उनकी याद, उनकी तमन्ना, उनका ग़म, कट रही है ज़िन्दगी आराम से
जनाब शकील बदायूंनी कलम के वो जादूगर हैं जिनको लफ्ज़ को फूल बनाने का करिश्मा आता है | और यही वजह है कि उनके अशआर व नग़मों की लताफत बू-ए-गुल की मानिंद आहिस्ता आहिस्ता अपने परों को खोलती, सुखननवाज़ के सोच और दिल के दरवाज़े से होते हुए रूह की गहराइयों में उतर जाती है | ‘हम तो रोते ही थे इश्क़ में रात-दिन, तुम भी आखिर इसी राह पर आ गये |’ अल्फाजों की सादगी, उम्दा कहन और जुदा अंदाजेबयां ये कुछ ऐसी ख़ासियतें है जो शकील बदायूंनी को एक अज़ीम शख्सियत और मुख्तलिफ़ शायर बनाता है | शकील के इसी सदा बयांनी के बाबत मकबूल शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी लिखते हैं, “शकील शायरे-फ़ितरत हैं, शायरे-कारीगर नहीं | उसका कलाम सिर्फ़ लफ्ज़ी तलिस्मबंदियों का मजमुआ नहीं बल्कि हकीक़तन उसका कलाम उसकी ज़िंदगी का आईनादार है|” शकील ख़ुद अपनी एक शेर में कहते हैं :
“मैं ‘शकील’ दिल का हूँ तार्ज़ुमां कि मुहब्बत का हूँ राज़दां मुझे फ़ख्र है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं”
चित्र-साभार गूगल
शकील ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है जो उनके स्वभाव के प्रतिकूल हो | शकील मानते हैं कि “प्रेम, सौंदर्य और शिष्टता जीवन का महत्वपूर्ण अंग है | इसके बिना पूर्ण मानव नहीं बना जा सकता है और यदि हम स्वयं मानव नहीं बन सकते तो दूसरों को मानवता का उपदेश कैसे दे सकते हैं |” लेकिन उनकी इसी धारणा और उनकी शयरी की एकरूपता के कारण कुछ प्रयोगवादी शायरों और समालोचकों ने शकील की शायरी को परम्परागत शायरी कह कर नज़र अंदाज़ भी किया |
लेकिन शकील ने इन सब की कभी परवाह नहीं की और वो हमेशा प्रेम में ही उलझे रहे | ‘शे’र-ओ-अदब की राह में हूं गामज़न ‘शकील’, अपने मुख़ालिफ़ीन की परवा किये बगैर|’ शकील ने अपने समय के किसी भी शायर के पदचिन्हों पर चलना मुनासिब नहीं समझा | उनके समय में ज्यादातर शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी साहब से प्रभावित थे | कुछ शायर तो ‘जिगर’ साहब के हुलिए, उनके खोए-खोए अंदाज़ में गुफ्तगू करने का ढंग और तरन्नुम की भी नक़ल करते थे | इस समबंध में शकील कहते हैं, “मेरा दिल ‘जिगर-छाप’ शायर बनने को बिल्कुल तैयार न था | शायद इसीलिए मैं पुकारता था ” :
जो नुकूश-खुर्दा-ए-पा न हो उसी रहगुज़र की तलाश है !
हालाँकि, कभी कभी उन्होंने अपनी शायरी में नये मूल्यों को पिरोने का भी प्रयास किया, लेकिन प्रेम-संबंधी मनोविश्लेषण की तुलन में उनके इस प्रयास काफ़ी कम रहा | समालोचक कुछ भी सोचते हों लकिन नगमा-ओ-नज़्म, और गीत-ओ-ग़ज़ल के जो मुरीद रोहानी तस्सली तलाशते हैं, उनके लिए जनाब शकील बदायूंनी हमेशा से एक तीर्थ जैसे रहें हैं | अपने शेरों की सरलता और सहजता के ज़रिये शकील समाजके एक बड़े रकबे से रिश्ता कायम कर पाए | दुसरें शायरों के मुक़ाबले शकील को हमेशा सर्वाधिक सर्वप्रियता और प्यार मिला | जानेमाने शायर और नगमा निगार ‘मजरूह’ सुलतानपुरी कहते हैं, “एक ग़ज़लगो शायर की हैसियत से मुझे ‘शकील’ के मक्तबे-ख्याल से इख्तिलाफ़ सही, लेकिन इमान की तो यह है कि जब भी मैंने उनके मुंह से अच्छे शेर सुने हैं रश्क किए बगैर नहीं रह सका |”
तसल्ली के लिए शकील के कुछ प्रेम संबंधी उम्दा शेरों पर गौर फ़रमाइए :
कोई ऐ ‘शकील’ देखे ये जुनूं नहीं तो क्या है, कि उसी के हो गए हम जो न हो सका हमारा
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कभी-याक-ब-याक ताव्व्ज़ुह कभी दफ़अतन तगाफुल
मुझे आज़मा रहा है कोई रुख बदल बदल कर
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तुम ज़माने के हो हमारे सिवा
हम किसी के नहीं तुम्हारे सिवा
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कैफे-निशाते-दर्द का आलम न पूछिए
हंस कर गुज़र दी है, शबे-ग़म कभी-कभी
शकील की शोहरत और मकबूलियत का भेद उनकी अहसास की तीव्रता, बेपनाह तरन्नुम और शेरों की बेजोड़ चुस्ती है | उनके शेर पर महफ़िलों से उठती ‘वाह’ ‘वाह’ और ‘सुभान अल्लाह’ की शोरे तहसीन ने शकील को प्रेम की झील से बहार निकलने का कभी मौका नहीं दिया और न उन्होंने कभी इससे बहार कुछ सोचा | शकील ने जीवन पर्यंत ख़ुद को परम्परागत ग़ज़ल तक ही सिमित रखा या यूं कहें कि प्रेम के अथाह सागर से अनमोल मोतियों को चुन चुन कर लाते रहें | ‘उनका ख्याल, उनकी तमन्ना में मस्त हूँ मेरे लिए ‘शकील’ इबादत है ज़िन्दगी |’ शकील के समकालीन शायर ‘साहिर’ लुधियावी कहते हैं, “ ‘जिगर’ और ‘फ़िराक’ के बाद आने वाली पीढ़ी में ‘शकील’ बदायूंनी एक मात्र शायर हैं जिन्होंने अपनी कला के लिए ग़ज़ल का क्षेत्र चुना है और इस प्राचीन किन्तु सुन्दर और पूर्ण काव्य-रूप को, जिसमे हमारे अतीत की सर्वोतम साहित्यिक तथा सांस्कृतिक समग्री सुरक्षित है, केवल अपनाया ही नहीं उसका जीवन के परिवर्तनशील मूल्यों और नये विचारों से समन्वय कर उसमे नये रंग भी भरे हैं |
इसमें कोई संदेह नहीं कि एक काव्य-रूप के लिहाज़ से ग़ज़ल सिमित भावनाओं की वाहक है | और फिर यह इतनी मथी जा चुकी है कि अब इसमें अधिक मंथन की बहुत कम गुंजाइश रह गयी है | लेकिन जो लोग इस प्रकार की गुंजाइश निकाल सकते हैं, उन्हें अपने विचारों को ग़ज़ल का पहनावा पहनाने का पूरा-पूरा अधिकार है |‘शकील’ बदायुनी बड़ी सुरीति से अपने अधिकार की रक्षा कर रहा है | उसे पढ़ते हुए जहाँ हमें यह अनुभव होता है कि हम आधुनिक काल के किसी शायर को नहीं, किसी उस्ताद को पढ़ रहे हैं, वहां इस बात का भी अनुभव होता है कि वह उस्ताद आधुनिक काल का उस्ताद है |”
खोल दे बादे-मैकदा ‘साक़ी’
एक फ़रिश्ता भी इंतजार में है
शकील शायरी के उस्ताद ही नहीं थे उन्हें जीवन के गहरे रहस्यों का भी पता था, तभी वो तो अपने एक शेर में कहते हैं , “इस कसरते-ग़म पर भी मुझे हसरते-ग़म है, जो भर कर छलक जाए वो पैमना नही हूँ|” हालाँकि कुछ लोग शकील को दुःखवादी शायर भी मानते हैं उनका कहना है कि शकील दर्द के तलबगार हैं, लेकिन जिनको जीवन के अटपटे ढंग का थोड़ा भी पता है वो ये जानते हैं कि , “वेन यू लर्न तो लव हेल, यू विल बी इन हेवन’’ | शकील निसंदेह जीवन के इस पहेली को समझते थे, उन के इस शेर से उनकी ये समझ नुमायां है,
मुझे ग़म भी उनका अज़ीज़ है, कि ये उन्हीं की दी हुई चीज़ है |
शयर शकील का बचपन
ग़मों से मोहब्बत करने वाले इस अज़ीम शायर का पूरा नाम शकील अहमद ‘शकील’ बदायूंनी है | इनका जन्म 3 अगस्त, 1916 ई. को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था | बदायूं के होने के कारण इनके नाम के साथ ‘बदायूंनी’ आता है और ‘शकील’ इनका तखल्लूस है | शकील के वालिद मौलाना जमील अहमद सोख्ता क़ादरी ने शकील के जन्म के वक़्त ही तय कर लिया था कि वो अपने बेटे को ऊँची तालीम दिलवाएंगे ताकि वो अपने जीवन में बड़ा मुकाम हासिल कर सके | शकील ने ठीक से उठाना बैठा भी नही सीखा था कि मौलाना साहब ने घर पर उस्तादों को बुला कर शकील को अरबी, फ़ारसी, उर्दू और हिंदी की प्रारंभिक शिक्षा दिलवाने लगे | जल्दी ही शकील भाषा दुरुस्त हो गयी, और वो उर्दू और फ़ारसी के शरों शायरियों में दिलचस्पी लेने, साथ ही साथ ख़ुद भी शब्दों के साथ खेलने लगे |
शकील के वालिद मिज़ाज़ के तो तेज़ थे लेकिन उनको शेरों शायरी में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी | घर में शायरी का माहौल बिल्कुल भी न था | अब दिक्कत ये थी कि शकील हीरा तो बन गये थे लेकिन उसको तराश कर चमकाने वला कोई मिल नहीं रहा था |
उस ज़माने में, बदायूं के गली मोहल्ले में मज़हबी और अदबी चर्चा आम हुआ करती थीं | बदायूं शायरों का गढ़ था और शहर के करीब करीब सभी शायर ग़ज़ल कहते थे | शकील शहर में होने में वाले मुशायरों में शरीक होने लगे थे और शायरों को सुन सुन कर उन में भी यह फ़न आने लगा था | इस संबंध में शकील कहते थे “मेरी शायरी का फ़न मारुसी नहीं है क्योंकि न मेरे वालिद शायर थे न दादा | हाँ, मेरी सातवीं पुश्त में जो मेरे जद्दे-अमजद थे उनके बारे में किताबों में पढ़ा है कि वो शायर थे और उनका नाम ख़लीफ़ा मोहम्मद वासिल था | मुमकिन है वही जौक सात पुश्तों की छलांग लगाकर मेरे हिस्से में आया हो’’
बदायूं के मुशायरों से शकील को दो महत्वपूर्ण बातें समझ में आई, पहला ये कि इन शायरों के शायरी पर लखनऊ-स्कूल का गहरा परभाव है | और दूसरा ये कि इन शायरी और ग़ज़लों में जीवन दर्शन का अभाव है, साहित्य तो है लेकिन वो सिर्फ साहित्य के लिए ही है, जीवन साहित्य की कमी है | शकील के पास अंतर-दृष्टि थी, शब्द था लेकिन सलीका नहीं था | स्वाद का तो पता था लेकिन जिस जुबान से स्वाद को बताया जाय उसकी कमी थी | इस कमी को सिर्फ एक चीज़ पूरा कर सकता था और वो थी किसी अच्छे उस्ताद की क़ुर्बत |
इसी बीच शकील अपने एक नाते के चाचा के संपर्क में आये जिनका नाम हज़रत मौलाना ज़िया-उल-क़ादिर था |मौलाना अपने समय के ख्यातिलब्ध नाअत-गो थे यानि हज़रत मोहब्बत की तारीफ़ में शेर लिखते थे | मौलाना की सूफ़ियाना सोहबत का असर शकील की शायरी में ख़ूब देखने को मिला, उनकी कुछ सूफ़ियाना शेरों पर नज़र फमाइये :
नई सुबह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है, ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुंचे
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क्या शै है मताअ-ए-ग़मों-रहत न समझना
जीना है तो जीने को हक़ीक़त न समझना
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एक तरफ़ ख़ुदा के पक्ष में शकील लिखते हैं :
मुिन्करे-ज़ात ! तेरी बहस मुसल्लम लेकिन
यूं वो कुछ और नुमायां नज़र आता है
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तो दूसरी और ख़ुदा के विपक्ष में कहते हैं :
दे सदायें दरे-इंसान ही पे इंसान ‘शकील’
हाए दुनियां के ग़रीबों का ख़ुदा क्यों न रहा
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बदायूं में अपनी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा पूरी कर 1936 ई. में शकील अलीगढ़ आ गये और यहां अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बी.ए में दाखिला लिया | यहाँ आपने के बाद वो आधुनिक, प्रयोगवादी और सैद्धांतिक शायरों के गुटों के संपर्क में आये | एक और प्रगतिशील शायरों का गुट था जिसमे, ‘मजाज़’, जज़्बी, जांनिसार ‘अख्तर’, मासऊद अख्तर ‘मजाल’, के नज़्में धूम मचा रही थीं तो दूसरी वो ‘राज़’ मुरादाबादी जैसे ऊँचे परम्परागत ग़ज़ल-गो शायर थे | ‘राज़’ मुरदाबादी शकील के बहुत अच्छे दोस्त और ‘जिगर’ मुरादाबादी के बहुत बड़े मरीद थे | राज़ स्वम् ‘जिगर’ साहब के शेरों-शायरी के कायल थे, और एक मुद्दा से दिल में उनसे मिलने की हसरत पाले हुए थे | लालिगढ़ आने के बाद ‘राज़’ की मदद से उनको ‘जिगर’ मुरादाबदी से मिलने का मौका नसीब हुआ | ‘जिगर’ मुरादाबादी से मिलने में बाद शकील की शायरी में जो निखार आया उसके बारे शकील ख़ुद कहते हैं, “ ‘जिगर’ साहब की कृपा-दृष्टि मिलने के बाद, मेरी शायरी पर यौवन आता चला गया | उसी ज़माने में स्वर्गीय मौलाना ‘अहसान’ माहरर्वी उर्दू के लेक्चरर थे, और यू.पी. के विभिन्न कालेजों, विशेषकर सेंट जोन्स कालेज, आगरा, में ‘इंटर-वर्सिटी’ इनामी मुशायरे हुआ करते थे | ‘अहसन’ साहब मुझे और ‘राज़’ को अपने साथ वहां ले जाया करते थे और हम दोनों मुशायरों के लिए ‘धमाका’ सिद्ध होते थे | इनाम हमें मिलता था और विजय अलीगढ़ विश्वविद्यालय की होती थी | इन सिलसिलों ने ग़ज़लगोई के क्षेत्र में मेरे पांव और भी दृढ़ता से जमा दिए | चूँकि मस्तिष्क को राजनीती से कोई लगाव ही न था इसीलिए प्रगतिशील आंदोलन की बजाय मैंने अपनी शयरी को प्रेम तथा प्रेम-संबधी मनोविश्लेषण पर केन्द्रित कर दिया |”
नग़मा-ए-इश्क़ न हो एक ही धुन पर क़ायम
वक़्त के साथ ज़रा राग बदलते रहना
निकाह-ए-इश्क़
मुश्किल था कुछ तो इश्क़ की बाज़ी को जीतना
कुछ जीतने के खौफ़ से हारे चले गये
1940, में शकील का निकाह उन्ही के एक दूर की रिश्तेदार शलमा से कर दिया गया | शलमा को शकील बचपन से जानते थे, वे एक ही हवेली में रहते थे | उस ज़माने के रवायत के अनुसार घर के मर्द हज़रात को ख़वातीन से मिलने नहीं दिया जाता था, सो एक घर में रहते हुए भी दोने एक दुसरे से अनजान ही थे | यहाँ पेशे ख़िदमत है शकील के कुछ मोहब्बत भरे शेर:
आज मेरे मन में सखी बांसुरी बजाये कोई
प्यार भरे गीत सखी बार-बार गये कोई
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वो हमसे ख़फ़ा हैं, हम उनसे ख़फ़ा हैं
मगर बात करने को जी चाहता है
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मुझे तो तेरी जुल्फ़ों का महकना याद आता है,
तुझे भी मेरी अश्कों की रवानी याद आती है |
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वह फेर लें नज़र तो कहां तबे-यक-नफ़स
यह ज़िन्दगी उन्ही की बदौलत है ज़िन्दगी
फ़िल्मी सफ़र
शादी के बाद शकील के कंधों पर गृहस्थी का बोझ आ आ गया, शेरों शायरी के दम पर घर चलाना संभव नहीं था | ‘हल हो सका न जब ग़मे-हस्ती का मसअला, कुछ सोच के हरीफ़े-ग़मे-यार बन गये’ | बी.ए. पास करने के बाद उन्होंने दिल्ली में राज्य के सप्लाई-विभाग में नौकरी पकड़ ली और 1942 से 1946 ई. वहीँ रहे | अपने दिल्ली निवास के दौरन, नौकरी के बंदिशों के वावजूद सभी मुख्य शहरों में मुशायरे पढ़ते रहे और साथ ही श्रोता के मिज़ाज़ को भी समझने के निरंतर कोशिश करते रहे | इन्ही कोशिशों के दौरान एक बात जो उन्हें समझ में आई वो ये कि शेर की भाषा सरल और बात गहरी होनी चाहिए, दूसरा मनोवैज्ञानिक तथ्य उनको ये समझ में आया कि क्या कहा जा रहा है से ज्यादा कौन कह रहा है ये मायने रखता था, मतलब शयर का नामचीन होना निहायत ही ज़रूरी है | इस सब से बढ़ कर कहने का अंजाद यानि तरन्नुम की अपनी भूमिका है | अपने इन अनुभवों के बारे में शकील कहते हैं, “मैंने, जहां तक संभव हो सका, अपनी शायरी को इस राह पर लेन की कोशिश की कि स्तर भी क़ायम रहे और सुनने वाले भी नराश न हो | कलाकार अगर प्रसिद्ध हो तभी उसकी आवाज़ में असर पैदा होता है और यह भी होता है कि कलाकार की आवाज़ जनता को अपनी ओर आकृष्ट करे | उसी प्रकार एक शायर यदि जनता में मान्य है तो उस शायर पर यह ज़िम्मेदारी आती है कि वह अपने प्रभाव से जनता का स्तर ऊँचा करे, न कि उसको अधस्थल की और ओर ले जाए | जो हो, मुझे और मेरी ग़ज़लों को जितनी भी मान्यता मिलती गई, मैं उतना चौकन्ना होता गया |”
जज़्बात की रौ में बह गया हूँ
कहना जो न था वो कह गया हूँ
रफ़्ता-रफ़्ता एक ग़ज़ल-गो शयर के तौर पर शकील की लोकप्रियता बढ़ने लगी और शकील लाखों दिलों के महबूब शायर बन गये | ऐसे मुशायरों में शकील को दाद मिलती थी जहां श्रोता मनो क़सम खा कर आते थे कि उनको किसी भी शायर दाद नहीं देंगे | शकील की प्रसिद्धि का ये आलम था कि शकील यदि कहीं किसी मुशायरे में ट्रेन से जा रहे होते थे तो लोग स्टेशन पर आ कर उनको पान, मिठाइयां, फल और फूल भेंट करते थे और साथ ही उनको अपने शहर में आने के लिए आमंत्रित करते थे, कुछ लोग उनको अपने घर पर भी रुकने के लिए आग्रह करते थे और शकील हंसी ख़ुशी उनके भेंटों और आमंत्रण को स्वीकार भी करते थे | उनकी ख्याति किसी फ़िल्म अभिनेता या राजनेता से कम नहीं थी | शकील को मुशायरों में शेर पढ़ते हुए देखना एक ऐसा अनुभव था जिस से सामयीन बार बार गुज़रना चाहते थे |
तेरी महफ़िल से उठ कर इश्क़ के मारों पे क्या गुज़री
मुखालिफ़ इक जहां था जाने बेचारों पे क्या गुज़री
शकील के कुछ मित्र जो उनकी ख्याति और उनको लोगों के द्वारा किये गये असीम प्रेम से जलते थे, उन्होंने कहानी बना रखी थी कि शकील लोगो को पहले से ख़त लिख कर अपने आने की ख़बर दे देते हैं, उनको बता देते हैं कि फलां तकिख को फलां मुशायरे में शरीक होने जा रहा हूँ, आप के शहर में ट्रेन रुकेगी, आप मुझ से मिलने ज़रूर आइये गा मुझे बड़ी ख़ुशी होगी | मैं आप की इस अनुकंपा के लिये सदा आपका एहसान मंद रहूँगा | वगैर वगैरह |
कांटो से गुज़र जाता हूँ दमन को बचाकर
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ
सचाई जो भी हो, मगर इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि शकील एक हर दिल अज़ीज़ शायर थे तभी तो इतने बरसों बाद भी उनके लिखे ग़ज़लों, गीतों और शेरों को लोग दिल की मानिंद सिने में बसाये रखे हैं |
है सितारों की तरफ़ माईले-परवाज़ ‘शकील’
दुश्मनों ! तुमको क़सम है यूंही जलते रहना
अपने शेरों शायरी की ज़बदस्त लोकप्रियता से उत्साहित हो कर शकील ने नौकरी छोड़ कर बंबई(मुंबई) जा कर फ़िल्मों में अवसर तलाशने का क़सद किया और 1946 ई. में दिल्ली को छोड़ कर मुंबई आ गये | ‘जुनूं से गुज़रने को जी चाहता है, हंसी ज़ब्त करने को जी चाहता है’ | मुंबई आने के बाद शकील की मुलाकात उस ज़माने के मशहूर संगीतकार नौशाद और निर्मता ए.आर कारदार से हुई | शकील के नौशाद को अपनी मनसा बताई, जिस पर नौशाद ने उनसे एक शेर लिख कर दिखने को कहा, शकील ने वहीँ आनन-फ़ानन में एक शेर लिख दिया, “हम दर्द का अफ़साना दुनियां को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की एक आग लगा देंगे” | नौशाद इस नये शायर हुनर देख़ कर दंग रह गये और उन्होंने बिना बिलंब किये शकील को निर्माता कारदार की अगली फ़िल्म ‘दर्द’ के गीत लिखने का काम दे दिया | ऐसा बहुत ही कम होता है कि किसी गीतकार को उसकी पहली ही फ़िल्म से सफलता का स्वाद चखने को मिल जाय, लेकिन शकील के मामले में ऐसा हुआ | ‘दर्द’ का गीत ‘अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का, आंखों में रंग भरके तेरे इंतज़ार का.....’ लोगों की जवान पर चढ़ गया, बांकी के गीत भी सफ़ल रहे | अपनी पहली ही फ़िल्म से शकील एक नामचीन शायर बन गये | अपने गीतों की लोगप्रियता से शकील को ये साफ़ हो गया बातें गूढ़ होनी चाहिए लेकिन शब्द चयन के मामले में सावधानी बरतने की ज़रुरत है, शब्द जितना सरल हो उतना बेहतर है | अपने इस अनुभव के संबध में शकील का कहना था, “मैंने जो ग़ज़लें कही है, उनमे मैंने इस समस्त बातों का ध्यान रखा है और मुझे आशा है कि यदि जीवन ने साथ दिया तो ग़ज़ल के लिए अपना एक अलग ढांचा तैयार कर लूँगा |”
चले तो ज़रा दौरे-जामे-मुहब्बत
फ़रिश्ते भी तक़लीदे-इंसा करेंगे
रूमानियत के शायर शकील
परदा नहीं जब कोई खुदा से बन्दों से परदा करना क्याजब प्यार किया तो डरना क्या प्यार किया तो डरना क्या
‘दर्द’ की गीतों सफलता के बाद नौशाद और शकील के दोस्ती गाढ़ी हो गई और दोने ने मिल कर एक से बढ़ कर एक गीत दिए | शकील के लेखनी की ख़ासियत ये थी कि उन्हों अपनी गीतों को किसी भाषा विशेष तक महदूद नहीं रखा, उर्दू के अलावे, हिंदी, ब्रजभाषा, भोजपुरी और कई क्षेत्रीय भाषों में अपनी भावनाओं पिरोया | नौशाद की संगीत और शकील के बोल से सुसज्जित फ़िल्मों में, ‘बैजू बावरा’, मदर इंडिया, और मुग़ल-ए-आज़म का नाम उल्लेखनीय है | मुगले-ए-आज़म का गीत, ‘जब प्यार किया तो डरना क्या...’ को हिंदी फ़िल्म संगीत के इतिहास तक के सब से रोमांटिक गाना माना जाता है | कहा जाता है कि नौशाद साहब ने कोई 105 बार शकील से इस गाने में सुधार करवाए तब जा कर वो संतुष्ट हुए | उस ज़माने में इस गाने को बनाने में और इस को शूट करने के लिए शीश महल तैयार करने में एक कड़ोड़ का खर्चा आया था | आवाज़ में गूंज पैदा करने के लिए नौशाद साहब ने लता मंगेशकर से बाथरूम में ये गवाया था |
हालाँकि शकील ने कई संगीत करों के साथ काम किया लेकिन सब से ज्यादा गीत उन्होंने नौशाद साहब के लिए लिखे | ‘दर्द’ के बाद अगले बीस सालों तक नौशाद के करीब करीब हर फ़िल्म शकील के बोल होते थे | नौशाद और शकील के ज्यातर सफ़ल गीत रफ़ी साहब के गये हुए है, जैसे, ‘ओ दुनियां के रखवाले.., ‘मन तड़पत हरि दर्शन को...’, ‘जय रघुनंदन जय सिया राम..’ | कहा जाता है कि धार्मिक प्रविर्ती के व्यक्ति थे, और ऐसा उनके ‘बैजू बावरा’ गीतों में साफ़ झलकता है |
ये ज़िन्दगी के मेले दुनियां में कम न होंगे, अफ़सोस हम न होंगे
कितनी लतीफ़, कितनी हसीं, कितनी मुख़्तसर
इक नौशिगुफ्ता फूल की नकहत है ज़िन्दगी
बहुत अच्छे अशआर वही कह सकता है जो बहुत अच्छा इंसान हो | शकील को जानने के लिए उनकी शायरी भर को पढ़ लेना काफ़ी है | मोहब्बत के मसीहा जनाब शकील बदायूंनी, जैसा कि शायर अक्सर होता है, तबियत से शांत और ख़ामोशी पसंद इंसान थे | उनमे शायरों वाला सब गुण था लेकिन वे शराब नहीं पीते थे और ऐसा भी नहीं था कि वो शराब के विरोधी थे, अपने एक शेर में कहते हैं, “जाहिद की मैकशी पर तअज्जुब न कीजिए, लती है रंग फ़ितरते-आदम कभी-कभी” | खाली समय में शकील को अपनी पत्नी औरे बेटे बेटी के साथ वक़्त गुज़ारना और अपने दोस्तों जैसे नौशाद और रफ़ी साहब के साथ बैडमिंटन खेलना पसंद था | नौशाद और शकील की दोस्ती मिसाल के काबिल है, शकील के इंतकाल से नौशाद इतने आहात हुए कि उन्हों ने काफ़ी समय तक म्यूजिक कंपोज़ करना छोड़ दिया|
बैडमिंटन खेलने के अलावा उन्हें पिकनिक पर जाना और पतंग उड़ना भी ख़ूब भाता था | वे पिकनिक पर जिन दोस्तों के साथ जाते थे उनमे नौशाद, मोहम्मद रफ़ी, और जॉनी वॉकर प्रमुख थे | दिलीप कुमार, वजाहत मिर्ज़ा, ख़ुमार बरबंखावी और अज़म बजातपुरी से भी उनकी अच्छी दोस्ती थी |
20 अप्रैल, 1970 को डायबिटीज की वजह से उनकी मृत्यु हो गई |
एक रोज़ मैं तो ढूंढ ही लूंगा जहाने-नौ (नई दुनियां)
दुनियां मुझे तलाश करेगी मगर कहां
शकील को मिले पुरुस्कारों की सूची
‘तुम हुए अपने तो दुनियां मेहरबां होने लगी’
1961 ई. में शकील को उनके लिखे गीत ‘चौदवीं का चाँद हो..’ (फिल्म ‘चौदवीं का चाँद’) के लिए फिल्मफेअर बेस्ट लिरिसिस्ट अवार्ड से सम्मनित किया गया |
1962 ई. में उन्हें ‘हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं...’ (फ़िल्म ‘घराना’) के लिए एक बार से फिल्मफेअर बेस्ट लिरिसिस्ट अवार्ड से नवाज़ा गया |
1963 ई. में उन्हें तीसरी बार फिल्मफेअर बेस्ट लिरिसिस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया ‘कहीं दीप जले कहीं दिल जले.....’ (फ़िल्म ‘बीस साल बाद’)
हश्र तक गर्मी-ए-हंगामाए-हस्ती है ‘शकील’
सिलसिला ख़त्म न होगा मेरे अफ़साने का
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