किताब- द पेर्लिस ऑफ़
बीइंग मॉडरेटली फेमस, लेखक-
सोहा अली खान
2014 में जब जॉब छोड़ कर
मेहसाना आया था, तो यही सोचा था कि 3 महीने आश्रम में रह कर कहीं और
चला जाऊंगा| लेकिन 3 महीना कब तीन साल हो गया पता ही नहीं चला| पिछले साल जनवरी
में आश्रम से भी निकल गया, लेकिन फिर भी मेहसाना नहीं छुटा| 2016 में जब धर्मशाला गया था,
तो वहां मेक्लोड़गंज से ऊपर बाकसू बहुत पसंद आया था| बाकसू से भी उपर
धर्मकोट के पास बाकसू नाग में रहने के लिए एक घर भी देखा,
सोचा आश्रम से निकल कर यहीं रहने आऊंगा| सब कुछ क़रीब-क़रीब तय था लेकिन फिर अंत में
ठंड की डर से बाकसू में रहने के प्लान रद्द कर दिया| उस के बाद से अचेतन रूप से नई
जगह की तलाश करता रहा| कभी माउंट आबू, कभी दाहोद, कभी मनाली, कभी सागर, कभी अजमेर,
कभी रणकपुर, कभी ऋषिकेश, कभी अमृतसर, कभी वलसाड, खेडब्रह्मा, तो कभी गोवा| अभी इस
साल जब जनवरी में गोवा गया, तो वहां जगह ढूँढने की बहुत कोशिश की, लेकिन सफलता हाथ
नहीं लगी| अंत में 16 दिन गोवा में बिता कर वापिस आ गया|
गोवा से आने के बाद घूमने और जगह दूंढने का सारा जोश ठंडा हो गया था, सोचा
शायद अस्तित्व नहीं चाहता है कि हम मेहसाना से बाहर निकले| गोवा के बाद कई बार कई
जगह जाने का प्लान बनाया लेकिन ऐन मौके पर सब रद्द हो जाता था| काफी जद्दोजहद के
बाद, एक बार होली से बचने के लिए खेडब्रह्मा गया और आम खाने के वलसाड| वलसाड से
आने के बाद घूमने का कीड़ा फिर से खून में दौड़ने लगा| वलसाड यात्रा काफी सफल रही थी|
आम खाने के साथ-साथ दमन और नारगोल जाने का भी मौका मिला|
वलसाड
वलसाड से आने के बाद, अपने एक सन्यासी मित्र, जो मेहसाना आश्रम से निकलने के
बाद पिछले दो साल से देहरादून में रह रहे हैं, से मैंने देहरादून के बारे में बात
की| उन्होंने दून की काफी तारीफ की, उनकी बातों से प्रभावित होकर मैंने यह तय किया
अब मेहसाना छोड़ कर देहरादून में शिफ्ट हो जाना है| लेकिन मेरे मित्र ने आग्रह किया
कि मेहसाना छोड़ने से पहले मुझे एक बार देहरादून कुछ दिनों के लिए आना चाहिए सिर्फ
देखने के लिए| मुझे उनकी बात जंची, शिफ्ट करने से पहले एक बार देहरादून देख लेना
उचित लगा|
मैंने 6 जुलाई की टिकट बुक की| मेहसाना से निकलने से पहले सोचा कि 10 दिन के
क़रीब देहरादून में रहूँगा, और जगह देखूंगा, फिर वहां से मसूरी जाऊंगा, वहां दस दिन
रहूँगा, फिर मसूरी से ऋषिकेश आ जाऊंगा| ऋषिकेश में कुछ दिन रह कर योग सीखूंगा, फिर
वहां से दिल्ली होते हुए मेहसाना आ जाऊंगा|
और फिर अनुभव के आधार पर तय करूँगा कि कहाँ रहना है, देहरादून में या फिर ऋषिकेश
में, या फिर मसूरी में|
नरगोल
इसी तरह की ख़याली खिचड़ी पकाते हुए 7 जुलाई की शाम देहरादून पहुंचा| पिछली
यात्राओं का यह अनुभव रहा था कि सफ़र में किताब पढ़ना न के बराबर ही हो पाता है,
इसीलिए सफर में ज्यादा किताब लेकर जाने का कोई मतलब नहीं है| वैसे भी ‘नदी के
द्वीप’ के बाद से मेरे किताब पढ़ने का सिलसिला टूट सा गया था| जिस रात नदी के द्वीप
पूरा किया, उसी सुबह से जीवन में एक उलझन शुरू हो गई| उस उलझन को सुलझते-सुलझते दो
महीने का वक़्त लग गया| इन दो महीनो में बमुश्किल दो या तीन किताब समाप्त कर पाया|
पढ़ना कम हुआ तो परिणाम स्वरूप लिखना भी कम हो गया| लेकिन देहरादून के लिए निकलने
से पहले-पहले तक सब कुछ ठीक हो चुका था| जीवन क़रीब-क़रीब पहले की तरह अपने पुरानी
लीक पर आ गई थी| सो, सोचा लम्बी छुट्टी पर जा रहा हूँ, क्या पता पढ़ने का मौका मिल
ही जाए, इसीलिए चलने से पहले चार किताबें अपने साथ ले लिया| एक कामू की किताबों का
संग्रह लिया, जिसमे कामू की चार किताबें हैं, दूसरी श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’
ली, तीसरी सोहा अली खान की ‘द पेर्लिस ऑफ़ बीइंग मॉडरेटली फेमस’ और चौथी डेल
कार्नेगी की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल’
लिया| सोचा भीड़-भाड़ में सोहा और कार्गेगी को पढूंगा, और शान्ति के क्षणों में श्रीलाल
शुक्ल और कामू को पढूंगा|
देहरादून में नौ दिन काफी अच्छा बीता| मैं क्लेमेंट टाउन में बुद्धा टेम्पल के
पास एक गेस्टहाउस में रह रहा था| जहाँ मैं रह रहा था वहीँ से थोड़ी दूर पर ‘ओशो
आश्रम’ भी था| एक दिन वहां भी ध्यान करने गया| प्लान था कि कुछ दिन आश्रम में भी
बिताऊंगा, लेकिन फिर बाद में आश्रम में रहने का आइडिया तर्क कर दिया|
देहरादून
देहरादून की हरियाली से मैं काफी मुतासिर हुआ| लोग भी कभी अच्छे लगे| रोज़ शाम
घूमने के लिए बुद्धा टेम्पल पर जाता था| जहाँ मैं रह रहा था, उसके पास में ही एक आर्मी
कैंप था, जिसके अन्दर एक काफी सुन्दर झील था| झील के अन्दर मछलियों का अम्बार था,
बत्तख भी बहुत सारे थे| बुद्धा टेम्पल पर वक़्त बीताने के बाद रोज़ शाम मैं झील के
किनारे अपने सन्यासी मित्र के साथ चक्कर लगाने के लिए चला जाता था| दिल्ली बम्बई
की तरह देहरादून के युवकों और युवतियों में भी फिटनेस को लेकर काफी क्रेज़ देखा|
एक दिन हम चार बजे के क़रीब झील पर पहुंचे| तब मैंने एक युवक को पीली टीशर्ट
में दौड़ कर झील का चक्कर लगाते देखा| उस वक़्त में झील के किनारे रखे बैंच पर बैठकर
मछलियों के क्रीड़ा का आनंद ले रहा था| जब चार बार वो युवक मेरे सामने से गुज़रा, तो
मैं उसे नोटिस करने लगा| क्योंकि दौड़ कर झील का चार चक्कर लगा देना मेरे लिए बड़ी
बात थी| मैंने सोचा लगता है आज यह दस चक्कर लगा देगा| और ऐसा हुआ भी मेरे देख-देखते
ही उसने दस चक्कर लगा दिया| और हैरानी की बात यह थी कि दस के बाद भी वह दौड़ता रहा|
काफी देर तक उसे दौड़ता हुआ देखने के बाद मेरे अन्दर जोश आ गया| मैं बैंच से उठा और
चप्पल उतार कर मिलंदी सोमन की तरह नंगे पैर ही दौड़ना शुरू कर दिया| एक चक्कर पूरा
करते-करते मेरी हालत ख़राब हो गई| थक कर मैं फिर से बैंच पर आकर बैठ गया| एक घंटा
से ज्यादा हो चुका था, वह युवक अब भी दौड़ रहा था| अंत में थक कर मैं वहां से चला
गया| एक घंटे बाद जब लौटा, तो मैं हैरान रह गया, वह युवक अब भी दौड़ रहा था| मैं
उसके विषय में जानने के लिए काफी उत्सुक हो गया, और तय किया कि इसके रुकने तक यहीं
इंतज़ार करूँगा| हमारे एक घंटे के इंतज़ार के बाद उसने अपनी गति थोड़ी धीमी की और
धीमी गति से क़रीब दस चक्कर लगाने के बाद दौड़ना बंद किया| मैं लपक कर उसके पास गया
और पूछा ‘भाई यह तीन घंटे तक लगातार तुम कैसे दौड़ लेते हो?’, “यह तो कुछ भी नहीं
है, मैं सुबह भी इतना ही दौड़ता हूँ”, उसने कान से लीड हटाते हुए बोला|” ‘एंअ...’
मेरे मुंह से बस इतना निकला|
देहरादून के मौसम में नमी थी, दिन में कहीं निकलना संभव नहीं था| इसीलिए घूमने
टहले का सारा कार्यक्रम हम सुबह और शाम में ही रखते थे| 7 तारिख को शनिवार की शाम
हम देहरादून पहुंचे थे, रविवार विश्राम में बीता था| शाम में बस थोड़ी देर के लिए
टहलने निकले थे| सोमवार से लेकर शुक्रवार तक हमने अपना ज्यादा समय क्लेमेंट टाउन
के आस-पास ही बिताया| बस एक दिन शुद्ध शहद की खोज में जंगल की तरफ गया था| दोपहर
का पूरा समय या तो सो कर बिताया या फिर किताब पढ़ कर| सोते-सोते जब थक जाता था तो किताब
पढ़ लेता था, और किताब पढ़ते-पढ़ते जब थक जाता था, तो सो लेता था| शुक्रवार तक रुटीन
लाइफ बिताने के बाद हमने शनिवार को एक स्कूटी किराए पर लिया और उसमे तेल भरा कर
थोड़ी साईट सीइंग की| पहले दिन ‘डाकुओं की गुफा’, FRI और ‘शिखर फॉल’ देखने गया| ‘शिख़र
फॉल’ का अनुभव काफी अभूतपूर्व रहा| दूसरे दिन सहस्त्रधारा पर नहाने में काफी आनंद
आया|
मसूरी
सोमवार की सुबह देहरादून में नौ दिन बिताने के बाद हम मसूरी आ गए| मसूरी शिमला
और नैनीताल से काफी मिलताजुलता लगा| देहरादून में नौ दिन गर्मी झेलने के बाद, मसूरी
में हमने काफी राहत महसूस की| सब कुछ बहुत ही सुन्दर लगा, लेकिन भीड़ की वजह से एक
दिन बिताने के बाद ही थोड़ी उब पकड़ने लगी| दो दिन बिताने के बाद हमने मसूरी से मूव
करने का तय किया| इन दो दिनों में पढ़ने का ज्यादा समय नहीं मिला| बस रात सोने से
पहले राग दरबारी का कुछ पेज पढ़ लेता था| तय यह था कि हम मसूरी से ऋषिकेश जाएँगे और
वहां योग सीखेंगे| लेकिन जब मैं देहरादून में था तब मेरे मित्र ने मुझे ‘धनौलटी’
के बारे में बताया था, “बहुत ही सुन्दर छोटा सा हिलस्टेशन है, समय और मौसम साथ दे
तो वहां ज़रूर जाइएगा, एक दो दिन रहने जैसा है”| ‘धनौलटी’ मसूरी से 35 किलोमीटर दूर
है| गाड़ी से एक घंटा लगता है| बकौल गूगल हमें पता चला कि धनौलटी मसूरी से ज्यादा
सुन्दर है, और वहां ठंड भी ज्यादा है| फिर काफी चिन्तन-मनन के बाद हमने यह तय कि
एक दिन हम धनौलटी में रुकेंगे और फिर वहां से चंबा, जोकि धनौलटी से 30 की.मी. की
दूरी पर है, जाएँगे, वहां भी एक दिन
रुकेंगे| फिर ऋषिकेश जाएँगे और वहां योग सीखेंगे|
18 जुलाई की सुबह आज से 6 दिन पहले हम दोपहर 1 बजे के क़रीब मसूरी से धनौलटी
पहुंचे| और पहुँचते के साथ ही दो घंटे के भीतर हमें धनौलटी से गहरा प्यार हो गया|
हमने सोचा कि यहाँ कम-से-कम दो या तीन दिन
तो ज़रूर रुकना चाहिए| अगले दिन सुबह जब उठे, तो हमने तय किया कि यहाँ कम-से-कम एक
महीना तो रुकना ही चाहिए| अब एक महीने का तो पता नहीं लेकिन इस महीने के अंत तक तो
हम यहीं हैं| पिछले चार सालों से जिस जगह की अचेतन रूप से मैं तलाश कर रहा था,
संभवतः यह वही जगह है| न भीड़, न शोर, न प्रदूषण, न ट्राफिक और न ही धूल मिट्टी|
धनौलटी
एक अभूतपूर्व शांति और सौदर्य से आबद्ध यह जगह किसी स्वप्नलोक से कम नहीं है|
जहाँ मैं रह रहा हूँ मार्किट वहां से कोई 3 किलोमीटर की दूरी पर है| रेसॉर्ट से
मार्किट जाना एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में नहीं समेटा जा सकता है| प्रकृति का ऐसा
सामीप्य मुझे पहले कभी उपलब्ध नहीं हुआ था| पहाड़, बादल, वृक्ष, और पंछी सब दस्तरस
है| एक ऐसा देश जहाँ तिल रखने की भी जगह न हो, वहां एक ऐसी जगह में रहना जगहं दिन
भर में मुश्किल एक या दो आदमी का दर्शन हो, काफी रोचक बात है|
धनौलटी
देख रहा हूँ कि मैं लेख के मूल उदेश्य से काफी भटक गया हूँ| इन अध्यात्मिक
बातों को यहीं विराम देता हूँ| अल्डोउस हक्सले की पत्नी लारा हक्सले ने एक बार
किसी इंटरव्यू में एलन वाट्स से कहा था, “आप के लेक्चर का टाइटल कुछ होता है, और
आप बोलते कुछ हैं|” ऐसा ही कुछ मुझे अपने लेखों में महसूस होता है, लिखना कुछ शुरू
करता हूँ, और लिख कुछ और ही देता हूँ| तो अपने सोहा अली खान की किताब ‘The perils of being moderately famous’ की बात करने जा रहा था| यह तो मैं आपको पहले ही बता चुका
हूँ कि यात्रा पर जिन चार किताबों को मैं आपने साथ लेकर आया हूँ, उनमे से एक सोहा
की किताब भी है| हालाँकि सोच कर यह आया था कि यात्रा के दौरान भीड़-भाड़ में इस
किताब को पढूंगा| लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं| देहरादून और मसूरी में जब भी वक्त मिला ‘राग
दरबारी’ ही पढ़ा| यहाँ धनौलटी में भी राग दरबारी ही पढ़ता रहा हूँ| परसों स्वाद
बदलने के लिए सोहा को शुरू किया| और कल रात किताब समाप्त हुई| नॉर्मली मेरी कोशिश
रहती है कि दिन में कम-से-कम 100 पेज पढूं| लेकिन ‘नदी के द्वीप’ के बाद से पढ़ने की
स्पीड काफी स्लो हो गई है| बमुश्किल दिन में 30 पेज पढ़ पाता हूँ| इस लिहाज से सिर्फ
दो दिन में 210 पेज की किताब समाप्त कर देना, इस बात का सूचक है कि किताब अच्छी और
इजी-रीड है| किताब के बारे में मैं कुछ भी निष्पक्ष होकर शायद ही कह पाऊं, क्योंकि
बतौर अभिनेत्री सोहा को मैं काफी पसंद करता हूँ| फिर भी मैं कोशिश करता हूँ कि
आपको निष्पक्ष जानकारी दे सकूँ| किताब पढ़ने से पहले मुझे इस बात का कोई भी इल्म
नहीं था कि सोहा कितनी पढ़ी लिखी हैं| हां, उनके चरित्र चुनाव को देख कर ऐसा जरूर
प्रतीत होता था कि लड़की समझदार है| किताब पढ़ कर सोहा और उनके परिवार के बारे में
काफी कुछ जानने को मिला| एक जहग सोहा के अब्बू मोबाइल फोन के बारे में कहते हैं, “I’ll turn it on when I want to call someone. It’s to make other people
available to me, not to make me available to other people.” यह बात मुझे जमी|
इसी तरह किताब में एक जगह सोहा का एक दोस्त टॉम उनसे कहता है, “The good traveler has no fixed plans, and is not intent on arriving.” टॉम की इस बात से मैं इत्तेफाक
रखता हूँ| अगर मुझे किताब की रेटिंग करनी हो, तो दस में से इसे मैं 3 स्टार दूंगा|
My होम at धनौलटी
अगर आप भी मेरी तरफ सोहा अली खान के मद्दा हैं, तो आप
इस किताब को पढ़ सकते हैं, किताब आपको अच्छी लगेगी| वैसे किताब अगर किताब न होकर
ब्लॉग के रूप में आता तो मैं इसकी ज्यादा सराहना करता| सोहा ने बहुत ही संभल-संभल
कर सब कुछ लिखा है| किताब बिलकुल ही ‘सब्जेक्टिव’ है| इसीलिए, अगर आप किताबों को
लेकर काफी चूज़ी हैं, तो फिर इस किताब से ख़ुद को दूर रखें, आपके लिए किताब में कुछ
भी नहीं है| अगर मैं सोहा का फैन नहीं होता, तो चार पेज पढ़ कर मैं किताब को कहीं
दूर फेक देता| मुझे इस तरह की सब्जेक्टिव किताबें बिलकुल भी पसंद नहीं है| इन
किताबों को मैं बस स्वाद बदलने के लिए पढ़ता हूँ|









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