Tuesday, 16 July 2019

गमले में भी दर्द उगाया जा सकता है


16-07-2019, 17:25
कुछ महीने पहले (पिछले साल अक्टूबर में) जब मेरा बोधगया जाना हुआ था, तब वहाँ रह रहे अपने एक परिचित से मिलने मैं उनके घर गया था। काफ़ी दिनों से फ़ोन करके वो मुझसे मिलने आने को कह रहे थे। मेरा भी बोधगया जाने का सालों से मन था, हर साल प्लान बनाता था, लेकिन किसी-न-किसी कारण से प्लान रद्द हो जाता था। लेकिन इस बार, बहुत ही आश्चर्यजनक संयोग के कारण बोधगया जाना संभव हो पाया। बौधगया पहुँचने से पहले मैंने अपने मित्र को कॉल किया, मेरे आने की ख़बर सुनकर ख़ुशी के मारे वे अपना पोन पीटने लगे। कहाँ पर रुकेंगे?”, फ़ोन के उस ओर से उनकी आवाज़ आई। बोधिवृक्ष के आसपास कहीं रुकूँगा’, मैंने उनसे कहा। संडे तक तो रुकेंगे ना?”, उन्होंने पुछा|  मैंने कहा, जी हाँ रुकेंगे। (यह ग़ौर-ए-तलब है कि उन्होंने एक बार भी मुझे अपने यहाँ रुकने को नही कहा, औपचारिकरूप से भी नहीं।) तो, आइये फिर संडे को, मैं घर पर ही रहूँगा, मेरा घर बोधिवृक्ष से बस चार किलोमीटर की दूरी पर है|”, फिर फ़ोन के उस तरफ़ से उनकी आवाज़ आई। फ़ोन पर बात करने के थोड़ी देर बाद मेरे मोबाइल पर उनका एक मेसेज आया जिसमें उन्होंने अपना पता लिखकर भेजा था।
संडे को मिलने जाने से पहले मैंने गूगल मैप पर उनका ऐड्रेस डालकर देखा। मेरे करंट लोकेशन, जो बोधिवृक्ष से 300 मीटर की दूरी पर था, से उनका घर सिर्फ़ दो किलोमीटर की दूरी पर बता रहा था। मुझे बड़ी हैरानी हुई क्योंकि उस दिन उन्होंने बताया था कि उनका घर मंदिर से चार किलोमीटर की दूरी पर है| मैंने सोचा हो सकता है, सुनने में मुझसे भूल हो गई हो|
होटल से बाहर निकलकर मैंने एक ऑटो को हाथ दिया| ऑटोवाले ने ठीक मेरे पैर के पास आकर ऑटो रोका| पता बताकर जब मैंने भाड़ा पूछा, तो उसने 60 रुपया बतया| “दो किलोमीटर का साठ रुपया किस हिसाब से हो गया भाई?”, थोड़ा चौंकते हुए मैंने उससे पूछा| “बात दूरी का नहीं है भाई जी, अभी उधर ढेर जाम होता है, कम-से-कम 20 से 30 मिनट लग जाएगा वहां पहुँचने में”, पान का पीक सकड़ पर फेकते हुए वह मुझसे बोला| उसकी ‘ढेर जाम’ वाली बात सुनकर मैं मुस्कुराने लगा| मुझे अपने मुंबई निवास के वे दिन याद आ गए, जब मैं अँधेरी में पटना के तीन लड़कों के साथ रह रहा था| उनकी पटनिया भाषा सुनने में मुझे बड़ा मजा आता था| अपने सुनहरे दिनों को याद करते हुए, मैं ऑटो में बैठ गया| ‘ठीक है चलो पचास ले लेना’, बैठते हुए मैंने उससे कहा| “आप से बेसी भाड़ा नहीं मांग रहे हैं भाई जी, जितना उचित है उतना ही आपसे बोले हैं|”, गाड़ी बढ़ाते हुए वह बोला|
30 मिनट तो नहीं लेकिन 20 मिनट जरूर लग गया पहुँचने में| ऑटो से उतरकर मैंने एक सौ का नोट निकालकर ऑटोवाले को दिया, उसने मुझे 40 रुपया वापिस किया| रूपया वापिस लेते हुए मैंने उसके मुंह को गौर से देखा, हल्की दाढ़ी पर चंद्रशेखर आज़ाद टाइप मूंछ में वह ऑटो ड्राइवर कम विदूषक ज्यादा लग रहा था| जहाँ मैं ऑटो से उतरा वही रोड किनारे एक पान की दूकान थी| मैंने अपने जेब से मोबाइल निकाला और पता देखकर दूकानदार से पते के बारे में पूछा| “सामने वाली गली में तीसरा मकान ओझा जी का है”, पान पर चूना लगते हुए, दूकानदार ने मुझसे कहा| ऑटो ड्राईवर की तरह दूकानदार का मुंह भी पान के थूक से भरा हुआ था, बड़ी मुश्किल से वह बोल पा रहा था| इसकी मूंछ और शक्ल-ओ-सूरत तारक मेहता के पत्रकार पोपटलाल जैसी थी| 
रोड पार करके मैं गली में पहुंचा| पहला मकान किसी राय जी का था, दूसरे मकान के बाहर लगे नेम प्लेट पर ‘एडवोकेट सुमन यादव’ लिखा हुआ था, और तीसरे मकान के बाहर लगे बोर्ड पर लिखा था, “आनंद निवास, कृष्ण मोहन ओझा’ (बदला हुआ नाम)” यह मेरे मित्र का मकान था| चूँकि यह सरकारी कॉलोनी थी, इसीलिए सारे मकान का पैटर्न एक जैसा था| सड़क किनारे घर का मुख्य द्वार था; दो सीमेंट के खम्भे के बीच एक लोहे का छोटा-सा फाटक| दाहिने खम्भे पर रखे गमले में नागफनी उगा हुआ था| नागफनी देखकर मुझे मेहशर अफरीदी साहब का एक शेर याद आ गया, “जब से कैक्टस को देखा है, सोच रहा हूँ गमले में भी दर्द उगाया जा सकता है”| पता नहीं कृषमोहन जी ने अपने किस दर्द को गमले में उगा रखा था| मुख्यद्वार इतना छोटा था कि यदि आप नियमित रूप से योग करते हैं, तो उसे आसानी सी टांग उठाकर फांद सकते थे| मुख्य द्वार और घर के बीच थोड़ी खाली जमीन थी, जिसमे में चार आम के पेड़, एक अर्जुन का पेड़, एक लीची और दो अमरुद के पेड़ लगे थे| घर के ठीक बाहर क्यारी बनी हुई थी, जिसमे गुलाब, गेंदा और बेला के छोटे और बड़े पौधे लगे हुए थे| घर के दाहिने भाग में भी थोड़ी खाली जमीन थी, उसमे कृष्ण मोहन जी ने धनिया, पुदीना, और मूली उगा रखा था| मकान के पीछे सीरिष्ट के दो बड़े-बड़े पेड़ थे, पेड़ की छाया से उनका पूरा मकान ढका हुआ था| कृष्ण मोहन जी के मकान की तरह ही गली के सारे मकान पेड़-पौधों से घिरे हुए थे| कृषमोहन जी के बाद गली का चौथा मकान किसी ‘अमरकांत झा’ का था| अमकांत जी और कृष्णमोहन जी के मकान के बीच जो दीवार थी उस पर लौकी और करेला लटका हुआ था| आनंद निवास के ठीक सामने सड़क के उस तरफ SBI का एटीएम था, यह कृष्णमोहन जी के घर का लैंडमार्क था| मुझे SMS करके जो पता उन्होंने भेजा था, उसमे इस एटीएम का भी जिक्र था| मुख्य द्वार का फाटक खोलकर मैं अन्दर उनकी मकान की और बढ़ा|

घर के प्रवेश द्वार पर ‘सुस्वागतम्’ का एक टिनही बोर्ड लगा हुआ था| बोर्ड मेरे नोटिस में आया, क्योंकि एक कील निकल जाने की वजह से वह नीचे झूल गया था| गेट के बायीं ओर बने खिड़की से एक लोहे का कूलर लगा हुआ था, जिसकी तेज़ आवाज़ मेरे कानो को चुभ रही थी| कूलर का पानी टपककर नीचे फूलों की क्यारी में जा रहा था| क्यारी के जमा पानी में दो बगरी (स्पैरो) पंख फड़फड़ा कर नाहा रही थी| गेट के सामने खड़े होकर मैंने घंटी बजाई| अन्दर कमरे से घंटी के बजने की आवाज़ आई, ‘ॐ भूर्भुवः...’| “अरे...सुमन देखो तो कौन है”, अन्दर से कृष्णमोहन जी की आवाज़ आई| कमरे के अन्दर से आ रही टीवी की आवाज़ को सुनकर मैंने अंदाज़ा लगाया कि कृष्ण मोहन जी कमरे में टीवी देख रहे हैं| पांच सेकेण्ड बाद कमरे का दरवाज़ा खुला| कृष्णमोहन जी का 7 वर्षीय बेटा सुमन अपरिचित निगाहों से मुझे घूरने लगा| तभी सोफे पर बैठे हुए कृष्णमोहन जी ने टीवी से नज़रे हटाकर मेरी ओर देखा| मुझे देखते ही एकदम से हडबडाकर उठे, “आइये-आइये कब से इंतज़ार कर रहा था”, बोलते हुए मेरे पास आए और हाथ मिलाने के लिए अपना दाहिना हाथ मेरी ओर बढाया| तीन साल आश्रम में रहने के बाद, मैं लोगों हाथ मिलाना भूल गया था| आश्रम में या तो हम लोगों से गले मिलते थे (कुछ लोग गले पड़ भी जाते थे), या फिर हाथ जोड़कर नमस्ते किया करते थे| बड़े ही अटपटे ढंग से मैंने अपना हाथ उनकी और बढाया| मुझे वह दिन याद आ गया जब जीवन में पहली बार मैंने किसी से हाथ मिलाया था| अपने एक दोस्त के साथ मैं गावं का ‘महावीर मेला’ देखने गया था| मेरे दोस्त का एक पुराना दोस्त नवीन नया-नया दिल्ली से आया था| वह हमें मेले में मिल गया| मिलते ही उसने हम दोनों के सामने अपना हाथ बढ़ाया| हमें एकदम से समझ नहीं आया कि करना क्या हैं, वो तो अच्छा था कि हमने फ़िल्मों में लोगों को हाथ मिलाते देखा था| हडबडाते हुए हम दोनों ने उससे हाथ मिलाया| आज जब कृषमोहन जी ने अचानक अपना हाथ मेरी और बढ़ाया, तो मैं वैसे ही हडबडा गया| 7 साल दिल्ली में और तीन साल मुंबई में रहने के बाद हाथ मिलाना मेरे लिए सहज हो गया था, लेकिन आश्रम में रहने के बाद अब फिर से मुझे यह अटपटा और अजीब लगने लगा है| अब या तो ओशो की तरह हाथ जोड़कर मंद-मंद मुस्कुराते हुए मिलना अच्छा लगता है, या फिर करीबी मित्रों के साथ गले मिलकर| यहाँ कृष्णमोहन जी मेरे इतने करीबी मित्र तो जरूर थे कि मैं उनसे गले मिल सकता था, लेकिन हाथ बढ़ाकर उन्होंने सब ख़राब कर दिया| अच्छा, एक मिनट रुकिए...!!! कहानी आगे बढ़ाने से पहले आपको एक शेर सुनाना चाहता हूँ, हाथ मिलाने से संबंधित शेर है इसिलिये अभी अचानक याद आ गया, बहुत अच्छा शेर है, पहले शे’र सुनिए फिर आगे की कहानी सुनेंगे, तो अर्ज़ किया है,
“आँख उठाकर भी न देखूँ, जिससे मेरा दिल न मिले
रस्मन सबसे हाथ मिलाना, मेरे बस की बात नहीं”
वा-वाह क्या शेर है...!!
हैण्डशेक करने के बाद कृष्णमोहन जी मेरा हाथ पकड़कर मुझे कमरे में ले आए| और फिर जिस सोफे पर वे बैठे थे, उस के बगल वाले सोफे से अपने बेटे का स्कूल बैग हटाकर मुझे बिठाया| फिर, अपनी पत्नी को आवाज़ लगाते हुए बोले, “सुनती हो, इक्क्यु जी आए हैं|” उनकी आवाज़ काफी तेज़ थी, लेकिन इतनी नहीं की टीवी से आ रहे शोर को दबा दे| “हाँ बस लाती हूँ बस दो मिनट और रुको”, अन्दर से सीमा भाभी की आवाज़ आई| “ये पता नहीं क्या समझ रही है, मैं बोल रहा हूँ इक्क्यु जी आये हैं, तो यह बोल रही है लाती हूँ”, मेरी ओर देखते हुए कृषमोहन जी बोले| टीवी चालू था, ‘सब टीवी’ पर तारक मेहता का उलटा चश्मा चल रहा था| 
“बोधगया कैसा लगा, पहलीबार आए हैं ना आप?”, टीवी का चैनल बदलते हुए उन्होंने मुझसे पुछा| “पापा, रहने दो न मुझे देखना है”, टीवी के नीचे जमीन पर बैठा सुमन बोला| “बेटा अभी ऐड दे रहा है, थोड़ी देर स्कोर देख लेने दो, फिर लगा दूंगा”, टीवी पर नज़रे टिकाये कृष्णमोहन जी बोलें| ‘स्कूल जाता है सुमन’, मैंने सुमन की ओर देखते हुए पुछा| (कृष्णमोहन जी ने मुझसे जो सवाल पूछा था, उसका जवाब न तो मैंने दिया न ही उन्होंने दूबारा पूछा, वह सवाल दो चैनलों के बीच दबकर मर गया|) सुमन ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया| चैनल बदले जाने की वजह से वह मुंह फुलाए बैठा था| “बेटा, अंकल कुछ पूछ रहे हैं, जवाब दो”, कृष्णमोहन जी ने सुमन से कहा| ‘अच्छा ये देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लेकर आया हूँ’, अपने बैग से चोकॉलेट निकालकर देते हुए मैंने सुमन से कहा| “अरे क्या बात है, कितना बड़ा चॉकलेट लेकर आए हैं अंकल जी सुमन के लिए|”, अपनी आवाज़ में पुचकार लाते हुए कृष्णमोहन जी ने अपने मुंह फुलाए बेटे से बोला| मेरे हाथ में चॉकलेट देखकर सुमन का गुस्सा गायब हो गया| वह झट से चॉकलेट लिया और अन्दर की और भागा| अब कमरे में बस हम तीन लोग रह गए थे, एक मैं, दूसरा कृष्णमोहनजी और तीसरा टीवी| “कोहलिया आजकर कमाल कर रहा है, आप क्रिकेट देखते हैं की नहीं”, एड आ जाने की वजह से टीवी को म्यूट करते हुए कृष्णमोहन जी ने मुझसे पूछा| इससे पहले की मैं जवाब देता, उनके मोबाइल की घंटी बजी| उन्होंने झट से कॉल उठाया और फोन पर बात करने लगे| उनको कॉल पर बात करते देख मुझे अपने मोबाइल की याद आई| बैग से मैंने मोबाइल निकाला, ‘साकेत ब्रो JIO 4 मिस्ड कॉल’| फोन साइलेंट होने की वजह से मुझे कॉल का पता नहीं चला था| किसी दोस्त से मिलने आया हूँ, भाई| दो घंटे बाद कॉल करता हूँ’, मैंने साकेत को SMS किया| “अरे सन्डे है भाई घर पर बैठे हैं, मन क्या लगेगा टीवी पर मैच देख रहे हैं”, कृष्णमोहन जी फोन पर बोल रहे थे|
करीब 10 मिनट तक कृषमोहन जी फोन पर बात करते रहें| इस बीच उनकी पत्नी आई और मुझसे मिलकर फिर से किचन में काम करने चली गई| कुछ देर पहले जब कृषमोहन जी ने आवाज़ लगा कर मेरे बारे उन्हें बताया था तब, सीमा भाभी को ऐसा लगा था कि कृष्णमोहन जी चाय के लिए उन्हें आवाज़ लगा रहे हैं, इसीलिए उन्होंने दो मिनट में लेकर आने की बात कही थी| फिर जब सुमन चॉकलेट लेकर अन्दर गया तो उन्हें पता चला कि कोई अंकल जी आए हैं| अमन की बातों से उन्हें अंदाज़ा लग गया था कि अजनबी अंकल जी मैं ही हूँ, (कृष्णमोहन जी ने उन्हें पहले से मेरे आने के बारे में बता रखा था|), इसीलिए जब वह हॉल में आई तो एक ट्रे में दो कप चाय और दो कटोरे में नमकीन और बिस्कुट ले कर आईं| करीब दो घंटे तक मैं कृष्णमोहन जी के यहाँ रुका| इस दो घंटे में उनकी पत्नी ने मेरे मना करने के बावजूद दो बार चाय पिलाया और एक बार खाना खिलाया| मैं जबतक रहा तब तक कृष्णमोहन जी का टीवी चलता रहा, कुछ देर ‘सब टीवी चलता था, तो कुछ देर क्रिकेट’| इसके अलावा दो घंटे में उन्होंने छः लोगों से फोन पर बात की| एक्स्ट्रा एक्टिवि में सुमन ने भाभी जी के कहने पर मुझे दो पोएम्स सुनाए| हालचाल पूछने और सुनाने के अलावा कृषमोहन जी से मेरी किसी और विषय पर कोई बात नहीं हुई| हद तो तब हो गई जब कृष्णमोहन जी मुझे छोड़ने के लिए अपने मकान के मुख्य द्वार तक भी नहीं आए, गली से बारह ऑटो तक छोड़ने की बात तो भूल ही जाइए| ये बाहर आकर छोड़ने वाली बात पहले मेरे नोटिस में नहीं आती थी, लेकिन एक बार मेरे एक ग्रामीण मित्र ने जब मुझे एक वाकया सुनाया तब से मैं इसे नोट करने लगा हूँ| वो वाकया क्या था? आइये सुनाता हूँ....
सन 2003 की बात है, मैं दरभंगा के MLSM कॉलेज से आई.एस.सी.(मैथ्स) कर रहा था| काश तब मुझे पता होता कि आर्ट्स/लिटरेचर पढ़ना शर्म की नहीं गर्व की बात है, तो मैं कभी साइंस में एडमिशन नहीं लेता| हालाँकि मेरे चाचा ने मुझे 10th के बाद यह सलाह दी थी कि आर्ट से आगे की पढ़ाई करो, लेकिन मैं अपने इस तर्क में कि मेरा जो विषय कमज़ोर है मुझे उसे मजबूत करना है, मैथ्स में एडमिशन ले लिया| साला ये तर्क बहुत ही ख़तरना चीज़ होता है, कब आपको डूबा दे कुछ पता नहीं| सुकरात ठीक ही कहते थे, “तर्क वेश्या है”| खैर, क्या करना चाहिए था, और क्या नहीं करना चाहिए था यह बताने के लिए अभी मैं आपको यह कहानी नहीं सुना रहा हूँ| कहानी पर लौटते हैं| दरभंगा चूँकि मेरे घर से 25 किलोमीटर दूर है, पढ़ाई करने के लिए मुझे गावं छोड़कर वहां शिफ्ट होना पड़ा, घर से रोज़ जाना आना संभव नहीं था| आज-कल की तरह अगर मोटर बाइक का चलन उन दिनों आम होता, तो आना-जाना मुश्किल नहीं है| लेकिन साइकल से यह नामुमकिन था| हालाँकि मेरे दादा अपने समय में गावं से रोज़ 13 किलोमीटर कमतौल हाईस्कूल पैदल जाते और आते थे| फिर साइकल से 25 किलोमीटर बहुत ज्यादा दूर नहीं था| लेकिन मेरे समय में आम रवायत यह था कि लड़के गाँव से दसवीं पास करने के बाद आगे की पढ़ाई करने के लिए दरभंगा रहने चले जाते थे|
दोनार में गोविन्द (गोविन्द का जिक्र बहुत से संस्मरणों आ चूका है, इसीलिए मैं मानता हूँ अबतक आपको यह पता लग गया होगा कि गोविन्द मेरे बचपन का मित्र/ग्रामीण और चचेरा भाई है, और बहुत दूर के रिश्ते में वह मेरा मामा भी लगता है| गोविन्द का नानी गाँव और मेरी माँ का नानी गाँव एक ही है|) का अपना घर था| दरभंगा में मैंने वहीं शरण लिया| घर का छत सीमेंट के चदरे का था, जिसपर गोबिंद ने लौकी का लता चढ़ा रखा था| गर्मी में छत से आग, बारिश में पानी और सर्दी में ओस टपकता था| सभी मौसम में घर में बहार आया रहता था| गोविन्द कक्षा में मेरे से एक वर्ष आगे था| मेरे से एक साल पहले, जब वह वहां रहना शुरू किया, तब मकान पूरा बनकर तैयार नहीं हुआ था| अधबने मकान में ही गोविन्द अपने चार दोस्तों के साथ रहना शुरू कर दिया था| टॉयलेट न होने की वजह से ये लोग सुबह घर से एक किलोमीटर दूर रलवे स्टेशन जाते थे| वहां वाशिंग के लिए खड़ी ट्रेन में फ़ारिग होते थे| एक बार तो यूं हुआ कि गोविन्द का एक दोस्त राकेश (बदला हुआ नाम), जोकि अब इस दुनिया में नहीं है 3 वर्ष पहले एक रोड एक्सीडेंट में उसकी मौत हो गई,  ट्रेन के टॉयलेट में बंद था, और ट्रेन चल दी| वह इतना खोया था कि जब तक ट्रेन तेज नहीं हो गई उसे पता ही न चला कि ट्रेन चल रही है| अगले स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो वह दूसरी ट्रेन पकड़ कर तीन घंटे बाद वापिस आया| ऑटो से वापिस आने के लिए उसके पास पैसे ही नहीं थे, इसीलिए ट्रेन से वापिस आना उसकी मजबूरी थी| खैर, जब मैं रहने आया तब तक वह मकान पूरा बनकर तैयार हो गया| मुझे इस तरह की दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा| हाँ, बारिश, आग और ओस का सुख सदैव मिलता रहा|
गोविन्द के जिस मकान में हम रह रहे थे, उस मकान से थोड़ी दूर पर मेरे एक और ग्रामीण का मकान था| उस ग्रामीण का नाम ‘शिवपाल’ (बदला हुआ नाम) था| शिवपाल अपने मकान से रोज़ 9 बजे हमारे मकान पर आता था| उसके रोज़ आने का कारण यह था कि वह हमारे यहाँ से सुबह का अख़बार लेकर अपने यहाँ जाता था| शिवपाल का ऐसा करने के पीछे गहरी राजनीति और चालाकी थी|
हमारे मकान पर रोज़ सुबह 6 बजे अख़बार आ जाता था| एक दिन शिवपाल जब हमारे यहाँ आया तो हमारा अख़बार देखकर उसके दिमाग में एक खुराफाती आइडिया आया| “तुम लोग कितने बजे तक अख़बार पढ़ लेते हो”, शिवपाल ने हम सब से पूछा| “9 बजे हम उस पर सुबह का नाश्ता करते हैं”, मेरे एक दोस्त ने जवाब दिया| “तो फिर ठीक है, 9 बजे तक तुम सब अख़बार पढ़कर उस पर नाश्ता कर लेते हो”, शिवपाल बोलने लगा, “और रोज़ 9 बजे मैं घर से दादाजी के लिए अख़बार लेने निकलता हूँ, अगर तुम लोग मुझे अपना अख़बार दे दो तो मुझे अख़बार खरीदना नहीं पड़ेगा| मेरा इससे थोड़ा पॉकेट मनी बन जाएगा, तुम लोग तो जानते ही हो कि मेरे दादा कितने कंजूस हैं| इसके बदले महीने में एक दिन मैं तुम लोगों को फिल्म दिखा दिया करूँगा|”, शिवपाल ने अपना प्लान हमारे सामने रखा| हमें शिवपाल का प्लान अच्छा लगा| “लेकिन अगर तुम हमारा अख़बार लेकर चले जाओगे, तो फिर महीने के अंत में हम क्या बेचेंगे? हर महीना 20 रुपया का अख़बार बिकता है| जितने का तुम हमें फ़िल्म दिखाओगे उतना तो हम हर महीना अख़बार बेचकर कमा लेते हैं(उन दिनों दरभंगा में सिनेमा का सबसे मंहगा टिकट 7 या 9 रूपये का था| हम लोग अक्सर 5 या सात वाला टिकट कटाते थे|)”, ऐसा मेरा रूममेट विजय बोला| विजय MLSM कॉलेज से ही कॉमर्स में पढ़ाई कर रहा था| हम सब विजय की चतुराई से सहमत हुए| मुझे भी इस बात का गर्व हुआ कि मैं एक शातिर आदमी के साथ रूम शेयर कर रहा हूँ| हालाँकि गोविन्द विजय की ऐसी हरकत को ‘छूछ काइयांपन’ कहा करता था| गोविन्द का ऐसा सोचने के पीछे कारण यह था कि विजय कभी भी गोविन्द को रूम रेंट टाइम पर नहीं देता था| “अगर ऐसा है तो रोज़ सुबह मैं पिछले दिन का अख़बार तुम लोगों के लिए ले आऊंगा| एकबार पढ़ने के बाद दादाजी इस बात की फिकिर नहीं करते हैं कि अख़बार कहाँ गया”, शिवपाल ने विजय की ओर देखते हुए कहा| इस बार शिवपाल की बात का काट हम में से किसी के भी पास नहीं था| हम सब एक मत से राज़ी हो गए| अब शिवपाल रोज़ सुबह हमारे यहाँ नया अखबार लेने और पुराना अखबार देने आने लगा|
अब तक शिवपाल से मेरी कोई खास दोस्ती नहीं थी| इन फैक्ट, गोविन्द और पारितोष के अलावा शिवपाल की हमारे मकान पर किसी से भी ज्यदा बातचीत नहीं थी| लेकिन अब धीरे-धीरे शिवपाल से सबकी दोस्ती होने लगी थी| मेरे से भी उसकी अच्छी बातचीत होने लगी| एक शाम शिवपाल हमारे मकान पर आया| कुछ दिनों से वह हर शाम बेडमिन्टन खेलने हमारे यहाँ आ जाता था| हालाँकि गोविन्द का कहना था कि वह खेलने कम और सामने वाली आंटी को देखने ज्यादा आता था| मकान मालिक होने की वजह से गोविन्द हर चीज़ को अलग और गूढ़ तरीके से देखने लगा था| उस दिन मेरे आलावा सब लोग बाहर गए हुए थे| शातिर विजय गाँव गया हुआ था, गोविन्द किसी से मिलने गया था| पराग और मोहित कोचिंग करने गए थे| एक बस अकेला में घर पर था|
बेडमिन्टन खेलने के बाद, थोड़ी देर हम ने इधर-उधर की बातें की फिर मैंने उससे बोला, “विश्वनाथ, यहीं पास वाली गली में अभी दो दिन पहले शिफ्ट हुआ है, कल मैं उसके यहाँ से एक किताब ले कर आ गया था, चलो किताब वापिस करके आते हैं|” शिवपाल की तरह विश्वनाथ भी मेरा ग्रामीण ही है| वह पहले हमसे दूर किसी और मुहल्ले में रहता था| अभी दो दिन पहले यहाँ शिफ्ट हुआ था| “मैं उससे मिलने नहीं जा सकता”, शिवपाल कहने लगा,  “उसको मिलने की तमीज़ नहीं है| पहले जब वह छपकी में रहता था, तो मैं एक बार उससे मिलने गया था| जब मैं उसके घर से निकला तो वह गेट तक भी छोड़ने नहीं आया|” ऐसा मैं पहली बार सुन रहा था| गेट तक छोड़ने नहीं आना मतलब मिलने की तमीज़ नहीं होना| पहले मैंने नहीं सुना था|
इस घटना के बाद से मैं गौर करने लगा कि मिलने जाने पर कौन मेजबान बहार तक छोड़ने आता है, और कौन नहीं आता है| दिल्ली में जब नासिर से मेरी दोस्ती हुई तो, जब भी उसका फोन आता था कि वह आ रहा है, तो मैं उसके घर तक उसको लेने के लिए चला जाता था| और जाते वक़्त ठीक उसके गेट के बाहर तक उसको छोड़कर आता था| इसलिए आज कृष्णमोहन जी का छोड़ने के लिए बाहर तक नहीं आना मुझे खला| अगर आज यहाँ कृष्णमोहन जी की जगह मेरे राव साहब होते तो गेट क्या मुझे मेरे होटल तक छोड़ने आ जाते| ऐसा मेरे और राव साहब के बीच कई बार हो चूका है| कभी जब मैं उनसे मिलने अहमदाबाद जाता था, तो वे घर से अदालच तक मुझे छोड़ने आते थे और अंत में मेरे साथ ही मेहसाना चले आते थे| एक बार तो स्कूटी से वे हमें योग युनिवर्सिटी तक छोड़ने आए, फिर जब हम निकलने लगे तो हमारे जरा सी इसरार पर, युनिवर्सिटी के बाहर स्कूटी खड़ी करके, वे हमारे साथ अहमदाबाद से 70 किलोमीटर दूर मेहसाना आ गए|
कृष्णमोहन जी के घर से निकलकर होटल के लिए ऑटो में बैठने के बाद, पूरे रास्ते यही सोचता रहा कि आखिर मैं मिलने किससे गया था? कृष्णमोहन जी या उनकी टीवी से? या फिर उनके बेटे सुमन से? नहीं मैं मिलने नहीं गया था, मैं भाभी जी के हाथ का खाना खाने और सुमन की पोएट्री सुनने गया था| ना..ह.. मैं ये देखने गया था कि कृष्णमोहन जी का घर कितना बड़ा है, और वे दो घंटे में कितनी बार फोन पर बात करते हैं| .....नहीं ऐसा भी नहीं है....., दी फैक्ट इज़ जहाँ मैं गया था वहां न तो कोई घर था, न ही कोई आदमी| वह एक शमशान था, जहाँ कुछ मुर्दे रह रहते हैं...., मैं उन्ही मुर्दों से मिलने गया था| हाँ यह ठीक है, मैं मुर्दों से मिलने गया था.... | ट्रिंग...ट्रिंग...ट्रिंग....मेरे फोन की घंटी बजी (ऑटो में बैठने से पहले मैंने मोबाइल को साइलेंट मोड़ से ‘रिंग’ मोड’ पर डाल दिया था), मैंने बैग से फ़ोन निकला, ‘कृष्णमोहन जी कॉलिंग.....’ मैंने फोन उठाया... “इक्क्यु जी, आप अपने साथ जो किताब लेकर आए थे..क्या नाम लिखा है इस पर ‘इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस, यहीं छुट गई है”, उधर से आवाज़ आई| ‘कृष्णमोहन जी, छूटी नहीं है, मैंने जानबूझकर छोड़ दी है आपके लिए, मोबाइल और टीवी से अगर कभी फुर्सत मिले तो इस किताब को एक बार पढ़ लीजिएगा| शायद इस किताब को पढ़ने के बाद आप मशीन से थोड़े मनुष्य बन जाएँ|’, इतना कहकर मैंने फोन काट दिया और उनका नम्बर ब्लाक कर दिया| और कृष्णमोहन जी को अपने दिमाग से हमेशा के लिए इरेज़ कर दिया|
दस महीने बाद....
कल शाम जब मैंने अपने फेसबुक पेज पर सितम्बर में होने वाले मनाली कैंप (प्रक्टिसिंग अवेअरनेस इन डेली लाइफ, 31st Aug to 4 Sep, 2019.) के बारे में डाला, तो उसके दो घंटे बाद मनाली वाले स्वामीजी का मुझे फोन आया, “स्वामी आज हम ने पोस्ट डाला और आज ही एक बुकिंग कन्फर्म हो गई|” उनकी आवाज़ से लगा वे काफी खुश हैं| ‘कहाँ से बुकिंग हुई है’, मैंने उनसे पूछा| “बोधगया के कोई हैं, अपना नाम उन्होंने ‘कृष्णमोहन ओझा’ लिखवाया है, कहते हैं वो आपको जानते हैं| आप जानते हैं क्या उनको?”, फिर उस तरफ से मनाली वाले स्वमी जी की आवाज़ आई| कृष्णमोहन...! मैं एकदम से चौंक गया| ‘हाँ, मैं उन्हें जानता हूँ’, खोई हुई आवाज़ में मैंने उनसे कहा| फोन रखने के बाद बड़ी देर तक मैं सोच-विचार में खोया रहा| यह चमत्कार कैसे हुआ, ‘कृष्णमोहन ओझा कैंप करने मनाली आ रहा है’....!!!! मुझे यह बात पच नहीं रही थी| रात सोने से पहले मैंने अपने फोन का कांटेक्ट लिस्ट खोला और कृष्णमोहन के नंबर को कल दस महीने बाद अनब्लॉक किया|
आज सुबह चार में से तीन आर्य कर्मों को निपटने के बाद 10 बजे जब फोन ऑन किया तो पता नहीं मुझे क्या सूझा मैंने कृष्णमोहन के व्हात्सप्प पर एक मेसेज भेजा, मनुष्यों की दुनिया में आपका स्वागत है, कृष्णमोहन जी|’ बीस मिनट बाद उधर से उनका रिप्लाई आया, “प्रणाम स्वामी जी, आप तो हमें भूल ही गए... अच्छा हुआ कि कल मैंने आपके कैंप का पोस्टर देख लिया, वर्ना इस शनिवार को ‘टी टॉक’ पर आपसे मिलने मैं दिल्ली आने वाला था| उस दिन उस किताब को मेरे यहाँ छोड़कर आपने मेरे उपर बड़ा उपकार किया, उसको पढ़ने के बाद से मेरी ज़िन्दगी बदल गई है| अब मैं टीवी नहीं देखता हूँ| मोबाइल का इस्तेमाल भी बहुत कम कर दिया है| सिर्फ सुबह 10 बजे से लेकर शाम के 6 बजे तक ऑफिस टाइम में मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल करता हूँ|  ऑफिस में जब भी टाइम मिलता है www.ikkyutalk.blogspot.com पर आपका ब्लॉग पढ़ता रहता हूँ| आपकी बताई हुई सारी किताबें मंगाकर पढ़ चुका हूँ| जीवन में सब कुछ बड़ी तेजी से बदल रहा है| बहुत दिनों से आपसे मिलकर आपका शुक्रिया अदा करना चाह रहा था| कल कैंप का पोस्टर देखा तो सोचा चलो इससे अच्छा मिलने का मौका और कुछ नहीं हो सकता है|” इस मेसेज के बाद उन्होंने चार-पांच और मेसेज किये| अलग-अलग तरह से वे अपना आभार प्रगट करने की कोशिश कर रहे थे| अंतिम मेसेज था , I can’t express it in words, I just want see you asap.”
जीवन बहुत है अजीब और अनूठा है| कौन-सी बात कब किस को छू जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है| उस दिन मैंने किताब जानबूझकर नहीं छोड़ा था| मुझे किताब लेने न जाना पड़े या फिर उनको किताब देने न आना पड़े इस वजह से मैंने उन्हें ऐसा बोल दिया था| या फिर शायद मैं उनसे दूबारा नहीं मिलना चाह रहा था| बाद में बहुत दिनों तक मुझे ख़िताब खोने का अफ़सोस रहा था| कल रात से ही चमत्कृत और हतप्रभ हूँ| ऐसा भी होता है क्या?
अगर आपके जीवन में कभी कोई ऐसा चमत्कार घटा हो तो नीचे कमेंट में जरूर शेयर कीजिए, या फिर आप अपनी कहानी मुझे ikkyutzu@gmail.com पर मेल कर सकते हैं| अगर आपकी कहानी मुझे अच्छी लगी तो उसे अपने ब्लॉग और फेसबुक पेज पर शेयर करूँगा|



PRACTICING AWARENESS IN DAILY LIFE 

(OSHO MEDITATION CAMP)

From 31st August to 4th September.

Facilitated by Swami Dhyan Viram (Ikkyu Tzu)

Place- In Manali, Osho Neo Vipassana Meditation Center 

Limited seats. Advance booking only. 

For booking call at +91 8839996078

”You have more time than any age, and you are not exhausted because of the world. You are exhausted because you have lost the inner contact- because you do not know how to go deeper in your self and be revitalized.”- Osho

सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है

मित्र,
मानसिक हानि जैसी कोई चीज नहीं होती है| शरीर बच गया तो समझिये सब बच गया| शरीर और मन दो अलग-अलग चीज़े नहीं हैं| मन को ठीक करने की ज्यादा फिकिर मत लीजिए| मन जैसा भी, उसे वैसे ही स्वीकार कीजिए| ‘मन’ गंदे पानी जैसा है| गंदे पानी को जितना आप साफ़ करने की कोशिश कीजिएगा, वह उतना ही गंदा हो जाएगा है| कोशिश करने की वजह से ही गन्दा हो जाएगा| बस उदासीन होकर ‘विचारों’ को देखिए, करना कुछ भी नहीं है| ‘मन’ यानि भीतर चलने वाला विचार| आप कहते हैं, "ख़ुद को बदलना है, मन को ठीक करना है, मुझे अच्छा आदमी बनना है, बहुत हानि हो गई है", यह सब भी तो विचार ही है, की नहीं है? जो मन को बदलना चाहता है, वह भी मन ही है| चेतना सदा द्रष्टा है, साक्षी है| ‘उस’ साक्षी तत्व के प्रति जागिये| मन के प्रति उदासीन होइए| बस यह जानते रहिए कि मेरे भीतर अभी इस तरह के विचार चल रहे हैं| विचार का संबंध हमेशा भूत और भविष्य से होता| और शरीर सदा वर्तमान में होता है| इसीलिए जैसे ही आप शरीर के प्रति बोध से भरेंगे, विचार कम होने लगेंगे| ‘इनर बॉडी ध्यान’ की भी यही उपयोगिता है| शरीर का एंकर की तरह इसेमल कीजिए| जैसे एंकर जहाज को किनारे से बाँध कर रखता है, वैसे ही शरीर का बोध आपको वर्तमान से बाँध कर रखेगा|
अपने सुनने की क्षमता को विकसित कीजिए| कभी, आप जहाँ भी बैठे हों, उसके आसपास जितनी भी आवाज़े हो उसको सुनिये| सुनना बहुत ही अद्भुत चीज है, क्योंकि सुनना और सोचना एक साथ नहीं हो सकता है| इसी तरह कान के साथ साथ आपनी बांकी इन्द्रियों के प्रति भी होश को साधिये| शरीर जितना शुद्ध होगा, मन उतना ही पारदर्शी हो जाएगा| इसीलिए मैंने आपसे योग़ और प्राणायाम करने को कहा| किसी अच्छे योगी से अगर आप योग सीखते हैं, तो वह आपको हर क्रिया को होशपूर्वक करने और सांस के प्रति जागरूक रहना सिखाएगा|
पोर्न से मुक्त हो कर आपने ख़ुद को नया जन्म दिया है| पूरी दुनिया में लाखो लोग हैं, जो अपनी इस आदत की वजह से सड़ रहे हैं| शारीरिक का सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है| क्योंकि ‘मन’ ही रोग है|
आप, अब, अपने बारे में ज्यादा चिंता मत लीजिए| आप इस नर्क से निकल चुके हैं| अब अपना अनुभव लोगों के साथ शेयर करके, उनको इस नर्क से निकालने की कोशिश में लगिए| आपने दोस्तों, परिचितों को पोर्न देखने के ख़तरनाक परिणाम के बारे में बताइए| जो बोध और ज्ञान आपको मिला है, उसे दूसरों से बांटिये...
जो प्राणायाम आप कर रहे हैं, वो पर्याप्त है| उसको जारी रखिये| बस यह सब गंभीर हो कर मत कीजिए, हल्के होइए| दिन में कुछ समय अगर संभव हो तो, छोटे बच्चों के साथ बिताइये| उनके साथ खेलिए...इससे आपकी गंभीरता थोड़ी कम होगी..


योग के मामले में बाबा रामदेव सही हैं| लेकिन चूँकि आप उनकी विडियो देख कर करते हैं, इसीलिए आप ग़लत कर रहे हैं, या सही, इसका पता लगाना मुशिकल है| अगर समय हो तो किसी प्रतिष्ठित योग-स्कूल से कुछ दिन का कोर्स कर लीजिये| संदीप महेश्वरी के संबध में मेरे विचार कुछ ज्यदा अच्छे नहीं हैं| इसलिए उनकी विधि के बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं दूंगा|
सुनने की क्षमता विकसित करने से मेरा मतलब था, आवाज़ के प्रति जागरूक होना| निरंतर आ रही आवाज़ को धीरे-धीरे हम भूल जाते हैं, जैसे जब आप फैन on करते हैं, तो आपको फैन की आवाज़ सुनाई देती है, लेकिन थोड़े समय बाद आप उसे भूल जाते हैं| इसी तरह ‘शब्द’ को हम सुनते हैं, लेकिन दो शब्दों के बीच जो अन्तराल होता है, उसे के प्रति हम जागरूक नहीं होते हैं, जबकि अंतराल उनता ही महत्वपूर्ण है, जितना कि ‘शब्द’| ओशो का एक 15 मिनट का ‘सुनना ध्यान’ है, शायद उसकी ऑडियो आपको यूटूब पर मिल जाए, अगर ना मिले तो मुझे बताइयेगा, मैं मेल कर दूंगा| उस प्रयोग को कभी-कभी कीजिए|
एक और प्रयोग है, जिसे आप लोगों से बात करते समय कर सकते हैं| बात-चीत के दौरान, दो वाक्यों के बीच जो गैप होता है, उसके प्रति जागरूक होइए, उसको भी नोटिस में लीजिए| जैसे-जैसे आप बाहर के गैप के प्रति जागेंगे, वैसे-वैसे ही आपके भीतर भी एक गैप बनने लगेगा| आमतौर पर हमारा मन ‘ऑफ बीट’ को नहीं सुनता है, जैसे यदि में टेबल पीटता हूँ, तो टेबल को पीटने से जो आवाज़ पैदा होगी, वो तो आप सुनेंगे, लेकिन दो ध्वनियों के बीच जो मौन अन्तराल होगा, वह आपके नोटिस में नहीं आएगा| और अगर मैं टेबल लगातार पीटता ही चला जाऊं, तो थोड़ी देर में आपको वो भी सुनाई नहीं देगा|

Monday, 15 July 2019

जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं..

(प्रश्न लम्बा और बहुत ही ज़्यादा व्यक्तिगत था, इसीलिए प्रश्न छोड़कर उत्तर का कुछ अंश आपके साथ share कर रहा हूँ।)
इक्क्यू-अपनी ग़लती को स्वीकारना, इस जगत की बड़ी-से-बड़ी घटनाओं में से एक| यह अघट सदियों में कभी एकाध बार घटता है| अपनी ग़लती स्वीकारना यानि बुद्धत्व की ओर कदम बढ़ाना| 'मेरे साथ जो भी हो रहा है, और जैसे भी हो रहा है, इसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ', यह बुद्धत्व से ठीक पहले की उद्घोष है... इस के बाद बस एक ही घोषणा रह जाती है, 'अहम् ब्रह्मास्मि'| बस बात खत्म हो गई..अपनी ग़लती को स्वीकारना ब्रह्म होने की तैयारी है...! आप अपने पिता की छोड़िये... क्या आप इस बात के लिए अभी तैयार हैं कि अपनी ग़लती को स्वीकार लें...? 'मेरे पिता मेरे साथ जैसा भी कर रहे हैं, उसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ, और-तो-और मेरे पिता जैसे भी हैं, इनके यहाँ जन्म लेने का निर्णय मेरा ही था, चाहे यह बात मुझे पता हो या न हो..', ऐसा कह पाएँगे आप? मिरदाद कहते हैं, "तुम्हारी नाक पर अगर एक मक्खी भी बैठती है, तो वह तुम्हारी मर्ज़ी से बैठती है| जैसे तुम को पता नहीं है कि तुम कैसे खाना पचाते हो, लेकिन तुम ही पचाते हो, तुमको मालूम नहीं कैसे तुम बाल बढ़ाते हो, लेकिन बढ़ाते हो, तुमको मालूम नहीं कि कैसे तुम लहू को नसों में दौड़ते हो, लेकिन तुम ही दौड़ते हो? इसी तरह बहुत कुछ है जो तुम अचेतन रूप से चाह लेते हो, जिसक तुम्हे कुछ पता ही नहीं| तुम्हारे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है, जो तुमने कभी चेतन और अचेतन रूप से नहीं चाहता हो...यह जगत तुम्हारी वासनाओं का विस्तार है|"... मिरदाद ठीक ही कहते हैं... यह जगत हमारी वासनाओं का विस्तार है.. इसे हमने अपनी मर्ज़ी से चुना है... दुःख हमारा चुनाव है, आपके पिता आपके चुनाव है... वह आपके साथ जैसा भी व्यवहार करते हैं, उस व्यवहार को स्वीकार करना या फिर अस्वीरकर करना आपका चुनाव है.. फिर वो गाली दे सकते हैं, गाली आपको लेनी है या नहीं लेनी है यह आपके निर्णय पर निर्भर करता है.. कोई भी इस जगत में आपको आपकी मर्ज़ी के बगैर सुखी या दुखी नहीं कर सकता है.. | 


अब प्रश्न यह उठता है कि अगर सब कुछ हमारा चुनाव ही है, और जो भी हमारे साथ हो रहा है उसको हमने अचेतन रूप से चुना है.. तब तो हम अचेतन रूप से कुछ भी चुन सकते हैं... हम आत्मघात चुन सकते हैं.. फिर इससे मुक्ति कैसे मिले? मुक्ति का मार्ग है..और वह है स्वीकार... जैसे ही आप जो है उसको स्वीकार कर लेते हैं, तो आपकी लड़ने में जो उर्जा खर्च हो रही थी, वह जागरण बनने लगता है... और धीरे-धीरे आप उन सब वासनाओं के प्रति जागने लगते हैं, जिन्हें अब तक आप अचेतन रूप से चाह रहे थे| इसीलिए साधक को जो भी है, उसे बिना किसी शिकायत के अहोभाव के साथ चुनाव करना चाहिए... अगर आपको देखकर कोई गाली देता है, तो सोचना चाहिए मैंने ही चाहा होगा.. दोस्तोवस्की तो यहाँ तक कहते थे कि दुनियां में अगर भी कुछ भी गड़बड़ हो रहा है, गलत हो रहा है, उस सब में आपकी जिम्मेवारी है| ऐसा होना भी चाहिए... हम सब में हैं, और सब हम में है... स्वामी राम कहते थे कि सूरज और चाँद को भी हम ही चला रहे हैं, सब हमारी मर्ज़ी से चल रहे हैं.... | 
जब तक हम अशांत हैं तब तक लोग हमें अशांत करते हैं, जिस दिन बुद्ध की भांति हम स्थिति-प्रज्ञ होकर अंगुलिमाल के सामने खड़े हो जाते हैं, उस दिन अंगुलिमाल ठिटक जाता है, और उसे हाथ से कटार गिर जाता है.. 
सुख और दुःख दोनों में अपने भीतर उस तत्व की तलाश कीजिए जो दोनों से विचलित नहीं होता है... अपने दुश्मन का चुनाव होश पूर्वक करना चाहिए.. क्योंकि जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं... अपने पिता में ज्यादा मत उलझिए अन्यथा अंत में आप उन्ही के जैसे हो जाएंगे...

Sunday, 14 July 2019

चीज़ों को ऐसे देखो मानो तुम उन्हें पहलीबार देख रहे हो


14-जुलाई 2019 
रात 11:30 की पठान कोट से दिल्ली की मेरी ट्रेन थी, ‘धौलाधार एक्सप्रेस”| धर्मकोट से धर्मशाला पहुँचने में 20-से-30 मिनट लगते है| हमारे पास दो विकल्प था| एक हम जिनके यहाँ रुके थे, उन्हीं की टैक्सी से धर्मशाला जाएँ, और दूसरा हम ऑटो से पहले मेक्लोड आ जाएँ, फिर वहां से बस या टैक्सी लेकर धर्मशाला चले जाएँ| दूसरा विकल्प पहले के अपेक्षा बहुत ही सस्ता था| अगर हम धर्मकोट से सीधा टैक्सी लेते हैं, तो उसका भाड़ा होता है 500/- और धर्मकोट से मेक्लोडल का ऑटो से 70 रुपया लगता है, फिर वहां से यदि आप बस से जाते हैं, तो 20 रुपया किराया है, और अगर टैक्सी लेते हैं तो उसका भाड़ा 250/- रुपया है| साफ़ है, हमने दूसरा विकल्प चुना था, लेकिन निकलने से ठीक 30 मिनट पहले हमने अपना इरादा बदला और जिनके यहाँ हम रुके थे उन्ही की टैक्सी में बैठकर बारह बजकर बीस मिनट पर हम धर्मकोट से निकल गए|

ऐन वक़्त पर निर्णय बदलने के पीछे तीन कारण था| एक सुबह से ही लगातार बारिश हो रही थी| बारिश में सामान लेकर ऑटो स्टेंड, जो कि बौद्ध ध्यान केंद्र ‘तुषिता’ के सामने है, तक पहुंचना कवायत हो जाता| दूसरा, शनिवार होने की वजह से ट्राफिक जाम में फसने के भी आसार थे| ऐसा भी हो सकता था कि हमें ऑटो मिलता ही नहीं, क्योंकि रोड जाम होने पर ऑटो को रोक दिया जाता है| धर्मशाला से 2:40 की हमारी बस थी, हमने हिमाचल परिवहन की वेबसाइट से एक दिन पहले ही टिकट बुक कर ली थी| इसीलिए समय से पहले हमें धर्मशाला पहुँच जाना था| तीसरा, 40 दिन तक प्रकाश भाई (बदला हुआ नाम) के यहाँ ठहरने के बाद, उनके टैक्सी से धर्मशाला न जाते हुए, थोड़ा अजीब लग रहा था| सो, ऑर्गेनिक थाली (यह रेस्तरां का नाम है) में नाश्ता करते हुए हमने तय किया की हम प्रकाश भाई की टैक्सी से ही धर्मशाला जाएँगे|
धर्मकोट से निकलने से पहले दिव्या को थोड़ी घबराहट हो रही थी, किसी भी जगह पर लम्बे समय तक ठहरने के बाद, उस जगह को छोड़ने से पहले उसे इस तरह की घबराहट पकड़ लेती है| वो कल कह रही थी, “पहले जब मैं जॉब करती थी, तब सुबह ऑफिस जाने से पहले भी मुझे ऐसी ही घबराहट पकड़ लेती थी, अब तो बहुत कम हो गया है| पहले मेरे पेट में तेज़ दर्द होने लगता था|” मुझे इस तरह की कोई घबराहट नहीं पकड़ती है, लेकिन मन थोड़ा बोझिल जरूर हो जाता है| ऐसे नाज़ुक वक़्त को मैं बहुत ही सजगता पूर्वक जागते हुए जीने की कोशिश करता हूँ| ओशो कहते हैं, “जब कोई तुम्हारा बहुत ही करीबी मित्र तुमसे दूर जा रहा हो, या फिर जब तुम किसी ऐसे जगह को छोड़कर जा रहे हो, जिस जगह से तुम्हे बहुत ही प्यार और लगाव है, तो स्वाभाविक है कि उस क्षण में तुम्हारे मन को अवसाद घेरेगा| तुम दुखी होओगे कि क्या पता अब कभी दुबारा मिलना (या लौट कर आना) हो भी या नहीं| उस क्षण को गंवाना मत, वह क्षण मृत्यु का क्षण है, कुछ है जो छूट रहा है, जो ज्ञात है उससे तुम दूर जा रहे है, यही तो मृत्यु में होगा| ज्ञात छूटेगा और तुम अज्ञात में प्रवेश करोगे| इन क्षणों में जागो| इन्ही छोटे-छोटे क्षणों में जागते-जागते तुम एक दिन मृत्यु के लिए तैयार हो पाओगे|” तो, ऐसे क्षण मेरे लिए साधना के क्षण होते हैं| पीछे जब मास्टर उगवे और राव साहब जा रहे थे, तब भी ऐसा शुभ क्षण आया था| ऐसे क्षण रोज़ ही हमारे जीवन में आते रहते हैं| जब भी नोन को छोड़ कर अनोन में जाना होता है, मन कंपता है| मन हमेशा ‘अज्ञात’ व नए से घबराता है| इसी घबराहट की वजह से बहुत से लोग, कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल घुमते हुए जीवन को घसीटते रहते हैं| विज्ञान भैरव तंत्र में शिव का एक ऐसा ही सूत्र है, वह सूत्र भी मुझे बहुत पसंद हैं| शिव कहते हैं, On joyously seeing a long absent friend permeate this joy”. पहला सूत्र अगर मृत्यु का अभ्यास है, तो यह सूत्र जीवन का अभ्यास है|

रास्ते में सिर्फ एक जगह, मेक्लोड से थोड़ा पहले, हमें ट्राफिक जाम का सामना करना पड़ा| गाड़ी में, मैं आगे की सीट पर प्रकाश भाई (गुजरात में रहने की वजह से नाम के पीछे ‘भाई’ लगाने की आदत पड़ गई है) के बगल में बैठा था, और दिव्या पीछे सामान के साथ बैठी थी| ‘हमारा 20 तक रुकने का प्लान था, लेकिन परसों इंडक्शन ख़राब हो गया, इसीलिए हम आज ही निकल रहे हैं’, मैंने प्रकाश जी से कहा| “अरे.. आपने मुझे क्यों नहीं बताया,” प्रकाश जी हमसे कहने लगे, “मैं आपको गैस दे देता, या फिर आप हमारे किचन में खाना बना लेते”, बोलते हुए उन्होंने आगे वाली गाड़ी को रास्ते देने के लिए अपनी गाड़ी को पीछे लिया| एकबार को मुझे लगा कहीं ये हमें घर वापिस तो नहीं ले जा रहे हैं| मैंने गर्दन घूमा कर पीछे दिव्या को देखा, वो आँखे बड़ी करके मुझे देख रही थी, मानो कह रही हो, “मैंने तुम्हे पहले ही कहा था, एक बार बात करके देख लो, क्या पता कुछ जुगाड़ हो जाए|” मैंने झट से गर्दन सीधी कर ली| ‘मैंने पहले ही कहा था’ दिव्या का पसंदीदा तकियाकलाम है| लालबुझकर की तरह इसको पहले से ही सब पता होता है| हालाँकि, जब भी कोई निर्णय लेने की बात होती है, तो इसका जुमला होता है, “तुम देख लो, जैसा ठीक लगे”|

हम 12:45 पर, बस की समय से करीब दो घंटा पहले, धर्मशाला पहुँच गए| घर से जल्दी निकलने का हमारा निर्णय गलत साबित हुआ| और टैक्सी से आने का निर्णय तो और अभी ज्यादा| जब हम धर्मकोट से निकल रहे थे, तब बारिश भी थम गई थी| और जब हम टैक्सी से तुषिता के पास से गुजर रहे थे, तब हमने एक लाइन से 6 ऑटो को एक साथ खड़ा देखा| खैर, अब कुछ भी नहीं किया जा सकता था| कोई भी निर्णय लेने से पहले कोई यह कैसे तय करे कि वह जो निर्णय ले रहा है वही सही ही होगा, There is no means of testing which decision is better; because there is no basis for comparison. We live everything as it comes, without warning, like an actor going on cold. And, what can life be worth if the first rehearsal for life is life itself?”  पिछे लौटकर, दिव्या की तरह, सही गलत का फैसला करना बहुत आसान है| लेकिन, जीवन में सही और गलत दोनों ही संयोग की बात है| और बहुत गहरा देखा जाए तो, जीवन में न तो कुछ सही होता है, न ही गलत| क्योंकि दोनों के लिए जो आधार चाहिए वह है ‘शुरूआत और अंत’| और जीवन में से यही दोनों चीज़ गायब है| किसी उपन्यास के बीच के 100 पेज पढ़कर आप किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँच सकते हैं| निर्णय लेने के लिए शुरुआत और अंत जानना अपरिहार्य है| जीवन घटनाओं का अनंत प्रवाह, और सब कुछ एक दूसरे पर पारस्परिकरूप से निर्भर है, लाओत्से कहा करते थे, 'जब तुम यहाँ एक पत्ता तोड़ते हो, तो उसकी झानाहट को वो जो दूर आकाश में तारे तुम्हे दिख रहे हैं, वे भी महसूस करते हैं|, ऐसे में किसी भी निर्णय पर पहुंचना असंभव है| इसीलिए, जिन्हें पूरे सत्य का पता होता है, वे कभी निर्णय नहीं देते हैं|

धर्मशाला से पठानकोट पहुँचने में करीब तीन घंटा लगता है| और हमारी ट्रेन 11:30 की थी, इसलिए हमने सोचा था की पांच बजे के करीब हम धर्मकोट से निकलेंगे, और फिर 6 के आसपास धर्मशाला से बस लेकर पठानकोट जाएँगे| लेकिन परसों सुबह जब मैंने हिमाचल परिवहन का वेबसाइट चेक किया तो पाया कि दो बजकर चालीस मिनट पर धर्मशाला से पठानकोट की आखरी बस है| इसका मतलब अगर हम धर्मकोट से शाम को निकलने की सोचते, तो हमें सीधा धर्मकोट से पठानकोट की टैक्सी करना पड़ता, जिसका भाड़ा करीब 45,00 होता| यह ऐसा ही होता जैसा हमारे यहाँ कहते हैं, “जतेक के बोहु’अ नै, तते के लहठी” (जितने की पत्नी नहीं उससे ज्यादा का उसका गहना)| इसलिए अब दो घंटे धर्मशाला में, और करीब 6 पठानकोट में बैठकर इंतज़ार करने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था|
प्रकाश जी के टैक्सी से उतरने के बाद हम बस स्टैंड से थोड़ी दूर रास्ते के किनारे बने लोहे के बैंच पर बैठने चले गए| बैठने से पहले हमने सुनिश्चित किया कि आसपास बारिश से बचने की कोई जगह है भी या नहीं| पास ही रोड के उस तरफ हमें एक घर दिख गया| तेज़ बारिश में हम वहां भाग कर जा सकते थे| लोहे के दो बैंच बने हुए थे, एक टूटा हुआ था और दूसरा थोड़ा दुरुस्त| टूटा हुआ बैंच काफी पुराना हो चला था| लोहे पर जंग लगना शुरू हो गया था| आधा से ज्यादा बैंच जंगली लताओं से घिरा हुआ था| दूसरा बैंच हरे रंग से पुता हुआ था और पहले की तुलना में काफी अच्छी हालत में था| टूटे हुए बैंच पर हमने अपना सामान रख दिया| और हरे रंग वाले बैंच को पेपर से पोछकर उस पर बैठ गए| सामने हिमालय का उतुंग शिखर दिख रहा था| जाने से पहले मैं अपनी आँखों को हिमालय की अलौकिक सौन्दर्य से भर लेना चाहता था| संयोग ऐसा था कि ठीक दस दिन पहले मैं इसी बैंच पर राव साहब के साथ बैठा हुआ था| उनकी बस सुबह 7:50 की थी, मैं उन्हें छोड़ने आया था| उस दिन हम एक घंटा पहले पहुँच गए थे| यहीं बैठकर हमने अपने तीन महीने के तवील सफ़र का आखरी घंटा बिताया था| समय बीतते देर नहीं लगती है, “दिवस जात नहिं लागिहि बारा”|

छः बजकर दस मिनट पर हम पठानकोट पहुंचे| जब हम बस स्टेंड में घुस ही रहे थे, तभी हमें दाहिनी ओर ‘कार्निवल’ सिनेमा दिख गया| बस से उतरते ही हम सीधा सिनेमा हॉल पर पहुँच गए| दिव्या ने पहले से सिनेमा देखने के मन बना रखा था| अक्टूबर टूर के दौरान जब मैंने सोशल मिडिया से दूरी बनाई थी, तब से मैंने सिनेमा देखना भी बंद कर दिया था| इस बीच सिर्फ दिल्ली में ही गोविन्द के साथ ‘गल्ली बॉय’ देखा था| उसके बाद धर्मकोट छोड़ने से पहले एक शाम हमने ‘दिल तो बच्च्चा है जी, और आखरी शाम ‘चश्मे बद्दूर’ (पुराना वाला) लैपटॉप पर देखा था| माफ कीजिए कुछ दिन पहले तुषिता के प्रभाव में आकर दलाई लामा की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘कुनदून’ भी देखी थी| 6:50 पर ‘सुपर 30’ शुरू होने वाला था|
टिकट बुक करने से पहले मैंने सामान का कन्फर्म कर लिया था, आपका लैपटॉप ऑफिस में जमा हो जाएगा, और बांकी सामान गार्ड अपने पास रख लेगा| पैसा और कार्ड आप अपने साथ अन्दर ले जा सकते हैं” मैंने दो टिकट कटाया और फिर सामान गार्ड को सुपुर्द करके खाने के लिए कुछ ढूंढने बाहर निकल गया| सुबह जो ऑर्गनिक थाली पर हमने नाश्ता किया था, उसके बाद अभी तक हमने कुछ नहीं खाया था| बाहर कुछ ही दूरी पर हमें एक जूस वाला दिख गया|
फिल्म अच्छी थी, लेकिन ऋतिक की एक्टिंग से मैं प्रभावित नहीं हुआ| डायरेक्शन भी मुझे थोड़ी कमज़ोर लगी| इतनी अच्छी कहानी थी, क्या कुछ नहीं किया जा सकता था, लेकिन ख़राब डायरेक्शन, पुअर स्क्रिप्ट और ऋतिक की कमज़ोर एक्टिंग की वजह से सब गोबर हो गया| खैर, सेकंड हाफ में फिल्म थोड़ी ग्रीपिंग है| हॉल से निकलने के बाद हम रेलवे स्टेशन का पता करने लगे, अभी घड़ी में 9:20 बज रहा था| हालाँकि टिकट बाबु ने हमें बताया था कि स्टेशन पास ही है, पैदल जाया सकता है| लेकिन फिर भी किधर है, और कैसे जाना है, यह हमें नहीं पता था| मैं एक दूकानदार से स्टेशन का पूछ ही रहा था कि एक ऑटो वाला आ गया, और कहने लगा, “बैठीये 20 रूपये में हम छोड़ देंगे”| हमने सोचा पता नहीं कितना चलना पड़े, सामान भी कम नहीं है, बैठ ही जाते हैं| हमारे ऑटो में बैठने के 20 सेकेण्ड बाद ही ऑटो वाला एक जगह गाडी रोक कर बोला, ‘वो रहा स्टेशन’| ऐसा हादसा हमारे साथ एक दो बार और घट चुका है|
स्टेशन पहुँचने के थोड़ी देर बाद, मैंने खाना दूंढने के लिए निकला| पठान कोट बहुत ही छोटा स्टेशन है| पुरे स्टेशन पर सिर्फ चार दूकाने हैं, एक सरकारी भोजनालय, जिसमे छोले भटूरे के अलावा और कुछ भी नहीं मिलता है, एक किताब घर, एक अमूल पारलर, और एक छोटा शॉप जिसमे पैकेट बंद चीज़ें मिलती है| मैं सकारी दूकान से हल्दीराम का एक चिप्स लेकर आया, दिव्या ने खाने से इंकार कर दिया| थोड़ी देर बाद मैं स्टेशन से बाहर खाना ढूँढने निकला| रोड किनारे दो ढाबा दिखा, भीड़ काफी थी उनके यहाँ, लेकिन रोटी की शक्ल देखकर ही लगा की यहाँ सही खाना नहीं मिलेगा| थोड़ा आगे बढ़ने पर मुझे एक और ढाबा दिखा, लेकिन वहां की हालत भी मुझे ठीक नहीं लगी| थोड़ा और आगे बढ़ने पर मैंने एक दवाई दूकानदार से पूछा, ‘यहाँ आस-पास सही खाना कहाँ मिल जाएगा|’ “थोड़ा और आगे जाइए बाएँ में ‘खालसा हिन्दू ढाबा’ है, वहां आपको सही खाना मिल जाएगा, हम भी वही से खाते है”, हाथ से आगे की ओर इशारा करते हुए दुकानदार ने मुझसे कहा| 100 कदम चलने के बाद ढाबा आ गया| काफ़ी बड़ा ढाबा था| गेट पर दो गार्ड खड़े थे| अन्दर पंहुचा तो काउंटर पर दो सरदार जी खड़े हैं| हॉल में कोई 25 स्थानिए निवासी बैठकर खा रहे थे| मैंने अपना आर्डर दिया और वही पास लगे चेयर पर बैठकर इंतजार करने लगा| 20 मिनट बाद मेरा खाना तैयार होकर आया| भुगतान करने के बाद, मैं तेजी से स्टेशन की और भागा| 11 बजने में अभी कुछ मिनट बांकी थे|
जब मैं स्टेशन पर पहुंचा तो देखा, दिव्या बेसब्री से खाने का इंतजार कर रही थी| वह गर्दन टेढ़ी करके बार-बार जिस गेट से मैं खाना लाने गया था, उस गेट की ओर देख रही थी| मैं दूसरी गेट से वापिस आया था, इसीलिए उसे पीछे से देख सकता था| उसके पास पहुँच कर मैंने पीछे से उसके सिर को हल्के से छुआ| वह चौंकते हुए पीछे मुड़ी और मेरे हाथ में खाने की थैली देखकर अकाल के कव्वे की तरह खुश हो गई| खाने को लेकर जैसी दीवानगी मैं इसमें और मास्टर उगवे में देखता हूँ, वैसी मैंने आज तक किसी में नहीं देखी है| सुबह का नाश्ता करते समय ही मास्टर उगवे रात के खाने में क्या खाना यह तय करने बैठ जाते थे| उनके खाऊँपन से हम इतने परेशान हो गए थे, जब वे हमारे पास से गए, तो उनकी जाने की ख़ुशी में हमने एक दिन का उपवास रखा था| खाने के मामले में मेरे मरहूम मित्र धर्मेद्र स्वामी बहुत अच्छे थे| हालाँकि मरने से कुछ दिन पहले खाने को लेकर उनका रवैया भी थोड़ा बदल गया था| जैसे मास्टर उगवे खाने के दीवाने हैं, वैसे ही धर्मेद्र स्वामी न खाने के दीवाने हो गए थे| कुछ लोग उनकी इसी दीवानगी को उनके मौत का जिम्मेवार मानते हैं| हालाँकि  मैं इस आम-राय से जरा भी इत्तेफाक नहीं रखता हूँ| मैं आज भी मानता हूँ कि उनकी मौत बंदगी करते वक़्त हुई थी| भक्त आदमी थे, भाव में आकर जान दे दिये| खाने के मामले में राव साहब का मामला थोड़ा ठीक है, लेकिन नमकीन और भजिये के प्रति उनकी दीवानगी अनूठी है| खाने को लेकर मेरा मामला भी गड़बड़ ही है| मीठा मेरी कमज़ोरी है| और अगर घर में मेरे पसंद की कोई चीज़ रखी हो, तो जबतक वह खत्म न हो जाए, मुझे चैन नहीं पड़ता है|
खाना खाने के बाद हम लोग ट्रेन में आकर बैठ गए| अभी ट्रेन खुलने में 15 मिनट का समय था| खाना खाने के बाद दिव्या का अमूल से आइस-क्रीम खाने का मन था, मैंने मना कर दिया| इसीलिए वह मुंह बनाकर बैठी थी| लेकिन मुझे मलाल नहीं था| ऐसी जिद को मैं नहीं समझ पाता हूँ, “मैं तभी खाऊँगी जब तुम भी खाओगे”| (इस जुमले का असली अर्थ यह है- क्योंकि अगर तुम नहीं खाओगे तो तुम मुझे सुनाओगे, तो इससे अच्छा है कि मैं नहीं खाती हूँ, और अगले तीन महीने तक तुम्हे सुनाती रहूंगी)| मैं अपने बैग से टॉलस्टॉय की ‘War and Peace’ निकालकर पढ़ने लगा|
जब भी सुबह साढ़े पांच के आसपास मेरी आँख खुलती है, और ऐसा करीब-करीब रोज़ होता है, तो मुझे आश्रम की याद आ जाती है| सुबह सक्रीय ध्यान की म्यूजिक चलाने के लिए मुझे रोज़ 5:30 पर उठाना पड़ता था| वह आदत आज भी कायम है| जब गावं में था, तब भी इतने बजे ही उठ जाया करता था| दरभंगा, दिल्ली और मुंबई के निवास के दौरान सोने और जागने के समय में काफी हेर-फेर हो गया था| मुंबई में रात के 3-4 बजे सोता था, और दिन के 1 बजे उठता था| बहुत बेकार हो गया था सब कुछ| जैसे ही मेरी आँख खुली मैंने सामान चेक किया| सब कुछ अपनी जगह पर मौजूद था| सिर्फ एक-दो लोग जागे थे, और बांकी सब सो रहे थे| मैंने अपना फ़ोन ऑन किया, वैसे इन दिनों मैं 10 बजे से पहले फोन ऑन नहीं करता हूँ, चूँकि कल यात्रा में था इसलिए ख़ुद को थोड़ी रियात दे दी| अन्यथा, आजकल मैं 4 आर्य कर्मों का पालन कर रहा हूँ| जबतक मेरे सुबह के तीन आर्य कर्म पूरे नहीं हो जाते हैं मैं फोन या लैपटॉप ऑन नहीं करता हूँ| (वो 4 आर्य कर्म क्या हैं, इसका जिक्र किसी दुसरे लेख में तफसील से करूँगा)| मोबाइल ऑन होने पर पता चला सुबह के 5:40 बज रहे थे| मैंने अपनी सीट से उतर कर नीचे आ गया और खिड़की के बहार का नज़ारा देखने लगा| पंजाब की सुबह बहुत ही हसीन थी| एक सरदार जी को पिली पगड़ी बाँध कर धान के खेत में टहलते देखकर बहुत कुछ याद आ गया|
दस बज कर बीस मिनट पर ट्रेन सराय रोहिल्ला पहुंची| स्टेशन से बाहर निकल कर हमने ओला बुक किया| और 11:15 पर हम अपने निवास स्थान पर पहुँच गए| इस बार मैंने पहाड़ पर ही तय कर लिया था कि दिल्ली को ऐसे देखूंगा जैसे ज़ोरबा दुनिया को देखता था, “लोगों और चीज़ों को ऐसे देखो मानो तुम उन्हें पहलीबार देख रहे हो” (नोट-विज्ञान भैरव तंत्र के एक सूत्र में शिव पार्वती से ऐसे ही जगत को देखते के लिए कहते हैं- See as if for the first time A beauteous person Or an ordinary object.”) रास्ते में सबकुछ नया-नया दिख रहा था| दिल्ली इससे ज्यादा खूबसूरत कभी नहीं दिखी थी| पूरे रास्ते को मैंने अलग ही ढंग से एन्जॉय किया| अपने निवास स्थान पर पंहुचा तो दो नए मेहमान, एक मिलान कुण्डेरा की ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ और दूसरी गाबरीयल गर्सीया मारकेस की ‘वन हण्ड्रेड यर्स ऑफ़ सॉलीत्युड’ बेड पर बंद पैकेट में मेरा इंतजार कर रहे थे| अभी 5 दिन पहले ही अमेज़न से मैंने इन्हें मंगाया था| पहाड़ पर मंगा नहीं सकता था, इसीलिए अपने अगले ठिकाने पर इन्हें मंगा लिया था| आते ही सबसे पहले मैंने रवायत के हिसाब से किताबों को पैकेट से निकाला और उन पर साइन किया|
खाना खाने के बाद थोड़ी देर सोया, फिर दोनों किताब को अलट-पलट कर देखने लगा| ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ की पहली ही लाइन पढ़कर मैं आगे पढ़ने से ख़ुद को रोक नहीं पाया| हालाँकि मैं ऐसा नहीं करना चाहता था| धर्मकोट पहुँचते ही ‘वार एंड पीस’ शुरू किया था| लेकिन दो दिन बाद तुषिता की लाइब्रेरी में ‘तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाईंग’ दिख गई| उसको समाप्त किया फिर रमण महर्षि ‘बी एज़ यू आर’ पढ़ने लगा| अब सोचा था कि जबतक इस 1400 पेज की ग्रन्थ को समाप्त न कर लूं, दूसरी कोई किताब बीच में शुरू नहीं करूँगा| लेकिन आज फिर फिसल गया| ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ की अभी तक 50 पेज पढ़ी है, आई लव दिस बुक, अब इसको समाप्त किए बगैर नहीं रह सकता हूँ| ऊपर जो आपके साथ अंग्रेजी में एक कोट शेयर किया है, वह इसी किताब से है (There is no means of testing which decision is better; because there is no basis for comparison. We live everything...)| चालीस दिन पहाड़ पर बिताने के बाद मैं सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकता था कि दिल्ली में मेरा पहला दिन इतना अच्छा बीतेगा| इससे पहले जब भी दिल्ली आता था दिन आपाधापी में ही बीत जाता था|


ख़त- #3 राव साहब की शाश्वत बीमारी का सनातन इलाज

प्रिय आत्मन, 
[28 June, 2019]
कल राव साहब ने एक नई बात बताईज़ुकाम की वजह से मेरा पेट ख़राब हो गया है।  क्या ग़ज़ब की बात कही! कल से ही इस बात को सोच-सोच कर मैं सिर और दाढ़ी खुजा रहा हूँ।( मुझे इस तरह से सिर खुजाता देखदिव्या को लग रहा है कि शायद मैं डैन्ड्रफ की वजह से इतना सिर खुजा रहा हूँ। वह सुबह से मुझे चार बार डैन्ड्रफ का इलाज बता चुकी है। अब उसको क्या बताऊँ कि खुजली के इस भयंकर उत्पात का कारण डैन्ड्रफ नहीं हैयह दिमाग़ी चक्कर का असर है। ख़ैरजो चीज़ जिसके पास नहीं होउस चीज के बारे उससे बात करना मैं ठीक नहीं समझता हूँ)
पेट ख़राब का ज़ुकाम से मुझे कोई भी संबंध नहीं दिख रहा है। उनका कहना है कि,”जिस बेक्टीरिया की वजह से मुझे ज़ुकाम हुआ हैलूज़ मोशन के ज़रिए शरीर उसे बाहर फ़ेक रहा है। यह मैं पहली बार सुन रहा हूँ। उनका ज़ुकाम भी मुझे समझ नहीं आता हैन तो नाक से पानी बह रहा हैन ही तीन दिन में एक बार भी उन्होंने छींका है। इतनी ठंड में लूज़ मोशन का होना भी मुझे बड़ा असंभव-सा लगता है। इस मामले में राव साहब मुझे कोई बहुत बड़े कलाकार मालूम पड़ रहे है।
कल सुबह पानी भरते समय कहने लगेइस वीराने अब मेरा मन नहीं लग रहा हैलगता है मुझे बुख़ार हो गया है।” मैं सुनकर बड़ा हैरान हुआ। सुबह-सुबह राव साहब क्या अलबल बोल रहे हैं। मन नहीं लगने का बुख़ार से क्या संबंध है। और धर्मकोट वीरान कब से हो गया।  मुझे कुछ शक हुआ मैंने कहालाइए अपना हाथ दिखाइएदेखूँ बुख़ार है भी या आप यूँ ही माहौल बना रहे हैं। कहने लगेबुख़ार हाथ से नहीं माथा छूकर देखा जाता है। मैंने कहाठीक है माथा ही छू लेते हैं।  मैंने माथा छूकर देखाकोई बुख़ार नहीं था। कहने लगेआपको बुख़ार देखना आता ही नहीं है।  मैंने कहाबच्चूमेरे पास आपकी इस मनरोग का भी इलाज है। मैं झट अपने कमरे से थरमामीटर निकाल लाया। बुख़ार जाँचकर देखा 97.7 निकला। उनका चेहरा उतर गया। मुझे भांति-भांति का (कु)तर्क देकर यह समझाने की कोशिश करने लगे कि बुख़ार न होने के बावजूद भी उन्हें बुख़ार जैसा क्यों लग रहा है। मैंने उनसे कहादेखिए राव साहबसौ बात की एक बात अगर मास्टर उगवे जैसा अनुभवी और बुज़ुर्ग आदमी किसी को बबूचक’ बोलता हैतो ऐसे ही मुँह उठाकर कुछ भी नहीं बोल देता। कुछ आगे पीछे का सोच कर बोलता है। आज से आप मेरी नज़र में भी बबूचक’ ही हैं। मेरी बात सुनकर थोड़ी देर तक मुँह लटकाए बैठे रहेफिर उठकर अपने कमरे में चले गए। और अंदर से गेट बंद करके लड़कियों से चैट करने लगे। 
डीजी को जब राव साहब की बीमारी के बारे में लिखातो उन का जवाब आया राव साहेब की यह पुरानी बीमारी हैवह जो चाहते हैअगर वह नहीं हो पाता हैतो वह बीमार पड़ जाते है। मुझे लगता है इस बार इनकी बीमारी की वजह प्रेमिका का न मिलना है।” मुझे डीजी की बातों में थोड़ी सच्चाई नज़र आती है। अभी दो दिन पहले ही मैंने मेहुल के ख़त का जवाब देते हुए लिखा था‘कल का पूरा दिन Salvation Cafe में किताब (तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाइंग) पढ़ते हुए बितायासुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना वहीं खायायह कैफ़े ज़ोस्टल वाले चलाते हैखाना और कॉफ़ी दोनों बहुत सही था(सैल्वेशन कैफ़े की कॉफ़ी से याद आया। दो दिन पहलेशुक्रवार को, Joy food पर जो कॉफ़ी पी थी उसकी वजह से सुबह पाँच बजे तक सो नहीं पाया था। कुछ अलग ही तरह का कैपेचीनो पिला दिया था। ऊपर साबुन के जैसा झाग थाऔर नीचे पेंदी में एक इंच मोटा खड़ा कॉफ़ी बीन। पैसा लगा था इसीलिए जैसे-तैसे निगल गया था| वर्ना, कॉफ़ी गिलोई के जूस से कम न था)
वहां कैफ़े के काउंटर पर जो लकड़ी बैठी थीउससे बात-चीत की तो पता चला कि वह वहां वालंटियर हैदिन में ४-५ घंटा काम करना होता हैउसके बदले रहना और खाना फ्री होता है|उसी से पता चला की भारत और नेपाल को मिलाकर ज़ोस्टेल के कुल 38 ब्रांच हैं (नेपाल में दो ब्रांच है, एक काठमांडू और दूसरा पोखरा में। धर्मकोट के अलावा Zostel का दूसरा ब्रांच हमने खजुराहो में देखा था)वह लड़की दिल्ली से थीकमला नेहरु कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक करके यहाँ थोड़ा समय बिताने आई हैहमेशा की तरह इस बार भी राव साहब को कल उससे एकतरफ़ा प्यार हो गयाअब परसों से वे उसके चक्कर में ज़ोस्टल में रहने जा रहे हैं| ” लेकिन अफ़सोसअपनी अनोखी बीमारी की वजह से शायाद अब उनका जोस्टल जाना संभव नहीं हो पाएगा। 

पुनश्च- आज सुबह राव साहब को तिब्बतन हॉस्पिटल ‘DELEK’ ले गया था| खून और स्टूल जांच करके डॉक्टर ने बता कि कुछ गड़बड़ खा लेने की वजह से पेट में इन्फेक्शन हो गया है| उम्मीद है, कल तक ठीक हो जाएँगे, और शुक्रवार को Zostel जा पाएँगे|
आज जब मास्टर उगवे को राव साहब की बीमारी के बारे में बताया तो उनका कमेंट आया, “राव एक नंबर का ढकोसलाबाज़ है, कोई तबियत ख़राब नहीं है इसकी... प्रेम नहीं मिलने के कारण यह बौरा गया है|”

पुनश्च- अभी-अभी डीजी का मेल आया है, “राव साहेब से जब मैंने कल वीडियो कॉल पर बात की तो उनके हाथ में मैंने ORS के दो पाउच देखे। उससे मुझे अंदाजा आया की शायद उनको दस्त हो गए है।पर तुरंत मुझे आभास हुआ की मेडिकल साईन्स भले ही इसे दस्त लगना कहती होपर मेरे ख़याल में वह दस्त नहीं हैबल्किप्रेमिका के अभाव में जो स्ख(beep).. आगे से नहीं हो पाया और दमित रह गयावही reservior के उन्माद ने अपना निकलने का कोई और ही मार्ग खोज लिया। ख़ैरहकीकत क्या हैवह तो राव साहेब जाने।“

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...