Sunday, 23 August 2020

डरे हुए और काफी हद तक मरे हुए लोगों की दुनिया है

उसने पूछा, 'तुम्हे अपनी ग़रीबी से, भूख से या फिर अपनी मौत से डर नहीं लगता?'
'शायद नहीं, क्योंकि मैंने कई दिनों की लांघने की हैं, ऐसा भी हुआ है, जब एक दाना भी पेट में नहीं गया| कई महीने फंकामस्ती में गुजारे हैं, ऐसा कई बार हुआ, जब एक नया पैसा भी जेब में नहीं रहा, कहते हैं न --एक फूटी कौड़ी भी नहीं|' उसने ऐसा कहते हुए अपनी जेब में इस तरह से हाथ डाले जैसे उनमें अपने पुराने दिन टटोल रहा हो|
रेबेक ने फिर कुरेदा, 'और मौत?'
'कई बार मरते-मरते बचा, मौत कई बार करीब आकर लौट गई, अनुभव रोमांचक रहा पर भय कभी नहीं लगा| जिसके पास पैसा है, जिसे भूख लगने से पहले ही खाना मिल जाता है, जो हर तरह से सुरक्षित है, जिसे मृत्यु आसानी से छू नहीं सकती, वही सबसे ज्यादा डरता है| जितनी सुरक्षा, उतना डर| जितना पैसा, उतनी निर्धनता| यह डरे हुए और काफी हद तक मरे हुए लोगों की दुनिया है|'
-'डॉमनिक की वापसी' (लेखक-
Vivek Mishra
, प्रकाशन -
Kitabghar Prakashan
)
कई बार लोग मुझसे पूछते हैं, बुद्ध का इतना प्रभाव क्यों है दुनिया पर, आज पूरी दुनिया में लोग बौद्ध धर्म में उत्सुक हो रहे हैं, ऐसा क्यों, महावीर, नानक, कृष्ण और अन्य सद्गुरुओं का उतना प्रभाव क्यों नहीं ? तो, मैं उसने कहता हूँ, "ऐसा नहीं है कि बुद्ध किसी और सम्बुद्ध पुरुष से भिन्न हैं, या फिर उनका बोध औरों की अपेक्षा अधिक है| उनका प्रभाव है, क्योंकि सत्य को जिस ढंग से उन्होंने कहा है, वह बहुत ही सुंदर और सम्मोहक है| बुद्ध एक बहुत ही कुशल स्टोरी-टेलर (कहानी सुनाने वाला) हैं| जिस ढंग से बुद्ध ने सत्य को लोगों तक पहुँचाया वह बड़ा अद्भुत है| लोगों के हृदय को छूने के लिए सत्य का सिर्फ सत्य होना ही काफी नहीं है, उसका सुंदर होना भी ज़रूरी है|
विवेक मिश्र एक बहुत ही सम्मोहक कहानीकार हैं, इतने सम्मोहक कि यदि आप उनकी किताब 'डॉमनिक की वापसी' आज सुबह 5 बजे पढ़ना शुरू करते हैं, तो फिर आप उसे दोपहर एक बजे खत्म करके ही दम लेते हैं| और न सिर्फ किताब खत्म करते हैं, बल्कि तुरंत ही तब्सिरा लिखने के लिए भी मजबूर हो जाते है| ऐसा बहुत कम होता है कि 208 पेज की किताब कोई एक सिटींग में पढ़कर खत्म कर दे| लेकिन 'डॉमनिक की वापसी' के मामले में ऐसा बहुतों के साथ हो सकता है| सत्य को कहने का इतना सरल, सुंदर और अनूठा ढंग इससे पहले मैंने भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा में देखा था| विवेक मिश्र जी जानते हैं कि सत्य को कैसे सुंदर और सरल ढंग से कहा जाए, इसीलिए उनकी बातें आपके हृदय को छूती है|
यह किताब (डॉमनिक की वापसी) जिस अनोखे ढंग से मेरे पास पहुंची उसके बारे में बताये बिना समीक्षा पूरी नहीं हो सकती है| यह कहानी भी किताब की जितनी ही रोचक है|
एक दिन, और वो दिन आज से कोई एक महीना पहले का था, मेरे फेसबुक इनबॉक्स एक में मेसेज आता है,
"इक्कयू तजु जी, नमस्कार,
अभी कुछ ही दिन पहले आपकी पोस्ट पढ़नी शुरू की और आपको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी और आपके स्वीकारने से हम जुड़ गए। जैसे जैसे आपको पढ़ रहा हूं, गहरे आश्चर्य से भरता जा रहा हूं। 2013 में शुरू किए और 15 में छपे मेरे उपन्यास का मुख्य पात्र डॉमनिक (दीपांश) न केवल आपकी तरह दिखता है, वह कई बिंदुओं पर आपकी तरह सोचता और बोलता भी है। जब मैं उसे लिख रहा था तब तक मैंने आपका होना नहीं जाना था।
कैसे डॉमनिक एक काल्पनिक चरित्र होने पर भी मैं आपमें उसे सजीव देख पा रहा हूं। ख़ुश भी हूं और आश्चर्य से भरा भी। पात्र पहले मिला और बाद में कहानी लिखी ये हुआ है पर कथा पहले लिखी और फिर कोई वहीं जीवन दृष्टि लिए। मात्र कला के लिए कला को जीता मिला। यह पहली बार हुआ। आप ऐसे ही बने रहिए। आपकी नियति डॉमनिक जैसी न हो। आप स्वस्थ और दीर्घायु हों। शुभकामनाएं|”
मेसेज पढ़ने के बाद मैं किताब में बेहद उत्सुक हो गया| सोचने लगा ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी किताब का पात्र मुझसे मिलता हो, और लेखक कहे कि मैंने कल्पना में जो चरित्र गढ़ा था, आप उसके मूर्त रूप हो| आज किताब पढ़ते समय शुरू के कुछ पन्नो पर मैं ख़ुद को ढूंढता रहा, लेकिन मैंने पाया कि यह तो मेरी कहानी नहीं है| लेकिन फिर 50 पेज पढ़ने के बाद, मुझे लगा यह मेरे नाम और रूप की कहानी नहीं है, मेरे आत्मा की कहानी है| फिर तो हर पेज पर मुझे सच में ही ऐसा लगा कि किताब जैसे मेरी आत्मकथा हो|
मैं हमेशा ऐसा सोचता हूँ कि आत्माकथा अगर सच में ही आत्मकथा है, तो वह फिर सब की कथा होती है| एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य के बीच जो भेद है, वह भेद नाम और रूप का है, पता ठिकाने का है, लेकिन आत्मा का नहीं है| आत्मा के तल पर हम सब एक हैं| इसलिए डॉमनिक की कहानी हर उस व्यक्ति की कहानी है, जो आत्मअनुसन्धान में लगा है|
सत्य तक पहुँचने के तीन मार्ग है, मैथ्स, म्यूजिक और मैडिटेशन| डॉमनिक ने म्यूजिक और अभिनय को अपना मार्ग बनाया है| माध्यम कोई भी हो मार्ग की अनुभूतियां सबकी एक जैसी ही होती है| डॉमनिक हम सबके अस्तित्व वह हिस्सा है, जिसे लेकर हम पैदा हुए थे, और जो धन कमाने, पद पाने, सेक्स पाने और पावर की पीछे भागने में कहीं खो गया है| डॉमनिक की वापसी पढ़ना अपने घर वापसी जैसा है| किताब पढ़ते समय आपको कई बार अपने उस संसार की याद आएगी, जिससे आपका सम्बन्ध वर्षों पहले टूट गया था|
अगर आप थोड़े हिम्मत वाले हुए, तो किताब खत्म होते ही आपके भीतर भी बहुत से दौड़ खत्म हो जाएँगे, आप उस संसार की और वापिस लौटने लगेंगे, जहाँ के आप असली निवासी है| यह दुनिया जिसमे अभी हम रह रहे हैं, यह तो बस एक सराय है| याद कीजिए जीसस का वो वचन, “यह दुनिया एक पुल की तरह है, इससे होकर गुजर जाओ, यहाँ अपना घर मत बनाओ”| आइये डॉमनिक के साथ हम सब भी अपनी दुनिया में वापिस चलें|
-इक्क्यु केंशो तजु

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