किताब का नाम- 'राग दरबारी' , लेखक - श्रीलाल शुक्ल
“पढ़कर आदमी पढ़े-लिखे लोगों
की तरह बोलने लगता है | बात करने का असली ढंग भूल जाता है”- राग दरबारी
साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल की किताब ‘राग दरबारी’ एक
क्लासिक उपन्यास है, जिसे आज से ठीक पचास वर्ष पूर्व 1968 में पहलीबार राजकमल
प्रकाशन ने छापा था | तब से, आज तक किताब की पांच लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी
है| “मोटीतौर पर उपन्यास गावं की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की
मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत्त करता है | शुरू से आखिर तक इतने
निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिंदी का शायद यह पहला वृहत उपन्यास
है|”
“चुनाव के चोंचले
में कुछ नहीं रखा है | नया आदमी चुनो, तो वह भी घटिया निकलता है | सब एक-जैसे हैं|
इसी से मैंने कहा, जो जहाँ है, उसे वहां चुन लो | पड़ा रहे अपनी जगह | क्या फ़ायदा
है उखाड़-पछाड़ करने से ! चुनाव लड़नेवाले प्रायः घटिया आदमी होते हैं, इसीलिए एक नए
घटिया आदमी द्वारा पुराने घटिया आदमी को, जिसके घटियापन को लोगों ने पहले से समझ-बूझ
लिया है, उखाड़ना न चाहिए |” –राग दरबारी
क्लासिक के बारे में कुछ भी कहना पिटी लकीर को पीटने जैसा होता है| किताब के
बारे में पहले ही इतना कुछ कहा और सुना जा चुका है कि आप चाह कर भी कुछ नया नहीं कह
सकते हैं | बचपन में प्रेमचंद मेरे पसंदीदा लेखक थे| मानसरोवर की शायद ही ऐसी कोई
कहानी होगी जिसे मैंने न पढ़ा हो | लेकिन समय के साथ प्रेमचंद से मेरा लगाव थोड़ा कम
हो गया | अब दो चार कहानियों को छोड़ कर मैं आमतौर पर प्रेमचंद को पसंद नहीं करता
हूँ | शुरुआत के 17 साल गाँव में बिताने के कारण आंचलिक कथा कहानियों से मेरा वेशेष लगाव
होना स्वाभाविक है | रेणु की ‘मैला आंचल’ मेरी पसंदीदा किताबों में से एक है| लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि तीन बार की कोशिश के बाद भी मैं आज तक उसे पूरा नहीं पढ़
पाया हूँ| राही मसूम रज़ा की ‘आधा गाँव’ 5 साल से मेरी स्टडी में चित पड़ा है | कई
बार पढ़ने की कोशिश की लेकिन सौ पेज से अधिक कभी नहीं पढ़ पाया | 2006 के बाद ‘राग
दरबारी’ हिंदी की दूसरी ऐसी उपन्यास है जिसे मैंने पूरा पढ़ा है| इससे पहले अज्ञेय
की ‘नदी के द्वीप’ को कुछ दिन पहले समाप्त किया था| ‘नदी के द्वीप’ के बाद हिंदी पर से खोई
आस्था फिर से वापिस लौट आई है| इस बीच आचार्य चतुरसेन की ‘वैशाली की नगरवधू’ भी शुरू
की थी, लेकिन 160 पेज के बाद किताब को मोड़ कर रख दिया|
अक्सर मुझे हिंदी के लेखक बचकाने और भेड़ चाल के हिस्से लगते हैं | और हिंदी
लेखकों में जिस चीज़ की सबसे अधिक कमी होती है वह है ‘मौलिकता’ | और भूल से यदि कभी कोई
लेखक ‘मौलिक’ होने की कोशिश करता है तो वह ‘छिछली’ बातें करने लगता है| बाबा
तुलसीदास के बाद हिंदी में आज तक कोई ठीक से प्रतिभाशाली उपन्यासकार पैदा नहीं हो
पाया |
“मुझे इन डायरेक्टर
से कोई उम्मीद नहीं है | जिस किसी की दुम उठाकर देखो, मादा ही नज़र आता है |” – राग दरबारी
खैर, यहाँ मैं आपसे ‘राग दरबारी’ की बात कर रहा था | मेरे लिए राग दरबारी ‘एक यथार्थवादी’
उपन्यास है | ऐसा पहलीबार हुआ है कि एक किताब के सभी पत्रों के साथ मैं ‘रिलेट’ कर
पाया | किताब का एक भी पात्र काल्पनिक नहीं है | भारतीय समाज का ऐसा सटीक चित्रण
इससे पहले मैंने कहीं नहीं देखा था | पहले पृष्ट से लेकर अंतिम पृष्ट तक किताब
आपको बाँध कर रखती है | और हैरानी की बात है कि पूरे किताब में शुक्ल
जी ने एक बार भी ‘रोमांच, रोमांस, अतिशयोक्ति, ड्रामा, सस्पेंस, सेक्स और सतही
हास्य जैसी बाजारू चीज़ों का सहारा नहीं लिया है | इस सबसे भी बड़ी बात यह है कि किताब में कोई कहानी नहीं
है | किताब एक अंतहीन प्रवाह की भांति है जिसमे सिर्फ 'बहते चले जाना' अपने आप में एक आनंद
है | किताब समाप्त होने पर ऐसा नहीं लगता है कि कोई कहानी समाप्त हुई हो, कुछ भी समाप्त नहीं होता है | शिवपालगंज आज भी अपनी जगह मौजूद है| छोटे पहलवान आज भी अपनी मूंछो पर ताव देते हुए, अपने ख़ानदानी परम्परा अनुसार अपने बाप को पीटते हैं, सनीचर का प्रधानी अभी भी चल ही रहा है, रुप्पन बाबू आज भी भांग पीकर बेला के घर के चारो ओर चक्कर लगा रहे हैं| जैसे समुन्दर का पानी कहीं से भी चखने पर खारा ही लगता है, वैसे ही किताब को
आप कहीं से भी खोल कर पढ़ सकते हैं, हर पृष्ट, हर दृश्य आपको अन्दर से गुदगुदा
जाएगा |
“असल झगड़ा अठन्नी
का नहीं, उधर पहलवान की ओर से है | ये गंजजहे जब अठन्नी के लिए झायं-झायं कर रहे
थे तो उधर से पहलवान बोले कि भाई, इस झगड़े में हमारा दिया हुआ रुपिया न भूल जाना|
अब देने को तो इन्होने एक छदम भी नहीं दिया और कह रहे हैं कि हमारा रुपिया न भूल
जाना | क्या ज़माना आ गया है!” –राग दरबारी
अगर मेरी तरह आपकी जड़े
भी किसी गाँव से जुड़ी है, और रोजीरोटी की जुगाड़ में वर्षों से शहर में रह रहे हैं,
तो इस किताब को जरूर पढ़िए | यह किताब आपके उपर पड़ी शहरी संस्कार की धूल को छाड़ कर
आपको फिर से नया कर देगी | किताब पढ़ते समय ऐसे हजारों शब्द और सैकड़ों कहवतों से आपका
सामना होगा, जिन्हें आप कब के भूल चुके हैं| वर्षो से अंग्रेज़ी बोलते-बोलते अकड़
चुकी आपकी जीभ, उन पावन शब्दों और मुहावरों के उच्चारण से सीधी हो जाएगी |
“कल का जोगी, चूतड़
तक जटा | सनीचर को देखो, देखते-देखते मंगलप्रसाद बन गए”- राग दरबारी
पचास साल पहले के हिंदुस्तानी ग्राम्य जीवन के
बारे में लिखी गई यह किताब आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उस समय थी | “जैसे-जैसे
उच्चयस्तरीय वर्ग में ग़बन, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और वंशवाद अपनी जड़े मज़बूत करता
जाता है, वैसे-वैसे आज से चालीस वर्ष पहले का यह उपन्यास प्रासंगिक होता जा रहा है
|” -श्रीलाल शुक्ल और मैं ऐसा मानता हूँ कि अगले पचास सालों
तक भी इस किताब की प्रासंगिकता खत्म नहीं होगी | जिस तरह घोंघे की रफ़्तार से हम
बदल रहे हैं, सौ साल भी कम ही लगता है | और यदि कभी समाज बदल भी गया तो अपनी
ख़ूबसूरती के कारण ‘राग दरबारी’ को अनंत काल तक एक धरोहर की तरह रखा जाएगा | और
साहित्य प्रेमी अपने अतीत में झाँकने और उसका रस्वादन करने के लिए इसे पढ़ते रहेंगे
| अंत में आपसे यही कहूँगा कि किसी भी कीमत पर शुक्लजी की इस कालजयी रचना का आनंद
लेने से न चुकें | और किताब पढ़ने के बाद नीचे कमेंट में हमें जरूर बताएं कि किताब
आपको कैसी लगी |
“वजह यह है कि जैसे बुद्धिमत्ता एक वैल्यू है, वैसे ही
बेवकूफ़ी भी अपने-आपमें एक वैल्यू है | बेवक़ूफ़ की बात चाहे तुम काट तो, चाहे मान
लो, उससे उसका न कुछ बनता है, न बिगड़ता है | वह बेवक़ूफ़ है और बेवक़ूफ़ रहता है |
इसीलिए मेरी आदत पड़ गई है कि बेवक़ूफ़ को कभी न छेड़ो |” - राग दरबारी

बहुत खूब मित्र......प्रासंगिक उपन्यास की प्रासंगिक घटना की समीक्षा बहुत ही प्रासंगिकता के साथ की है...बधाई।
ReplyDelete:) उपन्यास पढ़ते समय तुम्हारी बहुत याद आई... रंगनाथ का किरदार तुमसे बहुत ही मिलता है...!!!
Deleteबहुत खूबसूरत लिखा है
ReplyDeleteक्या कहते हैं फिर? किताब मंगा कर पढ़ लीजिए मजा आजेगा... !
Deleteबहुत खूबसूरत लिखा है
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