Saturday, 24 August 2019

पोंडिचेरी में बैठे-बैठे पुणे की याद

23-Aug-2019

समाधि के अन्दर जाने के लिए हम जहाँ से एंट्री करते हैं, उस हॉल में ओशो की एक रोल्सरॉय खड़ी है, जिसका नंबर मेरे ख्याल से MV2041 है| वहीं गाड़ी के पास लगे कुर्सियों पर बैठकर आप को सफ़ेद मौजे पहनने होते हैं, ताकि अन्दर समाधी में लगे सफ़ेद संगमरमर ख़राब न हो जाए| मौजा पहनने के बाद आप एक रूम में प्रवेश करते हैं, जिसके बाईं ओर एक सीढ़ी ऊपर को जाती हैं| फिर आप जिस रूम में प्रवेश करते हैं, उसके दीवारों से लगे शीशों की आलमारी में ओशो की किताबें सजी हुई हैं| ये वो किताबें हैं, जिन्हें ओशो ने अपने जीवन काल में पढ़ी थी| जहाँ तक मुझे पता है, करीब दो लाख किताबें हैं| ज्योति माँ ने अपनी किताब 'दस हज़ार बुद्धों की एक सौ कथाएँ' में लिखा है कि ओशो एक दिन में 6 से भी ज्यादा किताबें पढ़ते थे| यह असंभव नहीं है| एक जर्मन अनुवादक, मेरे ख्याल से Paul Deussen, किसी किताब के सम्बन्ध में विवेकानंद से बात करना चाहते थे| विविकानन्द ने कहा, "मैंने किताब नहीं पढ़ी है, आप इसे यहाँ छोड़ जाइए, मैं पढ़ लेता हूँ, फिर इस पर बात करेंगे|" पॉल किताब छोड़ कर चले गए| किताब बहुत मोटी थी, उनका अनुमान था कोई पन्द्रह दिन के बाद विवेकानंद से इस किताब पर चर्चा हो पाएगी| इससे कम में किताब पूरी नहीं की जा सकती हैं| लेकिन अगले दिन जब वे विवेकानंद से मिलने आए, तो हैरान रह गए| "मैंने किताब पढ़ ली है, आप चाहे तो आज हम उस पर चर्चा कर सकते हैं", विवेकानंद ने डेयुसन से कहा| उन्हें यकीन नहीं हुआ, "इतनी मोटी किताब आप एक रात में कैसे खत्म कर सकते हैं", पॉल ने आश्चर्य प्रगट करते हुए कहा| "अगर विचारों की बाधा न हो, तो यह बिलकुल संभव है, मुझे किताब खत्म करने में एक घंटा भी नहीं लगा", विवेकानंद ने पॉल से कहा| पॉल को काटो तो खून नहीं| "तुम एक काम करो, किताब खोल कर तुम मुझसे पेज नम्बर कहो, मैं तुम्हे बता दूंगा कि उस पर क्या लिखा है", टेबल पर से किताब उठा कर पॉल को देते हुए विवेकानंद ने कहा| पॉल ने ऐसा ही किया, उसने किताब पलट कर एक पेज नम्बर विवेकानंद से बोला, विवेकानंद ने उसे बता दिया कि उस पेज पर क्या लिखा है|
कुछ हद तक ऐसा मेरे और आपके जीवन में भी होता है, हम जब कुछ पढ़ रहे होते हैं, उस वक्त अगर हमारा दिमाग बहुत अशांत है, तो दस पेज पढ़ जाते हैं और कुछ भी समझ में नहीं आता है| और कभी जब मन शांत होता है, तो सट से बीस पेज खत्म हो जाता है, और सब समझ में भी आ जाता है| बहुत से लोग किताब नहीं पढ़ पाते हैं क्योंकि उनका बेचैन मन किताब के पन्नों पर उनके ध्यान को टिकने नहीं देता है| 
किताबों के जंगल से गुजरते हुए आप एक ऐसे रूम में पहुँचते हैं, जहाँ हरे रंग की एक डेंटल-चेयर रखी हुई है| ओशो के जब दांतों का इलाज़ चलता था, तब वे इसी चेयर पर बैठते थे| मेरे ख्याल से उनकी किताब 'नोट्स ऑफ़ मैड मैन' इसी चेयर पर की गई बातचीत है| चेयर रूम के बाद एक और रूम-जैसी जगह पार करके आप समाधि तक पहुँचते हैं| समाधि का द्वार उलटे यू (U) जैसा है| गेट पर सेंसर इत्यादि लगे हुए हैं| 
शीशे के गेट को खोल कर जब आप अन्दर पहुँचते हैं, तो आपके दायीं ओर आपको एक शीशे का बेड दिखता है| यही ओशो की समाधि है| वहीं बेड के पास ओशो की एक मूर्ति बनी हुई है-सिर्फ गर्दन के ऊपर का हिस्सा| अपने मरने से कुछ दिन पहले दो-तीन दिनों तक इस बेड पर ओशो सोए थे| समाधि एक बहुत बड़ा हॉल है, जिसके फर्श सफेद और खम्भे ग्रीन मार्बल से आच्छादित हैं| ऊंचाई कोई 40 से पचास फीट होगी| गोलाकार समाधि के तीन हिस्से में शीशे लगे हुए है, शीशे के उस पार हरा-भरा बगीचा दिखता है| ऊपर एक बड़ा गोल झूमर लगा हुआ है, जिसमे हमेशा लाइट जलती रहती है| ध्यान के दौरान उसके लाईट को थोडा कम कर दिया जाता है| समाधि वाले बेड के पास ही हॉल का एक दूसरा गेट है, यह गेट ओशो की बाथरूम में खुलता है| जब समाधि पर ध्यान करने वाले सन्यासियों की संख्या ज्यादा हो जाती है, तो कुछ सन्यासियों को बाथरूम में भी बिठाया जाता है| मुझे भी एक दिन अन्दर बैठने का मौका मिला| इतना आलीशान बाथरूम मैंने पहले कभी नहीं देखा था, सत्तर के दशक का यह बाथरूम अपने समय में वर्ल्ड का नंबर वन बाथरूम रहा होगा| 
मानसून फेस्टिवल के दौरान समाधि पर ओशो के छोटे भाई की पत्नी ड्यूटी पर हुआ करती थी| ओशो के सबसे छोटे भाई आश्रम में ही रहते हैं| फेस्टिवल के मौके पर ओशो की एक बहन और उनके पति भी आये हुए थे| ओशो के भाई आश्रम में उतनी ही सरलता के साथ रहते हैं, जितनी सरलता के साथ माधोपुर आश्रम में ब्रह्मवेदांत जी के एक बेटे रहते हैं| जबतक आपसे कहा न जाए की ये ओशो के भाई हैं, आप उन्हें नहीं पहचान सकते हैं| आसान नहीं है अपने बड़े भाई को भगवान मान कर उसकी भक्ति में अपने जीवन को मिटा देना| 
जो जानते हैं, उनका कहना है कि ओशो की समाधि आश्रम की सबसे जीवंत जगह है| जो नहीं जानते हैं उनके लिए आश्रम सेक्स का अड्डा है, और रजनीश लड़कियों और ड्रग्स के माफिया थे| 
‘ताओ ते चिंग’ में बूढ़ा लओत्जु कहता है, “When a superior man heard of Tao, He cultivates himself diligently. When an average man heard of Tao, He is doubtful, vague and would give up halfway. When an inferior man heard of Tao, He laughs and thinks of It as foolish. If Tao is not being laughed at, It is not the Great Tao.”
ओशो की समाधि जिस भवन में है, उसे च्वांगतजु के नाम से जाना जाता है| मेहसाणा आश्रम में जिस घर में हम रहते थे, उसका नाम 'लओत्जु' था| और मेरा नाम इक्क्युत्जु है|

अरे...! देखो हाथी है


22-Aug-2019
पुदुच्चेरी आने के बाद से हमने एक नया शौक पाला है, रात को फ़िल्म देखने का| पहले दिन 'आनंद' देखा, दुसरे दिन 'शौक़ीन' और तीसरे दिन 'बरेली की बर्फी'| कल रात कुछ भी नहीं देखा| आनंद मैंने पहले भी कई बार देखी थी, पुरानी फिल्मों में 'गोलमाल, पड़ोसन, चश्मेबद्दूर' चलती का नाम गाड़ी, प्यासा, और अंगूर कुछ ऐसी फ़िल्में हैं, जिन्हें में एक अन्तराल के बाद देखता रहता हूँ| दिव्या को पुरानी फिल्मे देखना पसंद नहीं है, फिल्म चलाने से पहले मुझे फिल्म के बारे में पहले दस मिनट एक्सप्लेन करना पड़ता है, तब जाकर वो राज़ी होती है| 

परसों रात 'बरेली की बर्फी' देखते-देखते सोने में देर हो गई| 11 बजे हम सोने के लिए गए| परिणामतः सुबह उठने में भी लेट हो गया| जल्दी-जल्दी तैयार होकर हम, मातृमन्दिर के अन्दर जाने का 'पास' लेने के लिए, ओरोविल की ओर भागे| रास्ते में एक दिव्यांग व्यक्ति की रेहड़ी से नारियल पानी पिया-एक नारियल का तीस रुपया| दिव्या ने पानी पीने के लिए प्लास्टिक का पाइप लिया, मैं ऐसे ही पी गया| धर्मेद्र स्वामी मरने से पहले मुझे बिना पाइप के नारियल से पानी पीना सिखा गए थे|
सूचना भवन तक पहुँचते-पहुँचते 11 बज गये| "सामने वाले भवन के पहले मंजिल पर जाओ, ध्यान के लिए पास वहीं से मिलेगा, जल्दी करो ऑफिस बंद होने वाला है", नीली शर्ट पहने स्टाफ ने कहा| तेज़ क़दमों से चलते हुए हम बुकिंग ऑफिस तक पहुंचे| "लो, ऑफिस बंद हो गया", दिव्या बोली| "अब दोपहर 2 बजे आओ'', प्रदर्शनी रूम के बाहर खड़े एक व्यक्ति ने हमने से कहा| बुकिंग ऑफिस सुबह 10 से 11 और दोपहर 2-3 खुलता है, मंगलवार बंद रहता है| "नीचे चलो 2 बजे तक हम यहीं वेट कर लेंगे", दिव्या बोली| 'चलो पहले अन्दर चलकर चित्रकला की प्रदर्शनी देख लेते हैं', हॉल की तरफ मुड़ते हुए मैंने कहा| 
हॉल में 1-2-3 करके क्रम से श्री अरविन्द के वचनों के साथ पेंटिंग्स लगे हुए थे| दो-तीन पेंटिंग मुझे बहुत ही आकर्षक लगी| कोई दस मिनट तक चित्रों को निहारने के बाद हम नीचे कैफे के पास आ गए| पेड़ के नीचे पत्थर का एक बड़ा सा टेबल बना था, हम वहीं बैठ गए| "किताब लेकर आई होती, तो यहीं पढ़ लेती, अभी तीन घंटा है हमारे पास", दिव्या बोली| ‘चलो जहाँ से कल मद्रासी कॉफ़ी पिया था, वहीं से आज कैपेचिनो लेते हैं’ मैंने कहा।
गोल टेबल से उठ कर हम कैफे में आ गए हैं| कैफे के बाहर वाले एरिया में लगे छोटे पैरों वाले लाल चेयर पर मैं बैठ गया, दिव्या मेन्यू लेने अंदर चली गई| 'यहाँ के चेयर इतने आरामदायक नहीं हैं कि हम तीन घंटा तक बैठ सकें| इससे अच्छा तो घर चलो, वहीं से खाना आर्डर कर देंगे| खाने के बाद थोड़ी देर आराम करके फिर आ जाएँगे', मैंने दिव्या से कहा| “पार्किंग वाला फिर से 10 रूपये नहीं ले लेगा?, मेन्यू से सिर उठाते हुए दिव्या बोली| ‘यहाँ कॉफ़ी और समोसे का 300 रूपये देंगे, उससे तो अच्छा ही है’, मैंने कहा| “हाँ, ये तो है... चलो घर ही चलते हैं”, बैग उठाते हुए दिव्या बोली| 
दोपहर में जब हम दुबारा आए, तो पार्किंग वाले ने हमसे पैसा नहीं लिया, “आप सुबह आए थे ना?”, पार्किंग वाले ने हम से पूछा| हमने हाँ में सिर हिलाया| “फिर दुबारा आपको पे करने की ज़रूरत नहीं है|” मैंने गर्दन मोड़ कर दिव्या को देखा, उसके चेहरे पर ख़ुशी थी| 
2 बजने से 7 मिनट पहले हम बुकिंग ऑफिस के बाहर खड़े थे| थोड़ी देर बाद हमारे पीछे तीन-चार लोग और खड़े हो गए| ठीक दो बजे ऑफिस खुला| हमसे रूम के अन्दर आ कर एक बड़े टेबल से लगे हुए बेंच पर बैठने को कहा गया| थोड़ी देर बाद स्टाफ में से एक लेडी ने हमें एक कार्ड दिया, “इसे भरिये”| कार्ड का रंग पीला था| यह हमारा मातृमन्दिर के अन्दर जा कर ध्यान करने के पास था| अगले दिन सुबह 8:45 मिनट पर हमें विडियो हॉल में हाजिर होना था| 
‘अब कहाँ चलना है’, गाड़ी स्टार्ट करते हुए मैंने पूछा| “अरविन्द आश्रम के पास ही एक फेमस मंदिर है ‘अरुलमिगु मनाकुला विनयागर टेम्पल’ वहीं चलो| वहीं से संग्रहालय चल लेंगे, फिर शाम में बीच पर चलेंगे”, स्कूटी पर बैठते हुए दिव्या बोली| 
ओरोविल से निलकते समय रास्ते में एक गुलमोहर का बड़ा पेड़ आता है| पेड़ के नीचे की ज़मीन लाल फूलों से पटा रहता है| ओरोविल आते-जाते समय मैं उस पेड़ के नीचे थोड़ी देर ज़रूर रुकता हूँ| “शहर में बचपन बीतने की वजह से मैं पेड़ों के बहुत करीब नहीं आ पाई”, दिव्या गुलमोहर के नीचे मुझसे बोलने लगी“, शहर के बच्चे कुत्ते-बिल्लीयों के प्रेम से कभी आगे नहीं बढ़ पाते हैं|” 
पेड़ से थोडा आगे एक सूखा तलाब है| तलाब में बस नाम मात्र पानी है, पूरा तलाब सूखा है, बस बीच में थोड़ा पानी है, जिसमे कमल के फूल खिले हुए हैं| उस तलाब के घाट पर बैठना भी मुझे अच्छा लगता है| उसी तलाब के पास एक आदमी जाल में बंद करके मुर्गी, तीतर, तर्की और बत्तख के जोड़े बेचता है| तलाब किनारे एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ है| पेड़ के नीचे एक बूढी औरत नारियल पानी बेचती है| पेड़ के पास ही कुत्ते के दो छोटे-छोटे बच्चे-एक काला और दूसरा ब्राउन, खेलते रहते हैं| थोडा और आगे आने पर दिव्यांग व्यक्ति का रेहड़ी है| इसी रेहड़ी से आज मैंने नारियल पानी पिया था| वहीं पास में एक बूढी औरत मछली बेचती हैं| अजनबी शहर में अब बहुत कुछ ऐसा है, जिससे पहचान हो गई है| 
गूगल की मदद से हम मंदिर तक पहुँच गए| ‘जूस वाले से पूछो कि कितने का दे रहा है’, स्कूटी खड़ी करते हुए मैंने दिव्या से कहा| 

23-Aug-2019
"२० रूपये का एक ग्लास बोल रहा है", जूस वाले के पास से पलटते हुए दिव्या बोली| 'उसे बोलो कि दो ग्लास बनाए', स्कूटी का हैंडल लॉक करते हुए मैंने पूछा| "मैं नहीं पियूंगी", बैग से ताम्बे वाला बोतल निकाल कर पानी पीते हुए दिव्या बोली| 'तुम क्यों नहीं पीओगी?', जूस वाले के पास पहुँचते हुए मैंने पुछा| "मैं कुछ और ले लुंगी, तुम जूस पी लो", बोतल का ढक्कन बंद करते हुए बोली| 

'एक ग्लास जूस बनाना, चीनी, नमक और बर्फ कुछ भी मत डालना', मैंने जूस वाले से कहा| उसके रेहड़ी पर करीब दस किलो मौसमी थे| उसने चाकू से चार-पांच मौसमी को बीचो-बीच काट कर दो भागों में बाँट दिया| 'छिलने के बजाय ये गोल-गोल क्यों काट रहा है मौसमी को?', आँखे बड़ी करते हुए मैंने दिव्या से पूछा| "इसका जूस बनाने वाला भी तो देखो कुछ अलग हैं", मेरी तरह वह भी आश्चर्य में डूबी हुई थी| उसका जूस बनाने का मशीन लट्टू के जैसा था, बीच से दो भागों में बंट जाता था| नीचे का भाग मंदिर की तरह उठा हुआ था, और ऊपर का भाग गुम्बंद की तरह खोखला था| नीचे वाले भाग पर उसने मौसमी के कटे हुए टुकड़े पर रखा, फिर हैण्डल घुमा कर ऊपर वाले भाग को नीचे ले आया| एक बार में पूरे फांक का रस दब कर निकल गया| एक मिनट से भी कम समय में सारे फांकों से रस निकाल कर उसने एक ग्लास जूस मुझे पकड़ा दिया| "वाह! क्या सही तरीका है, हमारे यहाँ जैसे जूस निकालते हैं, उससे तो यही सही है", आश्चर्य से खुश होते हुए दिव्या बोली| 
जूस पीने के बाद रोड पार करके हम मंदिर वाले रोड पर आ गए, "अरे...! देखो हाथी है", रोड पर एक फीट कूदते हुए दिव्या बोली| 'अंधी यही तो मैं तुमको रोड पार करते हुए कह रहा था, ध्यान कहाँ था तुम्हारा', हाथी की मौजूदगी को हल्के में लेते हुए मैंने कहा| हालाँकि हाथी देखकर मैं भी उसके इतना ही उत्साहित था| लेकिन हमारे बीच एक शीत युद्ध चलता रहता है| जिस चीज़ को लेकर वह उत्साहित होती है, उसके प्रति मैं उदासीन हो जाता हूँ, जो मुझे पसंद होता है, उसके प्रति उसका रवैया तीखा हो जाता है| तथ्य यह है की हम दोनों की पसंद-नापसंद कुछ एक अपवादों को छोड़ कर करीब-करीब एक जैसी है| 
मंदिर के गेट के बाहर एक छोटे से घेरे में हाथी को रखा गया था| घेरे के अन्दर हाथी की सुविधा के लिए मिट्टी डाला हुआ था| हाथी की उम्र बहुत कम थी| उसके पूरे शरीर पर कलाकारी की हुई थी| आगे के दोनों पैरों में पायल पहनाया हुआ था| गौर से देखने पर पता चला यह हाथी नहीं हथनी है| गले में उसके नाम का बोर्ड लटका हुआ था 'लक्ष्मी'| आते-जाते श्रद्धालु उसके सूंढ़ पर पैसा, केला और प्रसाद रख देते थे, भेट पाने के बाद वह सूंढ़ मोड़ कर लोगों को आशीर्वाद देती थी| फिर अगर केला या खाने की कोई चीज़ हो तो खा लेती थी, पैसा होने पर अपने मालिक को दे देती थी| उसका मालिक वहीं उसके पैरों के पास मुंडेर पर बैठा था| एक आदमी वहीं तेल वाले कंटेनर में कुछ लेकर कर आया था, उसका बड़ा-बड़ा गोला बना कर हाथी के मुंह में डाल रहा था| "ये लोग क्या खिला रहे हैं, उसको?", दिव्या मुझसे पूछी| 'पता नहीं क्या खिला रहे हैं, लगता है आटा में केला मिला कर खिला रहे हैं', अंदाज़े से मैंने कहा| "मैं उसको पैसा देने जाती हूँ, तुम मेरी विडियो बनाओ", उसके चेहरे पर छोटे बच्चों जैसी चमक थी, और मेरे चेहरे पर बाप जैसी कठोरता| 'फिर शुरू हो गया तुम्हारा बोकलोली, विडियो बनाने की क्या जरूरत है, मैं देख रहा हूँ तुम्हारा मोबाइल एडिक्शन बढ़ता जा रहा है', कहते हुए मैंने उसे अपने जेब से पांच रूपये का सिक्का दिया| "पांच रुपया नहीं दस का नोट दो", पांच रुपया मेरे जेब में वापिस रखते हुए बोली, उससे पहले मैंने क्या बोला था उस पर उसने कान नहीं दिया| उस बात पर उसे बाद में लड़ाई करनी थी, अभी किसी भी सूरत में विडियो बनानी थी| कोई आम मौका होता तो, मुझे दस सुना चुकी होती-मेरा मोबाइल एडिक्शन बढ़ रहा है, तो तुम्हारा कौन से मीठे का एडिक्शन कम हो रहा है, दस-दस रसगुल्ला खाते समय नहीं सोचते हो| 
हाथी के साथ दिव्या का विडियो बनाने के बाद हम मंदिर के अन्दर गए| अंदर लगे बोर्ड से पता चला कि यह मंदिर अरविन्द आश्रम के सहयोग से बना है| मंदिर में लगी मूर्तियों के सामने दक्षिण भारतीय श्रद्धालु| अलग-अलग तरीके से नाक-कान पकड़ कर मूर्ति को प्रणाम कर रहे थे| मंदिर साफ़-सुथरा और काफी फैलाव वाला था| प्रांगण में कुछ लोग आँखे बंद किए ढोंग-धतूरे में लीन थे| 
मंदिर से निकल कर हम ‘बीच’ की तरफ जाने लगे| रास्ते में एक जगह HDFC का एटीएम देखकर मैंने स्कूटी रोकी| ‘चार हज़ार रूपये निकाल लो’, एटीएम कार्ड देते हुए मैंने दिव्या से कहा| कार्ड लेकर वह एटीएम के अंदर पैसा निकलने के लिए चली गई| “पैसा फंस गया”, थोड़ी देर बाद एटीएम से बाहर निकल कर बोली| मैंने जेब से मोबाइल निकाल कर देखा था| बैंक से 4000 निकालने का मेसेज आया था| ‘रुको में आता हूँ’, कहकर मैं गाड़ी खड़ी करने के लिए रोड के उस तरफ गया| जबतक मैं गाडी खड़ी करके के एटीएम पर आया, बैंक से दूसरा मेसेज आ गया, चार हज़ार अकाउंट में वापिस आ गए थे| ‘चलो बच गए, पैसा कहीं और से निकाल लेंगे’, एटीएम पर खड़ी दिव्या से मैंने कहा| 
एटीएम से निकल कर हम ‘बीच’ पर आ गए है| थोड़ी देर बीच पर बैठने के बाद मैंने कहा, ‘रात में लेट खाने से अच्छा से चलो अभी ही कुछ खा लेते हैं, अगर तुम कहो तो पहले दिन रेलवे स्टेशन के पास जहाँ से इडली खाया था, उसी के यहाँ चलते हैं| सही खिलाता है वह|’ दिव्या खाने के नाम पर राजी हो गई| खाने के लिए इसे कभी भी राजी किया जा सकता है| “रेलवे स्टेशन यहाँ से पास ही है’’, उठते हुए बोली| ‘हाँ उस दिन चर्च के पास से मैंने ट्रेन खड़ी देखी थी’, मैंने कहा| ‘हें’अ’, बोलकर वह मेरे साथ रोड पार करने लगी|
इडली वाले के यहाँ जब हम पहुंचे तो पता चला कि वहां कुछ काम चल रहा है| एक घंटा समय लगेगा| “चलो फिर बीच पर ही कुछ देर बैठ लेते हैं| शाम ढलने के बाद रूम पर चल चलेंगे|”, निराश होते हुए दिव्या बोली| ‘हाँ चलो गाडी में पेट्रोल भी डलवाना है’, हेलमेट पहनते हुए मैं बोला| “ये हेलमेट क्यों लगा लेते हो तुम, कोई तो लगता नहीं, पुलिस ऐसे ही सब जगह घूमती रहती है| तुम्हारी हेलमेट की वजह से ही पुलिस ने उस दिन हमें रोक कर चेक किया था”, गाडी पर बैठते हुए दिव्या बोली| मैं भी सोचना लगा कि यहाँ हेलमेट के मामले में लोग इतने ढीले क्यों है| एक परसेंट लोग भी हेलमेट नहीं लागते हैं|

Thursday, 22 August 2019

पुदुच्चेरी में पुणे की बात लिखो


कल शाम दिव्या कह रही थी, "ये तुम्हारे लिखने की वजह से मुझे सब कुछ संभल-संभल कर बोलना पड़ता है, ऐसा लग रहा जैसे में हमेशा किसी कहानी में जी रही हूँ| कुछ भी करने से पहले सोचना पड़ता है| पता नहीं तुम क्या लिख दो|  अब तुम अभी जो कह रही हूँ उसको भी मत लिख देना..हाँ तो...! ये टटका लिखना बंद करो...पुदुच्चेरी में पुणे की बात लिखो, फिर जब हम यहाँ से बंगलोर जाएँगे तब यहाँ की लिखना|"
मुझे दिव्या की बात जंची, यह मैं भी देख रहा हूँ, टटका लेखनी में उतना स्वाद नहीं होता है, जितना बसिया में| मुझे याद है गाँव में अक्सर, बाढ़ के दिनों में, मछली का रेल-ठेल हो जाता था| पिता जी इतनी मछली ला देते थे कि माँ सिर्फ मछली रान्ह कर (बना कर) रख देती थी, अब सुबह से लेकर शाम तक खाओ मछली-ही-मछली, चावल रोटी सब बंद| आम के सीज़न में में भी घर में कई दिनों तक खाना नहीं बनता था| सुबह उठा तो, चार-पांच बाल्टी में मुंह कटा आम भरा रहता था| आम, माछ और दूध से मन अक्सर अकछ (उब) जाता था|
हाँ, तो मैं आपसे बसिया-टटके की बात कर रहा था| बोआरी माछ ठंड के दिनों में टटका में उतना अच्छा नहीं लगता था, जितना अगले दिन बसिया हो जाने पर| गर्म भात के साथ रात का जमा हुआ बोआरी माछ..आह...! मुझे लगता है, लिखना भी बोआरी माछ है| जितना पुराना हो जाता है, उतना अच्छा लगता है-पढ़ने में भी और लिखने में भी|
अरविन्द आश्रम समंदर (पुदुच्चेरी बीच) के बिलकुल पास है| जब हम आश्रम के गेट पर पहुंचे तो, हमें रोड के उस तरफ चप्पल जमा करने के लिए कहा गया| बाहर से देखने में पर आश्रम वैसा ही दिख रहा था, जैसा आस-पड़ोस का बांकी फ्रेंच स्टाइल घर, स्लेटी रंग पर सफ़ेद की पट्टी, लकड़ी के छोटे-छोटे पल्लों वाली खिड़कियाँ| आश्रम का पूरा एरिया ही बहुत बहुत ही सुन्दर और शांत है| अन्दर पहुँचने पर गार्ड ने हमें इशारे से समाधि की ओर जाने को कहा| रस्ते में अपनी बाईं तरफ मैंने कैक्टस का विशाल वृक्ष देखा| पुदुच्चेरी में जगह-जगह पर कैक्टस के अलग-अलग प्रजाति के पेड़ लगे हुए हैं| कोई बीस कदम चलने के बाद अरविन्द और माता जी (श्री अरविन्द घोष की अध्यात्मिक संगनी) की समाधि आ गई| एक विशाल पेड़ के नीचे संगेमरमर का बड़ा चबूतरा था| दो लोग चबूतरे से सिर टिकाए बैठे थे, एक दो लोग चबूतरे की परिक्रमा कर रहे थे| दो-चार लोग चबूतरे से दूर दीवार किनारे बैठे आँख बंद करके ध्यान कर रहे थे(यहाँ मास्टर उगवे होते तो कहते, “ये ढोंग-धतूरा कर रहे हैं)| दीवार के पास बैठे गार्ड ने मुझसे हेलमेट उसके पास रख कर समाधि की परिक्रमा करने को कहा| परिक्रमा करने के बाद हम गार्ड के बगल में दीवार से लग कर सुखासन में बैठ गए| मैंने दो मिनट के लिए आंख बंद करके ध्यान करने का नाटक किया, जब आँख खोला तो देखा दिव्या पहले से आँख खोले बैठे थी|
'इस पेड़ का क्या नाम है?', मैंने स्टूल पर बैठे गार्ड से पुछा| "हम इसे सर्विस ट्री कहते हैं", गार्ड धीरे से बोला| सर्विस ट्री? नाम थोडा अटपटा लगा मुझे| 'सब जगह इसे सर्विस ट्री ही बोलते हैं?', मैंने पुछा| "ये पता नहीं, लेकिन यहाँ यही बोलते हैं", गार्ड ने अफ़सोस व्यक्त किया| यहाँ का गार्ड पुणे के गार्ड जैसा ही था| पुणे में भी मैंने एक गार्ड से पेड़ का नाम पूछा था, उसे पता नहीं था तो वह तीन और से पूछ कर आ गया, लेकिन किसी को पता नहीं था| लगता है, आज कल लोग पेड़ों को हल्के में ले रहे हैं|
अरविन्द ने 1950 में देह त्यागा था, पेड़ उतना पुराना तो नहीं लग रहा था| हो सकता है समाधि बनाने के बाद लोगों से पेड़ लगा दिया हो| पेड़ के पत्ते गुलमोहर के पत्तों जैसे छोटे-छोटे थे| समाधी के ऊपर चादर की छत थी, जिसकी वजह से समाधी कुछ-कुछ मजार जैसा दिख रहा था|
समाधी से उठने के बाद हम अंदर हॉल में गए| हॉल में अरविन्द की और अरविन्द से जुडी किताबें और तस्वीरें थी| दिव्या ने 35 रूपये में अरविन्द की एक तस्वीर खरीदी| सब जगह से उसको तस्वीर खरीदने की बीमारी है|
हॉल से निकल कर हम लाइब्रेरी में आ गए| एक बुजुर्ग (स्टाफ) खिड़की की तरफ मुंह किए अपनी टेबल पर बैठे थे| जिस गेट से हम प्रवेश किये उसके ठीक सामने बड़े टेबल पर एक अमेरिकन लेडी 'सावित्री' से नोट्स बना रही थी| 'हम यहाँ आधा घंटा बैठ सकते हैं', मैंने दिव्या से पूछा| उसने सहमती में सिर हिलाया| 'यहाँ बैठ कर पढ़ने के लिए 'सावित्री' मिल सकती है?', मैंने दफ्तर बाबू से पूछा| मुझे यह समझ नहीं आया की ये हमारी और पीठ करके क्यों बैठे हैं| ऑफिस में किसी को इस तरह उल्टा बैठे मैंने पहली बार देखा था| मेरे देखा-देखी दिव्या ने भी उनसे सावित्री ही माँगा|
अमेरिकन लेडी के ऑपोजिट बैठकर मै किताब पढ़ने लगा| दिव्या मेरे बगल में बैठ गई| बाबू ने हमें एक, एंट्री करने के लिए, नोट बुक और पेन ला कर दिया| मैंने उसमे अपना नाम और पता लिख दिया|
'सावित्री' की पहली लाइन मुझे हमेशा से पसंद रही है, "It was the hour before the Gods awake." वाह...! इस बार यह लाइन पढ़कर मुझे गीत चतुर्वेदी की कविता ‘छोटा ईश्वर’ की याद आ गई| हालाँकि गीत ने ‘छोटा ईश्वर’ नीत्शे से प्रभावित होकर लिखा है| इतनी मोटी किताब को आधे घंटे में पढने का कोई मतलब नहीं था| किताब के आखरी पन्नो (पेज 738) पर अरविन्द द्वारा लिखे हुए सावित्री से सम्बंधित कुछ ख़त छपे हुए थे, मैं उन्ही खतों को पढ़ने लगा|
समाधि, हॉल और पुस्तकालय के आलावा आश्रम किसी और हिस्से में जाने की अनुमति नहीं थी| इससे मैं बड़ा निराश हुआ| मैं अरविन्द के शयनकक्ष में जाना चाहता था| गार्ड से पूछने पर पता चला कि समाधी के बगल वाले घरों में ही अरविन्द और माता जी रहते थे| हॉल से सटा एक सूचना रूम था, जहाँ से मैंने पांच रूपये में एक लीफलेट खरीदा, उसमे आश्रम और अरविन्द के बारे में थोड़ी जानकारी छपी हुई थी| सूचना रूम में बैठी महिला से जब मैंने कुछ जानकारी लेनी चाही तो पाया कि आप अमिताभ बच्चन की मम्मी हैं, फुसफुसा कर बोलती हैं, और आधी बात अन्दर ही खा जाती हैं| उनसे बातचीत करना संभव लगा|
आश्रम से निकल कर हम 'पुदुच्चेरी संग्रहालय' गए| संग्रहालय आश्रम से ज्यादा दूर नहीं था| “लाइट गई हुई है, अन्दर कुछ दिखेगा नहीं, आप लोग कल आइये”, संग्रहालय के गेट पर खड़े गार्ड ने हमसे कहा| वहां से स्कूटी स्टार्ट करके हम चर्च गए| चर्ज संग्रहालय से कोई एक किलोमीटर की दूरी पर होगा| चर्च के पास जब स्कूटी खड़ी कर रहा था, तो वहां से रेलवे लाइन दिखा, मतलब रेलवे स्टेशन भी यहीं कहीं आस-पास था| मेरे ख्याल से 10-15 किलोमीटर के भीतर ही घूमने और देखने की सारी जगहें हैं|
चर्ज मुझे कुछ ख़ास नहीं लगा| एक बड़े चर्ज को जैसा होना चाहिए था, वह बिलकुल वैसा ही था| चर्च और मंदिर मुझे टूटा-फूटा ही अच्छा लगता है| पूरा चर्च खाली था, जीसस अकेले सूली पर लटके हुए थे| थोड़ी देर बाद दो-तीन लोग आए और जीसस की तस्वीर खींच कर ले गए हैं| सूली पर लटके जीसस मुझे अच्छे नहीं लगते हैं| मौत और दुःख का ऐसा प्रदर्शन मुझे धार्मिक कम राजनीतिक ज्यादा लगता है| सूली वाले जीसस रुग्ण लोगों की इजात लगते हैं| पैगंबर का मंदिर नाचता, गाता और उत्सव पूर्ण होना चाहिए| बाइबल के जीसस से मुझे अथाह प्रेम है, लेकिन चर्च के जीसस से नहीं|
चर्च के बाद हम बीच पर आ गए| बीच के सामने बने फ्रेंच स्टाइल घर, होटल और सरकारी भवन, चोड़े पत्ते वाले छोटे-छोटे आदम कद पेड़, घर के आगे लगे पत्थर के बेंचो पर बैठे बुजुर्ग दम्पति, कहीं किताब पढ़ता युवक, तो कहीं चोंच मिलाता प्रेमी युगल, इम्तियाज़ अली के किसी फिल्म का सुंदर दृश्य लग रहा था| अगर आपने मुंबई का नरीमन पॉइंट देखा है, तो इस बीच की थोड़ी कल्पना आप कर सकते हैं| यहीं बैठे-बैठे, समन्दर की लहरों को देखते हुए, मेरे अन्दर पुदुच्चेरी के लिए पहली बार प्रेम का जन्म हुआ| अचानक यह शहर अपना और जाना-पहचाना लगने लगा| मैंने हाथ में डंडा लिए पास खड़े लड़के को इशारे से बुलाया| “अब तुम हवा मिठाई खाओगे?”, दिव्या बोली| मैंने अपने लिए लाल वाला पैकेट लिया, दिव्या ने ब्लू वाला लिया| ब्लू वाला हवा मिठाई मैं पहली बार देख रहा था|
हवा मिठाई खाते हुए हम नेहरु स्टेचू के पास ‘हैंडी क्राफ्ट’ का प्रदर्शनी देखने के लिए चल दिए...| ‘सिर्फ देखना है, खरीदना कुछ भी नहीं है’, प्रदर्शनी के अंदर जाने से पहले मैंने दिव्या से कहा| “अन्दर जाने से पहले कल वाली जगह से गन्ने का जूस पी लें”, दिव्या बोली| ‘नेकी और पूछ-पूछ’|


Wednesday, 21 August 2019

उदासी, घुमकड़ी और पुदुच्चेरी!

21-Aug-2019
पहली बार जब गोवा गया था, तो वहां कोई 5-6 दिन रहा था| जब वहां से निकलने लगा तो दिल बड़ा उदास था, पता नहीं क्यों वहां से जाने का मन ही नहीं कर रहा था| उसी उदासी को मिटाने एक साल बाद फिर से गोवा गया, इस बार 15 दिन से भी ज्यादा रहा| पन्द्रह दिन में इतना उब गया गया कि इस साल दोस्तों ने जब गोवा चलने के बात की तो मैंने सिरे से खारिज कर दिया|
तरसों जब पुदुच्चेरी पहुंचा तो मैं कुछ बहुत खुश नहीं था| खुश नहीं था इसका मतलब ये नहीं है कि उदास था, लेकिन कुछ-कुछ उदासीन जैसा ज़रूर था| शहर बड़ा पराया-पराया लग रहा था, अजनबी लोग, अजनबी जबान और अपने उद्देश्य का भी ठीक-ठीक पता नहीं था कि हम यहाँ क्यों आए हैं| यहाँ आना बिलकुल जीवन में आने जैसा था, हम क्यों और कहाँ से आते हैं, कुछ भी तो पता नहीं होता है|
अरविन्द को मैंने थोड़ा पढ़ा है, सावित्री को कई बार उलट-पुलट कर देखा है, लेकिन जैसा लगाव मुझे रविन्द्रनाथ से है, वैसा अपनत्व मैंने कभी अरविन्द के साथ महसूस नहीं किया| अरविन्द के लिए मेरे हृदय में सम्मान जरूर है, लेकिन उनसे प्रेम मुझे बिलकुल भी नहीं है|
‘पास’ मिलने के पास जब हम मातृमन्दिर के लिए जा रहे थे, रास्ते पर चलते हुए मुझे देवघर के रास्ते की याद आ गई| वाहं भी ऐसी ही लाल मिट्टी पर चला करते थे| मातृमन्दिर का रास्ता कुछ-कुछ देवघर जैसा था| सुन्न, शांत, और सघन जंगल में चलते हुए कई बार ऐसा लगा जैसे अब कोई बोल-बम करता हुआ बगल से गुजरेगा|
रास्ते में पुराने बरगद और उसी के पास नारियल के पत्तों से बने पिरामिड को देखकर मन गदगद हो उठा| इतना पुराना बरगद बहुत दिन बाद देखा, 50 से अधिक जड़े ज़मीन में घुस कर तने बन गए थे| पेड़ के पास 'पेड़ पर न चढ़े' का बोर्ड लगा देख कर मन खिन्न हो गया| राव साहब जब मेरे गाँव आए थे, तब हम रोज़ सुबह गावं के सबसे पुराने तालाब के पास वाले मौलसिरी के वृक्ष के ऊपर बैठ जाते थे| वहां बैठ कर जैसी ब्रह्मचर्चा हम किया करते थे, वैसी गहन चर्चा पहले कहीं नहीं हुई थी| 'पहले मैं और साकेत साथ ही पास वाले स्कूल में पढ़ते थे, वह मेरे से तीन दर्ज़ा पीछे था| जब में चौथी कक्षा में आया तो दादाजी ने कहा कि अब इसका नाम सरकारी स्कूल में लिखा दो| एक दर्ज़ा छोड़ कर मेरा नाम पांचवी कक्षा में लिखवा दिया गया| घर से हम दोनों भाई साथ स्कूल के लिए निकले| आज मुझे अलग स्कूल में जाना था| साकेत मुझे नए स्कूल तक छोड़ने के लिए इसी पेड़ के नीचे तक आया था| इस टहनी के नीचे हम दोनों खड़े थे| हमारा पुराना स्कूल सड़क के उस तरफ था| जब साकेत यहाँ तक मुझे छोड़ कर जाने लगा, तो मैं रोने लगा| पहली बार उससे दूर हो रहा था| आज भी मैं ख़ुद को इस पेड़ के नीचे खड़ा रोता हुआ देख सकता हूँ| साकेत मेरा थियो है|', पेड़ के ऊपर बैठे-बैठे मैंने राव साहब से कहा| आज यहाँ बरगद के पेड़ को देख कर मेरा उस पर चढ़ कर बैठने का बड़ा मन था, लेकिन उस बोर्ड ने मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया|
बतौर विजिटर आप मातृमन्दिर को सिर्फ दूर से देख सकते हैं| अंदर जाने के लिए आपको अलग से 'पास' लेना होता है| सुबह ८:३० से ११:३० तक अन्दर ध्यान होता है, जिसके लिए सूचना भवन के पास वाली ईमारत के पहली मंजिल से आपको 'अनुमति पत्र लेना होता है| हम जहाँ से खड़े हो कर मन्दिर को देख रहे थे, वहां से मंदिर आग के गोले की तरह दिख रहा था| 'आज चल के पास ले लेते हैं, कल ध्यान करने के लिए आएँगे', मैंने दिव्या से कहा| मेरी बात सुनकर उसने ऊँगली से एक ओर इशारा किया हैं| लकड़ी की एक प्रतिमा मुंह पर ऊँगली रख कर चुप रहने को कह रहा था| मंदिर के लिए आते समय हमारी दोस्ती एक हैदराबादी दंपत्ति से हो गई थी, वे लोग पोज़ दे कर तस्वीर खींचने में व्यस्त थे| हम एक पेड़ के नीचे बैठ कर मंदिर को देखने लगे|
‘हैदराबादी लोगों की हिंदी कॉमेडी लगती है मुझे”, दिव्या बोली| ‘यही मैं उस प्रोफेसर से कह रहा था| इनके यहाँ की दो फिल्म मैंने देखी है, ‘हैदराबादी बिरयानी और अँगरेज़’ दोनों मुझे अच्छी लगी थी|’, मैंने दिव्या से कहा| “वो प्रोफेसर हैं? उनकी पत्नी मुझसे कह रही थी कि वो अपने पति से बहुत परेशान है| घर पर तो ठीक रहते हैं, पता नहीं कहीं घूमने आने पर उनको क्या हो जाता है|”, दिव्या बोली| ‘यात्रा में अक्सर लोगों के व्यक्तित्व का नया पहलु खुल कर सामने आता है, शांत बातूनी हो जाता है, बातूनी बदमाश और बदमाश सज्जन|, चीन में कहते हैं अगर किसी व्यक्ति को पूरा-पूरा जानना हो तो उसके साथ यात्रा पर ज़रूर जाना चाहिए’, धीरे से मैंने कहा| “अब यहाँ से चलो, कल के ध्यान के लिए पास ले लेंगे, फिर पुदुच्चेरी कौतुकालय चलेंगे, वहीं एक पुराना चर्च (Basilica of the Sacred Heart of Jesus) भी है, हम वहां भी चल सकते हैं|”, दिव्या बोली| ‘नहीं, तुम पहले ‘अरविन्द आश्रम का पता करो कि वह कहाँ है, यहाँ से हम पहले वहीं चलेंगे|’, मैंने कहा|
इंफोर्मेशन सेंटर से पता चला कि पास के लिए कल सुबह आना होगा| मंगलवार को पास नहीं मिलता है| ‘चलो कैफे में चल कर कॉफ़ी पीते हैं’, मैंने दिव्या से कहा| हमने एक होममेड समोसा और मद्रासी कॉफ़ी ऑर्डर किया| एक समोसा 30 रूपये का था, और कॉफ़ी 40 रूपये का| ओशो आश्रम की तरह कैपेचिनो यहाँ भी 130 रूपये की थी| थोड़ी देर बाद, हमारा आर्डर आ गया| पीतल के कटोरे में एक पीतल का ही ग्लास था, जिसमे कॉफ़ी भरा था| ऐसी कॉफ़ी हमने एक बार राव साहब के साथ खजुराहो में पी थी| मेरे ख्याल से जिस कैफे में हमने ये कॉफ़ी पी थी, उसका नाम ‘मद्रास कैफे’ था| समोसे के अंदर डोसे का मसाला भरा हुआ था| “अरविन्द आश्रम, पुदुच्चेरी संग्रहालय के पास ही है”, मोबाइल देखते हुए दिव्या बोली| “आश्रम 2 से 6 खुला रहता है| अब चलो यहाँ से, घर चल कर खाना आर्डर कर देते हैं, फिर खा कर आश्रम चलेंगे”, दिव्या बोली| ‘पहले कॉफ़ी तो खत्म कर लूं’, मैंने कहा| पीतल का पात्र काफी गर्म हो गया था| ‘कॉफ़ी कम और झाग ज्यादा था’, ग्लास रखते हुए मैंने दिव्या से कहा|


मातृमंदिर पुदुच्चेरी (सफ़र-ए-मुसलसल)

18-Aug-2019

नाम का आदमी ही की तरह शहर पर भी असर पड़ता है। इस शहर का नाम पुदूच्चेरी (पोंडिचेरी) है और यहाँ सब कुछ प-से-पीला है। रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही रोड के उस तरफ़ गोल्डन रेस्तराँ है, वहीं इडली, दाल वडा, सांबर और नारियल की चटनी खाया। खाना दी-बेस्ट था! केले के पत्ते पर एक बार दिल्ली में नैवेदम में भी खाया था, लेकिन ऐसा स्वाद नहीं था। 
नाश्ता करने के बाद, एक पीले-auto में बैठे कर अभी-अभी hotel पहुँचा हूँ, रास्ते में ज़्यादातर घर और दीवारें पीले रंग से पुता हुआ था...auto वाले को 170/- रुपये में बात करके लाया था, लेकिन पैसा लेते समय उसने ऐसा पीला मुँह बनाया की 200 देना पड़ा..! अरे हाँ वो दो सौ का नोट भी तो पीला ही था!


19-Aug-2019

कल ECR रोड पर होटल पलाशियल पोंदि में रुका था। वहाँ से पुदूच्चेरी कौतुकालय बहुत नज़दीक तो नहीं लेकिन दूर भी नहीं था। शाम होटल से निकल कर हम यूँ ही रोड पर टहल रहे थे, एक जगह लोगों को ऑटो में बैठते देखा। पूछने पर पता चला कि ऑटो हमें जहाँ तक ले जाएगा वहाँ से बीच आधा किलोमीटर है। पैसे का पूछ कर हम ऑटो में बैठ गए। शाम के ६ बज रहे थे, अँधेरा होने में ज़्यादा वक़्त बाँकी नहीं था। रास्ते में जगह-जगह पर राजीव गांधी की तस्वीरें लगी। तिरंगे का चक्र बना कर बीच में उनकी गोल तस्वीर लगी हुई थी, अजनबी भाषा में क्या लिखा था समझ नहीं आया। 
ऑटो वाले ने हमें राजा टकीज पर उतारा। दो जन का १४ रुपया किराया लिया। राजा टकीज से हमें पैदल चल कर जाना था। रास्ते में हम ग्रैनड बाज़ार पुलिस स्टेशन और नेहरु रोड से होकर गुज़रे। नेहरु रोड से सटा हुआ ही म्यूजियम था। शाम हो जाने की वजह से म्यूज़ियम बंद हो गया था। एक जगह दीवार पर नेता जी(सुभाषचंद्र बोस) की (शायद 1945 की ) एक तस्वीर लगी हुई थी। बीच पहुँचने से पहले एक जगह हमने गन्ने का जूस पिया। जूस का स्वाद बहुत ही अलग था, ऐसा लग रहा था जैसे गुड़ का शर्बत हो।
बीच कुछ-कुछ मुंबई के नरीमन point जैसा था। किनारे पर गांधी जी की एक बड़ी मूर्ति खड़ी थी। बीच पर लोगों की अच्छी ख़ासी संख्या मौजूद थी। एक साफ़ पत्थर देखकर हम बैठ गए। “रूम लॉक का झमेला नहीं हुआ होता तो हम जल्दी पहुँच जाते”, दिव्या बोली। 
‘वो लेडी दो बार ‘aai-ai-o’ बोल कर चली क्यों गई?’ 
“वो लॉक करती थी, और तुम बार-बार गेट खोल देते थे, तो वो क्या करती, वो शायद रेसेप्शन पर बताने चली गई।” 
‘वो लॉक बिल्कुल मेहसाणा आश्रम जैसा था। याद है एक बार कैसे हम चाभी रूम में भूलकर रूम बंद कर दिए थे।’
“हाँ, तब हम स्वीमिंग पूल के पास रबिया में रह रहे थे। शुक्र था कि खिड़की थोड़ी खुली हुई थी, वरना गेट काटना पड़ता।”
‘लेकिन यहाँ तो रूम लॉक ही नहीं हो रहा था।’
“चलो अब चलते हैं, क्या पता लेट हो जाने पर जाने के लिए कुछ मिले ही ना”


आज हम जहाँ रुके हुए हैं, वहाँ से बीच सिर्फ़ तीन सौ मीटर की दूरी पर है। कल के होटल की तुलना में आज का फ़्लैट ज़्यादा सही है। फ़्लैट में घर वाली फ़ीलिंग आ रही है। पहले हमने यहाँ एक दिन की बुकिंग की थी, लेकिन आने के बाद हमें लोकेशन और सबकुछ इतना सही लगा कि दो दिन की बुकिंग और कर दी। ECR (ईस्ट कोस्ट रोड) से सटा 1BHK फ़्लैट है, अंदर ज़रूरी और ग़ैरज़रूरी सब सामान उपलब्ध है। किचन में सब कुछ है, बस बर्तन नहीं है, अगर बर्तन होता तो मज़ा ही आ जाता। धर्मकोट की तरह यहाँ भी ख़ुद ही खाना बना लेते हम। 
औरोविल यहाँ से आठ किलोमीटर की दूरी पर है। 
धर्मकोट से जब मैंने औरोविल आने का प्लान बनाया था, तब हम चार लोग आने वाले थे। लेकिन, आख़िर-आख़िर में दो लोगों का प्लान रद्द हो गया। राव साहब अपनी शाश्वत खुजली और स्वामी आनंद तीर्थ अपने ऑफ़िस की वजह से नहीं आ पाए। 
भाषा ना समझ आने की वजह से कहीं आना जाना यहाँ बड़ा मुश्किल है। हिंदी तो छोड़िये लोग इंग्लिश भी नहीं समझते हैं। मकान मालिक सुबह पाँच मिनट तक क्या बोल कर गया कुछ समझ नहीं आया। उत्तर भारतीय खाना भी यहाँ ना के बराबर ही मिलता है। जिस फ़्लैट में हम रह रहे हैं, उसके बाहर ही ‘मिड टाउन’ रेस्तराँ हैं, वहीं से ऑनलाइन ऑर्डर देकर दोपहर का खाना मँगाया था। डोसा 60 रुपए था और एक रोटी 40 रुपये का। बटर पनीर का स्वाद भी साम्बर जैसा था। 
अभी जैसा यहाँ महसूस कर रहा हूँ, ऐसा ही कुछ-कुछ कोलकाता में भी लगा था। हिंदी/इंग्लिश ना बोल पाने की वजह से बड़ी घुटन महसूस हो रही हैं।


नोट-फ़्लैट का रंग पीला है।
20-Aug-2019
जहाँ से हमें स्कूटी लेनी थी, कल उनके पास स्कूटी उपलब्ध नहीं थी, आज सुबह उन्होंने बुलाया था| सुबह उठकर हम पैदल ही मातृमंदिर की ओर चल दिए, मौसम आच्छा था, चलने में मजा आ रहा था, 'हरिवंश राय बच्चन के मामा रोज़ सुबह उठकर, अपने घर से सात किलोमीटर दूर' गंगा नहाने जाते थे', मैंने दिव्या से कहा| "हमारा भी आज आठ किलोमीटर तो हो ही जाएगा, मातृमंदिर यहाँ से 7.5 किलोमीटर बता रहा है", मोबाइल देखते हुए दिव्या ने कहा| 'बाइक वाले का एड्रेस डाल कर देखो, मेरे ख्याल से उसका पहले आएगा, अमोल स्वामी ने बताया था कि SBI बैंक वाले चौराहे के पास है|', मैंने दिव्या से कहा| 
एक किलोमीटर चलने के बाद हमने एक जगह रुककर नारियल पानी पिया, 30 रूपये का एक नारियल| सोमनाथ में नारियल बहुत सस्ता है, 5-15 रूपये के बीच आपको कैसा भी नारियल मिल जाता है| "ये देखो मदर्स-ग्रेस", मेरा ध्यान आकर्षित करते हुए दिव्या बोली| 'मुझे लगता है, ये वही हैं जिनसे हमने तीन साल पहले बात की थी' (मेहसाणा आश्रम में रहते हुए हमने एक बार पोंदिच्चेरी में शिफ्ट होने की सोची थी, तभी Mother's Grace वालों से बात की थी)| 'चलो लौटते समय इसकी एक फोटो खींच कर संजय स्वामी को भेज देंगे, उन्होंने ही यहाँ के बारे में बताया था', आगे बढ़ते हुए मैंने दिव्या से कहा| 
"अगर बाइक वाले के पास आज भी बाइक नहीं हुआ तो?" चलते हुए दिव्या ने चिंता जतलाई| 'किसी और के यहाँ देखेंगे, अगर एक 150 में दे रहा रहा है, तो वहां और भी ऐसे होंगे जो इतने का दे देंगे', मैंने कहा| "ऐसा कैसे है कि बाहर 350/- में एक दिन के लिए दे रहा है, और अन्दर औरोविल में सिर्फ 150/- में, हैरानी की बात है|" सिर खुजाते हुए दिव्या बोली| 'ये देखो SBI वाला चौराहा तो आ गया, बाइक वाला यहीं कहीं आस-पास होगा', नज़रे घुमाते हुए मैंने कहा| "यहाँ कैसे होगा, औरोविल यहाँ से 6 किलोमीटर बता रहा है|" मोबाइल देखते हुए दिव्या बोली| 'अमोल स्वामी ने कहा था बाइक वाला मातृमंदिर मंदिर से पहले है, 6 किलोमीटर मंदिर का बता रहा है, तुम 'कुमार बाइक' या फिर 'न्यू क्रिएशन' डाल कर देखो, या फिर सीधा उनको फोन करो|', मैंने कहा| दिव्या मोबाइल में पता डाल कर देखने लगी| "अरे हाँ यहीं आस-पास बता रहा है...", चहकते हुए बोली, "मुझे तो लगा पूरा आठ किलोमीटर चल के जाना होगा|"
"पुणे में बारिश हो रही थी?", बाइक वाले ने हमसे पुछा| 
मुख्य सड़क से थोड़ा हटकर जंगल में 'कुमार बाइक' वालों का अड्डा है| 
"हाँ वहां बारिश हो रही थी", दिव्या ने बाइक वाले से कहा| 
"दस साल से यहाँ का मौसम दिन-ब-दिन बिगड़ता ही जा रहा है, इस बार बहुत कम बारिश हुई है|"
"प्रदूष्ण की वजह से सब जगह मौसम में हेर-फेर हो रहा है", एक लेडी सटाफ जो हमारे बगल में खड़ी थी, अपने छोटे बालों में हाथ फेरते हुए बोली| 
'बाइक मिलने में समय लगेगा?', मैंने काउंटर पर बैठे तिलकधारी से पूछा| 
"हमारा सब बाइक बुक है, बगल से मंगा कर आपको दे रहे हैं, थोड़ी देर में लड़का आ जाएगा |" उसने जवाब दिया| 
थोड़ी देर बाद ब्लू टी-शर्ट में एक लड़का स्कूटी पर बैठ कर आया| 
'एक दिन का कितना किराया लेते हो?' मैंने लड़के से पुछा| 
"300/- एक दिन का", लड़के ने जवाब दिया| 
'लेकिन मेरी बात उनसे 150 की हुई है'
"150 में पुरानी स्कूटी मिलती है, यह नई है"
मैंने स्कूटी को गौर से देखा, नई थी| 
"पुरानी कहीं भी ख़राब हो जाती है, आप ये ले जाओ, प्रॉब्लम नहीं होएंगा"
"हमें लम्बा रुकना है, 300/- मंहगा पड़ेगा'', दिव्या बोली| 
तभी मैरून रोब में एक विदेशी लड़की स्कूटी पर बैठ कर आई, 'पूछो तो यह ओशो सन्यासी है क्या', मैंने दिव्या से कहा| वह उस विदेशी लड़की से बात करने चली गई| 'दो सौ में डन करो..', मैंने लड़के से कहा| "नहीं सअ'र 250 लास्ट|" थोड़ी देर विदेशी लड़की से बात करने के बाद दिव्या 'कुमार बाइक' वाले से बात करने ऑफिस में चली गई| 
"वो ओशो सन्यासी नहीं है, उसके किसी दोस्त ने उसे ये रोब दे दिया है, वे कह रही थी, हमें इन्फॉर्मेशन सेंटर जाना होगा, वहीं से यहाँ के बारे में पता चलेगा|'', दिव्या बोली| 
'वो सब ठीक है, बाइक वाले से क्या बात करके आई हो?'
" वे कह रहे हैं, दोपहर तक उनके पास बाइक आ जाएगी, अगर ये दो सौ तक नहीं देता है, तो रहने दो, हम दोपहर में ले लेंगे, अभी पैदल ही चलते हैं|" 
जैसे हम जाने को हुए वह दो सौ में बाइक देने को राज़ी हो गया| "अगर पुलिस रोकती है, तो tell him कि दोस्त की बाइक है, डोंट से की किराये पर ली है|", चाभी देते हुए लड़के ने मुझसे कहा| मैंने गाडी का नंबर प्लेट देखा वह पीला नहीं था| 


21-Aug-2019
जहाँ से स्कूटी लिया वहाँ से लेकर मातृमंदिर तक का सफ़र बहुत ही सुहाना था, छोटे-छोटे घरों और बड़े-बड़े पेड़ों से सड़क का दोनों किनारे सजे हुए थे। कोरेगाँव पार्क (पुणे) के पेड़ बहुत ही पुराने और सघन थे, उनकी वजह से रोड पर अँधेरा छाया रहता था। यहाँ के पेड़ उतने पुराने तो नहीं थे, लेकिन सुंदर और ऊँचे थे। 
इन्फ़र्मेशन सेंटर के बाहर स्कूटी पार्क करने का 10 रुपया चार्ज था। पैसा अदा कर मैंने एक पेड़ के नीचे गाड़ी खड़ी कर दी। सामने रेहड़ी पर एक दक्षिण भारतीय दंपत्ति चाय, कॉफ़ी और इडली बेच रहे थे। उसी के पास लगे यंत्र से एक आदमी अपने बोतल में पानी भर रहा था। हम जिस रोड पर चल रहे थे उसके लेफ़्ट में कुछ ऑटो वाले खड़े थे, जो जाते हुए लोगों से ‘मातृमंदिर-मातृमंदिर’ पूछ रहे थे। वहीं सामने लगे बोर्ड पर लिखा था, ‘मातृमंदिर यहाँ से एक किलोमीटर है, आपको चल कर जाना है, रास्ता शेडी(छायादार) है..! लौटते समय फ़्री बस सेवा है।’ 
कोई 100 मीटर चलने के बाद ‘सूचना भवन’ आ गया। बोर्ड पर लिखा था ‘कृपया चप्पल पहन कर अंदर आए।’
भवन में घुसते ही लेफ़्ट में एक किताब रूम था, उसी से लगा हुआ एक बड़ा हॉल था। हॉल के दीवारों पर बड़े-बड़े बैनर लगे थे, जिन पर अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, तमिल और हिंदी में औरोविल सिटी और मातृमंदिर के बारे में जानकारी दी हुई थी। हॉल के दूसरे कोने से लगे एक रूम में विडीओ चल रहा था। 10 मिनट का एक विडीओ बार-बार रिपीट हो रहा था। विडीओ में बताया जा रहा था कैसे मातृमंदिर बनकर तैयार हुआ था। 
हॉल से बाहर निकलने पर एक पेड़ के नीचे नीले शर्ट में बैठा एक व्यक्ति लगों को मातृमंदिर के लिए फ़्री पास दे रहा था। उसके पीछे एक कैफ़े था जिसमें 30 रुपए में पूरी और 15 रुपए में आधी चाय मिल रही थी। 
हमें जो पास मिला उसपर लिखा था, “निःशुल्क पास (अनुमति पत्र) उपलब्ध है। मातृमंदिर के बाह्य दर्शन के लिए पास दिए जाते हैं। सोमवार से शनिवार सुबह ९:०० से दोपहर ४:३०। रविवार केवल सुबह ९:०० से १:००। निजी/किराये पर वाहन की अनुमति नहीं है। वापसी यात्रा के लिए मुफत शटल बस है। (रविवार दोपहर को मातृमंदिर बंद रहता है।)
वहाँ से मातृमंदिर की अच्छी झलक मिलती है। अद्दान में शोर न करें, सफ़ाई का ध्यान रखें एवं अनुशासन बनाए रखें। पिकनिक मना है। नशीले पदार्थों तथा शराब के नशे में लोग अंदर प्रवेश न करें। कृपया ड्यूटी पर लगे लोगों की बात माने। धन्यवाद । 
मातृमंदिर आपके नीजी सामान की ज़िम्मेवारी नहीं लेती है। 
तारीख़- 20-Aug 2019. दर्शकों की संख्या- 2
पास लेने के बाद हम मंदिर की ओर चल दिए...।

Thursday, 15 August 2019

देखलि तऽ खेलि, देखलि तऽ खेलि.....

13-Aug-2019
2012 में जब मैं पहली बार पुणे आया था, तब आश्रम में HIV टेस्ट हुआ करता था, जिसका शुक्ल था 1000/- रुपया। इसके साथ नये आगंतुकों को ‘वेलकम मोरनिंग’ (इसमें आश्रम के तौर-तरीक़े और ध्यान विधियों के बारे में बताया जाता है।) का 500/- रुपया लिया जाता था। और उन दिनों भी एक दिन के प्रवेश पास का 750/- के आसपास ही चार्ज था। इस बार दिव्या से वेलकम मोरनिंग का शुक्ल नहीं लिया गया, क्योंकि मुझसे भी उन्होंने 5 दिन के प्रवेश पास और नये कार्ड का 3740/- रुपया ही लिया(और उससे भी इतना ही लिया)। सरकार के आदेश के बाद से HIV टेस्ट भी अब बंद हो गया है। मतलब अब 1500/- रुपये की राहत है। पहले मेरे ख़्याल से स्वमिंग का भी कुछ 280/- के क़रीब चार्ज था, वो भी इस बार प्रवेश-पास के साथ फ़्री है। 

7 बज कर 45 मिनट पर दिव्या ‘वेलकम’ के लिए चली गई। मैं अपनी जगह पर बैठकर उस स्टाफ़ के आने का इंतज़ार करता रहा जो मेरा कार्ड बनाता। ‘नाम के अनुरूप यह बिल्कुल एक resort जैसा है, आश्रम वाली फ़ीलिंग यहाँ नहीं आती है।’ अपने बग़ल में बैठे एक सज्जन से मैंने कहा। “मैं जब 2000 में यहाँ आया था, तब यहाँ की हवा कुछ और थी। अब यह बिल्कुल बदल गया है”, फुसफुसाते हुए उन्होंने मुझसे कहा। ‘ख़ैर, समय के साथ सब कुछ बदल जाता है’, एक गहरी साँस लेते हुए मैंने उनसे कहा। “आपका भी कार्ड खो गया है?”, उन्होंने मुझसे पूछा। ‘खोया नहीं है, मैं लाना ही भूल गया।’ मैंने उनके कान में धीरे से कहा। 
वहीं स्वागत कक्ष में बैठे-बैठे मेहसाणा आश्रम के कई मित्रों से मेरा मिलना हो गया। सुरेश स्वामी, नरेश स्वामी, सत्यम स्वामी, धर्मेंद्र स्वामी, अनीता माँ और राधेश्याम स्वामीजी से एक दिन पहले ही मिलना हो गया था।
स्वागत कक्ष से फ़्री होने के बाद मैं प्लाज़ा पर आ कर एक छतरी के नीचे बैठ गया। हल्की बारिश हो रही थी। दिव्या के वेलकम मोरनिंग से लौट कर आने में अभी बहुत समय बाँकी था। मैं चाहता तो कोई ध्यान करने जा सकता था, लेकिन अभी ध्यान करने का मेरा कोई मन नहीं था। 
प्लाज़ा पर खाने-पीने की चीज़ें मिलती है, जैसे, चाय, coffee, समोसा, और शाम को शराब। 
कुछ देर बाद सत्यम स्वामी भी अपने ग्रुप के साथ वहीं मेरे पास आकर बैठे गये। ‘यहाँ एक समोसा कितने का मिलता है?’, मैंने सत्यम स्वामी से पूछा। ‘शायद 80/- रुपये का है’, उन्होंने कहा। ‘तभी तो मैं कहूँ एक समोसे को तीन जन मिल कर क्यों खा रहे हैं।’ जब से मैं प्लाज़ा पर आया था, मैं यह नोटिस कर रहा था कि एक कप चाय और एक समोसे को दो-दो, तीन-तीन लोग आपस में मिल बाँट कर खा-पी रहे थे। 
आश्रम के भीतर कुछ भी खाने-पीने के लिए आपको मुख्यद्वार के पास कैश जमा करके कूपन लेना होता है। अपने पिछले अनुभवों के आधार पर मैंने इस बार कोई कूपन नहीं लिया था। last टाइम 320/- रुपये में दो चम्मच (दो चम्मच यहाँ तथ्य है, इसको कहावत की तरह ना लें) खाना खाकर मैं अपनी उँगली जला चुका था। 
आश्रम आने वाले 90 फ़ीसदी से ज़्यादा भारतीय और 70 फ़ीसदी से ज़्यादा विदेशी सन्यासी/ओशो प्रेमी आश्रम से बाहर ही अपने रहने और खाने-पीने का बंदोबस्त करते हैं। आश्रम में ठहरे का एक दिन का चार्ज क़रीब पाँच हज़ार रुपया है(यह घटता-बढ़ता रहता है)। अगर आप एक टाइम आश्रम/resort में ठीक से भर पेट भोजन करते हैं, तो 1500-200 के बीच ख़र्चा आएगा। कल मेरे तीन मित्रों ने 400 रुपए में 7 चम्मच दाल, और पाँच चम्मच सब्ज़ी और 6 रोटी (जितने आटे में हम अपने यहाँ मुश्किल से 2 रोटी बना पाते हैं, उतने में उन्होंने 6 रोटी बनाया था।) ख़रीद कर खाया। जितने खाना से एक आदमी का भी मुश्किल से पेट भरे, उतने को तीन लोगों ने मिलकर खाया। हैरान तो मैं हुआ जब उन्होंने कहा कि उतने में उनका पेट भर गया। मुझे लगता है जैसे बड़े होस्पिटल में इलाज करवा कर कुछ लोगों की बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं, वैसे महँगे भोजनालय में मेन्यू देखकर ही कुछ लोगों का पेट भर जाता है। इस बात को आप हल्के में नहीं ले सकते हैं, ऐसा सच में होता है। आपको एक कहानी सुनाता हूँ। 
मेरे गाँव जब कोई मर जाता है, तो दस दिन बाद मरे हुए व्यक्ति के परिवार के लोग गाँव के लोगों को भोज देते हैं, मतलब उनको अपने यहाँ बुलाकर खाना खिलाते हैं। आमतौर पर जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं, वे तीन दिन तक रोज़ शाम को गाँव के लोगों को बुला कर प्रीत भोज देते हैं। पहले दिन दाल, चावल और सब्ज़ी का भोज, दूसरे दिन चूड़ा(पोहा), दही और सब्ज़ी और तीसरे दिन माछ-भात (मछली चावल)। जो लोग अर्थ से उतने संपन्न नहीं होते हैं वे एक या दो दिन ही खिलाते हैं। 
मेरे घर के पास ही हरिजनों की बस्ती है, उनके यहाँ भी ऐसा ही होता है। मेरे छुटपन में हरिजन बहुत सुखी संपन्न नहीं हुआ करते हैं। सदियों से चली आ रही समजिक परम्परा और तथाकथित ब्राह्मणों की नीतियों ने उन्हें आर्थिक रूप से संपन्न होने का मौक़ा ही नहीं दिया था। वे लोग अमूमन एक या दो दिन का प्रीत भोज रखते थे। एक दिन दाल चावल खिलाते थे और दूसरे दिन दही-चूड़ा। दही-चूड़ा का भोज करना कुछ लोगों को बहुत भारी पड़ता था, क्योंकि आज ही की तरह दूध उन दिनों भी महँगा हुआ करता था। हरिजनों ने इसका हल निकाल रखा था। 
एक दिन किसी काम से मैं एक हरिजन के यहाँ गया हुआ था। कुछ दिन पहले ही उसके पिता की मृत्यु हुई थी। मैं जब उसके यहाँ पहुँचा तो देखा की बहुत से लोग भोज खाने के लिए पंक्ति में उसके यहाँ बैठे हुए थे। आज प्रीत भोज का दूसरा दिन था, यानी दही चूड़ा का भोज था। लोग अपने बग़ल में पानी का लोटा रखे ज़मीन पर सुखासन में बैठे हुए थे। सबके आगे केले का पत्ता बिछा हुआ था। दो लोग चंगेरा में चूड़ा लेकर बाँट रहे थे। जब सब के पत्ते पर चूड़ा पड़ गया, तब एक आदमी बाल्टी में सब्ज़ी लेकर आया और चूड़े के ऊपर करछुल से सब्ज़ी निकाल कर डालने लगा। यह देख कर मैं बड़ा हैरान हुआ। हमारे यहाँ (मतलब तथाकथित ब्राह्मणों के यहाँ) चूड़ा के ऊपर दही डाला जाता था, लेकिन ये लोग सब्ज़ी डाल रहे थे। उसके बाद जो कुछ मैंने देखा उसे कभी नहीं भूल सकता हूँ। जब सबके पत्तल पर सब्ज़ी डल गया, तब एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अपने हाथ में मिट्टी का एक मटका लेकर आए, जिसमें दही था। मुझे लगा अब शायद इन लोगों को दही दी जाएगी, लेकिन वे दही बाँटने के बजाय मटका लेकर पंक्ति में टहलने लगे। और उनको देख कर पंक्ति में बैठे सारे लोग एक सुर में चिल्लाने लगे, “देखलि तऽ खेलि, देखलि तऽ खेलि..... (देख लिया तो खा लिया, देख लिया तो खा लिया)।” इसी तरह दही लेकर और वे एक के बाद दूसरी पंक्ति में गए। और अंत में दही का पात्र लेकर एक रूम के अंदर चले गए। उनके जाने के बाद पंक्ति में बैठे लोग सब्ज़ी-चूड़ा मिला कर खाने लगे। 
यहाँ पुणे में भी मैं ऐसा ही देखता हूँ, मेन्यू देख कर ही बहुत से लोगों का पेट भर जा रहा है। वे लोग जो कुछ ज़्यादा पेटू हैं, वे थोड़ा टेस्ट करके अपना पेट भर ले रहे हैं।

उन्होंने मेरी सिगरेट जला दी।


11-Aug-2019
कल 11 बजकर 30 मिनट पर हम पुणे पहुचें। पुणे पहुँचे से पहले ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी, हम इस इंतज़ार में थे कि ट्रेन फिर से चलेगी, लेकिन प्लेटफ़र्म पर लगे भोपूओं से आवाज़ आई कि ट्रेन नंबर 12360 अब यहाँ से अलग रूट पर जाएगी, पुणे जाने वाले यात्रियों से अनुरोध है कि वे प्लेटफ़र्म नंबर पाँच पर खड़ी ट्रेन में जाकर बैठ जाएँ, ट्रेन कुछ ही मिनटों में पुणे के लिए निकलने वाली है।हम आनन-फ़ानन में भागकर पाँच नंबर पर पहुँचे, अगर तीस सेकेंड की भी और देरी होती तो हम चूक जाते। हमारी तरह ही जो यात्री भागते-पड़ते ट्रेन में बैठ पाये थे, वे सब भारतीय रेल को लानत भेज रहे थे। 
11 बज कर पंद्रह मिनट पर हम पुणे पहुँचे। स्टेशन से auto बूक करके कोरेगाँव पार्क पहुँचे। 
ट्रेनों की अनीयमिता की वजह से अभी तक बहुत कम सन्यासी आश्रम पहुँच पाए हैं। सुबह से रुक-रुक कर बारिश हो रही है। सुबह स्वागत कक्ष से लेकर दूर मुख्य सड़क तक आगंतुकों की लंबी क़तार होने की आशंका थी। लेकिन, इतने कम लोग आए थे कि ठीक से स्वागत कक्ष भी नहीं भर पाया। इतना फीका मासून उत्सव कभी नहीं हुआ था। 
जब से आया हूँ, बहुत व्यस्त रह रहा हूँ, कुछ भी लिखना संभव नहीं हो पा रहा हूँ। बहुत से पुराने मित्रों से मिला। मिलने-मिलाने की दृष्टि से दिन अच्छा का जा रहा है। अभी तैयार होकर ईवनिंग मीटिंग के लिए जा रहा हूँ। दिन ढलते-ढलते अच्छी संख्या में सन्यासी आ चुके हैं।

12-Aug-2019
कल दिन आश्रम में बिल्कुल वैसा ही गुज़रा जैसा आज का और कल का गुज़रेगा। पता नहीं कैसे आजकल अलसुबह 4 बजे के आसपास नींद टूट जाती है। कल भी सुबह चार बजे आँख खुल गयी। दिव्या का रजिस्ट्रेशन परसों शाम ही हो गया था। मेरा भी renewal हो गया होता, लेकिन ऐन वक़्त पर ए॰टी॰एम॰ से कैश निकालने चले जाने की वजह से मेरा रह गया। जबतक मैं कैश लेकर आया, office बंद गया था। हालाँकि बाद में पता चला कि renewal के time कैश की ज़रूरत नहीं होती है। यह सोचने वाली बात है कि इतने बड़े आश्रम में सारा कारोबार कैश से ही होता है, कार्ड से payment करने या एनईएफ़टी की सुविधा नहीं है। 
दिव्या का कार्ड तो परसों ही बन गया था, लेकिन कार्ड उसे मिला नहीं था। कार्ड लेने के लिए उसे कल सुबह सात बजे Welcome पर पहुँचना था। इतने बजे ही मझे भी renewal के लिए पहुँचना था। सुबह उठने के बाद, छः बजे तक नहा धोकर तैयार होकर कर हम आश्रम के लिए निकल लिए। 
किसी भी शहर को अगर पूरा जानना हो, तो सुबह उठकर उसे देखना चाहिए। पुणे की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि पूरा शहर सदियों पुराने पीपल, गुलमोहर, नीम, ईमली, बाँस, नारियल और रंगबिरंग के असंख्य पेड़ों से शहर ढका हुआ है। 
(कल शाम से थोड़ा बुख़ार हो गया है, आगे की कहानी स्वस्थ होने के बाद)

12-Aug-2019
सुबह 6 बजकर 21 मिनट पर स्वागत कक्ष पर पहुँचे। office खुलने में 40 मिनट बाँकी था। वहीं कक्ष में लगे लकड़ी के बेंच पर बैठकर हम इंतज़ार करने लगे। हमारे बाद एक-एक करके और कई लोग आ गए। धीरे-धीरे कक्ष भरने लगा। सात बजने से कुछ देर पहले, स्टाफ़ के लोग भी आने लगे। रूम का माहौल बदलने लगा। व्यवस्था और लोगों के काम करने का ढंग देख कर ऐसा लग रहा था मनो हम किसी ऐरपोर्ट पर आ गए हों। 
परसों जिन्होंने ने दिव्या का कार्ड बनाया था वे उसे बुलाकर अपने काउंटर पर ले कर गए। जब वह जा रही थी तब मैंने अपने जेब से उसे पाँच हज़ार रुपये निकाल कर दिये, ‘संभवतः इतने में तुम्हारा पाँच दिन का प्रवेश-पास और वेलकम morning हो जाएगा।’ सहमती में सिर हिलते हुए दिव्या अपने रोब के दाहिने जेब में पैसे रखकर चली गई। 
थोड़ी देर एक विदेशी लड़की ने आकर मुझसे पूछा, “आपको क्या करवाना है?” उसके पूछने का ढंग वैसा ही था जैसा ऐरपोर्ट पर होता-अतिशय विनम्रता और बनावटी मुस्कान। “मेरा पूरना कार्ड खो गया है, मुझे नया कार्ड बनवाना है।” मैंने उससे सपाट लहजे में कहा। 
थोड़ी देर बाद दिव्या अपने नए कार्ड और एक पर्ची के साथ मेरे पास आई। “टोटल 3740/- ही लग रहा है, 3640/- पाँच दिन के पास का और सौ रुपये कार्ड का। यह एक हज़ार रुपया वापिस रखो मैं पैसा जमा करके आती हूँ।” पैसा और अपना mobile मेरे हाथ में थमाकर दिव्या पैसा जमा करने के किए क़तार में जाकर खड़ा हो गयी। 
मैं अपनी जगह पर बैठे अपनी बारी के आने का इंतज़ार करता रहा। नया कार्ड बनाने वाला स्टाफ़ अभी तक नहीं आया था। मैंने जेब से mobile निकाल कर समय देखा 7:30AM. पाँच मिनट बाद दिव्या पैसा जमा करके मेरे पास आई, ”7:45 पर मुझे welcome morning के लिए जाना है। अभी यहीं बैठ कर इंतज़ार करना हैं।” फुसफुसाते हुए इतना कहकर वह मेरे राइट में क़रीने से सजी ‘MOOERNA( O’ D भी हो सकता है) की बिना हाथ वाली काली कुर्सी पर जाकर बैठ गई। उसे welcom के लिए तैयार बैठा देखकर मुझे अपना पुणे-first-टाइम याद आ गया। 
2011 के सितंबर में, जब दिल्ली छोड़कर मैं मुंबई गया था, तभी अक्टूबर में अपने जन्म दिन पर 2 तारीख़ को मेरा पुणे जाने का मन था। लेकिन माली हालत ठीक न होने की वजह से तब जाना नहीं हो पाया था। 2011 के अक्टूबर के बदले, 2012 के फ़रवरी में 12 तारीख़ को मैं पहली बार पुणे पहुँच पाया। 
(बुख़ार की वजह पूरा शरीर ऐंठ रहा है। सहज रूप से शरीर को स्वस्थ करने के लिए सुबह से उपवास में हूँ। सुबह आश्रम आने से पहले तुलसी पत्ता उबाल कर पिया था। आश्रम में एक अदरक, शहद और नींबू टी पिया था। इसके अलावा सिर्फ़ पानी पी रहा हूँ। हाँ, कल शाम और आज सुबह हिमालया के septilin की दो-दो गोली ली थी। लिखने में तकलीफ़ हो रही है, आगे की कहानी शाम में बताता हूँ।)

12-Aug-2019
आज प्लाज़ा पर हरियाणा के एक स्वामीजी बता रहे थे, “बचपन में मुझे समोकिंग की लत लग गई थी। मैं लोगों के द्वारा फेकें गए बीड़ी उठा कर पीने लगा था। लोगों को जब सिगरेट पीते हुए देखता था, तो सोचता था ये बड़े, पढ़े-लिखे और हाई क्लास लोग हैं। मेरे एक चचेरे बड़े भाई, जो गोरखपुर रेलवे में काम करते थे, सिगरेट पीते थे। मैं उनके गाँव आने का इंतज़ार किया करता था। उनके द्वारा फेकें गए सिगरेट के जले हुए टुकड़ों को पीने के लिए मैं हमेशा ललायित रहता था।
एक दिन मेरी चोरी पकड़ी गई। उन्होंने मुझे सिगरेट के फेकें गए टुकड़े उठाकर पीते हुए देख लिया। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया, मैं डरते-डरते गया। अपने डब्बे से एक सिगरेट निकाल कर मुझे देते हुए बोले, “अगर तुम्हें पिटने से बचना है तो इसे पीना होगा।” मैं बड़ा हैरान हुआ। उन्होंने मेरी सिगरेट जला दी। मैंने एक कश पिया, तो वे बोले, ‘ज़ोर की कश ले’। मेरी आँखे ला हो गई, मैं ज़ोर-ज़ोर से खाँसने लगा। एक के ख़त्म होने के बाद, उन्होंने दूसरी जला दी। मेरा सिर चकरा रहा था। खाँस-खाँस के बुरा हाल हो गया। दो दिन तक मेरी तबियत ख़राब रही। 
वो दिन था और आज का दिन है, 20 साल हो गए इस बात को, मैंने आज तक सिगरेट को हाथ नहीं लगाया।”

12-Aug-2019
वायलन के एक बड़े उस्ताद अपने 16 शिष्यों के साथ आए हुए थे। आज दिन में दो बार उनका कार्यक्रम था- सुबह 7:30 बजे और दोपहर 2 से 3:30 तक। सुबह दिव्या सक्रिय-ध्यान के लिए जाना चाहती थी, लेकिन मेरी तबीयत ख़राब होने की वजह से नहीं गई। मेरे ख़याल से सुबह हम 9 बजे के बाद आश्रम पहुँचे थे। अनिल स्वामी (इनर सर्कल से)ने कहा कि सुबह की संगीत-सभा बहुत ही अभूतपूर्व था, “दोपहर तुम लोग मिस मत करना।” 
दिव्या को वायलन बहुत पसंद है। हमने (सत्यम स्वामी, सुरेश स्वामी, नरेश स्वामी, धर्मेंद्र स्वामी, अमीता माँ और दिव्या) तय किया कि दोपहर में पहले हम स्वीमिंग करेंगे( इस बार प्रवेश-पास के साथ, स्वमिनिंग फ़्री है), फिर दो बजे ओशो की समाधि पर ध्यान करने जाएँगे, फिर 2:30 से संगीत-सभा का आनंद लेंगे। 
दिन में हमने किसी भी ध्यान में भाग नहीं लिया। प्लाज़ा पर बैठकर गपियाने में और लोगों को देखने में ही सारा समय बीता। वैसे भी ओशो की समाधि पर बैठने के अलावा मुझे किसी और ध्यान में जाना अच्छा नहीं लगता है। 
कल एक बात से मैं बड़ा हैरान हुआ। दोपहर में जब समाधि पर ध्यान करने के लिए गया, तब मैं काफ़ी थका हुआ था, और नींद से पलकें बोझिल हो रही थीं। ऐसी हालत में ध्यान के लिए बैठने पर नींद का आना तय होता है। लेकिन जैसे ही समाधि पर आँखे बंद करके बैठा नींद जैसे ग़ायब हो गई। थकान का कहीं कोई नमों निशान नहीं था। एक घंटा कैसे बीता पता ही नहीं चला। ऐसा ही मैंने पिछले साल चित्रकूट घाट और बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए महसूस किया था। 
अनिल स्वामी (इनर सर्कल से) की एक बात मुझे हमेशा से बड़ी प्रभावकारी लगती है। पहली बार उनसे मैं 2014 के दिसंबर में ओशो मनन मेहसाणा में मिला था। वे कैम्प लेने आए थे। मैं बुद्धा सभागार में worship कर रहा था, और दिव्या मौन-मदिरालय में। बस एक महीने पहले 10 november को हम मुंबई से job छोड़कर आश्रम में रहने आ गये थे। रधेश्याम जी (ओशो मनन के मेनेजिंग ट्रस्टी ) ने, मौन-मदिरालय के बाहर अंधेरे में, अनिल स्वामी से हमारा परिचय करवाया था, “ये इक्क्यू और दिव्या हैं, कार्य ध्यान के लिए मुंबई से आए थे। प्यारे कपल हैं।” अनिल स्वामी ने बड़े प्यार से हमें गले लगाया था। 
उस कैंप के ठीक एक साल बाद वे दुबारा मनन में आए। जब वे हमसे मिले तो उन्होंने नाम लेकर हमें संबोधित किया। हम बहुत हैरान हुए थे, उन्हें यह भी याद था कि हम कहाँ से आए थे और पहले क्या करते थे।
मनन से निकले अब हमें दो साल से ज़्यादा हो चुका है। इस बीच अनिल स्वामी से कहीं मिलना नहीं हुआ था। लेकिन कल जब उनसे मिला तो एक बार फिर से उनसे प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रह सका, “बहुत दिनों बाद देख रहा हूँ तुम दोनों को”। मेहसाणा आश्रम में जो लोग कैंप लेने के लिए आते हैं, उनमें से क़रीब-क़रीब सब से मिलना हो गया है। स्वामी आत्मों मनीष और धड़ूक स्वामी से मिल कर बहुत अच्छा लगा। स्वामी देवेंद्र भारती और साधना माँ ने मुझे पहचानने से इंकार कर दिया। सिंधु माँ को न तो मैं पहचानता हूँ न ही वो मुझे पहचानती हैं। स्वामी राधेश्याम जी इतनी आत्मीयता से मिले कि आँखे भर आई।

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...