Saturday, 2 May 2020

किताब-ए-मिरदाद (तब्सिरा)



किताब का नाम- 'किताब-ए-मिरदाद, लेखक-मिखाइल नईमी

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में अपने दस सबसे अधिक पसंदीदा किताबों की फ़ेहरिस्त साझा की है। उसमें से दो किताबों का नाम मुझे अभी याद है-महापण्डित राहुल सांकृत्यान की बौद्धचर्या' और लीयो टोलस्टोय की युद्ध और शांति। 'बैद्धचर्या' को लिस्ट में उन्होंने सबसे ऊपर और 'युद्ध और शांति' को सबसे नीचे रखा है। अगर मुझे कभी कोई ऐसी लिस्ट बनानी हो, तो मैं सबसे ऊपर मिखाइल नईमी की किताब-ए-मिरदादलिखूँगा, और फिर नीचे दस तक सेम ऐज़ अववलिख दूँगा।
दो साल से ऊपर हो गये मुझे तब्सिरालिखते हुए, लेकिन मिरदाद के संबंध में अब तक मैं मौन रहा हूँ। और मैंने तय किया था कि इस मौन को कभी नहीं तोड़ूँगा, लेकिन कल फेसबुक पर एक मित्र ने इस किताब का ज़िक्र छेड़ दिया, उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की है कि मैं बूक ऑफ़ मिरदादके बारे में लिखूँ।
मैं कल से ही बड़ी असमंजस में हूँ, आख़िर लिखूँ तो लिखूँ क्या...? मिरराद पर अगर कुछ बोलना हो, तो भीतर बुद्ध-सी गहरी मौन, और बाहर अल हल्लाज़ मंसूर सी मुखरता चाहिए। और यह बहुत ही दुर्लभ संयोग है, दो में से एक को साधना तो आसान है, लेकिन दोनों को एक साथ साध लेना, ‘एक अचंभा मैंने देखा नदिया लागी आग’ जैसी घटना है| इसीलिए इतने दिनों से चुप था|
‘मिरदाद’ पर सिर्फ़ लिखने से काम नहीं चल सकता है। इतने सालों का मौन सिर्फ लिखने से नहीं टूट सकता है| शब्द बहुत ही निर्बल हैं, मौन को तोड़ने के लिए| जब तक कि आप मेरे सामने न हों, और मैं चीख-चीख कर आपसे इस किताब के बारे में न कह  लूं, तब तक न तो आप इस किताब की महिमा को समझ पाएँगे, और न ही मुझे अभिव्यक्ति के बाद जो सहज तसल्ली मिलती है, वो मिलेगी|
खैर, आज कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ, तुतलाते हुए ही सही, आज कुछ बोलूँगा जरूर| मेरे आश्रम प्रवास के दौरान (2014 के 10 नवम्बर से लेकर 2017 के 10 जनवरी तक) , किसी ने मुझे किताब ए मिरदादपढ़ने को दी थी। मुझे याद है दिन भर किताब पढ़ने के बाद शाम को, संध्या सत्यसंग से पहले, ज़ोरबा (आश्रम का टी-शॉप) पर ग्रीन-टी पीने के लिए बैठता था| मेरी जगह तय थी, कैश काउन्टर के सामने खम्भे से सट कर, गर्मी के दिनों में दादी हौवा के ज़माने का एक पंखा सर पर घूमता रहता था, सामने हाईवे पर आती-जाती गाड़ीयों को मैं अपनी जगह से देख सकता था, पर्वत स्वामी मेरी सीट को व्यास सीट बोलते थे| वहीं टेबल पर मेरे पास दो-चार और सन्यासी बैठ जाते थे, फिर चाय पर चर्चा शुरू होती थी| मैं किताब-ए-मिरदाद पर बोलना शुरू करता था| बोलते समय मैं बिलकुल आविष्ट हो जाता था, लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे| मेरी बातें सुन-सुनकर आश्रम में किताब पढ़ने की होड़ मच गयी| कई लोगों ने किताब मंगवाई, कईयों ने मुझसे उधार मांग कर पढ़ी| जिस सन्यासिन ने मुझे वो किताब पढ़ने को दी थी, अचानक उनकी पूछ बढ़ गई, हर कोई उनसे वो किताब मांगने लगा| मजा ये था कि मुझे देने से पहले उन्होंने ख़ुद भी वो किताब नहीं पढ़ी थी| अब उनको भी किताब पढ़ने की जल्दी थी| इसी होड़ में दिव्या ने एक ही रात में पूरी किताब पढ़ डाली| जिसके पास ही किताब जाती थी, उसी पर उसे जल्दी ख़त्म करने की प्रेशर बनने लगता था| कई लोग किताब के लिए आपस में लड़ भी लिये| ऐसा कोई दो महीने तक चला था|
होड़ भले ही दो महीने तक चला हो, लेकिन उसका प्रभाव बहुत ही दूरगामी रहा था| 6 महीने बाद मेरे जन्म दिन पर दिव्या ने मुझे ‘किताब-ए-मिरदाद’ गिफ्ट की| मुझे याद गिफ्ट-रैप हटा कर जैसे ही मैंने कितबा को देखा, ख़ुशी के मारे पागल हो गया, जैसे आर्थर शोपनहावर उपनिषद को अपने सिर पर रख कर नाचे थे, वैसे ही मैं 'बुक ऑफ़ मिरदाद' को सर पर रख कर नाचने लगा था| दिव्या को पता था कि ‘हिंदी वर्शन’ पढ़ कर मैं बहुत खुश नहीं था, एक बार मैं किताब को अंग्रेजी में पढ़ना चाहता था| हिंदी अनुवाद बहुत ही पुअर था| अनुवाद में अक्सर आत्मा चली जाती है, और भाषाओं का तो मुझे पता नहीं, लेकिन किसी भी किताब का हिंदी अनुवाद पढ़कर मुझे ऐसा ज़रूर लगता है|
उस दिन से लेकर आज तक ‘बुक ऑफ़ मिरदाद’ मेरा पाथेय बना हुआ है| कुछ दिनों के अन्तराल पर, एक बार किताब को ज़रूर पलट कर देख लेता हूँ| जब भी लगता है अपना पता भूल गया हूँ, एक बार मिरदाद से पूछने चला जाता हूँ| अक्सर ख्वाबों में नरौन्दा की जगह ख़ुद को मिरदाद के श्री चरणों में बैठा हुआ देखता हूँ|
किताब से कोई भी ‘कोट’ यहाँ शेयर नहीं करूँगा| इसके पीछे दो वजूहात हैं- एक यह कि मैं तय नहीं कर पा रहा कि क्या शेयर करूं, और क्या न करूं| किताब का हर वाक्य एक महावाक्य है| यही दिक्कत मैंने किताब पढ़ते समय भी महसूस की थी| मुझे हाईलाइटर साथ में रख कर किताब पढ़ने की आदत है| पढ़ते समय अगर कुछ महत्वपूर्ण लगता है तो उसे मैं अंडरलाइन कर देता हूँ| लेकिन, दो ऐसी किताबें हैं जिनके दो-तीन पृष्ठों पर ही मैंने अंडरलाइन किया है| एक ‘किताब-ए-मिरदाद’ और दूसरा जे कृष्णमूर्ति की ‘सद्गुरु के चरणों में (At the feet of the master)’, इन दोनों किताबों में एक भी ऐसा वचन नहीं है, जो कोहिनूर से कम वैल्यू का हो, इन फैक्ट जो जानते हैं, उनके लिए इन वचनों के सामने कोहिनूर की चमक भी फीकी है|

किताब के पहले ही पृष्ठ पर मिखाइल ने पाठकों को चेताया है, यह है किताब-ए-मिरदाद’ उस रूप में जिसमें उसके (मिरदाद के) सबसे छोटे और विनम्र शिष्य नरौंदा ने लेखनीबद्ध किया| जिनमे आत्म-विजय के लिए तड़प है, उनके लिए यह आलोक-स्तम्भ और आश्रय है| बांकी सब इससे सावधान रहें|” मैं भी आपसे यही कहूँगा, अगर आपको अपने सपनों से प्रेम है, और नींद अच्छी लगती है, तो इस किताब से सावधान रहिये| यह किताब नहीं डायनामाइट है| इसका धमाका सिर्फ आपके शरीर को ही नहीं, आपके मन और आत्मा दोनों को उड़ा देगा| इस किताब से डरिये, और जिन्होंने यह किताब पढ़ रखी हो उनसे बच कर रहिये| 
            यही मेरी आपसे विनती है| Please don't read this book. संत पल्टू के इस महावाक्य को हमेशा याद रखिये" अजहूं चेत गंवार-
जीते जी मरि जाय, करै ना तन की आसा।
आसिक का दिन रात रहै सूली उपर बासा।।
मान बड़ाई खोय नींद भर नाहीं सोना।
तिलभर रक्त न मांस, नहीं आसिक को रोना।।
पलटू बड़े बेकूफ वे, आसिक होने जाहिं।
सीस उतारै हाथ से, सहज आसिकी नाहिं।
 -इक्क्यु केंशो तजु

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