Monday, 11 December 2017

और प्यार का भूत उतर गया........

Day-3 Running in the Evening 
और प्यार का भूत उतर गया........

पता नहीं अब ऐसा होता है या नहीं. लेकिन उन दिनों हमने किसी का भी नंबर या पता हासिल करने का नयाब तरीका ढूंढ निकाला था. MTNL के कस्टमर केयर में कॉल करके पता बताने पर वे लोग उस पते पर लगा MTNL का फ़ोन नंबर बता देते थे. और यदि आपके पास फोन नंबर है तो वो आपको पता बता देते थे. इसी तरीके से मैंने मीनाक्षी के घर का नंबर निकाल लिया था. दो चार दिन तक उस नंबर को मोबाइल के सेव करके मैं इतराता रहा, लेकिन कॉल करने की हिम्मत नहीं हुई. उन दिनों प्यार के मामले में मेरी हालत उन कुत्तों की तरह थी जो कार के पीछे बिना यह जाने भागते हैं कि अगर कार उन्हें मिल गया तो करेंगे क्या? “शादी-मुझे करनी नहीं है, सेक्स-बाप रे! ऐसा मैं सोच भी कैसे सकता हूँ,.

एक महीना तक हमारा बस देखा-देखी चलता रहा. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि आगे और क्या करना है. “हो तो गया वह मुझे देखती है, मैं उसे देखता हूँ, अब और इससे आगे क्या चाहिए...?” लेकिन मीनाक्षी को इससे आगे भी कुछ चाहिए था, एक दिन अपने छत के रेलिंग के एकदम पास आ कर, गर्दन उपर करके मुझसे बोली, “तुम कुछ बोलते क्यों नहीं हो...?”. भाई साहब यकीन मानिये मेरी तो एकदम से सिटीपिटी गुम हो गई. मैं नीचे उसकी ओर देखता है, गले से थूक सटका, लाख कोशिश के बावजूद भी मेरे अन्दर से एक शब्द भी नहीं निकला. थोड़ी देर तक मेरी ओर देखते रहने के बाद वह वहां से कुछ बुदबुदा कर चली गई, शायद मुझे गाली देकर चली गई.
रात मुझे तेज़ बुखार हो गया, पूरी रात नींद नहीं आई. अगले दिन फिर से हमेशा की तरह शाम का इंतजार करने लगा. लेकिन आज उसके सामने जाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. पता नहीं किस चीज़ से डर गया था मैं, अपने कमरे में दुबका बैठा रहा. अगले दो दिन तक यही किस्सा चला. तीसरे दिन सुबह मेरे ऊपर किसी जादूई शक्ति का इल्हाम हुआ और मैंने तय किया कि आज मैं उससे बात करूँगा. और उसे दिखा दूंगा कि मैं कोई डरपोक और बुजदिल नहीं हूँ. मजीद इंतजार के बाद वह वक़्त आया जब वह क्लास लेने के लिए अपने घर से निकली. मैं उसके पीछे हो लिया. पांच मिनट बाद हम मेन रोड पर आ गए. उसने अभी तक एक बार भी मुझे पीछे मुड़ कर नहीं देखा था. शायद उसे इस बात का इल्म नहीं था कि मैं उसका पीछा कर रहा हूँ या उसके पीछे चल रहा हूँ.
चित्र साभार-गूगल 
“Excuse me!”, मैंने पीछे से आवाज़ लगाईं. उसने पलट कर देखा. “क्या है..” उसने हडबडी दिखाते हुए कहा. “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है..’’, तेज़ कदमो से पीछे चलते हुए मैंने कहा. वह अचानक तेज-तेज चलने लगी थी. “जो भी कहना है जल्दी कहो..” बिना मेरी तरफ देखे बोली और आगे बढ़ती रही. इससे पहले कि मैं उसे कह पता कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ, तुझसे दोस्ती करना चाहता हूँ. एक कार ठीक मेरे बगल में आ कर रुकी. शीशा खुला, ड्राइविंग सीट पर बैठे लड़के ने मुझसे पूछा, “क्या है भाई, क्यों परेशान कर रहा है उसे, कहाँ रहता है तूं....?” मुझे काटो तो खून नहीं. “यहीं लालबाग में रहता हूँ...” मैंने हकलाते हुए गलत पता बताया. और तेज़ी से वहां से भागा...बिलकुल वैसे ही जैसे आजकल सुबह खेत में भागता हूँ. बीस मिनट तक भगने के बाद एक घर के नीचे बैठ गया. आधा घंटा तक चिंतन-मनन करने के बाद सीधा नाई के पास गया और अपने अर्जुनरामपाल कट बाल को फौजी कट करवा कर घर लौट आया. बाल के साथ सिर से प्यार का भूत भी उतर गया. दो चार दिन बाद घर खाली कर के दूसरे मोहल्ले में चला गया.

Saturday, 9 December 2017

‘म’ की महिमा (डायरी)

Running Day-2 (10-12-2017)

2014 के सितम्बर में जब तीन दिन के लिए मुंबई से मेहसाणा आया था तो किसने सोचा था कि 3 दिन तीन साल में बदल जाएगा. मेहसाणा में तीन दिन बिताने के बाद वापिस जाते समय अहमदाबाद स्टेशन पर हमने यह तय किया था कि जॉब छोड़ कर तीन महीना मेहसाना में रहेंगे. 
अक्टूबर में 7 को दरमाहा मिलने के बाद जॉब छोड़ दिया और 9 को मुंबई से रवाना हो लिए मेहसाना के लिए. म-से मुंबई छोड़ा और म-से मेहसाना आया और म-से मनुजी के आश्रम म-से मनन में रहने लगा. शुरू में प्लान यह था कि तीन महीना मेहसाना में रह कर कहीं और चला जाऊंगा और फिर वहां तीन महीना रहूँगा. और इसी तरह तीन-तीन महीना करके अलग-अलग शरह में बिताऊंगा. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, मेहसाना का तीन महीना आज तीन साल में बदल चुका है. 


म-से मनाली से आने के बाद जबसे (मतलब दो दिन से) मैंने दौड़ना शुरू किया है मेरे अन्दर नए-नए विचारों का जन्म हो रहा है. उनमे से एक ताज़ा विचार यह है कि ‘अब मेहसाना में नहीं रहना है.’ अभी जनवरी में 7 दिन के लिए Goa जाने का प्लान था, लेकिन अब सोच रहा हूँ कि मेहसाना छोड़कर तीन-चार महीना Goa में ही बिताऊँ. 
‘म’ की महिमा का बखान करते हुए याद आया कि मेरे बचपन के पहले दोस्त का नाम भी म-से मुकेश है. और हैरानी की बात है कि जिस लड़की से मुझे पहली दफ़ा मोहब्बत हुआ था, यानि जिसको देख कर यह एहसास हुआ कि दिल सच में धड़कता है, का नाम भी म-से मीनाक्षी था. और जिस चीज़ की तलाश में मैं पिछले कई सालों से भटक रहा हूँ क़िबला वह भी म-से मोक्ष है. और कमाल है कि जीवन की गंगोत्री भी तो म-से माँ है. और मैं और भी अचंभित हो रहा हूँ क्योंकि मेरी माँ नाम भी म-से मीरा है.

नोट- इस पुरे लेख में ‘म’ का कुल 61 बार इस्तेमाल हुआ है

फुर्रर्रर्रर्रर...


Running Day-1 (09/12/2017)
अभी जब मनाली में था तभी क़सद किया था कि मेहसाना पहुंचकर दौड़ना शुरू करूँगा. पता नहीं कैसे दौड़ने का ख्याल आया. फिट रहने के लिए योग का और जिम का सहारा कई बार ले चुका हूँ, दौड़ना पहली बार शुरू किया है. आज सुबह जब दौड़ रहा था तो याद आया कि बचपन में हम चलते कम और दौड़ते ज्यादा थे. कहीं भी जाना होता था तो दौड़ कर जाते थे. घरवालों को भी जब हमसे कोई काम करवाना होता था तो यही कहते थे, “दौड़ कर जाओ...”. फिर धीरे-धीरे वक़्त के साथ जब बड़े हुए तो दौड़ना कम हो गया. दौड़ना थोड़ा अजीब सा लगने लगा, क्योंकि कोई भी बड़ा व्यक्ति कभी दौड़ता नहीं था. शुरू-शुरू में हैरान भी होता था कि ये बड़े-बूढ़े कभी दौड़ते क्यों नहीं हैं?

सुबह जब दौड़ना शुरू किया तो थोड़ी देर बड़ा अजीब सा लगा, ‘लोग क्या सोचेंगे इतना बड़ा आदमी दौड़ क्यों रहा है?’, सिर झटक कर विचार को तर्क किया. ‘सोचेंगे कि फिट रहने के लिए दौड़ रहा है, और भी लोग दौड़ते हैं मैं कोई अकेले थोड़े हूँ.’ फिर कान में लीड लगा कर दौड़ने लगा. लेकिन थोड़ी देर बाद ही फिट रहने के लिए दौड़ने का ख्याल बड़ा बेहूदा लगने लगा. इस ख्याल के साथ मैं ज्यादा देर नहीं दौड़ सकता था. 

चित्र साभार- गूगल 
पांच मिनट बाद मैं ट्रैक छोड़ कर खेत में उतर गया और खेत की मुंडेर पर उसी तरह दौड़ने लगा जैसे 20 साल पहले बचपन में दौड़ा करता था-सिर्फ दौड़ने के लिए. दौड़ने का अंदाज़ एकदम से बदल गया. अभी पांच मिनट पहले समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कदम उठाऊँ, हाथ को कैसे और कहाँ रखूं, बड़ा अटपटा सा लग रहा था सब कुछ. लेकिन जैसे ही खेत में दौड़ना शुरू किया सब याद आ गया. दोनों होठों को थरथराते हुए गाड़ी स्टार्ट की और हाथ को हवा में लहराते हुए फुर्रर्रर्रर्रर...हो गया.

Friday, 8 December 2017

खजुराहो की खोज (यात्रा-वृतांत)

               'टिकट बुक ट्रेन की थी, लेकिन पहुंचे हम खजुराहो बस से.' 
कोई 15 दिन पहले जब हमने टिकट बुक किया था तो वेटिंग 40, 41 और 42 था. सो सोचा कि शायद कन्फर्म हो जाएगा और यदि नहीं भी हुआ तो तत्काल से बुकिंग करके चले जाएँगे. लेकिन सब गड़बड़ हो गया. ऐन वक्त पर वेटिंग 3, 2, और 1 पर आकर अटक गया. हमने सोचा था कि ट्रेन सोमनाथ से 9:30 पर खुलती है, तो सुबह 5 बजे के आस-पास चार्ट तैयार होगा और हमें हमारे टिकट का स्टेटस पता चल जाएगा. अगर टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो 11 बजे अगले दिन यानि 11 अगस्त के लिए तत्काल से बुक कर लेंगे या फिर बस से चले जाएँगे.
रात को चार बजे मेरी नींद खुली गई, तभी से जगकर मैं चार्ट तैयार होने का इंतजार करने लगा. जाने की उत्सुकता व उत्तेजना ने नींद उड़ा दी थी. उम्मीद था की 6 बजे तक रेलवे से मेसेज आ जागेगा. लेकिन 6 क्या 8 बजे तक भी कुछ नहीं हुआ. फिर 9 बजे के क़रीब इस आशंका से घबरा कर कि कहीं ट्रेन रद्द न हो गया हो 139 पर कॉल किया. वहां से पता चला कि ट्रेन अपने समय से सोमनाथ से चलेगी. और हमारा चार्ट 2:30 के आस-पास तैयार होगा. यानि हमारे बोर्डिंग समय, जो कि अहमादाबाद से 6:30 का था, से क़रीब चार घंटा पहले. मतलब अब हम आज तत्काल बुक नहीं कर सकते थे. और अभी वेटिंग केंसल करने का मतलब एक भी पैसा वापिस नहीं मिलेगा. अब हमारे लिए दूध और माछ दोनों बांतर था.
खैर, अल्लाह-अल्लाह करते हुए हमने पैकिंग कर ली और सारा सामान बाँध कर ढाई बजने का इंतज़ार करने लगे. और अंत में वही हुआ जो अपेक्षित नहीं था, टिकट कन्फर्म नहीं हुआ. अब तीन बजे तो तत्काल बुक नहीं हो सकता था. मतलब अब हम 12 अगस्त से पहले ट्रेन से नहीं जा सकते थे. और इतना लेट जाने का कोई मतलब भी नहीं था. 12 को जाना यानि 13 पहुंचना, और 14 को वापिस आ जाना, तभी मेरे दो कामकाजू मित्र 16 को ऑफिस ज्वाइन कर सकते थे. तो ऐसे कुछ घंटों के लिए खजुराहो को धप्पा मार का आने का कोई मतलब नहीं था.
इधर पिछले एक घंटे से कुणाल का फोन स्विच ऑफ जा रहा था, सो अब हमें आगे क्या करना है यह भी तय नहीं हो पा रहा था. बिना कुणाल से बात किए हम कोई भी स्टेप नहीं ले सकते थे. हमें मेहसाणा से अहमदबाद पहुंचना था, कुणाल वहीँ रहते हैं, सो वो वहीँ से सीधा स्टेशन आने वाले थे.  
अब सामान बाँध कर हम इस सोच में डूबे हुए थे जो कहीं के नहीं रह जाते हैं वो कहाँ जाते हैं? पिछले १० साल से मैं खजुराहो जाने का ख़्वाब पाले हुआ था. तीन-चार बार पूरी शिद्दत से जाने की कोशिश कर चूका था, हर बार कोई न कोई अरंगा खड़ा हो जाता था और जाना रद्द हो जाता था. इस बार भी यही लग रहा था. टिकट का ऐन एक-दो-तीन पर आकर अटक जाना, अचानक कुणाल के फ़ोन का स्विच ऑफ हो जाना कुछ शुभ संकेत नहीं लग रहा था. इन सब प्रतिकूल स्थिति में सुकून सिर्फ इस बात का था कि टिकट ख़ुद से केंसल न करा कर हमने 180 रुपए बचा लिया था. लेकिन यह ख़ुशी भी फूस की आग की तरह ज्यादा देर टिक नहीं पाई. 3 बजे के क़रीब IRCTC मेसेज आया कि आपका टिकट केंसल हो गया है और आपका 180 रुपया कट गया है. दरयाफ्त करने पर पता चला कि अब ऑटो-ऑटोकेंसेलेशन पर भी पैसा कटता है. मन खिन्न हो गया. यही 180 रुपया बचाने के लिए तो हमने टिकट केंसल नहीं किया था. अगर यह 180 गवाना ही था तो हम कब का टिकट केंसल करके तत्काल से बुक लिए होते. 
खैर, कोई ३ बजे, कुणाल का फ़ोन आया, पता चला कि बेट्री डाउन हो जाने की वजह से भाई साहब का दोनों फोन ऑफ हो गया था. ये भी खूब रहा, अगर ऐन मौके पर बेट्री डाउन ही हो जाए तो लानत है नोकिया फ़ोन पर, दो-दो मोबाइल रखने का क्या मतलब है फिर? खैर कोई नहीं यह कुणाल का जाति मामला है कि इस घटना के बाद उन्हें दो फ़ोन रहना चाहिए या नहीं. चलिए आगे बढ़ते हैं... काफी देर तक घमर्थन करने के बाद हमने ये तय पाया कि अहमदाबाद से आज रात की कोई बस लेकर हम भोपाल जाएँगे और फिर वहां पहुँच कर तय करेंगे आगे क्या और कैसे करना हैं. यह भी कुछ तय करना हुआ? बस की टिकट बुक करने का जिम्मा कुणाल ने अपने सिर लिया. हमें दिलासा दिया कि तुरंत टिकट बुक करके इत्लिया करता हूँ. सुरंग के उस तरफ मुझे रौशनी दिखने लगा, उम्मीद का बुझता हुआ दिया फिर से टिमटिमाने लगा. और खुली आँखों से मैं खाजुरोहों के देवी-देवताओं का दर्शन करने लगा. एक घंटे बाद जब मैं ये पता करने के लिए कुणाल को कॉल किया कि टिकट बुक हुआ कि नहीं, कुणाल का फ़ोन एक बार फिर से ऑफ जा रहा था. अब हमें अपने भाग्य के साथ-साथ कुणाल के इरादे पर भी संदेह होने लगा था. हम सामान बाँध कर घर के बाहर बैठे हुए थे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें. पीछे घर अच्छा नहीं लग रहा था, आगे कोई मंजिल नहीं दिख रही थी. घनघोर अवसाद के क्षण में हमने ये तय किया कि अब हम माउंट आबू जाएँगे और वहीँ ग़म ग़लत करेंगे. लेकिन अगले ही क्षण इस विचार पर उलटी आने  लगा. कहाँ खजुराहो जाने का सुनहरा ख्वाब और कहाँ आबू की घिसीपिटी गलियां. मन ओकिया-सा  गया.

अगर सिर्फ पांच मिनट और देर हो गया होता कुणाल का कॉल आने में तो हम अपने घर के पंखे से लटक कर जान दे दिए होते. और विदेह खजुराहो की ओर रवाना हो लिए होते. लेकिन, जैसे अभी तक सभी कुछ ऐन वक्त पर होता आ रहा था, उसी तरह ठीक ऐन वक्त पर कुणाल का कॉल आ गया, और शरीर छोड़ने के पाप और विदेह खजुराहो जाने के सुख से हम वंचित रह गए. 1714/- रुपया में कुणाल ने अहमादाबाद से भोपाल की टिकट, रेड बस के थ्रू, बुक कर लिया था. कुणाल ने जब टिकट वाला मेसेज फॉरवर्ड किया तो थोड़ी तसल्ली मिली. और हम आनन-फानन में घर से बस स्टैंड की ओर अहमादाबाद के लिए बस लेने निकल पड़े.
“खजुराहो जा रहे हैं, इसका ये मतलब नहीं कि आप अहमादाबाद को हलके में लेंगे”, कुणाल ने खिड़की से बाहर एक पुरानी इमारत की ओर इशारा करते हुए मुझसे कहा. हम महासागर परिवहन की शानदार एसी बस में बैठे..नहीं ...नहीं.. लेटे हुए थे. ट्रेन टिकट के रद्द हो जाने और 180 रुपए कटने का अब हमें कोई मलाल नहीं था. हम तीनो अपनी-अपनी खिड़की के बाहर का नज़ारा देखने मैं व्यस्त थे. तभी अचानक वो पॉइंट आगया जहाँ से कूद कर मेरे एक दोस्त की भाभी अभी एक महीना पहले आत्महत्या की थी. पीछे छुट गए दो टुअर बच्चे की मनोस्थिति को सोचकर मैं थोड़ी देर के लिए अवसाद में चला गया. और जीवन और मृत्यु के विषय में गंभीरता से सोच-विचार करने लगा. लेकिन मेरी ये सधुकड़ी ज्यादा देर नहीं चल पाई. कुणाल के लतीफ़ों ने विचारों की अनवरत धारा को तोड़ दिया. और फिर हम ख़ुशगप्पी की नशिस्त लगाकर बैठ गए.
बात-चीत करते-करते कब हमें नींद आ गई और कब हम सो गए, कुछ पता था. हमारी बस भी कुछ अलग टाइप की थी. रात कहीं रुकी ही नहीं. कुणाल ने सुबह से कुछ खाया नहीं था. हमने, हालाँकि, दोपहर में खाना का लिया था, लेकिन फिर भी थोड़ी भूख थी, सो हमने सोचा था कि अगर बस कहीं रुकेगी तो हलझप्पी करेंगे. लेकिन बस कहीं रुई ही नहीं. शायद जैसे हम खजुराहो पहुँचने के लिए अधीर थे, वैसे बस भोपाल पहुँचने के लिए बेचैन थी. भोपाल पहुँचते-पहुँचते 12 बज गया, अगर समय से पहुँचते तो शयद 9 बजे के आस-पास हम भोपाल पहुँच गए होते. लेकिन भारतीय धावक की तरह बस अपनी अनवरत गतिशीलता के वावजूद बस मंजिल पर समय से नहीं पहुँच सका.
ISBT में घुसते के साथ ही मेरी निगाहे सुलभ-शौचालय को ढूँढने लगी. मेरा एक….. (क्रमशः)


Tuesday, 4 July 2017

भावुकता भोंदूपन है





मेरा एक दोस्त शाम मुझसे पूछ रहा था कि ऐसा क्या दुःख था ग़ालिब के जीवन में कि वे ऐसे गहरे-गहरे शेर लिखते थे? मैंने कहा कि दुःख तो ग़ालिब के जीवन में उतना ही था, जितना हमारे और आपके जीवन में है। हो सकता है, हमसे कम ही दुःख रहा हो उनके जीवन में। लेकिन कुछ था, उनके पास जो हमारे और आपके पास नहीं है, और वह है दुःख को अनुभव करने की क्षमता। आश्चर्य की बात है कि हम में से बहुत कम लोगों के पास ही अनुभूति की क्षमता होती है।
                                                                          

चित्र- साभार गूगल 
आपने कभी सोचा कि ऐसा क्या था कि बुद्ध ने एक मरे हुए व्यक्ति को देखा, और सब छोड़कर जंगल चले गए, और हम रोज़ ही लोगों को मरते देखते हैं, फिर भी जीवन को वैसे ही जिए चले जाते हैं? हम सोच सकते हैं कि हम भी दुःख का अनुभव करते हैं। क्योंकि जब कोई मर जाता है तो हम रोते हैं, किसी को मुसीबत में देखकर उस व्यक्ति पर दया करते हैं। और तो और हम तो इतने भावुक हैं कि फिल्म में भी, जोकि झूठ है, अगर हीरो मर जाता है, हम रुमाल गीली कर लेते हैं। तो फिर प्रश्न उठता है 'हम में और चचा ग़ालिब या भगवान बुद्ध में क्या भेद हैं? बड़ा भेद हैं, भगवान बुद्ध या ग़ालिब संवेदनाशील व्यक्ति थे. और हम भावुक जीव है. 
भावुकता भोंदूपन है। अगर आप गौर करें, तो आप पाएँगे कि बिना किसी अपवाद के हर भावुक व्यक्ति मंदबुद्धि होता है। ऐसा क्यों? क्योंकि भावुक होना एक यांत्रिक घटना है। भावना बेहोशी से पैदा है।अगर ऐसा नहीं होता तो फिर आप फिल्म देखते समय या फिर उपन्यास पढ़ते हुए रोते नहीं।
यह जानते हुए कि फिल्म में जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह वास्तविक नहीं है, आप रोते हैं। इससे यह साफ़ होता है कि आपके रोने का बोध से या फिर होश से कोई सम्बन्ध नहीं है।जैसे हम चाहकर भी अपने विचारों को नहीं रोक सकते हैं, उसी प्रकार ख़ास स्थितियों में हम भावनाओं को बहने से नहीं रोक सकते हैं। किसी के मरने पर जब आप रोते हैं, तो ज़रूरी नहीं है कि आप उस व्यक्ति के लिए रो रहे हों, बहुत संभावना है कि और लोगों को रोता देख कर आप भी रोने लगे हों। 

Sunday, 2 July 2017

हंसी और जम्हाई का राज़


आपने कभी सोचा कि हम जम्हाई क्यों लेते हैं, और क्या आप जानते हैं कि हंसने का क्या प्रयोजन है? 

हँसना और जम्हाई लेना बहुत गहरे में एक दूसरे से सम्बंधित है। योग के अनुसार हमारे शरीर में सात चक्र हैं, और हर चक्र की अपनी उपयोगिता है और विशेषता है, लेकिन यहाँ हम चक्रों से नहीं उलझेंगे। 

चित्र-साभार गूगल 
हम हंसी और जम्हाई की बात कर रहे थे, अगर आप विज्ञान से जम्हाई और हंसी के बारे में पूछेंगे तो उनके पास कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है। एक योगी के सिवाय और कोई भी आपको हंसी और जम्हाई का राज़ नहीं बता सकता है। 
जम्हाई एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा आप अपने एक चक्र से दूसरे चक्र तक उर्जा को पहुंचाते है। मतलब ज्यादा उर्जा वाले चक्र से आप कम उर्जा वाले चक्र को जम्हाई के द्वारा उर्जा देते हैं। 
और हंसी के द्वारा आप चक्रों पर जरूरत से ज्यादा संग्रहित उर्जा को बाहर फेंकते हैं। अगर ज्यादा उर्जा संग्रहित हो जाए, और उसे हंसी के द्वारा बाहर न फेका जाए, तो वह उर्जा नकारात्मक उर्जा में परिवर्तित हो जाती है और आप अवसाद में चले जाते हैं। क्योंकि गति उर्जा का स्वाभाव है, आप उसे एक अवस्था में नहीं रोक सकते हैं। 
इसका मतलब यह हुआ कि आप न हंसने के कारण दुखी हो जाते हैं। साधारणतया हमें लगता है कि लोग दुखी हैं, इसीलिए नहीं हँसते हैं, लेकिन हकीकत कुछ उल्टा ही है, 'न हंसने के कारण लोग दुखी हैं'। 
हमारे 90% बीमारी और मानसिक रोग का कारण हमारे जिंदगी से हंसी का गायब हो जाना है। 
हंसने को अपने जीवन का अनिवार्य अंग बनाइए, और गंभीरता का त्याग कीजिए। अपने उर्जा का विधायक उपयोग कीजिए। गंभीरता एक रोग, सिवाय मनुष्य के पूरे अस्तित्व में और कोई गंभीर नहीं है। गंभीर होने की मूढ़ता सिर्फ तथाकथित समझदार लोगों में पाई जाती है। ऐसी समझदारी का क्या लाभ जिससे जीवन में मनहूसियत आती हो?

Sunday, 25 June 2017

बीमार मरो या स्वस्थ्य, क्या फर्क पड़ता है?

बाबू चमनलाल एक नास्तिक व्यक्ति थे, वे न तो स्वर्ग में मानते थे और न ही नरक में, उनका कहना था कि स्वर्ग और नर्क सब कपोल कल्पनाएँ हैं. उनकी इस धारणा से जीतेजी उनको जो परेशानी हुई सो तो ठीक है, लेकिन असली दिक्कत तब पैदा हुई जब उनका देहांत हुआ. मेरने से पहले अपनी आखरी इच्छा के रूप में उन्होंने अपनी पत्नी से कहा किया कि मरने बाद सफ़ेद रंगहीन कफ़न में लपटने के बजाय उन्हें अच्छे से नाह-धोकर तैयार किया जाए, और फिर अपने जन्म दिन पर जो उन्होंने २० साल पहले एक सूट सिलवाया था, वो उन्हें पहनाकर मरघट ले जाया जाए. उनकी आखरी इच्छा का सम्मान करते हुए उनकी पत्नी ने उन्हें अच्छे से सजा दिया. लेकिन जब लोग उनको मरघट ले जाने लगे तो उनकी पत्नी जोर-जोर से दहाड़ मारकर रोने लगी. यह देख लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि अब तक वह बिलकुल नहीं रो रही थी, फिर अचानक चमनलाल को सजा-धजा देखकर क्यों रोने लगी! लोगोंने जब अपनी जिज्ञासा जाहिर की तो, कहने लगी, “मैं यह सोचकर रो रही हूँ  कि इतना सज-धज यह जाएगा कहाँ..?” लोगों ने पूछा क्या मतलब कहाँ जाएगा, मरघट जाएगा और कहाँ जाएगा? इसपर वो कहने लगी, “वो तो ठीक है लेकिन मेरा मतलब है, यह न तो स्वर्ग में मानता है और न ही नर्क में, फिर यह कहाँ जाएगा, क्या फायदा इसको इतना सजाने का..?” और वो फिर दहाड़ मारकर रोने लगी.


आपको भले ही यह कहानी हास्यास्पद लगी हो, लेकिन जब भी लोगों को मैं स्वस्थ्य होने के पागलपन में लगा देखता हूँ तो मुझे यह कहानी याद आ जाती है. और मैं अक्सर अपने उन मित्रों से , जो ‘फिटनेस फ्रिक’ हैं, पूछता रहता हूँ, “इतना सजधज कर जाओगे कहाँ?” यह वाकई सोचने वाली बात है कि हम स्वस्थ्य होने के लिए इतने पगलाए हुए क्यों हैं? ख़ासकर इस सदी में तो लोगों के सर पर स्वस्थ्य होने का भूत कुछ ज्यादा ही सवार हो गया है. जिसको देखो वही या तो वजन कम करने में लगा है या फिर बढ़ाने में? हर कोई किसी-न-किसी जुगत में लगा है. कोई सुबह उठकर योग कर रहा है तो कोई साँसों के साथ फूं-फां कर रहा है. मैं आज तक किसी ऐसी लड़की से नहीं मिला जो ख़ुद को बिलकुल स्वस्थ्य मानती हो, किसी को चार किलो बढ़ाना है तो किसी को पांच  किलो घटाना है. समझ नहीं आता कि माजरा क्या है? जवान से लेकर बूढ़े तक सब ख़ुद को स्वस्थ्य करने में लगे हुए हैं!!!



संभवतः, लोगों के भीतर यह ख्याल घुस गया है कि अगर वे स्वस्थ्य रहेंगे तो ज्यादा दिन जिएंगे, या फिर शायद कभी मरेंगे ही नहीं. आमतौर पर हर कोई ऐसा ही सोचता है. लेकिन लोगों का यह खयाल बेबुनियाद है, क्योंकि यदि आप आधुनिक शरीरशास्त्रीयों की सुनेंगे, तो आप सदमे में आ जाएँगे. उनका ऐसा कहना है कि जो व्यक्ति जितना स्वस्थ्य होता है, वह उतनी जल्दी मरता है, और बीमारी से ग्रस्त आदमी लम्बा जीता/घसीटता है. क्योंकि वैज्ञानिक कहते हैं कि सिर्फ जीने के लिए ही नहीं बल्कि मरने के लिए भी उर्जा की ज़रुरत होती है. और अक्सर बीमार आदमी के पास इतनी भी शक्ति नहीं होता कि वह मर सके, इसीलिए वह सालों तक घसीटता रहता है. और शायद इसीलिए मुर्दे फिर कभी नहीं मरते हैं. संभवतः यह आपने भी गौर किया होगा जो आदमी कभी बीमार नहीं पड़ता है, वह अक्सर पहली ही बीमारी में चल बसता है. यह अकारण नहीं है कि पहलवान और खिलाड़ी अक्सर कम उम्र में ही मर जाते हैं. अगर ऐसा है तो उन लोगों को शतर्क हो जाना चाहिए जो लम्बे जीवन की चाह में योग-वगैरह करके ख़ुद को स्वस्थ्य रखना चाहते हैं.

चित्र-साभार गूगल



खैर, यह मेरा सवाल नहीं कि बीमार पहले मरता है कि स्वस्थ्य. असली सवाल यह कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि आप बीमार होकर मरते हैं या स्वास्थ्य होकर? अगर दोनों ही स्थिति में नियति मौत ही है, तो फिर स्वास्थ्य होने के लिए इतना परेशान होने की क्या ज़रुरत है...?

इस विषय पर बहुत सोच-विचार करने के बाद मेरे सामने जो अंतरदृष्टि उभरकर आई है वो ये कि स्वास्थ्य दो प्रकार का हो सकता है- एक नकारात्मक और दूसरा सकरात्मक. नकारात्मक स्वास्थ्य वो है जिसमे व्यक्ति बीमारी व मृत्यु के डर से भयाक्रांत होकर  स्वास्थ्य होने की कोशिश करता है. लेकिन यह मूर्खतापूर्ण है, आप चाहे कितना भी स्वस्थ्य क्यों न हों एक न एक दिन आपको मरना ही होगा. मृत्यु अपरिहार्य है, इसको किसी भी उपाय से अन्यथा नहीं किया जा सकता है. इसीलिए ऐसे स्वास्थ्य का कोई मूल्य नहीं जो भय की वजह से अर्जित किया गया हो. ‘स्वास्थ्य’ अपने आप में मूल्यहीन है, जबतक कि उसका कोई सार्थक उपयोग न किया जाए. भयभीत व्यक्ति का शरीर यदि स्वास्थ्य भी तो उसका मन रुग्न होता है, क्योंकि भय एक मानसिक रोग है, इसीलिए भय से जो भी पैदा होगा वो सब रुग्न होगा. चूँकि इनका मन कलुषित होता है इसीलिए ऐसे लोग स्वास्थ्य का गलत इस्तेमाल करते है, स्वास्थ्य मिलने पर ये उन सब जघन्य अपराधों संलग्न हो जाते हैं, जो ये दुर्बल शरीर से कभी नहीं कर सकते थे. शुभ करने के लिए शायद ही कभी मजबूत शरीर की ज़रूरत होती है. लेकिन अशुभ करने के लिए शरीर का मजबूत होना अनिवार्य है. इसीलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि हिटलर भी स्वास्थ्य के उन्ही नियमों का पालन करता है, जिसका कि महात्मा गाँधी या कोई और महात्मा करते हैं.


इसीलिए कालान्तर में गुरु, तब तक शिष्य को स्वस्थ्य होने की कुंजी नहीं देता था, जबतक कि वह इस बात को लेकर पूर्णरूपेन आश्वस्त नहीं हो जाता  कि शिष्य अब स्वास्थ्य का कोई गलत इस्तेमाल नहीं करेगा. लेकिन आज कल के गुरु बिना ये जाने समझे के कोई व्यक्ति क्यों स्वस्थ्य होना चाहता है, उसका क्या उदेश्य है, योग या स्वस्थ्य होने के अन्य विधियों की जानकारी धरल्ले से चंद नोटों और थोड़ी सी शोहरत के एवज में बेच रहे हैं. यह ख़तरनाक है, बहुत ही ख़तरनाक है. पता नहीं कैसे इसके दूरगामी दुष्परिणाम को ये मंदबुद्धि योगगुरु तथा स्वास्थ्य के अन्य ठेकेदार नहीं देख पा रहे हैं!



सकारात्मक, स्वास्थ्य एक बिलकुल ही अनूठी बात है. सकारात्मक स्वास्थ्य का खोजी, किसी चीज से भयाक्रांत होकर स्वास्थ्य नहीं खोजता है. वह बामारी या मृत्यु से लड़ने के लिए स्वास्थ्य नहीं तलाशता, बल्कि ऐसा व्यक्ति मृत्यु को जानने व उसके पार जाने के लिए स्वास्थ्य अर्जित करता है. उसकी उत्सुक जीवन के परम सत्य को पा लेने में है न कि सुडौल व सुगठित शरीर पाने में. बुद्ध ने कहा है कि असत्य में सौ साल जीने से उत्तम है सत्य में एक क्षण जीना.



महावीर ने शरीर को नाव कहा है, एक ऐसा नाव जिसमे सवार होकर हम संसार/भव(दुःख)-सागर के पार जा सकते हैं. नैचुरली, अगर नाव में  छेद हो तो पार करना मुश्किल होगा. इसीलिए साधक स्वस्थ्य शरीर की कमाना करता है. लेकिन शरीर उसके लिए साधन है साध्य नहीं. विचार करें कि आप क्यों स्वस्थ्य होना चाहते हैं? सिर्फ स्वस्थ्य होकर मरने में क्या अर्थ है? “शरीर’ शब्द संस्कृत के शब्द क्षर से बना है. क्षर का अर्थ होता नाश होना, इसलिए, शरीर को कितना भी सजा लो इसका नाश सुनिश्चित, एक न एक दिन इसका क्षय होकर रहेगा.



Friday, 16 June 2017

शकील बदायूंनी

उनकी याद, उनकी तमन्ना, उनका ग़म, कट रही है ज़िन्दगी आराम से
जनाब शकील बदायूंनी कलम के वो जादूगर हैं जिनको लफ्ज़ को फूल बनाने का करिश्मा आता है | और यही वजह है कि उनके अशआर व नग़मों की लताफत बू-ए-गुल की मानिंद आहिस्ता आहिस्ता अपने परों को खोलती, सुखननवाज़ के सोच और दिल के दरवाज़े से होते हुए रूह की गहराइयों में उतर जाती है | ‘हम तो रोते ही थे इश्क़ में रात-दिन, तुम भी आखिर इसी राह पर आ गये |’ अल्फाजों की सादगी, उम्दा कहन और जुदा अंदाजेबयां ये कुछ ऐसी ख़ासियतें है जो शकील बदायूंनी को एक अज़ीम शख्सियत और मुख्तलिफ़ शायर बनाता है | शकील के इसी सदा बयांनी के बाबत मकबूल शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी लिखते हैं, “शकील शायरे-फ़ितरत  हैं, शायरे-कारीगर नहीं | उसका कलाम सिर्फ़ लफ्ज़ी तलिस्मबंदियों का मजमुआ नहीं बल्कि हकीक़तन  उसका कलाम उसकी ज़िंदगी का आईनादार है|” शकील ख़ुद अपनी एक शेर में कहते हैं :
                                    “मैं ‘शकील’ दिल का हूँ तार्ज़ुमां  कि मुहब्बत का हूँ राज़दां                                       मुझे फ़ख्र  है मेरी शायरी मेरी  ज़िन्दगी  से  जुदा नहीं”


चित्र-साभार गूगल 
शकील ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है जो उनके स्वभाव के प्रतिकूल हो | शकील मानते हैं कि “प्रेम, सौंदर्य और शिष्टता जीवन का महत्वपूर्ण अंग है | इसके बिना पूर्ण मानव नहीं बना जा सकता है और यदि हम स्वयं मानव नहीं बन सकते तो दूसरों को मानवता का उपदेश कैसे दे सकते हैं |” लेकिन उनकी इसी धारणा और उनकी शयरी की एकरूपता के कारण कुछ प्रयोगवादी शायरों और समालोचकों ने शकील की शायरी को परम्परागत शायरी कह कर नज़र अंदाज़ भी किया |   
लेकिन शकील ने इन सब की कभी परवाह नहीं की और वो हमेशा प्रेम में ही उलझे रहे | ‘शे’र-ओ-अदब की राह में हूं गामज़न ‘शकील’, अपने मुख़ालिफ़ीन की परवा किये बगैर|’ शकील ने अपने समय के किसी भी शायर के पदचिन्हों पर चलना मुनासिब  नहीं समझा | उनके समय में ज्यादातर शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी साहब से प्रभावित थे | कुछ शायर तो ‘जिगर’ साहब के हुलिए, उनके खोए-खोए अंदाज़ में गुफ्तगू करने का ढंग और तरन्नुम की भी नक़ल करते थे | इस समबंध में शकील कहते हैं, मेरा दिल ‘जिगर-छाप’ शायर बनने को बिल्कुल तैयार न था | शायद इसीलिए मैं पुकारता था ” :
जो नुकूश-खुर्दा-ए-पा न हो उसी रहगुज़र  की तलाश है !
हालाँकि, कभी कभी उन्होंने अपनी शायरी में नये मूल्यों को पिरोने का भी प्रयास किया, लेकिन प्रेम-संबंधी मनोविश्लेषण की तुलन में उनके इस प्रयास काफ़ी कम रहा | समालोचक कुछ भी सोचते हों लकिन नगमा-ओ-नज़्म, और गीत-ओ-ग़ज़ल के जो मुरीद रोहानी तस्सली तलाशते हैं, उनके लिए जनाब शकील बदायूंनी हमेशा से एक तीर्थ जैसे रहें हैं | अपने शेरों की सरलता और सहजता के ज़रिये शकील समाजके एक बड़े रकबे से रिश्ता कायम कर पाए | दुसरें शायरों के मुक़ाबले शकील को हमेशा सर्वाधिक सर्वप्रियता और प्यार मिला | जानेमाने शायर और नगमा निगार ‘मजरूह’ सुलतानपुरी कहते हैं, “एक ग़ज़लगो शायर की हैसियत से मुझे ‘शकील’ के मक्तबे-ख्याल से इख्तिलाफ़ सही, लेकिन इमान की तो यह है कि जब भी मैंने उनके मुंह से अच्छे शेर सुने हैं रश्क  किए बगैर नहीं रह सका |”  
तसल्ली के लिए शकील के कुछ प्रेम संबंधी उम्दा शेरों पर गौर फ़रमाइए :
कोई  ऐ ‘शकील’ देखे ये जुनूं नहीं तो क्या है, कि उसी के हो गए हम जो न हो सका हमारा
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कभी-याक-ब-याक  ताव्व्ज़ुह कभी दफ़अतन तगाफुल 
मुझे  आज़मा  रहा  है  कोई  रुख बदल बदल कर
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तुम  ज़माने के हो हमारे सिवा
हम किसी के नहीं तुम्हारे सिवा
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कैफे-निशाते-दर्द  का  आलम  न पूछिए
हंस कर गुज़र दी है, शबे-ग़म कभी-कभी  
शकील की शोहरत और मकबूलियत का भेद उनकी अहसास की तीव्रता, बेपनाह तरन्नुम और शेरों की बेजोड़ चुस्ती है | उनके शेर पर महफ़िलों से उठती ‘वाह’ ‘वाह’ और ‘सुभान अल्लाह’ की शोरे तहसीन ने शकील को प्रेम की झील से बहार निकलने का कभी मौका नहीं दिया और न उन्होंने कभी इससे बहार कुछ सोचा | शकील ने जीवन पर्यंत ख़ुद को परम्परागत ग़ज़ल तक ही सिमित रखा या यूं कहें कि प्रेम के अथाह सागर से अनमोल मोतियों को चुन चुन कर लाते रहें | ‘उनका ख्याल, उनकी तमन्ना में मस्त हूँ मेरे लिए ‘शकील’ इबादत है ज़िन्दगी |’ शकील के समकालीन शायर ‘साहिर’ लुधियावी कहते हैं, “ ‘जिगर’ और ‘फ़िराक’ के बाद आने वाली पीढ़ी में ‘शकील’ बदायूंनी एक मात्र शायर हैं जिन्होंने अपनी कला के लिए ग़ज़ल का क्षेत्र चुना है और इस प्राचीन किन्तु सुन्दर और पूर्ण काव्य-रूप को, जिसमे हमारे अतीत की सर्वोतम साहित्यिक तथा सांस्कृतिक समग्री सुरक्षित है, केवल अपनाया ही नहीं उसका जीवन के परिवर्तनशील मूल्यों और नये विचारों से समन्वय कर उसमे नये रंग भी भरे हैं |
इसमें कोई संदेह नहीं कि एक काव्य-रूप के लिहाज़ से ग़ज़ल सिमित भावनाओं की वाहक है | और फिर यह इतनी मथी जा चुकी है कि अब इसमें अधिक मंथन की बहुत कम गुंजाइश रह गयी है | लेकिन जो लोग इस प्रकार की गुंजाइश निकाल सकते हैं, उन्हें अपने विचारों को ग़ज़ल का पहनावा पहनाने का पूरा-पूरा अधिकार है |‘शकील’ बदायुनी बड़ी सुरीति से अपने अधिकार की रक्षा कर रहा है | उसे पढ़ते हुए जहाँ हमें यह अनुभव होता है कि हम आधुनिक काल के किसी शायर को नहीं, किसी उस्ताद को पढ़ रहे हैं, वहां इस बात का भी अनुभव होता है कि वह उस्ताद आधुनिक काल का उस्ताद है |”   
खोल  दे बादे-मैकदा ‘साक़ी’
एक फ़रिश्ता भी इंतजार में है 
शकील शायरी के उस्ताद ही नहीं थे उन्हें जीवन के गहरे रहस्यों का भी पता था, तभी वो तो अपने एक शेर में कहते हैं , “इस कसरते-ग़म पर भी मुझे हसरते-ग़म है, जो भर कर छलक जाए वो पैमना नही हूँ|” हालाँकि कुछ लोग शकील को दुःखवादी शायर भी मानते हैं उनका कहना है कि शकील दर्द के तलबगार हैं, लेकिन जिनको जीवन के अटपटे ढंग का थोड़ा भी पता है वो ये जानते हैं कि , “वेन यू लर्न तो लव हेल, यू विल बी इन हेवन’’ | शकील निसंदेह जीवन के इस पहेली को समझते थे, उन के इस शेर से उनकी ये समझ नुमायां है,
मुझे ग़म भी उनका अज़ीज़  है, कि ये उन्हीं की दी हुई चीज़ है |

शयर शकील का बचपन  
ग़मों से मोहब्बत करने वाले इस अज़ीम शायर का पूरा नाम शकील अहमद ‘शकील’ बदायूंनी है | इनका जन्म 3 अगस्त, 1916 ई. को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था | बदायूं के होने के कारण इनके नाम के साथ ‘बदायूंनी’ आता है और ‘शकील’ इनका तखल्लूस  है | शकील के वालिद मौलाना जमील अहमद सोख्ता क़ादरी ने शकील के जन्म के वक़्त ही तय कर लिया था कि वो अपने बेटे को ऊँची तालीम दिलवाएंगे ताकि वो अपने जीवन में बड़ा मुकाम हासिल कर सके | शकील ने ठीक से उठाना बैठा भी नही सीखा था कि मौलाना साहब ने घर पर उस्तादों को बुला कर शकील को अरबी, फ़ारसी, उर्दू और हिंदी की प्रारंभिक शिक्षा दिलवाने लगे | जल्दी ही शकील भाषा दुरुस्त हो गयी, और वो उर्दू और फ़ारसी के शरों शायरियों में दिलचस्पी लेने, साथ ही साथ ख़ुद भी शब्दों के साथ खेलने लगे |
शकील के वालिद मिज़ाज़ के तो तेज़ थे लेकिन उनको शेरों शायरी में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी | घर में शायरी का माहौल बिल्कुल भी न था | अब दिक्कत ये थी कि शकील हीरा तो बन गये थे लेकिन उसको तराश कर चमकाने वला कोई मिल नहीं रहा था |
उस ज़माने में, बदायूं के गली मोहल्ले में मज़हबी और अदबी चर्चा आम हुआ करती थीं | बदायूं शायरों का गढ़ था और शहर के करीब करीब सभी शायर ग़ज़ल कहते थे | शकील शहर में होने में वाले मुशायरों में शरीक होने लगे थे और शायरों को सुन सुन कर उन में भी यह फ़न आने लगा था | इस संबंध में शकील कहते थे “मेरी शायरी का फ़न मारुसी  नहीं है क्योंकि न मेरे वालिद शायर थे न दादा | हाँ, मेरी सातवीं पुश्त में जो मेरे जद्दे-अमजद थे उनके बारे में किताबों में पढ़ा है कि वो शायर थे और उनका नाम ख़लीफ़ा मोहम्मद वासिल था | मुमकिन है वही जौक  सात पुश्तों की छलांग लगाकर मेरे हिस्से में आया हो’’
बदायूं के मुशायरों से शकील को दो महत्वपूर्ण बातें समझ में आई, पहला ये कि इन शायरों के शायरी पर लखनऊ-स्कूल का गहरा परभाव है | और दूसरा ये कि इन शायरी और ग़ज़लों में जीवन दर्शन का अभाव है, साहित्य तो है लेकिन वो सिर्फ साहित्य के लिए ही है, जीवन साहित्य की कमी है | शकील के पास अंतर-दृष्टि थी, शब्द था लेकिन सलीका नहीं था | स्वाद का तो पता था लेकिन जिस जुबान से स्वाद को बताया जाय उसकी कमी थी | इस कमी को सिर्फ एक चीज़ पूरा कर सकता था और वो थी किसी अच्छे उस्ताद की क़ुर्बत |
इसी बीच शकील अपने एक नाते के चाचा के संपर्क में आये जिनका नाम हज़रत मौलाना ज़िया-उल-क़ादिर था |मौलाना अपने समय के ख्यातिलब्ध नाअत-गो थे यानि हज़रत मोहब्बत की तारीफ़ में शेर लिखते थे | मौलाना की सूफ़ियाना सोहबत का असर शकील की शायरी में ख़ूब देखने को मिला, उनकी कुछ सूफ़ियाना शेरों पर नज़र फमाइये :
नई  सुबह पर नज़र है मगर आह ये भी डर  है,  ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुंचे
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क्या शै है मताअ-ए-ग़मों-रहत न समझना
जीना है तो जीने को हक़ीक़त न समझना
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एक तरफ़ ख़ुदा के पक्ष में शकील लिखते हैं :
मुिन्करे-ज़ात  ! तेरी बहस मुसल्लम लेकिन
यूं  वो  कुछ  और नुमायां  नज़र आता है
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तो दूसरी और ख़ुदा के विपक्ष में कहते हैं :
दे  सदायें दरे-इंसान ही पे इंसान ‘शकील’
हाए दुनियां के ग़रीबों का ख़ुदा क्यों न रहा
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बदायूं में अपनी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा पूरी कर 1936 ई. में शकील अलीगढ़ आ गये और यहां अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बी.ए में दाखिला लिया | यहाँ आपने के बाद वो आधुनिक, प्रयोगवादी और सैद्धांतिक शायरों के गुटों के  संपर्क में आये | एक और प्रगतिशील शायरों का गुट था जिसमे, ‘मजाज़’, जज़्बी, जांनिसार ‘अख्तर’, मासऊद अख्तर ‘मजाल’, के नज़्में धूम मचा रही थीं तो दूसरी वो ‘राज़’ मुरादाबादी जैसे ऊँचे परम्परागत ग़ज़ल-गो शायर थे | ‘राज़’ मुरदाबादी शकील के बहुत अच्छे दोस्त और ‘जिगर’ मुरादाबादी के बहुत बड़े मरीद थे | राज़ स्वम् ‘जिगर’ साहब के शेरों-शायरी के कायल थे, और एक मुद्दा से दिल में उनसे मिलने की हसरत पाले हुए थे | लालिगढ़ आने के बाद ‘राज़’ की मदद से उनको ‘जिगर’ मुरादाबदी से मिलने का मौका नसीब हुआ | ‘जिगर’ मुरादाबादी से मिलने में बाद शकील की शायरी में जो निखार आया उसके बारे शकील ख़ुद कहते हैं, “ ‘जिगर’ साहब की कृपा-दृष्टि मिलने के बाद, मेरी शायरी पर यौवन आता चला गया | उसी ज़माने में स्वर्गीय मौलाना ‘अहसान’ माहरर्वी उर्दू के लेक्चरर थे, और यू.पी. के विभिन्न कालेजों, विशेषकर सेंट जोन्स कालेज, आगरा, में ‘इंटर-वर्सिटी’ इनामी मुशायरे हुआ करते थे | ‘अहसन’ साहब मुझे और ‘राज़’ को अपने साथ वहां ले जाया करते थे और हम दोनों मुशायरों के लिए ‘धमाका’ सिद्ध होते थे | इनाम हमें मिलता था और विजय अलीगढ़ विश्वविद्यालय की होती थी | इन सिलसिलों ने ग़ज़लगोई के क्षेत्र में मेरे पांव और भी दृढ़ता से जमा दिए | चूँकि मस्तिष्क को राजनीती से कोई लगाव ही न था इसीलिए प्रगतिशील आंदोलन की बजाय मैंने अपनी शयरी को प्रेम तथा प्रेम-संबधी मनोविश्लेषण पर केन्द्रित कर दिया |”  
नग़मा-ए-इश्क़ न हो एक ही धुन पर क़ायम
वक़्त  के  साथ  ज़रा  राग  बदलते  रहना
निकाह-ए-इश्क़
मुश्किल था कुछ तो इश्क़ की बाज़ी को जीतना
कुछ  जीतने  के  खौफ़  से  हारे  चले  गये
1940, में शकील का निकाह उन्ही के एक दूर की रिश्तेदार शलमा से कर दिया गया | शलमा को शकील बचपन से जानते थे, वे एक ही हवेली में रहते थे | उस ज़माने के रवायत के अनुसार घर के मर्द हज़रात को ख़वातीन से मिलने नहीं दिया जाता था, सो एक घर में रहते हुए भी दोने एक दुसरे से अनजान ही थे |    यहाँ पेशे ख़िदमत है शकील के कुछ मोहब्बत भरे शेर:
आज मेरे मन में सखी बांसुरी बजाये कोई
प्यार  भरे  गीत सखी बार-बार गये कोई
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वो हमसे ख़फ़ा हैं, हम उनसे ख़फ़ा हैं
मगर  बात  करने  को जी चाहता है
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मुझे तो तेरी जुल्फ़ों का महकना याद आता है,
तुझे भी मेरी अश्कों की रवानी याद आती है |
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वह फेर लें नज़र तो कहां तबे-यक-नफ़स
यह ज़िन्दगी उन्ही की बदौलत है ज़िन्दगी
फ़िल्मी सफ़र
शादी के बाद शकील के कंधों पर गृहस्थी का बोझ आ आ गया, शेरों शायरी के दम पर घर चलाना संभव नहीं था | ‘हल हो सका न जब ग़मे-हस्ती का मसअला, कुछ सोच के हरीफ़े-ग़मे-यार बन गये’ | बी.ए. पास करने के बाद उन्होंने दिल्ली में राज्य के सप्लाई-विभाग में नौकरी पकड़ ली और 1942 से 1946 ई. वहीँ रहे | अपने दिल्ली निवास के दौरन, नौकरी के बंदिशों के वावजूद सभी मुख्य शहरों में मुशायरे पढ़ते रहे और साथ ही श्रोता के मिज़ाज़ को भी समझने के निरंतर कोशिश करते रहे | इन्ही कोशिशों के दौरान एक बात जो उन्हें समझ में आई वो ये कि शेर की भाषा सरल और बात गहरी होनी चाहिए, दूसरा मनोवैज्ञानिक तथ्य उनको ये समझ में आया कि क्या कहा जा रहा है से ज्यादा कौन कह रहा है ये मायने रखता था, मतलब शयर का नामचीन होना निहायत ही ज़रूरी है | इस सब से बढ़ कर कहने का अंजाद यानि तरन्नुम की अपनी भूमिका है | अपने इन अनुभवों के बारे में शकील कहते हैं, “मैंने, जहां तक संभव हो सका, अपनी शायरी को इस राह पर लेन की कोशिश की कि स्तर भी क़ायम रहे और सुनने वाले भी नराश न हो | कलाकार अगर प्रसिद्ध हो तभी उसकी आवाज़ में असर पैदा होता है और यह भी होता है कि कलाकार की आवाज़ जनता को अपनी ओर आकृष्ट करे | उसी प्रकार एक शायर यदि जनता में मान्य है तो उस शायर पर यह ज़िम्मेदारी आती है कि वह अपने प्रभाव से जनता का स्तर ऊँचा करे, न कि उसको अधस्थल की और ओर ले जाए | जो हो, मुझे और मेरी ग़ज़लों को जितनी भी मान्यता मिलती गई, मैं उतना चौकन्ना होता गया |”
जज़्बात  की  रौ में बह गया हूँ
कहना जो न था वो कह गया हूँ
रफ़्ता-रफ़्ता एक ग़ज़ल-गो शयर के तौर पर शकील की लोकप्रियता बढ़ने लगी और शकील लाखों दिलों के महबूब शायर बन गये | ऐसे मुशायरों में शकील को दाद मिलती थी जहां श्रोता मनो क़सम खा कर आते थे कि उनको किसी भी शायर दाद नहीं देंगे | शकील की प्रसिद्धि का ये आलम था कि शकील यदि कहीं किसी मुशायरे में ट्रेन से जा रहे होते थे तो लोग स्टेशन पर आ कर उनको पान, मिठाइयां, फल और फूल भेंट करते थे और साथ ही उनको अपने शहर में आने के लिए आमंत्रित करते थे, कुछ लोग उनको अपने घर पर भी रुकने के लिए आग्रह करते थे और शकील हंसी ख़ुशी उनके भेंटों और आमंत्रण को स्वीकार भी करते थे | उनकी ख्याति किसी फ़िल्म अभिनेता या राजनेता से कम नहीं थी | शकील को मुशायरों में शेर पढ़ते हुए देखना एक ऐसा अनुभव था जिस से सामयीन बार बार गुज़रना चाहते थे |
तेरी  महफ़िल से उठ कर इश्क़ के मारों पे क्या गुज़री
मुखालिफ़  इक  जहां  था  जाने बेचारों पे क्या गुज़री
शकील के कुछ मित्र जो उनकी ख्याति और उनको लोगों के द्वारा किये गये असीम प्रेम से जलते थे, उन्होंने कहानी बना रखी थी कि शकील लोगो को पहले से ख़त लिख कर अपने आने की ख़बर दे देते हैं, उनको बता देते हैं कि फलां तकिख को फलां मुशायरे में शरीक होने जा रहा हूँ, आप के शहर में ट्रेन रुकेगी, आप मुझ से मिलने ज़रूर आइये गा मुझे बड़ी ख़ुशी होगी | मैं आप की इस अनुकंपा के लिये सदा आपका एहसान मंद रहूँगा | वगैर वगैरह |
कांटो से गुज़र जाता हूँ दमन को बचाकर
फूलों  की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ
सचाई जो भी हो, मगर इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि शकील एक हर दिल अज़ीज़ शायर थे तभी तो इतने बरसों बाद भी उनके लिखे ग़ज़लों, गीतों और शेरों को लोग दिल की मानिंद सिने में बसाये रखे हैं |
है सितारों  की तरफ़ माईले-परवाज़ ‘शकील’
दुश्मनों ! तुमको क़सम है यूंही जलते रहना
अपने शेरों शायरी की ज़बदस्त लोकप्रियता से उत्साहित हो कर शकील ने नौकरी छोड़ कर बंबई(मुंबई) जा कर फ़िल्मों में अवसर तलाशने का क़सद किया और 1946 ई. में दिल्ली को छोड़ कर मुंबई आ गये | ‘जुनूं से गुज़रने को जी चाहता है, हंसी ज़ब्त करने को जी चाहता है’ | मुंबई आने के बाद शकील की मुलाकात उस ज़माने के मशहूर संगीतकार नौशाद और निर्मता ए.आर कारदार से हुई | शकील के नौशाद को अपनी मनसा बताई, जिस पर नौशाद ने उनसे एक शेर लिख कर दिखने को कहा, शकील ने वहीँ आनन-फ़ानन में एक शेर लिख दिया, “हम दर्द का अफ़साना दुनियां को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की एक आग लगा देंगे” | नौशाद इस नये शायर हुनर देख़ कर दंग रह गये और उन्होंने बिना बिलंब किये शकील को निर्माता कारदार की अगली फ़िल्म ‘दर्द’ के गीत लिखने का काम दे दिया | ऐसा बहुत ही कम होता है कि किसी गीतकार को उसकी पहली ही फ़िल्म से सफलता का स्वाद चखने को मिल जाय, लेकिन शकील के मामले में ऐसा हुआ |  ‘दर्द’ का गीत ‘अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का, आंखों में रंग भरके तेरे इंतज़ार का.....’ लोगों की जवान पर चढ़ गया, बांकी के गीत भी सफ़ल रहे | अपनी पहली ही फ़िल्म से शकील एक नामचीन शायर बन गये | अपने गीतों की लोगप्रियता से शकील को ये साफ़ हो गया बातें गूढ़ होनी चाहिए लेकिन शब्द चयन के मामले में सावधानी बरतने की ज़रुरत है, शब्द जितना सरल हो उतना बेहतर है | अपने इस अनुभव के संबध में शकील का कहना था, “मैंने जो ग़ज़लें कही है, उनमे मैंने इस समस्त बातों का ध्यान रखा है और मुझे आशा है कि यदि जीवन ने साथ दिया तो ग़ज़ल के लिए अपना एक अलग ढांचा तैयार कर लूँगा |”
चले तो ज़रा दौरे-जामे-मुहब्बत
फ़रिश्ते भी तक़लीदे-इंसा करेंगे
रूमानियत के शायर शकील
परदा  नहीं जब कोई खुदा से बन्दों से परदा करना क्याजब प्यार किया तो डरना क्या प्यार किया तो डरना क्या
‘दर्द’ की गीतों सफलता के बाद नौशाद और शकील के दोस्ती गाढ़ी हो गई और दोने ने मिल कर एक से बढ़ कर एक गीत दिए | शकील के लेखनी की ख़ासियत ये थी कि उन्हों अपनी गीतों को किसी भाषा विशेष तक महदूद नहीं रखा, उर्दू के अलावे, हिंदी, ब्रजभाषा, भोजपुरी और कई क्षेत्रीय भाषों में अपनी भावनाओं पिरोया | नौशाद की संगीत और शकील के बोल से सुसज्जित फ़िल्मों में, ‘बैजू बावरा’, मदर इंडिया, और मुग़ल-ए-आज़म का नाम उल्लेखनीय है | मुगले-ए-आज़म का गीत, ‘जब प्यार किया तो डरना क्या...’ को हिंदी फ़िल्म संगीत के इतिहास तक के सब से रोमांटिक गाना माना जाता है | कहा जाता है कि नौशाद साहब ने कोई 105 बार शकील से इस गाने में सुधार करवाए तब जा कर वो संतुष्ट हुए | उस ज़माने में इस गाने को बनाने में और इस को शूट करने के लिए शीश महल तैयार करने में एक कड़ोड़ का खर्चा आया था | आवाज़ में गूंज पैदा करने के लिए नौशाद साहब ने लता मंगेशकर से बाथरूम में ये गवाया था |
हालाँकि शकील ने कई संगीत करों के साथ काम किया लेकिन सब से ज्यादा गीत उन्होंने नौशाद साहब के लिए लिखे | ‘दर्द’ के बाद अगले बीस सालों तक नौशाद के करीब करीब हर फ़िल्म शकील के बोल होते थे | नौशाद और शकील के ज्यातर सफ़ल गीत रफ़ी साहब के गये हुए है, जैसे, ‘ओ दुनियां के रखवाले.., ‘मन तड़पत हरि दर्शन को...’, ‘जय रघुनंदन जय सिया राम..’ | कहा जाता है कि धार्मिक प्रविर्ती के व्यक्ति थे, और ऐसा उनके ‘बैजू बावरा’ गीतों में साफ़ झलकता है |

ये ज़िन्दगी के मेले दुनियां में कम न होंगे, अफ़सोस हम न होंगे  
कितनी लतीफ़, कितनी हसीं, कितनी मुख़्तसर
इक  नौशिगुफ्ता फूल की नकहत  है ज़िन्दगी
बहुत अच्छे अशआर वही कह सकता है जो बहुत अच्छा इंसान हो | शकील को जानने के लिए उनकी शायरी भर को पढ़ लेना काफ़ी है | मोहब्बत के मसीहा जनाब शकील बदायूंनी, जैसा कि शायर अक्सर होता है, तबियत से शांत और ख़ामोशी पसंद इंसान थे | उनमे शायरों वाला सब गुण था लेकिन वे शराब नहीं पीते थे और ऐसा भी नहीं था कि वो शराब के विरोधी थे, अपने एक शेर में कहते हैं, “जाहिद की मैकशी पर तअज्जुब न कीजिए, लती है रंग फ़ितरते-आदम कभी-कभी” | खाली समय में शकील को अपनी पत्नी औरे बेटे बेटी के साथ वक़्त गुज़ारना और अपने दोस्तों जैसे नौशाद और रफ़ी साहब के साथ बैडमिंटन खेलना पसंद था | नौशाद और शकील की दोस्ती मिसाल के काबिल है, शकील के इंतकाल से नौशाद इतने आहात हुए कि उन्हों ने काफ़ी समय तक म्यूजिक कंपोज़ करना छोड़ दिया|
बैडमिंटन खेलने के अलावा उन्हें पिकनिक पर जाना और पतंग उड़ना भी ख़ूब भाता था | वे पिकनिक पर जिन दोस्तों के साथ जाते थे उनमे नौशाद, मोहम्मद रफ़ी, और जॉनी वॉकर प्रमुख थे | दिलीप कुमार, वजाहत मिर्ज़ा, ख़ुमार बरबंखावी और अज़म बजातपुरी से भी उनकी अच्छी दोस्ती थी |
20 अप्रैल, 1970 को डायबिटीज की वजह से उनकी मृत्यु हो गई |
एक रोज़ मैं तो ढूंढ ही लूंगा जहाने-नौ (नई दुनियां)
दुनियां  मुझे  तलाश करेगी मगर कहां
शकील को मिले पुरुस्कारों की सूची
‘तुम हुए अपने तो दुनियां मेहरबां होने लगी’
1961 ई. में शकील को उनके लिखे गीत ‘चौदवीं का चाँद हो..’ (फिल्म ‘चौदवीं का चाँद’) के लिए फिल्मफेअर बेस्ट लिरिसिस्ट अवार्ड से सम्मनित किया गया |
1962 ई. में उन्हें ‘हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं...’ (फ़िल्म ‘घराना’) के लिए एक बार से फिल्मफेअर बेस्ट लिरिसिस्ट अवार्ड से नवाज़ा गया |
1963 ई. में उन्हें तीसरी बार फिल्मफेअर बेस्ट लिरिसिस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया ‘कहीं दीप जले कहीं दिल जले.....’ (फ़िल्म ‘बीस साल बाद’)
हश्र तक गर्मी-ए-हंगामाए-हस्ती है ‘शकील’
सिलसिला ख़त्म न होगा मेरे अफ़साने का
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Thursday, 15 June 2017

ऐश्वर्या राय बच्चन

जैसे दीवार-ए-अजंता की किसी बुत में रूह समा गयी हो, जैसे कोहेकाफ़ की कोई परी सैर-ओ-तफ़री के लिए हमारे बीच आ गयी हो, जैसे बहिश्त की कोई हूर ज़मीन पर रक्स करने उतर आई हो, जैसे स्वर्ग की कोई अफ्सरा पृथ्वी पर अवतरित हो गई हो, जैसे किसी महाकवि की निराकार कल्पना को साकार रूप मिल गया हो, जैसे किसी महान चित्रकार की अप्रतिम कृति जिवंत हो टहलने लगी हो, जैसे किसी शिल्पकार के ज़ेहन में बसी आमूर्त छवि मूर्त हो जीवन से भर गयी हो, जैसे किसी शायर की दीवान-ए-सफा से निकल कर कोई ग़ज़ल महफ़िलों में शिरकत करने लगी हो, कुछ ऐसे ही इल्म-ओ-एहसास का अनुभव होता है जब हम सुनहरी जुल्फ़ों के बीच गैबी-नूर से दमकते चेहरे पर सुर्ख कलियों सी मंद मंद तबस्सुम लिए, सौंदर्य की पर्याय बन चुकी ऐश्वर्या राय बच्चन को अपने बीच मौज़ूद पाते हैं | वो हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री की  एक ऐसी अभिनेत्री हैं जिसे अंतर-राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त है, उन्होंने हिन्दी के अलावा, इंग्लिश, तमिल, तेलगु और बंगाली फ़िल्मों में भी काम किया है, वो एक सफ़ल मॉडल हैं, उनका नाम गूगल पर सब से अधिक सर्च होने वाले नामों में से एक है, 1994 में, वो मिस वर्ल्ड पेजेंट की विजेता रही थीं और इसी साल वो मिस इंडिया प्रतियोगिता में उपविजेता भी रही थीं, उनके लाखों चाहने वाले और कड़ोडो दीवाने हैं, 2000 में उन्हें अब तक की सब से खूबसूरत मिस वर्ल्ड की संज्ञा दी गयी –‘मोस्ट ब्यूटीफुल मिस वर्ल्ड ऑफ़ आल टाइम’,  वो दो बार फिल्मफेअर अवार्ड्स से, दो बार स्क्रीन अवार्ड्स से और दो बार IIFA अवार्ड से सम्मानित हो चुकी हैं, 2009 में भारत सरकार के द्वारा उनको पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है, वो स्टाइल आइकॉन हैं, निजी जीवन में शादी से पहले उनका नाम अभिनेता सलमान खान और विवेक ओबेरॉय से जोड़ा जा चूका था, उनका नाम हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री की सब से मंहगी अभिनेत्री और हिन्दुस्तान की सब से अधिक आर्थिक रूप से संपन्न महिलाओं में शामिल है, 2004 में टाइम मैगज़ीन ने ऊनको ‘द मोस्ट इन्फ्लूएन्शल पर्सनालिटी’ का दर्ज़ा दिया था , वो एक अच्छी इंसान हैं, वो सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की पुत्रबधू हैं, अभिनेता अभिषेक बच्चन की पत्नी हैं, वो एक प्यारी सी बच्ची ‘आराध्या’ की माँ हैं, वो एक आदर्श पत्नी, बहु और माँ हैं, इत्यादि इत्यादि, लेकिन...लेकिन... इस सब से कहीं ऊपर अगर हम सौन्दर्योपासक और मिडिया की माने तो ऐश्वर्या राय बच्चन दुनियां की सब से ख़ूबसूरत स्त्री हैं- “शी इज़ द मोस्ट ब्यूटीफुल वुमन इन द वर्ल्ड’ |”- जूलिया रोबर्ट्स | कहा जाता है कि ‘भगवान ने 6 दिन में दुनियां को बनाया और सातवें दिन उन्होंने ने ऐश्वर्या राय को बनाया. ये करिश्मा है उनकी ख़ूबसूरती का |


चित्र-साभार गूगल 

बचपन और मोडलिंग
कर्नाटक के मंगलूर में, 1 नवंबर, 1973 को बंट परिवार में ऐश्वर्या राय का जन्म हुआ था | बचपन में घर के लोग प्यार से उनको ऐश या गुल्लू बुलाते थे | ऐश के पिता जी कृष्णराज राय मरीन इंजीनियर थे | माँ वृंदा राय घर के कामकाज के अलावा लेखन का भी काम करती है | ऐश्वर्या का एक बड़ा भाई है आदित्य राय, आदित्य मर्चेंट नेवी में इंजिनियर हैं | 2003 में आई ऐश्वर्या राय अभिनीत फ़िल्म ‘दिल का रिश्ता’ में आदित्य राय सह-निर्माता थे | राय का घराना अदबी तालीम का सरचश्मा है, घर के सभी लो लोग सु-शिक्षित और सु-संस्कृत हैं, और यही वजह है सफलता की शीर्ष पर पहुंचने के वजूद ऐश्वर्या अपने संस्कार, रिश्ते की मूल्य, और धर्म की महत्वा को कभी नहीं भूलि है | ऐश की मातृ-भाषा तुलु है, लेकिन उनको कन्नड़, हिंदी, मराठी, तमिल और अंग्रेजी भी आती है |
ऐश्वर्या ने स्कूलइंग हैदराबाद, आंध्र प्रदेश में शुरू की, लेकिन थोड़े समय बाद उनका परिवार मुंबई में आ कर रहने लगा | मुम्बई आने के बाद उनका दाखिला सांता-क्रूज़ के आर्य विद्या मंदिर में करवा दिया गया |  ऐश स्कूल के दिनों से ही निहायत ज़हीन, खूबसूरती से माला माल, तहजीब-वो-तमद्दुन के जेवर से मुज़ैयन और सलाहीयतों से भर पूर शख्सियत की मालिक थी | ऐश की माँ विद्या मंदिर में ऐश के पहले दिन को याद करते हुए एक मज़े की बात बताती है, “पहले दिन ऐश्वर्या अपने भाई आदित्य के साथ आर्य विद्या मंदिर गयी थी, आदित्य के दोस्त अपने क्लासफेलो की छोटी सिस्टर को देख कर काफ़ी उत्साहित थे, सब ऐश्वर्या को घेर कर उसको देखने के लिए खड़े हो गये | वे सब ऐश को ‘वाकिटाकी डाल’ बुलाते थे क्योंकि वो हमेशा बाते करती रहती थी, बहुत ज्यादा बोलती थी | आपको पता है वो जब स्कूल से वापिस आई तो क्या बोली ? उसने कहा, “मम्मी, आदित्य के क्लास के लड़के मुझे धक्का दे रहे थे और बहुत ज्यादा शोर कर रहे थे | मुझे अच्छा नहीं लगा ये सब | मैं ने उनसे कहा, अगर तुम लोग मुझे किस करना चाहते हो तो लाइन में खड़े हो जाओ |” ऐश्वर्या जब तीन साल की ही थी तभी से लड़के उसके लिए पागल थे |”
ऐश्वर्या बहुत महत्वाकांक्षी थीं, उनको बड़े बड़े ख़्वाब सजाना और तखय्युलाती दुनियां में खोए रहना पसंद था | साथ ही आस पास की चीजों के प्रति उनकी संवेदनशीलता असाधारण थीं, नई चीजों को जानने और समझने को हमेशा आतुर रहती थीं | ऐश्वर्या अपने चचेरे भाई बहन के साथ कम और अपने चाचा चाची के साथ ज्यादा वक़्त गुज़रती थीं, ऐसा नहीं था कि उम्र से पहले बड़ी होना चाहती थी, उनके घर का माहौल ही ऐसा था जिसमे बच्चे को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया जाता था | घर के सभी मामलों में छोटों की राय ली जाती थी और उनसे खुल कर बात चीत की जाती थी | घर के इस खुले माहौल का ऐश्वर्या के व्यक्तित्व निर्माण में काफ़ी अहम् भूमिका रहा |
ऐश्वर्या के पिता अपनी नौकरी की वजह से ज्यादातर समुद्रयात्रा पर ही रहते थी | घर पर सिर्फ उनकी माँ और तीन साल बड़ा भाई आदित्य होता था | हालाँकि ऐश्वर्या आदित्य से तीन साल छोटी थी लेकिन व्यवहार और सूझबुझ के मामले में वो आदित्य से बड़ी प्रतीति होती थीं | आदित्य और ऐश में हमेशा किसी न किसी बात को लेकर खटपट होती रहती थी | स्कूल में भी ऐश्वर्या से उनके जूनियर और सीनियर दोनों अपनी प्रॉब्लम डिस्कस करने आते थे | ऐश्वर्या की बौधिक कौशल देख कर लोगों को यकीन नहीं होता कि वो अपने भाई आदित्य से तीन साल छोटी है, वो अपने समय और उम्र से आगे थीं, दोनों भाई बहन के बीच लड़ाई की एक ये भी वजह थी | शुरू से ही ऐश्वर्या अपनी बात को दूसरों के सामने खुबसूरत तरीके से रखने की कला में माहिर थीं |
ऐश्वर्या का मन पढाई में ख़ूब लगता था, उन्होंने कभी भी स्कूल जाने को ले कर कोई नखरे या नाटक नहीं किया | उन्हें ने अपने सलाहीयतों का जौहर दिखाते हुए HSC के इम्तहान में 90 प्रतिशत अंक हासिल किया | बाद की तालीम उन्होंने माटुंगा स्थित डीजी रुपारेल कॉलेज से हासिल की | अपने लड़कपन की उम्र में ही ऐश्वर्या को कला संगीत और नृत्य से लगाव हो गया था, इसी उम्र पढाई के साथ साथ उन्होंने ने पांच साल तक क्लासिकल डांस, म्यूजिक और भारतनाट्यम की भी ट्रेनिंग ली | एकेडमिक में जिस विषय से उन्हें बिशेष लगाव था वो था जूलॉजी और बायोलॉजी, और वो इसी विषय पर आगे शोध करना चाहती थी, उन्होंने ने मेडिसिन के क्षेत्र में कुछ करने की सोची थी |

लेकिन जैसे जैसे कला और संगीत से उनका प्यार बढ़ता गया, पढाई के प्रति दिल लगाना कम हो गया | मेडिसिन की पढाई में ऐश्वर्या की दिलचस्पी कम होने लगी | उन्हें तरह तरह की गीत और संगीत को सुनना पसंद था | ऐश्वर्या का भाई आदित्य टेप खरीद कर लता था और पॉप म्यूजिक रिकॉर्ड करके सुनता था, चूँकि आदित्य बड़ा था वो अपनी मर्ज़ी की सुनता था | ऐश्वर्या की माँ पुरानी फ़िल्मों के गाने सुना करती थी | ऐश्वर्या का फाइन आर्ट और म्यूजिक से प्रेम पढता गया | परिणामस्वरूप उन्होंने मेडिसिन के क्षेत्र में कुछ करने की बात को तर्क कर दिया और आर्किटेक्ट बनने की ठानी और जय हिन्द कॉलेज में एडमिशन करा लिया | हालाँकि ऐश्वर्या ने मडिकल कॉलेज के लिए एंट्रेंस एग्जाम दे दिया था, जिसका रिजल्ट भी बाद में आया लेकिन तब तक ऐश्वर्या जय हिन्द में एडमिशन ले चुकी थीं | और मेडिकल के जिस कॉलेज के लिए वो पास हुई थीं वो वो मुंबई से काफ़ी दूर था और मुंबई छोड़ कर जाना ऐश के लिए संभव नहीं था | सो, उन्होंने आर्किटेक्ट की पढाई जरी कर दी, लेकिन यहां भी ऐश्वर्या ठहरी हुई पहाड़ी ही बनी रहीं जिस पर ज्ञान की बारिश आ कर फिसल जाती थी | किताब को सामने रख कर ऐश ख़्वाबों के समंदर किनारे बैठी ला’ल-ओ-गुहर चुनती रहती थी | धीरे धीरे उनका दिल पढाई से एक दम उचट गया | आस पास के लोगों की निगाह और अपनों और अजनबियों से मिली तारीफ़ की बाढ़ ने ऐश्वर्या को इस बात का का एहसास करा दिया था कि वो असाधारण रूप से सुन्दर है, उसका सौंदर्य अप्रतिम है | तमन्नाओं का तूफ़ान ऐश्वर्या के भीतर करवट ले कर उठ बैठा था, उमंगें जवान होने लगी थी | घर पर फ़िल्म देखने की आज़ादी थी, उन दिनों दूरदर्शन पर रविवार को फिल्म दिखाया जाता था, फ़िल्मों का जादू ऐश्वर्या के सर चढ़ कर बोलने लगा था | फ़िल्मों के अलावा उनको दूरदर्शन का प्रोग्राम ‘छ्यागीत’ भी बहुत पसंद था |
एक दिन जब जब्र-ओ-सब्र जवाब दे गया तो उन्होंने पढाई को पूरी तरह छोड़ कर मॉडलइंग में करियर बनाने की ठान ली | प्रथम वर्ष में मॉडलिंग के साथ साथ उन्होंने पढाई जरी रखी और फर्स्ट ईयर के एग्जाम में अच्छे अंकों से पास हुईं, लेकिन दुसरे साल, उनके मोडलिंग के कामों में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हो गई | ऐश ने प्रिंसिपल और अपने टीचर से बात कर के अपने कोर्स को एक साल के लिए ड्राप करना चाहा | उनको मोडलिंग में मिलती सफलता को देख कर कॉलेज से उन्हें इसकी अनुमति मिल गयी |
मिस वर्ल्ड का ख़िताब
शरुआती सफ़लता के नाम पर, 1991 में, फोर्ड द्वारा आयोजित सुपरमॉडल कांटेस्ट में ऐश्वर्या राय ने जीत हासिल की, ‘वोग’ पत्रिका के प्रथम पृष्ट पर ऐश की तस्वीर छपी गयी | इस सफ़लता ने उनको उत्साहित तो किया लेकिन पहचान और बेशुमार काम मिलना अभी बांकी था | 1993 में राय पेप्सी के एक विज्ञापन में अभिनेता आमिर खान के साथ आयीं, इस विज्ञापन से उन्हें काफ़ी पहचान मिली | इस के अगले साल 1994 में  राय ने फेमिना मिस इंडिया प्रतियोगिता में भाग लिया और दुसरे स्थान पर आयीं और मिस इंडिया वर्ल्ड के तौर पर ऐश की ताज़पोशी हुई | इस प्रतियोगिता में प्रथम आने वाली दावेदार ‘सुष्मिता सेन’ थीं, ऐश सुष्मिता से पीछे रह गयी थी |
इसी साल, साउथ अफ्रीका के सन सिटी में वाली मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में भारत से सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय ने भाग लिया और यहीं से ऐश्वर्या के ज़िन्दगी की हवा बदल गयी | उन्होंने ‘मिस वर्ल्ड’ का ख़िताब जीत लिया, राय की उम्र 21 साल थी | ऐश्वर्या के अलावा अलग अलग देशों की 86 सुंदरियों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया था | मिस वर्ल्ड के अतिरिक्त ऐश्वर्य ने ‘मिस फोटोजेनिक’ अवार्ड और ‘मिस वर्ल्ड कॉन्टिनेंटल क्वीन ऑफ़ ब्यूटी-एशिया एंड ओशिनिया’ भी जीता | अपने इन जीतों की ख़ुशी को व्यक्त करने हुए अपने उसी साल के एक इंटरव्यू में ऐश्वर्या राय कहती हैं, “अब मैं अपने आप को वर्ल्ड पर्सन के तौर पर देखती हूँ, इस जीत ने मुझे अन्दर से समृद्ध किया है, मैं अपने इस अनुभव को ता-उम्र नहीं भूलूंगी |”
मिस वर्ल्ड का ताज़ जीतने के बाद ऐश्वर्या के लिए कई अवसरों के द्वार खुल गए | मिस वर्ल्ड के लोगों के साथ करार के मुताबिक राय को एक साल लंदन में गुज़ारना पड़ा | इस बीच वो वर्ल्ड टूर पर भी गयीं और फ्रांस, जर्मनी, दुबई, अबू धाबी, साउथ अफ्रीका अदि देशों का भ्रमण किया | भारत वापिस आने पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया के प्रदीप गुहा ने उनके देल्ही और मुंबई में एक 5 दिन का स्वागत समारोह का आयोजन किया, जिसमे अतिथि के तौर पर मौजूदा प्रधान मंत्री, राष्ट्र पति और सोनिया गाँधी भी मौज़ूद थीं |
फ़िल्मी सफ़र
ऐश्वर्या राय ने 1997 में अपनी फ़िल्मी सफ़ल मणि रत्नम की तमिल फिल्म ‘इरुवर’ से शुरू की | समालोचकों ने फिल्म की सराहना की ,यकीन राय की एक्टिंग को कुछ खास सराहना नहीं मिली | इसी साल अभिनेता बॉबी देओल के साथ उनकी एक हिंदी फिल्म आई ‘और प्यार हो गया’, राय के काम की तारीफ़ की गयी |
1998 में ऐश्वर्या राय की दूसरी तमिल फिल्म आयी ‘जीन्स’ फिल्म के निर्देशक एस.शंकर थे, फिल्म राय की डांसिंग एबिलिटी की काफ़ी सराहना की गयी | और उन्हें साउथ का बेस्ट एक्ट्रेस फिल्मफेअर अवार्ड दिया गया |  1999 में ऐश्वर्या, ऋषि कपूर निर्देशित फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ में आईं | फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ दिया | राय के अभिनय को सिरे से खारिज कर दिया गया, मीडिया ने कहा ऐश्वर्या सिर्फ मुस्कुराना जानती है उनका चेहरा भावना रहित है, वो खुबसूरत लेकिन प्लास्टिक की गुड़िया हैं |

सफ़ल फ़िल्मी सफ़र
राय को एक ऐसी फ़िल्म की शदीद दरकार थी जो उनके आलोचकों के जुबान बंद कर सके, और ये काम किया 1999 की संजय लीला भंसाली निर्देशित फ़िल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ ने | फ़िल्म की अपार सफ़लता ने राय को कई अवार्ड दिलवाए, खास कर उन्हें फिल्मफेअर अवार्ड फॉर बेस्ट एक्ट्रेस से नवाज़ा गया | फ़िल्म ऐश्वर्या के साथ प्रमुख अभिनेता के तौर पर अजय देवगन और सलमान खान थे | इसी फिल्म की शूटिंग के दौरन राय की अभीनेता सलमान खान के साथ करीबी भी बढ़ गयी जो कुछ साल बाद विवादों के साथ समाप्त हुई |
‘हम दिल दे चुके सनम’ के बाद जिनती भी फिल्मे आयीं करीब करीब सब हिट रहीं | अभिनेता शाहरुख़ के साथ उनकी फिल्म जोश और मोहब्बतें ने जबर्दश्त सफलता हासिल की और हैरत की बात ये हैं ‘जोश’ में राय शाहरुख़ की बहन की भूमिका में थीं जबकि मोहब्बते में वो उनकी प्रेमिका बनी थीं |
अंतर-राष्ट्रीय ख्याति  
2002 की संजय लीला भंसाली निर्देशित फिल्म ‘देवदास’, जो बंगाली उपन्यसकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की बहुचर्चित उपन्यास ‘देवदास’ के ऊपर आधारित थी, ने ऐश्वर्या राय को अंतर-राष्ट्रीय स्टार बना दिया | इस फ़िल्म में राय ने देवदास की प्रेमिका पारो की भूमिका अदा की है | 2002 की कैनंस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में इस फ़िल्म को दिखाया गया था | अंतरराष्ट्रीय बाजार में फ़िल्म ने काफ़ी नाम और पैसा बटोरा | इस फ़िल्म के लिए ऐश्वर्या को फिल्मफेअर बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड भी मिला |
2004 में राय ने गुरिंदर चढ़ा की फिल्म ‘ब्राइड एंड प्रेज्यूडिस’ में काम किया , ये उनकी पहली हॉलीवुड फ़िल्म थी | फ़िल्म में उनकी ख़ूबसूरती को तो सराहा गया मगर उनकी अभिनय क्षमता को कमज़ोर करार दिया गया | ‘ब्राइड एंड प्रेज्यूडिस’ के बाद उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों में काम किया, जिसके लिए उनको मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली, कभी सराहा गया तो तो कभी आलोचना की गयी | ऐश्वर्या राय द्वरा अभिनीत हॉलीवुड फ़िल्मों के नाम इस प्रकार हैं ,  ‘ब्राइड एंड प्रेज्यूडिस’ (2004), ‘द मिस्ट्रेस ऑफ़ स्पाइसेज़’ (2005), ‘प्रोवोक्ड’ (2006), ‘द लास्ट लीजन’ (2007), ‘द पिंक पैंथर-2’ (2009) |
अगर भारत से बहार किसी भी एक भारतीय एक्टर को लोग जानते हैं तो वो ऐश्वर्या राय बच्चन हैं, ऐश्वर्या की सर्वप्रियता जगत विदित है  
राय से बच्चन
ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन के जोड़ी दुनियां की सबसे चर्चित जोड़ियों में से एक है | राष्ट्रीय और  अंतर-राष्ट्रीय मीडिया में इन्हें ‘सुपरकपल’ के नाम से जाना जाता है | धूम-2 की शूटिंग के दौरान अभिषेक को राय से मोहब्बत हो गयी थी | अभिषेक की एक बार पहले करिश्मा कपूर के साथ सगाई हुई थी लेकिन बाद में टूट गयी | 2007 के 14 जवरी को अभिषेक और ऐश्वर्या की सगाई की ख़बर आई, जिसकी पुष्टि बाद में अमिताभ बच्चन के द्वारा की गयी | 20 अप्रैल 2007 को ऐश्वर्या और अभिषेक परिणयसूत्र में बंध गए |
शादी के तीन साल बाद 16 नवम्बर 2011 को राय को मातृत्व का सौभग्य प्राप्त हुआ, उन्होंने ने बेटी का जन्म दिया | बच्चन परिवार ने बच्ची का नाम रखने में चार महीने का समय लिया, मार्च 2012 में बच्ची का नाम ‘आराध्या’ रखा गया |
माँ बनने के बाद से ऐश ने किसी फ़िल्म में काम नहीं किया है अभी वो अपना पूरा वक़्त अपनी बच्ची और परिवार के साथ बिताती हैं |
ऐश्वर्या के बारे में प्रसिद्ध लोगों के विचार
“ऐश्वर्या राय दुनियां की सब से ख़ूबसूरत महिला हैं”जूलिया रोबर्ट्स
“ऐश्वर्या सच में एक स्टार हैं” –शोभा डे
“जब भी आप सौंदर्य के बारे में सोचते हैं, ज़ेहन में ऐश्वर्या राय की छवि उभरती है” – जॉन अब्राहम
“मुझे ऐश्वर्या राय पर गर्व है, उन्होंने ने हर भारतीय का सर उंचा किया है” सुष्मिता सेन
“ऐश्वर्या जितनी बहार से सुन्दर हैं उस से कहीं ज्यादा वो एक अच्छी इंसान है, वो आंतरिक रूप से सुन्दर हैं”- विवेक ओबेरॉय
“वो वही मिट्टी हैं जिससे भगवन ने औरत के पहले रूप को बनाया था”- विल स्मिथ
ऐश्वर्या राय की कुछ उल्लेखनीय उपलब्धियां
राय पहली भारतीय अभिनेत्री हैं जो प्रतिष्ठित कैनंस इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल की जूरी रह चुकी है |
2004, में ऐश्वर्या पहली भारतीय अभिनेत्री बनी जिसकी मूर्ति लंदन के मेडम टूसाउड्स म्यूजियम में लगा गया |
2009, में ऐश्वर्या सब से कम उम्र में पद्म श्री से सम्मानित होने वाली अभिनेत्री बनी |
अवार्ड्स
1994- मिस कैटवाक, मिस फोटोजेनिक, मिस परफेक्ट 10, मिस पोपुलर, फेमिना मिस इंडिया वर्ल्ड- 1st रनर अप, मोस्ट फोटोजेनिक फेस, मिस वर्ल्ड-1994
1998-स्क्रीन अवार्ड्स मोस्ट प्रोमिसिंग न्यूकमर- (फिल्म ‘और प्यार हो गया’ के लिए), स्क्रीन अवार्ड्स-डिस्कवरी ऑफ़ द ईयर, फ़िल्मफेअर अवार्ड्स साउथ बेस्ट एक्ट्रेस- (फ़िल्म ‘जीन्स’ के लिए)
2000-स्क्रीन अवार्ड्स बेस्ट एक्ट्रेस- हम दिल दे चुके सनम, फिल्मफेअर अवार्ड्स बेस्ट एक्ट्रेस- हम दिल दे चुके सनम, स्टारडस्ट अवार्ड्स बेस्ट एक्ट्रेस- हम दिल दे चुके सनम



जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...