Sunday, 14 July 2019

बारिश, पहाड़ और आरुषी


iKKyuTzu Kensho, [24.06.19 20:19]
आरुषी, मैं जिनके यहाँ ठहरा हुआ हूँ उनके बड़े बेटे विकास (बदला हुआ नाम) की ४ वर्षीया बेटी, अपने बुआ से लड़ रही है। कभी किसी बात पर चिल्लाने लगती है, तो कभी कोई गीत गाने लगती है। ले.. अब अपनी गाड़ी में बैठकर दादी के आस-पास चक्कर लगा रही है। वहीं उसकी माँ गेहूँ से कंकड़ निकाल रही हैं। और उसकी दादी खुले आँगन में बैठकर ऊन का स्वेटर बुन रही है। और मैं, इक्क्यु केंशो तजु, बरामदे में बैठकर ग्रीन-टी पी रहा हूँ। अभी बस दो मिनट पहले राव साहब यहाँ से उठकर अपने कमरे में गए हैं। तबियत ख़राब होने की वजह से उन्हें बाहर ठंड लग रही थी। दिव्या भी कमरे में बैठी है, शायद लैप्टॉप पर कुछ काम कर रही हैं। ये देखिए...., अदिति के दादा हाथ में बाल्टी लिए कहीं से लहराते हुए आ रहे है। शायद गाय को पानी पिला कर आ रहे हैं। आरुषी की मम्मी ने अपने ससुर को देखकर सिर पल्लू से ढक लिया है। आरुषी के दो चाचा हैं, और दोनो अपने आप में एक केरेक्टर हैं। बड़ा चाचा प्रकाश (बदला हुआ नाम), जिस दिन से मैं यहाँ आया हूँ (मुझे यहाँ आए आज २२ दिन हो गया), पिली टीशर्ट और छोटा वाला चाचा पप्पू एक ग्रीन टीशर्ट पहनकर घूम रहा है। राव साहब ने दोनों का नाम चमड़ी रख दिया है। वैसे यहाँ आकर राव साहब को भी एक नया नाम मिला है। उनकी दिलफेंकी वाली आदत को देखते हुए, मास्टर उगवे ने उन्हें बबूचक’ बुलाना शुरू कर दिया है। अल्लाह जाने ये ‘बबूचक’ का क्या अर्थ होता है।
आरुषी की बड़ी बुआ की भी मुझे कोई कहानी लगती है। छोटी के बिल्कुल विपरीत वह अक्सर शांत-शांत और थोड़ी उदास जैसी रहती है। उनके चेहरे को देखकर लगता हैं कि वो किसी गहरे ग़म में जी रही है| हो सकता है, मेरा अनुमान ग़लत हो..गॉड नोज़ क्या सच है| अरे....ये देखिए बारिश शुरू हो गई। पूरा पहाड़ बादलों से ढक गया है। मेरे मेज़बान यानि आरुषी के दादा पानी गिरता देख कोई पहाड़ी गीत गुनगुना रहे हैं। वैसे उनके मयनोशी का वक़्त भी हो चला है। आप रोज़ शाम को जाम पीते हैं। ७० के क़रीब उनकी उम्र है, सिर पर पहाड़ी टोपी पहनते हैं, और अक्सर हाथ में सिगरेट जलाए इधर-से-उधर घुमते रहते है, सेहत से बड़े फ़िट और दुरुस्त हैं। बारिश से बचने के लिए आरुषी की दादी भी आँगन से उठकर अपने कमरे में जा रही है| आरुषी ऊन का गोला उठाए उनके पीछे-पीछे चल रही है| अपने नन्हे हाथों से बड़ी मुश्किल से गोले को संभाल पा रही है| मुझे अपना बचपन याद आ गया| माँ को स्वेटर बुनने का बहुत शौक है| कभी जब ऊन का गोला उनकी गोद से लुढ़ककर नीचे चला जाता था, तो हमें उठाकर लाने के लिए कहती थी| आरुषी की तरह मैं भी बड़ी मुश्किल से बड़े गोले को अपने हाथों में संभाल पाता था| वो कथई रंग की स्वेटर जो माँ ने मेरे लिए बुनी थी, मुझे आज भी याद है| माँ ने गलती से गला छोटा बुन दिया था| बड़ी मुश्किल से मेरा सिर उसमे घुस पाता था, पहना और निकालना दोनों किसी कवायत से कम नहीं था| फिर भी बहुत सालों तक मैंने उसे पहनता रहा था| साइकल सीखते समय जिस दिन मेरा हाथ टूटा था, उस दिन भी मैंने वही स्वेटर पहन रखा था| बाद में जब स्वेटर मुझे छोटा होने लगा, तो माँ ने उसे उधेड़कर साकेत के लिए, नहीं शायद सुरुचि के लिए उसका स्वेटर और टोपी बुन दिया| जब हम थोड़े बड़े हो गए, तो हमें हाथ से बुना हुआ स्वेटर पहनने में शर्म आने लगी| अब सब बाजार से स्वेटर खरीद कर पहनने को अच्छा मानने लगे थे| जमाना बड़ी तेजी से बदल रहा था| कुछ दिनों तक माँ जबरदस्ती हाथ से बुना हुआ स्वेटर और टोपी पहना देती थी| लेकिन बाद में हमारे जिद के आगे हार मान गई| और फिर ऐसा भी हुआ कि ज्यादा देर बुनाई करने से उनको आँखों में तकलीफ होने लगती थी|
मेरे सामने टेबल पर आज का अख़बार (जिसे पढ़कर मैं सुबह से दुखी हूँ), केले का छिलका, चाक़ू, ग्रीन-टी का कप और सोग्यल रिंपोचे की विश्व प्रसिद्ध किताब ‘The Tibetan book of Living and dying’ पड़ी है। आधी से ज़्यादा किताब ख़त्म कर चुका हूँ। १० दिन पहले तुषिता की लाइब्रेरी से ६०० रुपया जमा कर के, १० रुपये सप्ताह किराए पर किताब इशू कराया था। सोचा था ४०० पेज की किताब है ४ दिन में पढ़कर लौटा दूँगा। लेकिन किताब इतनी प्रफ़ाउंड है कि एकदम से निगल नहीं पाया।
किताब पूरी करने के बाद तबसिरा (www.ikkyutalk.blogspot.com) पर किताब का अनुभव आपसे शेयर करूँगा। रुकिए मुझे शाम के खाने के लिए दही लाने जाना होगा। दिव्या का आज पंजाबी करी बनाने का प्लान है। दही लेकर आता हूँ, फिर आपको आगे की कहानी सुनाऊँगा।
लीजिए मैं दही लेकर आ गया। अरूषी अब फूल के गुलदस्ते से खेल रही। गुलदस्ते में दो फूल है, एक का रंग हरा है दूसरे का पीला। मज़ा यह है कि आरूषी ने जो कपड़े पहन रखें हैं, उसका रंग भी हरा और पीला है।
दही लाने दिव्या भी मेरे साथ गई थी। हम तुषिता तक गए थे। अभी जहाँ हम ठहरे हुए हैं, वहां से तुषिता पहुँचने में २ से ३ मिनट लगते हैं| तुषिता के मेन गेट के बाहर ही हिमालय टी शॉप है (धर्म कोट में सबसे अच्छी और सस्ती चाय यहीं मिलती है), वहीं से दही लिया। जाते समय रास्ते में एक चीज़ देख कर बड़ा हैरान हुआ कि अपनी छतरी के नीचे दिव्या आरुषी के दादा की तरह गाना गुनगुनाने लगी, ‘घर से निकलते ही कुछ दूर.....’। ऐसे तो कभी नहीं गाती है। लगता है बारिश और संगीत का कोई गहरा व अनूठा सम्बंध है। रुकिए अँधेरा घिरने लगा है, कान और पैर को ढकने के लिए कुछ पहन लेता हूँ। वैसे भी यहाँ नंगे पैर घूमना ठीक नहीं है। कुछ दिन पहले मेरे बिस्तर पर एक बिच्छू बैठा हुआ था। रास्ते पर बिच्छू को कई बार यूँ ही टहलते हुए देख चुका हूँ।
चित्र साभार-गूगल
ओह! झींगुर की आवाज़ आनी शुरू हो गई..रात के सन्नाटे में मुझे झिंगरों का ब्रह्मनाद सुनना बहुत पसंद है। गाने की आवाज़ थोड़ा कम करना, ये मैं दिव्या से कह रहा हूँ। वह अंदर कमरे में जगजीत सिंह को सुन रही है। खाना बनाते समय उसे संगीत सुनने की आदत है। मुझे याद है जिस दिन जगजीत सिंह ने इस दुनिया से विदा लिया था, मैं मुंबई में था। कांदीवली से चारकोप सेक्टर -८ की बस में बैठने के लिए, बस स्टॉप पर लाइन में खड़ा था। मेरे एक दोस्त ने तभी फ़ोन करके मुझे जगजीत सिंह जी के शरीर छोड़ने की ख़बर दी। (खो..खो...खो... माफ़ कीजिएगा, किसी दोस्त ने फ़ोन नहीं किया था, वो वही थी जिसकी कहानी मैंने 'डोंट आस्क मी वेन' में लिखा है|) मैं वहीं बस की लाइन में खड़े-खड़े रोने लगा। काफ़ी दिनों तक उनकी मौत पर उदास रहा था। लेकिन, इस वक़्त पहाड़ के इस गहन मौन में उनकी गीतों से ज़्यादा मैं झींगुरों सुनना पसंद करूँगा।
आरुषी के बड़े चाचा, प्रकाश जी (अभी नाम देखकर याद आया पी-से पीला, पी से प्रकाश), अभी उसे गोद में उठाकर आँगन में घूमा रहे हैं। इस वक़्त उन्होंने अपने पीले टीशर्ट के ऊपर एक पीला जैकेट पहन रखा है। लगता है जैसे कर्ण को वरदान में कवच मिला था, वैसे ही किसी ने इनको पीला टीशर्ट दे दिया है। कमरे से पकौड़ों की ख़ुशबू आ रही है, अब मैं और नहीं लिख सकता हूँ। लाइव राइटिंग यहीं बंद करके पकौड़े खाने जा रहा हूँ।

पुनश्च- बारिश थम गई है। आरुषी अपनी दादी के साथ भंसाघर में बैठी है| राव साहब अपने कमरे में बीमारी का बहाना करके लेटे हैं, और लड़कियों से चैट कर रहे हैं। अदिति की छोटी बुआ गाय को चारा खिलाने जा रही है। आरुषी के दादा अपने दोस्त के साथ जाम का मज़ा ले रहे हैं। पहाड़ बिल्कुल शांत और मौन खड़ा है। आकाश में काले बादल छाए हुए हैं। मेरे सामने खड़े पेड़ का एक भी पत्ता नहीं हिल रहा है। शायद वह अभी ओशो सक्रिय ध्यान के चौथे चरण में खड़ा है। दिव्या अभी कमरे में गाना सुन रही है, ‘मैंने सोचा न था....। आरुषी के आँगन में बने मंदिर की बल्ब टिमटिमा रहे हैं। बल्ब की टिमटिमाहट देखकर मुझे अपनी बा (दादी) की याद आ रही, वो भी सालों से इसी तरह टिमटिमा रही ही, ख़ुदा जाने कब ऑफ हो जाएगी|


Friday, 12 July 2019

This too shall pass.

Question- Swamiji, a few days back I broke up with my girlfriend. Now, I am in great sadness and distress. What should I do? Will meditation help me? Which meditation should I do?
Answer- “Not letting even a single thought go unnoticed is meditation” J. Krishnamurti.
It often happens that people start practising meditation after heartbreak to escape from the loneliness. It is highly deplorable that we always become interested in religion at the wrong moment and for the wrong reasons only. Kabir is right when he says’

”दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोई, जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होई”
Always remember this ’Anything that you do to escape from reality is not meditation.’ Technically, there is no difference between the people who take drugs, and who meditate. One thing is common between them that they are escaping from reality. Whether you go to a movie or Mandir, it is all the same. 
So, if you are actually interested in spirituality and would like to bring about a radical change in your life, you must learn to learn from 'that which is', instead of hankering after 'that which is not'.
Before doing anything, one must ask, 'why am I doing this or going to do this..?' 'Why I want to meditate?' Ask this question to yourself and it will be the beginning of meditation. Know your motive of doing meditation. And this very knowledge is meditation not what you do in the name of meditation.

Sitting silently is not meditation, watching breath or chanting mantra is not meditation. There is no such thing, action or activities as meditation. Meditation is not an act. Hence, there is no technique or shortcut. 
Knowing the motive, especially the hidden-motive of every action that you do is meditation. So, when you ask how to meditate, you basically are asking a wrong question. There is no 'how-to-ism' in the realm of spirituality. Anybody who is answering your 'how-to' is fooling you, in fact exploiting you, be it your Guru or Google. These days, Google is fooling people more than any Guru or God. 

Your heartbreak can become a great spiritual breakthrough if you don't make an escape from it. As we say in Zen, "If the fool would persist in his folly, he would become wise." So, learn to persist, don't escape. It is rightly said in Lazy men’s guide to enlightenment ”when in hell, keep going. The road to heaven goes through hell.” So, keep going. ”This too shall pass. 

रडिंग और traveling से मेरे गूँगेपन को शब्द मिलता है

प्रश्न- आज आप हर सवाल का जवाब और किसी भी समस्या का समाधान बता रहे हो, ऐसी समझ आपने कैसे प्राप्त की, इसके लिए क्या किया?
इक्क्यू-जितनी समस्याएँ हमें दिखती हैं, उतनी असल में है नहीं।समस्या एक ही और वह यह है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं। बाँकी सभी समस्याएँ एक इसी समस्या की प्रतिछवि है। सो, यदि आप इस एक समस्या का समाधान ढूँढने निकलते हैं, तो उसी यात्रा में बाँकी सभी समस्याओं का समाधान मिल जता है।
और, ख़ुद को जनाने का जो सूत्र है वह है ‘self-study’ (स्वाध्याय), यानी अपने शरीर, विचार और भाव का चुनाव रहित अवलोकन। 

यही मैं करता हूँ , और यही मैं चाहता हूँ कि आप भी करिये। यही वह सूत्र है। 
‘सक्षित्व या स्वाध्याय’ वो चाभी है जिससे अस्तित्व के सभी राज़ खुल जाते हैं।


एक विशेष बात- अनुभव कई बार आपको गूँगा भी बना सकता है। इसीलिए, निरंतर आपको, जो आपने जाना है उसको जनाने के लिए, अभिव्यक्ति के नए-नए माध्यम तलाशते रहना चाहिए। रडिंग और traveling से मेरे गूँगेपन को शब्द मिलता है।

Wednesday, 10 July 2019

इस जगत में कोई भी ‘आर्डिनरी’ नहीं है..


प्रश्न- बुद्ध की वाईफ अच्छी थी,. He had a small child. He was king, but still, he left his house and went to the jungle because he wanted to find his truth. I don't love my husband because I m selfish. I want to find my truth. I need someone as a catalytic agent in my religious journey and that person is perfect for that I feel. I can't leave my journey for my husband n family. I don't want to die like ordinary people die. I don't want to die without finding the meaning of my life.

इक्क्यु- सबसे पहले, आप जो ऐतिहासिक भूल कर रही हैं, मैं उसको सुधार दूंघर छोड़ कर गौतम भागा था बुद्धनहीं| इस बात को आप सदा याद रखिए| बुद्ध घर लौट कर आए थे, और घर आते ही सबसे पहले अपनी पत्नी और बेटे से मिले थे| उनसे माफ़ी मांगी थी, उस भूल के लिए जो गौतमने किया थाबुद्ध भगोड़े नहीं थे, भगौड़ा गौतम था| दूसरी बात जहाँ तक मैंने बौद्ध ग्रंथों को पढ़ा है, मुझे इस बात का जिक्र कहीं नहीं मिला है कि घर छोड़ने से पहले गौतम ने किस से राय-मश्वरा किया था| आपका मेरे से सवाल पूछना इस बात का सूचक है कि घर छोड़ने से पहले गौतम की जो मनःस्थिति थी, उससे आपकी मनःस्थिति बिलकुल भिन्न है| गौतम ने अपने बोध से घर छोड़ा था, किसी के अनुकरण में नहीं| इसीलिए, घर छोड़ने के ६ वर्ष बाद ही वह प्रबुद्ध हो गया| अगर आपकी भी ऐसी ही संभावना है, तो शौक से घर छोड़िए| अगर ६ वर्ष बाद आप भी उस प्रकाश को उपलब्ध हो जाएंगी, जो ज्ञान का प्रकाश गौतम को मिला था, तो इतिहास आपके भी घर छोड़ने की भूल को माफ़ कर देगा| लेकिन जैसा मैं जानता हूँ, बुद्ध के पीछे हजारों लोगों ने घर छोड़ा, और उन हजारों में से एक भी आज तक उस ऊंचाई को नहीं छू पाया, जिस ऊंचाई को गौतम ने २६,०० पहले छुआ था|
अगर आप बुद्ध से ही प्रभावित हैं, तो उनकी सूत्रों पर भी जरा ध्यान दीजिए| उन्होंने निर्वाण के लिए जो सूत्र और विधि दिया है, उसका पालन करने के लिए घर छोड़ने की कहीं भी अनिवार्यता नहीं है| बुद्ध के बाद भी सैकड़ों ऐसे जागृत पुरुष/स्त्रियाँ हुई हैं, जिनके टीचिंग में घर छोड़ने की अनिवार्यता नहीं हैं| पिछली सदी में ही, रामकृष्ण, रमण, कृष्णमूर्ति और ओशो जैसे अनेकों ऐसे बुद्ध पुरुष हुए हैं, जिनका पूरा जोर इस बात पर है कि घर छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है| मैं नहीं मानता कि आप इन सब से परिचित नहीं होंगी|

जिस हालात और परिस्थिति में आप घर छोड़ने का निर्णय ले रही, उससे ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा है कि आपका घर छोड़ने का कारण/निर्णय कहीं से भी धार्मिक है| आपका घर छोड़ने का निर्णय नितांत रूप से मानसिक है| आपके इस वक्तव्य, “I don't want to die like ‘ORDINARY people die.” से यह साफ़ जाहिर होता है कि आप श्रेष्टता की ग्रंथिका शिकार हो गई हैं| हीनता और श्रेष्टता दोनों रोग हैअपने को हीन या श्रेष्ठ मानना मानसिक रुग्णता का लक्षण है| एक अति से दूसरी अति में डोलना मन का स्वाभाव है| भारत में शास्त्र के लिए हम एक शब्द का प्रयोग करते हैं ‘ग्रंथ’, ग्रन्थ का अर्थ होता है जो ग्रंथि खोल दें| इसीलिए, जैन परम्परा में उपलब्ध व्यक्ति के लिए ‘निग्रंथ’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है| ‘निग्रंथ’ का अर्थ होता है, एक ऐसा व्यक्ति जो न तो अपने को किसी से श्रेष्ठ मानता, और न ही किसी को अपने हीन मानता है| वह superiority और inferiority दोनों complex से मुक्त होता है| 
इस जगत में कोई भी आर्डिनरी नहीं है| इसीलिए, ‘असाधारणबनने की चाह से बड़ी मुर्खतापूर्ण चाह और कोई है ही नहीं| यह चाह ऐसे ही जैसे कोई परुष कहे कि वह पुरुष बनना चाहता है| और फिर वह पुरुष बनने की दिशा में कोशिश भी करने लगे| परमात्मा की फैक्ट्री में कुछ भी साधारण नहीं बनता है|
ख़ुद को असाधारण, दूसरों को साधारण या फिर ख़ुद को साधारण और दूसरों को असाधारण देखना बंद कीजिए| दोनों ही दृष्टि में भूल है|  तिब्बत में ऐसी कहावत हैराजा मरता है, तो सबको पता चलता है, साधारण आदमी मरता है, तो गावं वालों को पता चलता है| और जब कोई बुद्ध पुरुष या भिखारी मरता है, तो शायद ही किसी को पता चलता है|”  ग़ालिब का एक शेर हैहुए मरके हम जो रुस्वा, हुए क्यों न गर्के-दरिया, न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं माजर होता साधक ऐसी मौत मरने की कामना करता है, न जनाजा उठे न मज़ार बने, किसी को कानो कान ख़बर भी लगे| बुढा तलोत्जु अकेले मरने के लिए हिमालय की बर्फ में चला गया था|
"पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार,
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो"
अपनी दृष्टि को बदिलिए, सृष्टि अपने आप बदल जाएगी| जगह बदलने से अगर सत्य मिलता, तो मामला बहुत आसन होता| ग़ालिब का एक शेर है
“कतरे में दिजला दिखाई ना दे और जुज़्व में कुल,
खेल लड़कों का हुआदीदा-ऐ-बीना ना हुआ
जबतक बूंद में सागर और अंड में ब्रह्म ने दिखाई दे, तब तक सब बचकानी बाते है, तब तक समझिए दृष्टि अभी गहरी नहीं हुई है|
I don't want to die without finding the meaning of my life.” कहाँ खो गया है मीनिंगजिसको आप दूंढ़ रही हैं? और अगर खो ही गया है, तो आपको कैसे पता कि बाहरखोया? पहले तो यह पता कीजिए कि खोया भी या नहीं, और फिर अगर खोया है, तो कहाँ खोया है भीतर या बाहर’| जब तक यह तय न हो जाए कि बहार खोया है, या भीतर,  तब तक अँधेरे में टटोलने से कुछ भी नहीं मिलेगा| दूसरी बात यह कौन है जो यह कह रहा है की बिना अर्थ जाने मैंमरना नहीं चाहती हूँ’, ये मैंकौन है? इस खोजने वाले को खोजिए’, क्योंकि अगर खोजने वाले का ही पता नहीं है, तो खोजेगा कौन?





Tuesday, 9 July 2019

Sit back and reflect on things

Question- Pranam Swamiji, I am a working woman with 3 kids. I live in Ahmedabad. My husband is a nice person, a software engineer. But, he is social unlike me. I meditate every day, and I don't like social people. I feel I don't love him from the first day we met. I am in love with a person. He is my facebook friend. He is a very deep meditative, intelligent and very impressive personality. He is godlike for me. I want to spend my whole life with him. Because he is the man I was searching for, I feel. I don't feel like to spend my rest life with my hubby. What should I do?

Ikkyu- There is no question of what you should do. Don’t ask this now. You have already done enough. Now, just stop doing everything. Sit back and reflect on things going around you. Do a little introspection.
As I can see your problem is born out of a very famous religious disease known as ‘Holier than thou attitude.’ It is a very ancient disease. Almost every so-called religious person is suffering from it. You are not the first one. You think you are holier than your husband, he is a social man and you are a religious woman. This superiority complex of yours is the root cause of all the turmoil you’re facing and creating in your life. In India, almost all married women are suffering from this disease, they all feel that they are religious souls, and their husbands are dragging them into hell. They always look down upon their husband for he is the one who is forcing her into sex-and obviously, sex is a sin. Hence, You see these Indian women hovering around So-called Godmen and Babas of whom they think are super celibates. They seek solace in their teaching, grovel at their feet and beg for liberation from their husband. You seem to be doing the same in a very sophisticated and modern way.   
Just drop the idea that you are a religious woman. If you were really religious you would see God in everyone, even in your husband. This is the criterion, unless you see God in your neighbours, in your kids and at last in your husband, do not consider yourself a religious person. It is very easy to see good in someone you don’t know well. If you don’t know a person well, you can project anything on him.
I have met many godlike, deep meditative personalities from Facebook in person, and without any exception, they all had feet of venal clay. So beware.     
"सिर्फ़ इक क़दम उठा था ग़लत राह-ए-शौक़ मेंमंज़िल तमाम उम्र मुझे ढूँढती रही"
You don’t love your husband because you don’t have love in your heart. You don’t love even this man who you have met on Facebook. If love is not unconditional, it cannot be called love. What if this man from Facebook was not godlike? 
Bringing change in the situation will change nothing in your life, you have to change yourself. As they say in French, "plus ça change, plus c'est la même chose." You say my husband is a nice person. What else do you want now? If there were any particle problems like he would be beating and abusing you and kids, I would definitely advise you to move on. But your problems are utterly superficial.  

Spend time away from social media and the internet. Play with children, be in nature, behold the morning sun, and feast your eyes on the setting sun in the evening. Do some creative thing every day.  Asking for love is a very childish thing, learn to give love. Love your husband for what he is. No man can match your imagination, you can imagine anything. Reality will never fit into it.
Instead of wasting and killing time on Facebook and WhatsApp, read some good books. At this juncture, reading “Anna Karenina” from Tolstoy will help you understand many things.

Monday, 8 July 2019

अंतिम अरण्य (निर्मल वर्मा)


   “वह कुछ और नहीं बोले। जो चीज़ बुरी लगती थी, उसके बारे में वह चुप हो जाते। –अंतिम अरण्य
होता तो यूं है कि हम जब कहीं घूमने जाते हैं, तो अपने किसी दोस्त-अहबाब, भूले-भटके प्रेमी, या फिर किसी निकट कुटुम्ब को याद करते है, उनकी कमी को महसूस करते हैं| सोचते हैं, काश अगर वो आज मेरे साथ यहाँ होते तो कैसा होता, या फिर उनके साथ की गई पहले के किसी यात्रा को याद करते हैं| बाज़-औक़ात, उनको कॉल और मेसेज भी कर लेते हैं| अभी जब मास्टर उगवे हमारे साथ थे, तो वह अपने सभी परिचितों को Whatsapp से विडियो कॉल करके यहाँ की ख़ूबसूरती दिखाया करते थे| उनका कहना था कि जब तक दो-चार दोस्तों को फोन करके जला न दूं, तब तक मुझे ऐसा लग रहा होता कि यात्रा पर पैसा व्यर्थ खर्च हो रहा है| मास्टर उगवे हर रोज, जब तक वे यहाँ रहें, कम-से-कम दस दोस्तों को जरूर विडियो कॉल करते थे| मुझे ऐसा लगता है, जब से सेल्फी का जमाना आया, पर्यटन का कुछ ज्यादा ही क्रेज़ हो गया है| 90 फीसदी लोग सिर्फ फोटों खीचने के लिए घूमने जाते हैं| अगर उन्हें फोटों खींचने से रोक दिया जाए, तो शायद ही वे कहीं घूमने जाएँगे| लिन यूतांग अपनी किताब ‘इम्पोर्टेंस ऑफ़ लिविंग’ में लिखते हैं, “अच्छा यात्री वह होता है, जिसे अब आगे कहाँ जाना है, इसका कुछ पता नहीं होता है| और श्रेष्ट यात्री वह होता है, जिसे यह भी पता नहीं होता है कि वह कहाँ से आया है| वह अपना पद, पहचान, और नाम सब पीछे छोड़कर यात्रा पर निकलता है|” कुछ-कुछ ऐसा ही थॉट ग़ालिब के इस शेर में भी है, 
“रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो  
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो”
अगले शे'र में ग़ालिब लिन से एक क़दम और आगे बढ़ जाते हैं 
"पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो"
प्लान बना कर यात्रा करने वालों, यात्रा में फ़ोटो खींचने वालों, और घर पहुँच कर लोगों से अपने यात्रा की बखान करने वालों को लिन यूतांग यात्रियों में गिनती नहीं करते हैं| उनका कहना है कि ऐसे लोग सिर्फ भीड़ बढ़ाने का काम करते हैं| ये पवित्र व सुन्दर स्थानों की उर्जा को ख़राब करते हैं| भविष्य में ऐसे लोगों को पवित्र व सुन्दर जगहों पर जाने की आजादी नहीं होनी चाहिए| अब मेरे एक मित्र है, ग़जब के सेल्फी एडिक्ट हैं| आप दिल्ली में रहते हैं| अगर उनको यह पता चल जाए कि आप दिल्ली से अगर सिर्फ गुजर भी रहे हैं, तो वे आपसे मिलने थर्मस में चाय भरकर स्टेशन पर आ जाएँगे| आपको लगेगा की जनाब मित्रतावश आपसे मिलने आएं हैं, आप एकदम भावावेश होकर उनसे मिलेंगे| लेकिन उनका आपसे मिलने का कुल उदेश्य सेल्फी लेना होता है| ऐसा मैं दो बार उनके चक्कर में आ चुका हूँ| एक बार तो उन्होंने मुझे सिर्फ सेल्फी लेने के चक्कर में खानपुर से दो घंटे की दूरी पर स्थित अपने दुकान पर बुला लिया| मैं खानपुर में अपने भाई के यहाँ रुका हुआ था| कहीं से उनको ख़बर लग गई कि मैं एक दिन के लिए दिल्ली आया हुआ हूँ| तुरंत मुझे उनका फोन आया| पहले तो इस बात पर नाराजगी जताई कि मैंने आने से पहले उनको इतिला क्यों नहीं दिया| फिर कहने लगे, “आप दिल्ली आएं हैं, मेरा बड़ा मन है आपसे मिलने का| कोई है नहीं जिसके हवाले दूकान छोड़ कर आपसे मिलने आऊँ| आप कल जा भी रहे हैं| क्या करूँ मैं समझ नहीं आ रहा है!” मैं उनके शब्दों के जाल में आकर उनसे मिलने उनके दूकान पर चला गया| हालाँकि पिछली बार का स्टेशन पर मिलना मुझे याद था| लेकिन फिर सोचा, हो सकता है उनका हृदयपरिवर्तन हो गया हो| जलती गर्मी में दो घंटे की बस यात्रा करके मैंने उनसे मिलने उनके दूकान पर गया| 30 मिनट तक उनके दूकान पर बैठा रहा| वे पूरे समय अपने ग्राहक के साथ व्यस्त रहे| उनको मेरे से कोई काम नहीं था, ना ही मिलने में कोई दिलचस्पी थी| औपचारिकता वश पड़ोस की दूकान से उन्होंने मेरे लिए एक कप घटिया कॉफ़ी मंगा दी| जब मैं वहां से निकलने लगा तो, अपने पड़ोस के दूकान से उन्होंने आवाज़ लगाकर एक लड़के को बुलाया| और मुझसे कहने लगे, “एक सेल्फी हो जाए, पता नहीं अब फिर आप से कब दुबारा मिलने का मुहूर्त बने|” मेरे साथ सेल्फी लेने के अलावा मुझसे मिलने का उनका कोई और प्रयोजन नहीं था| फेसबुक पर जब उन्हें वो सेल्फी चस्पा किया तो, कैप्शन में लिखा था, “With Great Soul Ikkyu केंशो Tzu”| इस बार जब मैं दिल्ली से गुजर रहा था, तो फिर से उन्होंने मुझे झांसे में लेना चाहा| बड़ी मुश्किल से उनके शब्द जाल से मैंने ख़ुद को बचाया|
ये लीजिए, क्या सुनाना शुरू किया था आपको, और क्या कह रहा हूँ| यह मेरी गजब की बीमारी है, उन्वान कुछ होता है, और लेख कुछ और, कहना कुछ शुरू करता, और थोड़ी देर बाद पाता हूँ कि जो कहना शुरू किया था उसके अलावा और सब कुछ कह दिया| आइये मूल विषय पर लौटते हैं....| तो, मैं आपसे यह कह रहा था कि लोग जब कहीं घूमने जाते हैं तो अपने प्रिय सगे-संबंधियों को याद करते हैं| लेकिन, मेरे साथ कुछ गजब ही हो रहा है| पिछले कुछ दिनों से मैं किसी व्यक्ति नहीं बल्कि दो किताबों को बड़ी शिद्दत से याद कर रहा हूँ| हर क्षण उनकी कमी को महसूस कर रहा हूँ| सोचता रहता हूँ, काश वो किताब साथ लाया होता, तो आज ऐसे सुहाने मौसम में उन्हें पढ़ने का आनंद कुछ और ही होता| जिन किताबों को मैं याद कर रहा हूँ, उनमे से एक है मेरे पसंदीदा लेखक निर्मल वर्मा की ‘अंतिम अरण्य’ और दूसरी अज्ञये की ‘नदी के द्वीप’| दूसरी किताब का तब्सिरा मैं आपके साथ अपने ब्लॉग (www.ikkyutalk.blogspot.com) पर साझा कर चूका हूँ| हैरानी की बात है कि ‘अंतिम अरण्य’ के बारे में मैंने अभी तक कहीं कुछ भी शेयर नहीं किया है| संभतः मैंने यह किताब तब पढ़ी होगी, जब सोशल मिडिया और इंटरनेट से ख़ुद को दूर कर लिया था| अन्यथा, कोई कारण नहीं है कि मैं आपसे से अपने इस सबसे अज़ीज़ किताब के बारे में बात न करूँ|
मेरे लिए निर्मल और ‘अंतिम अरण्य’ एक दुसरे के पर्याय हैं| एक को सोचता हूँ दुसरे की याद आनायास ही आ जाती है| हमारे यहाँ बिहार में लोग मिठाई (खासकर रसगुल्ला) खाने के बाद कुछ और खाना पसंद नहीं करते हैं, उनका मानना है कि इससे मुंह का जयका ख़राब हो जाता है| मेरे पिताजी अक्सर कहते है, “जिस मुंह में रसगुल्ला खा लिया, अब उसमे और कुछ कैसे खा सकता हूँ|” रसगुल्ले को मिथिलांचल और बंगाल में श्रेष्ठतम भोज्य पदार्थ माना जाता है| सिर्फ मिथिलांचल में ही नहीं संभतः दुनियां के सभी हिस्सों में मिठाई को सर्वोत्तम भोज्य-पदार्थ माना जाता है| ऐसा माने जाने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है| आदमी जन्म से ही ‘मीठे’ का आदी होता है| हमारा ब्रेन ‘मीठे’ की भाषा ही समझता है| इसीलिए, जब आपको जबरदस्त भूख लगी हो, तब अगर आप कुछ मीठा खा लें, तो भूख खत्म हो जाती| ब्रेन ऐसा समझ लेता है कि भोजन मिल गया| शायद इसीलिए चाय पीने से भूख खत्म हो जाती है| भूख कम करने में चाय पत्ती की भूमिका कम और चीनी की भूमिका ज्यादा है| मिठाई से जुड़ी एक कहानी मैंने बचपन में पढ़ी थी, मैं अक्सर यह कहानी अपने दोस्तों को अलग-अलग सन्दर्भ में सुनाता रहता हूँ| जब में छठी कक्षा में पढ़ता था, तब हमारे किताब में एक नाटक हुआ करता था, “बलकरण’’| बलकरण एक 12 साल का लकड़ा है, वह अपने आंगन में बैठा चाकू पर धार चढ़ा रहा है, उसकी माँ उससे पूछती, “तू, चाकू पर धार क्यों चढ़ा रहा है?” तो वह कहता है, “सुना है गाँव में तैमूर लंग आने वाला है, उसी से लड़ने के लिए मैं चाकू पर धार चढ़ा रहा हूँ|” अपने बहादुर बेटे की बात सुन कर माँ उसे गले से लगा लेती है, और उससे कहती है, “बेटा शायद तू भूल गया है कि आज तेरा जन्म दिन है, जा किसान के यहाँ से दूध लेकर आ, तुम्हारे लिए मिठाई बनानी है|” बलकरण जन्म दिन से ज्यादा मिठाई खाने की बात सुन कर, खुशी से नाचते हुए दूध लाने चला जाता है| थोड़ी देर बाद जब वह दूध लेकर आता है, तो उसकी माँ उसके लिए मिठाई (संभवतः रसगुल्ला) बनाना शुरू करती है| मिठाई बन कर तैयार ही होता है कि ख़बर आती है, “तैमूर के लूटेरे गाँव में घुस चुके हैं”| बलकरण की माँ मिठाई को ढक कर, आनन-फानन में बलकरण को लेकर जान बचाने के लिए जंगल की ओर भागती है| कहानी का अगला दृश्य है कि जब तैमूर बलकरण के में घर में आता है, तो मिठाई देख कर वह बड़ा ख़ुश होता है| वह तीन दिन का भूखा है, लूट-पाट में वह खाना पीना सब भूल चुका है| मिठाई देखकर वह उसे खाना चाहता है| तभी उसका सेनापति उसे आगाह करता है, “मिस्टर लंग, हो सकता है गाँव वालों ने मिठाई जानबूझ कर छोड़ा हो, बहुत संभावना है कि इसमें जहर मिला हो|” तैमूर अपने मुर्ख सेनापति की बचकानी बात सुन कर हँसते हुए उससे कहता है, “तुम मुर्ख हो, पहली तो बात यह कि गाँव के लोग इतने चालाक नहीं होते हैं कि इसमें जहर मिला दें| दूसरी बात यदि इसमें जहर मिला भी हो तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है| मरते समय मुझे इस बात की ख़ुशी होगी की मैं मिठाई खा कर मरा|” अगर मैं ईश्वर होता, और मुझे तैमूर के गुनाहों का हिसाब करना होता, तो सिर्फ इस एक वक्तव्य के आधार पर मैं उसके सारे गुनाहों को माफ़ कर देता| “मरते समय मुझे इस बात की ख़ुशी होगी की मैं मिठाई खा कर मरा|” वाह...!इस एक वक्तव्य से यह साबित होता है कि इस आदमी के कर्म भले ही अच्छे नहीं रहे हों, लेकिन यह आदमी बहुत अनूठा था| इस नाटक से मेरी एक और याद जुड़ी हुई है| मेरे छुटपन में दिवाली के दिन मेरे मुहल्ले के लड़के यह नाटक खेला करते थे| हर कोई तैमूर की भूमिका अदा करने के लिए आतुर रहता था| उनकी आतुरता का कुल कारण इतना था कि जो तैमूर की भूमिका निभाता था उसे बलकरण की मिठाई खाने को मिलती थी| हर बार मिठाई खाने को लेकर झंझट हो जाती थी| बाद में उन लोगों ने मिठाई हटा कर सिर्फ दूध कर दिया| लेकिन, फिर दूध पीने के लिए लड़ाई होने लगी| फिर दिमाग लगा कर यह तय किया गया कि दूध असली नहीं होगा, स्त्रियाँ अपने मुंह पर जो पावडर थोपती हैं, उस पावडर को घोल कर दूध बनाया जाएगा| एक साल पावडर वाले दूध के साथ नाटक हुआ, लेकिन अगले साल से नाटक होना बंद हो गया| बिना मिठाई और दूध के कोई भी नाटक खेलने को तैयार नहीं था| “‘अंतिम अरण्य’ को पढने के बाद मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ था| बीस दिन तक मैंने कोई दूसरी किताब नहीं पढ़ी| मुझे डर था कि कहीं मेरे ज़ेहन का जयका न ख़राब हो जाए| मेरे ख्याल से उस किताब को पढ़े हुए अब 6 महीने से अधिक हो चूका है, इस बीच मैंने पंचासों किताबें पढ़ी होगी, लेकिन ‘अंतिम अरण्य’ का स्वाद अभी तक जेहन में बना हुआ है| अभी तक दूसरी कोई ऐसी किताब पढ़ने को नहीं मिली जो ‘अंतिम अरण्य’ के स्वाद को भुला दे| किताब पढ़कर मैं इतना तृप्त महसूस कर रहा था कि जब बीस दिन बाद निर्मल की दूसरी किताब ‘लाल टीन की छत’ शुरू की तो, लाख कोशिशों के बावजूद भी बीस पेज से आगे नहीं पढ़ पाया|
निर्मल के शिल्प का दीवाना हूँ| उनका कहानी को कहने का अंदाज़ इतना निराला है की आप भूल ही जाते हैं, की वो क्या कह रहे हैं| आप अंदाज और भाषा की मधुरता में इतना खो जाते हैं कि कहानी क्या है, और आगे क्या होगा इसकी फिकर ही खो जाती है| निर्मल भावनाओं के जादूगर और कलम के मदारी हैं| कहानियां दो तरह की होती है, एक जिसमे घटनाएँ होती है, घटनाओं का एक क्रम होता है, टर्न और ट्विस्ट होता है, रोमांच होता है| ऐसी कहानियों को अच्छे पाठक छिछली कहानी मानते हैं| क्योंकि इन कहानियों को आप एक बार से अधिक नहीं पढ़ सकते हैं| एक बार भी आप फस जाने की वजह से पढ़ते हैं| जैसे मैं चेतन भगत की ‘रूम नंबर 105 पढ़ते हुए फस गया था| मुझे ऐसी किताबें पसंद नहीं है, जो एक बिंदु से शुरू होकर दूसरे बिंदु पर खत्म हो जाती हैं| मुझे ऐसी किताबें पसंद हैं, जिनको अगर आपने एक बार पढ़ लिया तो जीवन भर वो आपके साथ रहती हैं| इसीलिए, मैं तनहाई में भी कभी अकेला महसूस नहीं करता हूँ| जब में समंदर के पास जाता हूँ, तो ‘ज़ोरबा दी ग्रीक’ का ज़ोरबा मेरे साथ होता है, जब मैं पहाड़ पर होता हूँ, तो ‘अंतिम अरण्य’ और ‘नदी के द्वीप’ के कई पात्र मेरे साथ होते हैं, जब मैं गाँव में होता हूँ, तो ‘फादर्स एंड संस’ का बजारोव मेरे साथ होता है| जब मैं आश्रम में होता हूँ, तो हर्मन हेस का सिद्धार्थ मेरे साथ होता है| ऐसे हजारों लोग हैं जो किताबों से निकल कर मेरे जीवन और मेरी यात्रा के साथी बन गए हैं|
तो, मैं आपसे कहानी के प्रकार की बात कर रहा था| दूसरी तरह की कहनी बिलकुल अनूठी होती है| ये कहानियाँ भाव तथा विचार प्रधान होती है| मन के भाव नहीं, आत्मा की उर्मियाँ| ये मानसिक विचारों व भावों का रेचन नहीं होती हैं| ये कहानियां आत्म-अभिव्यक्ति होती है| इसीलिए इन कहानियों के जरिये आप आत्म-साक्षात्कार करते हैं| ये कहानियां आपको आपके अचेतन की सैर कराती हैं| इनका उदेश्य आपका मनोरंजन करना नहीं, बल्कि ये कहानियां इसलिए लिखी जाती हैं कि इनको पढ़कर आपका मनोभंजन हो सके| इन कहानियों का उदेश्य आपकी धारणाएं तोड़ना और आपकी बुद्धि को थोड़ा खोलना होता है| निर्मल दूसरी तरह की कहानियां लिखते हैं|

मैंने आपसे यह नहीं कहूँगा कि आप ‘अंतिम अरण्य’ को पढ़िए, ऐसा मैं नहीं कह सकता| मैं आपसे ऐसा निवेदन करूँगा कि न सिर्फ आप इस किताब को पढ़िए बल्कि इसको हमेशा अपने साथ रखिए| जहाँ भी जाइये इस किताब को अपने साथ लेकर जाइएये| खासकर तब जब आप पहाड़ पर जा रहे हों| अगर आपका इरादा इधर आने का है, जिधर मैं इन दिनों रह रहा हूँ, तो प्लीज मेरे लिए भी ‘अंतिम अरण्य’ और ‘नदी के द्वीप’ की प्रति लेते आइयेगा| पैसा मैं दे दूंगा (वैसे ऐसा ही बोल कर मेरे एक मित्र से मेरे से अपने प्रश्न का जवाब ले लिया, अभी तक उनका पैसा नहीं आया, इसीलिए इस बात पर भरोसा नहीं कीजिएगा| मैं भी ऐसा बोल कर ‘पैसा मैं दे दूंगा’, किसी को चूना लगाना चाहता हूँ)| जितनी जल्दी हो सके इस किताब को पढ़ लीजिए, अन्यथा आपको बहुत अफ़सोस करना पड़ सकता है| मुझे सदा इस बात का अफ़सोस रहेगा कि आज से पंद्रह साल पहले मुझे ज़ोरबा पढ़ने को क्यों नहीं मिला|  
वह कुछ देर इसकी ओर आँखें टिकाए लेटे रहे। फिर कुछ सोचते हुए कहा, “हो सकता है हमारी असली जगह कहीं और हो और हम ग़लती से यहाँ चले आएँ हों?” उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था कि मैं हकबका सा गया।
कौन सी असली जगह?”  मैंने कहा, “इस दुनिया के अलावा कोई और जगह है?”
मुझे नहीं मालूम, लेकिन जहाँ पर तुम हो, मैं हूँ, निरंजन बाबू हैं, ज़रा सोचो, क्या हम सही जगह पर हैं? निरंजन बाबू ने एक बार मुझे बड़ी अजीब घटना सुनायीतुम जानते हो, उन्होंने फ़िलोसफ़ी तो छोड़ दी, लेकिन साधु-सन्यासियों से मिलने की धुन सवार हो गयीजो भी मिलता, उससे बात करने बैठ जाते! एक बार उन्हें पता चला की कोई बूढ़ा बौद्ध भिक्षुक उनके बग़ीचे के पास ही एक झोंपड़ी में ठहरा हैवह उनसे मिलने गए, तो भिक्षुक ने बहुत देर तक उनके प्रश्नों का कोई जवाब नहीं दियाफिर भी जब निरंजन बाबू ने उन्हें नहीं छोड़ा, तो उन्होंने कहा पहले इस कोठरी में जहाँ तुम्हारी जगह है, वहाँ जाकर बैठोनिरंजन बाबू को इसमें कोई कठिनाई नहीं दीखी। वह चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ गए। लेकिन कुछ ही देर बाद उन्हें बेचैनी महसूस होने लगी। वह उस जगह से उठ कर दूसरी जगह जाकर बैठ गए, लेकिन कुछ देर बाद उन्हें लगा, वहाँ भी कुछ ग़लत है और वह उठ कर तीसरी जगह जा बैठेउनकी बेचनी बढ़ती रही और वह बराबर एक जगह से दूसरी जगह बदलते रहेफिर उन्हें लगा जैसे एक ही जगह उनके लिए बची थी, जिसे उन्होंने पहले नहीं देखा था, दरवाज़े की देहरी के पास, जहाँ पहले अँधेरा था और अब हल्की धूप का चकत्ता चमक रहा थावहाँ बैठते ही उन्हें लगा, जैसे सिर्फ़ कुछ देर के लिए कि यह जगह सिर्फ़ उनके लिए थी, जिसे वह अब तक खोज रहे थेजानते हो वहाँ बैठ कर उन्हें क्या लगाएक अजीब-सी शांति का बोध उन्हें लगा उन्हें भिक्षुक से कुछ भी नहीं पूछना, उन्हें सब उत्तर मिल गए हैं, मन की सारी शंकाएँ दूर हो गयी हैं वह जैसे कोठरी में आए थे, वैसे ही बाहर निकल आए…” –अंतिम अरण्य


Sunday, 7 July 2019

Spending money rightly is a greater art than earning it.

Question- I am making around 5 lakh per month, still I cannot live the life you are living.
Ikkyu- ‘Sir, this is where you are mistaken, you don’t live life by what you earn, you live life by what you spend. It may be true that you make 5 lakh per month, but how much do you spend? You must be hoarding 90% of your income and spending only 10%. Whereas I spend 100% of my income, I don’t hoard even a single penny, for I don’t think of the morrow. I live in the present; I know that the future doesn’t exist. In my view, to live Omarkhayamic life, one needs courage more than money. 
Unless you learn to spend money without any compulsion, you cannot enjoy life. You may invest 5 lakh in something, with the hope to earn 10 lakh in the future, but that is not spending. You may spend 10 lakh on your daughter's wedding, but that's not spending either. It's also an investment, you spend so that you can earn 'Izzat' in society. You are simply incapable of spending money without fear and greed. You may pay 5 lakh at a hospital, but that's because of the fear of dying. It is not spending again. Spending money rightly is a greater art than earning it. Any idiot can earn it, mostly only idiots are good at earning. But, it needs some understanding of life to spend wisely. 

I know many people who have earned so much money that their 3 generations can live without earning a penny, still they go on earning. Not only do they earn themselves, but they also push their children to earn. 
Sir, it is high time, you stopped earning. Start living now.

Saturday, 6 July 2019

सभी रोग मन से पैदा होते हैं


प्रश्न- 7 मार्च के बाद पहली बार 5 मई की रात को स्वप्नदोष Nightfall  हुआ। 5 मई के बाद से किसी भी काम मे मन नही लग रहा है कोई भी काम के लिए अपने आप को कमजोर महसूस कर रहा हुं सिर्फ सोने का मन  हो रहा है और अधिक सो भी रहा हुं। बेहोशी मे डूब रहा हुं जैसे बाथरूम लगनी भी बन्द हो गयी है  48 घंटो मे एक बार लगती है उसमे भी कॉफी जोर लगाना पडता है और अच्छे से पेट साफ नही होता है। मानसिक रुप से कॉफी तनाव भरा रहता हुं। शांति नही मिल रही अब जो पहले मिल रही थी।
जवाब- ‘मन’ एक रोग है, और सभी रोग मन से पैदा होते हैं| आपका ‘मन’ स्वास्थ्य को बीमारी बना रहा है| ‘स्वप्नदोष’ होना शुभ लक्षण है| स्वप्नदोष शुभ का सूचक है| इस का अर्थ हुआ कि अब शरीर प्राकृतिक तरीके से प्रतिक्रिया दे रहा है| इसको चिंता का विषय मत बनाइये| आपको स्वप्नदोष जल्दी हो गया| आमतौर पर लोगों को इतनी जल्दी नहीं होता है, इसका मतलब है कि ज्यादा हानि नहीं हुई थी| ठीक से तीन महीना भी नहीं हुआ, और शरीर प्रतिक्रिया करने लगा| यह बहुत शुभ संकेत है| किसी-किसी को 6 महीने से साल भर का वक़्त लग जाता है, स्वप्नदोष होने में| जब हम पोर्न देखना और हस्तमैथुन करना बंद कर देते हैं, तब स्वप्नदोष से ही यह पता चलता है कि शरीर पूरी तरीके से स्वस्थ्य हुआ या नहीं| आपकी रिकवरी हो गया है| स्वप्नदोष का सिर्फ इतना अर्थ है कि आपका शरीर नेचुरल सेक्स लाइफ जीने के लिए तैयार हो गया हैं|
किसी काम में मन न लगना और कमज़ोर महसूस करने का कोई भी संबंध स्वप्नदोष से नहीं है| यह आपकी इस पुरानी धार्मिक धारणा की वजह से हो रहा है कि ‘वीर्य’ निकलने से शक्ति का नाश होता है| ‘काम में मन ना लगना, और कमज़ोर महसूस करना’ मानसिक समस्या है| वीर्य निकलने से, और वो भी स्वप्नदोष के माध्यम से, किसी भी प्रकार की कमजोरी होने का कोई कारण नहीं है| अगर आप हस्तमैथुन नहीं करते हैं, तो महीने में एक-से-चार बार स्वप्नदोष होना बिलकुल स्वाभाविक है| स्वस्थ्य शरीर का लक्षण है| ‘
बाथरूम न लगना और पेट खाली ना होने के कुछ प्रैक्टिकल और कुछ मानसिक कारण हो सकते हैं| पेट हमारे मन से बहुत ज्यादा प्रभावित होगा है| पेट की 70 फीसदी समस्या मानसिक होती है| इसीलिए खाना खाते समय खाने को प्रेम-शांति व धर्यपूर्वक ग्रहण कीजिए| हड़बड़ी में जल्दी-जल्दी मत खाइए| गर्मी का समय है दिन में 4 लीटर तक पानी पीजिए| ज्यादा चिंता करने और तनाव की वजह से भी पेट अस्तव्यस्त हो जाता है| तो, इस बात का ठीक से अवलोकन कीजिए कि कारण मानसिक है या शारीरिक| अगर मानसिक है तो चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं है, जैसे मन ठीक होगा, पेट ठीक हो जाएगा| लेकिन यदि शारीरिक है, खान-पान में या भी किसी अन्य प्रकार की गड़बड़ी के कारण ऐसा हो रहा है, तो एक बार चिकित्सक से संपर्क कर लीजिए|
याद रखिए शांति कभी भी मांगने और प्रयास से नहीं मिलती है| अशांति का सदा एक ही कारण होता है ‘अस्वीकार’, और शांति का सदा एक ही मार्ग है ‘सर्व-स्वीकार’| अगर शांति नहीं मिल रही है तो इस बात को स्वीकार लीजिए कि ‘मैं अभी अशांत हूँ, और मुझे शांति नहीं मिल रही है’| समस्या ‘अशांति’ नहीं है, असली समस्या ‘अशांति’ की अस्वीकृति है| जितना आप अशांति से लड़ेंगे और और शांत होने की कोशिश करेंगे, उतनी अशांति बढ़ती जाएगी|
शांति नही मिल रही अब जो पहले मिल रही थी।“ यह कौन पहले जैसी शान्ति की मांग कर रहा है? यह कौन कह रहा है कि अब पहले जैसी शान्ति नहीं मिल रही है? जो यह कह रहा है वह ‘लोभ’ है| अपने लोभ को समझये| ‘लोभ’ और मोह सभी बिमारियों की जड़ है| जो भी बहार भीतर घटित हो रहा है उसके साक्षी बनीये, बस उसे दिखिए| घटना को अच्छे-बुरे में मत बाँटिये, और यदि पुरानी आदतवश मन ऐसा करता भी है, तो उसके भी साक्षी बनिये कि ‘मन व्याख्या कर रहा है’|
तथ्य यानि ‘फैक्ट’ के साथ जीना शुरू कीजिए- बुद्ध का शब्द है ‘यथाभूतं’ इसका अर्थ है, ‘जो जैसा है, उसको वैसे ही देखना, किसी भी चीज़ की व्याख्या नहीं करना’| ‘फैक्ट’ बस इतना है कि आपको स्वप्नदोष हुआ- अगर आप सिर्फ ‘फैक्ट के साथ बने रहते तो, ये तो मन न लगना और कमजोरी महसूस हो रहा है, ऐसा कुछ भी नहीं होता| लेकिन आपने मन ने व्याख्या कर लिया होगा, “बाप रे स्वप्नदोष हो गया, वीर्य का नाश हो गया”| इसी व्याख्या से गड़बड़ी होनी शुरू हो गई| इस शब्द ‘स्वप्न-दोष’ में ही खोट है, ‘दोष’ ‘शब्द’ को सुनकर ऐसा लगता है कि कुछ गलत हो गया| यह शब्द ठीक नहीं है| मेरे हिसाब से इसे स्वप्नदोष ना कह कर ‘स्वप्नसुख’ कहना चाहिए| यह मत कहिये कि 5 को स्वप्नदोष हुआ, कहिए कि ’5 मई को सपने में संभोग का सुख मिला’, फिर दिखिए कैसा महसूस होगा है| तक्षण आप आनंद से भर जाएँगे|

इस जगत में ‘सही’ और ‘गलत’ जैसा कुछ भी नहीं होता है| यह जगत घटनाओं की प्रवाह है| हर घटना की व्याख्या सही/गलत के तौर पर की जा सकती है| और सारी व्याख्या नासमझी से पैदा होती है| व्याख्या करने की नासमझी से बचिए और निरपेक्ष हो कर तथ्य का अवलोकन कीजिए| ‘’शरीर’ में जो उर्जा पैदा हो रहा है, उसका किसी सार्थक काम में इस्तेमाल कीजिए| पेड़ लगाइए, योग कीजिए, बच्चों के साथ खेलिए, आवारा जानवर और कुत्तों को खिलाइए, पंछी को पानी पिलाइए, हंसिये, कविता लिखिए, गीत गाइए, नृत्य कीजिए, भजन कीजिए- कुछ मंगल कीजिए| व्यर्थ के विचारों को अपने भीतर जगह मत दीजिए| हमारे 90 फीसदी विचार नकारात्मक होते हैं| फिजूल के बातों में समय मत खर्च कीजिए| ‘कब बुद्धत्व घटेगा, कब मैं पानी पर चलने लगूंगा, कब लोग मुझसे प्रभावित होने लगेंगे, कब मेरे हाथ राख और फूल निकलने लगेंगे...’ इस तरह की नासमझियों से बचिए...हल्के-फुल्के होइए...! हंसिये, खेलिए और ध्यान कीजिए..बाबा गोरखनाथ का वचन याद रखिए ‘हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानं’| धार्मिक गंभीरता इस जगत का सबसे बड़ा रोग, उस रोग से बचिए| ‘मैं पागल हो जाऊंगा, मैं परेशान हूँ, इस तरह के शब्द आत्म-सम्मोहन पैदा करते हैं| ऐसा कभी मंत बोलीये| मन मेगनिफाइंग ग्लास है, सादा सब चीज़ों को बड़ा करके देखता है| मन के जालों के प्रति जागिये|
मन किसी भी कृत्य को करने से पहले नफा-नुकसान के बारे में सोचने लगता है| मन स्वभाव से बनिया है| इसीलिए जब तक ‘मन’ की मालकियत रहेगी.. जीवन गंभीर रहेगा| और गंभीरता रोग है| मन हर चीज़ को समस्या बना देता है| अगर शांति आती है, तो मन इस बात की चिंता करने लगता है कि कहीं यह खो तो नहीं जाएगी, कहीं यह नकली शान्ति तो नहीं है, कहीं यह सब मेरा भ्रम तो नहीं है| और जब शांति चली जाती है, तो मन फिर से उसे पाने के लिए विकल होने लगता है| मन के इस पागलपन के प्रति जागिये|
बेहोशी मे डूब रहा हुं”  अगर आपको सच में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप बेहोशी में डूब रहे हैं, तो सुभ संकेत है| जब जीवन में होश की पहली किरण उतरती है तो साधक अपने ‘बेहोशी का ही पता चलता है’| ‘मैं बेहोश हूँ, मैं बेहोशी में डूब रहा हूँ,’ होश की पहली किरण है| ‘बेहोशी का पता चलना होश का लक्षण है| ‘मैं होश में हूँ, मैं जाग रहा हूँ’, ऐसा सिर्फ अज्ञानी कहता है| ज्ञानी कभी भी अपने होश की घोषणा नहीं कर्ता है| वह सदा यही कहता है कि ‘मैं बेहोश हूँ’| जिसको अपनी बेहोशी का पता चल गया वह अब ज्यदा देर होश से वंचित नहीं रह सकता है| जिसे यह पता चल गया कि ‘मैं नींद में हूँ’, समझिये वह जाग गया| ‘मैं नींद में हूँ’ यह जागरण का लक्ष्ण है|
सिर्फ सोने का मन  हो रहा है”, तो सोइये, कोई रोक रहा क्या आपको सोने से? लाखों लोग हैं जिनको नींद नहीं आती है, गोली लेकर सोते हैं| आप धन्यभागी हैं कि आपको नींद आती है| परमात्मा के प्रति अहोभाव प्रगट कीजिए|
“बाथरूम लगनी भी बन्द हो गयी है  48 घंटो मे एक बार लगती है” खान-पान में सुधार लाइए, और फिर भी यह समस्या बनी रहती है तो डॉक्टर से संपर्क कीजिए| इसका स्वप्नदोष होने, हस्तमैथुन ना करने, और पोर्न ना देखने से कोई संबंध नहीं है| हो सकता है कोई छोटी-मोटी शारीरिक परेशानी हो, तो ऐसे में आप एक चिकित्सक से परामर्श ले सकते हैं| सुबह, किसी योग कुशल योगाचार्य की देख रेख में, 40 मिनट योग और 15 मिनट प्राणायाम ( अनुलोम-विलोम)करना शुरू कर दीजिए|

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...