Monday, 17 August 2020

पुरुष का प्रेम अंततः अन्याय में बदल जाता है

 "समझदार स्त्रियाँ अपना चंडी वाला रूप पति के लिए बचाकर रख लेती है, प्रेमी के सामने वह अपना 'आई एम् अ स्वीट गर्ल' वाला पहलु ही उजागर करती है"

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प्रश्न- एक सवाल प्राय: मन में उठता है कि अगर राधा से इतना ही प्रेम था, तो कृष्ण उन्हें छोड़कर क्यों चले गए। फिर कभी लौटे क्यों नहीं, और शादी क्यों नहीं की । बैरागी की जिंदगी जीने के लिए छोड़ क्यों दिये ।


इक्क्यु- यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, बहुतों के मन में उठता है| दो-तीन दिशाओं से इसको समझने की कोशिश करते हैं|


पहला- आधुनिक मनोविज्ञान कहता है कि स्त्री उसी से शादी करती हैं, जिनसे उन्हें बदला लेना होता है| यदि कोई लड़की सच में ही आपसे प्रेम करती है, तो वह कभी भी आपसे शादी नहीं करेगी, वह आपको इतना बड़ा दुःख नहीं देगी| समझदार स्त्रियाँ अपना चंडी वाला रूप पति के लिए बचाकर रख लेती है, प्रेमी के सामने वह अपना 'आई एम् अ स्वीट गर्ल' वाला पहलु ही उजागर करती है| जिन लोगों की भी प्रमिकाओं ने उसने शादी कर लिया है, वो यहाँ मेरी बात को गहराई से समझ सकते हैं| शादी के बाद स्त्री का जो विकराल रूप अपने पति के सामने निकलकर आता है, उसकी परिकल्पना प्रेमी कभी नहीं कर सकते हैं|

तो, मैं मानता हूँ कि राधा को कृष्ण से सच में ही प्रेम था, और वह समझदार भी थी, इसीलिए उन्होंने कृष्ण से विवाह नहीं किया| आपका यह कहना कि "तो कृष्ण उन्हें छोड़ कर क्यों चले गए", यह वक्तव्य बहुत ठीक नहीं हैं, पुरुष कभी भी इतना समझदार नहीं होता कि वह 'छोड़कर चला जाए' वो भी तब जब वो सच में ही स्त्री के प्रेम में हो| कृष्ण से इतनी समझदारी की अपेक्षा मैं नहीं रखता हूँ| जहाँ तक मैं समझता हूँ, राधा ने ही मना कर दिया होगा| कृष्ण तो पीछे पड़े होंगे शादी के लिए| प्रेम में धोखा सिर्फ स्त्रियाँ देती हैं, पुरुष न तो इतना उदार होता है कि अपने प्रेम को किसी और सौंप दे, और न ही इतना समझदार कि जिससे प्रेम करे उसे अपने बन्धनों से मुक्त कर दे| इसलिए छोड़ने का गौरव कृष्ण को देना मुझे उचित नहीं लगता है| जिन किताबों में ऐसा लिखा हो, उनमे सुधार कर देनी चाहिए|

उन दिनों मैं दिल्ली में था, 2010 की बात है, प्रेम में था| दिल्ली में अक्सर लोग प्रेम में होते है, मैं भी था| पहले उसे मुझसे प्रेम हुआ, और फिर मुझे उससे| रुकिए, 'मुझे उससे प्रेम हुआ' कहना ग़लत होगा, क्योंकि मुझे तो हमेशा ही हुआ रहता था, यह पहला मौका था कि सामने वाले को मुझसे हुआ था| लड़कों के लिए प्रेम कोई करने की चीज़ नहीं है, यह उनके व्यक्तित्व की सहज अवस्था है, 'करने' का काम सिर्फ लड़कियों का है, क्योंकि उनके चित की सहज अवस्था 'कठोरता' है|

एक दिन हमारी किसी विषय पर बात हो रही थी, तो उसने मुझसे कहा, "मैं तुमसे शादी नहीं करुंगी", मैंने पूछा, 'क्यूं', मुझे लगा शायद मज़ाक में ऐसा कह रही है| लेकिन वो इस बात को लेकर बेहद गंभीर थी, बोली, "तुम बर्बाद हो जाओगे", मैं थोड़ा हैरान हुआ, "बर्बाद क्यों हो जाऊंगा मैं? मुझे तो लगता है कि अगर हमारी शादी नहीं हुई तो मैं बर्बाद हो जाऊंगा" मैंने उससे कहा| "बर्बाद क्यों हो जाओगे ये मैं अभी तो नहीं बता सकती हूँ, लेकिन बीस साल बाद तुमको पता चल जाएगा", वह मुझसे बोली|

और, आज दस वर्ष बीत चुके हैं उस बात को, 2010 में वह मुझसे ऐसा बोली थी, और अभी 2020 चल रहा है| मैं अभी ही थोड़ा-थोड़ा समझ रहा हूँ उसके आशय को| मैं ख़ुद को भी देखता हूँ, और उस नमूने को भी जिससे उसने शादी की| और मुझे लगता है, आने वाले दस सालों में,अगर मैं जिंदा बचा, तो यह दावे के साथ कह पाउँगा कि उसने जो कहा था, वह १०० फीसदी सच साबित हुआ|

स्त्री जिससे भी प्रेम करती है, उसके साथ न्याय करती हैं| और पुरुष जिससे प्रेम करता है, उससे वह शादी करके अपना गुलाम बना लेना चाहता है| पुरुष का प्रेम अंततः अन्याय में बदल जाता है| और स्त्री का प्रेम अंत में पुरुष की आज़ादी, स्त्री जिससे भी प्रेम करती है, उसे आज़ादी देती है| और पुरुष पाश देता है, उम्र भर की गुलामी| इसीलिए, मुझे लगता है, कृष्ण से विवाह न करके राधा ने उनके साथ न्याय किया| और दुनिया की अन्य औरतों को भी यह सीख दी कि जिससे प्रेम करो, उससे शादी कभी मत करना| अभी दो दिन पहले ही मास्टर उगवे मुझसे कह रहे थे कि कभी अगर मैं अपनी पुरानी प्रेमिकाओं से बात करता हूँ, तो वो मुझे आज भी देवता समझती हैं, उनसे बात करके अपने बारे में अच्छा फील होता है| लेकिन वहीं पत्नी के सामने ऐसा लगता है, जैसे दुनिया का सबसे नीच, कमीना और लुच्चा आदमी मैं ही हूँ, दो कौड़ी की भी इज्ज़त नहीं है, उसके सामने मेरी|

दूसरा- दूसरे पहलु को भी आधुनिक मनोविज्ञान की मदद से समझने में आसानी होगी| मनोविज्ञान कहता है कि हर पुरुष के भीतर स्त्री, और हर स्त्री के भीतर एक पुरुष होता है| अंतर सिर्फ अनुपात का होता है| स्त्री में पुरुष का अनुपात कम होता है- ६० फीसदी स्त्री, तो, ४० पुरुष| ऐसा ही पुरुषों के साथ भी होता है- पुरुष तत्व ज्यादा होते हैं, और स्त्री तत्व कम, लेकिन होते दोनों है| और हर व्यक्ति में यह अनुपात अलग-अलग होता है| आजकल के पुरुषों में, जिनके जीवन से संघर्ष गायब हो गया है, उनमे स्त्री तत्व की मात्र बढ़ गई है| और वो स्त्रीयां जो राजनीती, पुलिस, और सेना इत्यादि में चली जाती हैं, उनमे पुरुष तत्व बढ़ जाता है|

पुराने शास्त्र कहते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण पूर्ण पुरुष थे| मतलब उनमे स्त्री तत्व बिलकुल भी नहीं था| और राधा पूर्ण स्त्री थी, उनमे पुरुष तत्व का पूर्णतया अभाव था| और विवाह के लिए दोनों में से एक का अपूर्ण होना अनिवार्य है| दो पूर्ण के बीच विवाह संभव नहीं है| इसको ऐसे समझिये आपके पास एक लीटर शुद्ध दूध, और एक लीटर शुद्ध पानी है| अब आप दोनों को आपस मिला देते हैं, तो जो मिश्रण होगा, उसको आप शुद्ध कह सकते हैं? अब न तो उसे आप शुद्ध पानी कह सकते हैं, न ही शुद्ध दूध| मतलब दो शुद्ध चीज़ों को अभी अगर आपस में मिला दिया जाए, तो जो मिश्रण तैयार होता है, वह अशुद्ध हो जाता है| इसलिए, राधा और कृष्ण का विवाह संभव नहीं है| विवाह के लिए कम-से-कम एक का अशुद्ध होना ज़रूरी है, तभी समबन्ध चलेगा| क्योंकि विवाह का अर्थ होगा है स्त्री और पुरुष के बीच शाश्वत कलह| और यह तभी संभव है, जब या तो दोनों अपूर्ण हो, या फिर दो में से के अपूर्ण हो| अन्यथा विवाह संभव नहीं है|

तीसरा- तीसरे आयाम को समझने के लिए हमें थोड़ा तंत्र को समझना होगा| तंत्र कहता है, बाहर हम जिस स्त्री को ढूंढ रहे हैं, या स्त्री जिस पुरुष को ढूंढ रही है, वह दरसल भीतर के स्त्री और पुरुष की तलाश है| इसलिए, बाहर के स्त्री और पुरुष से आप कभी भी पूर्ण तृप्त नहीं हो सकते हैं| चाहे आप कितने ही स्त्री-पुरुष से सम्बन्ध क्यों न बना लें| वे लोग जो बहुत से रिलेशन से होकर गुज़रे हैं, मेरी बातों को समझ सकेंगे|

तृप्ति तभी संभव है, जब पुरुष अपने भीतर के स्त्री से सम्बन्ध बना है, और स्त्री अपने भीतर के पुरुष से सम्बन्ध स्थापित कर ले| उससे पहले कहीं ठौर नहीं है| तो, मेरी दृष्टि में, और यही सनातन की दृष्टि है, राधा कृष्ण के भीतर जो स्त्री है, उसकी प्रतीक है| राधा शब्द को यदि आप उल्टा करें, तो ‘धारा’ बनता है| राधा कहीं बाहर नहीं है, वह कृष्ण की भीतरी धारा है| इसलिए, बहुत पुराने शास्त्रों में राधा का कहीं जिक्र नहीं है| नए शास्त्रों में ही राधा की चर्चा है, पुराने में सिर्फ रुक्मिणी की बात है| राधा की कोई कहानी नहीं है| ज़रूरी भी नहीं था| राधा कृष्ण से अलग नहीं है, इसलिए, अलग से उसकी चर्चा करने की कोई ज़रूरत भी नहीं है| जैसे पर्वती कोई बाहर की स्त्री नहीं है, वह भी शिव के भीतर जो स्त्री है, उसकी प्रतीक है| उसी तरह राधा भी कृष्ण के भीतर है|
-इक्क्यु केंशो तजु


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