मेरा एक दोस्त शाम मुझसे पूछ रहा था कि ऐसा क्या दुःख था ग़ालिब के जीवन में कि वे ऐसे गहरे-गहरे शेर लिखते थे? मैंने कहा कि दुःख तो ग़ालिब के जीवन में उतना ही था, जितना हमारे और आपके जीवन में है। हो सकता है, हमसे कम ही दुःख रहा हो उनके जीवन में। लेकिन कुछ था, उनके पास जो हमारे और आपके पास नहीं है, और वह है दुःख को अनुभव करने की क्षमता। आश्चर्य की बात है कि हम में से बहुत कम लोगों के पास ही अनुभूति की क्षमता होती है।
चित्र- साभार गूगल
आपने कभी सोचा कि ऐसा क्या था कि बुद्ध ने एक मरे हुए व्यक्ति को देखा, और सब छोड़कर जंगल चले गए, और हम रोज़ ही लोगों को मरते देखते हैं, फिर भी जीवन को वैसे ही जिए चले जाते हैं? हम सोच सकते हैं कि हम भी दुःख का अनुभव करते हैं। क्योंकि जब कोई मर जाता है तो हम रोते हैं, किसी को मुसीबत में देखकर उस व्यक्ति पर दया करते हैं। और तो और हम तो इतने भावुक हैं कि फिल्म में भी, जोकि झूठ है, अगर हीरो मर जाता है, हम रुमाल गीली कर लेते हैं। तो फिर प्रश्न उठता है 'हम में और चचा ग़ालिब या भगवान बुद्ध में क्या भेद हैं? बड़ा भेद हैं, भगवान बुद्ध या ग़ालिब संवेदनाशील व्यक्ति थे. और हम भावुक जीव है.
भावुकता भोंदूपन है। अगर आप गौर करें, तो आप पाएँगे कि बिना किसी अपवाद के हर भावुक व्यक्ति मंदबुद्धि होता है। ऐसा क्यों? क्योंकि भावुक होना एक यांत्रिक घटना है। भावना बेहोशी से पैदा है।अगर ऐसा नहीं होता तो फिर आप फिल्म देखते समय या फिर उपन्यास पढ़ते हुए रोते नहीं।
यह जानते हुए कि फिल्म में जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह वास्तविक नहीं है, आप रोते हैं। इससे यह साफ़ होता है कि आपके रोने का बोध से या फिर होश से कोई सम्बन्ध नहीं है।जैसे हम चाहकर भी अपने विचारों को नहीं रोक सकते हैं, उसी प्रकार ख़ास स्थितियों में हम भावनाओं को बहने से नहीं रोक सकते हैं। किसी के मरने पर जब आप रोते हैं, तो ज़रूरी नहीं है कि आप उस व्यक्ति के लिए रो रहे हों, बहुत संभावना है कि और लोगों को रोता देख कर आप भी रोने लगे हों।

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