Friday, 6 September 2019

‘आत्मा की बात’(बेंगलोर डायरी)

सुख के गीत गाता हूँ, आनंद की बातें करता हूँ, इसका यह मतलब नहीं है कि जीवन के दुखों से, ग़रीबों की पीड़ाओं से, बीमारों की आँसुओं से, स्त्रियों की आहों से, अबलाओं की चाहों से अपरिचित हूँ। सबके प्रति सजग हूँ, जागरुक हूँ और जितना जागरुक हूँ उससे ज़्यादा होने की कोशिश में निरंतर लगा रहता हूँ। 
ख़ुद की सीमाओं और पाखंडों का भी बोध है मुझे। ख़ुद के भीतर कथनी और करनी का जो भेद है, उससे भी भली भाँति परिचित हूँ। 
ध्यान और अहिंसा की बातें कर लेता हूँ, फिर किसी होटल में जाकर मछली और मुर्ग़ा खा लेता हूँ। सादा जीवन पर एक घंटा लेक्चर दे देता हूँ, फिर चार हज़ार की जींस ख़रीद लेता हूँ। इसी तरह की हज़ार विरोधी तत्वों को ख़ुद के भीतर पाता हूँ। राम और रावण को एक साथ अपने भीतर सक्रीय पाता हूँ। कभी कोई घट जाता है, तो कभी कोई बढ़ जाता है, लेकिन मौजूद हमेशा दोनों होते हैं। एक पूरी भीड़ है मेरे भीतर, अगले क्षण मैं क्या करूँगा, या फिर मुझसे क्या हो जाएगा, इसका मुझे कुछ भी पता नहीं होता है। कल तक जिस चीज़ का विरोध कर रहा था, हो सकता है आज उसकी पूजा करने लगूँ। बहुत ही अजीब है सबकुछ।

इन दिनों, जब भी ज़रूरत से ज़्यादा सुख-सुविधाओं में ख़ुद को पाता हूँ, अंदर से बेचैन होने लगता हूँ। मुझे उन मासूम बच्चों की तस्वीरें दिखने लगती हैं, जो रोड किनारे भूख से बिलखते रहते हैं। रेल की पटरियों के किनारे जलती धूप में प्लास्टिक की छतों के नीचे सोये लोगों की याद आने लगती है। अस्पताल के बाहर बिना इलाज के दम तोड़ते मज़दूरों के चेहरे दिखाई पड़ने लगते हैं। हवस की शिकार स्त्रियों की चीख़ें सुनाई देने लगती है। बहुत सोचता हूँ इन सब के बारे, क्या हो सकता क्या किया जा सकता है, इसके बारे में अपने क़रीबी मित्रों से बातें करता हूँ, उनके साथ घंटों बहस करता हूँ। अपने लेवल पर जितना कर सकता हूँ उतना करने की कोशिश करता हूँ। बिजली की बचत करता हूँ, पानी बचाता हूँ, पलस्टिक का इस्तेमाल बहुत कम करता हूँ, बच्चा पैदा नहीं किया है, पेड़ लगाता रहता हूँ, खाना खाते समय सजग रहने की कोशिश करता हूँ, और ऐसी ही बहुत सी चीज़ें हैं जो करता रहता हूँ। लेकिन बहुत गहरे में जानता हूँ कि इस सबसे कुछ नहीं बदलेगा। 
मैं यहाँ घर में पानी और बिजली बचाता हूँ, और वहाँ बड़े-बड़े शोपिंग भवन में दिन दहाड़े हज़ारों लाइटें जल रही होती है। मैं पैदल चलता हूँ, और लोग महँगी कारों से तीन किलोमीटर जाने में एक लीटर पेट्रोल जला देते हैं। 
किसी भी क्रांति या आंदोलन से इस दुनिया को ठीक नहीं किया जा सकता है। जितना सोचता हूँ उतना पाता हूँ कि आध्यात्मिक समझ के अलावा इस दुनिया को और ख़ुद को किसी भी चीज़ से ठीक नहीं किया जा सकता है। आज अगर मैं ख़ुद के दोषों को देख पा रहा हूँ, उन्हें स्वीकार कर पा रहा हूँ, तो सिर्फ़ इस लिए कि मेरे भीतर होश का एक छोटा-सा दिया टिमटिमाने लगा है। 
जब तक होश का यह दिया कम-से-कम दुनिया के ३३ फ़ीसदी लोगों के भीतर नहीं जलने लगता है। इस पृथ्वी पर स्वर्ग को नहीं उतारा जा सकता है। धर्म आख़री विकल्प है। धर्म से मेरा मतलब हिंदू धर्म या इस्लाम धर्म या ऐसे ही किसी अन्य धार्मिक परंपरा और संगठन से नहीं है। धर्म से मेरा मतलब बोध की उस अवस्था से है, जब हम यह जान लेते हैं कि हमारा कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है। जब तक हमारे भीतर से ‘मैं और तू’ का भेद नहीं मिट जाता है, तब तक हम विरोधाभासों और पाखंडों से ख़ुद को नहीं बचा सकते हैं।

इमरोज मेरी दृष्टि में शरीर हैं! साहिर आत्मा और अमृता मन।

कल अमृता प्रीतम के बारे कुछ लिखना चाह रहा था। लेकिन उनकी वो दो किताबें जो मैंने पढ़ी है, उन में से एक का नाम याद ही नहीं आया। अभी भक से दूसरा नाम याद आ गया- मन मिर्ज़ा, तन साहिबा! इसके अलावा ‘रसीदी टिकट’ मैंने पढ़ी है, कुछ कहानियाँ भी पढ़ी है। मेरे एक मित्र ने तीन साल पहले अमृता प्रीतम की 17 किताबें मुझे गिफ़्ट की थीं। अभी तक उनमें से एक भी नहीं पढ़ी है। उनकी आत्मकथा मुझे कुछ ख़ास नहीं लगी थी-रसीदी टिकट कुछ ख़ास होती भी नहीं है। इस अर्थ में किताब ने मुझे बहुत प्रभावित किया। साहिर-अमृता और इमरोज में शरीर, मन और आत्मा जैसा भेद दिखा। इमरोज मेरी दृष्टि में शरीर हैं! साहिर आत्मा और अमृता मन। 
इमरोज का व्यक्तित्व मुझे हमेशा से आकर्षित करता है। रात को एक बजे उठकर चाय बनाना-किसी साधना से कम नहीं है। अमृता की छायावादी लेखन से इमरोज का चायवादी होना मुझे ज़्यादा प्रभावित करता है। जैसे थीयो के बिना मैं वानगोग के अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकता हूँ, वैसे ही इमरोज के बिना अमृता नहीं हो सकती हैं।

Thursday, 5 September 2019

जीवन के सभी सुख विकल्पों से आते हैं!


मुसलसल मसाफ़त से बहुत थक गया हूँ| और शहरों की तरह बेंगलोर भी बहुत आपाधापी वाला शहर है| बड़े शहरों की बेचैनी मुझे अच्छी नहीं लगती है| आश्रम से निकलने के बावजूद भी दो साल मेहसाणा में सिर्फ इसलिए टिक गया क्योंकि वहां सब-कुछ बहुत ठहरा-ठहरा-सा है| इस साल अभी तक जितनी भी यात्राएं की है, उसमे पोंडिचेरी मुझे सबसे अच्छा लगा| सिक्किम में ठहराव तो बहुत था, लेकिन सुविधाएँ कम थी| हम एक गाँव में रुके हुए थे| सबकुछ बहुत ही उत्तम और सुन्दर था, लेकिन खाना बनाने की आजादी नहीं थी| हम जिनके यहाँ रुके थे उन्ही के यहाँ खाना खाने के लिए हम वाध्य थे| गाँव में कहीं कोई भोजनालय वगैरह नहीं था| 
जिनके यहाँ हम रुके थे वे बहुत ही अच्छा, परंपरागत, और आर्गेनिक खाना बेहद प्यार से खिलाते थे| लेकिन, जबतक नर्क का विकल्प मौजूद ना हो, स्वर्ग दो कौड़ी का लगता है| जीवन के सभी सुख विकल्पों से आते हैं| जीत आपको तभी ख़ुशी देती है, जब आपको यह पता होता है कि आप हार भी सकते थे| अगर कभी ऐसा हो जाए कि आपका हारना असंभव हो जाए, तो तत्क्षण जीत का सारा गौरव और सौदंर्य विलीन हो जाएगा| मिसेज दोरजी के उत्तम-से-उत्तम भोजन का स्वाद हमें फीका लगने लगा था, क्योंकि हमारे पास उन भोजनों के अलावा और कोई विकल्प नहीं था| हम यह भी नहीं तय कर सकते थे कि आज हमें क्या खाना है, किसी के घर में मेन्यु नहीं होता है| कितने बजे खाना है, हम ये तय करने के लिए भी स्वतंत्र नहीं थे| ऐसा भी नहीं था कि हमारे निवास पर खाना पहुँचा दिया जाए, और हमें जैसे मर्जी हो हम खा लें| हमें प्रॉपर उनके डाइनिंग हॉल में जाना पड़ता था, 20 तरीके के पकवानों से टेबल सजा होता था| भोजन के दौरान हमें अकेला भी नहीं छोड़ा जाता था, बात करने के लिए हमेशा कोई न कोई मौजूद होता था| हमारे यहाँ दामाद की जैसी खातिरदारी होती है, वैसी ही खातिरदारी हमारी हो रही थी| तीन-चार दिन बाद हम सुख-सुविधा और उत्तम मेहमानवाजी से इतने उब गए कि लताड़े जाने, उपेक्षित होने, अनअटेंडेड छोड़े जाने के लिए तरसने लगे| पहली बार मुझे ऐसा लगा कि गरीबी से ज्यादा ख़तरनाक अमीरी होती है| दुःख की अतिरेकता को सुख की उम्मीद में काटा जा सकता है, लेकिन सुख की अतिरेकता से बच कर कहाँ जाए आदमी| एक पॉइंट के बाद सुखी आदमी के लिए आत्महत्या के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है|
मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं अपने किसी बहुत ही अमीर रिश्तेदार के यहाँ मेहमान हूँ| सब कुछ टॉप क्लास का था, लेकिन फिर भी दो-तीन दिन के बाद सब कुछ बोझ जैसा लगने लगा| हम पैसा पे कर रहे थे, फिर भी भूटिया फेमली के एहसानों तले दबे जा रहे थे| राव साहब कुछ ज्यादा ही दब गए थे| मिसेज दोरजी जब कभी भी चाय लेकर आती, और तिबतन स्टाइल में दोनों हाथों से कप को उठा कर माथे के पास ले जा कर हमारे सामने रखती थीं, तो राव साहब एकदम से जमीन पर बिछ जाते थे| बाद में तो राव साहब हमेशा बिछे-बिछे से ही रहने लगे| एक शाश्वत मुस्कान जो उनके चेहरे से हमेशा चिपकी रहती थी, भूटिया परिवार के किसी सदस्य को देख कर और भी चौड़ी हो जाती थी| मेरी और दिव्या की हालत भी कुछ-कुछ राव साहब जैसी ही थी, लेकिन ‘हम इस सबके लिए पैसा पे कर रहे हैं’ सोच कर हम दोनों ज़मीन पर फैलने से ख़ुद को थोड़ा बचा लेते थे| 
सुविधा के साथ अगर थोड़ी भी स्वतंत्रता होती तो, सिक्किम यात्रा को मैं सबसे ऊपर रखता| धर्मकोट में स्वतंत्रता और सुविधा दोनों थी, लेकिन दोनों की मात्रा बहुत कम थी| दोनों में से यदि एक को भी बढ़ाने की सोचो तो कीमत आसमान छू लेती थी| नेपाल में चूँकि हम आश्रम में ठहरे थे, इसलिए उसको लेखाजोखा में शामिल करना मैं ठीक नहीं समझता| एक आश्रम की तुलना सिर्फ दूसरे किसी आश्रम से हो सकती है| आश्रम का शहर से कोई लेना-देना नहीं होता है| इसलिए इस साल की पोरबंदर यात्रा के बारे में भी यहाँ बात नहीं करूँगा| पुणे के बारे में भी यही हाल है| दिल्ली को मैं बस बेस-कैंप मानता हूँ| इसीलिए बात सिर्फ सिक्किम, धर्मकोट, पोंडिचेरी, त्रिरूवन्नामलाई और बेंगलोर की हो सकती हैं| इन पांच जगहों में पोंडिचेरी को में 10 में से 10 स्टार दे सकता हूँ| सब कुछ इतना सही और सटीक था, कि इससे ज्यादा की आप मांग ही नहीं कर सकते हैं| सुख, दुःख, सुविधा और स्वंत्रता का ऐसा सुन्दर समन्वय इससे पहले मैंने कहीं और नहीं जाना था|

शहर का नाम बेंगलोर है

31-Aug, 2019


रमणाश्रम के बहुत से अनुभवों और घटनाओं के बारे में लिखना बाँकी रह गया है। लिखना कभी-कभी मुझे मछली फाँसने वाले जाल से हाथी को पकड़ने की कोशिश जैसा लगता है। 
बेंगलोर के लिए बस में बैठा हूँ| दो बजे तक बस बेंगलोर छोड़ देगी। बेंगलोर सिर्फ़ जाने के लिए जा रहा हूँ। इधर से गुज़र रहा तो सोचा इस शहर को भी सलाम करता चलूँ। अभी तक मन में कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं है। तिरुवन्नामलाई की तरह बेंगलोर को भी धप्पा मार कर, एक-दो दिन बाद, आगे निकल जाऊँगा। 
जीवन में पहली बार किसी लड़की से दिल्ली में क़ुतुबमीनार पर हाथ मिलाया था। लड़की विदेशी थी। अंग्रेज़ी सीखने के चक्कर में फिरंगियों से बात करने क़ुतुबमीनार पर जाया करता था। वही हाथ मिलाने वाली लकड़ी ने, मैं BCA कर रहा हूँ, जानने के बाद, मुझे बताया था कि बेंगलोर इलेक्ट्रोनिक सिटी है। तभी शायद मेरे अचतेन में एक बार बेंगलोर जाने की ललक उठी थी। 2005 में जो मन के अंदर बीज पड़ा है, आज 14 साल बाद वह अंकुरित हो रहा है। मिरदाद कहते हैं, “एक मक्खी भी हमारी मर्ज़ी के बिना हमारे नाक पर नहीं बैठ सकती है।”


31-Aug, 2019
हवा में खुनकी है, बादल छाए हुए हैं, शाम में थोड़ी विष्टि हुई थी। शहर का नाम बेंगलोर है। मैं अभी किसी कॉफ़ी हाउस में बैठा हूँ। शहर से अभी दोस्ती नहीं हुई है। वैसा ही महसूस कर रहा हूँ जैसा पहले दिन पोंडिचेरी में लगा था। थकान इतनी है कि कुछ भी अभी लिखने का मन नहीं कर रहा है।


“रजनीश कैसा है?”, महर्षि ने ख़ुद को पंखा झलते हुए मुझसे पूछा!

29-Aug,2019

11 रातें बिताने के बाद पोंडिचेरी को विदा बोलते हुए तिरुवन्नामलाई (भगवान श्री रमण महर्षि आश्रम) जा रहा हूँ। उदासी की मलिन चादर मन के ऊपर सुबह से तनी हुई है। भारी साँसों की बोझ से हृदय बैठा जा रहा है। 
बुद्ध कहते हैं, “प्रिय से बिछड़ना और अप्रिय से मिलना दुख है।” इन ११ दिनों में मन ने पुद्दूचेरी से गहरी प्रीत गाढ़ ली थी। 
रमण आश्रम यहाँ 110 किलोमीटर दूर है।


29-Aug,2019

“रजनीश कैसा है?”, महर्षि ने ख़ुद को पंखा झलते हुए मुझसे पूछा। एक बड़े से हॉल में, जिसमें ६ खिड़कियाँ और दो दरवाज़े थे, भगवान सोफ़े पर लेटे हुए थे। मेरे बाईं ओर दिव्या और दाएँ मे पॉल ब्रंटन बैठे थे। हाल में ही मैंने पॉल की किताब ‘गुप्त भारत की खोज’ पढ़ी थी। इसीलिए पॉल को मैं थोड़ा जानता था। बाँकी हॉल में बैठे सारे लोग मेरे लिए अजनबी थे। कोई तीस लोग बैठे थे। तीस में से बीस आँखे बंद किए हुए थे। जिनकी आँखे बंद नहीं थी, उनकी नज़रें भगवान पर टिकी हुई थी।
‘अच्छे हैं, आपको बहुत याद कर रहे थे। उनकी बड़ी इच्छा थी आपसे मिलने की, लेकिन नहीं आ पाए। इससे पहले कि वो आते १९५० में १४ अप्रैल की शाम ८ बजकर ४५ मिनट पर आप महापरिनिर्वाण को उपलब्ध हो गए।’, मैंने भगवान श्री से कहा। “वो मुझसे मिलने नहीं आ पाया, लेकिन महापरिनिर्वाण के बाद मैं उससे मिलने गया था। ‘सक्रीय ध्यान’ के तीसरे चरण में ‘मैं कौन हूँ-मैं कौन हूँ’ पूछने का सुझाव उसे मैंने ही दिया था।’, भगवान तमिल में अपने अनुवादक से बोले, अनुवादक ने इंग्लिश में ट्रांसलेट करके मुझे बताया। 
बोलने के बाद बड़ी देर तक मौन बैठे रहे हैं। मैं उनके चेहरे पर अपनी नज़रें टिका नहीं पा रहा था। “जब पुणे गए ही थे, तो मेहर से मिलने क्यूँ नहीं गए”, मौन से लौटते हुए भगवान मुझसे बोले। ‘पॉल ने अपनी किताब में मेहर बाबा के बारे में जो कुछ लिखा है, उसे पढ़ने के बाद से बाबा पर से मेरा भरोसा उठ गया है’, बोलते समय मेरी नज़रें नीचे थी। मेरे मुँह से आपना नाम सुनकर पॉल मेरी और देखने लगा। भगवान बिना कुछ बोले मौन लेटे रहे। 
भगवान के पास से उठकर मैं लक्ष्मी(भगवान की गाय) की समाधि पर गया। लक्ष्मी भगवान से दो साल पहले १९४८ में देह त्यागी थी। लक्ष्मी के बग़ल में एक कव्वे, कुत्ते और हिरण की समाधि भी थी। 
सात बजने में बस १५ मिनट रह गए थे। अँधेरा घिर गया था। “जल्दी चलो, ऑफ़िस बंद हो जाएगा तो हमें चप्पल नहीं मिलेगा, बाँकी आश्रम कल देखेंगे”, दिव्या मुझसे बोली। आश्रम से हमारा डेरा थोड़ा दूर है, हमें पैदल आना था। सो, हम आश्रम से निकल गए। 
“अगर आश्रम में रहना हो, तो दो महीना पहले बुकिंग करनी होती है। सिर्फ़ तीन के लिए अलाउ करते हैं। रहने का कोई चार्ज नहीं है,” आश्रम से निकलते समय दिव्या मुझसे बोली। ‘वो महर्षि की समाधि पर जो आचानक से गाने लगे, उनकी आवाज़ कितनी अच्छी थी’, रोड पार करते हुए मैंने दिव्या से कहा। “हाँ, मैं तो एकदम से खो गई थी।”
कल सुबह वो गुफा देखने जाऊँगा जहाँ रमण ध्यान किया करते थे। आश्रम से १.५ किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह ८ से शाम ४ बजे तक आप वहाँ जा सकते हैं।


30-Aug, 2019
महापरिनिर्वाण रूम में भगवान के बेड पर उनकी खाने-पीने के पात्र, छड़ी और पंखा पड़ा हुआ था। कमरा बहुत छोटा लेकिन सुंदर था। ध्यान हॉल में रखे सोफ़े की तरह यहाँ भी भगवान का बेड बस पर्याप्त था, न ज़रूरत से एक इंच बड़ा और न ही एक इंच छोटा। कमरे के ऊपर दो विशाल पेड़ों की छाया थी। छड़ी और पंखे के अलावा कमरे में क़रीब-क़रीब वो सब कुछ था जिसे भगवान अपने जीवन काल में उपयोग में लाते थे। 
‘महर्षि, इतने छोटे-से बेड पर आप कैसे सो लेते हैं?’, मैंने पूछा। भगवान बेड पर लेटे हुए थे, और मैं उनके पैरों के पास ज़मीन पर बैठा हुआ था। कमरे में मेरे और दिव्या के अलावा और कोई नहीं था। महर्षि ने कोई उत्तर नहीं दिया। बहुत देर तक जब महर्षि चुप रहे, तो हम वहाँ से उठकर बाहर आ गए। रूम से निकलते ही बाएँ में उनके दो प्रमुख शिष्यों की समाधि थी। सामने एक नारियल का पेड़ फलों से लदा खड़ा था।


महर्षि की समाधि पर पूजा चल रही थी। कुछ लड़के, जिनके शरीर का ऊपरी हिस्सा निवस्त्र था और माथे व शरीर पर जगह-जगह विभूत का तिलक लगा हुआ था, मंत्रोउच्चार के साथ शिवलिंग की पूजा कर रहे थे। हॉल के बाईं दीवार से लगकर पुरुष साधक बैठे थे, और दायीं दीवार के पास महिलाएँ बैठी थीं। निरपवाद रूप से देशी और विदेशी सभी साधक भारतीय परिधान में थे। 
पूजा समाप्त होने के बाद रमण के वचनों का पाठ शुरू हुआ। पाठ तमिल में हो रहा था, हमें कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जिस लय में वे पढ़ रहे थे, वह बड़ा अच्छा लगा।
महर्षि की समाधि से लगी हुई उनकी माँ की समाधि है। भगवान की समाधि की तरह उनकी समाधि में भी शिवलिंग स्थापित है।
माँ की समाधि में शिविलिंग के अलावा रमण की भी एक प्रतिमा रखी हुई है। जैसे ही आप समाधि में प्रवेश करते हैं, अपने बाईं ओर एक बेड पर आप रमण को बैठा हुआ देखते हैं-काले पत्थर से बनी मूर्ति बहुत ही भव्य और आकर्षक है।
दोनों समधियों (रमण और उनकी माँ की) पर लोग पूजा-अर्चना और परिक्रमा कर रहे थे। हमने भी रमण की समाधि का दो बार परिक्रमा की।

समाधि के ठीक सामने वह रूम (महापरिनिर्वाण रूम) है जिसमें रमण ने देह त्यागा था। जब हम वहाँ गए थे, रूम का गेट बंद था। गेट में लगे शीशे से झाँकने पर हमने देखा कि उस पार बेड के नीचे पीतल का एक दिया जल रहा है।
समाधि हॉल से सटा हुआ ही वह कक्ष है, जहाँ रमण दर्शन दिया करते थे। कक्ष में जिस सोफ़े पर रमण लेटा करते थे, वह आज भी यथावत-यथा-स्थान सुरक्षित रखा हुआ है। सोफ़े के ऊपर रमण की एक बहुत ही बड़ी पेंटिंग रखी हुई है। सोफ़े वाली जगह को लकड़ी के बाड़े से घेर दिया गया है। फ़ेंस के बाहर बैठ कर लोग ध्यान करते हैं। कक्ष में साधकों की सुविधा के लिए दो पंखे लटके हुए हैं। पंखा देखते समय मैंने नोटिस किया कि खिड़कियों की तरह लकड़ी के छत को संभालने वाले बरेरी(बीम) भी ६ हैं। 
कक्ष का दोनों गेट आमने सामने है। एक गेट अब शायद हमेशा बंद रहता है। गेट से लग कर कुछ लोग ध्यान में बैठे हुए थे। शाम के बाद रूम के अंदर पीली रौशनी जलने लगती है। 
हॉल के पास ही पुराना कुआँ और पुराना भोजनालय है। भोजनालय के सामने पुराना चिकित्सालय है, जिसके हर कमरे में अब बस रमण की तस्वीरें सजी हुई है। चिकित्सालय से बाहर निकलते ही बाएँ में नीम पेड़ के नीचे लक्ष्मी की समाधि है।


आज के आइस-क्रीम का स्वाद सबसे अलग लग राह है..है ना ?


लड़की-कोई आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता...(सोफे पर लेट कर छत को देखते हुए) कोई मुझे आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता.....
लड़का- पैसें नहीं है...और मेरा अभी आइस-क्रीम खाने का मन भी नहीं है..तुमको अकेले ही खाना हो तो ऑनलाइन आर्डर देकर माँगा लो?
लड़की- नहीं फिर रहने दो ...नमकीन होता तो, खा भी लेती, मीठा अकेले नहीं खाना| पैसे क्यूं नहीं है?
लड़का-नहीं है बस, जो थे वो बाइक वाले को दे दिये..कल एटीएम से निकालना होगा|
लड़की- (फिर से गाने लगती है..) कोई मुझे आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता.....| 
लड़का-बस दो-दस के नोट पड़े हैं, मेरे पास| इतने में होगा तो चलो चलते हैं| 
लड़की- कुल्फी तीस का देता है| 
लड़का- (अपना जेब टटोलते हुए) एक पांच का सिक्का भी है|
लड़की-रुको... कुछ छुट्टे मेरे पास भी पड़े हैं..(भाग कर हॉल से कमरे में जाते हुए) बीस रूपये हैं (चिल्लड़ गिनते हुए)-टोटल कितना हुआ?
लड़का-हम्म...पचीस मेरे पास है, और बीस तुम्हारे पास तो..कुल हुआ 45 रुपया..| अरे..यार अगर पन्द्रह रूपये और मिल जाए तो मैं भी खाल लूं... रुको मैं अपने बैग में देखता हूँ..(भाग कर कमरे में जाता है, बैग सर्च करता है)..सात रूपये मिले!
लड़की- दो कुल्फी के लिए आठ रूपये और चाहिए..रुको मैं अपने बैग में भी देखती हूँ...
लड़का-कहीं तो कल पांच का एक सिक्का पड़ा देखा था!
लड़की- वही पांच का सिक्का जोड़ कर तो मेरा बीस रुपया हुआ है| मेरे बैग में एक भी रुपया नहीं नहीं है-तुम एक भी रुपया मेरे पास नहीं छोड़ते हो| 
लड़का-(अपना सब सामान देखते हुए, बेड के नीचे, टेबल पर, जींस के जेब में, सोफे के नीचे..) यार ऐसा कैसे हो गया कि अपने पास 8 रुपया भी नहीं है..कितना तो यहाँ वहां पड़ा देखता था|
लड़की- वही 'कितना' जोड़ कर तो 52 रुपये हुए हैं....| छोड़ों नहीं मिलेगा...एक काम करते हैं...उसकों बोल देंगे कि 8 रुपया बाद में दे देंगे| 
लड़का-(बे-मन से) हाँ चलो ये ठीक रहेगा(रूम से निकलते हुए) अरे...आई हैव एन आइडिया...ये जो अपने पास इतना अख़बार पड़ा है, चलो इसको बेच देते हैं..| 
लड़की- (चहकते हुए) हाँ...वहीं हैंडी मार्केट के पास ही रद्दी वाले का शॉप है...चलो फिर ज्यादा पैसे आ गए तो मैं एक कोण भी ले लुंगी..|
लड़का- (मन-ही-मन 'गाँव बसा नहीं की भिखारी आ गए)
-------थोड़ी देर बाद-------
लड़की- आज के आइस-क्रीम का स्वाद सबसे अलग लग राह है..है ना ?

नागफनी पर पीला फूल आया था


26-Aug,2016
अगर पांच मिनट और इंतजार करता तो आज किरण बेदी जी से मिलना हो जाता है, और उनके साथ एक फोटों भी खिच जाती | अगर फोटो को शेयर करता, निःसंदेह आम तस्वीरों की तुलना में उस तस्वीर पर लोगों के ज्यादा लाइक और कमेंट आ जाते| लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया| एन वक़्त पर जब किरण बेदी जी अपने मीटिंग से निकल कर आने ही वाली थीं, हम राज निवास से निकल कर बाहर आ गए| दिव्या इस बात से थोड़ी नाराज़ भी हुई उसे उनसे मिलकर तस्वीर बनवाने का बड़ा मन था| लेकिन मैं अपने वायदे से मजबूर था| उस दिन चाय पर जब हम (पी.डी ओस्पेंसकी, गुर्जेइफ़ और मैं) चर्चा कर रहे थे, तब G. ने मुझसे तीन वचन लिए थे, उसमे से एक वचन एक यह भी था कि मैं जीवन में कभी किसी फेमस व्यक्ति के साथ तस्वीर नहीं खिचवाउंगा| 
राज निवास में जाने के लिए आपको एक दिन पहले बुकिंग कराना होता है| यह बुकिंग ऑनलाइन होता है| फिर आपको अगले दिन 12:00 से 1:00 के बीच में बुलाया जाता है| 'राज निवास', 'पुदुच्चेरी संग्रहालय' के बगल में ही है| अंदर जाने पर एक उदास और जीवन से एकदम थकी हुई स्त्री आपको अंदर घुमाने ले जाती है| दिवार पर लगे कुछ पेंटिंग, फ़्रेच फर्नीचर, डाइनिंग हॉल, मीटिंग हॉल और एक सौ पचास साल पुराना पियानो और फर्श दिखाने के बाद वो आपको एक मंदिर में ले जाती है| मंदिर के बाहर खड़ा एक व्यक्ति जो कहीं से भी पंडित और भक्त टाइप नहीं दिखता है, आपको मंदिर के पास बुला कर एक कपूर जला कर भगवान् की आरती करता है, और फिर आरती का दिया आपके सामने लाकर आपसे कुछ पैसे पाने की उम्मीद करता है| इसी उम्मीद में वह आपके माथे पर तिलक भी लगा देता है| फ्रेंच स्टाइल में बना भवन सुन्दर और भव्य है| मेन हॉल में उस सब गवर्नर की तस्वीर लगी है, जो किरण बेदी से पहले वहां रह चुके हैं| बहुत से तस्वीरों में एक तस्वीर 'एन.एन झा' की थी| मैं खुश हुआ कि यहाँ अपने मिथिलांचल के भी कोई रह चुके हैं| 
डाइनिंग हॉल के टेबल पर एक विशाल कॉफ़ी कप रखा हुआ था, कप इतना बड़ा था कि एक छोटा बच्चा उसमे बैठ कर नाहा ले, "क्या मैडम इसमें कॉफ़ी पीती हैं", मैंने जीवन से उदास महिला से पूछा| जवाब देने के बजाय उसने कप में सामने हमें खड़ा करके अपने मोबाइल से एक फोटो लेकर हमारे व्हात्सप्प पर भेज दिया| 
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कल सुबह शमशान के पास वाले ओरोविल बीच पर सूर्योदय देखने गया था| हमसे पहले कई लोग बीच पर मौजूद थे| संभवतः हर कोई दिनकर को अरग देने ही आए थे| एक दम्पत्ति जो थर्मस में चाय भर कर लाए थे, शानदार कप में चाय का मजा ले रहे थे| उनकी ठाठ देखकर थोड़ी इर्ष्या भी हुई| 
मौसम सुहाना था, लोग कम थे, तीन कुत्ते रेत पर मस्ती कर रहे थे, नागफनी पर पीला फूल आया था|
छः बजकर तीस मिनट तक हमने इंतजार किया, लेकिन सूर्य महाराज बादलों की ओट से प्रगट नहीं हुए| अंत में निराश होकर हम लौट आए| हालाँकि सुबह इतनी सुन्दर थी कि सूरज को उगता हुआ न देख पाने का मलाल ज्यादा देर तक नहीं रहा|

घर से जब आईना देखकर निकलता था


मैं किसी भी सवाल का जवाब नहीं हूँ| लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, "तुम क्या हो?", और मैं बगले झाँकने लगता हूँ| घर से जब आईना देखकर निकलता था, तो वही था जिसे लोग 'आदमी, इन्सान, और मनुष्य' कहते हैं| पता नहीं पूछने वाले महानुभाव को इसका पता कैसे नहीं चलता है| फिर कुछ लोग पूछते हैं, "तुम क्या करते हो?", तो मैं एकदम से बिदक जाता हूँ| क्या बोलूं की मैं क्या करता हूँ| यदि सच बोलता हूँ कि 'मैं कुछ भी नहीं करता हूँ', तो सामने वाले को यकीन नहीं होता है| और यदि झूठ बोलता हूँ, तो मुझे अच्छा नहीं लगता है| 

गए साल अपनी बुआ से मिलने राजस्थान गया था, वो कहने लगीं, "सब पूछते रहते हैं कि आपका भतीजा क्या करता है, मुझे तो ख़ुद ही पता नहीं की तुम क्या करते हो, अब क्या बोलूं में लोगों को, क्या करते हो तुम?" मुझे कुछ समझ ही नहीं आया कि मैं उनसे क्या बोलूं| 'बौआता(भटकता) रहता हूँ, इधर-से-उधर, और तो कुछ करता नहीं', मैंने ने उनसे कहा| "इतना घूमने के लिए पैसा कहाँ से लाते हो?", बुआ बोली| 'ढक-पेंच से कमा लेता हूँ, या कह लो की GD करता हूँ', मैंने उनसे कहा| "ई जीडी क्या होता है?", मुंह बनाते हुए बुआ बोली| 'जीडी माने गोरख धंधा, यही करता हूँ मैं', मैंने उनसे कहा| "तुम्हारे बाप का भी कभी किसी को पता नहीं चला कि क्या करता है, और तुम्हारा भी वही हाल है..असल बेटे हो तुम'', चाय का कप उठाकर जाते हुए बुला बोली| 
उस दिन के बाद से अब जब भी कोई मुझसे मेरे कमाने का राज़ पूछता है तो जीडी कह देता हूँ| लेकिन मैं ख़ुद नहीं जानता कि ये जीडी क्या है, और मैं क्या करता हूँ| मैं बस इतना जानता हूँ कि कुछ-से-कुछ करता रहता हूँ, और उसके परिणाम स्वरूप कुछ-का-कुछ होता रहता है| या फिर इसको ऐसे कह सकता हूँ, 'करता-धरता कुछ भी नहीं हूँ, लेकिन होता बहुत कुछ रहता है'| 'तुम क्या करते हो के बजाय यदि मुझसे ये पूछा जाए कि तुम्हारे जीवन में क्या-क्या होता रहता है', तो बड़ी सहजता से बहुत कुछ बता सकता हूँ| 
मैं अपने जीवन में करता कुछ भी नहीं हूँ, और न ही मैं कुछ हूँ| जैसे सबके जीवन में होता है, वैसे ही मेरे जीवन में भी बहुत कुछ होता रहता है| और मेरे जीवन में शुरू से ही सब कुछ ऐसे ही है| मैंने जन्म लिया नहीं था, मेरा जन्म हुआ था, और जैसे अपने आप एक दिन जन्म हुआ था, वैसे ही बड़ा हो गया, और एक दिन ऐसे ही मर भी जाऊँगा| सब अपने आप हो रहा है| इसमें मैं कुछ कर नहीं रहा हूँ| इसीलिए 'करने' की बात उठा कर आप मुझे बड़ी असुविधा में डाल देते हैं| 

स्त्री हुए बिना सृजन संभव नहीं है

25-Aug, 2019

एक विडंबना- 

दुनिया के ज्यादातर प्रसिद्ध लेखक/कवि स्त्री प्रेमी हैं (या कम-से-कम ऐसा उनकी लेखनी से प्रगट होता है), जबकि अक्सर स्त्री कवयित्री/लेखिकाएँ पुरुष विरोधी होती हैं|


25-Aug,2019

जबसे पुदुच्चेरी आया हूँ, हिंदी पढ़ने के लिए तरस गया हूँ| अपने साथ बस एक किताब लेकर आया हूँ-वॉर एंड पीस| 'लाल टीन की छत' पढ़ने के बाद से निर्मल को पढ़ने की तलब बहुत बढ़ गई है| परसों यहाँ के लिब्रेरी में गया था| बड़ी मुश्किल से निर्मल की एक किताब मिली वो भी वही जो पहले से पढ़ रखी थी-लाल टीन की छत| 

कृष्णनाथ की 'अरुणाचल यात्रा' और मनोहर श्याम जोशी की 'क्या हाल हैं चीन के', लेकर पढ़ने के लिए बैठा| दोनों यात्रा-संस्मरण है| 'अरुणाचल यात्रा' कुछ ख़ास नहीं लगी| जोशी जी को पढ़ने में मज़ा आने लगा| कोई आधा घंटा मैंने किताब पढ़ी होगी कि सामने वाली कुर्सी पर दिव्या को पाउलो केओलो की किताब पर उंघते हुए पाया| जबसे उसने अलकेमिस्ट पढ़ी है, जहाँ कही भी जाती है, पाउलो की कोई किताब उठा लेती है| पाउलो की एडल्ट्री भी उसे अच्छी लगी थी| 
उसे ऊँघता देख मन-मसोस कर मुझे उठाना पड़ा| उठते-उठते मैंने किताब के कुछ पन्नो की फोटो खींच ली, सोचा रूम पर जा कर पढेंगे| सीढ़ियों से नीचे उतरते समय मेरी नज़र नेहरु जी की एक पेंटिंग पर अटक गई| पेंटिंग में मुझे कुछ अटपटा लगा| गौर करने पर पाया कि उनके नाक और होंठ के बीच जो मूंछ वाली जगह है, वह कुछ ज्यादा ही बड़ी हो गई है| मूर्ति और रास्ते पर लगे पोस्टरों से मेरा ऐसा अनुमान है कि यहाँ के लोगों को नेहरु परिवार से विशेष लगाव है| 
रास्ते में एक किताब की दुकान दिखी, अन्दर जाकर पता किया तो पाया कि उनके पास हिंदी की एक भी किताब नहीं थी| 
रूम पर पहुँचते-पहुँचते हिंदी में कुछ पढ़ने के लिए मन इतना अधीर हो उठा कि कमरे में घुसते ही 'हिंदीसमय.कॉम' खोल कर बैठ गया| एक घंटा राहुल सांकृतयान को पढ़ने के बाद थोडा आराम मिला| 
पढ़ने की ऐसी भीषण अभीप्सा इससे पहले मैंने पहले कभी नहीं जानी थी|


26-Aug, 2019
लेखक होना स्त्री के किए और स्त्री होना है, जबकि पुरुष के लिए लेखक होना अपने मूल स्वभाव से दूर जाना है। इसी में वह टूट जाता है, तलवार उठाना उसके लिए क़लम उठाने से ज़्यादा सहज है। जैसे ही पुरुष किसी भी प्रकार के कला में उत्सुक होने लगता है वह स्त्री जैसा होने लगता है। स्त्री हुए बिना सृजन संभव नहीं है। विध्वंस करना उसका/पुरुष का मूल स्वभाव है। अक्सर लेखक और कवि थोड़े पागल हो जाते हैं, यह स्वभाव से दूर जाने की वजह से होता है। इसी तरह वे स्त्रियाँ भी टूट जाती हैं, जो अपने स्वभाव से दूर जा कर पुलिस, आर्मी और इसी तरह के और पागलपन में पुरुषों के कंधे-से-कंधा मिलाने लगती हैं।



जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...