Monday, 31 August 2020

भीख मांग कर गुजारा कर लेना

“ऐसा कोई काम जिसको करने के बाद मन में तारीफ़ पाने, पैसा पाने, या कुछ भी पाने का ख्याल उठे, तो उस काम को करना बंद कर दीजिए, वह काम आपकी आत्मा को घुन की तरह खा जाएगा| उस काम को करने से अच्छा है भीख मांग कर गुजारा कर लेना|

 

इक्क्यु- मेरा एक प्रश्न है, सर ये बताइए हम कैसे जाने कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?

 

इक्क्यु- पश्चिम का एक बड़ा उपन्यासकार हुआ ऐल्डस लॅनर्ड हक्स्ले, उनकी किताब ब्रेव न्यू वर्ल्ड और आइलैंड पढ़ने जैसी है| हक्सले की पहली पत्नी मरिया थी, जिसके मरने के बाद हक्सले ने लॉरा अर्चेरा से शादी कर ली| लॉरा ख़ुद भी एक लेखिका थी, और साथ ही संगीतकार भी| हक्सले जिद्दु कृष्णमूर्ति, भारतीय चिंतन और ओरिएंट के दर्शन से बहुत प्रभावित थे| अक्सर वे अपनी पत्नी के साथ कृष्णमूर्ति के यहाँ चर्चा-परिचर्चा के लिए जाया करते थे|

 

कृष्णमूर्ति बारहा अपने प्रवचनों में गुरु, संस्था, और आर्डर आदि के खिलाफ बोलते रहते थे| लॉरा हक्सले ने एक दिन कृष्णमूर्ति से पूछा, "आप ऑर्गनाइजेशन और गुरु के खिलाफ बोलते हैं, लेकिन आप ख़ुद भी तो यही सब कर रहे हैं| अगर गुरु की ज़रूरत नहीं है, तो आप फिर प्रवचन क्यों देते हैं? आप अगर ऑर्गेनाइजेशन के खिलाफ हैं, तो फिर कृष्णमूर्ति फाउंडेशन क्यों चलाते हैं?"

 

लॉरा हक्सले के ये प्रश्न बहुतों के प्रश्न थे, कृष्णमूर्ति को जो लोग सुनते थे, उन में से बहुतों के मन में इस तरह के प्रश्न उठते थे| किसी ने अभी तक पूछने की हिम्मत नहीं की थी, लेकिन लॉरा ने पूछ लिया, उसके मन में भी बहुत दिनों से ये सब बातें घूम रही थी| जे. कृष्णमूर्ति ने जो लॉरा से कहा उसी में आपके प्रश्न का भी जवाब है|

 

कृष्णा जी ने ज़ोर देकर लॉरा से कहा, "I don't do it on purpose." मतलब "मैं यह सब किसी उद्देश्य से नहीं करता हूँ|" क्या अर्थ हुआ इसका? इसका अर्थ हुआ 'मैं जो कर रहा हूँ उसको करना मेरा आनंद है, इससे कोई फल मिले, इसका का कोई परिणाम हो ऐसी किसी आशा के साथ मैं ये सब नहीं करता हूँ|' इसको हमें इस तरह से समझें| सुबह पंछी गीत गाते हैं, फूल खुशबू बिखेरते हैं, क्या उद्देश्य है इस सब का? क्या पंछी पैसा कमाने के लिए गाते हैं? या इस लिए गाते हैं कि कोई उनको सुने? यदि ऐसा होता तो पंछी कब के डिप्रेश होकर गाना बंद कर दिए होते| वे गाते हैं क्योंकि गाना उनका आनंद है, इसके पीछे कोई हेतु नहीं| कोई हेतु अपने आप सिद्ध हो जाता हो, ये हो सकता है, लेकिन पंछीयों के तरफ से कोई नहीं है| आप उनके गीत सुनकर आनंदित हो सकते हैं, कोई ध्यानी उनके गीत सुनकर समाधि को उपलब्ध सकता है, कोई कवि कविता रच सकता है, कोई संगीतकार धुन तैयार कर सकता है, कुछ भी हो सकता है, लेकिन चिड़िया इन में से किसी भी कारण के लिए नहीं गाती है| कृष्णमूर्ति, रमण, ओशो, बुद्ध, कृष्ण या महावीर इसीलिए नहीं बोलते हैं कि उन्हें लोगों को बदलना है, नहीं ऐसा उद्देश्य रखकर वे नहीं बोलते हैं| अगर ऐसा होता तो वे कबके निराश होकर बोलना बंद कर देते| बुद्ध चालीस साल अहर्निश बोलते रहे, और उन चालीस साल में मुश्किल से चालीस लोग उनकी बातों से बदले होंगे| और मैं कहता हूँ अगर चार लोग भी यदि नहीं बदले होते तब भी बुद्ध बोलते ही रहते|

आप पूछती हैं " कैसे जाने कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?" बहुत ही सरल है| देखें कि आपके जीवन में ऐसा क्या है जो आप बिना किसी परिणाम के चिंता किए बगैर कर सकती हैं, वही आपके जीवन का उद्देश्य है| अगर आप कहती हैं कि आपको गीत गाना पसंद है, तो क्या आप तब भी गा सकती है जब आपको एक आदमी भी न सुने? और अगर कभी सुने भी तो तारीफ न करे? और कभी तारीफ भी कर दे, तो आपको गाने के लिए कोई इनाम या पैसा न दे? क्या तब भी आप उसी आनंद से गा सकती हैं? यदि हाँ तो गाना आपके जीवन का उद्देश्य है| फिर संगीत के प्रति ख़ुद को समर्पित पर दीजिए| बिना मांगे, बिन चाहे आप को वो सब मिल जाएगा, जिसकी तलाश में योगी और ध्यानी वर्षों तक हिमालय में तपस्या करते हैं, और उन्हें नहीं मिलता है|

 

कभी इस तरह से सोच कर देखें कि यदि दुनिया में पैसा, प्रसिद्ध और पॉवर जैसी चीज़ें नहीं होती, तो मैं करती??? क्या वही करती जो अभी कर रही हूँ, या फिर वही करना चाहती जो अभी करना चाह रही हूँ, यदि हाँ तो आपने अपने जीवन का उद्देश्य पा लिया है| यदि आपका जावाब नहीं है, तो फिर आपने उद्देश्य की तलाश कीजिए, मेहनत कीजिए, खोजिए कि वो क्या चीज़ है जिसको आप सिर्फ करने के आनंद के लिए कर सकती हैं| उसको करने में ही आपको इतना मजा आ रहा है कि आप उस से कुछ मिले ऐसी कोई उम्मीद नहीं बांधती हैं| भूखे पेट भी आप उसको कर सकती हैं| ग़ालिब का एक शेर है, "न सताइश की तमन्ना न सिले की परवा, गर नहीं हैं मिरे अशआर में मअ'नी न सही " मतलब न तो मुझे किसी की तारीफ़ चाहिए, न ही शिकायत से मुझे दुःख होता है, यदि मेरे शेर में कोई अर्थ नहीं है, तो न सही, मुझे कहने में मजा आता है, इसलिए मैं तो कहता रहूँगा|

 

डच चित्रकार हुआ वानगोग, उसका छोटा भाई थिओ उसे पैसे भेजता था, महीने का| वह एक दिन खाता था और दूसरे दिन उपवास करता था| भूखे रह कर पैसे बचाता था, फिर उस पैसे से रंग और कागज़ खरीद कर चित्र बनाता था| ख़ुद को गोली मारने से पहले उसने अपने भाई को लिखा, "मैं जो करना चाहता था, वो मैंने कर दिया, जैसी तस्वीर मैं बनाना चाहता था, मैंने बना दी, अब बेमतलब का जीने में मुझे मजा नहीं आ रहा है|" जब तक वानगोग जिंदा रहा उसकी एक पेंटिंग नहीं बिकी| लेकिन वह आनंदित था, किसी ने उसके चित्रों की तारीफ नहीं की लेकिन वह आनंदित था|

 

उसी बातचीत में लॉरा ने कृष्णा जी से पूछा, "आपके आनंद का क्या राज़ है", तो कृष्णमूर्ति ने कहा, "I don't mind what happens." (क्या होता है उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है|) यही राज़ की बात है-फर्क नहीं पड़ना चाहिए| कुछ लोग ऊपर-ऊपर से ऐसा बोलते हैं- अरे लोग पसंद करे या न करे, पैसा मिले या न मिले मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता| यदि ऊपर-उपर से ऐसा कहना पड़े, लोगों को दिखाने के लिए मुस्कुराना पड़े तो समझिये आप जो कर रहे हैं, वह गलत है| वह वो काम नहीं है जिसको करने के लिए आपका जन्म हुआ है| आप न सिर्फ लोगों धोखा दे रहे बल्कि अपना भी जीवन नष्ट कर रहे हैं| ऐसा कोई काम जिसको करने के बाद मन में तारीफ़ पाने, पैसा पाने, या कुछ भी पाने का ख्याल उठे, तो उस काम को करना बंद कर दीजिए, वह काम आपकी आत्मा को घुन की तरह खा जाएगा| उस काम को करने से अच्छा है भीख मांग कर गुजारा कर लेना|

 

ढूंढिए अपने जीवन में, कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होगा, सबके जीवन में होता है, कुछ लोग खोज लेते कुछ नहीं खोज पाते हैं, लेकिन होता सबके जीवन में है| आपके जीवन में भी कुछ ऐसा होगा जिसके बारे में आप कह पाएंगी, "स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा"| अभी जो आपका प्रश्न है, एक दिन मेरा भी था, 7 वर्ष लगे मुझे ढूँढने में, आपको भी वक़्त लग सकते हैं, क्योंकि समाज और शिक्षा ने हमारे आत्मा के ऊपर बहुत धूल चढ़ा दिए हैं, उनको हटाने में वक्त लग सकता है, लेकिन उद्देश्य मिलेगा ज़रूर| इसलिए, जब तक अपना उद्देश्य नहीं मिल जाता है, तब तक अपने उद्देश्य को खोजने को ही उद्देश्य मानकर आगे बढ़िये|

-इक्क्यु केंशो तजु

 

नोट-प्रश्नकर्ता ने जवाब पाने के लिए 500 रूपये डोनेट किये हैं| यदि आपके कोई प्रश्न हैं तो आप उसे ikkyutzu@gmail.com पर मेल करके पूछ सकते हैं| जवाब पाने के लिए डोनेट करना अनिवार्य है|



Thursday, 27 August 2020

रात का रिपोर्टर

 अब हम तुम्हे नहीं पढ़ा सकेंगे| जानती हो, आस-पड़ोस के लोग क्या कहते हैं ? कहते हैं, लड़का रिपोर्टिंग के लिए लिए बाहर रहता है और बूढ़ा पढ़ाने के बहाने अपनी जवान बहू के साथ........

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एक बूढ़ा बालक, लओत्सो नाम का यही अर्थ होता है चीनी भाषा में| कहते हैं लओत्सो जब पैदा हुआ तो वह 80 साल का था| कुछ लोग इस बात को प्रतीक की तरह लेते है, मतलब उसकी बौद्धिक उम्र उतनी थी| मेरी दृष्टि में लओत्सो ओरिएंट का असली हिमालय है, एक ऐसा हिमालय जिस पर पश्चिम का कोई हिलेरी कभी नहीं चढ़ सकता है| लओत्सो ज्ञान के गौरीशंकर हैं|
लओत्सो का सारा ज्ञान उनकी छोटी-सी किताब 'ताओ ते चिंग' में समाहित है| मुश्किल से 30 पेज की यह किताब अपने में अस्तित्व के सभी राज़ को समेटे हुए है| 'ताओ ते चिंग' के बहुत से सूत्रों में से एक सूत्र अस्तित्व के शुरुआत के बारे में हैं| उसी शुरुआत के बारे में, जिसके सम्बन्ध में अरविन्द सावित्री में लिखते हैं- It was the hour before the Gods awake. जी, यह उस क्षण की बात है जब ईश्वर अपनी नींद से जागा नहीं था| ग़ालिब कहते हैं, जब कुछ नहीं था तो ख़ुदा था, लेकिन लओत्सो ने कहा है कि जब कुछ भी नहीं था तब कोहरा था, धुंध था| ख़ुदा के होने के लिए बन्दे का होना ज़रूरी है, बिना बन्दे के ख़ुदा नहीं हो सकता है| इसलिए ग़ालिब की बातों में बहुत सचाई नहीं है| अरविन्द भी सत्य के बहुत करीब हैं, लेकिन उनकी भी ऊँगली ठीक सत्य पर नहीं है| ईश्वर और नींद ये सब द्वैत की बातें है|
लओत्सो की व्यख्या एकदम सटीक है- जब कुछ भी नहीं था तब धुंध था| रहस्यदर्शी के लिए अंग्रेज़ी में हम मिस्टिक शब्द का उपयोग करते हैं, यह शब्द भी मिस्ट यानि धुंध से बना है| संत वह जो धुंध को देखता है| हमें सब साफ़ दिखता है, हमें पता है कि क्या गलत है और क्या सही, पाप और पुण्य की परिभाषा हमें याद है| लेकिन संत को कुछ भी साफ़ नहीं होता है, उसके लिए पाप-पुण्य, सुख-दुःख, धर्म-अधर्म और अच्छा-बुरा इस सबमे कोई भेद नहीं होता है| उसको कुछ भी साफ़ नहीं होता है| सिर्फ मूर्खों को सब चीज़ें साफ़ दिखाई देती है, संत को नहीं, संत जहाँ से देखता है वहां सिर्फ घाना कोहरा है|
निर्मल वर्मा को पढ़ना धुंध को टटोलना है| निर्मल की दुनिया में कुछ भी साफ़ नहीं होता है, न तो वहां दिन का अलोक है, और न ही रात का अँधेरा, क्योंकि अभ्यास से कोई अँधेरे में भी दिन की तरह देख सकता है| चोर देख लेते हैं, शिकारी देख लेते हैं, आप भी देख सकते हैं| लेकिन कोहरे में देखने का कोई अभ्यास नहीं हो सकता है| आप कितनी ही कोशिश क्यूं न कर लें, कोहरे में कुछ भी साफ़ नहीं होता|
"ज़रा सोचिये, हम कैसे टाइम में जी रहे हैं, जहाँ आदमी अपनी औरत के सामने नंगा नहीं हो सकता है!" - निर्मल वर्मा (रात का रिपोर्टर)
यही सच है हमारे समय का, हमारे ही समय का क्यों यह हमेशा का सच है| कवि गंग को अकबर ने हाथी से कुचलवा दिया था, क्यों? क्योंकि उन्होंने लिखा 'जिसको हरि से प्रीत नहीं आस करे अकबर की' | हमें भी कुचल दिया गया है, हाथी से| यह और बात ही कि इस बार हाथी चीन से आया था|
लओत्सो कहते हैं, "The supreme rulers are hardly known by their subjects. The lesser are loved and praised. The even lesser are feared. The least are despised" (राजा वही महान है जिसकी उपस्थिति का बोध प्रजा को न के बराबर हो, समान्य राजा से लोग प्रेम करते हैं, उनकी प्रशंसा करते हैं, और घटिया रजा से प्रजा डरती है)
इस कसौटी पर आज के राजाओं को कहाँ रखते हैं? आज यह सवाल पूछना बहुत ज़रूरी है| आज ही क्यों यह सवाल हमेशा ज़रूरी था, और आगे भी रहेगा|
'ताओ ते चिंग' में ही लओत्सो का एक और वचन है, "The more laws and commands there are, the more thieves and robbers there will be. (अगर अपराध और अपराधी को बढ़ाना है तो नियम और कानून को बढ़ा दो|)
यही हो रहा है पूरी दुनिया में, रोज़ नए-नए नियमों को लोगों पर थोपा जाता है, कभी घर से बाहर मत निकलो, कभी बिना मुंह ढके बाहर मत निकलो, मत कहो को आसमां में छेद यह किसी व्यक्तिगत निंदा हो सकती है|
इसीलिए रिशी का बॉस, राय साहब, उससे आत्मकथा लिखने के लिए कहते हैं, क्योंकि समाज के सत्य को बिना सत्ता की नज़रों में आए लोगों तक पहुँचाने का एक मात्र उपाय है आत्माकथा| लेकिन वह दिन दूर नहीं जब दुनिया की सरकारें आत्मकथा लिखने पर बैन लगा देगी|
फिर रिशी के पिता को अपनी बहू से कहना पड़ेगा, "अब हम तुम्हे नहीं पढ़ा सकेंगे| जानती हो, आस-पड़ोस के लोग क्या कहते हैं ? कहते हैं, लड़का रिपोर्टिंग के लिए लिए बाहर रहता है और बूढ़ा पढ़ाने के बहाने अपनी जवान बहू के साथ........
-इक्क्यु केंशो तजु (२६, अगस्त २०२०)


Sunday, 23 August 2020

डरे हुए और काफी हद तक मरे हुए लोगों की दुनिया है

उसने पूछा, 'तुम्हे अपनी ग़रीबी से, भूख से या फिर अपनी मौत से डर नहीं लगता?'
'शायद नहीं, क्योंकि मैंने कई दिनों की लांघने की हैं, ऐसा भी हुआ है, जब एक दाना भी पेट में नहीं गया| कई महीने फंकामस्ती में गुजारे हैं, ऐसा कई बार हुआ, जब एक नया पैसा भी जेब में नहीं रहा, कहते हैं न --एक फूटी कौड़ी भी नहीं|' उसने ऐसा कहते हुए अपनी जेब में इस तरह से हाथ डाले जैसे उनमें अपने पुराने दिन टटोल रहा हो|
रेबेक ने फिर कुरेदा, 'और मौत?'
'कई बार मरते-मरते बचा, मौत कई बार करीब आकर लौट गई, अनुभव रोमांचक रहा पर भय कभी नहीं लगा| जिसके पास पैसा है, जिसे भूख लगने से पहले ही खाना मिल जाता है, जो हर तरह से सुरक्षित है, जिसे मृत्यु आसानी से छू नहीं सकती, वही सबसे ज्यादा डरता है| जितनी सुरक्षा, उतना डर| जितना पैसा, उतनी निर्धनता| यह डरे हुए और काफी हद तक मरे हुए लोगों की दुनिया है|'
-'डॉमनिक की वापसी' (लेखक-
Vivek Mishra
, प्रकाशन -
Kitabghar Prakashan
)
कई बार लोग मुझसे पूछते हैं, बुद्ध का इतना प्रभाव क्यों है दुनिया पर, आज पूरी दुनिया में लोग बौद्ध धर्म में उत्सुक हो रहे हैं, ऐसा क्यों, महावीर, नानक, कृष्ण और अन्य सद्गुरुओं का उतना प्रभाव क्यों नहीं ? तो, मैं उसने कहता हूँ, "ऐसा नहीं है कि बुद्ध किसी और सम्बुद्ध पुरुष से भिन्न हैं, या फिर उनका बोध औरों की अपेक्षा अधिक है| उनका प्रभाव है, क्योंकि सत्य को जिस ढंग से उन्होंने कहा है, वह बहुत ही सुंदर और सम्मोहक है| बुद्ध एक बहुत ही कुशल स्टोरी-टेलर (कहानी सुनाने वाला) हैं| जिस ढंग से बुद्ध ने सत्य को लोगों तक पहुँचाया वह बड़ा अद्भुत है| लोगों के हृदय को छूने के लिए सत्य का सिर्फ सत्य होना ही काफी नहीं है, उसका सुंदर होना भी ज़रूरी है|
विवेक मिश्र एक बहुत ही सम्मोहक कहानीकार हैं, इतने सम्मोहक कि यदि आप उनकी किताब 'डॉमनिक की वापसी' आज सुबह 5 बजे पढ़ना शुरू करते हैं, तो फिर आप उसे दोपहर एक बजे खत्म करके ही दम लेते हैं| और न सिर्फ किताब खत्म करते हैं, बल्कि तुरंत ही तब्सिरा लिखने के लिए भी मजबूर हो जाते है| ऐसा बहुत कम होता है कि 208 पेज की किताब कोई एक सिटींग में पढ़कर खत्म कर दे| लेकिन 'डॉमनिक की वापसी' के मामले में ऐसा बहुतों के साथ हो सकता है| सत्य को कहने का इतना सरल, सुंदर और अनूठा ढंग इससे पहले मैंने भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा में देखा था| विवेक मिश्र जी जानते हैं कि सत्य को कैसे सुंदर और सरल ढंग से कहा जाए, इसीलिए उनकी बातें आपके हृदय को छूती है|
यह किताब (डॉमनिक की वापसी) जिस अनोखे ढंग से मेरे पास पहुंची उसके बारे में बताये बिना समीक्षा पूरी नहीं हो सकती है| यह कहानी भी किताब की जितनी ही रोचक है|
एक दिन, और वो दिन आज से कोई एक महीना पहले का था, मेरे फेसबुक इनबॉक्स एक में मेसेज आता है,
"इक्कयू तजु जी, नमस्कार,
अभी कुछ ही दिन पहले आपकी पोस्ट पढ़नी शुरू की और आपको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी और आपके स्वीकारने से हम जुड़ गए। जैसे जैसे आपको पढ़ रहा हूं, गहरे आश्चर्य से भरता जा रहा हूं। 2013 में शुरू किए और 15 में छपे मेरे उपन्यास का मुख्य पात्र डॉमनिक (दीपांश) न केवल आपकी तरह दिखता है, वह कई बिंदुओं पर आपकी तरह सोचता और बोलता भी है। जब मैं उसे लिख रहा था तब तक मैंने आपका होना नहीं जाना था।
कैसे डॉमनिक एक काल्पनिक चरित्र होने पर भी मैं आपमें उसे सजीव देख पा रहा हूं। ख़ुश भी हूं और आश्चर्य से भरा भी। पात्र पहले मिला और बाद में कहानी लिखी ये हुआ है पर कथा पहले लिखी और फिर कोई वहीं जीवन दृष्टि लिए। मात्र कला के लिए कला को जीता मिला। यह पहली बार हुआ। आप ऐसे ही बने रहिए। आपकी नियति डॉमनिक जैसी न हो। आप स्वस्थ और दीर्घायु हों। शुभकामनाएं|”
मेसेज पढ़ने के बाद मैं किताब में बेहद उत्सुक हो गया| सोचने लगा ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी किताब का पात्र मुझसे मिलता हो, और लेखक कहे कि मैंने कल्पना में जो चरित्र गढ़ा था, आप उसके मूर्त रूप हो| आज किताब पढ़ते समय शुरू के कुछ पन्नो पर मैं ख़ुद को ढूंढता रहा, लेकिन मैंने पाया कि यह तो मेरी कहानी नहीं है| लेकिन फिर 50 पेज पढ़ने के बाद, मुझे लगा यह मेरे नाम और रूप की कहानी नहीं है, मेरे आत्मा की कहानी है| फिर तो हर पेज पर मुझे सच में ही ऐसा लगा कि किताब जैसे मेरी आत्मकथा हो|
मैं हमेशा ऐसा सोचता हूँ कि आत्माकथा अगर सच में ही आत्मकथा है, तो वह फिर सब की कथा होती है| एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य के बीच जो भेद है, वह भेद नाम और रूप का है, पता ठिकाने का है, लेकिन आत्मा का नहीं है| आत्मा के तल पर हम सब एक हैं| इसलिए डॉमनिक की कहानी हर उस व्यक्ति की कहानी है, जो आत्मअनुसन्धान में लगा है|
सत्य तक पहुँचने के तीन मार्ग है, मैथ्स, म्यूजिक और मैडिटेशन| डॉमनिक ने म्यूजिक और अभिनय को अपना मार्ग बनाया है| माध्यम कोई भी हो मार्ग की अनुभूतियां सबकी एक जैसी ही होती है| डॉमनिक हम सबके अस्तित्व वह हिस्सा है, जिसे लेकर हम पैदा हुए थे, और जो धन कमाने, पद पाने, सेक्स पाने और पावर की पीछे भागने में कहीं खो गया है| डॉमनिक की वापसी पढ़ना अपने घर वापसी जैसा है| किताब पढ़ते समय आपको कई बार अपने उस संसार की याद आएगी, जिससे आपका सम्बन्ध वर्षों पहले टूट गया था|
अगर आप थोड़े हिम्मत वाले हुए, तो किताब खत्म होते ही आपके भीतर भी बहुत से दौड़ खत्म हो जाएँगे, आप उस संसार की और वापिस लौटने लगेंगे, जहाँ के आप असली निवासी है| यह दुनिया जिसमे अभी हम रह रहे हैं, यह तो बस एक सराय है| याद कीजिए जीसस का वो वचन, “यह दुनिया एक पुल की तरह है, इससे होकर गुजर जाओ, यहाँ अपना घर मत बनाओ”| आइये डॉमनिक के साथ हम सब भी अपनी दुनिया में वापिस चलें|
-इक्क्यु केंशो तजु

Monday, 17 August 2020

पुरुष का प्रेम अंततः अन्याय में बदल जाता है

 "समझदार स्त्रियाँ अपना चंडी वाला रूप पति के लिए बचाकर रख लेती है, प्रेमी के सामने वह अपना 'आई एम् अ स्वीट गर्ल' वाला पहलु ही उजागर करती है"

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प्रश्न- एक सवाल प्राय: मन में उठता है कि अगर राधा से इतना ही प्रेम था, तो कृष्ण उन्हें छोड़कर क्यों चले गए। फिर कभी लौटे क्यों नहीं, और शादी क्यों नहीं की । बैरागी की जिंदगी जीने के लिए छोड़ क्यों दिये ।


इक्क्यु- यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, बहुतों के मन में उठता है| दो-तीन दिशाओं से इसको समझने की कोशिश करते हैं|


पहला- आधुनिक मनोविज्ञान कहता है कि स्त्री उसी से शादी करती हैं, जिनसे उन्हें बदला लेना होता है| यदि कोई लड़की सच में ही आपसे प्रेम करती है, तो वह कभी भी आपसे शादी नहीं करेगी, वह आपको इतना बड़ा दुःख नहीं देगी| समझदार स्त्रियाँ अपना चंडी वाला रूप पति के लिए बचाकर रख लेती है, प्रेमी के सामने वह अपना 'आई एम् अ स्वीट गर्ल' वाला पहलु ही उजागर करती है| जिन लोगों की भी प्रमिकाओं ने उसने शादी कर लिया है, वो यहाँ मेरी बात को गहराई से समझ सकते हैं| शादी के बाद स्त्री का जो विकराल रूप अपने पति के सामने निकलकर आता है, उसकी परिकल्पना प्रेमी कभी नहीं कर सकते हैं|

तो, मैं मानता हूँ कि राधा को कृष्ण से सच में ही प्रेम था, और वह समझदार भी थी, इसीलिए उन्होंने कृष्ण से विवाह नहीं किया| आपका यह कहना कि "तो कृष्ण उन्हें छोड़ कर क्यों चले गए", यह वक्तव्य बहुत ठीक नहीं हैं, पुरुष कभी भी इतना समझदार नहीं होता कि वह 'छोड़कर चला जाए' वो भी तब जब वो सच में ही स्त्री के प्रेम में हो| कृष्ण से इतनी समझदारी की अपेक्षा मैं नहीं रखता हूँ| जहाँ तक मैं समझता हूँ, राधा ने ही मना कर दिया होगा| कृष्ण तो पीछे पड़े होंगे शादी के लिए| प्रेम में धोखा सिर्फ स्त्रियाँ देती हैं, पुरुष न तो इतना उदार होता है कि अपने प्रेम को किसी और सौंप दे, और न ही इतना समझदार कि जिससे प्रेम करे उसे अपने बन्धनों से मुक्त कर दे| इसलिए छोड़ने का गौरव कृष्ण को देना मुझे उचित नहीं लगता है| जिन किताबों में ऐसा लिखा हो, उनमे सुधार कर देनी चाहिए|

उन दिनों मैं दिल्ली में था, 2010 की बात है, प्रेम में था| दिल्ली में अक्सर लोग प्रेम में होते है, मैं भी था| पहले उसे मुझसे प्रेम हुआ, और फिर मुझे उससे| रुकिए, 'मुझे उससे प्रेम हुआ' कहना ग़लत होगा, क्योंकि मुझे तो हमेशा ही हुआ रहता था, यह पहला मौका था कि सामने वाले को मुझसे हुआ था| लड़कों के लिए प्रेम कोई करने की चीज़ नहीं है, यह उनके व्यक्तित्व की सहज अवस्था है, 'करने' का काम सिर्फ लड़कियों का है, क्योंकि उनके चित की सहज अवस्था 'कठोरता' है|

एक दिन हमारी किसी विषय पर बात हो रही थी, तो उसने मुझसे कहा, "मैं तुमसे शादी नहीं करुंगी", मैंने पूछा, 'क्यूं', मुझे लगा शायद मज़ाक में ऐसा कह रही है| लेकिन वो इस बात को लेकर बेहद गंभीर थी, बोली, "तुम बर्बाद हो जाओगे", मैं थोड़ा हैरान हुआ, "बर्बाद क्यों हो जाऊंगा मैं? मुझे तो लगता है कि अगर हमारी शादी नहीं हुई तो मैं बर्बाद हो जाऊंगा" मैंने उससे कहा| "बर्बाद क्यों हो जाओगे ये मैं अभी तो नहीं बता सकती हूँ, लेकिन बीस साल बाद तुमको पता चल जाएगा", वह मुझसे बोली|

और, आज दस वर्ष बीत चुके हैं उस बात को, 2010 में वह मुझसे ऐसा बोली थी, और अभी 2020 चल रहा है| मैं अभी ही थोड़ा-थोड़ा समझ रहा हूँ उसके आशय को| मैं ख़ुद को भी देखता हूँ, और उस नमूने को भी जिससे उसने शादी की| और मुझे लगता है, आने वाले दस सालों में,अगर मैं जिंदा बचा, तो यह दावे के साथ कह पाउँगा कि उसने जो कहा था, वह १०० फीसदी सच साबित हुआ|

स्त्री जिससे भी प्रेम करती है, उसके साथ न्याय करती हैं| और पुरुष जिससे प्रेम करता है, उससे वह शादी करके अपना गुलाम बना लेना चाहता है| पुरुष का प्रेम अंततः अन्याय में बदल जाता है| और स्त्री का प्रेम अंत में पुरुष की आज़ादी, स्त्री जिससे भी प्रेम करती है, उसे आज़ादी देती है| और पुरुष पाश देता है, उम्र भर की गुलामी| इसीलिए, मुझे लगता है, कृष्ण से विवाह न करके राधा ने उनके साथ न्याय किया| और दुनिया की अन्य औरतों को भी यह सीख दी कि जिससे प्रेम करो, उससे शादी कभी मत करना| अभी दो दिन पहले ही मास्टर उगवे मुझसे कह रहे थे कि कभी अगर मैं अपनी पुरानी प्रेमिकाओं से बात करता हूँ, तो वो मुझे आज भी देवता समझती हैं, उनसे बात करके अपने बारे में अच्छा फील होता है| लेकिन वहीं पत्नी के सामने ऐसा लगता है, जैसे दुनिया का सबसे नीच, कमीना और लुच्चा आदमी मैं ही हूँ, दो कौड़ी की भी इज्ज़त नहीं है, उसके सामने मेरी|

दूसरा- दूसरे पहलु को भी आधुनिक मनोविज्ञान की मदद से समझने में आसानी होगी| मनोविज्ञान कहता है कि हर पुरुष के भीतर स्त्री, और हर स्त्री के भीतर एक पुरुष होता है| अंतर सिर्फ अनुपात का होता है| स्त्री में पुरुष का अनुपात कम होता है- ६० फीसदी स्त्री, तो, ४० पुरुष| ऐसा ही पुरुषों के साथ भी होता है- पुरुष तत्व ज्यादा होते हैं, और स्त्री तत्व कम, लेकिन होते दोनों है| और हर व्यक्ति में यह अनुपात अलग-अलग होता है| आजकल के पुरुषों में, जिनके जीवन से संघर्ष गायब हो गया है, उनमे स्त्री तत्व की मात्र बढ़ गई है| और वो स्त्रीयां जो राजनीती, पुलिस, और सेना इत्यादि में चली जाती हैं, उनमे पुरुष तत्व बढ़ जाता है|

पुराने शास्त्र कहते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण पूर्ण पुरुष थे| मतलब उनमे स्त्री तत्व बिलकुल भी नहीं था| और राधा पूर्ण स्त्री थी, उनमे पुरुष तत्व का पूर्णतया अभाव था| और विवाह के लिए दोनों में से एक का अपूर्ण होना अनिवार्य है| दो पूर्ण के बीच विवाह संभव नहीं है| इसको ऐसे समझिये आपके पास एक लीटर शुद्ध दूध, और एक लीटर शुद्ध पानी है| अब आप दोनों को आपस मिला देते हैं, तो जो मिश्रण होगा, उसको आप शुद्ध कह सकते हैं? अब न तो उसे आप शुद्ध पानी कह सकते हैं, न ही शुद्ध दूध| मतलब दो शुद्ध चीज़ों को अभी अगर आपस में मिला दिया जाए, तो जो मिश्रण तैयार होता है, वह अशुद्ध हो जाता है| इसलिए, राधा और कृष्ण का विवाह संभव नहीं है| विवाह के लिए कम-से-कम एक का अशुद्ध होना ज़रूरी है, तभी समबन्ध चलेगा| क्योंकि विवाह का अर्थ होगा है स्त्री और पुरुष के बीच शाश्वत कलह| और यह तभी संभव है, जब या तो दोनों अपूर्ण हो, या फिर दो में से के अपूर्ण हो| अन्यथा विवाह संभव नहीं है|

तीसरा- तीसरे आयाम को समझने के लिए हमें थोड़ा तंत्र को समझना होगा| तंत्र कहता है, बाहर हम जिस स्त्री को ढूंढ रहे हैं, या स्त्री जिस पुरुष को ढूंढ रही है, वह दरसल भीतर के स्त्री और पुरुष की तलाश है| इसलिए, बाहर के स्त्री और पुरुष से आप कभी भी पूर्ण तृप्त नहीं हो सकते हैं| चाहे आप कितने ही स्त्री-पुरुष से सम्बन्ध क्यों न बना लें| वे लोग जो बहुत से रिलेशन से होकर गुज़रे हैं, मेरी बातों को समझ सकेंगे|

तृप्ति तभी संभव है, जब पुरुष अपने भीतर के स्त्री से सम्बन्ध बना है, और स्त्री अपने भीतर के पुरुष से सम्बन्ध स्थापित कर ले| उससे पहले कहीं ठौर नहीं है| तो, मेरी दृष्टि में, और यही सनातन की दृष्टि है, राधा कृष्ण के भीतर जो स्त्री है, उसकी प्रतीक है| राधा शब्द को यदि आप उल्टा करें, तो ‘धारा’ बनता है| राधा कहीं बाहर नहीं है, वह कृष्ण की भीतरी धारा है| इसलिए, बहुत पुराने शास्त्रों में राधा का कहीं जिक्र नहीं है| नए शास्त्रों में ही राधा की चर्चा है, पुराने में सिर्फ रुक्मिणी की बात है| राधा की कोई कहानी नहीं है| ज़रूरी भी नहीं था| राधा कृष्ण से अलग नहीं है, इसलिए, अलग से उसकी चर्चा करने की कोई ज़रूरत भी नहीं है| जैसे पर्वती कोई बाहर की स्त्री नहीं है, वह भी शिव के भीतर जो स्त्री है, उसकी प्रतीक है| उसी तरह राधा भी कृष्ण के भीतर है|
-इक्क्यु केंशो तजु


जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...