बाबू चमनलाल एक नास्तिक व्यक्ति थे, वे न तो स्वर्ग में मानते थे और न ही नरक में, उनका कहना था कि स्वर्ग और नर्क सब कपोल कल्पनाएँ हैं. उनकी इस धारणा से जीतेजी उनको जो परेशानी हुई सो तो ठीक है, लेकिन असली दिक्कत तब पैदा हुई जब उनका देहांत हुआ. मेरने से पहले अपनी आखरी इच्छा के रूप में उन्होंने अपनी पत्नी से कहा किया कि मरने बाद सफ़ेद रंगहीन कफ़न में लपटने के बजाय उन्हें अच्छे से नाह-धोकर तैयार किया जाए, और फिर अपने जन्म दिन पर जो उन्होंने २० साल पहले एक सूट सिलवाया था, वो उन्हें पहनाकर मरघट ले जाया जाए. उनकी आखरी इच्छा का सम्मान करते हुए उनकी पत्नी ने उन्हें अच्छे से सजा दिया. लेकिन जब लोग उनको मरघट ले जाने लगे तो उनकी पत्नी जोर-जोर से दहाड़ मारकर रोने लगी. यह देख लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि अब तक वह बिलकुल नहीं रो रही थी, फिर अचानक चमनलाल को सजा-धजा देखकर क्यों रोने लगी! लोगोंने जब अपनी जिज्ञासा जाहिर की तो, कहने लगी, “मैं यह सोचकर रो रही हूँ कि इतना सज-धज यह जाएगा कहाँ..?” लोगों ने पूछा क्या मतलब कहाँ जाएगा, मरघट जाएगा और कहाँ जाएगा? इसपर वो कहने लगी, “वो तो ठीक है लेकिन मेरा मतलब है, यह न तो स्वर्ग में मानता है और न ही नर्क में, फिर यह कहाँ जाएगा, क्या फायदा इसको इतना सजाने का..?” और वो फिर दहाड़ मारकर रोने लगी.
आपको भले ही यह कहानी हास्यास्पद लगी हो, लेकिन जब भी लोगों को मैं स्वस्थ्य होने के पागलपन में लगा देखता हूँ तो मुझे यह कहानी याद आ जाती है. और मैं अक्सर अपने उन मित्रों से , जो ‘फिटनेस फ्रिक’ हैं, पूछता रहता हूँ, “इतना सजधज कर जाओगे कहाँ?” यह वाकई सोचने वाली बात है कि हम स्वस्थ्य होने के लिए इतने पगलाए हुए क्यों हैं? ख़ासकर इस सदी में तो लोगों के सर पर स्वस्थ्य होने का भूत कुछ ज्यादा ही सवार हो गया है. जिसको देखो वही या तो वजन कम करने में लगा है या फिर बढ़ाने में? हर कोई किसी-न-किसी जुगत में लगा है. कोई सुबह उठकर योग कर रहा है तो कोई साँसों के साथ फूं-फां कर रहा है. मैं आज तक किसी ऐसी लड़की से नहीं मिला जो ख़ुद को बिलकुल स्वस्थ्य मानती हो, किसी को चार किलो बढ़ाना है तो किसी को पांच किलो घटाना है. समझ नहीं आता कि माजरा क्या है? जवान से लेकर बूढ़े तक सब ख़ुद को स्वस्थ्य करने में लगे हुए हैं!!!
संभवतः, लोगों के भीतर यह ख्याल घुस गया है कि अगर वे स्वस्थ्य रहेंगे तो ज्यादा दिन जिएंगे, या फिर शायद कभी मरेंगे ही नहीं. आमतौर पर हर कोई ऐसा ही सोचता है. लेकिन लोगों का यह खयाल बेबुनियाद है, क्योंकि यदि आप आधुनिक शरीरशास्त्रीयों की सुनेंगे, तो आप सदमे में आ जाएँगे. उनका ऐसा कहना है कि जो व्यक्ति जितना स्वस्थ्य होता है, वह उतनी जल्दी मरता है, और बीमारी से ग्रस्त आदमी लम्बा जीता/घसीटता है. क्योंकि वैज्ञानिक कहते हैं कि सिर्फ जीने के लिए ही नहीं बल्कि मरने के लिए भी उर्जा की ज़रुरत होती है. और अक्सर बीमार आदमी के पास इतनी भी शक्ति नहीं होता कि वह मर सके, इसीलिए वह सालों तक घसीटता रहता है. और शायद इसीलिए मुर्दे फिर कभी नहीं मरते हैं. संभवतः यह आपने भी गौर किया होगा जो आदमी कभी बीमार नहीं पड़ता है, वह अक्सर पहली ही बीमारी में चल बसता है. यह अकारण नहीं है कि पहलवान और खिलाड़ी अक्सर कम उम्र में ही मर जाते हैं. अगर ऐसा है तो उन लोगों को शतर्क हो जाना चाहिए जो लम्बे जीवन की चाह में योग-वगैरह करके ख़ुद को स्वस्थ्य रखना चाहते हैं.
चित्र-साभार गूगल
खैर, यह मेरा सवाल नहीं कि बीमार पहले मरता है कि स्वस्थ्य. असली सवाल यह कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि आप बीमार होकर मरते हैं या स्वास्थ्य होकर? अगर दोनों ही स्थिति में नियति मौत ही है, तो फिर स्वास्थ्य होने के लिए इतना परेशान होने की क्या ज़रुरत है...?
इस विषय पर बहुत सोच-विचार करने के बाद मेरे सामने जो अंतरदृष्टि उभरकर आई है वो ये कि स्वास्थ्य दो प्रकार का हो सकता है- एक नकारात्मक और दूसरा सकरात्मक. नकारात्मक स्वास्थ्य वो है जिसमे व्यक्ति बीमारी व मृत्यु के डर से भयाक्रांत होकर स्वास्थ्य होने की कोशिश करता है. लेकिन यह मूर्खतापूर्ण है, आप चाहे कितना भी स्वस्थ्य क्यों न हों एक न एक दिन आपको मरना ही होगा. मृत्यु अपरिहार्य है, इसको किसी भी उपाय से अन्यथा नहीं किया जा सकता है. इसीलिए ऐसे स्वास्थ्य का कोई मूल्य नहीं जो भय की वजह से अर्जित किया गया हो. ‘स्वास्थ्य’ अपने आप में मूल्यहीन है, जबतक कि उसका कोई सार्थक उपयोग न किया जाए. भयभीत व्यक्ति का शरीर यदि स्वास्थ्य भी तो उसका मन रुग्न होता है, क्योंकि भय एक मानसिक रोग है, इसीलिए भय से जो भी पैदा होगा वो सब रुग्न होगा. चूँकि इनका मन कलुषित होता है इसीलिए ऐसे लोग स्वास्थ्य का गलत इस्तेमाल करते है, स्वास्थ्य मिलने पर ये उन सब जघन्य अपराधों संलग्न हो जाते हैं, जो ये दुर्बल शरीर से कभी नहीं कर सकते थे. शुभ करने के लिए शायद ही कभी मजबूत शरीर की ज़रूरत होती है. लेकिन अशुभ करने के लिए शरीर का मजबूत होना अनिवार्य है. इसीलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि हिटलर भी स्वास्थ्य के उन्ही नियमों का पालन करता है, जिसका कि महात्मा गाँधी या कोई और महात्मा करते हैं.
इसीलिए कालान्तर में गुरु, तब तक शिष्य को स्वस्थ्य होने की कुंजी नहीं देता था, जबतक कि वह इस बात को लेकर पूर्णरूपेन आश्वस्त नहीं हो जाता कि शिष्य अब स्वास्थ्य का कोई गलत इस्तेमाल नहीं करेगा. लेकिन आज कल के गुरु बिना ये जाने समझे के कोई व्यक्ति क्यों स्वस्थ्य होना चाहता है, उसका क्या उदेश्य है, योग या स्वस्थ्य होने के अन्य विधियों की जानकारी धरल्ले से चंद नोटों और थोड़ी सी शोहरत के एवज में बेच रहे हैं. यह ख़तरनाक है, बहुत ही ख़तरनाक है. पता नहीं कैसे इसके दूरगामी दुष्परिणाम को ये मंदबुद्धि योगगुरु तथा स्वास्थ्य के अन्य ठेकेदार नहीं देख पा रहे हैं!
सकारात्मक, स्वास्थ्य एक बिलकुल ही अनूठी बात है. सकारात्मक स्वास्थ्य का खोजी, किसी चीज से भयाक्रांत होकर स्वास्थ्य नहीं खोजता है. वह बामारी या मृत्यु से लड़ने के लिए स्वास्थ्य नहीं तलाशता, बल्कि ऐसा व्यक्ति मृत्यु को जानने व उसके पार जाने के लिए स्वास्थ्य अर्जित करता है. उसकी उत्सुक जीवन के परम सत्य को पा लेने में है न कि सुडौल व सुगठित शरीर पाने में. बुद्ध ने कहा है कि असत्य में सौ साल जीने से उत्तम है सत्य में एक क्षण जीना.
महावीर ने शरीर को नाव कहा है, एक ऐसा नाव जिसमे सवार होकर हम संसार/भव(दुःख)-सागर के पार जा सकते हैं. नैचुरली, अगर नाव में छेद हो तो पार करना मुश्किल होगा. इसीलिए साधक स्वस्थ्य शरीर की कमाना करता है. लेकिन शरीर उसके लिए साधन है साध्य नहीं. विचार करें कि आप क्यों स्वस्थ्य होना चाहते हैं? सिर्फ स्वस्थ्य होकर मरने में क्या अर्थ है? “शरीर’ शब्द संस्कृत के शब्द क्षर से बना है. क्षर का अर्थ होता नाश होना, इसलिए, शरीर को कितना भी सजा लो इसका नाश सुनिश्चित, एक न एक दिन इसका क्षय होकर रहेगा.

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