँ| मेरा नाम से न तो आप मेरे जाति का पता लगा सकते हैं, और न ही मेरे धर्म का|
11- अंतिम बात- अपनी जीवन संगनी का चुनाव मैंने अपनी मर्ज़ी से किया था| और मेरी मर्ज़ी जाति, धर्म, क्षेत्र, देश और दहेज की लोभ से मुक्त थी| 

नोट- यहाँ भी मेरे पिताजी और माँ की इच्छा थी कि मैं उस्न्की मर्जी से 'शरीक-ए-हयात' का चुनाव करूँ, वे भी चाहते थे कि उनको दहेज़ मिले| मैं एक ऐसे खानदान से ताल्लुक रखता हूँ जहाँ मुर्ख और पढ़े लिखे सब समान है| मैंने अपने खानदान के डॉक्टर, इंजीनियर,CA, BA MBA, गवर्नमेंट जॉब वाले, प्राइवेट जॉब वाले, भैस चराने वाले और अनपढ़-मुर्ख सबको दहेज लेकर शादी करते हुए देखा है| ऐसे में बिना दहेज़ लिए और अपनी मर्ज़ी से 'पार्टनर' का चुनाव करना मेरे लिए कतई आसान नहीं था| 

Thursday, 26 July 2018

राग दरबारी

किताब का नाम- 'राग दरबारी' , लेखक - श्रीलाल शुक्ल 


पढ़कर आदमी पढ़े-लिखे लोगों की तरह बोलने लगता है | बात करने का असली ढंग भूल जाता है”- राग दरबारी

साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल की किताब ‘राग दरबारी’ एक क्लासिक उपन्यास है, जिसे आज से ठीक पचास वर्ष पूर्व 1968 में पहलीबार राजकमल प्रकाशन ने छापा था | तब से, आज तक किताब की पांच लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी है| “मोटीतौर पर उपन्यास गावं की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत्त करता है | शुरू से आखिर तक इतने निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिंदी का शायद यह पहला वृहत उपन्यास है|”

“चुनाव के चोंचले में कुछ नहीं रखा है | नया आदमी चुनो, तो वह भी घटिया निकलता है | सब एक-जैसे हैं| इसी से मैंने कहा, जो जहाँ है, उसे वहां चुन लो | पड़ा रहे अपनी जगह | क्या फ़ायदा है उखाड़-पछाड़ करने से ! चुनाव लड़नेवाले प्रायः घटिया आदमी होते हैं, इसीलिए एक नए घटिया आदमी द्वारा पुराने घटिया आदमी को, जिसके घटियापन को लोगों ने पहले से समझ-बूझ लिया है, उखाड़ना न चाहिए |”राग दरबारी

क्लासिक के बारे में कुछ भी कहना पिटी लकीर को पीटने जैसा होता है| किताब के बारे में पहले ही इतना कुछ कहा और सुना जा चुका है कि आप चाह कर भी कुछ नया नहीं कह सकते हैं | बचपन में प्रेमचंद मेरे पसंदीदा लेखक थे| मानसरोवर की शायद ही ऐसी कोई कहानी होगी जिसे मैंने न पढ़ा हो | लेकिन समय के साथ प्रेमचंद से मेरा लगाव थोड़ा कम हो गया | अब दो चार कहानियों को छोड़ कर मैं आमतौर पर प्रेमचंद को पसंद नहीं करता हूँ | शुरुआत के 17 साल गाँव में बिताने के कारण आंचलिक कथा कहानियों से मेरा वेशेष लगाव होना स्वाभाविक है | रेणु की ‘मैला आंचल’ मेरी पसंदीदा किताबों में से एक है| लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि तीन बार की कोशिश के बाद भी मैं आज तक उसे पूरा नहीं पढ़ पाया हूँ| राही मसूम रज़ा की ‘आधा गाँव’ 5 साल से मेरी स्टडी में चित पड़ा है | कई बार पढ़ने की कोशिश की लेकिन सौ पेज से अधिक कभी नहीं पढ़ पाया | 2006 के बाद ‘राग दरबारी’ हिंदी की दूसरी ऐसी उपन्यास है जिसे मैंने पूरा पढ़ा है| इससे पहले अज्ञेय की ‘नदी के द्वीप’ को कुछ दिन पहले समाप्त किया था| ‘नदी के द्वीप’ के बाद हिंदी पर से खोई आस्था फिर से वापिस लौट आई  है| इस बीच आचार्य चतुरसेन की ‘वैशाली की नगरवधू’ भी शुरू की थी, लेकिन 160 पेज के बाद किताब को मोड़ कर रख दिया|

अक्सर मुझे हिंदी के लेखक बचकाने और भेड़ चाल के हिस्से लगते हैं | और हिंदी लेखकों में जिस चीज़ की सबसे अधिक कमी होती है वह है ‘मौलिकता’ | और भूल से यदि कभी कोई लेखक ‘मौलिक’ होने की कोशिश करता है तो वह ‘छिछली’ बातें करने लगता है| बाबा तुलसीदास के बाद हिंदी में आज तक कोई ठीक से प्रतिभाशाली उपन्यासकार पैदा नहीं हो पाया |

“मुझे इन डायरेक्टर से कोई उम्मीद नहीं है | जिस किसी की दुम उठाकर देखो, मादा ही नज़र आता है |”राग दरबारी


खैर, यहाँ मैं आपसे ‘राग दरबारी’ की बात कर रहा था | मेरे लिए राग दरबारी ‘एक यथार्थवादी’ उपन्यास है | ऐसा पहलीबार हुआ है कि एक किताब के सभी पत्रों के साथ मैं ‘रिलेट’ कर पाया | किताब का एक भी पात्र काल्पनिक नहीं है | भारतीय समाज का ऐसा सटीक चित्रण इससे पहले मैंने कहीं नहीं देखा था | पहले पृष्ट से लेकर अंतिम पृष्ट तक किताब आपको बाँध कर रखती है | और हैरानी की बात है कि पूरे किताब में शुक्ल जी ने एक बार भी ‘रोमांच, रोमांस, अतिशयोक्ति, ड्रामा, सस्पेंस, सेक्स और सतही हास्य जैसी बाजारू चीज़ों का सहारा नहीं लिया है | इस सबसे भी बड़ी बात यह है कि किताब में कोई कहानी नहीं है | किताब एक अंतहीन प्रवाह की भांति है जिसमे सिर्फ 'बहते चले जाना' अपने आप में एक आनंद है | किताब समाप्त होने पर ऐसा नहीं लगता है कि कोई कहानी समाप्त हुई हो, कुछ भी समाप्त नहीं होता है | शिवपालगंज आज भी अपनी जगह मौजूद है| छोटे पहलवान आज भी अपनी मूंछो पर ताव देते हुए, अपने ख़ानदानी परम्परा अनुसार अपने बाप को पीटते हैं, सनीचर का प्रधानी अभी भी चल ही रहा है, रुप्पन बाबू आज भी भांग पीकर बेला के घर के चारो ओर चक्कर लगा रहे हैं| जैसे समुन्दर का पानी कहीं से भी चखने पर खारा ही लगता है, वैसे ही किताब को आप कहीं से भी खोल कर पढ़ सकते हैं, हर पृष्ट, हर दृश्य आपको अन्दर से गुदगुदा जाएगा |  

“असल झगड़ा अठन्नी का नहीं, उधर पहलवान की ओर से है | ये गंजजहे जब अठन्नी के लिए झायं-झायं कर रहे थे तो उधर से पहलवान बोले कि भाई, इस झगड़े में हमारा दिया हुआ रुपिया न भूल जाना| अब देने को तो इन्होने एक छदम भी नहीं दिया और कह रहे हैं कि हमारा रुपिया न भूल जाना | क्या ज़माना आ गया है!”राग दरबारी

अगर मेरी तरह आपकी जड़े भी किसी गाँव से जुड़ी है, और रोजीरोटी की जुगाड़ में वर्षों से शहर में रह रहे हैं, तो इस किताब को जरूर पढ़िए | यह किताब आपके उपर पड़ी शहरी संस्कार की धूल को छाड़ कर आपको फिर से नया कर देगी | किताब पढ़ते समय ऐसे हजारों शब्द और सैकड़ों कहवतों से आपका सामना होगा, जिन्हें आप कब के भूल चुके हैं| वर्षो से अंग्रेज़ी बोलते-बोलते अकड़ चुकी आपकी जीभ, उन पावन शब्दों और मुहावरों के उच्चारण से सीधी हो जाएगी |

“कल का जोगी, चूतड़ तक जटा | सनीचर को देखो, देखते-देखते मंगलप्रसाद बन गए”- राग दरबारी

पचास साल पहले के हिंदुस्तानी ग्राम्य जीवन के बारे में लिखी गई यह किताब आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उस समय थी | “जैसे-जैसे उच्चयस्तरीय वर्ग में ग़बन, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और वंशवाद अपनी जड़े मज़बूत करता जाता है, वैसे-वैसे आज से चालीस वर्ष पहले का यह उपन्यास प्रासंगिक होता जा रहा है |” -श्रीलाल शुक्ल और मैं ऐसा मानता हूँ कि अगले पचास सालों तक भी इस किताब की प्रासंगिकता खत्म नहीं होगी | जिस तरह घोंघे की रफ़्तार से हम बदल रहे हैं, सौ साल भी कम ही लगता है | और यदि कभी समाज बदल भी गया तो अपनी ख़ूबसूरती के कारण ‘राग दरबारी’ को अनंत काल तक एक धरोहर की तरह रखा जाएगा | और साहित्य प्रेमी अपने अतीत में झाँकने और उसका रस्वादन करने के लिए इसे पढ़ते रहेंगे | अंत में आपसे यही कहूँगा कि किसी भी कीमत पर शुक्लजी की इस कालजयी रचना का आनंद लेने से न चुकें | और किताब पढ़ने के बाद नीचे कमेंट में हमें जरूर बताएं कि किताब आपको कैसी लगी |

“वजह यह है कि जैसे बुद्धिमत्ता एक वैल्यू है, वैसे ही बेवकूफ़ी भी अपने-आपमें एक वैल्यू है | बेवक़ूफ़ की बात चाहे तुम काट तो, चाहे मान लो, उससे उसका न कुछ बनता है, न बिगड़ता है | वह बेवक़ूफ़ है और बेवक़ूफ़ रहता है | इसीलिए मेरी आदत पड़ गई है कि बेवक़ूफ़ को कभी न छेड़ो |” - राग दरबारी




Tuesday, 24 July 2018

The Perils of Being Moderately Famous

किताब- द पेर्लिस ऑफ़ बीइंग मॉडरेटली फेमस, लेखक- सोहा अली खान


2014 में जब जॉब छोड़ कर मेहसाना आया था, तो यही सोचा था कि 3 महीने आश्रम में रह कर कहीं और चला जाऊंगा| लेकिन 3 महीना कब तीन साल हो गया पता ही नहीं चला| पिछले साल जनवरी में आश्रम से भी निकल गया, लेकिन फिर भी मेहसाना नहीं छुटा| 2016 में जब धर्मशाला गया था, तो वहां मेक्लोड़गंज से ऊपर बाकसू बहुत पसंद आया था| बाकसू से भी उपर धर्मकोट के पास बाकसू नाग में रहने के लिए एक घर भी देखा, सोचा आश्रम से निकल कर यहीं रहने आऊंगा| सब कुछ क़रीब-क़रीब तय था लेकिन फिर अंत में ठंड की डर से बाकसू में रहने के प्लान रद्द कर दिया| उस के बाद से अचेतन रूप से नई जगह की तलाश करता रहा| कभी माउंट आबू, कभी दाहोद, कभी मनाली, कभी सागर, कभी अजमेर, कभी रणकपुर, कभी ऋषिकेश, कभी अमृतसर, कभी वलसाड, खेडब्रह्मा, तो कभी गोवा| अभी इस साल जब जनवरी में गोवा गया, तो वहां जगह ढूँढने की बहुत कोशिश की, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी| अंत में 16 दिन गोवा में बिता कर वापिस आ गया|
गोवा से आने के बाद घूमने और जगह दूंढने का सारा जोश ठंडा हो गया था, सोचा शायद अस्तित्व नहीं चाहता है कि हम मेहसाना से बाहर निकले| गोवा के बाद कई बार कई जगह जाने का प्लान बनाया लेकिन ऐन मौके पर सब रद्द हो जाता था| काफी जद्दोजहद के बाद, एक बार होली से बचने के लिए खेडब्रह्मा गया और आम खाने के वलसाड| वलसाड से आने के बाद घूमने का कीड़ा फिर से खून में दौड़ने लगा| वलसाड यात्रा काफी सफल रही थी| आम खाने के साथ-साथ दमन और नारगोल जाने का भी मौका मिला|
                                  वलसाड 
वलसाड से आने के बाद, अपने एक सन्यासी मित्र, जो मेहसाना आश्रम से निकलने के बाद पिछले दो साल से देहरादून में रह रहे हैं, से मैंने देहरादून के बारे में बात की| उन्होंने दून की काफी तारीफ की, उनकी बातों से प्रभावित होकर मैंने यह तय किया अब मेहसाना छोड़ कर देहरादून में शिफ्ट हो जाना है| लेकिन मेरे मित्र ने आग्रह किया कि मेहसाना छोड़ने से पहले मुझे एक बार देहरादून कुछ दिनों के लिए आना चाहिए सिर्फ देखने के लिए| मुझे उनकी बात जंची, शिफ्ट करने से पहले एक बार देहरादून देख लेना उचित लगा|

मैंने 6 जुलाई की टिकट बुक की| मेहसाना से निकलने से पहले सोचा कि 10 दिन के क़रीब देहरादून में रहूँगा, और जगह देखूंगा, फिर वहां से मसूरी जाऊंगा, वहां दस दिन रहूँगा, फिर मसूरी से ऋषिकेश आ जाऊंगा| ऋषिकेश में कुछ दिन रह कर योग सीखूंगा, फिर वहां  से दिल्ली होते हुए मेहसाना आ जाऊंगा| और फिर अनुभव के आधार पर तय करूँगा कि कहाँ रहना है, देहरादून में या फिर ऋषिकेश में, या फिर मसूरी में|
                                   नरगोल 
इसी तरह की ख़याली खिचड़ी पकाते हुए 7 जुलाई की शाम देहरादून पहुंचा| पिछली यात्राओं का यह अनुभव रहा था कि सफ़र में किताब पढ़ना न के बराबर ही हो पाता है, इसीलिए सफर में ज्यादा किताब लेकर जाने का कोई मतलब नहीं है| वैसे भी ‘नदी के द्वीप’ के बाद से मेरे किताब पढ़ने का सिलसिला टूट सा गया था| जिस रात नदी के द्वीप पूरा किया, उसी सुबह से जीवन में एक उलझन शुरू हो गई| उस उलझन को सुलझते-सुलझते दो महीने का वक़्त लग गया| इन दो महीनो में बमुश्किल दो या तीन किताब समाप्त कर पाया| पढ़ना कम हुआ तो परिणाम स्वरूप लिखना भी कम हो गया| लेकिन देहरादून के लिए निकलने से पहले-पहले तक सब कुछ ठीक हो चुका था| जीवन क़रीब-क़रीब पहले की तरह अपने पुरानी लीक पर आ गई थी| सो, सोचा लम्बी छुट्टी पर जा रहा हूँ, क्या पता पढ़ने का मौका मिल ही जाए, इसीलिए चलने से पहले चार किताबें अपने साथ ले लिया| एक कामू की किताबों का संग्रह लिया, जिसमे कामू की चार किताबें हैं, दूसरी श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ ली, तीसरी सोहा अली खान की ‘द पेर्लिस ऑफ़ बीइंग मॉडरेटली फेमस’ और चौथी डेल कार्नेगी की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल’ लिया| सोचा भीड़-भाड़ में सोहा और कार्गेगी को पढूंगा, और शान्ति के क्षणों में श्रीलाल शुक्ल और कामू को पढूंगा|
देहरादून में नौ दिन काफी अच्छा बीता| मैं क्लेमेंट टाउन में बुद्धा टेम्पल के पास एक गेस्टहाउस में रह रहा था| जहाँ मैं रह रहा था वहीँ से थोड़ी दूर पर ‘ओशो आश्रम’ भी था| एक दिन वहां भी ध्यान करने गया| प्लान था कि कुछ दिन आश्रम में भी बिताऊंगा, लेकिन फिर बाद में आश्रम में रहने का आइडिया तर्क कर दिया|
                                    देहरादून
देहरादून की हरियाली से मैं काफी मुतासिर हुआ| लोग भी कभी अच्छे लगे| रोज़ शाम घूमने के लिए बुद्धा टेम्पल पर जाता था| जहाँ मैं रह रहा था, उसके पास में ही एक आर्मी कैंप था, जिसके अन्दर एक काफी सुन्दर झील था| झील के अन्दर मछलियों का अम्बार था, बत्तख भी बहुत सारे थे| बुद्धा टेम्पल पर वक़्त बीताने के बाद रोज़ शाम मैं झील के किनारे अपने सन्यासी मित्र के साथ चक्कर लगाने के लिए चला जाता था| दिल्ली बम्बई की तरह देहरादून के युवकों और युवतियों में भी फिटनेस को लेकर काफी क्रेज़ देखा|
एक दिन हम चार बजे के क़रीब झील पर पहुंचे| तब मैंने एक युवक को पीली टीशर्ट में दौड़ कर झील का चक्कर लगाते देखा| उस वक़्त में झील के किनारे रखे बैंच पर बैठकर मछलियों के क्रीड़ा का आनंद ले रहा था| जब चार बार वो युवक मेरे सामने से गुज़रा, तो मैं उसे नोटिस करने लगा| क्योंकि दौड़ कर झील का चार चक्कर लगा देना मेरे लिए बड़ी बात थी| मैंने सोचा लगता है आज यह दस चक्कर लगा देगा| और ऐसा हुआ भी मेरे देख-देखते ही उसने दस चक्कर लगा दिया| और हैरानी की बात यह थी कि दस के बाद भी वह दौड़ता रहा| काफी देर तक उसे दौड़ता हुआ देखने के बाद मेरे अन्दर जोश आ गया| मैं बैंच से उठा और चप्पल उतार कर मिलंदी सोमन की तरह नंगे पैर ही दौड़ना शुरू कर दिया| एक चक्कर पूरा करते-करते मेरी हालत ख़राब हो गई| थक कर मैं फिर से बैंच पर आकर बैठ गया| एक घंटा से ज्यादा हो चुका था, वह युवक अब भी दौड़ रहा था| अंत में थक कर मैं वहां से चला गया| एक घंटे बाद जब लौटा, तो मैं हैरान रह गया, वह युवक अब भी दौड़ रहा था| मैं उसके विषय में जानने के लिए काफी उत्सुक हो गया, और तय किया कि इसके रुकने तक यहीं इंतज़ार करूँगा| हमारे एक घंटे के इंतज़ार के बाद उसने अपनी गति थोड़ी धीमी की और धीमी गति से क़रीब दस चक्कर लगाने के बाद दौड़ना बंद किया| मैं लपक कर उसके पास गया और पूछा ‘भाई यह तीन घंटे तक लगातार तुम कैसे दौड़ लेते हो?’, “यह तो कुछ भी नहीं है, मैं सुबह भी इतना ही दौड़ता हूँ”, उसने कान से लीड हटाते हुए बोला|” ‘एंअ...’ मेरे मुंह से बस इतना निकला|
देहरादून के मौसम में नमी थी, दिन में कहीं निकलना संभव नहीं था| इसीलिए घूमने टहले का सारा कार्यक्रम हम सुबह और शाम में ही रखते थे| 7 तारिख को शनिवार की शाम हम देहरादून पहुंचे थे, रविवार विश्राम में बीता था| शाम में बस थोड़ी देर के लिए टहलने निकले थे| सोमवार से लेकर शुक्रवार तक हमने अपना ज्यादा समय क्लेमेंट टाउन के आस-पास ही बिताया| बस एक दिन शुद्ध शहद की खोज में जंगल की तरफ गया था| दोपहर का पूरा समय या तो सो कर बिताया या फिर किताब पढ़ कर| सोते-सोते जब थक जाता था तो किताब पढ़ लेता था, और किताब पढ़ते-पढ़ते जब थक जाता था, तो सो लेता था| शुक्रवार तक रुटीन लाइफ बिताने के बाद हमने शनिवार को एक स्कूटी किराए पर लिया और उसमे तेल भरा कर थोड़ी साईट सीइंग की| पहले दिन ‘डाकुओं की गुफा’, FRI और ‘शिखर फॉल’ देखने गया| ‘शिख़र फॉल’ का अनुभव काफी अभूतपूर्व रहा| दूसरे दिन सहस्त्रधारा पर नहाने में काफी आनंद आया|
                                     मसूरी
सोमवार की सुबह देहरादून में नौ दिन बिताने के बाद हम मसूरी आ गए| मसूरी शिमला और नैनीताल से काफी मिलताजुलता लगा| देहरादून में नौ दिन गर्मी झेलने के बाद, मसूरी में हमने काफी राहत महसूस की| सब कुछ बहुत ही सुन्दर लगा, लेकिन भीड़ की वजह से एक दिन बिताने के बाद ही थोड़ी उब पकड़ने लगी| दो दिन बिताने के बाद हमने मसूरी से मूव करने का तय किया| इन दो दिनों में पढ़ने का ज्यादा समय नहीं मिला| बस रात सोने से पहले राग दरबारी का कुछ पेज पढ़ लेता था| तय यह था कि हम मसूरी से ऋषिकेश जाएँगे और वहां योग सीखेंगे| लेकिन जब मैं देहरादून में था तब मेरे मित्र ने मुझे ‘धनौलटी’ के बारे में बताया था, “बहुत ही सुन्दर छोटा सा हिलस्टेशन है, समय और मौसम साथ दे तो वहां ज़रूर जाइएगा, एक दो दिन रहने जैसा है”| ‘धनौलटी’ मसूरी से 35 किलोमीटर दूर है| गाड़ी से एक घंटा लगता है| बकौल गूगल हमें पता चला कि धनौलटी मसूरी से ज्यादा सुन्दर है, और वहां ठंड भी ज्यादा है| फिर काफी चिन्तन-मनन के बाद हमने यह तय कि एक दिन हम धनौलटी में रुकेंगे और फिर वहां से चंबा, जोकि धनौलटी से 30 की.मी. की दूरी पर है,  जाएँगे, वहां भी एक दिन रुकेंगे| फिर ऋषिकेश जाएँगे और वहां योग सीखेंगे|
18 जुलाई की सुबह आज से 6 दिन पहले हम दोपहर 1 बजे के क़रीब मसूरी से धनौलटी पहुंचे| और पहुँचते के साथ ही दो घंटे के भीतर हमें धनौलटी से गहरा प्यार हो गया| हमने  सोचा कि यहाँ कम-से-कम दो या तीन दिन तो ज़रूर रुकना चाहिए| अगले दिन सुबह जब उठे, तो हमने तय किया कि यहाँ कम-से-कम एक महीना तो रुकना ही चाहिए| अब एक महीने का तो पता नहीं लेकिन इस महीने के अंत तक तो हम यहीं हैं| पिछले चार सालों से जिस जगह की अचेतन रूप से मैं तलाश कर रहा था, संभवतः यह वही जगह है| न भीड़, न शोर, न प्रदूषण, न ट्राफिक और न ही धूल मिट्टी|
                                     धनौलटी 
एक अभूतपूर्व शांति और सौदर्य से आबद्ध यह जगह किसी स्वप्नलोक से कम नहीं है| जहाँ मैं रह रहा हूँ मार्किट वहां से कोई 3 किलोमीटर की दूरी पर है| रेसॉर्ट से मार्किट जाना एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में नहीं समेटा जा सकता है| प्रकृति का ऐसा सामीप्य मुझे पहले कभी उपलब्ध नहीं हुआ था| पहाड़, बादल, वृक्ष, और पंछी सब दस्तरस है| एक ऐसा देश जहाँ तिल रखने की भी जगह न हो, वहां एक ऐसी जगह में रहना जगहं दिन भर में मुश्किल एक या दो आदमी का दर्शन हो, काफी रोचक बात है|
                                        धनौलटी

देख रहा हूँ कि मैं लेख के मूल उदेश्य से काफी भटक गया हूँ| इन अध्यात्मिक बातों को यहीं विराम देता हूँ| अल्डोउस हक्सले की पत्नी लारा हक्सले ने एक बार किसी इंटरव्यू में एलन वाट्स से कहा था, “आप के लेक्चर का टाइटल कुछ होता है, और आप बोलते कुछ हैं|” ऐसा ही कुछ मुझे अपने लेखों में महसूस होता है, लिखना कुछ शुरू करता हूँ, और लिख कुछ और ही देता हूँ| तो अपने सोहा अली खान की किताब ‘The perils of being moderately famous’ की बात करने जा रहा था| यह तो मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि यात्रा पर जिन चार किताबों को मैं आपने साथ लेकर आया हूँ, उनमे से एक सोहा की किताब भी है| हालाँकि सोच कर यह आया था कि यात्रा के दौरान भीड़-भाड़ में इस किताब को पढूंगा| लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं| देहरादून और मसूरी में जब भी वक्त मिला ‘राग दरबारी’ ही पढ़ा| यहाँ धनौलटी में भी राग दरबारी ही पढ़ता रहा हूँ| परसों स्वाद बदलने के लिए सोहा को शुरू किया| और कल रात किताब समाप्त हुई| नॉर्मली मेरी कोशिश रहती है कि दिन में कम-से-कम 100 पेज पढूं| लेकिन ‘नदी के द्वीप’ के बाद से पढ़ने की स्पीड काफी स्लो हो गई है| बमुश्किल दिन में 30 पेज पढ़ पाता हूँ| इस लिहाज से सिर्फ दो दिन में 210 पेज की किताब समाप्त कर देना, इस बात का सूचक है कि किताब अच्छी और इजी-रीड है| किताब के बारे में मैं कुछ भी निष्पक्ष होकर शायद ही कह पाऊं, क्योंकि बतौर अभिनेत्री सोहा को मैं काफी पसंद करता हूँ| फिर भी मैं कोशिश करता हूँ कि आपको निष्पक्ष जानकारी दे सकूँ| किताब पढ़ने से पहले मुझे इस बात का कोई भी इल्म नहीं था कि सोहा कितनी पढ़ी लिखी हैं| हां, उनके चरित्र चुनाव को देख कर ऐसा जरूर प्रतीत होता था कि लड़की समझदार है| किताब पढ़ कर सोहा और उनके परिवार के बारे में काफी कुछ जानने को मिला| एक जहग सोहा के अब्बू मोबाइल फोन के बारे में कहते हैं, I’ll turn it on when I want to call someone. It’s to make other people available to me, not to make me available to other people.”  यह बात मुझे जमी| इसी तरह किताब में एक जगह सोहा का एक दोस्त टॉम उनसे कहता है, The good traveler has no fixed plans, and is not intent on arriving.” टॉम की इस बात से मैं इत्तेफाक रखता हूँ| अगर मुझे किताब की रेटिंग करनी हो, तो दस में से इसे मैं 3 स्टार दूंगा|
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अगर आप भी मेरी तरफ सोहा अली खान के मद्दा हैं, तो आप इस किताब को पढ़ सकते हैं, किताब आपको अच्छी लगेगी| वैसे किताब अगर किताब न होकर ब्लॉग के रूप में आता तो मैं इसकी ज्यादा सराहना करता| सोहा ने बहुत ही संभल-संभल कर सब कुछ लिखा है| किताब बिलकुल ही ‘सब्जेक्टिव’ है| इसीलिए, अगर आप किताबों को लेकर काफी चूज़ी हैं, तो फिर इस किताब से ख़ुद को दूर रखें, आपके लिए किताब में कुछ भी नहीं है| अगर मैं सोहा का फैन नहीं होता, तो चार पेज पढ़ कर मैं किताब को कहीं दूर फेक देता| मुझे इस तरह की सब्जेक्टिव किताबें बिलकुल भी पसंद नहीं है| इन किताबों को मैं बस स्वाद बदलने के लिए पढ़ता हूँ|

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...