Saturday, 2 May 2020

किताब-ए-मिरदाद (तब्सिरा)



किताब का नाम- 'किताब-ए-मिरदाद, लेखक-मिखाइल नईमी

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में अपने दस सबसे अधिक पसंदीदा किताबों की फ़ेहरिस्त साझा की है। उसमें से दो किताबों का नाम मुझे अभी याद है-महापण्डित राहुल सांकृत्यान की बौद्धचर्या' और लीयो टोलस्टोय की युद्ध और शांति। 'बैद्धचर्या' को लिस्ट में उन्होंने सबसे ऊपर और 'युद्ध और शांति' को सबसे नीचे रखा है। अगर मुझे कभी कोई ऐसी लिस्ट बनानी हो, तो मैं सबसे ऊपर मिखाइल नईमी की किताब-ए-मिरदादलिखूँगा, और फिर नीचे दस तक सेम ऐज़ अववलिख दूँगा।
दो साल से ऊपर हो गये मुझे तब्सिरालिखते हुए, लेकिन मिरदाद के संबंध में अब तक मैं मौन रहा हूँ। और मैंने तय किया था कि इस मौन को कभी नहीं तोड़ूँगा, लेकिन कल फेसबुक पर एक मित्र ने इस किताब का ज़िक्र छेड़ दिया, उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की है कि मैं बूक ऑफ़ मिरदादके बारे में लिखूँ।
मैं कल से ही बड़ी असमंजस में हूँ, आख़िर लिखूँ तो लिखूँ क्या...? मिरराद पर अगर कुछ बोलना हो, तो भीतर बुद्ध-सी गहरी मौन, और बाहर अल हल्लाज़ मंसूर सी मुखरता चाहिए। और यह बहुत ही दुर्लभ संयोग है, दो में से एक को साधना तो आसान है, लेकिन दोनों को एक साथ साध लेना, ‘एक अचंभा मैंने देखा नदिया लागी आग’ जैसी घटना है| इसीलिए इतने दिनों से चुप था|
‘मिरदाद’ पर सिर्फ़ लिखने से काम नहीं चल सकता है। इतने सालों का मौन सिर्फ लिखने से नहीं टूट सकता है| शब्द बहुत ही निर्बल हैं, मौन को तोड़ने के लिए| जब तक कि आप मेरे सामने न हों, और मैं चीख-चीख कर आपसे इस किताब के बारे में न कह  लूं, तब तक न तो आप इस किताब की महिमा को समझ पाएँगे, और न ही मुझे अभिव्यक्ति के बाद जो सहज तसल्ली मिलती है, वो मिलेगी|
खैर, आज कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ, तुतलाते हुए ही सही, आज कुछ बोलूँगा जरूर| मेरे आश्रम प्रवास के दौरान (2014 के 10 नवम्बर से लेकर 2017 के 10 जनवरी तक) , किसी ने मुझे किताब ए मिरदादपढ़ने को दी थी। मुझे याद है दिन भर किताब पढ़ने के बाद शाम को, संध्या सत्यसंग से पहले, ज़ोरबा (आश्रम का टी-शॉप) पर ग्रीन-टी पीने के लिए बैठता था| मेरी जगह तय थी, कैश काउन्टर के सामने खम्भे से सट कर, गर्मी के दिनों में दादी हौवा के ज़माने का एक पंखा सर पर घूमता रहता था, सामने हाईवे पर आती-जाती गाड़ीयों को मैं अपनी जगह से देख सकता था, पर्वत स्वामी मेरी सीट को व्यास सीट बोलते थे| वहीं टेबल पर मेरे पास दो-चार और सन्यासी बैठ जाते थे, फिर चाय पर चर्चा शुरू होती थी| मैं किताब-ए-मिरदाद पर बोलना शुरू करता था| बोलते समय मैं बिलकुल आविष्ट हो जाता था, लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे| मेरी बातें सुन-सुनकर आश्रम में किताब पढ़ने की होड़ मच गयी| कई लोगों ने किताब मंगवाई, कईयों ने मुझसे उधार मांग कर पढ़ी| जिस सन्यासिन ने मुझे वो किताब पढ़ने को दी थी, अचानक उनकी पूछ बढ़ गई, हर कोई उनसे वो किताब मांगने लगा| मजा ये था कि मुझे देने से पहले उन्होंने ख़ुद भी वो किताब नहीं पढ़ी थी| अब उनको भी किताब पढ़ने की जल्दी थी| इसी होड़ में दिव्या ने एक ही रात में पूरी किताब पढ़ डाली| जिसके पास ही किताब जाती थी, उसी पर उसे जल्दी ख़त्म करने की प्रेशर बनने लगता था| कई लोग किताब के लिए आपस में लड़ भी लिये| ऐसा कोई दो महीने तक चला था|
होड़ भले ही दो महीने तक चला हो, लेकिन उसका प्रभाव बहुत ही दूरगामी रहा था| 6 महीने बाद मेरे जन्म दिन पर दिव्या ने मुझे ‘किताब-ए-मिरदाद’ गिफ्ट की| मुझे याद गिफ्ट-रैप हटा कर जैसे ही मैंने कितबा को देखा, ख़ुशी के मारे पागल हो गया, जैसे आर्थर शोपनहावर उपनिषद को अपने सिर पर रख कर नाचे थे, वैसे ही मैं 'बुक ऑफ़ मिरदाद' को सर पर रख कर नाचने लगा था| दिव्या को पता था कि ‘हिंदी वर्शन’ पढ़ कर मैं बहुत खुश नहीं था, एक बार मैं किताब को अंग्रेजी में पढ़ना चाहता था| हिंदी अनुवाद बहुत ही पुअर था| अनुवाद में अक्सर आत्मा चली जाती है, और भाषाओं का तो मुझे पता नहीं, लेकिन किसी भी किताब का हिंदी अनुवाद पढ़कर मुझे ऐसा ज़रूर लगता है|
उस दिन से लेकर आज तक ‘बुक ऑफ़ मिरदाद’ मेरा पाथेय बना हुआ है| कुछ दिनों के अन्तराल पर, एक बार किताब को ज़रूर पलट कर देख लेता हूँ| जब भी लगता है अपना पता भूल गया हूँ, एक बार मिरदाद से पूछने चला जाता हूँ| अक्सर ख्वाबों में नरौन्दा की जगह ख़ुद को मिरदाद के श्री चरणों में बैठा हुआ देखता हूँ|
किताब से कोई भी ‘कोट’ यहाँ शेयर नहीं करूँगा| इसके पीछे दो वजूहात हैं- एक यह कि मैं तय नहीं कर पा रहा कि क्या शेयर करूं, और क्या न करूं| किताब का हर वाक्य एक महावाक्य है| यही दिक्कत मैंने किताब पढ़ते समय भी महसूस की थी| मुझे हाईलाइटर साथ में रख कर किताब पढ़ने की आदत है| पढ़ते समय अगर कुछ महत्वपूर्ण लगता है तो उसे मैं अंडरलाइन कर देता हूँ| लेकिन, दो ऐसी किताबें हैं जिनके दो-तीन पृष्ठों पर ही मैंने अंडरलाइन किया है| एक ‘किताब-ए-मिरदाद’ और दूसरा जे कृष्णमूर्ति की ‘सद्गुरु के चरणों में (At the feet of the master)’, इन दोनों किताबों में एक भी ऐसा वचन नहीं है, जो कोहिनूर से कम वैल्यू का हो, इन फैक्ट जो जानते हैं, उनके लिए इन वचनों के सामने कोहिनूर की चमक भी फीकी है|

किताब के पहले ही पृष्ठ पर मिखाइल ने पाठकों को चेताया है, यह है किताब-ए-मिरदाद’ उस रूप में जिसमें उसके (मिरदाद के) सबसे छोटे और विनम्र शिष्य नरौंदा ने लेखनीबद्ध किया| जिनमे आत्म-विजय के लिए तड़प है, उनके लिए यह आलोक-स्तम्भ और आश्रय है| बांकी सब इससे सावधान रहें|” मैं भी आपसे यही कहूँगा, अगर आपको अपने सपनों से प्रेम है, और नींद अच्छी लगती है, तो इस किताब से सावधान रहिये| यह किताब नहीं डायनामाइट है| इसका धमाका सिर्फ आपके शरीर को ही नहीं, आपके मन और आत्मा दोनों को उड़ा देगा| इस किताब से डरिये, और जिन्होंने यह किताब पढ़ रखी हो उनसे बच कर रहिये| 
            यही मेरी आपसे विनती है| Please don't read this book. संत पल्टू के इस महावाक्य को हमेशा याद रखिये" अजहूं चेत गंवार-
जीते जी मरि जाय, करै ना तन की आसा।
आसिक का दिन रात रहै सूली उपर बासा।।
मान बड़ाई खोय नींद भर नाहीं सोना।
तिलभर रक्त न मांस, नहीं आसिक को रोना।।
पलटू बड़े बेकूफ वे, आसिक होने जाहिं।
सीस उतारै हाथ से, सहज आसिकी नाहिं।
 -इक्क्यु केंशो तजु

Friday, 1 May 2020

और स्त्री पुरुष में शिव के भाव को आरोपित करें

'तंत्र साधना सूत्र-2'
21 दिन बाद, साधना के लिए दिन का एक निश्चित समय तय करें|
साधना में बैठने से पहले दोनों पार्टनर का स्नान करना ज़रूरी है| स्नान करने के बाद, कोई ढीला सूती वस्त्र पहने, फिर 20 मिनट ध्यान में बैठें| ध्यान करते समय आप दोनों को आमने-सामने बैठना है| तीन चरण में ध्यान करें, पहला पांच मिनट भाव करें कि आपका शरीर शिथिल हो रहा है, दूसरा पांच मिनट भाव करें कि आपकी साँसे शांत हो रही है| तीसरा पांच मिनट भाव करें कि विचार शांत हो रहे हैं| अंत में पांच मिनट सिर्फ मौन में अडोल बैठे रहें| समय का बोध रहे, इसके लिए आप कोई ऐसा संगीत बजा सकते हैं, जो हर पांच मिनट पर बदलता हो|
ध्यान के बाद, दोनों पार्टनर हाथ जोड़ कर एक दुसरे को प्रणाम करें| पुरुष स्त्री में शक्ति/देवी के भाव को आरोपित करे, और स्त्री पुरुष में शिव के भाव को आरोपित करें|
पहला दिन-
पुरुष को मसाज करना है| अपनी पत्नी/प्रेमिका को बेड पर पेट के बल लिटा दें (बिस्तर एक दम साफ़-सुथरा और पवित्र होना चाहिए)| वस्त्र नहीं उतारना है| कोई सुमधुर संगीत बजा लें| अगर संभव हो तो साधना के लिए ऐसा कमरा चुने जो बहुत भरा हुआ न हो| कमरा जितना खाली होगा, साधना के लिए उतना सही है|
स्त्री के पैरों से शुरू करें, पहले दस मिनट पैर के पंजों से लेकर घुटनों तक का मसाज करें| फिर कमर से लेकर गर्दन तक| फिर दोनों हाथों का| अंत में स्त्री के सिर में तेल लगा कर सर का मसाज करें| जब पूरी प्रक्रिया समाप्त हो जाए, तब एक दुसरे को प्रणाम करके, अहोभाव प्रगट करें और कमरे से निकल जाए|
नोट- पहले दिन, स्त्री पुरुष में से कोई भी वस्त्र नहीं उतरेगा...मसाज के दौरान स्त्री के ....................,,,,,,,नहीं छूना है| और सिर्फ 20 मिनट मसाज करना है|
दूसरा दिन-
आज फिर पुरुष को मसाज करना है- पहले ही दिन की तरह स्नान करके ध्यान कर लें| फिर स्त्री से कहें कि वो अपने वस्त्र ख़ुद ही उतार ले, और बेड पर पेट के बल लेट जाए| (आपको अपने वस्त्र नहीं उतारने हैं)| कल के ही तरह आज भी आपको मसाज करना है| आज के मसाज में दो चीज़ें नयी होगी, एक स्त्री के शरीर पर वस्त्र नहीं होगा| दूसरा, मसाज के दौरान आपको 'तेल' का इस्तेमाल करना है| अंत में एक दुसरे को प्रणाम करके अहोभाव प्रगट करना है, और फिर अलग हो जाना है|
नोट- कल की तरह आज भी आपको स्त्री के सेक्स .........,. नहीं छूना है| आज का मसाज 30 मिनट का होगा|
तीसरा दिन-
आज स्त्री मसाज करेगी- आज जब आप स्नान करके ध्यान में एक दुसरे के आमने-सामने बैठेंगे, तो दोनों के शरीर पर वस्त्र नहीं होगा| आज ध्यान आँख खोल कर करना है| पहले एक दुसरे की आँखों में देखें, फिर दृष्टि को नीचे लाएं, स्त्री पुरुष के जननेंद्रिय पर ध्यान करेगी, और पुरुष स्त्री के स्तन पर| बहुत ही शान्ति पूर्वक एक दुसरे के प्रतेक अंग को देखें| फिर बीस मिनट बाद, पुरुष बेड पर पेट के बल लेट जाएगा| फिर स्त्री पुरुष के पूरे शरीर का मसाज करेगी|
नोट- मसाज का समय 30 मिनट होगा| मसाज में तेल का इस्तेमाल करना है| स्त्री को पुरुष एक दुसरे के सेक्स सेंटर्स को नहीं छुएंगे|
चौथा दिन- आज का दिन........
(आगे की साधना बहुत ही गूढ़-व-गुप्त है, आगर आप जानना चाहते हैं , तो ikkyutzu@gmail.com पर sub में ‘तंत्र साधना सूत्र’ लिख कर मेल करें।
चित्र साभार-गूगल

Friday, 24 April 2020

'तंत्र साधना सूत्र-1'


चित्र साभार- गूगल
तंत्र में उतरने से पहले ख़ुद को थोड़ा तैयार करना जरूरी है| अभी हम जिस स्थिति में हैं, उस स्थिति में तंत्र में प्रवेश करना कठिन है| इसीलिए, पहले मैं आपको कुछ ऐसी बातें बताता हूँ, जिससे हम ख़ुद को तंत्र के लिए तैयार कर सकते है|
साधना शुरू करने से पहले 21 दिन तक आपको साधना में उतरने की तैयारी करनी होगी| तैयारी का पहला चरण है, शरीर शुद्धि, बिना शरीर को शुद्ध किये तंत्र की साधना संभव नहीं है| शरीर को शुद्ध करने के लिए आपको सबसे पहले अपने आहार को ठीक करना होगा| आहार ठीक करने का सरल सूत्र है, स्वाद के नहीं, शरीर की जरूरत के हिसाब से भोजन करना| अगले 21 दिनों के लिए मांसाहार, नशे का सेवन, धूम्रपान, अधिक तला हुआ, मीठा तथा गरिष्ठ भोजन का सेवन न करें| भोजन में हरी-सब्जी, फल, सलाद, जूस, नारियल पानी, देसी गाय का दूध (अगर दूध आपको पचता हो तो) और घर का बना सादा खाना ही खाएं| भोजन की मात्रा उतनी हो, जितने से खाने के बाद भारीपन महसूस न हो| इसके अलावा, अगर संभव हो तो, सुबह उठ कर योग की सूक्ष्म क्रियाएँ तथा प्राणायाम करें| अगर ऐसा न कर पाएं तो, रात का खाना खाने के बीस मिनट बाद 40 मिनट वाक कर लें|
आहार सुधारने के अलावा, शरीर को शुद्ध करने के लिए सबसे अहम् चीज़ है ब्रह्मचर्य का पालन| अगले 21 दिनों तक आपको sex नहीं करना है| एक वीर्य स्खलन के बाद शरीर को कम-से-कम 15 दिन लगते हैं, फिर से सेक्स के लिए तैयार होने में| 15 दिन से पहले सेक्स करना,शरीर के साथ अत्याचार है| चूँकि आपको तंत्र सेक्स की साधना करनी है, इसीलिए आपको परंपरागत सेक्स की जो आदत है, उसे तोड़ना होगा| अन्यथा आप तंत्र की साधना में सफ़ल नहीं हो पाएँगे| परंपरागत सेक्स शरीर की जरूरत कम मन की आदत ज्यादा है| इसलिए, बिना इस आदत को तोड़े आप तंत्र साधना नहीं कर सकते हैं| अभी आपका शरीर 'वीर्य स्खलन' का आदी हो चुका है, बिना पुरानी आदत को तोड़े आप तंत्र के लिए उसे राजी नहीं कर सकते हैं| अगले 21 दिनों के लिए सेक्स और सेक्स जुड़ी सभी चीज़ों (पोर्न, हस्तमैथून, अश्लील किताबें, अश्लील गाने इत्यादि) से ख़ुद को दूर कर लीजिए| शरीर के बाद आता है मन शुद्धि- मन को शुद्ध करने के लिए सबसे पहले ऐसी चीज़ों से ख़ुद दूर कर लीजिए, जिससे मन को गति मिलती हो| जैसे, टीवी देखना, मोबाइल का इस्तेमाल करना, अख़बार पढ़ना, गॉसिप करना, निंदा करना, इत्यादि-इत्यादि|
शरीर और मन को शुद्ध करने के अलावा, तंत्र साधना के लिए 'धेर्य' को विकसित करना बहुत ही ज़रूरी है| धेर्य विकसित करने के लिए झेन परम्परा के पास एक सूत्र है, 'when in hurry, go slow' (जब जल्दबाजी में हों, ख़ुद को धीमा कर लें)| आपने किसी के घर का बेल बजाया, दो क्षण की देरी के बाद मन एकदम बेचैन होने लगता है| उस बेचैनी के प्रति जागें| कहीं जाने की जल्दी हैं, आप हडबडाहट में सब कुछ जल्दी-जल्दी करने लगते हैं, ऐसे क्षण में ख़ुद को थोड़ा स्लो कर लें| जब भी किसी काम को करने की बेचैनी पकड़े, पहले भीतर की बेचैनी को शांत कर लें, फिर उस को करें| तेज़ भूख लगी है, आप टेबल पर बैठे हैं, भोजन आने का इंतजार कर रहे हैं| जैसे ही भोजन आता है, आप टूट पड़ते हैं, यहाँ थोड़ा ठहर जाएँ| थोड़ी देर भूख को देखें, भीतर जो खाना जल्दी आ जाए इसकी बेचैनी है, इसको देखें| जब खाना आ जाए, तो थोड़ी देर ठहर जाएँ..मन जब थोड़ा शांत हो तब धीरे-धीरे खाना शुरू करें| इस 'गो स्लो' के सूत्र को जीवन में सब जगह लेकर आएं| जिन-जिन चीज़ों को आप जल्दबाजी में करते हैं, उनको धीरे करना शुरू कर दें| मन हमेशा मंजिल पर पहुँचने की जल्दी में होता है, उसकी इसी जल्दबाजी को तोड़ना 'तंत्र' है| जब आप अपने अनुभव से यह समझ लेते हैं, कि हर उत्थान के बाद पतन आता है, आपके भीतर से मंजिल पर पहुँचने की जो बेचैनी है, कम होने लगती है|
सेक्स के क्षण में भी मन मंजिल (वीर्य स्खलन) तक पहुँचने की जल्दी में होता है| अगर पुरुष का बस चले तो वह फॉरप्ले की झंझट में कभी न पड़े, वो सीधा सेक्स ही शुरू कर दे| वो तो स्त्रियाँ, अक्सर, बिना फॉरप्ले के सेक्स के लिए तैयार नहीं हो पाती हैं, इसलिए पुरुष को यह कवायत करनी पड़ती है| २१ दिनों तक अगर आपने यह सब किया, आपका सेक्स मन से निकल कर शरीर में आ जएगा| अभी हम मन से सेक्स करते हैं, शरीर बस इंस्ट्रूमेंटल है| इसीलिए, आज दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो बिना पोर्न देखे सेक्स नहीं कर सकते हैं| जो लोग पोर्न नहीं देखते हैं, वो लोग भी सेक्स करते समय कल्पना करते रहते हैं, पुरुष किसी और स्त्री के बारे में सोचता रहता है, और स्त्री किसी और पुरुष के बारे में| कुछ लोग सेक्स करते समय एक दुसरे को गंदी-गंदी गलियां देकर उत्तेजित करते हैं, अश्लील शब्दों की मदद से ख़ुद को उकसाते हैं| यह सब इस बात का सबूत है कि शरीर से सेक्स विदा हो गया है| जब तक सेक्स शरीर में नहीं आ जाता है, तंत्र संभव नहीं है| और सेक्स शरीर में तभी आएगा, जब आप अपने मन से सेक्स से जुड़े सभी विचारों को बाहर फेंक दें|

(आगे पढ़ने के लिए मुझे ikkyutzu@gmail.com पर सब्जेक्ट में 'तंत्र सेक्स' लिख कर मेल करें.....)

Wednesday, 15 April 2020

मैं एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था

प्रश्न-स्वामी जी, धार्मिक लोग आपस में इतना लड़ते क्यूं हैं?
इक्क्यु- मैं एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था, आम मान्यता का अनुकरण करते हुए, बहुत सालों तक मैं इसी मुगालते में जीता रहा है कि मैं ब्राह्मण हूँ| सबसे श्रेष्ठ हूँ, विशिष्ट हूँ..मंदिर जाता था, पूजा करता था, शास्त्रों का अध्यन करता था|
जब तक गाँव में था तब तक मुझे पता था कि कौन सूद्र है, कौन डोम, कौन चमार और कौन मुसलमान| घर में जब कोई किसी और धर्म या जाति का आता था, तब माँ उसे अलग कप में चाय देती थी| कभी जब उन्हें खाना खिलाना होता था, तो माँ उन्हें अलग थाली में खिलाती थी| यह सब देख कर कभी-कभी मैं काफी उदास हो जाता था, और कई बार तो माँ से लड़ता भी था| लेकिन, माँ डांट-डपट कर मुझे चुप कर देती थी| सबसे बुरा मुझे तब लगा था, जब माँ ने मेरे एक मुसलमान दोस्त को अलग कप में चाय दी थी| लेकिन, वक़्त के साथ-साथ मैं माँ की बातों से सहमत होने लगा था-ख़ुद को श्रेष्ट और दूसरी जाति और धर्म के लोगों को अपने से नीचा मानने लगा था|

नीची जाति के लोग कभी भी, हमारे यहाँ आने पर, टेबल या कुर्सी पर नहीं बैठते थे| वे सदा नीचे ज़मीन पर बैठते थे| कुछ दुसाद जो मेरे घर पर आते थे, वे उम्र में काफी बड़े थे, उनके बाल सफ़ेद थे, लेकिन फिर भी हम उन्हें नाम लेकर ही बुलाते थे| ये मुझे थोड़ा अटपटा जरूर लगता था, लेकिन घर के सभी बच्चे ऐसा ही करते थे, सो मैं भी उन्हें नाम से ही बुलाता था, "माँ गुलमा आया है", गुलमा का पूरा नाम 'राम गुलाम दास था" वह हमारे घर का खानदानी नौकर था| हमारे घर के लोगों ने उसके घर के पूर्वजों को घर बनाने के लिए ज़मीन दी थी| वह हमारी ज़मीन पर बसा था, इसीलिए हमारे यहाँ गुलामी करता था| इस तरह की दास-प्रथा भारत में कैसे आई, यह सोचने वाली बात है| आज जब मैं इस प्रथा के बारे में सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि जरूर यूरोप के लोगों ने यह प्रथा भारत में शुरू करवाई होगी| गुलमा 'माँ को गृहस्तणी, और पिता जी तथा घर के सभी मर्द हज़रात, उसमें मैं भी शामिल था, को 'गृहस्त' बुलाता था| बचपन में मैं इस शब्द की महिमा से परिचित नहीं था, लेकिन इधर कुछ दिन पहले जब किसी ने मेरी माँ को 'गिरहसनी' बुलाया, तो अचानक मुझे ध्यान आया कि यह 'गिरहसनी' दरसल गृहस्तणी का बिगड़ा हुआ रूप है| फिर मुझे ध्यान आया कि संबोधन कितना पुराना है, और अब कितना निरर्थक है| बिना वानप्रस्थ और सन्यस्त हुए 'गृहस्त' होने का क्या अर्थ है| 'गृहस्त' तो उसी को कहा जा सकता है जो एक दिन वानप्रस्थ, फिर सन्यस्त भी होगा| फिर मुझे समझ में आया कि अदिकाल में गुलमा नौकर/या दास नहीं उन ब्राह्मणों का सेवक रहा होगा, जिनको एक दिन गृहस्त-आश्रम छोड़ कर सन्यस्त होना होता था| 'सेवक' होने और एक 'नौकर' होने में बड़ा फर्क है| समय के साथ सेवक दास हो गया और गृहस्त शोषक|
गाँव में रहते हुए किसी सूद्र, चमार, डोम या दुसाद से मेरी दोस्ती नहीं हुई| स्कूल में मेरे सारे दोस्त ब्राह्मण घर के ही बच्च्चे थे| नीची जाति के लड़कों के साथ उठने-बैठने तथा खेलने की मनाही थी| स्कूल में नीची जाति से कोई भी पढ़ने नहीं आता था| वे लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने की उम्र में किसी ब्राह्मण के यहाँ गाय-भैंस चराने के लिए चरवाही पर रख देते थे| उनका बच्चा वहीं बासी और बचा हुआ खाना खा कर पलता-बढ़ता था| कभी चोरी छिपे मैं अपने यहाँ के चरवाहे के साथ खेल लेता था, अगर कभी माँ पकड़ लेती थी, तो बहुत डांटती थी| दिल्ली आने के बाद, कई लड़कों से मेरी दोस्ती हुई, और मैंने सबसे बिना उनका सर नेम जाने दोस्ती की| 'रवि' नाम का एक लड़का मेरा बहुत ही करीबी दोस्त था| दो साल की लम्बी दोस्ती के बाद मुझे एक दिन पता चला कि जाति से वह चमार है| मैं बड़ा चौंका क्योंकि उसके रहन-सहन, खान-पान और पहनावे को देख कर मैं हमेशा अंदर-ही-अंदर ऐसा सोचता था कि यह ब्राह्मण है| मैंने कई बार उसके यहाँ खाना खाया था, उसने कई बार मेरे यहाँ खाया था| पहले तो, यह सोच कर मैं थोड़ा बेचैन हुआ कि चमार के साथ मैंने खाना खा लिया था| लेकिन एक दो दिन बाद मैं इन सब के बारे में ग़मभीरता से सोचने लगा| गाँव के चमार बहुत ही गंदगी में रहते थे, मरे हुए जानवर का मांस खाते थे, उनके घर गंदे थे, इन सब के बीच ख़ुद को अलग और महान समझना आसान था| लेकिन रवि का मामला अलग था...सच्चाई तो यह थी कि वह मुझसे भी ज्यादा साफ-सफाई में रहता था| पूजा-पाठ करता था, हारमोनियम बजता था| किसी भी अर्थों में मुझ से कम नहीं था| यह पहला मौका था जब मुझे अपने ब्राह्मणत्व' पर शक होने लगा| धीरे-धीरे यह शक इतना बढ़ गया कि मैंने अपने नाम के साथ वो सर नेम लगाना बंद कर दिया जिससे यह पता चलता था कि मैं ब्राह्मण हूँ| 'अगर यही ब्राह्मण होना है, तो यह तो दो कौड़ी का है'|

बहुत दिनों तक मैं अन्धकार में टटोलता रहा| मेरे अन्दर हजारों धार्मिक प्रश्न घुमते रहते थे| दिल्ली में ही मेरा एक दोस्त बना नासिर मैं उससे घंटों धार्मिक मुद्दों पर बहस करता रहता था| उसका मानना था कि धर्म का सम्बन्ध 'जन्म' से है, हम जिस परिवार, जाति में पैदा होते हैं, वही हमारा जाति और धर्म होता है| मैं इस तर्क से राज़ी नहीं होता था क्योंकि मुझे ख़ुद में, नासिर में और रवि में कोई भी अंतर नहीं दिखता था| फिर मुझे गाँव के वो लोग याद आते थे जिन्हें हम अपने से नीचा समझ कर उनके साथ अलग व्यवहार करते थे| अब मैं ख़ुद को उनसे अलग नहीं पाता था| उनका रंग रूप, मनः स्थिति, शरीर सब कुछ तो मेरे जैसा ही था| इतना तो मैं समझ गया था कि धर्म का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है| लेकिन, फिर किस चीज़ से धर्म का संबंध है, यह मेरे लिए एक यक्ष प्रश्न था| हिन्दू धर्म से मेरा मोह भंग हो रहा था, मेरे किसी भी प्रश्नों का जवाब हिन्दुओं के पास नहीं था| कम-से-कम उन हिन्दुओं के पास तो नहीं ही था, जिन्हें मैं जानता था| मेरा पूरा जीवन ही प्रश्न चिन्ह बन गया था| मैं इतना परेशान रहने लगा था कि मेरे करीबी और परिचितों को ऐसा शक होने लगा कि मैं पागल होता जा रहा हूँ| मेरा छोटा भाई एक दिन माँ को फोन करके बोला, " माँ, भाई पागल हो गया है, दिन भर अलबल कुछ भी बोलता रहता है|"
कई साल बाद, मैं दिल्ली में ही बौद्ध धर्म की एक शाखा से जुड़ा| शुरू-शुरू में मैं उनकी बातों और फिलोसोफी से बड़ा मुतासिर हुआ| कई लोगों को उस प्रैक्टिस से जोड़ा भी| लेकिन, कुछ ही दिनों में बाद मुझे बहुत सी ऐसी चीज़े दिखने लगी, जिससे मेरे सारे पुराने प्रश्न फिर से ताजे हो गए| हर मीटिंग में किसी न किसी से मेरी बहस हो जाती थी| कई बार बड़े लीडर मुझे समझाने आए, लेकिन मुझ से बहस करने के बाद वो ख़ुद ही कंफ्यूज हो जाते थे| धीरे-धीरे मैं ख़ुद को प्रैक्टिस से दूर कर लिया| नासिर के साथ कुछ दिन मैं मस्जिद में भी गया| बहुत सी किताबें पढ़ीं...बौद्ध प्रैक्टिस की तरह इस्लाम से भी मैं शुरू में बड़ा प्रभावित हुआ| लेकिन थोड़े दिनों बाद फिर वही बहस| वहां जाना भी छोड़ दिया| फिर बत्रा होस्पिटल के पास एक 'मैहर बाबा' का केंद्र था..कुछ महीने तक मैं वहां भी कीर्तन में गया| इस्कॉन में भी बहुत दिन अमित मामू के साथ गया| फिर आदित्य के साथ चर्च में भी...सब जगह एक ही कहानी, थोड़े दिनों बाद मैं वहां के लोगों से बहस करने लगता था| फिर धीरे-धीरे ख़ुद को दूर कर लेता था|
आज मेरा सम्बन्ध दुनिया के किसी भी धर्म से नहीं है| लेकिन मैं फिर भी धार्मिक हूँ| और मेरी यह धार्मिकता मेरे लिए कोई विश्वास या मान्यता नहीं है| बल्कि एक अस्तित्वगत प्यास है| अब मेरा धार्मिक होना मेरी पहचान नहीं है| मेरा धर्म मेरे अहंकार का विस्तार नहीं है| इसलिए, अपने धर्म की रक्षा करने के लिए मैं किसी की जान नहीं ले सकता हूँ| चूँकि मेरा धर्म किसी भी तरह के मान्यताओं और विश्वासों पर आधारित नहीं है, मैं किसी को भी अपने धर्म में कन्वर्ट नहीं कर सकता हूँ| ना ही किसी को भी अपने धर्म को मानने के लिए मजबूर कर सकता हूँ| यह ऐसे ही होगा जैसे कोई आँख वाला किसी अंधे को प्रकाश को मानने के लिए मजबूर करे| अँधा अगर प्रकाश को मान भी लेगा तो उसके जीवन में क्या फर्क पड़ेगा? क्या प्रकाश को मान भर लेने से अंधे का अंधापन दूर हो जाएगा? धर्म का जन्म से कोई भी सम्बन्ध नहीं है| धार्मिकता का सम्बन्ध हमेशा ही व्यक्ति से होता है, किसी भी जाति, धर्म या देश से नहीं| जन्म से हम सब एक जैसे ही होते हैं| पंच तत्व से ही हम सब का शरीर बना है, इसलिए हमारे शरीर में तो जन्म से कोई भेद हो नहीं सकता है| मन भी हम सब का एक ही जैसा है- क्या हिन्दू का क्रोध किसी मुस्लिम या इसाई के क्रोध से अलग होता है? फिर जन्म से अगर कुछ तय होता है तो वह हमारा भोजन, रहन-सहन, वस्त्र और कुछ मान्यताएं| लेकिन इन में से कोई भी धर्म नहीं है| एक हिन्दू जो कि ईश्वर को मानता है, और एक ईसाई जो कि जीसस को मानता है, में बुनियादी भेद क्या है? कुछ भी नहीं...!!!! रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता है| यह ऐसे ही जैसे एक अँधा प्रकाश को मानता हो, और दूसरा अँधा प्रकाश को नहीं मानता हो...इस मानने और न मानने से उनके जीवन के क्या अंतर आएगा? कुछ भी नहीं...!!! इसीलिए, जन्म से हिन्दू होना, मुस्लिम होना, या फिर ईसाई या यहूदी होना सांयोगिक घटना है, धर्मिक नहीं|
इसलिए, विवेक, दो धार्मिक लोग कभी भी आपस में नहीं लड़ सकते हैं| लड़ाई सिर्फ अंधों के बीच होती है| जहाँ भी लड़ाई दिखे समझ जाइए कि वहां धर्म नहीं है| और यह बात न सिर्फ बाहर के संबंध में सही है, बल्कि भीतर के संबंध में भी यही सूत्र लागू होता है| अगर आप अपने भीतर के क्रोध से लड़ रहे हैं, काम वासना से लड़ रहे हैं, लोभ से लड़ रहे हैं, इर्ष्या से लड़ रहे हैं, तो समझ जाइएये कि अभी आप धार्मिक नहीं हुए हैं| मेरी दृष्टि में, और यही सभी धार्मिक लोगों की दृष्टि है, लड़ाई अधर्म है, और स्वीकार धर्म|
धार्मिकता अनुभव है, जबकि धर्म सिर्फ एक मान्यता| 'मान्यता' से जीवन में कुछ भी नहीं बदलता है| इसीलिए, "धर्म के नाम पर दुनिया का कोई भी ऐसा पाप नहीं है जो न हुआ हो|" 

Sunday, 5 April 2020

जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?


प्रश्न - 24 घंटे आनंदित रहने का क्या मार्ग है ?
Ikkyu- सबसे पहले आपके भीतर 24 घंटे आनंदित रहने का जो लोभ है, उसे छोड़ना होगा..। दूसरी बात, आनंद का अपना कोई अनुभव नहीं होता है| सुख का अनुभव होता है, दुःख का भी अनुभव होता है, लेकिन आनंद का कोई अनुभव नहीं होता है, क्योंकि अनुभव के लिए ‘दो’ का होना ज़रूरी है। सुख के पीछे दुःख छिपा होता है, इसीलिए सुख का अनुभव होता है। इसी तरह दुःख के पीछे सुख छिपा होता है। अगर भीतर बिल्कुल ही सुख न हो तो आपको दुःख का पता नहीं चलेगा। तो, इस बात को बहुत ही अच्छे से समझ लीजिए कि अनुभव हमेशा विपरीत का होता है। साथ ही एक और बात गहरे उतार लीजिए,’कोई भी अनुभव आध्यात्मिक नहीं होता है’। कैसा भी अनुभव क्यों न हो सब अनुभव मन के हैं।
आनंद का अनुभव नहीं हो सकता है क्योंकि आनंद आपका होना है। आनंद चेतना का स्वभाव है। इसीलिए, जब तक चेतना सुख और दुःख के अनुभव में उलझी रहती है, वह अपने स्वभाव से वंचित रहती है। सुख में सुखी होना और दुःख में दुखी होना छोड़ दीजिए, फिर जो रह जाएगा वही अनन्द है।
प्रश्न- जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?
इक्क्यू- जागकर जीना चाहिए...दो दृष्टिकोण मैं आपको देता हूँ, जो भी सही लगे उसे चुन लीजिए। दोनों का परिणाम एक जैसा है।
पहला- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखिये जैसे आप उन्हें पहली बार देख रहे हैं। हर दिन को ऐसे जीना शुरू कीजिये जैसे यह आपके जीवन का पहला दिन है।
दूसरा- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखना शुरू कर दीजिए जैसे कि आप उन्हें आख़री बार देख रहे हैं। हर दिन को अपने जीवन का आख़री दिन समझिए।
दोनों ही दृष्टिकोण का एक ही लक्ष्य है-अतीत और भविष्य से मुक्ति..। जो भी आपको जमे उसे चुन लीजिए और कोई तीन महीने इस प्रयोग को कीजिए।
प्रश्न- आपका मूल संदेश क्या है ?
मेरा कोई संदेश नहीं है..। मैं कोई पैग़म्बर (पैग़ाम/मेसेज लाने वाला) नहीं हूँ..! संदेश लाना डाकिये का काम है। मैं कोई डाकिया-वग़ैरह नहीं हूँ। डाकिया एक जगह की ख़बर को दूसरी जगह पहुँचता है। यह बिचौलिये काम है। मुझे ऐसा काम पसंद नहीं है।
मैं अपने से ऊपर किसी को नहीं मानता हूँ, और ना ही कोई मुझसे नीचे है। फिर किसका संदेश किस तक पहुँचाऊँ?? मैं स्वयं संदेश हूँ।और यही मैं आपसे भी कहना चाहता हूँ, “अप्प दीपो भव:”


Saturday, 29 February 2020

हम सब दूसरे दर्जे के यूरोपीयन बनते जा रहे हैं|

समय- 6:26 (सुबह), मंगलवार २४ फ़रवरी, कोलकाता
हम अभी जहाँ बैठे हैं, वहाँ से दो मिनट की walk पर तारा मंडल है। मेरे बाईं ओर एक गगनचुंबी इमारत बादलों के बोसे ले रहा है। दिव्या अपने योग-चटाई पर अष्टांग-योग के आसनों का अभ्यास कर रही है। पार्क almost ख़ाली है, हमसे काफ़ी दूर कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं। पास में ही अशोक का एक विशाल पेड़ है, जिससे चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आ रही है। मेरे दाईं ओर मुख्य सड़क को पार कर के एक पूरना चर्च है, उसकी चार मीनारों को यहाँ से मैं देख पा रहा हूँ।
सुबह तीन बजकर पंद्रह मिनट पर हमारी ट्रेन चितपूर स्टेशन (उर्फ़ कोलकाता स्टेशन) पहुँच गयी थी। सवा पाँच बजे तक हम वहीं वेटिंग रूम में बैठे थे। पौ फटने के बाद बस पकड़ कर पहले हम श्याम बाज़ार आए, फिर वहाँ से दूसरी बस पकड़ कर विक्टोरिया। अभी पर्क में आने से पहले हमने गन्ने का जूस पीया।
Airbnb से जो रूम हमने बूक किया है, उसका चेक इनटाइम ११ बजे हैं। अभी हमारे पास पर्याप्त समय है। दिव्या अपने योग-रूटीन को निर्बाध रखना चाहती थी, इसीलिए उसे यहाँ, विक्टोरिया के सामने वाले पार्क में लेकर आया हूँ। दिव्या जब योगाभ्यास समाप्त कर लेगी, तब हम टहल कर शहर की सुबह का आनंद लेंगे।
योग करने के बाद हम एक बार फिर से गन्ने वाले के यहाँ गए। इस बार हमने दो छोटा ग्लास लिया। मूँह में गन्ने की मिठास लिए हम विक्टोरिया मेमोरियल के मुख्य द्वार तक टहलते हुए आए। द्वार के सामने खड़े अरविन्दो की आदमक़द प्रतिमा को मैंने दूर से ही पहचान लिया...हालाँकि पहली नज़र में मुझे लगा कि रविंद्रनाथ हैं, लेकिन फिर दाढ़ी की लम्बाई से लगा कि ये अरविंद ही हैं। पहली बार संभवतः २०१० में जब कोलकाता आया था, तब इस मूर्ति पर इतना ग़ौर नहीं किया था...क्या पता किया भी हो, लेकिन अब कुछ याद नहीं...!
मुख्यद्वार के सामने ही पैदलमार्ग में एक बुजुर्ग अमरूद और कुछ अजनबी फल बेच रहे थे। दिव्या की ज़िद्द पर मैंने 50 रुपये में दो अमरूद और एक लाल रंग का अजनबी फल, जिसका नाम उन्होंने जामुन बताया, ख़रीदा... जामुन का ऐसा अनोखा रंग और विलायती रूप मैंने पहले कहीं नहीं देखा था। फल का स्वाद कुछ-कुछ सेब जैसा था।
अमरूद वाले के पास ही लगे लकड़ी के बैंच पर बैठ कर हम विक्टोरिया के महल को देखने लगे। तभी आचानक वृष्टि शुरू हो गयी...। “ओह-ओ बारिश से स्वागत हुआ है हमारा”, दिव्या बोली।
आठ बजे call करके रूम मालकिन ने हमें बता कि हम अपने समय से पहले भी आ सकते हैं...! यह हमारे लिए अच्छी ख़बर थी, विक्टोरिया के खुलने में अभी दो घंटा बाँकी था। उनके call के बाद हमने तुरंत उबर बूक किया, और कोई २० मिनट की यात्रा के बाद अपने निवास स्थान पर पहुँच गए।
अभी जहाँ हम ठहरे हुए हैं वह एक रेसीडेंटल एरिया है..। Corporation बैंक के सामने एक चार मंज़िला मकान है। बिल्डिंग में लिफ़्ट नहीं। चौथी मंज़िल पर सफ़ेद गेट वाले घर में अभी हम ठहरे हुए हैं..। दिव्या अभी किचन में में coffee बना रही है, वहाँ से मुझे नहाने के लिए आवाज़ दे रही है..इसीलिए बाँकी कहानी बाद में...
हम जादवपूर में जहाँ रह रहे हैं, वहाँ से थोड़ी ही दूर पर बस स्टेंड है। स्नान-ध्यान के बाद हम बस लेकर विक्टोरिया पहुँचे। विक्टोरिया पहुँचने से पहले हमने थोड़ा समय रविंद्र सदन में बिताया। वहीं bookshop के सामने बने फ़ूडकोर्ट से कुछ स्थानीय व्यंजन लेकर खाया।
खाने के बाद हम आर्ट गैलरी गए...वहाँ जाने के बाद हमने पता चला कि गैलरी २ बजे ओपन होता है। हम निराश होकर विक्टोरिया की तरफ़ चल पड़े। विक्टोरिया पहुँच कर हमने टिकट लिया और अंदर गए। अंदर जाने के बाद पता चला कि सोमवार को महल बंद होता है। निराश होकर हम पोखर किनारे बैठ गए...पोखर बहुत ही सुंदर था, किनारे लगे फूलों को देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया। हमारे पास के पेड़ों के नीचे बैठे प्रेमी युगल खुलेआम एक दूसरे के अधरों को चूम रहे थे...प्रेम का ऐसा खुला प्रदर्शन देखकर मैं थोड़ा हैरान भी हुआ। खैर, विक्टोरिया के पार्क में थोड़ी देर बैठने के बाद हम फिर से रविंद्र सदन आ गए...

इस बार बमुश्किल हम आर्ट गैलरी ढूँढ पाए...ग़ैरलरी में कुछ आम से पेंटिंग लगे हुए थे। हम जल्दी ही hall से बाहर निकल आए..! नाट्यशाला के बाहर लोग अंदर जाने के लिए क़तार में खड़े थे। बाहर किसी बंगाली नाटक का पोस्टर लगा हुआ था। रविंद्र सदन का पूरा माहौल मुंबई के पृथ्वी थिएटर और अहमदाबाद के गुफ़ा जैसा था..।
सदन से बाहर निकल कर हमने मेट्रो लिया और काली घाट गए। खुली खिड़की वाला मेट्रो देख कर दिव्या बहुत हैरान हुई. लेकिन जब मैंने उससे कहा, “भारत में भूमिगत रेल 1984 में सब से पहले यहीं शुरू हुआ था।”, तो उसकी हैरान थोड़ी कम हुई, ‘तुम दिल्ली के मेट्रो से इसकी तुलना नहीं कर सकती हो..’
कालीघाट के आसपास का माहौल वैसा ही था जैसा पूरे उत्तर भारत में मंदिरों के पास होता है, गली के दोनो तरफ़ अनगिनत फ़ूल-प्रसाद और पूजा से जुड़ी वस्तुओं की दुकान और मंदिर के प्रांगण में कीचड़ और गंदगी..। इस सबसे भी ज़्यादा गंदी वहाँ मुझे उन लोगों के चेहरे पर दिखती है जो लाल-पीले वस्त्र पहन का पुजारी-पंडित बने यहाँ-वहाँ घूमते रहते हैं। पूजारी से अधिक अधार्मिक व्यक्ति खोजने से भी नहीं मिल सकता है।
काली घात से निकल कर हम धर्मतल्ला के new मार्केट गए। यह मार्केट दिल्ली के सरोजनी और सरद जैसा है। जूता पहन कर अधिक चलने की वजह से दिव्या का पैर कट गया है, उसमें अपने लिए एक चप्पल लिया। एक घंटा से भी अधिक समय हमने मार्केट में बिताया...
जब हम मार्केट से बाहर निकले तो मुख्य सड़क का नज़ारा देखने लायक़ था। लोग एक बड़े ट्रक पर अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रतिमा लादे हुए थे। पीछे लोग ‘ट्रम्प वापिस जाओ’ का नारा लगा रहे थे।
New-Market से अपने निवास स्थान की ओर आते से मैंने एक अद्भूत दृश्य देखा। एक जगह ओवेरब्रिज के नीचे बने बैंच पर बैठकर लोग चार-पाँच जगह शतरंज खेल रहे थे। और, कई लोग खड़े होकर उनकी खेल को देख रहे थे। इतनी ट्राफ़िक में इस तरह से लोगों को शतरंज खेलते मैं और कहीं नहीं देखा था।
बस स्टेंड से आवास की तरफ़ आते हुए, रास्ते में हमने गुड़ की चाशनी में डूबा हुआ रसगुल्ला खाया...वाह ऐसा अद्भूत स्वाद...!
वैश्वीकरण की वजह से पूरी दुनिया में संस्कृति का साम्यवाद बड़ी तेजी से फ़ैल रहा है| मेरी दृष्टि में यह बहुत ही चिंतनीय और निंदनीय है| दस साल पहले जब कोलकाता गया था, तब के कोलकाता और आज के कोलकाता में जमीन आसमान का अंतर आ गया है|
लोगों, घरों, दुकानों और लोगों के पहनावा और व्यवहार को देख कर कुछ भी तय कर पाना मुश्किल था| मुंबई, कोलकाता, दिल्ली और बंगलौर में आज कोई भी बुनियादी भेद नहीं हैं..(और अगर थोड़ा बहुत कुछ है भी तो वह आने वाले दस साल में एकदम मिट जाएगा) वैसे ही लोग, वही बात करने का ढंग, उसी तरह की दुकाने, घरों का वही पैटर्न, सड़के भी वैसी ही.. जैसे आजादी तलाशते-तलाशते स्त्रियाँ आज दुसरे दर्जे की पुरुष बन कर रह गई हैं, वैसे ही ग्लोबलाइजेशन की वजह से हम सब दूसरे दर्जे के यूरोपीयन बनते जा रहे हैं|
अगर तिलक लगाना, और पत्थर के सामने सिर झुकाना अंधविश्वास और गँवईपन हैं, तो मैं पूछता हूँ भारत जैसे देश में, जहाँ साल में 300 से अधिक दिन सूर्य का दर्शन होता है, वहां टाई लगाकर घूमना, जूता पहनना और कोट पहनना क्या है? कोई मुझे समझाए कि इसके पीछे क्या वैज्ञानिकता है?
ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण ने हमसे हमारी आत्मा और मौलिकता दोनों छीन ली है| आज दरभंगा, जिसे मिथिला का हृदयस्थली कहा जाता है, में जब दूकानदार से मैं पूछता हूँ, "ई समान की भाव छै यो", तो उधर से जवाब आता है, " चालीस का किलो है, कितना चाहिए..." यह हास्यास्पद है...क़रीब-क़रीब ऐसी ही स्थिति आज पूरे देश में हैं...|

Saturday, 8 February 2020

हर पल सेक्स माइंड में चलता रहता है

प्रश्नकर्ता-माइंड बहुत डिस्टर्ब रहता है, हर पल सेक्स माइंड में चलता रहता है|
इक्क्यु- पोर्न देखते हैं?
प्रश्नकर्ता-जी, देखता हूँ|
इक्क्यु-पोर्न देखते हुए हस्तमैथुन/मैथुन करते हैं?
प्रश्नकर्ता- जी, करता हूँ|
इक्क्यु- जितनी जल्दी हो सके ये दोनों चीज़ छोड़ दीजिए...यह आपके सेक्स लाइफ को बर्बाद कर देगा..वैवाहिक जीवन को भी नष्ट कर देगा..साथ ही आपके दिमाग की संवेदनशीलता को हमेशा के लिए खत्म कर देगा| पोर्न का दिमाग पर वही असर पड़ता है, जो ड्रग्स या किसी और मादक द्रव का...पोर्न देखने वालों में शीघ्र-पतन, और erectile dysfunction की समस्या बहुत ही आम है.. पोर्न को जीवन से एकदम दूर कर दीजिए..कुछ दिन (कोई 30 दिन ) पत्नी के साथ भी सेक्स मत कीजिये...सब ठीक हो जाएगा...
प्रश्नकर्ता- मैं पत्नी के साथ 3----(बीप) करना चाहता हूँ.....मन में हमेशा यही सब चलता रहता है|
इक्क्यु- यह सब ख्याल आपके भीतर पोर्न देख कर पैदा हुआ है... इस सबसे से आप चीज़ों को बहुत ही मुश्किल बना देंगे... आप कुछ दिन वाइफ के साथ सेक्स मत कीजिए, पोर्न मत देखिये...हस्तमैथुन भी मत कीजिए ...कुछ दिनों में आपका ब्रेन नार्मल हो जाएगा...और फिर आपकी पत्नी भी आपके साथ पहले से ज्यादा खुश रहने लगेगी... सेक्स से कभी भी स्थाई सुख या आनंद नहीं मिल सकता है... थ्री...(बीप) जैसी चीजें लॉन्ग रन में आपको अपनी पत्नी की नज़रों में गिरा देगा...वो कभी भी आपकी इज्जत नहीं कर पाएगी... जीवन बहुत ही दुष्कर हो जाएगा... पोर्न छोड़ दीजिए सब ठीक हो जाएगा..और साथ ही कोशिश कीजिए की पत्नी के साथ महीने में सिर्फ दो बार सेक्स हो ...धीरज रखिये चीज़ें बेहतर हो जाएगी...
चित्र साभार- गूगल
सेक्स से सुख तभी मिल सकता है जब आप एक गैप के बाद इसमें उतरते हैं... पोर्न देखने की वजह से आदमी सेक्स का आदि हो जाता है .... और जितना अधिक इसके बारे में सोचता है, उतना ही रियल सेक्स उसके लिए मुश्किल हो जाता है
अकेले में फ़ोन का इस्तेमाल मत कीजिए, रात को बिलकुल ही नहीं... कोई 90 दिन जब आप बिलकुल पोर्न नहीं देखेगे और हस्तमैथुन भी नहीं करेंगे...तब आपका ब्रेन और शरीर नार्मल हो पाएगा...

Tuesday, 4 February 2020

ध्यान जीवन जीने का एक ढंग है...


प्रश्न- नमस्ते सर, आपकी बात सोच रहे थे, हम खुद को समझने और शांत करने के लिए क्या करें... हमें मैडिटेशन के बारे में भी कुछ पता नहीं... कुछ दिन ब्रह्मा कुमारी में जाते थे पर अब नहीं जाते... पता नहीं क्यों..| आप कुछ बताएं प्लीज्..!

ख़ुद को वही समझ सकता है, जो यह भलीभांति जान ले कि वह ख़ुद को नहीं समझता/जानता है| इसी तरह, जिसको शांति चाहिए उसे अपनी अशांति को ठीक से समझना होगा..| तो, आपको अपने को समझना नहीं है, आपको बस इतना समझना है कि आप अपने को नहीं समझती/जानती हैं| और जिस उपाय से हमें यह समझ आता है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, उसी को ही शास्त्रों में ध्यान/मैडिटेशन कहा गया है| 
ध्यान से न तो शांति मिलती है, न ही हम ख़ुद को समझते हैं.. ध्यान से हमें बस इतना समझ में आता है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं| यह कहने में कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, और सच में ही यह जानना कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, में बड़ा भेद है| जिस दिन आपको पता चलेगा कि आप सच में ही ख़ुद को नहीं जानती हैं, आपके पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाएगी...पूरा जीवन ही कुछ और हो जाएगा...| 
ध्यान हमें वस्तुस्थिति का बोध करता है| और जिसने यह जान लिया कि वह ख़ुद को नहीं जानता है, वह असल में बहुत कुछ जानता है| उपनिषद तो यहाँ तक कहते हैं कि वह सब कुछ जानता है, "यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्‌ ॥"
अशांति का बोध ही शान्ति का मार्ग है..| इसीलिए, शांति पाने से ज्यादा अशांति को समझने की कोशिश कीजिए...असल में शांति की बहुत ज्यादा चाह की वजह से ही हम कभी अशांति को नहीं समझ पाते हैं| अज्ञानी ज्ञान की चाह के कारण ही भटक जाता है| इन फैक्ट 'चाह' हमें भटकती है..| कुछ लोग, जो क्रोध से पीड़ित है, पूरी जिंदगी क्रोध से लड़ते रहते हैं, फिर भी कभी उससे मुक्त नहीं हो पाते हैं| कारण क्या है? कारण है 'अक्रोधी बनने की चाह'...! और मजा यह है कि जो व्यक्ति अक्रोधी होने की चाह को छोड़ कर क्रोध से लड़ना बंद कर देता है, वह क्रोध से मुक्त हो जाता है| तो, इसका अर्थ हुआ 'स्वीकार' करना सूत्र है| यही ध्यान है... 'स्वीकार करना' ध्यान है, और लड़ना/विरोध करना 'अध्यान है| अगर आप अशांत हैं, तो अपनी अशांति को स्वीकार कर लीजिए, उससे लड़िये मत...अशांति के क्षण में शांत होने की कोशिश करना 'अशांति से लड़ना है'... और आप जितना अशांति से लड़ेंगी और शांत होने की कोशिश करेंगी, उतना है अशांति बढ़ता जाएगा...| अशांति को स्वीकार करने से मेरा क्या मतलब है? जब अशांति मन को पकड़े तब आँखे बंद करके भीतर देखिये, देखिये कि उस क्षण आपके शरीर और मन में क्या घट रहा है... उस क्षण शांत होने की कोशिश या फिर अशांति से भागिए मत...टीवी खोल कर मत बैठिये, दोस्तों को मत फोन लगाइए...यह मत कहिये कि मुझे शांत होना है , या फिर मैं शांत हूँ... नहीं बस जो कुछ भी आपके भीतर घटित हो रहा है, उसको देखिये, उसमे गहरे उतरिये...इस बोध से ख़ुद को भरिये कि अभी इस क्षण मैं अशांत हूँ (ऐसा नहीं की अशांत होना अच्छी बात नहीं है, मुझे शांत होना है, नहीं ऐसा नहीं ...बस अशांति है ..यथा भूतं...ऐसा है ....!) | बिना किसी विकल्प के, बिना किसी धारणा के जो हो रहा है , उसके अनुभव में गहरे उतरना ध्यान है| ध्यान कोई क्रिया नहीं है जिसे कोई आँख बंद कर के एक घंटा कर सकता है ... ध्यान जीवन जीने का एक ढंग है... | अगर आपको ख़ुद को समझना है, तो आपको अभी तक के इकट्ठा किये गए सभी उधार ज्ञान को उतार का फेकना होगा..| आपको अपने उस रूप की तलाश करनी होगी, जो आपके पास तब था जब आपके पिता भी नहीं जन्मे थे| ये जो अभी आपका नाम है, यह उधार है... धर्म उधार है, रूप उधार है, जाति उधार है... इन फैक्ट अभी आपके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे आप अपना कह सकती हैं, सब उधार है ...वही ज्ञान आपका अपना हो सकता है जिसे आप गहरी नींद में अपने साथ ले जा सकती हैं... अभी तो नींद में आप सब भूल जाती हैं..| जो ज्ञान नींद में साथ छोड़ देता है, वो मौत में क्या काम आएगा...| 

आप कहती हैं 'हमें मैडिटेशन के बारे में भी कुछ पता नहीं', यह अच्छी बात है| ब्रह्मा कुमारी से भी आप बचकर निकल गयीं, यह बहुत ही सौभाग्य की बात है|

Monday, 4 November 2019

बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है (महा-प्रयोग डे- 4 & 5)

परसों पीवीआर पर कॉफ़ी पीने गया था| एक छोटा-सा लड़का एक मरे हुए चूहे को हाथ में लेकर सबको डराने की कोशिश कर रहा था| चूहा आकर में काफी बड़ा था, वह उसके पूछ को पकड़कर बैठे हुए लोगों पर उछाल रहा था| उसी लड़के के साथ एक और लड़का था, जो लोगों को पहले आगाह कर दे रहा था, "वो देखिये वह चूहा लेकर आपको डराने आ रहा है|" लोग डरने से पहले संभल जाते थे, इसीलिए संभल-संभल कर डरते थे और डर-डर कर संभलते थे| यह एक अच्छा खेल था, लेकिन मुझे इस तरह का खेल देखना पसंद नहीं है| मैं चूहों से नहीं डरता, इसीलिए मैंने कभी बिल्ली नई पाली| चूहे और बिल्ली दोनों (लिखता भले ही 'दोनों' हूँ, लेकिन मैं बोलता हमेशा 'दौनों' हूँ, बोलने में लिखने से ज्यादा गलतियाँ करता हूँ|) मुझे नापसंद है|
मौन के अलावा मैं किसी भी भाषा को ठीक से उच्चारित नहीं कर पाता हूँ| मुझे भाषओं से डर लगता हूँ| इन फैक्ट, हर बार बोलने से पहले मैं बहुत डर जाता हूँ| अक्सर बहुत बोल कर मैं अपने डर को छुपाने की कोशिश करता हूँ| लेकिन डर छुपाने से नहीं छिपता है| छिपाने की कोशिश में ही वह बाहर आ जाता है|
मौन मेरी अपनी भाषा है, इसे मैंने किसी से सीखा नहीं है| 9 महीने तक माँ के गर्भ में रह कर मैंने इसे साधा है| माँ के गर्भ से निकल कर मैं तुरंत नहीं चीखा था, रोने से पहले थोड़ी देर 'मौन' रहा था| मौन रहना, सुनना, रोना और मुस्कुराना ये चार चीज़े मैं अपने साथ लेकर आया था| इसके लिए मैंने कहीं से ट्रेनिंग नहीं ली थी| इसीलिए मैं जब भी मौन होता हूँ, 'मैं' नहीं होता हूँ-बस 'मौन' होता है, एक समग्र मौन| माँ के गर्भ में आने से पहले मैं मौन में था-मौन के गर्भ से ही मैं माँ के गर्भ में आया था| पहली बार जब मैंने 'माँ' शब्द का उच्चार किया था, तो वह कोई शब्द नहीं था, वो मेरे मौन का विस्तार था| इस जीवन से जाने से पहले भी अंतिम बार मैं इसी शब्द का उच्चार करके अनंत मौन के गर्भ में चला जाऊँगा| मेरे बाबा ने भी ऐसे ही किया था| मरने से पहले वे कोमा में चले गए थे| उनकी आँखे हमेशा बंद रहती थी| न वे किसी से कुछ बोलते थे, न ही किसी की कोई बात सुन सकते थे| बस कभी-कभी माँ शब्द का उच्चार करते थे| मरने के बाद वे बिलकुल 'मौन' हो गए थे|
कल शाम का खाना आदित्य के यहाँ खाया था| वे गाँव से मरुआ का आटा लेकर आए थे| इधर काफी दिनों से मैं मरुआ की रोटी खाना चाह रहा था| कल मरुआ की मोटी रोटी, देशी घी और गुड़ खाकर शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी तृप्ति मिली|
पिंज़रे के तोते की तरह मैं दिल्ली में छटपटा रहा हूँ| शहर की हवा शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी बीमार कर रही है| आदमी को कभी भी ऐसी जगह नहीं रहना चाहिए जहाँ वह कहीं भी पेशाब नहीं कर सकता हो| जंगल और गाँव मुझे इस लिए पसंद है कि वहां पेशाब करने के लिए किसी विशेष नियमों का पालन नहीं करना पड़ता है| खुले में पेशाब करना एक महान सुख है। शहर हमें ऐसे बहुत से सुखों से वंचित करता हैं| अनावश्यक 'dos और don'ts में रहना मुझे पसंद नहीं है- यहाँ से चलो, यहाँ से मत चलो, ये करो, ऐसा मत करो -शहरों में इन सब बातों से मैं बहुत थक जाता हूँ| शहर मनुष्यों के लिए नहीं मशीनों के लिए हैं| वही मनुष्य शहर में रह सकता है जो मशीन बनने को तैयार हो| आदित्य का बच्चा अभी सिर्फ आठ महीने का हैं| कल उनके बच्चे को देख कर मैंने उनसे वही कहा जो वानगोग ने अपने भाई थिओ से कहा था, "बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है|" आदित्य मेरी बातों को नहीं समझे, लेकिन उनका बेटा मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था|
मेरा महा-प्रयोग बहुत ही सही ढंग से सफलता पूर्वक चल रहा है| आज पांचवा दिन है, बिस्तर पर जाने का समय और मोबाइल को ऑन और ऑफ करने के मामले में मैं एकदम सही जा रहा हूँ| खाने के मामले में 2% इधर-उधर हो जाता है| बांकी प्रगोय से काफी कुछ बदल रहा है जीवन में| बदलते-बदलते एक दिन मेरा जीवन बिलकुल वैसा ही हो जाएगा, जैसा अभी हैं| बहुत बदले के बाद चीज़ें एन अपने जैसी हो जाती हैं|

Friday, 1 November 2019

जवाब दुःख की जननी है (महा-प्रयोग डे-3)

इस बार, मुंबई से रोज़ चालीस मिनट वाक करना, दाहोद से दोपहर को खाने के बाद सोना, और मेहसाणा से खाली बैठना सीख कर लौटा हूँ| महाप्रयोग के पहले दो दिन सुबह-सुबह वाक करने के लिए सिटी फारेस्ट गया था| लेकिन आज नहीं गया| ख़बर की माने तो दिल्ली में प्रदूष्ण का लेवल बहुत ही ज्यादा बढ़ गया है| कल वाक से आने के बाद मुझे भी बड़ा अजीब-सा फील हो रहा था-सर भारी हो रहा था, और सांस लेने में भी दिक्कत महसूस कर रहा था| इसीलिए आज से वाक के लिए जाना बंद कर दिया है| पुराने दिनों में लोगों ने जिस नर्क की परिकल्पना मरने के बाद आसमान के किसी सातवें लोक में की थी, उस नर्क को हमने शहरों के रूप में जमीन पर उतार लिया है| 
  
आज प्रयोग का तीसरा दिन है| कल का दिन अच्छा गुजरा| फोन समय पर ऑन और ऑफ किया था| रात सोने भी टाइम पर चला गया था| अगर कहीं कुछ चूका तो वो खाने में, परसों की तरह कल भी एक बार बिना चीनी की चाय पी| वैसे मैं कभी चाय नहीं पीता हूँ, मुझे कॉफ़ी पसंद है, पर पता नहीं क्यूं मैंने कल ख़ुद ही दिव्या से चाय बनाने को कहा| चाय पीने के बाद मैं घंटो सोचता रहा कि ऐसा मैंने क्यों किया? लाख कोशिशों के बाद भी मैं कोई ठोस जवाब नहीं ढूढ़ पाया| वैसे जवाब ना पाकर मैं काफी खुश था| अगर कोई जवाब मिल जाता तो शायद मैं दुखी हो जाता| मैं जीवन में सिर्फ उन्ही चीज़ों को लेकर दुखी होता हूँ जिसका जवाब मिल जाता है| उसके मामले में भी ऐसा ही हुआ था| जब वो एक दिन अचानक मुझे छोड़ कर चली गई, तो कुछ दिनों तक मैं बड़ा हैरान रहा था| उसका यूं अचानक बिना कुछ बताए चले जाने की वजह ढूंढता रहा| काफी दिनों तक मुझे कोई वजह नहीं मिली| महीनों तक उसका जाना मेरे लिए रहस्य बना रहा| मैं बहुत ही खुश था| इसलिए नहीं कि वह मुझे छोड़कर चली गई, बल्कि इसलिए कि मैं उसके जाने की कोई वजह नहीं ढूंढ पाया| फिर एक दिन मुझे वजह मिल गई- मेरे पास पैसे नहीं थे, और ना ही मैं पैसे कमाना चाहता था, इसलिए वो मुझे छोड़कर चली गई| फिर मैं बहुत दुखी हो गया| इसलिए नहीं कि वो मुझे पैसों की वजह से छोड़ कर चली गई, बल्कि इस लिए कि वो मुझे छोड़ कर चली गई| मुझे छोड़ कर वो जिस व्यक्ति के पास गई वह मुझसे भी ज्यादा गरीब और दरिद्र था| लेकिन वह उसके साथ खुश थी क्योंकि वह ढेर सारा पैसा कमाना चाहता था| असली सवाल 'चाह' का था| उन दिनों अगर मैंने कबीर को नहीं पढ़ा होता, तो शायद वह मुझे कभी छोड़कर नहीं जाती, 

"चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह । जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह|"-कबीर 

मुराकामी को पढ़ना काफी अच्छा लग रहा है| मेरा अनुमान सही था, मुराकामी के बारे में मैंने जैसा सोचा था वे वैसे ही निकले| मुराकामी की 'नोर्वेगैन वुड' के अलावा मेरे टेबल पर इन दिनों पांच और किताबें हैं-गीत चतुर्वेदी की 'न्यूनतम मैं, और सावंत आंटी की लड़कियां', लिओ तोल्स्तोय की 'वॉर एंड पीस', गोर्की की 'मदर', और निर्मल वर्मा की 'वे दिन'| इन पांच किताबों के अलावा टेबल एक और किताब है जो गिफ्ट रैप के अंदर बंद है| इस किताब को मैंने 'नोर्वेगैन वुड' के साथ मनवाई है| यह किताब दिव्या को उसके बर्थडे के दिन गिफ्ट दूंगा| दिव्या को उसके हर बर्थडे पर एक किताब गिफ्ट देता हूँ| अक्सर यह वो किताब होती है, जो मुझे पढ़नी होती है| 
इन छः किताबों के अलावा टेबल पर एक डायरी और दो पेन भी  हैं| यह डायरी और कलम उम्मेद स्वामी ने मुझे इस बार मेहसाणा में उपहार स्वरूप दिया| डायरी बहुत ही सुंदर है-ऊपर चमड़े की कवर है, और भीतर हैण्डमेड पेपर हैं| कलम भी मेरे पसंद की है| जबसे दिल्ली आया हूँ रोज़ कुछ-न-कुछ डायरी में लिख रहा हूँ| बहुत दिनों बाद कलम से लिखना बहुत ही सुखद लग रहा है| हालाँकि आदत छूट जाने की वजह से जल्दी ही उँगलियाँ दुखने लगती है|

पूरा दिन घर पर बैठा रहता हूँ, प्रदुषण की वजह से कहीं आने-जाने का मन नहीं करता है| कल शाम सोचा था कि पीवीआर पर कॉफ़ी पीने जाऊं, पर फिर यह सोच कर रुक गया कि वहां दूध वाली कॉफ़ी पीना पड़ेगा| बाहर की ब्लैक कॉफ़ी बहुत ही खरनाक और कड़वी  होती है| दो बार इस कड़वे अनुभव से मैं गुज़र चुका है| एक बार दो साल पहले अमोल स्वामी के साथ देहरादून में और अभी दिवाली पर पुष्कर में उम्मेद स्वामी के साथ|
पुष्कर घाट से ही लगा एक कैफ़े है 'मामासीता कैफ़े'| पुष्कर पहुँचने के बाद हम (उम्मेद स्वामी और मैं) थोड़ी देर घाट पर बैठकर बाते करते रहे| थोड़ी देर बाद हमें नींद आने लगी| हम घाट पर से उठ कर कैफ़े में आ गए|
'आप क्या लेंगे?' उम्मेद स्वामी ने मुझसे पूछा| 'लेना तो मैं ब्लैक कॉफ़ी चाहता हूँ, लेकिन ये लोग बहुत कड़वा बनाते हैं| एक बार मैंने देहरादून में अमोल स्वामी के साथ पी थी, नानी याद आ गई| चार लोटा गर्म पानी मिलाने के बाद भी वो कॉफ़ी ब्लैक से ब्राउन नहीं हुई|", मैंने उनसे मेन्यु देखते हुए कहा| "यहाँ ऐसा नहीं होगा, मैं उनसे बोल देता हूँ, आप के लिए बढियां लाइट कॉफ़ी बना देंगे|", मेरा डर दूर करते हुए उम्मेद स्वामी बोले| वेटर को बुलाकर उन्होंने मेरे लिए एक 'लाइट' ब्लैक कॉफ़ी और अपने लिए एक मसाला चाय आर्डर दिया| 
दस मिनट बाद वेटर कॉफ़ी लेकर आया है| कॉफ़ी एक ब्लैक थर्मस में बंद था| थर्मस में साथ वह एक सफेद कप-प्लेट और ब्राउन सुगर के कुछ पैकेट रख गया| उम्मेद स्वामी की चाय आने में अभी टाइम था| "भाई, ये गाना बदल कर कोई कैलासिक्ल सॉफ्ट म्यूजिक लगा दो", उम्मेद स्वामी ने वेटर से कहा| मैंने थर्मस से कॉफ़ी कप में उड़ेला, कप बहुत ही प्यारा था| कॉफ़ी का रंग देख कर मेरे चेहरे का रंग उड़ गया| मेरा अनुभव कहने लगा-यह कॉफ़ी बहुत ही खतरनाक  है| लेकिन फिर बुद्धि ने कहा-क्या पता बस ब्लैक दिख रहा हो, हो लाइट ही| मैंने आधे कप को कॉफ़ी से भरा, फिर उसमे दो पैकेट चीनी डाला-अगर कड़वा हुआ तो चीनी से थोड़ी कड़वाहट कम हो जाएगी| दो मिनट बाद मैंने पहला सिप लिया- याआआआक्क्क....!! गिलोई के जूस से भी ज्यादा कड़वा था ...येंआआआ...! दवाई की तरह जैसे तैसे मैंने उसको खत्म किया है| फिर उम्मेद स्वामी ने वेटर से कह कर दो कप गर्म पानी मंगवाया| थर्मस में गर्म पानी आया| मैंने पानी से अपने कप को भरा, फिर कॉफ़ी वाले थर्मस से दो बूँद कॉफ़ी उस पानी में डाला| कॉफ़ी वाले थर्मस में अभी जितना कॉफ़ी था उससे कम-से-कम मैं बीस कप कॉफ़ी अपने लिए तैयार कर सकता था| बचे हुए गर्म पानी से उम्मेद स्वामी ने अपने लिखे कॉफ़ी तैयार किया| "इतना कड़वा कॉफ़ी कौन पीता होगा, किसके लिए बनाते हैं ये लोग, अगर लाइट ऐसा है, तो डार्क कैसा होगा...", उम्मेद स्वामी ने मुझसे पूछा| मेरे पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं था| मैं बहुत खुश था| जवाब ढूंढ कर मैं दुखी नहीं होना चाहता था| "शायद जीवन की कड़वाहट को कम करने के लिए लोग इतनी कड़वी कॉफ़ी पीते हैं", कार में बैठते हुए उम्मेद स्वामी ने मुझसे कहा| उन्हें जवाब मिल गया था, और मैं देख सकता था कि जवाब मिलने के बाद वे काफी दुखी हो गए थे| सीट बेल्ट लगाते हुए मैंने उन्हें जीवन का एक सूत्र दिया-जवाब दुःख की जननी है| 



सावंत आंटी की लडकियाँ (महा-प्रयोग डे- 2)

कल शाम 'सावंत आंटी की लड़कियां' समाप्त हुई| किताब मुझे बहुत ही अच्छी लगी, खासकर पहली (सावंत आंटी की लड़कियां) और अंतिम (साहिब है रंगरेज) कहानी बहुत ही कमाल की है| गाली-गलौज, और हगने-पादने को गीत ने इतने कलात्मक ढंग से कहानी में इस्तेमाल किया है कि मैं दंग रह गया| कहानियों में गालियों के प्रयोग से इतना ज्यादा प्रभावित मैं पहले कभी नहीं हुआ था| पूरी किताब में अगर मैंने कहीं कुछ अंडरलाइन किया है, तो वह गाली-गलौज और हगने पादने की बातें| कुछ अंडरलाइन आपके साथ यहाँ शेयर करता हूँ, हालाँकि इन लाइनों की महिमा आप बिना सन्दर्भ के समझ नहीं पाएँगे, फिर भी.... 

"इश्क़ छिपाए नहीं छिप पाया| पानी में हगे गए की तरह ऊपर आ गया"

"डिम्प की माँ की कुछ चीज़ें बहुत मशहूर थी- एक तो उसके भारी-भरकम नितम्ब, जो चलते समय बहुत नैसर्गिक तरीक़े से अप एंड डाउन होते थे और यह अफ़वाह फैलाते थे कि उसका पति पीछे से करता है|" 
"दीनानाथ कांबले के चेहरे पर तनाव तब और बढ़ गया, जब उन्हें पता चला कि उनका भाभड़ा और निरा चिम्हड़ी बेटा ऐसा चुतिया-बसंत टाइप एलान करके गया है|" (इस लाइन को पढ़ कर में दस मिनट तक पेट पकड़ कर हंसता रहा था|)

दूसरी कहानी 'साहिब हैं रंगरेज' बहुत ही अलग, थॉट-प्रोवोकिंग, और सुंदर कहानी है| किताब पढ़ते हुए मुझे कई बार मिलान कुंदेरा की किताब 'अन्बेरबल  लाइटनेस ऑफ़ बीइंग' की याद आई| कुंदेरा की तरह गीत भी हमें उन चीज़ों के बारे में सोचने के लिए मजबूर करते हैं, जिनको हम आम तौर पर बहुत ही हल्के में लेते हैं|  
इन दिनों गीत चतुर्वेदी मेरे सबसे पसंदीदा लेखक हैं, उनकी किताब 'न्यूनतम मैं' को मैं तकिये के नीचे रखकर सोता हूँ| इधर मेरा भोपाल जाकर उनसे मिलने का भी बड़ा मन था, सोचा था मेहसाना से सीधा भोपाल जाऊंगा, और वहां से फिर दिल्ली| लेकिन, आश्रम पहुँचने के बाद मन इतना निष्क्रिय हो गया कि कहीं आने-जाने का दिल ही नहीं किया| गीत से मिलकर उनका ऑटोग्राफ लेने लिए भक्तराज, रावसाहब और मैंने 'न्यूनतम मैं' की तीन नई प्रतियां भी मंगा ली थी| आश्रम का नशा मुझ पर ऐसा तारी हुआ कि मैं आश्रम के गेट से बाहर निकलने से पहले भी दो बार सोचता था| आश्रम में बिताए दस दिन मेरे इस साल के अब तक के सबसे बेहतरीन दिन थे| आश्रम के अन्दर मैं ऐसा ही फील करता हूँ जैसा बच्चा गर्भ में फील करता है| जैसे गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए माँ सांस लेती है, वैसे ही जब मैं आश्रम में होता हूँ, अस्तित्व मेरे लिए सांस लेता है| 

'सावंत आंटी की लड़कियां' समाप्त करने के बाद कल शाम ही मैंने एक नई किताब शुरू की है- मुराकामी की 'नार्वेजियन वुड'| पहला बीस पेज पढ़ कर ही मजा आ गया| मुराकामी को पहली बार पढ़ रहा हूँ| अभी तक उनके बारे जितना पढ़ा और सुना है, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उनकी किताब मुझे जमेगी| आगे पूरी किताब पढ़ने के बाद ही किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है| डी.टी सुजुकी के अलावा मुझे नहीं याद है कि इससे पहले किसी जपानी लेखक को मैंने  कभी पढ़ा है| जापान से मेरा संबंध झेन तक ही सिमित रहा है| और झेन के बारे मैंने जितना भी जाना, सुना और समझा है उसका क्रेडिट जाता है ओशो और एलन वाट्स को| डी.टी सुजुकी को पढ़कर मैंने झेन को बस जाना था, झेन से असली प्रेम मुझे ओशो और एलन वाट्स की वजह से हुआ| 
आज 'महा-प्रयोग' का दूसरा दिन है| कल का दिन क़रीब-क़रीब अच्छा बीता| पूरा दिन तो मेरा सही गया, बस शाम में थोड़ा गच्चा खा गया| 
कल मेरे साथ वैसा ही हुआ जैसा धर्मकोट में राव साहब के साथ हुआ था| एक दिन ऑर्गनिक थाली में खाना खाते समय राव साहब की मुलाकात एक अहमदाबादी लड़की से हुई| जहाँ वे खाना खा रहे थे वहीं बगल वाले टेबल पर लड़की रूमी को पढ़ रही थी| बहुत हिम्मत इकठ्ठा करके राव साहब ने उससे बात की| बातचीत से उनको यह पता चला कि लड़की उनके ही शहर अहमदाबाद से है, पिछले एक महीने के धर्मकोट में रह रही है, और कभी-कभी जब उसे घर पर खाना बनाने का मन नहीं होता है, तो वो यहाँ ऑर्गनिक थाली पर खाने चली आती है| राव साहब बड़े खुश हुए- अगर यह लड़की पट गई तो मजा आ जाएगा, अपने ही शहर की है, फिर तो रोज़ मिलना हो पाएगा, रूमी को पढ़ती है, मतलब समझदार टाइप की है, और एक महीने से यहाँ रह रही है, यानी की अपने टाइप की है| फिर क्या था उससे दुबारा मिलने के लिए राव साहब रोज ऑर्गनिक थाली का चक्कर लगाने लगे| संयोग ऐसा बना कि वह दुबारा नहीं आई| राव साहब ने रेस्टोरेंट के मनेजर को अपना नंबर भी दिया यह कह कर कि वह लड़की अगर कभी आए तो उसे इस नम्बर पर कॉल करने को बोलना, मुझे उसके मारफत कुछ अहमदाबाद भेजना है| आस-पास के सब्जी वालों को भी लड़की का हुलिया बता कर राव साहब ने यह पता करने की कोशिश की कि क्या ऐसी कोई लड़की उनके पास सब्जी लेने आती है| -अहमदाबाद की कोई लड़की हाथ में रूमी की किताब लेकर आपके यहाँ सब्जी लेने आती है? वह एक महीने से यहाँ रह रही है..उसके बाल कमर तक लम्बे हैं, चश्मा लगाती है, नाक पतले और होंठ मोटे हैं, बड़ी-बड़ी काली आँखें हैं| सिलिंडर बॉडी है, जब वो चलती है तो जमाना उसे रुक कर देखने लगता है| कुछ इस तरह से लड़की के बारे में राव साहब लोगों को बताते थे| राव साहब की रूमानी व्याख्या का असर यह हुआ था कि सब्जी वालों के साथ-साथ मास्टर उगवे भी लड़की को ढूँढने में बहुत रस लेने लगे| 

जब दस दिन की हंटिंग के बाद कहीं से लड़की का कुछ पता नहीं चला, तो राव साहब थोड़े ढीले पड़ गए| मास्टर उगवे भी बहुत उदास हो गए| एक दिन मास्टर उगवे मुझसे कहने लगे, "ये राव झूठ बोलता है, यह ऐसी किसी लड़की से नहीं मिला है| हम पर इम्प्रेशन डालने के अपने को झांसे में ले रहा है| जैसी लड़की ये बता रहा है, मैं नहीं मानता कि ऐसी कोई लड़की इस जनम में कभी इनके जैसे बबूचक से बात करेगी|" उगवे की बात सुनकर राव का मुंह उतर गया|  'लेकिन इजराइली ने तो की थी, बात तो छोड़ीये वो तो एक दिन इनसे हिंदी भी सीखी थी', मैंने मास्टर उगवे से कहा| "इजरायली ने बात की नहीं थी, तुमने इनकी बात उससे करवाई थी| अगर इनके गांड में गू था, तो ये दुसरे दिन उसको क्यों नहीं पढ़ा लिए, एक दिन पढ़ने के बाद दुसरे दिन उसने इनको क्यों नहीं बुलाया?", मुंह बनाते हुए मास्टर उगवे बोले| मास्टर उगवे की बात सुनकर राव साहब को ताव आ गया, " उगवे, गू तो मेर्मे भोत है| इदर कर देगा, तो तुम साला उसका बास से मर जाएंगा| अरे, मैं पादेंगा, तो उसका बास सैन नहीं होएंगा तेर्से, मेरे गू का क्या बात करता है रे तू ?" मैंने देखा मामला गर्म हो रहा है, इससे पहले राव साहब सच में हग देते और मास्टर उगवे सच में ही मारे बास के दम तोड़ देते, राव साहब को वहां से उठा कर मैं तुषिता की तरफ ले गया| हम रोड क्रॉस करके के उस तरफ जाने ही वाले थे कि एक ऑटो हमारे सामने से गुजरा| राव साहब एकदम से ख़ुशी के मारे चिल्लाए, "अरे अहमदाबादी थी उसमे" राव साहब की चिल्लाहट सुनकर मास्टर उगवे भी चाय वाले के पास से उठकर हमारे पास आ गए| राव के चेहरे को देखकर उगवे ने भांप लिया की लड़की मिल गई है| "तुम ऑटो पकड़ो और उसके पीछे जाओ'', उगवे ने राव को सुझाया| राव रोड पार करके ऑटो ढूँढने के लिए भागे| हमने उनका पीछा किया| ऑटो स्टैंड पर कोई भी ऑटो नहीं था| राव मुंह लटकाए खड़े थे| "अब क्या करोगे, साला इसीलिए बोला था कि एक बाइक रेंट पर लेलो, आज बाइक होता तो बबूचक की तरह यहाँ मुंह लटका कर खड़ा नहीं होना पड़ता|", मास्टर उगवे ने राव साहब को लताड़ते हुआ कहा| "कोई नहीं उस ऑटोवाले को लौटकर आने दीजिए, उससे पूछेंगे कि उसे कहाँ छोड़ कर आया| या फिर शाम तक इंतजार करते हैं, लौट कर यहीं तो आएगी|", राव साहब ने ख़ुद को और मास्टर उगवे को दिलासा देते हुए कहा| 'ऑटो वाले को कैसे पहचानेगे?' मैंने राव साहब से पूछा| मास्टर उगवे और राव दोनों मेरी और देखकर हंसने लगे, "हम तो चलती सुन्दरी के भी झांटे गिन लेते हैं, फिर ऑटो का नंबर क्या चीज़ है, " ऐंठ लेते हुए  राव साहब बोले|
ऑटोवाला जब लौट कर आया तो हमें यह पता चला कि वह डेलेक होस्पिटल गई है| होस्पिटल की बात सुनकर राव साहब का प्यार और बढ़ गया-बीमार थी इसीलिए बाहर नहीं निकल रही थी| तभी तो मैं कहूँ कि ऐसा कैसे हो गया कि इन दस दिनों में एक बार भी वहां खाना खाने नहीं आई| मैं अभी हॉस्पिटल के लिए निकलता हूँ, वहीं पर उससे मिल लूँगा| यह कहकर जैसे ही राव साहब ने ऑटो के लिए हाथ दिया मास्टर उगवे बोले, "मुझे भी मेकलोडगंज से एक चूरन लेता था, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ|" राव साहब और उगवे दोनों एक ही ऑटो में बैठ कर निकल लिए| मैं दो मिनट तक वहीं खड़ा राव साहब की दीवानगी और मास्टर उगवे की हरकतों के बारे में सोचता रहा-इनको सच में चूरन लेना था, या ये उस लड़की को देखने गए हैं?
शाम को मास्टर उगवे और राव साहब जब लौट कर आए तो पता चला कि इनके पहुंचे से पहले अस्पताल बंद हो गया था| लड़की का कुछ पता नहीं चला| राव साहब दुखी-दुखी से लग रहे थे| मास्टर उगवे का मानना था कि राव हवा में तीर मार रहा है, ऑटो में कोई और लड़की बैठी थी, राव को भ्रम हो रहा है कि वह अहमदाबादी थी| "जिस तरह की लड़की तुम उसको बता रहे हो, उससे मुझे नहीं लगता है कि वह फ्री वाले अस्पताल में जाएगी| या तो तुम झूठ बोल रहे हो, या फिर वो लड़की कोई और थी", उगवे ने राव से कहा| राव के पास कोई उत्तर नहीं था, वे मुंह लटकाए बैठे थे| उनके लटके हुए मूंह से मैंने अंदाज़ा लगाया कि ऑटो वाली लड़की सच में ही अहमदाबादी थी| 
दो दिन बाद, मास्टर उगवे धर्मकोट छोड़ कर चले गए| जाते समय उन्होंने राव से बस इतना कहा, "टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक ...." जवाब में राव साहब ने दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते किया| यह नमस्ते मुझे बड़ा सिम्बोलिक लगा| क्या मास्टर उगवे के जाने के बाद राव साहब का दिन फिरने वाला था? नहीं ऐसा कुछ भी होने वाला था| जैसा कि राव साहब ख़ुद ही कहते हैं, "मेरी तकदीर साली पोपटलाल जैसी है, लगता है यह जनम हंटिंग में ही जाएगी|" 
मास्टर उगवे के जाने के तीन दिन बाद राव साहब को तुषिता में एक कोर्स ज्वाइन करना था-इंट्रोडक्शन टू बुद्धिज्म' दस दिन के कोर्स का 6000 चार्ज था, रहना खाना अंदर ही था| "कोर्स के लिए जाने से पहले मैं बौद्ध भिक्षु की तरह बाल दाढ़ी मुंडवा लेना चाहता हूँ, आप क्या कहते हैं?", राव साहब ने मुझसे पूछा| 'मुंडवा लीजिए, वैसे भी आपने अंत समय में फॉर्म भरा था, बहुत कम चांस है कि आपका इस बार हो पाएगा| वेटिंग में और भी बहुत लोग होंगे| क्या पता भिक्षु वाले लुक से आप का चांस थोड़ा बढ़ जाए', मैंने राव साहब से कहा| "हाँ मैं भी ऐसा ही सोच रहा हूँ, और थोड़ा अहमदाबादी नहीं मिली इस ग़म में भी मैं बाल मुंडवाना चाहता हूँ, " गमगीन होते हुए राव साहब बोले| 
तुषिता के लिए जाने से एक दिन पहले राव साहब बाल और दाढ़ी मुंडवाकर आ गए| एकदम छिले हुए अंडे लग रहे थे| दिव्या उनके नए रूप को देख कर बहुत देर तक हंसती रही थी| मास्टर उगवे ने राव साहब को जो उपनाम दिया था 'बबूचक' उस का अर्थ तो मैं अभी तक नहीं समझा था, लेकिन साहब का नया लुक देखकर यह जरूर समझ आ गया कि गुण के साथ-साथ इस शब्द की अपनी एक शक्ल भी है| 
अगले दिन राव साहब नहा-धोकर तुषिता के लिए निकले| जिस रूम में रह रहे थे उस को खाली करके हिसाब चुकता कर दिया| हम सब से विदा लेकर गिरती बारिश में निकल पड़े| जब राव साहब जा रहे थे, तभी मैंने मकान मालिक के गाय और बछड़े को देखा| गाय अपने जीभ से चाट कर बछड़े को साफ़ कर रही थी| गाय के नवजात बछड़े को देखकर मैं बड़ा हैरान हुआ- बछड़ा एकदम बबूचक दिख रहा था| 

हमसे विदा लेकर जाने के ठीक एक घंटे बाद गिरती बारिश में राव साहब ससामान तुषिता से लौट कर आ गए, "वेटिंग कन्फर्म नहीं हुआ, यह इस साल का आखरी कोर्स था, सो बहुत कम लोगों ने केंसल किया", बैग रखते हुए राव साहब बोले| बल्ब की रौशनी में राव साहब का बेल एकदम चमक रहा था| जो रूम वे छोड़ कर गए थे, वही रूम उन्हें फिर से मिल गया| अपने सामान की ओर इशारा करते हुए मुझसे बोले, "सामान बाँध कर इस सोच में खड़ा हूँ कि जो लोग कहीं के नहीं रह जाते हैं, वे कहाँ जाते हैं?" 
तुषिता से निराश होने के बाद राव साहब का दिल बहुत बैठ गया था, "चलिए आज शाम में बाकसू चलते हैं, मुझे कुछ शोपिंग करनी है| अब मैं दो चार दिन से ज्यादा यहाँ नहीं रुकुंगा| लड़की भी नहीं मिली, इजरायली गच्चा दे गई, अहमदाबादी मिल नहीं रही है, तुषिता में एडमिशन हुआ नहीं, अब किस लिए रुकू मैं यहाँ?" 
शाम को हम तीनों (राव साहब, दिव्या और मैं) बाकसू गए| राव साहब और दिव्या ने शोपिंग की और मैंने जिस सलून में राव साहब ने बेल मुंडवाया था, उसी में बाल ढाढ़ी सेट करवाया| शोपिंग वगैरह करने के बाद पिज़्ज़ा-विज्ज़ा खाकर जब हम धर्मकोट की और लौट रहे थे, एक जगह अचानक से राव साहब जमीन पर लोटने लगे| मैं बड़ा हैरान हुआ इस तरह से नागिन डांस करते मैंने राव साहब को पहले कभी नहीं देखा था| "क्या हो गया इनको?" दिव्या मुझसे पूछी| इस बीच राव साहब उठकर खड़े हुए और बोले, "अहमदाबादी बैठी है उस सामने वाले शॉप में|" ये कह कर वे फिर जमीन पर लोटने लगे| 'इस तरह से जमीन पर लोटने से क्या होगा, जाकर बात कीजिए उससे', हाथ पकड़ कर उठाते हुए मैंने उनसे कहा| "अरे, मैं अब क्या बात करूं उससे", राव साहब अपने सिर और दाढ़ी पर हाथ फेरने लगे| उनका भाव समझ कर दिव्या जोर-जोर से हंसने लगी| अब मैं भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया| "इसी को कहते हैं सर मुंडवाया और ओले पड़े, अब ये बबूचक जैसी शक्ल लेकर क्या मिलूँ मैं उससे | पंद्रह दिन से ढूंढ रहा था तब तो मिली नहीं, अब जब बेल मुंडवा लिया तो मिली है,", राव साहब मुझसे बोले| मुझे पता नहीं क्यों मास्टर उगवे की वो बात याद आ गई जो उन्होंने जाते-जाते राव साहब से कही थी- टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक ....|   
ठीक यही चीज़ कल मेरे साथ हई| जैसे ही मैं आदित्य के रूम से उतर रहा था, उनके मकान मालिक ने मुझे बुला लिया| मेरे लाख मना करने के बाद भी अपनी पत्नी से मेरे लिए चाय बनाने के लिए बोल दिया| बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें चीनी डालने से रोका| फिर जैसे ही हम चाय पी रहे थे, उनकी बेटी एक थाल में मिठाइयाँ लेकर आ गई| थाल में वो सारी मिठाइयाँ थी जो मुझे पसंद है| कुछ देर मैं गौर से मिठाइयों को देखता रहा, पांच महीने बाद एक बार फिर से मुझे मास्टर उगवे की वो बात याद आ गई, जो उन्होंने राव साहब से कही थी, "टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक...."| 
                                            (01-Nov. 2019, 13:52 PM, Delhi) 



नोट- लाल रंग से लिखे सारे वक्तव्य गीत चतुर्वेदी की किताब 'सावंत आंटी की लड़कियाँ' से लिए गए हैं| 

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...