Tuesday, 5 May 2020

अंतिम यात्रा


धुंध की वजह से लालटेन के आसपास एक पीली आभा बनी हुई है| बाहर बहुत ठण्ड है लेकिन, मेरा कमरा गर्म है| दिव्या बीच-बीच में उठकर आग में लकड़ी डाल आती है, मैं पूछता हूँ, "तुम क्यों बार-बार उठ कर जाती हो, थक जाओगी, अमन कहाँ गया?" वह अपने चश्मे पर जमे पानी की बूंदों को साड़ी के पल्लू से साफ़ करती है, और गेट से बाहर देखते हुए मुझसे कहती हैं, "अमन शायद बाहर रॉकी के साथ खेल रहा है, राव साहब आते हैं तो बोलती हूँ, उसे बुला लाएंगे|" पिछले एक घंटे से हम दोनों राव साहब का इंतजार कर रहे हैं| "ब्लैक कॉफ़ी बना कर लाऊँ, पीओगे", मेरे कानो को ढकते हुए दिव्या बोली| "वह भी तुम्ही को बनाना होगा, अपनी सेहत का ख्याल रखो, अभी बहुत काम करने हैं तुम्हे| राव साहब से सब कुछ अकेले नहीं संभलेगा| भक्तराज की हालत भी बहुत गंभीर है....", “भक्त राज बड़े भी तो आपसे कितने हैं, 12 साल छोटे हैं आप उनसे" दिव्या मुझे बीच में काटते हुए बोली| "यही तो मैं तुमसे कह रहा हूँ, अब जब मेरे जाने का वक़्त आ गया है, तो भक्तराज और कितने दिन जिएंगे", खिड़की की तरफ मुंह करते हुए मैंने कहा| खिड़की के उस पार देवदार पर एक कौव्वा बैठा था| उसके पंख गीले थे, अपने पैरों के नीचे उसने कुछ दबा रखा था| बार-बार चोंच मार कर उन्हें खा रहा था, और बीच-बीच में इधर-उधर देख लेता था| "मैं कॉफ़ी बनाने जा रही हूँ", रजाई से मेरे कन्धों को ढकते हुए दिव्या बोली| "आपके बाद मैं या तो मर जाउंगी, या फिर दिल्ली चली जाउंगी| आपके बिना मैं यहाँ एक दिन भी नहीं रह सकती हूँ", बोलते हुए कमरे से निकल गई| जाते समय मैंने उसे देखा, घुटने का दर्द शायद फिर से बढ़ गया था, ठीक से चल नहीं पा रही थी| 'कितना तो समझाया करता था कि नियमित रूप से योग किया करो, लेकिन इसको बकलोली से फुर्सत मिले तब तो', मैं मन-ही-मन सोचने लगा| वो भी क्या दिन थे जब हम भारत के अलग-अलग खूबसूरत जगहों पर जाया करते थे, सुबह उठकर योग करते थे| मुझे आज भी याद है कैसे सुबह चार बजे उठकर दिव्या मेरे लिए नाश्ता तैयार करती थी| और मैं मेहसाणा से 70 किलोमीटर दूर योग सिखने जाया करता था| "इतना सब करने का लेकिन फायदा क्या हुआ? इतनी मेहनत करके सीखो, फिर उसी चीज़ का विरोध करने लगो", ख्याब में ही दिव्या मुझसे बोली| उसे मेरी इस आदत से हमेशा से शिकायत रही है| पहले किसी चीज़ को सीख लो, फिर उसके खिलाफ़ हो जाओ| "कितनी बार मना किया है, पुरानी यादों को मत कूदेरा करो", टेबल पर कॉफ़ी रखते हुए दिव्या बोली| "कहाँ कुछ सोच रहा हूँ", 'पता नहीं इसे कैसे पता चल जाता है कि मैं अतीत की राख को कुदेर रहा हूँ' सोचते हुए मैं बोला| "अगर सोच नहीं रहे हो, तो फिर आँखों में आंसू कैसे है", पीठ को सहारा देकर मुझे बिठाते हुए बोली| "अब बोलो क्या सोच कर रो रहे थे", कॉफ़ी का मग पकड़ाते हुए बोली| "अब तुम्हारे हाथ भी कांपने लगे हैं", कांपते हुए कप को देख कर बोली| मैंने भी कप पर नज़र डाली, सच में हाथ कापं रहे थे| "ठण्ड से कांप रहे होंगे", मैंने उससे कहा| "हाँ कमरे में ठण्ड जो बहुत है", अपनी कॉफ़ी का मग लेकर मेरे पैताने बैठते हुए बोली

खिड़की से आने वाली रौशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी| मैंने देखा एक दो को छोड़ कर उसके सारे बाल सफ़ेद हो गए थे| "मुझे घूरना बंद करो और बताओ कि क्या सोच कर रो रहे थे?", कॉफ़ी मग को नाक के पास ले जाते हुए बोली| "यही याद कर रहा था कि पहली बार जब आईने में तुम्हे एक सफ़ेद बाल दिखा था तो तुम कैसे रोने लगी थी", बोलते-बोलते मुझे हंसी आ गई| "25 वर्ष की आयु में किसी की बाल सफ़ेद होने लगे तो वो रोएगा नहीं, इसमें हंसने की क्या बात है| चलो मेरे तो सफ़ेद हैं, लेकिन अपना न देखो...गंजा होने से तो बेहतर है सफ़ेद होना|", गुस्से से उसका नाक लाल हो गया था| -इसकी गुस्सा करने की बीमारी मरते दम तक भी नहीं गई| मैं खिड़की से बाहर देखने लगा|
वह कौव्वा अब भी वहीं बैठा था, लेकिन उसके पैरों के नीचे अब कुछ भी नहीं था| अपने चोंच से पंखों को साफ़ कर रहा था| "तब मैं नादान थी, इसलिए रोई थी, अब मुझे अपने सफ़ेद बालों से प्रेम हैं| पहले मैं बुढ़ापे से डरती थी, लेकिन अब जानती हूँ, बुढ़ापा जीवन का फूल है| जो लोग ठीक से बूढ़े नहीं हो पाते हैं, वो बाँझ ही रह जाते हैं, उनका जीवन एक ठूंठ पेड़ जैसा हो जाता है-न फूल न पत्ते", वो भी मेरी तरह खिड़की के बाहर ही देख रही थी| "और हाँ, मुझे तुम्हारा गंजापन भी पसंद है", कॉफ़ी के खाली कप को बेड के सामने पड़े तिपाये पर झुककर रखते हुए बोली| उसका गुस्सा शांत हो चुका था| मैंने देखा सफ़ेद बालों और साड़ी में वह सच में ही बहुत सुंदर लग रही थी, इतनी सुंदर जितनी वह पहले कभी नहीं लगी थी| "साड़ी जंचती है तुम पर", अपना खाली कप बढ़ाते हुए मैंने कहा| "हाँ, मैं भी यही सोचती हूँ, लेकिन याद है भारतीय कपड़ों से मुझे कितनी चिढ़ थी| मैं कितना गुस्सा करती थी जब तुम मुझे इंडियन पहनने को कहते थे", मेरे कप को भी तिपाये पर रखते हुए बोली| "यह सब गार्गी कॉलेज की विकृत शिक्षा-दीक्षा का असर था, वहीं से तुम बिगड़ी थी", राव साहब के लिए प्रतीक्षा रत आँखों से मैंने गेट की ओर देखा| "आप तो गार्गी कॉलेज और दिल्ली के पीछे ही पड़े रहते हैं", पांच साल हो गए मुझे दिल्ली गए हुए| पिछले महीने धीरज के बेटे की मंगनी थी, उसमे भी नहीं गई| पता नहीं क्या सोचेगा वह?", वह भी बार-बार गर्दन मोड़ कर गेट की ओर देख रही थी|
"तुम्हारे गार्गी कॉलेज से याद आया, अपनी गार्गी कैसी ही है, कोई ख़त आया है उसका?", मैंने बातों को मोड़ते हुए कहा| "अरे हाँ, शनिवार को उसका ख़त आया था, मैं आपको देना भूल गई| सुभूति की तबियत थोड़ी ख़राब हो गई थी| इसीलिए गुरुपूर्णिमा पर नहीं आ पाई| मैंने जवाब लिख दिया है, उसे यह भी बता दिया है कि आपकी तबियत बहुत ख़राब है| देखिये कब तक आती है....अरे ओ अमन", बात को बीच में रोककर अमन को आवाज़ देने लगी| "मेरी तबियत का बोली हो, तब तो वो भागी चली आएगी, उसके बाप को भी ख़बर कर दो| उसे गाँव से यहाँ आने में वक्त लगेगा", मेरी आँखे फिर नम थी| "आपको क्या लगता है, आपकी तबियत ख़राब होगी और आपके थिओ को पता नहीं चलेगा| ७ दिन पहले ही उसका खत आया था वो और गार्गी की माँ दोनों आ रहे हैं", बेड से उतरते हुए बोली, 'रे अमन...अमन', बोलते हुए गेट की ओर जाने लगी| "क्या बात कर रही हो, साकेत आ रहा है?", मैंने थोड़ा अविश्वास दिखाते हुए पूछा| "हाँ..आ रहा है बाबा आ रहा है...आपका थिओ, .......भाई के बिना इनका प्राण भी कैसे छुटेगा", बुदबुदाते हुए गेट पर चली गई| पैर मोड़ कर काफी देर तक बैठे रहने की वजह से इस बार उसे चलने में ज्यादा तकलीफ हो रही थी| "रे अमन.....", दो-तीन बार उसने आवाज़ लगाई| कौव्वा अपनी जगह से उड़ गया था| 'साकेत आ रहा है', सोच कर मेरे भीतर गुदगुदी होने लगी| “अच्छा सुनो, मैं सोच रहा था कि कितना सही रहता यदि गार्गी अपने बेटे का नाम सुभूति की जगह शेख़ सरायरख लेती”, मैं ज़ोर से हंसने लगा। हंसने की वजह से पेट में तेज़ दर्द होने लगता है। दिव्या को पता न चल जाए इसलिए मैं दर्द के बावजूद भी हंसता रहता हूँ। आपको हंसी आ रही, याद है गार्गी को उसके दोस्त JNU में कितना चिढ़ाते थे- अपना नाम गार्गी, बाप का नाम साकेत और माँ का नाम प्रीत विहार।”, दरवाज़े के पास से दिव्या बोली। प्रीत विहार तो ज़्यादती थी, उसकी माँ का नाम प्रीती है...भद तो तब होती जब उन्हें पता चलता कि उसके बड़े पापा का एक नाम नेहरुभी है। फिर उसे सब नेहरु प्लेस कहकर चिढ़ाते..हा..हा..हा”, मैं ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगता हूँ। शुक्र है आपके नेहरू नाम का बहुत से लोगों पता नहीं है...नहीं तो सच में गार्गी आपसे बहुत लड़ती”, अमन शायद उसे आता हुआ दिख गया था, वह दरवाज़े से नीचे उतरने लगी। "कितनी देर से आवाज़ लगा रही हूँ तुम्हे, सुनता क्यों नहीं है तू....", अमन को डांटते हुए बोली| "मैं सुराही आंटी को दादाजी के बारे में बताने गया था", सफाई देते हुए अमन बोला| "तू रॉकी के साथ मैदान में खेल रहा था, और बोल रहा है कि सुराही आंटी के पास गया था, झूठ बोलेगा तू..." दिव्या ने उसे डांटा| "खेल तो मैं अभी रहा था, वहां से आने के बाद", गहरी सांस भरते हुए अमन ने अपनी बात रखी| मैं अमन को देख तो नहीं सकता था, लेकिन उसकी आवाज़ से ऐसा लग रहा था कि वह हांफ रहा है| "क्या बोली सुराही?", दिव्या ने पूछा| "राव अंकल जब बाजार से लौट कर आ जाएँ, तो मुझे आकर बता देना, मैं पापा को लेकर आ उंगी", दिव्या के पीछे कमरे में घुसते हुए अमन बोला| अमन के पीछे कूँ-कूँ करके पूँछ हिलाता हुआ रॉकी खड़ा था| मास्टर उगवे रॉकी को अपने साथ गुजरात से लाए थे| मतलब रॉकी अब पंद्रह साल का हो गया है| "ग़जब की लड़की है सुराही भी, अब फिर से तुम इतने उपर जाओगे उसे बताने के राव साहेब आ गये", बिना अमन को देखते हुए दिव्या बोली| "मैं चला जाऊंगा", तिपाई पर पड़े कप्स को उठाते हुए अमन बोला| "हाँ-हाँ तू क्यों नहीं जाएगा...बहुत बड़ा पेटबहुक है ये लड़का सुराही कुछ-कुछ खाने को दे देती है, इस चक्कर में यह वहां जाने के लिए बहाने ढूंढता रहता है..एक बार वहां जाना हो तो मुझे पन्द्रह बार सोचना पड़ता है, और यह लड़का दिन में पांच बार वहां चला जाता है, पहाड़ चढ़ना न हुआ जैसे कोई खेल हुआ", मुझे देखते हुए दिव्या बोली| "तुम्हे भी तो मैं कहता हूँ कि इसे चॉकलेट दिया करो, लेकिन तुम्ही ज्यादा मीठा खाएगा तो ये हो जाएगा, वो हो जाएगा..करती रहती हो, तो बेचारा क्या करे...सुराही चॉकलेट देती है, तो वहां चला जाता है", अमन को देखते हुए मैंने बोला| वह दिव्या के पीछे खड़ा मुंह बना रहा था, और मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था| "आप से तो कुछ कहना ही बेकार है....सुनो कप्स को किचन में रख दो, फिर गोडाउन से लकड़िया लेकर आओ...आग ठंडी हो रही है", कप लेकर जाते हुए अमन से दिव्या बोली|
"लगता है राव साहब को किताब नहीं मिली, इसलिए इतनी देर हो रही है| नहीं तो ६ घंटे में आमदी चार बार रानीखेत से होकर आ जाए, ऐसे नहीं मास्टर उगवे इनको बबूचक बुलाते थे। एक काम भी ये ठीक से नहीं करते हैं। उस दिन सोनिया बता रही थी एक कप चाय बनाने में इनको बीस मिनट लगते हैं", खिड़की के ऊपर वाले पल्ले को बंद करते हुए दिव्या बोली| नीचे का पल्ला उसने खुला रहने दिया ताकि मैं देवदार को देख सकूँ।
मास्टर उगवे का जिक्र सुन कर मैं बड़ा बेचैन हो गया| चार साल पहले, इसी कमरे में, इसी बेड पर, जिसपर अभी मैं लेटा हूँ, मास्टर उगवे ने देह त्यागा था| "मृत्यु जीवन से हज़ार गुणा ज़्यादा सुंदर है मास्साहब, अगर हमने जीवन ठीक से जीया हो, और मैं जीवन को ठीक से जीकर मर रहा हूँ। जल्दी आइएगा, मैं वहाँ इंतज़ार कर रहा होऊँगा आपका, अकेले मेरा मन नहीं लगेगा वहाँ”, उगवे की आँखों में आंसू थे।
राव साहब मेरे दाईं ओर खड़े थे और भक्तराज़ अपने व्हीलचेअर पर मेरे बाईं ओर बैठे थे। राव को देखकर उगवे फुट-फुट कर रोने लगे थे। राव की आँखों से भी अनवरत आंसू बह रहे थे। बूढ़ऊ, तुम कब तक व्हीलचेअर पर बैठे रहोगे, सुराही भी तुमसे तंग आ गयी है अब तो...”, रोना रोक कर उगवे ने भक्तराज़ से कहा। भक्तराज के सब्र का बांध भी टूट चुका था, वह भी रोये जा रहे थे। तभी एक थाली हाथ में लिए सुराही अंदर आई। थाली में ये क्या लेकर आई है?” उगवे ने पूछा। आपके लिए प्याज़ और आलू के पकौड़े बना कर लाई है”, भक्तराज ने कहा। मुँह में एक भी दांत ना होने की वजह से भक्तराज हवा निकालते हुए बोलते थे। वाह...अब आप चैन से देह छोड़ पाएँगे जनाब”, राव साहब बोले।
मैं उगवे के बारे में सोच ही रहा था कि अमन, “असीम दादा (राव साहब) आ गए, असीम दादा आ गये...”, चिल्लाता हुआ कमरे में घुसा। उसके हाथों में लकड़ी का एक गट्ठर था। राव साहब आ गये”, दिव्या मुझसे बोली। हम्म...बोलकर मैं दरवाज़े को देखने लगा। कहाँ देखा तुमने उनको?” दिव्या ने अमन से पूछा। लकड़ी लेने गोडाउन गया था, तो वहीं से नीचे पुल के पास उनको ऊपर चढ़ते हुए देखा”, गट्ठर खोलकर लकड़ी आग में डालते हुए अमन बोला। फिर तो उन्हें आने में अभी 20 मिनट और लगेंगे, दमे की वजह से उन्हें ऊपर चढ़ने में बड़ी तकलीफ़ होती है”, मैं अपने आप से बोला। दमे की वजह से नहीं...नीचे गुप्ता जी के यहाँ जो रोज़ सिगरेट पीने जाते हैं, उससे दम फूलता है उनका”, दिव्या मुँह ऐंठते हुए ख़ुद से बोली। अमन... तुम आग को छोड़ों, और ऊपर जाकर सुराही से कहो कि वो भक्तराज जी को लेकर आए।अमन जाने से कतरा रहा था। उसे डर था कि अगर राव साहब के आने पर वह यहाँ मौजूद नहीं रहा, तो राव साहब उसके लिए जो चोकलेट लेकर आएँगे उसे वह अभी नहीं मिलेगा...। दिव्या ने उसके मन को भाँप लिया, “वो जो कुछ भी तुम्हारे लिए लेकर आएँगे, मैं नहीं रखूँगी..और भूलो मत सुराही भी तुम्हें कुछ न कुछ ज़रूर देगी।आश्वासन मिलने पर अमन लथराते हुए बाहर निकला..उसे दिव्या की बातों पर भरोसा नहीं था। अच्छा सुनो, पता है मैं क्या सोचता था?”, अमन के जाने के बाद मैंने दिव्या से कहा। दिव्या अंगीठी की आग को जगा रही थी। क्या सोचते थे?”, चिंगारी उड़ाते हुए वह बोली।
सुराही अपनी गार्गी से कुछ ही महीने छोटी है। जब उसका जन्म हुआ तो मैंने सोचा काश ये लड़का होती, तो गार्गी की शादी इसी से तय कर देता। हा..हा.हा”, मेरे साथ दिव्या भी हंसने लगी। आग के पास ज़ोर से हंसने की वजह से थोड़ी राख उसके मुँह में चली गई।बताओ तब गार्गी ठीक से तीन महीने की भी नहीं थी, और आप उसकी शादी की बात सोच रहे थे”, आग के पास से उठते हुए दिव्या बोली। बिना सहारे के उठने में उसे बड़ी दिक़्क़त हो रही थी। लगता है ठंड की वजह से दर्द बढ़ गया है। हंसने के बाद मैं फिर से पेट में खिंचाव महसूस कर रहा था।
सोनिया’ अहमदाबाद से कब लौट रही है?” मैंने दिव्या से पूछा। राव साहब तो कह रहे थे कि वो कल सुबह यहाँ पहुँच जाएगी”, ओवरकोट पर गिरे राख को झाड़ते हुए दिव्या बोली। तिपाई खींच कर मेरे सिर के पास बैठ गई, और फिर मेरे दाहिए हाथ को अपने दोनों हथेलियों के बीच रखकर रोने लगी,”क्या तुम सच में मर जाओगे.....?” अपने सिर को उसने हाथों पर रख दिया। उसे रोता देख मैं भी रोने लगा। रोते-रोते एक शेर याद आ गया, “अपने मरने का ग़म नहीं, हाय तुमसे जुदाई होती है”, 40 साल पहले यह शेर लोगों को बहुत सुनाया करता था। लेकिन मर्म आज समझ आया।
राव साहब के कदमो की आहट सुनकर दिव्या सिर उठा कर बैठ गई| जूते उतार कर राव साहब अंदर आए| उनकी टोपी पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें जमी हुई थी| वे तेज़-तेज़ सांस ले रहे थे| उनके हाथों में दो थैली थी, एक उन्होंने अंगीठी के पास कुर्सी पर रख दिया, और दूसरा दिव्या को थमा दिया| और ख़ुद अंगीठी में हाथ सेकने लगे| अंगीठी के पास बैठे इस बूढ़े राव साहब को देखकर मेरे लिए यकीन करना मुश्किल था कि यह वही राव साहब हैं, जिनके साथ 45 साल पहले अहमदाबाद में मैं कॉफ़ी पिया करता था| कितना कुछ बदल गया इस ४५ साल में| राव साहब सिंगल से डबल हो गए, मास्टर उगवे चले गए| बीस साल पहेल हम आठ लोग (मैं, दिव्या, रावसाहब, सोनिया, मास्टर उगवे, भक्तराज उनकी पत्नी, और सुराही) यहाँ, पहाड़ पर, रहने आए थे, आज बस ६ बच गए हैं| मैं जाने ही वाला हूँ, मुझे नहीं लगता दिव्या मेरे बाद यहाँ रहेगी| भक्त राज भी ज्यादा-से-ज्यादा एक-दो महीने और टिकेंगे| राव साहब के अकेले हो जाने का मुझे बड़ा दुःख हो रहा है| पता नहीं मेरे बाद क्या करेगा ये आदमी? सोनिया संभाल लेगी, समझदार लड़की है|  

सुबह के चार बज रहे हैं। आधा घंटा हो चुका है मुझे जगे हुए। दिव्या के उठने का वेट कर रहा हूँ। 8 बजे मैं शरीर छोड़ूँगा। दो बजे तक दिव्या जगी ही हुई थी।रात के बारह बजे तक साकेत, राव साहब, और भक्तराज यहीं कमरे ही थे। बारदो शुरू करने से पहले हमने बड़ी मुश्किल से सुराही और गार्गी को यहाँ से भेजा। दिव्या को जगाने से पहले मैं एकबार (या कह लें कि अंतिम बार) अष्ट्रावक्र गीता पढ़ना चाहता हूँ। मंगलवार को राव साहब यही किताब ख़रीदने रानीखेत गये थे। ‘Importance of living’ और अष्ट्रावक्र गीता को मैं अपने साथ ले जाऊँगा। इन दो किताबों के बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नर्क हो जाएगा। और अगर ये दोनों मेरे साथ है, तो फिर नर्क कहीं है ही नहीं, मैं जहाँ भी होऊँगा, स्वर्ग वहीं होगा। 
किताब पढ़ते-पढ़ते कब ६ बज गए पता ही नहीं चला। दिव्या अभी-अभी उठी है। आज पूरी खिड़की खोल दो, और अंगीठी जलाने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं काफ़ी गर्मी महसूस कर रहा हूँ।नीम-जगी दिव्या से मैंने कहा| वह बिना कुछ बोले बेड से उठ कर किचन में कॉफ़ी बनाने चली गई|
इस वक्त सुबह के ७ बज रहे हैं, कमरे में सारे लोग मौजूद हैं| मैं बेड पर लेटा हूँ| कमरे की सारी खिड़कियाँ और दरवाज़े खोल दिए गए हैं| दिव्या मेरे पैताने बैठी हुई हैं, दरवाज़े से आती हुई सूरज की लाल रौशनी उसके चेहरे पर पड़ रही है| बाल चांदी से चमक रहे हैं| दिव्या के बगल में साकेत बैठा हुआ है| उम्र में साकेत मुझसे सिर्फ तीन साल छोटा है, लेकिन इस वक़्त दस साल छोटा लग रहा है| प्रीती और गार्गी बेड के पीछे साकेत के पास ही खड़े हैं| राव साहब मेरे सिर के पास बैठे हैं, भक्त राज अपनी व्हीलचेअर पर बैठे हैं, सुराही उनके पीछे खडी है| कल अमन के माता-पिता मुझसे मिलने आए थे, अमन उन्ही के साथ कुछ दिनों के लिए अपने गाँव चला गया है| रॉकी अंगीठी के पास उदास बैठा, उसे शायद इस बात का इल्म हो गया है आज उसका दूसरा मालिक भी उसे छोड़ कर जा रहा है|
इशारे से मैंने गार्गी और सुराही को अपने पास बुलाया| दोनों राव साहब के बगल में आकर खड़ी हो गयी| दोनों की आँखों में आंसू है| अपने बगल से अष्ट्रावक्र गीता की दो कॉपी उठा कर मैं एक-एक दोनों को देता हूँ| “मुझे नदी के पास ले चलिए”, मैंने राव साहब से कहा|
मास्टर उगवे जब जिन्दा थे, और भक्तराज ने पेड़ से गिर कर अपना पैर नहीं तोड़ा था, तब हम चारों (भक्तराज, उगवे, राव और मैं) रोज़ यहाँ नहाने आते थे| जब मैं पहली बार यहाँ आया था तभी तय किया था कि अगर अस्तित्व ने चाहा तो अंतिम साँस यहीं लूँगा| नदी की कल-कल नाद और पंछियों की चहचहाहट के सिवाय यहाँ और कोई आवाज़ नहीं है| राव साहब और साकेत मेरे लिए चिता तैयार कर रहे हैं| शून्य आँखों से भक्तराज पानी को देख रहे हैं| सूराही उनके चेअर को संभाले हुए है| दिव्या मेरे बगल में बैठी है, मैं करवट लेकर नदी को बहता हुआ देख रहा हूँ| “पापा गिर गए.....” अचानक से सूराही चीखी| “मुझे पता था, यह आदमी मुझसे पहले जाएगा”, मैंने दिव्या से कहा| राव साहब दौड़ कर उनको उठाने गए|
अब एक की जगह दो चिताएं तैयार हो रही थी| साकेत लकड़ियाँ ला-लाकर राव साहब को दे रहा था| साकेत को देख कर मुझे रामचरित्रमानस का एक दोहा याद आ गया, “सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥ अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता” चिता तैयार हो जाने के बाद सब लोग मेरे पास आकर बैठ गए| भक्तराज को भी मेरे बगल में लिटा दिया गया| मैं अब भी पानी के बहाव को देख रहा था| प्रवाह में दौड़ते पत्थरों में मुझे वो सारे चेहरे दिख रहे थे, जिनसे जीवन काल में कभी मिलना हुआ था| थोड़ी देर प्रवाह को देखने के बाद मैंने अपनी आँखें बंद कर ली| और दिव्या के दाहिने हाथ को अपने दोनों हथेली के बीच रखा| मन-ही-मन माँ पिता जी को प्रणाम किया, दादाजी से आशीर्वाद माँगा, खानदान के सभी लोगों को एक साथ प्रणाम किया, गोविन्द और निकेश को याद करके आँखे गीली हो गई, पवन सर को प्रणाम किया और रोया, आदित्य से विदा मांगी| फिर आँखें खोल कर एक बार सबको देखा| हाथ जोड़ कर सबको प्रणाम किया| गहरी सांस लेते हुए एक बार धीरे से ओशो बोला, और फिर हमेशा के लिए शून्य में विलीन हो गया...
                                              The End..
Ikkyu Knesho Tzu (Between ‘Yesterday’-‘Today’) जन्म थिति-कल, मृत्यु- आज..!
किताब का नाम- अष्ट्रावक्र गीता, Importance of living..   लेखक- अज्ञात, लिन युतांग

Saturday, 2 May 2020

किताब-ए-मिरदाद (तब्सिरा)



किताब का नाम- 'किताब-ए-मिरदाद, लेखक-मिखाइल नईमी

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में अपने दस सबसे अधिक पसंदीदा किताबों की फ़ेहरिस्त साझा की है। उसमें से दो किताबों का नाम मुझे अभी याद है-महापण्डित राहुल सांकृत्यान की बौद्धचर्या' और लीयो टोलस्टोय की युद्ध और शांति। 'बैद्धचर्या' को लिस्ट में उन्होंने सबसे ऊपर और 'युद्ध और शांति' को सबसे नीचे रखा है। अगर मुझे कभी कोई ऐसी लिस्ट बनानी हो, तो मैं सबसे ऊपर मिखाइल नईमी की किताब-ए-मिरदादलिखूँगा, और फिर नीचे दस तक सेम ऐज़ अववलिख दूँगा।
दो साल से ऊपर हो गये मुझे तब्सिरालिखते हुए, लेकिन मिरदाद के संबंध में अब तक मैं मौन रहा हूँ। और मैंने तय किया था कि इस मौन को कभी नहीं तोड़ूँगा, लेकिन कल फेसबुक पर एक मित्र ने इस किताब का ज़िक्र छेड़ दिया, उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की है कि मैं बूक ऑफ़ मिरदादके बारे में लिखूँ।
मैं कल से ही बड़ी असमंजस में हूँ, आख़िर लिखूँ तो लिखूँ क्या...? मिरराद पर अगर कुछ बोलना हो, तो भीतर बुद्ध-सी गहरी मौन, और बाहर अल हल्लाज़ मंसूर सी मुखरता चाहिए। और यह बहुत ही दुर्लभ संयोग है, दो में से एक को साधना तो आसान है, लेकिन दोनों को एक साथ साध लेना, ‘एक अचंभा मैंने देखा नदिया लागी आग’ जैसी घटना है| इसीलिए इतने दिनों से चुप था|
‘मिरदाद’ पर सिर्फ़ लिखने से काम नहीं चल सकता है। इतने सालों का मौन सिर्फ लिखने से नहीं टूट सकता है| शब्द बहुत ही निर्बल हैं, मौन को तोड़ने के लिए| जब तक कि आप मेरे सामने न हों, और मैं चीख-चीख कर आपसे इस किताब के बारे में न कह  लूं, तब तक न तो आप इस किताब की महिमा को समझ पाएँगे, और न ही मुझे अभिव्यक्ति के बाद जो सहज तसल्ली मिलती है, वो मिलेगी|
खैर, आज कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ, तुतलाते हुए ही सही, आज कुछ बोलूँगा जरूर| मेरे आश्रम प्रवास के दौरान (2014 के 10 नवम्बर से लेकर 2017 के 10 जनवरी तक) , किसी ने मुझे किताब ए मिरदादपढ़ने को दी थी। मुझे याद है दिन भर किताब पढ़ने के बाद शाम को, संध्या सत्यसंग से पहले, ज़ोरबा (आश्रम का टी-शॉप) पर ग्रीन-टी पीने के लिए बैठता था| मेरी जगह तय थी, कैश काउन्टर के सामने खम्भे से सट कर, गर्मी के दिनों में दादी हौवा के ज़माने का एक पंखा सर पर घूमता रहता था, सामने हाईवे पर आती-जाती गाड़ीयों को मैं अपनी जगह से देख सकता था, पर्वत स्वामी मेरी सीट को व्यास सीट बोलते थे| वहीं टेबल पर मेरे पास दो-चार और सन्यासी बैठ जाते थे, फिर चाय पर चर्चा शुरू होती थी| मैं किताब-ए-मिरदाद पर बोलना शुरू करता था| बोलते समय मैं बिलकुल आविष्ट हो जाता था, लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे| मेरी बातें सुन-सुनकर आश्रम में किताब पढ़ने की होड़ मच गयी| कई लोगों ने किताब मंगवाई, कईयों ने मुझसे उधार मांग कर पढ़ी| जिस सन्यासिन ने मुझे वो किताब पढ़ने को दी थी, अचानक उनकी पूछ बढ़ गई, हर कोई उनसे वो किताब मांगने लगा| मजा ये था कि मुझे देने से पहले उन्होंने ख़ुद भी वो किताब नहीं पढ़ी थी| अब उनको भी किताब पढ़ने की जल्दी थी| इसी होड़ में दिव्या ने एक ही रात में पूरी किताब पढ़ डाली| जिसके पास ही किताब जाती थी, उसी पर उसे जल्दी ख़त्म करने की प्रेशर बनने लगता था| कई लोग किताब के लिए आपस में लड़ भी लिये| ऐसा कोई दो महीने तक चला था|
होड़ भले ही दो महीने तक चला हो, लेकिन उसका प्रभाव बहुत ही दूरगामी रहा था| 6 महीने बाद मेरे जन्म दिन पर दिव्या ने मुझे ‘किताब-ए-मिरदाद’ गिफ्ट की| मुझे याद गिफ्ट-रैप हटा कर जैसे ही मैंने कितबा को देखा, ख़ुशी के मारे पागल हो गया, जैसे आर्थर शोपनहावर उपनिषद को अपने सिर पर रख कर नाचे थे, वैसे ही मैं 'बुक ऑफ़ मिरदाद' को सर पर रख कर नाचने लगा था| दिव्या को पता था कि ‘हिंदी वर्शन’ पढ़ कर मैं बहुत खुश नहीं था, एक बार मैं किताब को अंग्रेजी में पढ़ना चाहता था| हिंदी अनुवाद बहुत ही पुअर था| अनुवाद में अक्सर आत्मा चली जाती है, और भाषाओं का तो मुझे पता नहीं, लेकिन किसी भी किताब का हिंदी अनुवाद पढ़कर मुझे ऐसा ज़रूर लगता है|
उस दिन से लेकर आज तक ‘बुक ऑफ़ मिरदाद’ मेरा पाथेय बना हुआ है| कुछ दिनों के अन्तराल पर, एक बार किताब को ज़रूर पलट कर देख लेता हूँ| जब भी लगता है अपना पता भूल गया हूँ, एक बार मिरदाद से पूछने चला जाता हूँ| अक्सर ख्वाबों में नरौन्दा की जगह ख़ुद को मिरदाद के श्री चरणों में बैठा हुआ देखता हूँ|
किताब से कोई भी ‘कोट’ यहाँ शेयर नहीं करूँगा| इसके पीछे दो वजूहात हैं- एक यह कि मैं तय नहीं कर पा रहा कि क्या शेयर करूं, और क्या न करूं| किताब का हर वाक्य एक महावाक्य है| यही दिक्कत मैंने किताब पढ़ते समय भी महसूस की थी| मुझे हाईलाइटर साथ में रख कर किताब पढ़ने की आदत है| पढ़ते समय अगर कुछ महत्वपूर्ण लगता है तो उसे मैं अंडरलाइन कर देता हूँ| लेकिन, दो ऐसी किताबें हैं जिनके दो-तीन पृष्ठों पर ही मैंने अंडरलाइन किया है| एक ‘किताब-ए-मिरदाद’ और दूसरा जे कृष्णमूर्ति की ‘सद्गुरु के चरणों में (At the feet of the master)’, इन दोनों किताबों में एक भी ऐसा वचन नहीं है, जो कोहिनूर से कम वैल्यू का हो, इन फैक्ट जो जानते हैं, उनके लिए इन वचनों के सामने कोहिनूर की चमक भी फीकी है|

किताब के पहले ही पृष्ठ पर मिखाइल ने पाठकों को चेताया है, यह है किताब-ए-मिरदाद’ उस रूप में जिसमें उसके (मिरदाद के) सबसे छोटे और विनम्र शिष्य नरौंदा ने लेखनीबद्ध किया| जिनमे आत्म-विजय के लिए तड़प है, उनके लिए यह आलोक-स्तम्भ और आश्रय है| बांकी सब इससे सावधान रहें|” मैं भी आपसे यही कहूँगा, अगर आपको अपने सपनों से प्रेम है, और नींद अच्छी लगती है, तो इस किताब से सावधान रहिये| यह किताब नहीं डायनामाइट है| इसका धमाका सिर्फ आपके शरीर को ही नहीं, आपके मन और आत्मा दोनों को उड़ा देगा| इस किताब से डरिये, और जिन्होंने यह किताब पढ़ रखी हो उनसे बच कर रहिये| 
            यही मेरी आपसे विनती है| Please don't read this book. संत पल्टू के इस महावाक्य को हमेशा याद रखिये" अजहूं चेत गंवार-
जीते जी मरि जाय, करै ना तन की आसा।
आसिक का दिन रात रहै सूली उपर बासा।।
मान बड़ाई खोय नींद भर नाहीं सोना।
तिलभर रक्त न मांस, नहीं आसिक को रोना।।
पलटू बड़े बेकूफ वे, आसिक होने जाहिं।
सीस उतारै हाथ से, सहज आसिकी नाहिं।
 -इक्क्यु केंशो तजु

Friday, 1 May 2020

और स्त्री पुरुष में शिव के भाव को आरोपित करें

'तंत्र साधना सूत्र-2'
21 दिन बाद, साधना के लिए दिन का एक निश्चित समय तय करें|
साधना में बैठने से पहले दोनों पार्टनर का स्नान करना ज़रूरी है| स्नान करने के बाद, कोई ढीला सूती वस्त्र पहने, फिर 20 मिनट ध्यान में बैठें| ध्यान करते समय आप दोनों को आमने-सामने बैठना है| तीन चरण में ध्यान करें, पहला पांच मिनट भाव करें कि आपका शरीर शिथिल हो रहा है, दूसरा पांच मिनट भाव करें कि आपकी साँसे शांत हो रही है| तीसरा पांच मिनट भाव करें कि विचार शांत हो रहे हैं| अंत में पांच मिनट सिर्फ मौन में अडोल बैठे रहें| समय का बोध रहे, इसके लिए आप कोई ऐसा संगीत बजा सकते हैं, जो हर पांच मिनट पर बदलता हो|
ध्यान के बाद, दोनों पार्टनर हाथ जोड़ कर एक दुसरे को प्रणाम करें| पुरुष स्त्री में शक्ति/देवी के भाव को आरोपित करे, और स्त्री पुरुष में शिव के भाव को आरोपित करें|
पहला दिन-
पुरुष को मसाज करना है| अपनी पत्नी/प्रेमिका को बेड पर पेट के बल लिटा दें (बिस्तर एक दम साफ़-सुथरा और पवित्र होना चाहिए)| वस्त्र नहीं उतारना है| कोई सुमधुर संगीत बजा लें| अगर संभव हो तो साधना के लिए ऐसा कमरा चुने जो बहुत भरा हुआ न हो| कमरा जितना खाली होगा, साधना के लिए उतना सही है|
स्त्री के पैरों से शुरू करें, पहले दस मिनट पैर के पंजों से लेकर घुटनों तक का मसाज करें| फिर कमर से लेकर गर्दन तक| फिर दोनों हाथों का| अंत में स्त्री के सिर में तेल लगा कर सर का मसाज करें| जब पूरी प्रक्रिया समाप्त हो जाए, तब एक दुसरे को प्रणाम करके, अहोभाव प्रगट करें और कमरे से निकल जाए|
नोट- पहले दिन, स्त्री पुरुष में से कोई भी वस्त्र नहीं उतरेगा...मसाज के दौरान स्त्री के ....................,,,,,,,नहीं छूना है| और सिर्फ 20 मिनट मसाज करना है|
दूसरा दिन-
आज फिर पुरुष को मसाज करना है- पहले ही दिन की तरह स्नान करके ध्यान कर लें| फिर स्त्री से कहें कि वो अपने वस्त्र ख़ुद ही उतार ले, और बेड पर पेट के बल लेट जाए| (आपको अपने वस्त्र नहीं उतारने हैं)| कल के ही तरह आज भी आपको मसाज करना है| आज के मसाज में दो चीज़ें नयी होगी, एक स्त्री के शरीर पर वस्त्र नहीं होगा| दूसरा, मसाज के दौरान आपको 'तेल' का इस्तेमाल करना है| अंत में एक दुसरे को प्रणाम करके अहोभाव प्रगट करना है, और फिर अलग हो जाना है|
नोट- कल की तरह आज भी आपको स्त्री के सेक्स .........,. नहीं छूना है| आज का मसाज 30 मिनट का होगा|
तीसरा दिन-
आज स्त्री मसाज करेगी- आज जब आप स्नान करके ध्यान में एक दुसरे के आमने-सामने बैठेंगे, तो दोनों के शरीर पर वस्त्र नहीं होगा| आज ध्यान आँख खोल कर करना है| पहले एक दुसरे की आँखों में देखें, फिर दृष्टि को नीचे लाएं, स्त्री पुरुष के जननेंद्रिय पर ध्यान करेगी, और पुरुष स्त्री के स्तन पर| बहुत ही शान्ति पूर्वक एक दुसरे के प्रतेक अंग को देखें| फिर बीस मिनट बाद, पुरुष बेड पर पेट के बल लेट जाएगा| फिर स्त्री पुरुष के पूरे शरीर का मसाज करेगी|
नोट- मसाज का समय 30 मिनट होगा| मसाज में तेल का इस्तेमाल करना है| स्त्री को पुरुष एक दुसरे के सेक्स सेंटर्स को नहीं छुएंगे|
चौथा दिन- आज का दिन........
(आगे की साधना बहुत ही गूढ़-व-गुप्त है, आगर आप जानना चाहते हैं , तो ikkyutzu@gmail.com पर sub में ‘तंत्र साधना सूत्र’ लिख कर मेल करें।
चित्र साभार-गूगल

Friday, 24 April 2020

'तंत्र साधना सूत्र-1'


चित्र साभार- गूगल
तंत्र में उतरने से पहले ख़ुद को थोड़ा तैयार करना जरूरी है| अभी हम जिस स्थिति में हैं, उस स्थिति में तंत्र में प्रवेश करना कठिन है| इसीलिए, पहले मैं आपको कुछ ऐसी बातें बताता हूँ, जिससे हम ख़ुद को तंत्र के लिए तैयार कर सकते है|
साधना शुरू करने से पहले 21 दिन तक आपको साधना में उतरने की तैयारी करनी होगी| तैयारी का पहला चरण है, शरीर शुद्धि, बिना शरीर को शुद्ध किये तंत्र की साधना संभव नहीं है| शरीर को शुद्ध करने के लिए आपको सबसे पहले अपने आहार को ठीक करना होगा| आहार ठीक करने का सरल सूत्र है, स्वाद के नहीं, शरीर की जरूरत के हिसाब से भोजन करना| अगले 21 दिनों के लिए मांसाहार, नशे का सेवन, धूम्रपान, अधिक तला हुआ, मीठा तथा गरिष्ठ भोजन का सेवन न करें| भोजन में हरी-सब्जी, फल, सलाद, जूस, नारियल पानी, देसी गाय का दूध (अगर दूध आपको पचता हो तो) और घर का बना सादा खाना ही खाएं| भोजन की मात्रा उतनी हो, जितने से खाने के बाद भारीपन महसूस न हो| इसके अलावा, अगर संभव हो तो, सुबह उठ कर योग की सूक्ष्म क्रियाएँ तथा प्राणायाम करें| अगर ऐसा न कर पाएं तो, रात का खाना खाने के बीस मिनट बाद 40 मिनट वाक कर लें|
आहार सुधारने के अलावा, शरीर को शुद्ध करने के लिए सबसे अहम् चीज़ है ब्रह्मचर्य का पालन| अगले 21 दिनों तक आपको sex नहीं करना है| एक वीर्य स्खलन के बाद शरीर को कम-से-कम 15 दिन लगते हैं, फिर से सेक्स के लिए तैयार होने में| 15 दिन से पहले सेक्स करना,शरीर के साथ अत्याचार है| चूँकि आपको तंत्र सेक्स की साधना करनी है, इसीलिए आपको परंपरागत सेक्स की जो आदत है, उसे तोड़ना होगा| अन्यथा आप तंत्र की साधना में सफ़ल नहीं हो पाएँगे| परंपरागत सेक्स शरीर की जरूरत कम मन की आदत ज्यादा है| इसलिए, बिना इस आदत को तोड़े आप तंत्र साधना नहीं कर सकते हैं| अभी आपका शरीर 'वीर्य स्खलन' का आदी हो चुका है, बिना पुरानी आदत को तोड़े आप तंत्र के लिए उसे राजी नहीं कर सकते हैं| अगले 21 दिनों के लिए सेक्स और सेक्स जुड़ी सभी चीज़ों (पोर्न, हस्तमैथून, अश्लील किताबें, अश्लील गाने इत्यादि) से ख़ुद को दूर कर लीजिए| शरीर के बाद आता है मन शुद्धि- मन को शुद्ध करने के लिए सबसे पहले ऐसी चीज़ों से ख़ुद दूर कर लीजिए, जिससे मन को गति मिलती हो| जैसे, टीवी देखना, मोबाइल का इस्तेमाल करना, अख़बार पढ़ना, गॉसिप करना, निंदा करना, इत्यादि-इत्यादि|
शरीर और मन को शुद्ध करने के अलावा, तंत्र साधना के लिए 'धेर्य' को विकसित करना बहुत ही ज़रूरी है| धेर्य विकसित करने के लिए झेन परम्परा के पास एक सूत्र है, 'when in hurry, go slow' (जब जल्दबाजी में हों, ख़ुद को धीमा कर लें)| आपने किसी के घर का बेल बजाया, दो क्षण की देरी के बाद मन एकदम बेचैन होने लगता है| उस बेचैनी के प्रति जागें| कहीं जाने की जल्दी हैं, आप हडबडाहट में सब कुछ जल्दी-जल्दी करने लगते हैं, ऐसे क्षण में ख़ुद को थोड़ा स्लो कर लें| जब भी किसी काम को करने की बेचैनी पकड़े, पहले भीतर की बेचैनी को शांत कर लें, फिर उस को करें| तेज़ भूख लगी है, आप टेबल पर बैठे हैं, भोजन आने का इंतजार कर रहे हैं| जैसे ही भोजन आता है, आप टूट पड़ते हैं, यहाँ थोड़ा ठहर जाएँ| थोड़ी देर भूख को देखें, भीतर जो खाना जल्दी आ जाए इसकी बेचैनी है, इसको देखें| जब खाना आ जाए, तो थोड़ी देर ठहर जाएँ..मन जब थोड़ा शांत हो तब धीरे-धीरे खाना शुरू करें| इस 'गो स्लो' के सूत्र को जीवन में सब जगह लेकर आएं| जिन-जिन चीज़ों को आप जल्दबाजी में करते हैं, उनको धीरे करना शुरू कर दें| मन हमेशा मंजिल पर पहुँचने की जल्दी में होता है, उसकी इसी जल्दबाजी को तोड़ना 'तंत्र' है| जब आप अपने अनुभव से यह समझ लेते हैं, कि हर उत्थान के बाद पतन आता है, आपके भीतर से मंजिल पर पहुँचने की जो बेचैनी है, कम होने लगती है|
सेक्स के क्षण में भी मन मंजिल (वीर्य स्खलन) तक पहुँचने की जल्दी में होता है| अगर पुरुष का बस चले तो वह फॉरप्ले की झंझट में कभी न पड़े, वो सीधा सेक्स ही शुरू कर दे| वो तो स्त्रियाँ, अक्सर, बिना फॉरप्ले के सेक्स के लिए तैयार नहीं हो पाती हैं, इसलिए पुरुष को यह कवायत करनी पड़ती है| २१ दिनों तक अगर आपने यह सब किया, आपका सेक्स मन से निकल कर शरीर में आ जएगा| अभी हम मन से सेक्स करते हैं, शरीर बस इंस्ट्रूमेंटल है| इसीलिए, आज दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो बिना पोर्न देखे सेक्स नहीं कर सकते हैं| जो लोग पोर्न नहीं देखते हैं, वो लोग भी सेक्स करते समय कल्पना करते रहते हैं, पुरुष किसी और स्त्री के बारे में सोचता रहता है, और स्त्री किसी और पुरुष के बारे में| कुछ लोग सेक्स करते समय एक दुसरे को गंदी-गंदी गलियां देकर उत्तेजित करते हैं, अश्लील शब्दों की मदद से ख़ुद को उकसाते हैं| यह सब इस बात का सबूत है कि शरीर से सेक्स विदा हो गया है| जब तक सेक्स शरीर में नहीं आ जाता है, तंत्र संभव नहीं है| और सेक्स शरीर में तभी आएगा, जब आप अपने मन से सेक्स से जुड़े सभी विचारों को बाहर फेंक दें|

(आगे पढ़ने के लिए मुझे ikkyutzu@gmail.com पर सब्जेक्ट में 'तंत्र सेक्स' लिख कर मेल करें.....)

Wednesday, 15 April 2020

मैं एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था

प्रश्न-स्वामी जी, धार्मिक लोग आपस में इतना लड़ते क्यूं हैं?
इक्क्यु- मैं एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था, आम मान्यता का अनुकरण करते हुए, बहुत सालों तक मैं इसी मुगालते में जीता रहा है कि मैं ब्राह्मण हूँ| सबसे श्रेष्ठ हूँ, विशिष्ट हूँ..मंदिर जाता था, पूजा करता था, शास्त्रों का अध्यन करता था|
जब तक गाँव में था तब तक मुझे पता था कि कौन सूद्र है, कौन डोम, कौन चमार और कौन मुसलमान| घर में जब कोई किसी और धर्म या जाति का आता था, तब माँ उसे अलग कप में चाय देती थी| कभी जब उन्हें खाना खिलाना होता था, तो माँ उन्हें अलग थाली में खिलाती थी| यह सब देख कर कभी-कभी मैं काफी उदास हो जाता था, और कई बार तो माँ से लड़ता भी था| लेकिन, माँ डांट-डपट कर मुझे चुप कर देती थी| सबसे बुरा मुझे तब लगा था, जब माँ ने मेरे एक मुसलमान दोस्त को अलग कप में चाय दी थी| लेकिन, वक़्त के साथ-साथ मैं माँ की बातों से सहमत होने लगा था-ख़ुद को श्रेष्ट और दूसरी जाति और धर्म के लोगों को अपने से नीचा मानने लगा था|

नीची जाति के लोग कभी भी, हमारे यहाँ आने पर, टेबल या कुर्सी पर नहीं बैठते थे| वे सदा नीचे ज़मीन पर बैठते थे| कुछ दुसाद जो मेरे घर पर आते थे, वे उम्र में काफी बड़े थे, उनके बाल सफ़ेद थे, लेकिन फिर भी हम उन्हें नाम लेकर ही बुलाते थे| ये मुझे थोड़ा अटपटा जरूर लगता था, लेकिन घर के सभी बच्चे ऐसा ही करते थे, सो मैं भी उन्हें नाम से ही बुलाता था, "माँ गुलमा आया है", गुलमा का पूरा नाम 'राम गुलाम दास था" वह हमारे घर का खानदानी नौकर था| हमारे घर के लोगों ने उसके घर के पूर्वजों को घर बनाने के लिए ज़मीन दी थी| वह हमारी ज़मीन पर बसा था, इसीलिए हमारे यहाँ गुलामी करता था| इस तरह की दास-प्रथा भारत में कैसे आई, यह सोचने वाली बात है| आज जब मैं इस प्रथा के बारे में सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि जरूर यूरोप के लोगों ने यह प्रथा भारत में शुरू करवाई होगी| गुलमा 'माँ को गृहस्तणी, और पिता जी तथा घर के सभी मर्द हज़रात, उसमें मैं भी शामिल था, को 'गृहस्त' बुलाता था| बचपन में मैं इस शब्द की महिमा से परिचित नहीं था, लेकिन इधर कुछ दिन पहले जब किसी ने मेरी माँ को 'गिरहसनी' बुलाया, तो अचानक मुझे ध्यान आया कि यह 'गिरहसनी' दरसल गृहस्तणी का बिगड़ा हुआ रूप है| फिर मुझे ध्यान आया कि संबोधन कितना पुराना है, और अब कितना निरर्थक है| बिना वानप्रस्थ और सन्यस्त हुए 'गृहस्त' होने का क्या अर्थ है| 'गृहस्त' तो उसी को कहा जा सकता है जो एक दिन वानप्रस्थ, फिर सन्यस्त भी होगा| फिर मुझे समझ में आया कि अदिकाल में गुलमा नौकर/या दास नहीं उन ब्राह्मणों का सेवक रहा होगा, जिनको एक दिन गृहस्त-आश्रम छोड़ कर सन्यस्त होना होता था| 'सेवक' होने और एक 'नौकर' होने में बड़ा फर्क है| समय के साथ सेवक दास हो गया और गृहस्त शोषक|
गाँव में रहते हुए किसी सूद्र, चमार, डोम या दुसाद से मेरी दोस्ती नहीं हुई| स्कूल में मेरे सारे दोस्त ब्राह्मण घर के ही बच्च्चे थे| नीची जाति के लड़कों के साथ उठने-बैठने तथा खेलने की मनाही थी| स्कूल में नीची जाति से कोई भी पढ़ने नहीं आता था| वे लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने की उम्र में किसी ब्राह्मण के यहाँ गाय-भैंस चराने के लिए चरवाही पर रख देते थे| उनका बच्चा वहीं बासी और बचा हुआ खाना खा कर पलता-बढ़ता था| कभी चोरी छिपे मैं अपने यहाँ के चरवाहे के साथ खेल लेता था, अगर कभी माँ पकड़ लेती थी, तो बहुत डांटती थी| दिल्ली आने के बाद, कई लड़कों से मेरी दोस्ती हुई, और मैंने सबसे बिना उनका सर नेम जाने दोस्ती की| 'रवि' नाम का एक लड़का मेरा बहुत ही करीबी दोस्त था| दो साल की लम्बी दोस्ती के बाद मुझे एक दिन पता चला कि जाति से वह चमार है| मैं बड़ा चौंका क्योंकि उसके रहन-सहन, खान-पान और पहनावे को देख कर मैं हमेशा अंदर-ही-अंदर ऐसा सोचता था कि यह ब्राह्मण है| मैंने कई बार उसके यहाँ खाना खाया था, उसने कई बार मेरे यहाँ खाया था| पहले तो, यह सोच कर मैं थोड़ा बेचैन हुआ कि चमार के साथ मैंने खाना खा लिया था| लेकिन एक दो दिन बाद मैं इन सब के बारे में ग़मभीरता से सोचने लगा| गाँव के चमार बहुत ही गंदगी में रहते थे, मरे हुए जानवर का मांस खाते थे, उनके घर गंदे थे, इन सब के बीच ख़ुद को अलग और महान समझना आसान था| लेकिन रवि का मामला अलग था...सच्चाई तो यह थी कि वह मुझसे भी ज्यादा साफ-सफाई में रहता था| पूजा-पाठ करता था, हारमोनियम बजता था| किसी भी अर्थों में मुझ से कम नहीं था| यह पहला मौका था जब मुझे अपने ब्राह्मणत्व' पर शक होने लगा| धीरे-धीरे यह शक इतना बढ़ गया कि मैंने अपने नाम के साथ वो सर नेम लगाना बंद कर दिया जिससे यह पता चलता था कि मैं ब्राह्मण हूँ| 'अगर यही ब्राह्मण होना है, तो यह तो दो कौड़ी का है'|

बहुत दिनों तक मैं अन्धकार में टटोलता रहा| मेरे अन्दर हजारों धार्मिक प्रश्न घुमते रहते थे| दिल्ली में ही मेरा एक दोस्त बना नासिर मैं उससे घंटों धार्मिक मुद्दों पर बहस करता रहता था| उसका मानना था कि धर्म का सम्बन्ध 'जन्म' से है, हम जिस परिवार, जाति में पैदा होते हैं, वही हमारा जाति और धर्म होता है| मैं इस तर्क से राज़ी नहीं होता था क्योंकि मुझे ख़ुद में, नासिर में और रवि में कोई भी अंतर नहीं दिखता था| फिर मुझे गाँव के वो लोग याद आते थे जिन्हें हम अपने से नीचा समझ कर उनके साथ अलग व्यवहार करते थे| अब मैं ख़ुद को उनसे अलग नहीं पाता था| उनका रंग रूप, मनः स्थिति, शरीर सब कुछ तो मेरे जैसा ही था| इतना तो मैं समझ गया था कि धर्म का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है| लेकिन, फिर किस चीज़ से धर्म का संबंध है, यह मेरे लिए एक यक्ष प्रश्न था| हिन्दू धर्म से मेरा मोह भंग हो रहा था, मेरे किसी भी प्रश्नों का जवाब हिन्दुओं के पास नहीं था| कम-से-कम उन हिन्दुओं के पास तो नहीं ही था, जिन्हें मैं जानता था| मेरा पूरा जीवन ही प्रश्न चिन्ह बन गया था| मैं इतना परेशान रहने लगा था कि मेरे करीबी और परिचितों को ऐसा शक होने लगा कि मैं पागल होता जा रहा हूँ| मेरा छोटा भाई एक दिन माँ को फोन करके बोला, " माँ, भाई पागल हो गया है, दिन भर अलबल कुछ भी बोलता रहता है|"
कई साल बाद, मैं दिल्ली में ही बौद्ध धर्म की एक शाखा से जुड़ा| शुरू-शुरू में मैं उनकी बातों और फिलोसोफी से बड़ा मुतासिर हुआ| कई लोगों को उस प्रैक्टिस से जोड़ा भी| लेकिन, कुछ ही दिनों में बाद मुझे बहुत सी ऐसी चीज़े दिखने लगी, जिससे मेरे सारे पुराने प्रश्न फिर से ताजे हो गए| हर मीटिंग में किसी न किसी से मेरी बहस हो जाती थी| कई बार बड़े लीडर मुझे समझाने आए, लेकिन मुझ से बहस करने के बाद वो ख़ुद ही कंफ्यूज हो जाते थे| धीरे-धीरे मैं ख़ुद को प्रैक्टिस से दूर कर लिया| नासिर के साथ कुछ दिन मैं मस्जिद में भी गया| बहुत सी किताबें पढ़ीं...बौद्ध प्रैक्टिस की तरह इस्लाम से भी मैं शुरू में बड़ा प्रभावित हुआ| लेकिन थोड़े दिनों बाद फिर वही बहस| वहां जाना भी छोड़ दिया| फिर बत्रा होस्पिटल के पास एक 'मैहर बाबा' का केंद्र था..कुछ महीने तक मैं वहां भी कीर्तन में गया| इस्कॉन में भी बहुत दिन अमित मामू के साथ गया| फिर आदित्य के साथ चर्च में भी...सब जगह एक ही कहानी, थोड़े दिनों बाद मैं वहां के लोगों से बहस करने लगता था| फिर धीरे-धीरे ख़ुद को दूर कर लेता था|
आज मेरा सम्बन्ध दुनिया के किसी भी धर्म से नहीं है| लेकिन मैं फिर भी धार्मिक हूँ| और मेरी यह धार्मिकता मेरे लिए कोई विश्वास या मान्यता नहीं है| बल्कि एक अस्तित्वगत प्यास है| अब मेरा धार्मिक होना मेरी पहचान नहीं है| मेरा धर्म मेरे अहंकार का विस्तार नहीं है| इसलिए, अपने धर्म की रक्षा करने के लिए मैं किसी की जान नहीं ले सकता हूँ| चूँकि मेरा धर्म किसी भी तरह के मान्यताओं और विश्वासों पर आधारित नहीं है, मैं किसी को भी अपने धर्म में कन्वर्ट नहीं कर सकता हूँ| ना ही किसी को भी अपने धर्म को मानने के लिए मजबूर कर सकता हूँ| यह ऐसे ही होगा जैसे कोई आँख वाला किसी अंधे को प्रकाश को मानने के लिए मजबूर करे| अँधा अगर प्रकाश को मान भी लेगा तो उसके जीवन में क्या फर्क पड़ेगा? क्या प्रकाश को मान भर लेने से अंधे का अंधापन दूर हो जाएगा? धर्म का जन्म से कोई भी सम्बन्ध नहीं है| धार्मिकता का सम्बन्ध हमेशा ही व्यक्ति से होता है, किसी भी जाति, धर्म या देश से नहीं| जन्म से हम सब एक जैसे ही होते हैं| पंच तत्व से ही हम सब का शरीर बना है, इसलिए हमारे शरीर में तो जन्म से कोई भेद हो नहीं सकता है| मन भी हम सब का एक ही जैसा है- क्या हिन्दू का क्रोध किसी मुस्लिम या इसाई के क्रोध से अलग होता है? फिर जन्म से अगर कुछ तय होता है तो वह हमारा भोजन, रहन-सहन, वस्त्र और कुछ मान्यताएं| लेकिन इन में से कोई भी धर्म नहीं है| एक हिन्दू जो कि ईश्वर को मानता है, और एक ईसाई जो कि जीसस को मानता है, में बुनियादी भेद क्या है? कुछ भी नहीं...!!!! रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता है| यह ऐसे ही जैसे एक अँधा प्रकाश को मानता हो, और दूसरा अँधा प्रकाश को नहीं मानता हो...इस मानने और न मानने से उनके जीवन के क्या अंतर आएगा? कुछ भी नहीं...!!! इसीलिए, जन्म से हिन्दू होना, मुस्लिम होना, या फिर ईसाई या यहूदी होना सांयोगिक घटना है, धर्मिक नहीं|
इसलिए, विवेक, दो धार्मिक लोग कभी भी आपस में नहीं लड़ सकते हैं| लड़ाई सिर्फ अंधों के बीच होती है| जहाँ भी लड़ाई दिखे समझ जाइए कि वहां धर्म नहीं है| और यह बात न सिर्फ बाहर के संबंध में सही है, बल्कि भीतर के संबंध में भी यही सूत्र लागू होता है| अगर आप अपने भीतर के क्रोध से लड़ रहे हैं, काम वासना से लड़ रहे हैं, लोभ से लड़ रहे हैं, इर्ष्या से लड़ रहे हैं, तो समझ जाइएये कि अभी आप धार्मिक नहीं हुए हैं| मेरी दृष्टि में, और यही सभी धार्मिक लोगों की दृष्टि है, लड़ाई अधर्म है, और स्वीकार धर्म|
धार्मिकता अनुभव है, जबकि धर्म सिर्फ एक मान्यता| 'मान्यता' से जीवन में कुछ भी नहीं बदलता है| इसीलिए, "धर्म के नाम पर दुनिया का कोई भी ऐसा पाप नहीं है जो न हुआ हो|" 

Sunday, 5 April 2020

जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?


प्रश्न - 24 घंटे आनंदित रहने का क्या मार्ग है ?
Ikkyu- सबसे पहले आपके भीतर 24 घंटे आनंदित रहने का जो लोभ है, उसे छोड़ना होगा..। दूसरी बात, आनंद का अपना कोई अनुभव नहीं होता है| सुख का अनुभव होता है, दुःख का भी अनुभव होता है, लेकिन आनंद का कोई अनुभव नहीं होता है, क्योंकि अनुभव के लिए ‘दो’ का होना ज़रूरी है। सुख के पीछे दुःख छिपा होता है, इसीलिए सुख का अनुभव होता है। इसी तरह दुःख के पीछे सुख छिपा होता है। अगर भीतर बिल्कुल ही सुख न हो तो आपको दुःख का पता नहीं चलेगा। तो, इस बात को बहुत ही अच्छे से समझ लीजिए कि अनुभव हमेशा विपरीत का होता है। साथ ही एक और बात गहरे उतार लीजिए,’कोई भी अनुभव आध्यात्मिक नहीं होता है’। कैसा भी अनुभव क्यों न हो सब अनुभव मन के हैं।
आनंद का अनुभव नहीं हो सकता है क्योंकि आनंद आपका होना है। आनंद चेतना का स्वभाव है। इसीलिए, जब तक चेतना सुख और दुःख के अनुभव में उलझी रहती है, वह अपने स्वभाव से वंचित रहती है। सुख में सुखी होना और दुःख में दुखी होना छोड़ दीजिए, फिर जो रह जाएगा वही अनन्द है।
प्रश्न- जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?
इक्क्यू- जागकर जीना चाहिए...दो दृष्टिकोण मैं आपको देता हूँ, जो भी सही लगे उसे चुन लीजिए। दोनों का परिणाम एक जैसा है।
पहला- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखिये जैसे आप उन्हें पहली बार देख रहे हैं। हर दिन को ऐसे जीना शुरू कीजिये जैसे यह आपके जीवन का पहला दिन है।
दूसरा- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखना शुरू कर दीजिए जैसे कि आप उन्हें आख़री बार देख रहे हैं। हर दिन को अपने जीवन का आख़री दिन समझिए।
दोनों ही दृष्टिकोण का एक ही लक्ष्य है-अतीत और भविष्य से मुक्ति..। जो भी आपको जमे उसे चुन लीजिए और कोई तीन महीने इस प्रयोग को कीजिए।
प्रश्न- आपका मूल संदेश क्या है ?
मेरा कोई संदेश नहीं है..। मैं कोई पैग़म्बर (पैग़ाम/मेसेज लाने वाला) नहीं हूँ..! संदेश लाना डाकिये का काम है। मैं कोई डाकिया-वग़ैरह नहीं हूँ। डाकिया एक जगह की ख़बर को दूसरी जगह पहुँचता है। यह बिचौलिये काम है। मुझे ऐसा काम पसंद नहीं है।
मैं अपने से ऊपर किसी को नहीं मानता हूँ, और ना ही कोई मुझसे नीचे है। फिर किसका संदेश किस तक पहुँचाऊँ?? मैं स्वयं संदेश हूँ।और यही मैं आपसे भी कहना चाहता हूँ, “अप्प दीपो भव:”


जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...