Saturday, 29 February 2020

हम सब दूसरे दर्जे के यूरोपीयन बनते जा रहे हैं|

समय- 6:26 (सुबह), मंगलवार २४ फ़रवरी, कोलकाता
हम अभी जहाँ बैठे हैं, वहाँ से दो मिनट की walk पर तारा मंडल है। मेरे बाईं ओर एक गगनचुंबी इमारत बादलों के बोसे ले रहा है। दिव्या अपने योग-चटाई पर अष्टांग-योग के आसनों का अभ्यास कर रही है। पार्क almost ख़ाली है, हमसे काफ़ी दूर कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं। पास में ही अशोक का एक विशाल पेड़ है, जिससे चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आ रही है। मेरे दाईं ओर मुख्य सड़क को पार कर के एक पूरना चर्च है, उसकी चार मीनारों को यहाँ से मैं देख पा रहा हूँ।
सुबह तीन बजकर पंद्रह मिनट पर हमारी ट्रेन चितपूर स्टेशन (उर्फ़ कोलकाता स्टेशन) पहुँच गयी थी। सवा पाँच बजे तक हम वहीं वेटिंग रूम में बैठे थे। पौ फटने के बाद बस पकड़ कर पहले हम श्याम बाज़ार आए, फिर वहाँ से दूसरी बस पकड़ कर विक्टोरिया। अभी पर्क में आने से पहले हमने गन्ने का जूस पीया।
Airbnb से जो रूम हमने बूक किया है, उसका चेक इनटाइम ११ बजे हैं। अभी हमारे पास पर्याप्त समय है। दिव्या अपने योग-रूटीन को निर्बाध रखना चाहती थी, इसीलिए उसे यहाँ, विक्टोरिया के सामने वाले पार्क में लेकर आया हूँ। दिव्या जब योगाभ्यास समाप्त कर लेगी, तब हम टहल कर शहर की सुबह का आनंद लेंगे।
योग करने के बाद हम एक बार फिर से गन्ने वाले के यहाँ गए। इस बार हमने दो छोटा ग्लास लिया। मूँह में गन्ने की मिठास लिए हम विक्टोरिया मेमोरियल के मुख्य द्वार तक टहलते हुए आए। द्वार के सामने खड़े अरविन्दो की आदमक़द प्रतिमा को मैंने दूर से ही पहचान लिया...हालाँकि पहली नज़र में मुझे लगा कि रविंद्रनाथ हैं, लेकिन फिर दाढ़ी की लम्बाई से लगा कि ये अरविंद ही हैं। पहली बार संभवतः २०१० में जब कोलकाता आया था, तब इस मूर्ति पर इतना ग़ौर नहीं किया था...क्या पता किया भी हो, लेकिन अब कुछ याद नहीं...!
मुख्यद्वार के सामने ही पैदलमार्ग में एक बुजुर्ग अमरूद और कुछ अजनबी फल बेच रहे थे। दिव्या की ज़िद्द पर मैंने 50 रुपये में दो अमरूद और एक लाल रंग का अजनबी फल, जिसका नाम उन्होंने जामुन बताया, ख़रीदा... जामुन का ऐसा अनोखा रंग और विलायती रूप मैंने पहले कहीं नहीं देखा था। फल का स्वाद कुछ-कुछ सेब जैसा था।
अमरूद वाले के पास ही लगे लकड़ी के बैंच पर बैठ कर हम विक्टोरिया के महल को देखने लगे। तभी आचानक वृष्टि शुरू हो गयी...। “ओह-ओ बारिश से स्वागत हुआ है हमारा”, दिव्या बोली।
आठ बजे call करके रूम मालकिन ने हमें बता कि हम अपने समय से पहले भी आ सकते हैं...! यह हमारे लिए अच्छी ख़बर थी, विक्टोरिया के खुलने में अभी दो घंटा बाँकी था। उनके call के बाद हमने तुरंत उबर बूक किया, और कोई २० मिनट की यात्रा के बाद अपने निवास स्थान पर पहुँच गए।
अभी जहाँ हम ठहरे हुए हैं वह एक रेसीडेंटल एरिया है..। Corporation बैंक के सामने एक चार मंज़िला मकान है। बिल्डिंग में लिफ़्ट नहीं। चौथी मंज़िल पर सफ़ेद गेट वाले घर में अभी हम ठहरे हुए हैं..। दिव्या अभी किचन में में coffee बना रही है, वहाँ से मुझे नहाने के लिए आवाज़ दे रही है..इसीलिए बाँकी कहानी बाद में...
हम जादवपूर में जहाँ रह रहे हैं, वहाँ से थोड़ी ही दूर पर बस स्टेंड है। स्नान-ध्यान के बाद हम बस लेकर विक्टोरिया पहुँचे। विक्टोरिया पहुँचने से पहले हमने थोड़ा समय रविंद्र सदन में बिताया। वहीं bookshop के सामने बने फ़ूडकोर्ट से कुछ स्थानीय व्यंजन लेकर खाया।
खाने के बाद हम आर्ट गैलरी गए...वहाँ जाने के बाद हमने पता चला कि गैलरी २ बजे ओपन होता है। हम निराश होकर विक्टोरिया की तरफ़ चल पड़े। विक्टोरिया पहुँच कर हमने टिकट लिया और अंदर गए। अंदर जाने के बाद पता चला कि सोमवार को महल बंद होता है। निराश होकर हम पोखर किनारे बैठ गए...पोखर बहुत ही सुंदर था, किनारे लगे फूलों को देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया। हमारे पास के पेड़ों के नीचे बैठे प्रेमी युगल खुलेआम एक दूसरे के अधरों को चूम रहे थे...प्रेम का ऐसा खुला प्रदर्शन देखकर मैं थोड़ा हैरान भी हुआ। खैर, विक्टोरिया के पार्क में थोड़ी देर बैठने के बाद हम फिर से रविंद्र सदन आ गए...

इस बार बमुश्किल हम आर्ट गैलरी ढूँढ पाए...ग़ैरलरी में कुछ आम से पेंटिंग लगे हुए थे। हम जल्दी ही hall से बाहर निकल आए..! नाट्यशाला के बाहर लोग अंदर जाने के लिए क़तार में खड़े थे। बाहर किसी बंगाली नाटक का पोस्टर लगा हुआ था। रविंद्र सदन का पूरा माहौल मुंबई के पृथ्वी थिएटर और अहमदाबाद के गुफ़ा जैसा था..।
सदन से बाहर निकल कर हमने मेट्रो लिया और काली घाट गए। खुली खिड़की वाला मेट्रो देख कर दिव्या बहुत हैरान हुई. लेकिन जब मैंने उससे कहा, “भारत में भूमिगत रेल 1984 में सब से पहले यहीं शुरू हुआ था।”, तो उसकी हैरान थोड़ी कम हुई, ‘तुम दिल्ली के मेट्रो से इसकी तुलना नहीं कर सकती हो..’
कालीघाट के आसपास का माहौल वैसा ही था जैसा पूरे उत्तर भारत में मंदिरों के पास होता है, गली के दोनो तरफ़ अनगिनत फ़ूल-प्रसाद और पूजा से जुड़ी वस्तुओं की दुकान और मंदिर के प्रांगण में कीचड़ और गंदगी..। इस सबसे भी ज़्यादा गंदी वहाँ मुझे उन लोगों के चेहरे पर दिखती है जो लाल-पीले वस्त्र पहन का पुजारी-पंडित बने यहाँ-वहाँ घूमते रहते हैं। पूजारी से अधिक अधार्मिक व्यक्ति खोजने से भी नहीं मिल सकता है।
काली घात से निकल कर हम धर्मतल्ला के new मार्केट गए। यह मार्केट दिल्ली के सरोजनी और सरद जैसा है। जूता पहन कर अधिक चलने की वजह से दिव्या का पैर कट गया है, उसमें अपने लिए एक चप्पल लिया। एक घंटा से भी अधिक समय हमने मार्केट में बिताया...
जब हम मार्केट से बाहर निकले तो मुख्य सड़क का नज़ारा देखने लायक़ था। लोग एक बड़े ट्रक पर अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रतिमा लादे हुए थे। पीछे लोग ‘ट्रम्प वापिस जाओ’ का नारा लगा रहे थे।
New-Market से अपने निवास स्थान की ओर आते से मैंने एक अद्भूत दृश्य देखा। एक जगह ओवेरब्रिज के नीचे बने बैंच पर बैठकर लोग चार-पाँच जगह शतरंज खेल रहे थे। और, कई लोग खड़े होकर उनकी खेल को देख रहे थे। इतनी ट्राफ़िक में इस तरह से लोगों को शतरंज खेलते मैं और कहीं नहीं देखा था।
बस स्टेंड से आवास की तरफ़ आते हुए, रास्ते में हमने गुड़ की चाशनी में डूबा हुआ रसगुल्ला खाया...वाह ऐसा अद्भूत स्वाद...!
वैश्वीकरण की वजह से पूरी दुनिया में संस्कृति का साम्यवाद बड़ी तेजी से फ़ैल रहा है| मेरी दृष्टि में यह बहुत ही चिंतनीय और निंदनीय है| दस साल पहले जब कोलकाता गया था, तब के कोलकाता और आज के कोलकाता में जमीन आसमान का अंतर आ गया है|
लोगों, घरों, दुकानों और लोगों के पहनावा और व्यवहार को देख कर कुछ भी तय कर पाना मुश्किल था| मुंबई, कोलकाता, दिल्ली और बंगलौर में आज कोई भी बुनियादी भेद नहीं हैं..(और अगर थोड़ा बहुत कुछ है भी तो वह आने वाले दस साल में एकदम मिट जाएगा) वैसे ही लोग, वही बात करने का ढंग, उसी तरह की दुकाने, घरों का वही पैटर्न, सड़के भी वैसी ही.. जैसे आजादी तलाशते-तलाशते स्त्रियाँ आज दुसरे दर्जे की पुरुष बन कर रह गई हैं, वैसे ही ग्लोबलाइजेशन की वजह से हम सब दूसरे दर्जे के यूरोपीयन बनते जा रहे हैं|
अगर तिलक लगाना, और पत्थर के सामने सिर झुकाना अंधविश्वास और गँवईपन हैं, तो मैं पूछता हूँ भारत जैसे देश में, जहाँ साल में 300 से अधिक दिन सूर्य का दर्शन होता है, वहां टाई लगाकर घूमना, जूता पहनना और कोट पहनना क्या है? कोई मुझे समझाए कि इसके पीछे क्या वैज्ञानिकता है?
ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण ने हमसे हमारी आत्मा और मौलिकता दोनों छीन ली है| आज दरभंगा, जिसे मिथिला का हृदयस्थली कहा जाता है, में जब दूकानदार से मैं पूछता हूँ, "ई समान की भाव छै यो", तो उधर से जवाब आता है, " चालीस का किलो है, कितना चाहिए..." यह हास्यास्पद है...क़रीब-क़रीब ऐसी ही स्थिति आज पूरे देश में हैं...|

Saturday, 8 February 2020

हर पल सेक्स माइंड में चलता रहता है

प्रश्नकर्ता-माइंड बहुत डिस्टर्ब रहता है, हर पल सेक्स माइंड में चलता रहता है|
इक्क्यु- पोर्न देखते हैं?
प्रश्नकर्ता-जी, देखता हूँ|
इक्क्यु-पोर्न देखते हुए हस्तमैथुन/मैथुन करते हैं?
प्रश्नकर्ता- जी, करता हूँ|
इक्क्यु- जितनी जल्दी हो सके ये दोनों चीज़ छोड़ दीजिए...यह आपके सेक्स लाइफ को बर्बाद कर देगा..वैवाहिक जीवन को भी नष्ट कर देगा..साथ ही आपके दिमाग की संवेदनशीलता को हमेशा के लिए खत्म कर देगा| पोर्न का दिमाग पर वही असर पड़ता है, जो ड्रग्स या किसी और मादक द्रव का...पोर्न देखने वालों में शीघ्र-पतन, और erectile dysfunction की समस्या बहुत ही आम है.. पोर्न को जीवन से एकदम दूर कर दीजिए..कुछ दिन (कोई 30 दिन ) पत्नी के साथ भी सेक्स मत कीजिये...सब ठीक हो जाएगा...
प्रश्नकर्ता- मैं पत्नी के साथ 3----(बीप) करना चाहता हूँ.....मन में हमेशा यही सब चलता रहता है|
इक्क्यु- यह सब ख्याल आपके भीतर पोर्न देख कर पैदा हुआ है... इस सबसे से आप चीज़ों को बहुत ही मुश्किल बना देंगे... आप कुछ दिन वाइफ के साथ सेक्स मत कीजिए, पोर्न मत देखिये...हस्तमैथुन भी मत कीजिए ...कुछ दिनों में आपका ब्रेन नार्मल हो जाएगा...और फिर आपकी पत्नी भी आपके साथ पहले से ज्यादा खुश रहने लगेगी... सेक्स से कभी भी स्थाई सुख या आनंद नहीं मिल सकता है... थ्री...(बीप) जैसी चीजें लॉन्ग रन में आपको अपनी पत्नी की नज़रों में गिरा देगा...वो कभी भी आपकी इज्जत नहीं कर पाएगी... जीवन बहुत ही दुष्कर हो जाएगा... पोर्न छोड़ दीजिए सब ठीक हो जाएगा..और साथ ही कोशिश कीजिए की पत्नी के साथ महीने में सिर्फ दो बार सेक्स हो ...धीरज रखिये चीज़ें बेहतर हो जाएगी...
चित्र साभार- गूगल
सेक्स से सुख तभी मिल सकता है जब आप एक गैप के बाद इसमें उतरते हैं... पोर्न देखने की वजह से आदमी सेक्स का आदि हो जाता है .... और जितना अधिक इसके बारे में सोचता है, उतना ही रियल सेक्स उसके लिए मुश्किल हो जाता है
अकेले में फ़ोन का इस्तेमाल मत कीजिए, रात को बिलकुल ही नहीं... कोई 90 दिन जब आप बिलकुल पोर्न नहीं देखेगे और हस्तमैथुन भी नहीं करेंगे...तब आपका ब्रेन और शरीर नार्मल हो पाएगा...

Tuesday, 4 February 2020

ध्यान जीवन जीने का एक ढंग है...


प्रश्न- नमस्ते सर, आपकी बात सोच रहे थे, हम खुद को समझने और शांत करने के लिए क्या करें... हमें मैडिटेशन के बारे में भी कुछ पता नहीं... कुछ दिन ब्रह्मा कुमारी में जाते थे पर अब नहीं जाते... पता नहीं क्यों..| आप कुछ बताएं प्लीज्..!

ख़ुद को वही समझ सकता है, जो यह भलीभांति जान ले कि वह ख़ुद को नहीं समझता/जानता है| इसी तरह, जिसको शांति चाहिए उसे अपनी अशांति को ठीक से समझना होगा..| तो, आपको अपने को समझना नहीं है, आपको बस इतना समझना है कि आप अपने को नहीं समझती/जानती हैं| और जिस उपाय से हमें यह समझ आता है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, उसी को ही शास्त्रों में ध्यान/मैडिटेशन कहा गया है| 
ध्यान से न तो शांति मिलती है, न ही हम ख़ुद को समझते हैं.. ध्यान से हमें बस इतना समझ में आता है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं| यह कहने में कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, और सच में ही यह जानना कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, में बड़ा भेद है| जिस दिन आपको पता चलेगा कि आप सच में ही ख़ुद को नहीं जानती हैं, आपके पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाएगी...पूरा जीवन ही कुछ और हो जाएगा...| 
ध्यान हमें वस्तुस्थिति का बोध करता है| और जिसने यह जान लिया कि वह ख़ुद को नहीं जानता है, वह असल में बहुत कुछ जानता है| उपनिषद तो यहाँ तक कहते हैं कि वह सब कुछ जानता है, "यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्‌ ॥"
अशांति का बोध ही शान्ति का मार्ग है..| इसीलिए, शांति पाने से ज्यादा अशांति को समझने की कोशिश कीजिए...असल में शांति की बहुत ज्यादा चाह की वजह से ही हम कभी अशांति को नहीं समझ पाते हैं| अज्ञानी ज्ञान की चाह के कारण ही भटक जाता है| इन फैक्ट 'चाह' हमें भटकती है..| कुछ लोग, जो क्रोध से पीड़ित है, पूरी जिंदगी क्रोध से लड़ते रहते हैं, फिर भी कभी उससे मुक्त नहीं हो पाते हैं| कारण क्या है? कारण है 'अक्रोधी बनने की चाह'...! और मजा यह है कि जो व्यक्ति अक्रोधी होने की चाह को छोड़ कर क्रोध से लड़ना बंद कर देता है, वह क्रोध से मुक्त हो जाता है| तो, इसका अर्थ हुआ 'स्वीकार' करना सूत्र है| यही ध्यान है... 'स्वीकार करना' ध्यान है, और लड़ना/विरोध करना 'अध्यान है| अगर आप अशांत हैं, तो अपनी अशांति को स्वीकार कर लीजिए, उससे लड़िये मत...अशांति के क्षण में शांत होने की कोशिश करना 'अशांति से लड़ना है'... और आप जितना अशांति से लड़ेंगी और शांत होने की कोशिश करेंगी, उतना है अशांति बढ़ता जाएगा...| अशांति को स्वीकार करने से मेरा क्या मतलब है? जब अशांति मन को पकड़े तब आँखे बंद करके भीतर देखिये, देखिये कि उस क्षण आपके शरीर और मन में क्या घट रहा है... उस क्षण शांत होने की कोशिश या फिर अशांति से भागिए मत...टीवी खोल कर मत बैठिये, दोस्तों को मत फोन लगाइए...यह मत कहिये कि मुझे शांत होना है , या फिर मैं शांत हूँ... नहीं बस जो कुछ भी आपके भीतर घटित हो रहा है, उसको देखिये, उसमे गहरे उतरिये...इस बोध से ख़ुद को भरिये कि अभी इस क्षण मैं अशांत हूँ (ऐसा नहीं की अशांत होना अच्छी बात नहीं है, मुझे शांत होना है, नहीं ऐसा नहीं ...बस अशांति है ..यथा भूतं...ऐसा है ....!) | बिना किसी विकल्प के, बिना किसी धारणा के जो हो रहा है , उसके अनुभव में गहरे उतरना ध्यान है| ध्यान कोई क्रिया नहीं है जिसे कोई आँख बंद कर के एक घंटा कर सकता है ... ध्यान जीवन जीने का एक ढंग है... | अगर आपको ख़ुद को समझना है, तो आपको अभी तक के इकट्ठा किये गए सभी उधार ज्ञान को उतार का फेकना होगा..| आपको अपने उस रूप की तलाश करनी होगी, जो आपके पास तब था जब आपके पिता भी नहीं जन्मे थे| ये जो अभी आपका नाम है, यह उधार है... धर्म उधार है, रूप उधार है, जाति उधार है... इन फैक्ट अभी आपके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे आप अपना कह सकती हैं, सब उधार है ...वही ज्ञान आपका अपना हो सकता है जिसे आप गहरी नींद में अपने साथ ले जा सकती हैं... अभी तो नींद में आप सब भूल जाती हैं..| जो ज्ञान नींद में साथ छोड़ देता है, वो मौत में क्या काम आएगा...| 

आप कहती हैं 'हमें मैडिटेशन के बारे में भी कुछ पता नहीं', यह अच्छी बात है| ब्रह्मा कुमारी से भी आप बचकर निकल गयीं, यह बहुत ही सौभाग्य की बात है|

Monday, 4 November 2019

बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है (महा-प्रयोग डे- 4 & 5)

परसों पीवीआर पर कॉफ़ी पीने गया था| एक छोटा-सा लड़का एक मरे हुए चूहे को हाथ में लेकर सबको डराने की कोशिश कर रहा था| चूहा आकर में काफी बड़ा था, वह उसके पूछ को पकड़कर बैठे हुए लोगों पर उछाल रहा था| उसी लड़के के साथ एक और लड़का था, जो लोगों को पहले आगाह कर दे रहा था, "वो देखिये वह चूहा लेकर आपको डराने आ रहा है|" लोग डरने से पहले संभल जाते थे, इसीलिए संभल-संभल कर डरते थे और डर-डर कर संभलते थे| यह एक अच्छा खेल था, लेकिन मुझे इस तरह का खेल देखना पसंद नहीं है| मैं चूहों से नहीं डरता, इसीलिए मैंने कभी बिल्ली नई पाली| चूहे और बिल्ली दोनों (लिखता भले ही 'दोनों' हूँ, लेकिन मैं बोलता हमेशा 'दौनों' हूँ, बोलने में लिखने से ज्यादा गलतियाँ करता हूँ|) मुझे नापसंद है|
मौन के अलावा मैं किसी भी भाषा को ठीक से उच्चारित नहीं कर पाता हूँ| मुझे भाषओं से डर लगता हूँ| इन फैक्ट, हर बार बोलने से पहले मैं बहुत डर जाता हूँ| अक्सर बहुत बोल कर मैं अपने डर को छुपाने की कोशिश करता हूँ| लेकिन डर छुपाने से नहीं छिपता है| छिपाने की कोशिश में ही वह बाहर आ जाता है|
मौन मेरी अपनी भाषा है, इसे मैंने किसी से सीखा नहीं है| 9 महीने तक माँ के गर्भ में रह कर मैंने इसे साधा है| माँ के गर्भ से निकल कर मैं तुरंत नहीं चीखा था, रोने से पहले थोड़ी देर 'मौन' रहा था| मौन रहना, सुनना, रोना और मुस्कुराना ये चार चीज़े मैं अपने साथ लेकर आया था| इसके लिए मैंने कहीं से ट्रेनिंग नहीं ली थी| इसीलिए मैं जब भी मौन होता हूँ, 'मैं' नहीं होता हूँ-बस 'मौन' होता है, एक समग्र मौन| माँ के गर्भ में आने से पहले मैं मौन में था-मौन के गर्भ से ही मैं माँ के गर्भ में आया था| पहली बार जब मैंने 'माँ' शब्द का उच्चार किया था, तो वह कोई शब्द नहीं था, वो मेरे मौन का विस्तार था| इस जीवन से जाने से पहले भी अंतिम बार मैं इसी शब्द का उच्चार करके अनंत मौन के गर्भ में चला जाऊँगा| मेरे बाबा ने भी ऐसे ही किया था| मरने से पहले वे कोमा में चले गए थे| उनकी आँखे हमेशा बंद रहती थी| न वे किसी से कुछ बोलते थे, न ही किसी की कोई बात सुन सकते थे| बस कभी-कभी माँ शब्द का उच्चार करते थे| मरने के बाद वे बिलकुल 'मौन' हो गए थे|
कल शाम का खाना आदित्य के यहाँ खाया था| वे गाँव से मरुआ का आटा लेकर आए थे| इधर काफी दिनों से मैं मरुआ की रोटी खाना चाह रहा था| कल मरुआ की मोटी रोटी, देशी घी और गुड़ खाकर शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी तृप्ति मिली|
पिंज़रे के तोते की तरह मैं दिल्ली में छटपटा रहा हूँ| शहर की हवा शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी बीमार कर रही है| आदमी को कभी भी ऐसी जगह नहीं रहना चाहिए जहाँ वह कहीं भी पेशाब नहीं कर सकता हो| जंगल और गाँव मुझे इस लिए पसंद है कि वहां पेशाब करने के लिए किसी विशेष नियमों का पालन नहीं करना पड़ता है| खुले में पेशाब करना एक महान सुख है। शहर हमें ऐसे बहुत से सुखों से वंचित करता हैं| अनावश्यक 'dos और don'ts में रहना मुझे पसंद नहीं है- यहाँ से चलो, यहाँ से मत चलो, ये करो, ऐसा मत करो -शहरों में इन सब बातों से मैं बहुत थक जाता हूँ| शहर मनुष्यों के लिए नहीं मशीनों के लिए हैं| वही मनुष्य शहर में रह सकता है जो मशीन बनने को तैयार हो| आदित्य का बच्चा अभी सिर्फ आठ महीने का हैं| कल उनके बच्चे को देख कर मैंने उनसे वही कहा जो वानगोग ने अपने भाई थिओ से कहा था, "बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है|" आदित्य मेरी बातों को नहीं समझे, लेकिन उनका बेटा मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था|
मेरा महा-प्रयोग बहुत ही सही ढंग से सफलता पूर्वक चल रहा है| आज पांचवा दिन है, बिस्तर पर जाने का समय और मोबाइल को ऑन और ऑफ करने के मामले में मैं एकदम सही जा रहा हूँ| खाने के मामले में 2% इधर-उधर हो जाता है| बांकी प्रगोय से काफी कुछ बदल रहा है जीवन में| बदलते-बदलते एक दिन मेरा जीवन बिलकुल वैसा ही हो जाएगा, जैसा अभी हैं| बहुत बदले के बाद चीज़ें एन अपने जैसी हो जाती हैं|

Friday, 1 November 2019

जवाब दुःख की जननी है (महा-प्रयोग डे-3)

इस बार, मुंबई से रोज़ चालीस मिनट वाक करना, दाहोद से दोपहर को खाने के बाद सोना, और मेहसाणा से खाली बैठना सीख कर लौटा हूँ| महाप्रयोग के पहले दो दिन सुबह-सुबह वाक करने के लिए सिटी फारेस्ट गया था| लेकिन आज नहीं गया| ख़बर की माने तो दिल्ली में प्रदूष्ण का लेवल बहुत ही ज्यादा बढ़ गया है| कल वाक से आने के बाद मुझे भी बड़ा अजीब-सा फील हो रहा था-सर भारी हो रहा था, और सांस लेने में भी दिक्कत महसूस कर रहा था| इसीलिए आज से वाक के लिए जाना बंद कर दिया है| पुराने दिनों में लोगों ने जिस नर्क की परिकल्पना मरने के बाद आसमान के किसी सातवें लोक में की थी, उस नर्क को हमने शहरों के रूप में जमीन पर उतार लिया है| 
  
आज प्रयोग का तीसरा दिन है| कल का दिन अच्छा गुजरा| फोन समय पर ऑन और ऑफ किया था| रात सोने भी टाइम पर चला गया था| अगर कहीं कुछ चूका तो वो खाने में, परसों की तरह कल भी एक बार बिना चीनी की चाय पी| वैसे मैं कभी चाय नहीं पीता हूँ, मुझे कॉफ़ी पसंद है, पर पता नहीं क्यूं मैंने कल ख़ुद ही दिव्या से चाय बनाने को कहा| चाय पीने के बाद मैं घंटो सोचता रहा कि ऐसा मैंने क्यों किया? लाख कोशिशों के बाद भी मैं कोई ठोस जवाब नहीं ढूढ़ पाया| वैसे जवाब ना पाकर मैं काफी खुश था| अगर कोई जवाब मिल जाता तो शायद मैं दुखी हो जाता| मैं जीवन में सिर्फ उन्ही चीज़ों को लेकर दुखी होता हूँ जिसका जवाब मिल जाता है| उसके मामले में भी ऐसा ही हुआ था| जब वो एक दिन अचानक मुझे छोड़ कर चली गई, तो कुछ दिनों तक मैं बड़ा हैरान रहा था| उसका यूं अचानक बिना कुछ बताए चले जाने की वजह ढूंढता रहा| काफी दिनों तक मुझे कोई वजह नहीं मिली| महीनों तक उसका जाना मेरे लिए रहस्य बना रहा| मैं बहुत ही खुश था| इसलिए नहीं कि वह मुझे छोड़कर चली गई, बल्कि इसलिए कि मैं उसके जाने की कोई वजह नहीं ढूंढ पाया| फिर एक दिन मुझे वजह मिल गई- मेरे पास पैसे नहीं थे, और ना ही मैं पैसे कमाना चाहता था, इसलिए वो मुझे छोड़कर चली गई| फिर मैं बहुत दुखी हो गया| इसलिए नहीं कि वो मुझे पैसों की वजह से छोड़ कर चली गई, बल्कि इस लिए कि वो मुझे छोड़ कर चली गई| मुझे छोड़ कर वो जिस व्यक्ति के पास गई वह मुझसे भी ज्यादा गरीब और दरिद्र था| लेकिन वह उसके साथ खुश थी क्योंकि वह ढेर सारा पैसा कमाना चाहता था| असली सवाल 'चाह' का था| उन दिनों अगर मैंने कबीर को नहीं पढ़ा होता, तो शायद वह मुझे कभी छोड़कर नहीं जाती, 

"चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह । जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह|"-कबीर 

मुराकामी को पढ़ना काफी अच्छा लग रहा है| मेरा अनुमान सही था, मुराकामी के बारे में मैंने जैसा सोचा था वे वैसे ही निकले| मुराकामी की 'नोर्वेगैन वुड' के अलावा मेरे टेबल पर इन दिनों पांच और किताबें हैं-गीत चतुर्वेदी की 'न्यूनतम मैं, और सावंत आंटी की लड़कियां', लिओ तोल्स्तोय की 'वॉर एंड पीस', गोर्की की 'मदर', और निर्मल वर्मा की 'वे दिन'| इन पांच किताबों के अलावा टेबल एक और किताब है जो गिफ्ट रैप के अंदर बंद है| इस किताब को मैंने 'नोर्वेगैन वुड' के साथ मनवाई है| यह किताब दिव्या को उसके बर्थडे के दिन गिफ्ट दूंगा| दिव्या को उसके हर बर्थडे पर एक किताब गिफ्ट देता हूँ| अक्सर यह वो किताब होती है, जो मुझे पढ़नी होती है| 
इन छः किताबों के अलावा टेबल पर एक डायरी और दो पेन भी  हैं| यह डायरी और कलम उम्मेद स्वामी ने मुझे इस बार मेहसाणा में उपहार स्वरूप दिया| डायरी बहुत ही सुंदर है-ऊपर चमड़े की कवर है, और भीतर हैण्डमेड पेपर हैं| कलम भी मेरे पसंद की है| जबसे दिल्ली आया हूँ रोज़ कुछ-न-कुछ डायरी में लिख रहा हूँ| बहुत दिनों बाद कलम से लिखना बहुत ही सुखद लग रहा है| हालाँकि आदत छूट जाने की वजह से जल्दी ही उँगलियाँ दुखने लगती है|

पूरा दिन घर पर बैठा रहता हूँ, प्रदुषण की वजह से कहीं आने-जाने का मन नहीं करता है| कल शाम सोचा था कि पीवीआर पर कॉफ़ी पीने जाऊं, पर फिर यह सोच कर रुक गया कि वहां दूध वाली कॉफ़ी पीना पड़ेगा| बाहर की ब्लैक कॉफ़ी बहुत ही खरनाक और कड़वी  होती है| दो बार इस कड़वे अनुभव से मैं गुज़र चुका है| एक बार दो साल पहले अमोल स्वामी के साथ देहरादून में और अभी दिवाली पर पुष्कर में उम्मेद स्वामी के साथ|
पुष्कर घाट से ही लगा एक कैफ़े है 'मामासीता कैफ़े'| पुष्कर पहुँचने के बाद हम (उम्मेद स्वामी और मैं) थोड़ी देर घाट पर बैठकर बाते करते रहे| थोड़ी देर बाद हमें नींद आने लगी| हम घाट पर से उठ कर कैफ़े में आ गए|
'आप क्या लेंगे?' उम्मेद स्वामी ने मुझसे पूछा| 'लेना तो मैं ब्लैक कॉफ़ी चाहता हूँ, लेकिन ये लोग बहुत कड़वा बनाते हैं| एक बार मैंने देहरादून में अमोल स्वामी के साथ पी थी, नानी याद आ गई| चार लोटा गर्म पानी मिलाने के बाद भी वो कॉफ़ी ब्लैक से ब्राउन नहीं हुई|", मैंने उनसे मेन्यु देखते हुए कहा| "यहाँ ऐसा नहीं होगा, मैं उनसे बोल देता हूँ, आप के लिए बढियां लाइट कॉफ़ी बना देंगे|", मेरा डर दूर करते हुए उम्मेद स्वामी बोले| वेटर को बुलाकर उन्होंने मेरे लिए एक 'लाइट' ब्लैक कॉफ़ी और अपने लिए एक मसाला चाय आर्डर दिया| 
दस मिनट बाद वेटर कॉफ़ी लेकर आया है| कॉफ़ी एक ब्लैक थर्मस में बंद था| थर्मस में साथ वह एक सफेद कप-प्लेट और ब्राउन सुगर के कुछ पैकेट रख गया| उम्मेद स्वामी की चाय आने में अभी टाइम था| "भाई, ये गाना बदल कर कोई कैलासिक्ल सॉफ्ट म्यूजिक लगा दो", उम्मेद स्वामी ने वेटर से कहा| मैंने थर्मस से कॉफ़ी कप में उड़ेला, कप बहुत ही प्यारा था| कॉफ़ी का रंग देख कर मेरे चेहरे का रंग उड़ गया| मेरा अनुभव कहने लगा-यह कॉफ़ी बहुत ही खतरनाक  है| लेकिन फिर बुद्धि ने कहा-क्या पता बस ब्लैक दिख रहा हो, हो लाइट ही| मैंने आधे कप को कॉफ़ी से भरा, फिर उसमे दो पैकेट चीनी डाला-अगर कड़वा हुआ तो चीनी से थोड़ी कड़वाहट कम हो जाएगी| दो मिनट बाद मैंने पहला सिप लिया- याआआआक्क्क....!! गिलोई के जूस से भी ज्यादा कड़वा था ...येंआआआ...! दवाई की तरह जैसे तैसे मैंने उसको खत्म किया है| फिर उम्मेद स्वामी ने वेटर से कह कर दो कप गर्म पानी मंगवाया| थर्मस में गर्म पानी आया| मैंने पानी से अपने कप को भरा, फिर कॉफ़ी वाले थर्मस से दो बूँद कॉफ़ी उस पानी में डाला| कॉफ़ी वाले थर्मस में अभी जितना कॉफ़ी था उससे कम-से-कम मैं बीस कप कॉफ़ी अपने लिए तैयार कर सकता था| बचे हुए गर्म पानी से उम्मेद स्वामी ने अपने लिखे कॉफ़ी तैयार किया| "इतना कड़वा कॉफ़ी कौन पीता होगा, किसके लिए बनाते हैं ये लोग, अगर लाइट ऐसा है, तो डार्क कैसा होगा...", उम्मेद स्वामी ने मुझसे पूछा| मेरे पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं था| मैं बहुत खुश था| जवाब ढूंढ कर मैं दुखी नहीं होना चाहता था| "शायद जीवन की कड़वाहट को कम करने के लिए लोग इतनी कड़वी कॉफ़ी पीते हैं", कार में बैठते हुए उम्मेद स्वामी ने मुझसे कहा| उन्हें जवाब मिल गया था, और मैं देख सकता था कि जवाब मिलने के बाद वे काफी दुखी हो गए थे| सीट बेल्ट लगाते हुए मैंने उन्हें जीवन का एक सूत्र दिया-जवाब दुःख की जननी है| 



सावंत आंटी की लडकियाँ (महा-प्रयोग डे- 2)

कल शाम 'सावंत आंटी की लड़कियां' समाप्त हुई| किताब मुझे बहुत ही अच्छी लगी, खासकर पहली (सावंत आंटी की लड़कियां) और अंतिम (साहिब है रंगरेज) कहानी बहुत ही कमाल की है| गाली-गलौज, और हगने-पादने को गीत ने इतने कलात्मक ढंग से कहानी में इस्तेमाल किया है कि मैं दंग रह गया| कहानियों में गालियों के प्रयोग से इतना ज्यादा प्रभावित मैं पहले कभी नहीं हुआ था| पूरी किताब में अगर मैंने कहीं कुछ अंडरलाइन किया है, तो वह गाली-गलौज और हगने पादने की बातें| कुछ अंडरलाइन आपके साथ यहाँ शेयर करता हूँ, हालाँकि इन लाइनों की महिमा आप बिना सन्दर्भ के समझ नहीं पाएँगे, फिर भी.... 

"इश्क़ छिपाए नहीं छिप पाया| पानी में हगे गए की तरह ऊपर आ गया"

"डिम्प की माँ की कुछ चीज़ें बहुत मशहूर थी- एक तो उसके भारी-भरकम नितम्ब, जो चलते समय बहुत नैसर्गिक तरीक़े से अप एंड डाउन होते थे और यह अफ़वाह फैलाते थे कि उसका पति पीछे से करता है|" 
"दीनानाथ कांबले के चेहरे पर तनाव तब और बढ़ गया, जब उन्हें पता चला कि उनका भाभड़ा और निरा चिम्हड़ी बेटा ऐसा चुतिया-बसंत टाइप एलान करके गया है|" (इस लाइन को पढ़ कर में दस मिनट तक पेट पकड़ कर हंसता रहा था|)

दूसरी कहानी 'साहिब हैं रंगरेज' बहुत ही अलग, थॉट-प्रोवोकिंग, और सुंदर कहानी है| किताब पढ़ते हुए मुझे कई बार मिलान कुंदेरा की किताब 'अन्बेरबल  लाइटनेस ऑफ़ बीइंग' की याद आई| कुंदेरा की तरह गीत भी हमें उन चीज़ों के बारे में सोचने के लिए मजबूर करते हैं, जिनको हम आम तौर पर बहुत ही हल्के में लेते हैं|  
इन दिनों गीत चतुर्वेदी मेरे सबसे पसंदीदा लेखक हैं, उनकी किताब 'न्यूनतम मैं' को मैं तकिये के नीचे रखकर सोता हूँ| इधर मेरा भोपाल जाकर उनसे मिलने का भी बड़ा मन था, सोचा था मेहसाना से सीधा भोपाल जाऊंगा, और वहां से फिर दिल्ली| लेकिन, आश्रम पहुँचने के बाद मन इतना निष्क्रिय हो गया कि कहीं आने-जाने का दिल ही नहीं किया| गीत से मिलकर उनका ऑटोग्राफ लेने लिए भक्तराज, रावसाहब और मैंने 'न्यूनतम मैं' की तीन नई प्रतियां भी मंगा ली थी| आश्रम का नशा मुझ पर ऐसा तारी हुआ कि मैं आश्रम के गेट से बाहर निकलने से पहले भी दो बार सोचता था| आश्रम में बिताए दस दिन मेरे इस साल के अब तक के सबसे बेहतरीन दिन थे| आश्रम के अन्दर मैं ऐसा ही फील करता हूँ जैसा बच्चा गर्भ में फील करता है| जैसे गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए माँ सांस लेती है, वैसे ही जब मैं आश्रम में होता हूँ, अस्तित्व मेरे लिए सांस लेता है| 

'सावंत आंटी की लड़कियां' समाप्त करने के बाद कल शाम ही मैंने एक नई किताब शुरू की है- मुराकामी की 'नार्वेजियन वुड'| पहला बीस पेज पढ़ कर ही मजा आ गया| मुराकामी को पहली बार पढ़ रहा हूँ| अभी तक उनके बारे जितना पढ़ा और सुना है, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उनकी किताब मुझे जमेगी| आगे पूरी किताब पढ़ने के बाद ही किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है| डी.टी सुजुकी के अलावा मुझे नहीं याद है कि इससे पहले किसी जपानी लेखक को मैंने  कभी पढ़ा है| जापान से मेरा संबंध झेन तक ही सिमित रहा है| और झेन के बारे मैंने जितना भी जाना, सुना और समझा है उसका क्रेडिट जाता है ओशो और एलन वाट्स को| डी.टी सुजुकी को पढ़कर मैंने झेन को बस जाना था, झेन से असली प्रेम मुझे ओशो और एलन वाट्स की वजह से हुआ| 
आज 'महा-प्रयोग' का दूसरा दिन है| कल का दिन क़रीब-क़रीब अच्छा बीता| पूरा दिन तो मेरा सही गया, बस शाम में थोड़ा गच्चा खा गया| 
कल मेरे साथ वैसा ही हुआ जैसा धर्मकोट में राव साहब के साथ हुआ था| एक दिन ऑर्गनिक थाली में खाना खाते समय राव साहब की मुलाकात एक अहमदाबादी लड़की से हुई| जहाँ वे खाना खा रहे थे वहीं बगल वाले टेबल पर लड़की रूमी को पढ़ रही थी| बहुत हिम्मत इकठ्ठा करके राव साहब ने उससे बात की| बातचीत से उनको यह पता चला कि लड़की उनके ही शहर अहमदाबाद से है, पिछले एक महीने के धर्मकोट में रह रही है, और कभी-कभी जब उसे घर पर खाना बनाने का मन नहीं होता है, तो वो यहाँ ऑर्गनिक थाली पर खाने चली आती है| राव साहब बड़े खुश हुए- अगर यह लड़की पट गई तो मजा आ जाएगा, अपने ही शहर की है, फिर तो रोज़ मिलना हो पाएगा, रूमी को पढ़ती है, मतलब समझदार टाइप की है, और एक महीने से यहाँ रह रही है, यानी की अपने टाइप की है| फिर क्या था उससे दुबारा मिलने के लिए राव साहब रोज ऑर्गनिक थाली का चक्कर लगाने लगे| संयोग ऐसा बना कि वह दुबारा नहीं आई| राव साहब ने रेस्टोरेंट के मनेजर को अपना नंबर भी दिया यह कह कर कि वह लड़की अगर कभी आए तो उसे इस नम्बर पर कॉल करने को बोलना, मुझे उसके मारफत कुछ अहमदाबाद भेजना है| आस-पास के सब्जी वालों को भी लड़की का हुलिया बता कर राव साहब ने यह पता करने की कोशिश की कि क्या ऐसी कोई लड़की उनके पास सब्जी लेने आती है| -अहमदाबाद की कोई लड़की हाथ में रूमी की किताब लेकर आपके यहाँ सब्जी लेने आती है? वह एक महीने से यहाँ रह रही है..उसके बाल कमर तक लम्बे हैं, चश्मा लगाती है, नाक पतले और होंठ मोटे हैं, बड़ी-बड़ी काली आँखें हैं| सिलिंडर बॉडी है, जब वो चलती है तो जमाना उसे रुक कर देखने लगता है| कुछ इस तरह से लड़की के बारे में राव साहब लोगों को बताते थे| राव साहब की रूमानी व्याख्या का असर यह हुआ था कि सब्जी वालों के साथ-साथ मास्टर उगवे भी लड़की को ढूँढने में बहुत रस लेने लगे| 

जब दस दिन की हंटिंग के बाद कहीं से लड़की का कुछ पता नहीं चला, तो राव साहब थोड़े ढीले पड़ गए| मास्टर उगवे भी बहुत उदास हो गए| एक दिन मास्टर उगवे मुझसे कहने लगे, "ये राव झूठ बोलता है, यह ऐसी किसी लड़की से नहीं मिला है| हम पर इम्प्रेशन डालने के अपने को झांसे में ले रहा है| जैसी लड़की ये बता रहा है, मैं नहीं मानता कि ऐसी कोई लड़की इस जनम में कभी इनके जैसे बबूचक से बात करेगी|" उगवे की बात सुनकर राव का मुंह उतर गया|  'लेकिन इजराइली ने तो की थी, बात तो छोड़ीये वो तो एक दिन इनसे हिंदी भी सीखी थी', मैंने मास्टर उगवे से कहा| "इजरायली ने बात की नहीं थी, तुमने इनकी बात उससे करवाई थी| अगर इनके गांड में गू था, तो ये दुसरे दिन उसको क्यों नहीं पढ़ा लिए, एक दिन पढ़ने के बाद दुसरे दिन उसने इनको क्यों नहीं बुलाया?", मुंह बनाते हुए मास्टर उगवे बोले| मास्टर उगवे की बात सुनकर राव साहब को ताव आ गया, " उगवे, गू तो मेर्मे भोत है| इदर कर देगा, तो तुम साला उसका बास से मर जाएंगा| अरे, मैं पादेंगा, तो उसका बास सैन नहीं होएंगा तेर्से, मेरे गू का क्या बात करता है रे तू ?" मैंने देखा मामला गर्म हो रहा है, इससे पहले राव साहब सच में हग देते और मास्टर उगवे सच में ही मारे बास के दम तोड़ देते, राव साहब को वहां से उठा कर मैं तुषिता की तरफ ले गया| हम रोड क्रॉस करके के उस तरफ जाने ही वाले थे कि एक ऑटो हमारे सामने से गुजरा| राव साहब एकदम से ख़ुशी के मारे चिल्लाए, "अरे अहमदाबादी थी उसमे" राव साहब की चिल्लाहट सुनकर मास्टर उगवे भी चाय वाले के पास से उठकर हमारे पास आ गए| राव के चेहरे को देखकर उगवे ने भांप लिया की लड़की मिल गई है| "तुम ऑटो पकड़ो और उसके पीछे जाओ'', उगवे ने राव को सुझाया| राव रोड पार करके ऑटो ढूँढने के लिए भागे| हमने उनका पीछा किया| ऑटो स्टैंड पर कोई भी ऑटो नहीं था| राव मुंह लटकाए खड़े थे| "अब क्या करोगे, साला इसीलिए बोला था कि एक बाइक रेंट पर लेलो, आज बाइक होता तो बबूचक की तरह यहाँ मुंह लटका कर खड़ा नहीं होना पड़ता|", मास्टर उगवे ने राव साहब को लताड़ते हुआ कहा| "कोई नहीं उस ऑटोवाले को लौटकर आने दीजिए, उससे पूछेंगे कि उसे कहाँ छोड़ कर आया| या फिर शाम तक इंतजार करते हैं, लौट कर यहीं तो आएगी|", राव साहब ने ख़ुद को और मास्टर उगवे को दिलासा देते हुए कहा| 'ऑटो वाले को कैसे पहचानेगे?' मैंने राव साहब से पूछा| मास्टर उगवे और राव दोनों मेरी और देखकर हंसने लगे, "हम तो चलती सुन्दरी के भी झांटे गिन लेते हैं, फिर ऑटो का नंबर क्या चीज़ है, " ऐंठ लेते हुए  राव साहब बोले|
ऑटोवाला जब लौट कर आया तो हमें यह पता चला कि वह डेलेक होस्पिटल गई है| होस्पिटल की बात सुनकर राव साहब का प्यार और बढ़ गया-बीमार थी इसीलिए बाहर नहीं निकल रही थी| तभी तो मैं कहूँ कि ऐसा कैसे हो गया कि इन दस दिनों में एक बार भी वहां खाना खाने नहीं आई| मैं अभी हॉस्पिटल के लिए निकलता हूँ, वहीं पर उससे मिल लूँगा| यह कहकर जैसे ही राव साहब ने ऑटो के लिए हाथ दिया मास्टर उगवे बोले, "मुझे भी मेकलोडगंज से एक चूरन लेता था, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ|" राव साहब और उगवे दोनों एक ही ऑटो में बैठ कर निकल लिए| मैं दो मिनट तक वहीं खड़ा राव साहब की दीवानगी और मास्टर उगवे की हरकतों के बारे में सोचता रहा-इनको सच में चूरन लेना था, या ये उस लड़की को देखने गए हैं?
शाम को मास्टर उगवे और राव साहब जब लौट कर आए तो पता चला कि इनके पहुंचे से पहले अस्पताल बंद हो गया था| लड़की का कुछ पता नहीं चला| राव साहब दुखी-दुखी से लग रहे थे| मास्टर उगवे का मानना था कि राव हवा में तीर मार रहा है, ऑटो में कोई और लड़की बैठी थी, राव को भ्रम हो रहा है कि वह अहमदाबादी थी| "जिस तरह की लड़की तुम उसको बता रहे हो, उससे मुझे नहीं लगता है कि वह फ्री वाले अस्पताल में जाएगी| या तो तुम झूठ बोल रहे हो, या फिर वो लड़की कोई और थी", उगवे ने राव से कहा| राव के पास कोई उत्तर नहीं था, वे मुंह लटकाए बैठे थे| उनके लटके हुए मूंह से मैंने अंदाज़ा लगाया कि ऑटो वाली लड़की सच में ही अहमदाबादी थी| 
दो दिन बाद, मास्टर उगवे धर्मकोट छोड़ कर चले गए| जाते समय उन्होंने राव से बस इतना कहा, "टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक ...." जवाब में राव साहब ने दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते किया| यह नमस्ते मुझे बड़ा सिम्बोलिक लगा| क्या मास्टर उगवे के जाने के बाद राव साहब का दिन फिरने वाला था? नहीं ऐसा कुछ भी होने वाला था| जैसा कि राव साहब ख़ुद ही कहते हैं, "मेरी तकदीर साली पोपटलाल जैसी है, लगता है यह जनम हंटिंग में ही जाएगी|" 
मास्टर उगवे के जाने के तीन दिन बाद राव साहब को तुषिता में एक कोर्स ज्वाइन करना था-इंट्रोडक्शन टू बुद्धिज्म' दस दिन के कोर्स का 6000 चार्ज था, रहना खाना अंदर ही था| "कोर्स के लिए जाने से पहले मैं बौद्ध भिक्षु की तरह बाल दाढ़ी मुंडवा लेना चाहता हूँ, आप क्या कहते हैं?", राव साहब ने मुझसे पूछा| 'मुंडवा लीजिए, वैसे भी आपने अंत समय में फॉर्म भरा था, बहुत कम चांस है कि आपका इस बार हो पाएगा| वेटिंग में और भी बहुत लोग होंगे| क्या पता भिक्षु वाले लुक से आप का चांस थोड़ा बढ़ जाए', मैंने राव साहब से कहा| "हाँ मैं भी ऐसा ही सोच रहा हूँ, और थोड़ा अहमदाबादी नहीं मिली इस ग़म में भी मैं बाल मुंडवाना चाहता हूँ, " गमगीन होते हुए राव साहब बोले| 
तुषिता के लिए जाने से एक दिन पहले राव साहब बाल और दाढ़ी मुंडवाकर आ गए| एकदम छिले हुए अंडे लग रहे थे| दिव्या उनके नए रूप को देख कर बहुत देर तक हंसती रही थी| मास्टर उगवे ने राव साहब को जो उपनाम दिया था 'बबूचक' उस का अर्थ तो मैं अभी तक नहीं समझा था, लेकिन साहब का नया लुक देखकर यह जरूर समझ आ गया कि गुण के साथ-साथ इस शब्द की अपनी एक शक्ल भी है| 
अगले दिन राव साहब नहा-धोकर तुषिता के लिए निकले| जिस रूम में रह रहे थे उस को खाली करके हिसाब चुकता कर दिया| हम सब से विदा लेकर गिरती बारिश में निकल पड़े| जब राव साहब जा रहे थे, तभी मैंने मकान मालिक के गाय और बछड़े को देखा| गाय अपने जीभ से चाट कर बछड़े को साफ़ कर रही थी| गाय के नवजात बछड़े को देखकर मैं बड़ा हैरान हुआ- बछड़ा एकदम बबूचक दिख रहा था| 

हमसे विदा लेकर जाने के ठीक एक घंटे बाद गिरती बारिश में राव साहब ससामान तुषिता से लौट कर आ गए, "वेटिंग कन्फर्म नहीं हुआ, यह इस साल का आखरी कोर्स था, सो बहुत कम लोगों ने केंसल किया", बैग रखते हुए राव साहब बोले| बल्ब की रौशनी में राव साहब का बेल एकदम चमक रहा था| जो रूम वे छोड़ कर गए थे, वही रूम उन्हें फिर से मिल गया| अपने सामान की ओर इशारा करते हुए मुझसे बोले, "सामान बाँध कर इस सोच में खड़ा हूँ कि जो लोग कहीं के नहीं रह जाते हैं, वे कहाँ जाते हैं?" 
तुषिता से निराश होने के बाद राव साहब का दिल बहुत बैठ गया था, "चलिए आज शाम में बाकसू चलते हैं, मुझे कुछ शोपिंग करनी है| अब मैं दो चार दिन से ज्यादा यहाँ नहीं रुकुंगा| लड़की भी नहीं मिली, इजरायली गच्चा दे गई, अहमदाबादी मिल नहीं रही है, तुषिता में एडमिशन हुआ नहीं, अब किस लिए रुकू मैं यहाँ?" 
शाम को हम तीनों (राव साहब, दिव्या और मैं) बाकसू गए| राव साहब और दिव्या ने शोपिंग की और मैंने जिस सलून में राव साहब ने बेल मुंडवाया था, उसी में बाल ढाढ़ी सेट करवाया| शोपिंग वगैरह करने के बाद पिज़्ज़ा-विज्ज़ा खाकर जब हम धर्मकोट की और लौट रहे थे, एक जगह अचानक से राव साहब जमीन पर लोटने लगे| मैं बड़ा हैरान हुआ इस तरह से नागिन डांस करते मैंने राव साहब को पहले कभी नहीं देखा था| "क्या हो गया इनको?" दिव्या मुझसे पूछी| इस बीच राव साहब उठकर खड़े हुए और बोले, "अहमदाबादी बैठी है उस सामने वाले शॉप में|" ये कह कर वे फिर जमीन पर लोटने लगे| 'इस तरह से जमीन पर लोटने से क्या होगा, जाकर बात कीजिए उससे', हाथ पकड़ कर उठाते हुए मैंने उनसे कहा| "अरे, मैं अब क्या बात करूं उससे", राव साहब अपने सिर और दाढ़ी पर हाथ फेरने लगे| उनका भाव समझ कर दिव्या जोर-जोर से हंसने लगी| अब मैं भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया| "इसी को कहते हैं सर मुंडवाया और ओले पड़े, अब ये बबूचक जैसी शक्ल लेकर क्या मिलूँ मैं उससे | पंद्रह दिन से ढूंढ रहा था तब तो मिली नहीं, अब जब बेल मुंडवा लिया तो मिली है,", राव साहब मुझसे बोले| मुझे पता नहीं क्यों मास्टर उगवे की वो बात याद आ गई जो उन्होंने जाते-जाते राव साहब से कही थी- टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक ....|   
ठीक यही चीज़ कल मेरे साथ हई| जैसे ही मैं आदित्य के रूम से उतर रहा था, उनके मकान मालिक ने मुझे बुला लिया| मेरे लाख मना करने के बाद भी अपनी पत्नी से मेरे लिए चाय बनाने के लिए बोल दिया| बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें चीनी डालने से रोका| फिर जैसे ही हम चाय पी रहे थे, उनकी बेटी एक थाल में मिठाइयाँ लेकर आ गई| थाल में वो सारी मिठाइयाँ थी जो मुझे पसंद है| कुछ देर मैं गौर से मिठाइयों को देखता रहा, पांच महीने बाद एक बार फिर से मुझे मास्टर उगवे की वो बात याद आ गई, जो उन्होंने राव साहब से कही थी, "टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक...."| 
                                            (01-Nov. 2019, 13:52 PM, Delhi) 



नोट- लाल रंग से लिखे सारे वक्तव्य गीत चतुर्वेदी की किताब 'सावंत आंटी की लड़कियाँ' से लिए गए हैं| 

Wednesday, 30 October 2019

महा-प्रयोग डे-1

आज महा-प्रयोग का पहला दिन है| कल शाम पांच बजे मोबाइल फोन बंद कर दिया था| और रात ठीक 10 बजकर 30 मिनट पर सोने चला गया था| शाम को मोबाइल बंद करने के बाद थोड़ी देर किताब (सावंत आंटी की लडकियाँ) पढ़ता रहा, लेकिन एक पॉइंट के बाद मन फोन का इस्तेमाल करने के लिए बेचैन होने लगा| बेचैनी इस बात का सबूत था कि मन मोबाइल फोन का आदी हो गया है| 
प्रयोग के हिसाब से मैं अगले 90 दिनों तक शाम पांच बजे से लेकर सुबह 9:30 तक मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करूँगा| साथ ही लैपटॉप, टीवी और रेडियो इत्यादि का इस्तेमाल भी नहीं करूँगा| दूसरा, रात 10:30 तक सो जाऊंगा| 
कल शाम मोबाइल फोन बंद करने के बाद सकारात्मक बात यह हुई कि दिव्या और मैं बड़ी देर तक सोफे पर बैठ कर बातें करते रहे| मोबाइल फोन के ऑन रहते इतनी लम्बी चर्चा निर्बाध रूप से बहुत कम ही हो पाती है| पीछे मेहसाना में भक्तराज, राव साहब और मैं एक दिन फोन भक्तराज के घर पर छोड़कर सीसीडी (संकूवाटरपार्क) गए थे| शाम 5:00 बजकर 30 मिनट पर हम घर से निकले थे| कोई आधा घंटा हमें सीसीडी पहुंचे में लगा होगा| कॉफ़ी आर्डर करने के बाद हम ब्रह्म-चर्चा में लग गए| शुरू में राव साहब थोड़े बेचैन लग रहे थे, उनकी चिंता यह थी अगर इस बीच उनकी होने वाली गर्लफ्रेंड ने मेसेज कर दिया तो क्या होगा-क्या वह इस बात को सहज रूप से स्वीकार कर पाएगी कि उसके मेसेज का राव साहब ने आनन-फ़ानन में जवाब नहीं दिया? भक्तराज और मुझे कोई तीस मिनट लगा राव साहब को सहज करने में- आप समझिये चौबीसों घंटे ढेल की तरह अगर आप उसके लिए बिछे रहेंगे तो वो कभी आपसे नहीं पटेगी| लड़कियां ऐसे लड़कों को कभी पसंद नहीं करती है जिसके पास कोई रीढ़ ना हो| जब हमने ऐसे अजीबों-गरीब कोई पचास तर्क दिए तब राव साहब थोड़े रिलैक्स हुए| हम (भक्तराज और मैं) दोनों इस बात से बहुत ही हैरान थे कि इस सदी में मोबाइल से दूर होने पर भी आदमी को सदमा लग सकता है|
हम तीनो में से किसी के भी पास घड़ी नहीं थी, सो हमें टाइम का कुछ पता नहीं चला| और हमने किसी से पूछा भी नहीं| हम अपने-अपने ढंग से ब्रह्म की व्याख्या करने में इतने तल्लीन थे कि कब शाम ढली और कब रात हुई हमें किसी भी चीज़ का कुछ पता नहीं चला| जब सीसीडी वाला भाई दूबारा आर्डर देने के लिए हमसे कहने आया, तब हमें अंदाज़ा लगा कि शायद हम बहुत देर से बैठे हैं|
घर पहुँच कर जब हमने समय देखा तो हम तीनो हैरान होने से ख़ुद को नहीं रोक पाए| रात के 11:00 बज रहे थे| मतलब अगर आने-जाने के एक घंटा को निकाल दिया जाए, तो हमने 4 घंटे से भी ज्यादा सीसीडी में ब्रह्मचर्चा करते हुए बिताया| अगर बिना घड़ी देखे कोई हमसे पूछता कि हम कितनी देर सीसीडी में बैठे थे, तो हम अंदाज़े से दो घंटे से ज्यादा नहीं बता पाते| हमें दो घंटे बोलते हुए भी डाउट ही होता| 

मोबाइल के इस्तेमाल को सिमित करने और सोने का समय तय करने के अलावा मैंने भोजन को भी महाप्रयोग में शामिल किया है| आज से तीन महीने के लिए मैं सफ़ेद, चीनी, गेंहू और दूध का सेवन बिलकुल बंद कर रहा हूँ| अभी तक मौका-बेमौका चीनी और दूध का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सेवन कर लेता था, लेकिन अब वो भी बंद कर रहा हूँ|    
मोबाइल का इस्तेमाल, सोने का तय समय और भोजन में मामूली सुधार लाने के अलावा और किसी चीज़ को बदलने पर मेरा कोई विशेष ज़ोर नहीं है| अगर कुछ अपने आप सजह रूप से बदलता है तो ठीक, वर्ना प्रयास से मैं किसी भी चीज़ में बदलाव नहीं लाना चाहता हूँ| 
जब से दिल्ली आया हूँ तभी से रोज़ सुबह उठ कर पार्क जाने की सोचता था और टाल देता था| रात लेट सोने की वजह से सुबह उठने में देर हो जाती थी| सुबह के पार्क जाने को शाम पर टाल देता था, और शाम आते-आते उसे अगली सुबह पर| लेकिन कल रात ठीक समय पर सो जाने की वजह से, आज सुबह जल्दी नींद खुल गई| नित्यकर्म से फ़ारिग होने के बाद बड़ी देर तक किताब (गीत चतुर्वेदी की सावंत आंटी की लड़कियां) पढ़ते हुए पौ फटने का इतज़ार करता रहा| बहुत दिन बाद किताब पढ़ते हुए ऐसी शान्ति अनुभव किया| 
अपने मुंबई, दाहोद और मेहसाना निवास के दौरान निरंतर वाक करते रहने की वजह से मैं बहुत ही सुगमता के साथ तेज गति से चल पा रहा था| काफी दिनों से निष्क्रिय रहने की वजह से दिव्या उतनी सुगमता से तेज़ नहीं चल पा रही थी| नतीजतन, मुझसे पीछे न रह जाए इसलिए, बीच-बीच में उसे दौड़ना पड़ता था| मुझे अपनी याद आ गई, बम्बई में ठीक ऐसी ही हालत मेरी थी| सर (पवन श्रीवास्तव) बहुत तेज चलते हैं, उनके साथ वाक करते समय मैं अक्सर पीछे छुट जाता था| मुझे तेज चलाने के लिए, सर कोई कई बार मुझे धक्का मारना पड़ता था| मैं सोचा करता था-इतनी तेज़ चलने तो अच्छा है कि दौड़ ही लूं| 
सुबह वाक पर जाने के अलावा एक और चीज़ जो सहज रूप से घट रही है, वह है 'लिखना'| एक अरसे से मेरा लिखना बंद हो गया था| आज बड़े ही सहज ढंग से यह फिर से शुरू हो गया है| आगे मेरी कोशिश यही रहेगी कि आने वाले 90 दिनों में महा-प्रयोग के जो भी छोटे-बड़े परिणाम होंगे उनसे आपको अवगत कराता रहूँ| 
                                                (दिल्ली- 31-10-2019, 12:08 PM)


सब एक वर्तुल में घूम रहा है

17-Oct. 2019 (Mehsana Aashram)
अनिरंतरता को छोड़ कर जीवन में कुछ भी निरंतर नहीं है, और मेरा जीवन इसका अपवाद नहीं है| चाहे वह लिखना, पढ़ना, घूमना या फिर फोटोग्राफी करना हो, सब कुछ एक मौसम की तरह जीवन में आता-जाता रहता है| एक मुझे छोड़कर जीवन में सब कुछ परिवर्तनशील है| धर्म-अधर्म, सुख-दुःख सब मन के मेहमान बन कर आते-जाते रहते हैं| शरीर भी अपने धर्म से नित बदल रहा है| बदलाब के इस भयंकर झंझावात में विश्व-साक्षी को छोड़कर सब एक वर्तुल में घूम रहा है|

इसी साल फरवरी में जब मेहसाणा को अलविदा कहा था तब यह सपनों में भी नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी फिर से लौट कर इस अंजुमन में आना होगा| आश्रम के गेट पर कदम रखते ही एक शेर, जो राधेश्याम स्वामी जी हर शिविर के अंत के सुनाते हैं, याद आ गई, “यह मय-कदा है ओशो का, हम सब यहाँ के रिंद है, जो जरा-सी पी कर बहक गया, उसे मय-कदे से निकाल दो, यही मय-कदे का निज़ाम है”, इस शेर के साथ ही वो एक बार यह लाइन जरूर दोहराते है, “इस अंजुमन में आपको आना है बार बार दीवार-ओ-दर को गौर से पहचान लीजिये”
मुंबई में करीब महिनाभर बिताने के बाद पांच दिन दाहोद में रहा| और अभी पिछले तीन दिनों से ओशो मनन नियो सन्यास कम्यून, मेहसाणा में हूँ| 2017 के दस जनवरी को, पूरा दो साल दो महीना रहने के बाद, आश्रम छोड़ा था| आश्रम में सबकुछ वैसे ही चल रहा है, जैसे पहले चलता था| थोड़ा-बहुत अगर कुछ बदला भी तो वो इतना गौण है कि उसकी वजह से बदलाब महसूस हो नहीं रहा है| ऐसा लग रहा है, दो साल पहले शतरंज की चाल को जहाँ पर छोड़ गया, वह आज भी वहीं है| एक-दो मोहरे जरूर बदल गए हैं, लेकिन राजा, मंत्री, ऊंट, और घोड़ा अपनी जगह पर ही हैं| वेलकम में घुसते ही अरविन्द स्वामी की और राबिया के पास से गुजरते हुए शिवाजी की बहुत याद आई|
आश्रम में प्रवेश करने के दो घंटे के बाद मैं यह भूल ही गया कि दो साल के लम्बे अन्तराल के बाद यहाँ आया हूँ| अगर रूप के पीछे छिपे अरूप से हम थोड़े-बहुत भी परिचित हों, तो समय के बोध से पूर्णतया मुक्त हुआ जा सकता है| समय, शरीर, मन, सुख, दुःख जीवन, मृत्यु, धर्म, अधर्म, माया, बन्धन, मुक्ति यह सब एक ही चीज़ के अलग-अलग नाम हैं|
आश्रम का पहला दिन इधर-उधर चक्कर लगाने, पुराने मित्रों से मिलने व जय-भगवन के साथ चर्चा करने में बीता| आज का दिन वैसा ही बीता जैसा मैं चाहता था| आश्रम आने से पहले मैंने तय किया था कि I will underplay, वही कर रहा हूँ| सालों बाद नितांत अकेले होने का अवसर मिला है, इस अवसर को मैं निम्बू की तरह नीचोड़ लेना चाहता हूँ| बिल्कुल लोड-फ्री होकर आश्रम में रह रहा हूँ|

मुंबई से समय ने मुझे ऐसे खींचकर अलग किया जैसे आदमी खून चूस रहे जोंक को अपने से अलग करता है| मुंबई का एक महीना बहुत ही सुख और चैन से गुजरा| 7 महीने की लम्बी यात्रा के बाद मैं जैसा समय बिताना चाह रहा था, वैसा मुंबई में रहते संभव हो पाया| सुस्त-सुस्त सा दिन, लम्बी राते, समंदर की ठंडी हवा, शाम को सर के साथ टहलना, फिल्म देखने जाना, बाज़-औक़ात सर, भाभी या फिर मुकेश जी के साथ ब्रह्म-चर्चा कर लेना, मेरे थके शरीर और यात्रा से ऊबे मन के लिए स्वाति की बूंदों जैसा था|
जोंक को अपने शरीर से अलग करने के बाद आदमी उसके मुंह पर नमक या तम्बाकू का पानी रख देता है| उस नमक के बाद जोंक खून की उलटी करके मर जाता है| लेकिन, समय ने मेरे साथ ऐसी बेरहमी नहीं की, उसने मुंबई से अलग करने के बाद मेरे मुंह पर शहद रख दिया| मुंबई से दाहोद आते समय वरोदरा स्टेशन पर स्वामी Atmo Govind Indachi से मिलना सडन सतोरी जैसा था| उस झटके से उबरने में मुझे काफी वक्त लगा| आत्मो का स्टेशन पर आना जितना अप्रत्यासित था, उनता ही उनका मेरे लिए थर्मस में भरकर चाय, सेब, और मेरे लिए कपड़े लाना था| अगर कुछ नोन था तो वो जाने से पहले उनका सेल्फी लेना| इस तरह से स्टेशन पर आकर इतने भावपूर्ण होकर मिलना आत्मो जैसे भक्त-हृदय व्यक्ति के लिए ही संभव है| अध्यात्म की दृष्टि से साधकों के दो प्रकार हैं- एक वे जिनका बेसिक मन बनिये का है, लेकिन लगे वे ध्यान, योग और भक्ति साधना में हैं| दूसरा वे जिनक बेसिक मन अध्यात्मिक हैं, लेकिन वे लगे हैं सांसारिक जोड़-घटाओ करने में| आत्मो दूसरे प्रकार में आते हैं| आत्मो आश्रम ना रहते हुए भी सदा आश्रम में हैं| मैं उनके दूकान पर भी गया हूँ, उन्होंने अपने दुकान और घर सब को आश्रम बना रखा है| और मैं ऐसे भी बहुत से लोगों को जानता हूँ, जिन्होंने आश्रम में दूकान सजा रखी है|
मेहसाणा पहुँच कर बिना मोबाइल फ़ोन के राव साहब और भक्त राज के साथ वार्टर पार्क वाले सीसीडी पर चार घंटे तक कॉफ़ी पर चर्चा करना बहुत ही पारलौकिक रहा है| दाहोद में मास्टर उगवे के साथ और रनत महल में स्वामी Ketan Raval के साथ बिताए गए पल और ब्रह्म-चर्चा बहुत ही आल्हादकारी रहा| स्वामी Anand Magan जी के यहाँ का भोजन इतना तृप्तिदायक था कि नाभि से सहज ही 'अन्नं ब्रह्म-अन्नम ब्रह्म' की नाद उठने लगता था| केतन स्वामी के हाथ की खिचड़ी भी अभूतपूर्व थी| दाहोद के गुलाब जामुन का स्वाद मैं अभी भी अपने मुंह में महसूस कर सकता हूँ| मास्टर उगवे के साथ बाऊका तंत्र मंदिर और काली डैम पर बिताया गया समय भी ज़ेहन पर अमिट छाप छोड़ गया है| सुबह उठकर सात बंगले तक टहलने जाना और फिर लौट कर बीरबल चाय वाले के यहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर मास्टर उगवे और उनके दोस्तों के बीच हो रही खुशगप्पियों की नशिस्त का मौन दर्शक बनने का अनुभव भी बहुत ही मजे का था|
कल सुबह आश्रम आने से पहले भक्त राज और राव साहब के साथ ‘बर्ड फोटोग्राफी’ भी काफी एन्जॉय किया| मेहसाना में जैसे भक्त राज, राव साहब और मेरी जोड़ी बनती है, वैसे ही मुंबई में सर, मुकेश जी, और मेरी जोड़ी बन गई थी| और दाहोद में जब मास्टर उगवे, स्वामी आनंद मगन हम एक ही बाइक पर बैठ कर रतनमहल जा रहे थे, तब मुझे राव साहब और भक्त राज के साथ की गई गोवा की ट्रिपलिंग याद आ गई| भक्त राज हमारी जोड़ी को ‘त्रिफला’ बुलाते हैं|
मेहसाणा से निकल कर मेरा भोपाल जाने का प्लान था, लेकिन अभी यहाँ इतना मजा आ रहा है कि भोपला जाने का प्लान मैंने टाल दिया है|

Friday, 6 September 2019

‘आत्मा की बात’(बेंगलोर डायरी)

सुख के गीत गाता हूँ, आनंद की बातें करता हूँ, इसका यह मतलब नहीं है कि जीवन के दुखों से, ग़रीबों की पीड़ाओं से, बीमारों की आँसुओं से, स्त्रियों की आहों से, अबलाओं की चाहों से अपरिचित हूँ। सबके प्रति सजग हूँ, जागरुक हूँ और जितना जागरुक हूँ उससे ज़्यादा होने की कोशिश में निरंतर लगा रहता हूँ। 
ख़ुद की सीमाओं और पाखंडों का भी बोध है मुझे। ख़ुद के भीतर कथनी और करनी का जो भेद है, उससे भी भली भाँति परिचित हूँ। 
ध्यान और अहिंसा की बातें कर लेता हूँ, फिर किसी होटल में जाकर मछली और मुर्ग़ा खा लेता हूँ। सादा जीवन पर एक घंटा लेक्चर दे देता हूँ, फिर चार हज़ार की जींस ख़रीद लेता हूँ। इसी तरह की हज़ार विरोधी तत्वों को ख़ुद के भीतर पाता हूँ। राम और रावण को एक साथ अपने भीतर सक्रीय पाता हूँ। कभी कोई घट जाता है, तो कभी कोई बढ़ जाता है, लेकिन मौजूद हमेशा दोनों होते हैं। एक पूरी भीड़ है मेरे भीतर, अगले क्षण मैं क्या करूँगा, या फिर मुझसे क्या हो जाएगा, इसका मुझे कुछ भी पता नहीं होता है। कल तक जिस चीज़ का विरोध कर रहा था, हो सकता है आज उसकी पूजा करने लगूँ। बहुत ही अजीब है सबकुछ।

इन दिनों, जब भी ज़रूरत से ज़्यादा सुख-सुविधाओं में ख़ुद को पाता हूँ, अंदर से बेचैन होने लगता हूँ। मुझे उन मासूम बच्चों की तस्वीरें दिखने लगती हैं, जो रोड किनारे भूख से बिलखते रहते हैं। रेल की पटरियों के किनारे जलती धूप में प्लास्टिक की छतों के नीचे सोये लोगों की याद आने लगती है। अस्पताल के बाहर बिना इलाज के दम तोड़ते मज़दूरों के चेहरे दिखाई पड़ने लगते हैं। हवस की शिकार स्त्रियों की चीख़ें सुनाई देने लगती है। बहुत सोचता हूँ इन सब के बारे, क्या हो सकता क्या किया जा सकता है, इसके बारे में अपने क़रीबी मित्रों से बातें करता हूँ, उनके साथ घंटों बहस करता हूँ। अपने लेवल पर जितना कर सकता हूँ उतना करने की कोशिश करता हूँ। बिजली की बचत करता हूँ, पानी बचाता हूँ, पलस्टिक का इस्तेमाल बहुत कम करता हूँ, बच्चा पैदा नहीं किया है, पेड़ लगाता रहता हूँ, खाना खाते समय सजग रहने की कोशिश करता हूँ, और ऐसी ही बहुत सी चीज़ें हैं जो करता रहता हूँ। लेकिन बहुत गहरे में जानता हूँ कि इस सबसे कुछ नहीं बदलेगा। 
मैं यहाँ घर में पानी और बिजली बचाता हूँ, और वहाँ बड़े-बड़े शोपिंग भवन में दिन दहाड़े हज़ारों लाइटें जल रही होती है। मैं पैदल चलता हूँ, और लोग महँगी कारों से तीन किलोमीटर जाने में एक लीटर पेट्रोल जला देते हैं। 
किसी भी क्रांति या आंदोलन से इस दुनिया को ठीक नहीं किया जा सकता है। जितना सोचता हूँ उतना पाता हूँ कि आध्यात्मिक समझ के अलावा इस दुनिया को और ख़ुद को किसी भी चीज़ से ठीक नहीं किया जा सकता है। आज अगर मैं ख़ुद के दोषों को देख पा रहा हूँ, उन्हें स्वीकार कर पा रहा हूँ, तो सिर्फ़ इस लिए कि मेरे भीतर होश का एक छोटा-सा दिया टिमटिमाने लगा है। 
जब तक होश का यह दिया कम-से-कम दुनिया के ३३ फ़ीसदी लोगों के भीतर नहीं जलने लगता है। इस पृथ्वी पर स्वर्ग को नहीं उतारा जा सकता है। धर्म आख़री विकल्प है। धर्म से मेरा मतलब हिंदू धर्म या इस्लाम धर्म या ऐसे ही किसी अन्य धार्मिक परंपरा और संगठन से नहीं है। धर्म से मेरा मतलब बोध की उस अवस्था से है, जब हम यह जान लेते हैं कि हमारा कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है। जब तक हमारे भीतर से ‘मैं और तू’ का भेद नहीं मिट जाता है, तब तक हम विरोधाभासों और पाखंडों से ख़ुद को नहीं बचा सकते हैं।

इमरोज मेरी दृष्टि में शरीर हैं! साहिर आत्मा और अमृता मन।

कल अमृता प्रीतम के बारे कुछ लिखना चाह रहा था। लेकिन उनकी वो दो किताबें जो मैंने पढ़ी है, उन में से एक का नाम याद ही नहीं आया। अभी भक से दूसरा नाम याद आ गया- मन मिर्ज़ा, तन साहिबा! इसके अलावा ‘रसीदी टिकट’ मैंने पढ़ी है, कुछ कहानियाँ भी पढ़ी है। मेरे एक मित्र ने तीन साल पहले अमृता प्रीतम की 17 किताबें मुझे गिफ़्ट की थीं। अभी तक उनमें से एक भी नहीं पढ़ी है। उनकी आत्मकथा मुझे कुछ ख़ास नहीं लगी थी-रसीदी टिकट कुछ ख़ास होती भी नहीं है। इस अर्थ में किताब ने मुझे बहुत प्रभावित किया। साहिर-अमृता और इमरोज में शरीर, मन और आत्मा जैसा भेद दिखा। इमरोज मेरी दृष्टि में शरीर हैं! साहिर आत्मा और अमृता मन। 
इमरोज का व्यक्तित्व मुझे हमेशा से आकर्षित करता है। रात को एक बजे उठकर चाय बनाना-किसी साधना से कम नहीं है। अमृता की छायावादी लेखन से इमरोज का चायवादी होना मुझे ज़्यादा प्रभावित करता है। जैसे थीयो के बिना मैं वानगोग के अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकता हूँ, वैसे ही इमरोज के बिना अमृता नहीं हो सकती हैं।

Thursday, 5 September 2019

जीवन के सभी सुख विकल्पों से आते हैं!


मुसलसल मसाफ़त से बहुत थक गया हूँ| और शहरों की तरह बेंगलोर भी बहुत आपाधापी वाला शहर है| बड़े शहरों की बेचैनी मुझे अच्छी नहीं लगती है| आश्रम से निकलने के बावजूद भी दो साल मेहसाणा में सिर्फ इसलिए टिक गया क्योंकि वहां सब-कुछ बहुत ठहरा-ठहरा-सा है| इस साल अभी तक जितनी भी यात्राएं की है, उसमे पोंडिचेरी मुझे सबसे अच्छा लगा| सिक्किम में ठहराव तो बहुत था, लेकिन सुविधाएँ कम थी| हम एक गाँव में रुके हुए थे| सबकुछ बहुत ही उत्तम और सुन्दर था, लेकिन खाना बनाने की आजादी नहीं थी| हम जिनके यहाँ रुके थे उन्ही के यहाँ खाना खाने के लिए हम वाध्य थे| गाँव में कहीं कोई भोजनालय वगैरह नहीं था| 
जिनके यहाँ हम रुके थे वे बहुत ही अच्छा, परंपरागत, और आर्गेनिक खाना बेहद प्यार से खिलाते थे| लेकिन, जबतक नर्क का विकल्प मौजूद ना हो, स्वर्ग दो कौड़ी का लगता है| जीवन के सभी सुख विकल्पों से आते हैं| जीत आपको तभी ख़ुशी देती है, जब आपको यह पता होता है कि आप हार भी सकते थे| अगर कभी ऐसा हो जाए कि आपका हारना असंभव हो जाए, तो तत्क्षण जीत का सारा गौरव और सौदंर्य विलीन हो जाएगा| मिसेज दोरजी के उत्तम-से-उत्तम भोजन का स्वाद हमें फीका लगने लगा था, क्योंकि हमारे पास उन भोजनों के अलावा और कोई विकल्प नहीं था| हम यह भी नहीं तय कर सकते थे कि आज हमें क्या खाना है, किसी के घर में मेन्यु नहीं होता है| कितने बजे खाना है, हम ये तय करने के लिए भी स्वतंत्र नहीं थे| ऐसा भी नहीं था कि हमारे निवास पर खाना पहुँचा दिया जाए, और हमें जैसे मर्जी हो हम खा लें| हमें प्रॉपर उनके डाइनिंग हॉल में जाना पड़ता था, 20 तरीके के पकवानों से टेबल सजा होता था| भोजन के दौरान हमें अकेला भी नहीं छोड़ा जाता था, बात करने के लिए हमेशा कोई न कोई मौजूद होता था| हमारे यहाँ दामाद की जैसी खातिरदारी होती है, वैसी ही खातिरदारी हमारी हो रही थी| तीन-चार दिन बाद हम सुख-सुविधा और उत्तम मेहमानवाजी से इतने उब गए कि लताड़े जाने, उपेक्षित होने, अनअटेंडेड छोड़े जाने के लिए तरसने लगे| पहली बार मुझे ऐसा लगा कि गरीबी से ज्यादा ख़तरनाक अमीरी होती है| दुःख की अतिरेकता को सुख की उम्मीद में काटा जा सकता है, लेकिन सुख की अतिरेकता से बच कर कहाँ जाए आदमी| एक पॉइंट के बाद सुखी आदमी के लिए आत्महत्या के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है|
मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं अपने किसी बहुत ही अमीर रिश्तेदार के यहाँ मेहमान हूँ| सब कुछ टॉप क्लास का था, लेकिन फिर भी दो-तीन दिन के बाद सब कुछ बोझ जैसा लगने लगा| हम पैसा पे कर रहे थे, फिर भी भूटिया फेमली के एहसानों तले दबे जा रहे थे| राव साहब कुछ ज्यादा ही दब गए थे| मिसेज दोरजी जब कभी भी चाय लेकर आती, और तिबतन स्टाइल में दोनों हाथों से कप को उठा कर माथे के पास ले जा कर हमारे सामने रखती थीं, तो राव साहब एकदम से जमीन पर बिछ जाते थे| बाद में तो राव साहब हमेशा बिछे-बिछे से ही रहने लगे| एक शाश्वत मुस्कान जो उनके चेहरे से हमेशा चिपकी रहती थी, भूटिया परिवार के किसी सदस्य को देख कर और भी चौड़ी हो जाती थी| मेरी और दिव्या की हालत भी कुछ-कुछ राव साहब जैसी ही थी, लेकिन ‘हम इस सबके लिए पैसा पे कर रहे हैं’ सोच कर हम दोनों ज़मीन पर फैलने से ख़ुद को थोड़ा बचा लेते थे| 
सुविधा के साथ अगर थोड़ी भी स्वतंत्रता होती तो, सिक्किम यात्रा को मैं सबसे ऊपर रखता| धर्मकोट में स्वतंत्रता और सुविधा दोनों थी, लेकिन दोनों की मात्रा बहुत कम थी| दोनों में से यदि एक को भी बढ़ाने की सोचो तो कीमत आसमान छू लेती थी| नेपाल में चूँकि हम आश्रम में ठहरे थे, इसलिए उसको लेखाजोखा में शामिल करना मैं ठीक नहीं समझता| एक आश्रम की तुलना सिर्फ दूसरे किसी आश्रम से हो सकती है| आश्रम का शहर से कोई लेना-देना नहीं होता है| इसलिए इस साल की पोरबंदर यात्रा के बारे में भी यहाँ बात नहीं करूँगा| पुणे के बारे में भी यही हाल है| दिल्ली को मैं बस बेस-कैंप मानता हूँ| इसीलिए बात सिर्फ सिक्किम, धर्मकोट, पोंडिचेरी, त्रिरूवन्नामलाई और बेंगलोर की हो सकती हैं| इन पांच जगहों में पोंडिचेरी को में 10 में से 10 स्टार दे सकता हूँ| सब कुछ इतना सही और सटीक था, कि इससे ज्यादा की आप मांग ही नहीं कर सकते हैं| सुख, दुःख, सुविधा और स्वंत्रता का ऐसा सुन्दर समन्वय इससे पहले मैंने कहीं और नहीं जाना था|

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...