Sunday, 7 October 2018

इसे déjà vu कहते हैं



माँ देवयानी और स्वामी अमित शिविर के संचाल थे। शिविर का नाम था ‘यूथ कैम्प’। ओपनिंग के दिन टोटल बारह पंद्रह लोग ही आए हुए थे। अगले दिन मैं सुबह नहा धोकर ‘सक्रिय ध्यान’ के लिए गया। स्वामी अमित ने ध्यान के सारे चरण डेमो के साथ समझाया। सबकुछ ठीक लगा लेकिन दूसरे चरण में पागल होने वाली बात समझ नहीं आई- मैं यहाँ पागल होने आया हूँ या ठीक?। खौर, म्यूज़िक के साथ ध्यान शुरू हुआ, इन्स्ट्रक्शन था कि पूरे एक घंटे आँख नहीं खोलना है, लेकिन मैं हर दो मिनट पर एक बार आँख खोलकर सबको देख लेता था। दूसरे चरण में जब सब चीख़ने-चिल्लाने लगे तो मैं एकदम से सहम गया-ये क्या खेला हो रहा है? थोड़ी देर बाद मुझे तेज़ हँसी आने लगी- ध्यान के नाम पर ये पागल कर देंगे क्या हमको? सोचने लगा, बाहर निकल जब दोस्तों से कहूँगा कि एक ऐसी भी दुनियां है जहाँ खुल कर हंसने, रोने, नाचने और पागल होने की आज़ादी है, तो क्या वे यकीन कर पाएँगे..!
सुबह डयनमिक के बाद प्रवचन बजा, फिर नादब्रह्म किया, फिर नटराज, फिर दोपहर में कुंडलनी। हर ध्यान से पहले स्वामी अमित और माँ देवयानी हमें ख़ूब नाचते थे। नाचने का यह मेरा पहला अनुभव था। इससे पहले कभी नाचा नहीं था। बहुत बचपन से भीतर नाचने की एक अदम्य इच्छा थी, लेकिन झिझक और शर्म की वजह से कभी नाचा नहीं था| 
शाम होते-होते शरीर टूटने लगा था। लेकिन संध्या सत्यसंग से पहले जब नहा कर सफ़ेद रोब पहना, तो फिर से एक नई ताज़गी से भर गया। जब बुद्ध सभागार में पहुँचा तो मैं दंग रह गया। मेरी आँखे फटी-की-फटी रह गयी। मध्यम रोशनी, हल्की म्यूज़िक, और सफ़ेद रोब में झूमते सन्यासी मुझे ऐसा लगा जैसे मैं इंद्रलोक में आ गया हूँ और देवी-देवताओं को नाचते हुए देख रहा हूँ| इतना शांत, आनंदित और प्रेमपूर्ण लोग मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी कभी नहीं देखा था। थोड़ी देर बाद, आनंद से भावविहोर होकर मैं रोने लगा। मेरे अलावा एक-दो सन्यासी और रो रहे थे। 
थोड़ी देर बाद स्लो म्यूज़िक बंद हुआ और कीर्तन शुरू हुआ, ‘तुम्हारे दर्शन की वेला, यह मौसम रास रचाने की’। सारे सन्यासी खड़े होकर मस्ती में झूमने लगे। मैं भी नाचने लगा, थोड़ी देर में शरीर बोझ सा लगने लगा, ऐसा लगने लगा जैसे शरीर मेरे और नृत्य के बीच आ रहा है| मस्ती, उन्माद और पागपन का ऐसा स्वाद मैंने पहले कभी नहीं चखा था| ओशो के तस्वीर के सामने जब माँ देवयानी को कूद कर नाचते हुए देखा तो मेरी टकटकी बंध गई- ये कौन सी दुनिया है? कौन हैं ये लोग? इसी तरह के कई सवाल भीतर उठने लगे| तभी गज़ब की प्रतीती होने लगी, ऐसा लगने लगा जैसे मैं इन लोगों को बहुत पहले से जानता हूँ, सब कुछ परिचित सा लगने लगा| उस दिन तो पता नहीं चला कि यह क्या था, बाद में पता चला कि इसे déjà vu कहते हैं|

मुझे सन्यास लेना है



काँपते हाथों से जब गेट पीट रहा था, तो भीतर से यही आवाज़ आ रही थी कि भगवान! अंदर कोई न हो, गेट न खुले। लेकिन मेरी उम्मीद के विपरीत एक भाई साहब ने पहले झाँककर मुझे देखा, फिर दरवाज़ा खोला। वो भीमकाय काला दरवाज़ा उस वक़्त मेरे लिए भय का प्रतीक था। ‘जी मुझे सन्यास लेना है।’, मैंने भीतर घुसते हुए कहा। उसने मेरी एंट्री की फिर दूर एक भवन की ओर इशारा करते हुए कहा, “वेल्कम सेंटर वहाँ है।” खरमा-खरमा चलते हुए मैं वेल्कम की ओर बढ़ा। रास्ते में कई बार लौट जाने का विचार आया, लेकिन इन सब ऊपरी विचारों के अलावा भीतर कुछ था जो बड़ा ही सघन था। विरोध का स्वर सिर्फ़ ऊपर-ऊपर से उठ रहा था।
वेल्कम सेंटर में एक 25-30 साल का सन्यासी, मरून रोब में बैठा हुआ था। आवाज़ सुनकर लगा कि ये वही हैं जिनसे फ़ोन पर, पता पूछने के लिए, मेरी बात हुई थी। फ़ोन पर जिस तरीक़े से उन्होंने बात किया था उससे मैंने बड़ा अनवेल्कम्ड फ़ील किया था। लेकिन यहाँ वे बड़े वेल्कमिंग और friendly लग रहे थे। ‘मुझे सन्यास लेना है’, मैंने अपना सामना रखते हुए उनसे कहा। “पता पूछने के लिए आपने ही फ़ोन किया था?” उन्होंने पूछा। ‘जी मैंने ही फ़ोन किया’, कहते हुए मैं उनके चेहरे को देखने लगा। चेहरे की बनावट से नेपाली लग रहे थे। “सन्यास कैम्प के आख़री दिन होता है, पाँच दिन का कैम्प है। कैम्प संचालक आपको सन्यास के बारे में बता देंगे। अभी आप कहाँ रुकना चाहेंगे?”, आँख मटकाते हुए वे मुझे देखने लगे। ‘चार्ज कितना है?’ “कबीर का 250/- है”
मैंने कबीर में पाँच दिन की बुकिंग कर ली। मेरे ख़्याल से लॉकर का 100/- रुपया डिपॉज़िट देना पड़ा था। लॉकर में सामान रख कर मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। पूरा कक्ष खाली था, ‘कल से शिविर है, अभी तक कहीं कोई दिख नहीं रहा है’, लेटे-लेटे मैं सोचने लगा। फिर मैंने जेब से फ़ूड-पास निकाल कर देखा। रात के खाने अभी टाइम था, लेकिन मुझे भूख लग गई थी। सोचा, पहले बाथरूम जाकर पानी से हाथ मुँह धो लेता हूँ, फिर बाहर निकल कर खाने का कुछ देखेंगे। बाथरूम में गया तो मैं हैरान रह गया, एक महानुभाव, बाथरूम का दरवाज़ा खुला रखकर, पूरा निवस्त्र होकर नहा रहे थे। ‘ये क्या नौटंकी है, भाई...’ ख़ैर, अपना काम करके मैं अपने dormitory में आ गया और रोब पहनकर बाहर रिसेप्शन के पास आ गया। 
ज़िन्दगी में पहली बार रोब पहना था, बड़ा अजीब सा लग रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ पहन ही नहीं रखा है। 
‘शिविर कब से शुरू होगा’, मैंने वेल्कम वाले स्वामी से पूछा। “परसों ओपनिंग है”, उन्होंने जवाब दिया। ‘लेकिन वेबसाईट पर आज की ओपनिंग लिखा था।’ मैंने हैरान होते हुए उनसे कहा। “हाँ, लेकिन बाद में हमने डेट बदल दिया था, आपने शायद नहीं देखा”, उन्होंने बड़ी शांति से जवाब दिया। ‘तभी आश्रम इतना ख़ाली-ख़ाली दिख रहा है’, मैंने सोचा। 
उनसे खाने और ध्यान की टाइमिंग के बारे में पूछ कर मैं आश्रम का चक्कर लगाने के लिए निकल गया। आधे-घंटे बाद चाय का समय था। वेल्कम के पास ही एक खम्भे पर पूरे दिन का schedule चिपका हुआ था।


एक बार मैं एक जगह 'शिविर' करने गया था| एक बहुत पुराने सन्यासी, ओशो के समय के, शिविर के संचालक थे| उन सन्यासी का संबंध ओशो के जिस कुनवे से है, वहां के अनुसार 'माला' पहनना, और दाढ़ी बढ़ाना कुफ्र है| और मैं शिविर में माला पहनकर घूम रहा था| मेरे अलावा एक दो और सन्यासियों ने भी माला पहन रखा था| 
सुबह के सक्रीय ध्यान के बाद जब बैठक हुई, तो उन्होंने बिना किसी को लक्षित किए हुए कहा, "ओशो ने माला पहनने से कबका मना कर दिया था| फिर भी पता नहीं क्यों कुछ लोग अब भी माला पहन के घुमते हैं| शायद उनको लगता है कि माला पहनने से ज्यादा ध्यान लगेगा|" मुझे बात चोट कर गई, मन में बहुत सी बातें उठने लगी| लेकिन मैंने जब्त किया, और उस वक़्त वहां कुछ नहीं बोला| 
लेकिन शाम की बैठक में जब प्रश्न-उत्तर चल रहा था, तो मैंने उनसे पूछा, 'स्वामी जी, सुबह आपने कहा कि कुछ लोग इसलिए माला पहनकर घूम रहे हैं, क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि माला पहनने से ज्यादा ध्यान लगेगा| तो, मेरा सवाल यह है कि अगर आपके हिसाब से माला पहनने से ज्यादा ध्यान नहीं लगता है, तो क्या माला उतार देने से ज्यादा ध्यान लग जाएगा?'

जब मैं बहुत छोटा था, संभवत: 8 या 9 वर्ष का रहा होऊँगा, तब अपने एक चाचा, जिनका नाम मोहन झा है, से सुना था कि रजनीश एक बहुत बड़ा माफ़िया था। यह पहला मौक़ा था जब मैंने किसी के मुँह से ओशो का नाम सुना था। यह बात मुझे क्यों याद रह गई, यह बड़े हैरानी की बात है। क्योंकि किस संदर्भ में यह बात उन्होंने कही थी यह मुझे बिलकुल भी याद नहीं है। मैं ऐसा मानता हूँ कि शायद ‘माफ़िया’ शब्द के आकर्षण की वजह से यह बात मुझे याद रह गई। 
फिर सन 2000 में, मैं अपने एक दोस्त, जिसका नाम गोविंद है और लोग उसे गोविंदा या गोविंदजी बुलाते हैं, के यहाँ बैठकर किताबें पढ़ा करता था। उसके पास बहुत सी किताबें थीं। मैं उन में से चुन-चुनकर पढ़ता रहता था। उन्हीं किताबों में मुझे एक दिन एक ऐसी किताब हाथ लगी जिसके शुरू और अंत के कुछ पृष्ठ ग़ायब थे। हर पृष्ठ के नीचे किताब का नाम लिखा था ‘संभोग से समाधि की ओर’ नाम देखते ही मैंने झट-से किताब जेब में रख ली। 
घर आकर जब किताब पढ़ा तो बड़ी निराशा हुई। संभोग के बारे कुछ लिखा ही नहीं था। बस एक जहग यह लिखा था कि अगर कोई सात घंटे तक लगातार संभोग कर ले, किस ढंग से करना है उसकी विधि बताई हुई थी, तो फिर वह सदा के लिए संभोग से मुक्त हो जाएगा। बस यह एक बात मुझे रोचक लगी थी, बाँकि किताब में जो बातें लिखी थी वो मेरे सिर के ऊपर से चला गया। लेकिन किताब के लेखक का नाम जानने की इच्छा मन में घर कर गयी। पर किताब का नाम ऐसा था कि किसी से उसके बारे में पूछ भी नहीं सकता था। 
फिर 2001 में जब मैं दसवीं में आया तो ट्यूशन पढ़ने के लिए अपने गाँव से चार किलोमीटर दूर एक दूसरे गाँव ‘भरवाड़ा’ जाने लगा। टीचर का नाम गुनानंद जी था आप मेरे ननिहाल ‘कटका’ निवासी थे। बिहार के प्रसिद्ध विदूषक गोनु झा की समाधि पर हमारी क्लास लगती थी। अपने गाँव से हम चार लोग, प्रेम ठाकुर, अमित झा, भैरव झा, सुमित झा और मैं, वहाँ पढ़ने जाते थे। 
दिवाली के नज़दीक जिस भवन में हमारी क्लास लगती थी उसकी सफ़ाई होनी थी। सो, कुछ दिनों के लिए क्लास की जगह शिफ़्ट कर दी गई। नई जगह पूरानी जगह के ठीक सामने रोड के उस तरफ़, लेकिन रोड से काफ़ी ऊँचाई पर थी। 
एक दिन एक लंबे घुंघराले बाल और बड़ी दाढ़ी वाला व्यक्ति नीचे रोड से गुज़र रहा था। इस व्यक्ति को मैं जानता था, ये मेरे पिता के मित्र थे। उनको जाता देख मेरे क्लास की एक लड़की ने गुनानंद जी से पूछा, “सर, इसके बाल-दाढ़ी इतने लंबे क्यों हैं?” गुनानंद जी ने बड़ी आत्मीयता के साथ उसके कान के पास अपना मुँह लाकर क़रीब-क़रीब फुसफुसाते हुए कहा, “यह रजनीश का चेला है। रजनीश लड़की और ड्रग्स का धंधा करता था।”

यह मेरा ओशो से दूसरा परिचय था। पहला- रजनीश एक बहुत बड़ा माफ़िया था, और दूसरा- रजनीश लड़की और ड्रग्स का धंधा करता था।

सत्य का कोई अनुभव नहीं होता है



सत्य का कोई अनुभव नहीं होता है। सारे अनुभव मन के हैं। और मन के बहुत से अनुभवों से बहुत बार गुज़रा। बुद्धत्व भी कई बार घटा। एक दौर ऐसा भी था जब जो भी सोच लेता था, वही होने लगता था। कभी ‘मैं’ मिट जाता था, कभी आनंद की बारिश होने लगती थी, कभी हज़ार-हज़ार सूरज निकल जाता था। कभी लगता था मैं हवा में उड़ रहा हूँ। प्रवचन सुनते समय ओशो जो-जो बोलते थे वही होने लगता था। 
अनजाने ही ओशो की नक़ल करना शुरूकर दिया था। उनकी तरह हाथ घूमाना, धीरे-धीरे बोलना, हाथ बिना हिलाए चलना, पलक झपकाए बिना बात करना। रॉलस रॉय की कमी रह गई थी बस। नौटंकी की चलती-फिरती दूकान बन गया था। राह चलता था तो बड़ा हैरान होता था कि लोग मेरे चरणो में क्यों नहीं गिर रहे हैं, क्या ये अंधे हैं? इतनी बड़ी घटना घटी है मेरे भीतर इनको दिख नहीं रहा है?
शुरू में ओशो से प्रेम था इसीलिए उनको लोगों से छिपाता था, उनका नाम लेने से झिझकता था। बाद में उनको इस डर से छिपाने लगा कि कहीं लोगों को अगर यह पता चल जाएगा कि मेरा कोई गुरु है और मेरी जिन बातों से वे प्रभावित हो रहे हैं, वे मेरी नहीं किसी और की है, तो लोग फिर मुझे पूजना छोड़ कर सीधा उन में उत्सुक हो जाएँगे। और उन दिनों बहुत से लोग मुझसे प्रभावित थे, मेरे पिताजी के उम्र के लोग मेरे पैर छूने लगे थे। कई लोग मुझे आकर कहते थे कि आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। जहाँ-भी जाता था जिससे भी मिलता था उसको अपने ज्ञान से प्रभावित करने का कोई मौक़ा छोड़ता नहीं था। 
लेकिन इस सब के बावजूद कभी खुलकर अपने ज्ञान की घोषणा नहीं कर पाता था। इसके पीछे कारण यह था कि जानकारी इकट्ठा करने के लिए ही सही ओशो को सुनना जारी रखे हुआ था। और गाहे-बगाहे ओशो की कोई-न-कोई बात मुझे चोट कर जाती थी और एक क्षण के लिए ही सही मुझे मेरा पाखंड दिख जाता था। और इसका परिणाम यह हो रहा था कि पहले मैं लोगों को प्रभावित कर लेता था, फिर कोई-न-कोई ऊटपटाँग हरकत करके उनको दूर भी भगा देता था। यह खेल बहुत दिनों तक चला।

Saturday, 6 October 2018

‘सत्य’ यानी क्या?


                                                                       साकेत के साथ (2014)

शुरू में बहुत दिनों तक यही समझ में नहीं आता था कि ‘सत्य’ यानी क्या? ‘सत्य’ को पाना है, लेकिन ‘सत्य’ शब्द किस चीज़ के लिए प्रयोग हो रहा है, यह पल्ले नहीं पड़ता था। प्रवचन सुनने का मुख्य उद्देश्य जोक्स सुनना होता था। जिन प्रवचन माला में अधिक जोक्स होते थे, उन्हें ही सुनता था। सूत्र वाले प्रवचनों को अवॉड करता था। प्रश्न उत्तर वाले प्रवचन बड़े चाव से सुनता था, लोगों की कुटाई-पिटाई में बड़ा मज़ा आता था। लेकिन धीरे-धीरे यह बात सालने लगी कि असली चीज़ तो मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ। अष्ट्रवक्रगीता सूनना सबसे से बड़ा सिर दर्द था— अभी घट सकती है घटना, इसी क्षण, मुझे सुनते-सुनते तुम उपलब्ध हो सकते हो...! यह सब सुन कर मन बड़ा पगलाता था, माथा घोर हो जाता था। कई दिनों तक मैं सिर दर्द से परेशान रहता था। समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर घटना क्यों नहीं घट रही है? जनक के ‘अहो!’ पर मन बड़ा खीझता था। 
परेशान होकर थोड़े-थोड़े दिनों के लिए मैं प्रवचन सुनना बंद कर देता था। फिर एक दिन, 2010 में संभवत: ऑक्टोबर महीने में, ‘ओशोवर्ल्ड’ पत्रिका ख़रीदकर पढ़ रहा था। उसमें ओशो बर्फ़ के टूकरे और पानी के रूपक की मदद से चेतना की स्थिति को समझा रहे थे। वो लेख मेरे भीतर तीर की तरह घुस गया, जैसे अंधेरे कमरे में अचानक से बल्ब जल गया हो। बात शीशे की तरह एकदम साफ़ हो गई। उस दिन के बाद से ओशो की सभी बातों का अभिप्राय मुझे समझ में आने लगा। ‘सत्य’ क्या है इसका पता तो नहीं चला, लेकिन ‘झूठ’ क्या है यह साफ़ होने लगा। फिर ‘जानने’ की एक अदम्य अभिप्सा भीतर पैदा हो गई। ओशो को सुनने का ढंग बदल गया। अब मैं कभी-भी और कैसे-भी नहीं सुनता था। पहली बार पता चला कि गुरु होना क्या होता, और शिष्य होना क्या है। ओशो की बातों, तर्क, जोक्स इत्यादि से रस ख़त्म हो गया। रोज़ सुबह शाम नहा धोकर रोब और माला पहनकर सुनने बैठता था। ओशो क्या बोलते थे कुछ समझ में नहीं आता था, पूरे प्रवचन के दौरान मैं बस रोता रहता था। दिन में भी कभी भी बिना किसी बात के रोने लगता था। अपने ऑफ़िस में ओशो की जो तस्वीरें लगा रखी थी, उसे फाड़कर फेंक दिया, लोगों से उलझना, तर्क करना, ज्ञान देना इत्यादि सब बंदकर दिया। यह सिलसिला क़रीब 6 महीने तक चला।

Monday, 1 October 2018

खोपड़ी में भयंकर उत्पात मचने लगा


                                                                  चित्र साभार- गूगल 

चार किताबें पढ़कर गुरु बनने की बात तो आपने शायद सुनी होगी, लेकिन एक किताब पढ़कर गुरु बनने की घटना बहुत कम ही घटती है| अपने पैसे से ओशो की जो पहली किताब मैंने खरीदी थी, वो थी 'मैं मृत्यु सिखाता हूँ'| किताब पढ़कर मैं पगला गया था| किताब पढ़ने के बाद उसका ऑडियो CD भी खरीद कर ले आया| फिर ऑडियो चलाकर सुनता भी था, और साथ-साथ पढ़ता भी था| एक किताब में इतनी जानकारी थी, इतनी जानकारी थी कि मेरे खोपड़ी में भयंकर उत्पात मचने लगा| और जानकारी के साथ जो बड़े-से-बड़ा ख़तरा है, वो है उसको बांटने की खुजली| अनुभव के बारे में बात करने में एक बार आदमी झिझकता भी है, लेकिन जानकारी को पचा पाना बहुत ही कठिन| मैं बिलकुल भी हैरान नहीं होता उन सन्यासियों को देखकर जो 'अपने बुद्धत्व की घोषणा करके, गुरु बन बैठे हैं| ओशो सन्यासी के लिए गुरु बनने की वासना से मुक्त होना बहुत ही कठिन है| क़रीब-क़रीब असंभव है| जिस परंपरा में भी साधकों को जरूरत से ज्यादा जानकारी दी जाएगी, उस परंपरा में ऐसा होना तय है| और ओशो के साथ यह अपरिहार्य है| और जानकारी के साथ एक और खतरा है| जैसे-जैसे जानकारी की बोझ बढ़ता है-वैसे-वैसे ज्ञान की क्षमता कम होने लगती है| मेरे ही मामले को ले लीजिए, बुद्धत्व के मामले में शायद में बुद्ध से भी ज्यादा जानता होऊं, जितनी कुशलता से मैं होश, जागरण, और बुद्धत्व के बारे में बातकर सकता हूँ, शायद कबीर, नानक, और दरिया जैसे बुद्ध पुरुष भी न कर पाएं| अगर मैं आज गोरखधंधे की दूकान खोलूं, तो किसी भी टूटपूंजिये बाबा और तथाकथित बुद्धों से अच्छी दूकान चला सकता हूँ, लेकिन इस सब का हासिल क्या है? 
आज इन जानकारियों के जंगल में जितना मैं ख़ुद को भटका हुआ पता हूँ, उतना में आज से दस साल पहले भी नहीं था| ओशो के हिंदी और अंग्रेज़ी के क़रीब-क़रीब सारे प्रवचन सुन चुका हूँ, कृष्णमूर्ति को आर-पार पढ़ चुका हूँ, गुरिजेइफ़ को निपटा चुका हूँ, विवेकानंद, एलन watts, इकहार्ट, रमण, जीसस, मिखाइल, और पता नहीं कितने लोगों को पढ़ चुका हूँ, कितने ही लोगों से मिल चुका हूँ, न जाने कितने प्रकार के प्रयोग कर चुका हूँ| आश्रमों में रहा हूँ| लेकिन इस सब का सार क्या है? कुछ भी नहीं, बस कुशलता से तर्क कर सकता हूँ, और अपनी जानकारी से लोगों को प्रभावित कर सकता हूँ, लेकिन क्या इसी के लिए मैंने सन्यास लिया था? जहाँ तक लोगों को प्रभावित करने का सवाल है, वो तो पैसे से भी हो सकता था, पद से हो सकता था, बल्कि अधिक सुगमता से हो सकता था| इसके लिए सन्यास लेने की क्या जरूरत थी?

Friday, 28 September 2018

कॉफ़ी और किताब

“Zorba, sitting in front of me, sniffed his coffee in a sensual way which was quite oriental.” – Zorba the Greek
24, Sep. 2018
घर से जब जेब में किताब (ज़ोरबा द ग्रीक) और हाइलाइटर डालकर निकला निकला था, तो यह सोचा नहीं था कि पढ़ने के लिए सही जगह तलाशते-तलाशते घर से 22 किलोमीटर दूर CCD चला जाऊंगा| 

साइकल लेकर जब मुख्य सड़क पर आया तो कुछ सेकंड के लिए सोच में पड़ गया कि कहाँ जाऊं| फिर ध्यान आया कि यहाँ से एक किलोमीटर दूर एक मंदिर है, वहां मंदिर के पास बने बैंच पर बैठकर पढ़ सकता हूँ| जब वहां पहुंचा तो देखा कि कुछ बुजुर्ग वहां पहले-से बैठे थे, और आपस में बातचीत कर रहे थे| सोचा, यहाँ अगर इन लोगों (बुजुर्गों) के बीच बैठकर पढूंगा तो ज़ोरबा नाराज़ हो जाएगा, “Many are the joys of this world—women, fruit, ideas.” और यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था- No women, no fruit..! वहां से थोड़ी दूर हटकर एक और मंदिर है| वो मंदिर यहाँ से ज्यादा शांत जगह पर है, वहीं जाने का तय किया| लेकिन रास्ते में फिर ख्याल आया कि वहीं मंदिर के पास भूरी बाई का तबेला भी है, वो देखेगी तो गुजरती में पूछेगी, “ભાઈ, હવે દૂધ લેવા કેમ નથી આવતાં?”, मैं हिंदी में जवाब दूंगा, “आज कल दूध का इस्तेमाल बंद कर दिया है, दूध खाने से पेट में तकलीफ होती है|”, और वो कुछ-भी नहीं समझेगी| मैं इन सब झमेले में नहीं पड़ना चाहता था| अगर वहां नहीं जाना है, तो कहाँ जाना है? यह यक्ष प्रश्न फिर से खड़ा हो गया| उस वक़्त मैं जहाँ खड़ा था, वहां से सात किलोमीटर दूर मेरे एक मित्र रहते हैं, सोचा उन्ही से मिल लिया जाए| मौसम सही था, साइकल चलाने में मजा आ रहा था| 
दो किलोमीटर साइकल चलाने के बाद, दिमाग फिर से चलने लगा- उनसे मिलना तो हो जाएगा, लेकिन किताब पढ़ना नहीं हो पाएगा| असली सवाल किताब पढ़ना है| और वैसे भी वे अभी ऑफिस में होंगे, ऑफिस के टाइम उनको डिस्टर्ब करना ठीक बात नहीं है| फिर कहाँ जाऊं? किंकर्तव्यविमूढ़ हो थोड़ी देर राह किनारे साइकल रोककर खड़ा रहा| फिर अचानक से दिमाग की बत्ती जली- CCD जाना कैसा रहेगा? मौसम सही है, एक घंटे में पहुँच जाऊँगा| वहीं बैठकर पढूंगा| पूरे शरीर में जान आ गई| पैरे अपने आप पैडल पर तेज़ी से घूमने लगे| सबकुछ अच्छा-अच्छा और नया-सा लगने लगा| - “Zorba sees everything every day as if for the first time.” 
आधे घंटे बाद हौसला पस्त होने लगा- सिर्फ जाना ही नहीं है, आना भी है| क्यों न दोस्त से मिलकर उससे उसकी बाइक ले लूं, साइकल वहीं उसके ऑफिस के बाहर खाड़ी कर दूंगा, और फिर लौटते में साइकल से आ जाऊंगा| ये आईडिया सही लगा, लेकिन एक्सिटिंग नहीं लगा| -इस में स्टोरी कहाँ है? नाह...मजा नहीं आया..! साइकल से ही जाना चाहिए, तभी मजा है| मैं फिर से पैडल मारने लगा| अपने बचपन के उन दिनों को याद करने लगा, जब घर से तीस किलोमीटर दूर दरभंगा चला जाता था, और फिर दिन भर घूमने के बाद शाम तक लौट भी आता था- यह तो कुछ भी नहीं है| 
नए जोश के साथ फिर कुछ देर साइकल चलाया| अब थोड़ी-थोड़ी धूप भी निकल आई थी| मंजिल का दूर-दूर तक कुछ पता नहीं था| गाड़ी से आते समय कभी सोचा नहीं था कि सीसीडी इतनी दूर है| रास्ते में कई बार ख्याल आया कि यहीं कहीं किसी पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ लूं| घर से 10:15 पर निकला था, अभी 11:30 हो रहा था| खोपड़ी की दलीलों से शरीर राजी नहीं हो रहा था| अब ग़जब हालात हो गई थी, मन दो पैडल आगे मारता था, तो शारीर चार पैडल पीछे मारता था| लिल्लाह, किस चक्कर में फंस गया..!!

तभी, दूर पेड़ के नीचे एक गन्ने वाला दिखा| एज़ यू नो, गन्ने का जूस मुझे बहुत पसंद है, जूस वाले को देखते ही जान-में-जान आ गई| सोचा, अब जूस पी कर ही आगे का निर्णय लिया जाएगा| साइकल खड़ी करके जूस वाले को बिना बर्फ के दो गिलास जूस बनाने को बोला| 3 मिनट बाद जूस बनकर तैयार हो गया| आह..नींबू और पुदीने से सजा गन्ने का जूस| एक घंटा साइकल चलाने के बाद जूस का स्वाद अमृत जैसा लग रहा था| वाह...!! एक ग्लास ख़त्म करने के बाद दिमाग सही तरीके से काम करने लगा- ससुर, जब संजू सिनेमा में संजय दत्त 18 दिन तक भटक सकता है ड्रग्स के लिए, तो तुम कुछ किलोमीटर साइकल नहीं चला सकते हो किताब और कॉफ़ी के लिए| मुझे बात जंची| जूस वाले को पैसा देने के बाद मैंने नए जोश और उत्साह के साथ साइकल चलाने लगा| 
ठीक 12 बजे मैं सीसीडी के सामने खड़ा था| एक मिनट तक मुग्ध होकर मंजिल को देखता रहा| फिर नीम के पेड़ के नीचे साइकल खड़ी करके भीतर गया| बहार भी चेअर्स लगे थे, लेकिन बाहर धूप आ रही थी| पूरा कैफ़े खाली था| काउंटर पर खड़ी लड़की मैगज़ीन के पन्ने पलट रही थी| बैठने के लिए सही जगह का चुनाव करके मैंने टेबल पर किताब और हाइलाइटर रखा| फिर काउंटर पर आया, “paytm से पेमेंट एक्सेप्ट करती हैं आप?”, मैंने उससे पूछा| उसने 'हाँ' में सिर हिलाया| घर से निकलते समय सिर्फ 160 रुपया कैश लेकर निकला था| सो, थोड़ा वरीड था कि यदि paytm से पेमेंट नहीं हुआ तो कैश की तंगी हो सकती है| कहीं कैश कम न पड़ जाए इसी डर से तेज़ प्यास के बावजूद भी रस्ते में पानी नहीं खरीदा था| जूस यह सोच कर पीया था कि इससे प्यास भी मिट जाएगी और थोड़ी उर्जा भी मिल जाएगी| लेकिन जूस के बाद प्यास उल्टा बढ़ गई थी| ‘पानी रखती हैं, आप?’, मेनू देखते हुए मैंने पूछा| “RO तो नहीं है, लेकिन नार्मल पानी आपको पीने के लिए मिल सकता है”, उसने जवाब दिया| ‘कोई नहीं, एक ग्लास दे दीजिए|’
एक Classic Cappuccino (King Size) का आर्डर देकर मैं अपनी टेबल पर आ गया| मेरे पीठ पीछे लगी टीवी पर जॉन अब्राहम की कोई फिल्म चल रही थी| मेरे राईट में रोड व्यू, और लेस्फ़ में कैफ़े का इंटीरियर था| सामने दीवाल पर ‘Nobody loves coffee like we do.’ लिखा हुआ था| दो मिनट बाद मेरा कॉफ़ी आ गया| जैसे बाबा भारती अपने घोड़े को देखकर मुस्कुराते थे, वैसे ही मैं कॉफ़ी को देखकर मुस्कुराने लगा| बड़े कप में कॉफ़ी पीने का मजा ही कुछ और है| ज़ोरबा, कॉफ़ी, साइकल, और बादल इससे सुंदर दिन और क्या हो सकता था..! ख़ुशी के मारे में हाथ-पैर में सनसनी होने लगी| 

“I too felt a great happiness in delivering myself up, silently, to the rosy transformation of sunrise. In those magic minutes, the whole of life seems as light as down. The earth constantly changes shape in the wind, like a soft and billowy cloud.” - Zorba the Greek

Wednesday, 26 September 2018

मैं कौन हूँ, ये कहाँ हूँ मैं... ???

#सन्यास'- 5
जब माँ धर्मज्योति ने कहा कि रोब और माला पहनना अब अनिवार्य नहीं है, तो मैं बड़ा उदास हो गया| जिस चीज़ के लिए सन्यास लिया था, उसी चीज़ को गैर-ज़रूरी बता दिया| सोचा था रोब पहनकर घर आऊंगा, लोग देखकर चौंकेंगे, खूब नौटंकी होगी, मजा आएगा| लेकिन, सब उल्टा हो गया|
घर आकर मैं बड़ा दुखी हो गया| रास्ते भर यही सोचता रहा था कि 'ऐसे सन्यास का क्या फायदा जिसका किसी को पता ही नहीं चलेगा'| नियम के नाम पर बस रोज़ एक घंटा ध्यान करने के लिए कहा गया था| -यह भी कोई नियम हुआ, एक घंटा ध्यान करो, ये तो ऐसे ही कर लेता, इसके लिए सन्यासी बनने की क्या ज़रूर थी| 'नाम भी कितना अजीब दिया 'स्वामी ध्यान विराम'..हुंह...| नाम सुनकर मुझे एकदम मजा नहीं आ रहा था| सोचा था कोई भारी भरकम नाम मिलेगा 'स्वामी चैतन्य कृति, ध्यान मुहम्मद, ऐसा कुछ बड़ा-सा, यह क्या पिद्दी नाम दे दिया 'ध्यान विराम'| बिना मतलब रोब में तीन सौ रुपया और खर्च करवा दिया, अरे जब रोब था ही तो नया खरीदवाने की क्या ज़रूरत थी? और ऐसा क्या है इस माला में जिसका सौ रुपया ले लिया....
घर आकर मैंने ध्यान-व्यान कुछ भी नहीं किया-कितना डरा हुआ, कितना कुछ सोचा था, और हुआ क्या? एक बस नाम का सन्यास...!! यह एकदम खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसा मामला था| एक-दो दिन में मैं सन्यास-वन्यास सब भूल-भालकर अपनी रूटीन लाइफ में व्यस्त हो गया| सब कुछ पहले की तरह चलने लगा|
एक सप्ताह बाद, एक शाम मैं अपने इंस्टीट्यूट से घर जा रहा था| राह चलते हुए अचानक मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मैं अपने शरीर से अलग हूँ| एक बहुत ही अनूठे ढंग से पूरे शरीर का बोध होने लगा| ऐसा पहले कभी कुछ नहीं हुआ था| घर पहुंचे-पहुँचते एक और नई चीज़ घटने लगी| सब कुछ अजनबी-सा लगने लगा- मैं कौन हूँ, ये कहाँ हूँ मैं, कौन हैं ये लोग, क्या है यह सब, यहाँ आने से पहले मैं कहाँ था... ??? इस तरह के कई सवाल भीतर उठने लगे| भाई को देखा तो ऐसा लगा जैसे पहली बार इसे देख रहा हूँ, एकदम अजनबी लग रहा था भाई| बड़ी देर तक यह सब खेल चलता रहा| ऐसा लग रहा था जैसे शरीर बहुत ही नाज़ुक हो गया हो| इस तरह से शारीर का कभी पता नहीं चला था|
खाना खाकर मैं सोने के लिए छत पर चला गया| बिस्तर पर लेटा, लेकिन नींद नहीं आ रही थी, शरीर में बड़ी बेचैनी हो रही थी| मैंने सारे कपड़े उतार दिए और बिस्तर पर लेट कर सांस को देखने लगा (सांस को देखने का ध्यान प्रयोग आश्रम में सीखा था)| थोड़ी देर बाद, ऐसा लगने लगा जैसे मैं शरीर से बहुत दूर हूँ और शरीर को देख रहा हूँ, सांसें अपने आप आ और जा रही है| फिर तो ऐसा लगने कि यदि अभी मैं उठ कर खड़ा हुआ तो मैं उठ जाऊँगा और शरीर पड़ा रह जाएगा| थोड़ा डर भी लगने लगा| बड़ी देर तक यही सब चलता रहा, फिर कब नींद आ गई पता नहीं चला|

अगली सुबह जब आँख खुली तो सब कुछ नार्मल था| बस हृदय में ठंडा-ठंडा लग रहा था| दिन भर इंस्टीट्यूट में काम करता रहा| शाम में किसी काम से कैफ़े गया| इंस्टीट्यूट के पास ही कैफ़े था, एक घंटा का दस रुपया लगता था| सन्यास लेने से पहले से www.oshoworld.com पर जा कर कुछ-कुछ देखता रहता था| डिस्कोर्स वाले टैब पर जब भी click करता था तो प्रवचनों का लिस्ट आता था| जब उन पर click करता था तो एक औरत गाना गाने लगती थी| सोचता था-पता नहीं प्रवचन के नाम पर इन लोगों ने गाना क्यों डाल रखा है| उस दिन भी किसी अंतर प्रेरणा से मैं वेबसाइट पर गया और प्रवचन पर click किया, फिर से उसी औरत की आवाज़ आई..कुछ सेकेंड सुन कर मैंने हैडफोन रख दिया और कैफ़े वाले से कुछ पूछने के लिए केबिन से बाहर आ गया| थोड़ी देर बाद जब लौटकर अपने केबिन में आया और हेडफोन उठाकर कान में लगाया, तो मैं हैरान रह गया ओशो बोल रहे थे| मैंने दूसरा प्रवचन प्ले करके देखा| फिर मुझे खेला समझ में आया, शुरू में एक स्त्री श्लोक को गाती थी, फिर ओशो बोलते थे|
कुछ प्रवचन डाउनलोड कर के अपने पैन ड्राइव में रख लिया| घर आकर खाना खाने के बाद PC में प्रवचन को डाल कर प्ले किया| बातें कुछ ज्यादा समझ में नहीं आती थी, लेकिन ओशो के आवाज़ की जादू में मैं खो जाता था| एक दो दिन बाद नेहरु प्लेस से एक छोटा सा 2 GB का MP3 प्लेअर 1300 में खरीद कर लाया| फिर तो कैफ़े से प्रवचन डाउनलोड करके लाता था, और दिन भर प्लेयर में डाल कर सुनता रहता था|

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...