प्रश्न- नमस्ते सर, आपकी बात सोच रहे थे, हम खुद को समझने और शांत करने के लिए क्या करें... हमें मैडिटेशन के बारे में भी कुछ पता नहीं... कुछ दिन ब्रह्मा कुमारी में जाते थे पर अब नहीं जाते... पता नहीं क्यों..| आप कुछ बताएं प्लीज्..!
ख़ुद को वही समझ सकता है, जो यह भलीभांति जान ले कि वह ख़ुद को नहीं समझता/जानता है| इसी तरह, जिसको शांति चाहिए उसे अपनी अशांति को ठीक से समझना होगा..| तो, आपको अपने को समझना नहीं है, आपको बस इतना समझना है कि आप अपने को नहीं समझती/जानती हैं| और जिस उपाय से हमें यह समझ आता है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, उसी को ही शास्त्रों में ध्यान/मैडिटेशन कहा गया है|
ध्यान से न तो शांति मिलती है, न ही हम ख़ुद को समझते हैं.. ध्यान से हमें बस इतना समझ में आता है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं| यह कहने में कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, और सच में ही यह जानना कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, में बड़ा भेद है| जिस दिन आपको पता चलेगा कि आप सच में ही ख़ुद को नहीं जानती हैं, आपके पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाएगी...पूरा जीवन ही कुछ और हो जाएगा...|
ध्यान हमें वस्तुस्थिति का बोध करता है| और जिसने यह जान लिया कि वह ख़ुद को नहीं जानता है, वह असल में बहुत कुछ जानता है| उपनिषद तो यहाँ तक कहते हैं कि वह सब कुछ जानता है, "यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥"
अशांति का बोध ही शान्ति का मार्ग है..| इसीलिए, शांति पाने से ज्यादा अशांति को समझने की कोशिश कीजिए...असल में शांति की बहुत ज्यादा चाह की वजह से ही हम कभी अशांति को नहीं समझ पाते हैं| अज्ञानी ज्ञान की चाह के कारण ही भटक जाता है| इन फैक्ट 'चाह' हमें भटकती है..| कुछ लोग, जो क्रोध से पीड़ित है, पूरी जिंदगी क्रोध से लड़ते रहते हैं, फिर भी कभी उससे मुक्त नहीं हो पाते हैं| कारण क्या है? कारण है 'अक्रोधी बनने की चाह'...! और मजा यह है कि जो व्यक्ति अक्रोधी होने की चाह को छोड़ कर क्रोध से लड़ना बंद कर देता है, वह क्रोध से मुक्त हो जाता है| तो, इसका अर्थ हुआ 'स्वीकार' करना सूत्र है| यही ध्यान है... 'स्वीकार करना' ध्यान है, और लड़ना/विरोध करना 'अध्यान है| अगर आप अशांत हैं, तो अपनी अशांति को स्वीकार कर लीजिए, उससे लड़िये मत...अशांति के क्षण में शांत होने की कोशिश करना 'अशांति से लड़ना है'... और आप जितना अशांति से लड़ेंगी और शांत होने की कोशिश करेंगी, उतना है अशांति बढ़ता जाएगा...| अशांति को स्वीकार करने से मेरा क्या मतलब है? जब अशांति मन को पकड़े तब आँखे बंद करके भीतर देखिये, देखिये कि उस क्षण आपके शरीर और मन में क्या घट रहा है... उस क्षण शांत होने की कोशिश या फिर अशांति से भागिए मत...टीवी खोल कर मत बैठिये, दोस्तों को मत फोन लगाइए...यह मत कहिये कि मुझे शांत होना है , या फिर मैं शांत हूँ... नहीं बस जो कुछ भी आपके भीतर घटित हो रहा है, उसको देखिये, उसमे गहरे उतरिये...इस बोध से ख़ुद को भरिये कि अभी इस क्षण मैं अशांत हूँ (ऐसा नहीं की अशांत होना अच्छी बात नहीं है, मुझे शांत होना है, नहीं ऐसा नहीं ...बस अशांति है ..यथा भूतं...ऐसा है ....!) | बिना किसी विकल्प के, बिना किसी धारणा के जो हो रहा है , उसके अनुभव में गहरे उतरना ध्यान है| ध्यान कोई क्रिया नहीं है जिसे कोई आँख बंद कर के एक घंटा कर सकता है ... ध्यान जीवन जीने का एक ढंग है... | अगर आपको ख़ुद को समझना है, तो आपको अभी तक के इकट्ठा किये गए सभी उधार ज्ञान को उतार का फेकना होगा..| आपको अपने उस रूप की तलाश करनी होगी, जो आपके पास तब था जब आपके पिता भी नहीं जन्मे थे| ये जो अभी आपका नाम है, यह उधार है... धर्म उधार है, रूप उधार है, जाति उधार है... इन फैक्ट अभी आपके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे आप अपना कह सकती हैं, सब उधार है ...वही ज्ञान आपका अपना हो सकता है जिसे आप गहरी नींद में अपने साथ ले जा सकती हैं... अभी तो नींद में आप सब भूल जाती हैं..| जो ज्ञान नींद में साथ छोड़ देता है, वो मौत में क्या काम आएगा...|
आप कहती हैं 'हमें मैडिटेशन के बारे में भी कुछ पता नहीं', यह अच्छी बात है| ब्रह्मा कुमारी से भी आप बचकर निकल गयीं, यह बहुत ही सौभाग्य की बात है|

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