“ऐसा कोई काम जिसको करने के बाद मन में तारीफ़ पाने, पैसा पाने,
या कुछ भी पाने का ख्याल उठे, तो उस काम को
करना बंद कर दीजिए, वह काम आपकी आत्मा को घुन की तरह खा
जाएगा| उस काम को करने से अच्छा है भीख मांग कर गुजारा कर
लेना|”
इक्क्यु- मेरा एक प्रश्न है, सर ये बताइए हम कैसे जाने कि हमारे
जीवन का उद्देश्य क्या है?
इक्क्यु- पश्चिम का एक बड़ा उपन्यासकार हुआ ऐल्डस लॅनर्ड हक्स्ले, उनकी किताब ब्रेव
न्यू वर्ल्ड और आइलैंड पढ़ने जैसी है| हक्सले की पहली पत्नी
मरिया थी, जिसके मरने के बाद हक्सले ने लॉरा अर्चेरा से शादी
कर ली| लॉरा ख़ुद भी एक लेखिका थी, और
साथ ही संगीतकार भी| हक्सले जिद्दु कृष्णमूर्ति, भारतीय चिंतन और ओरिएंट के दर्शन से बहुत प्रभावित थे| अक्सर वे अपनी पत्नी के साथ कृष्णमूर्ति के यहाँ चर्चा-परिचर्चा के लिए जाया
करते थे|
कृष्णमूर्ति बारहा अपने प्रवचनों में गुरु, संस्था, और
आर्डर आदि के खिलाफ बोलते रहते थे| लॉरा हक्सले ने एक दिन
कृष्णमूर्ति से पूछा, "आप ऑर्गनाइजेशन और गुरु के खिलाफ
बोलते हैं, लेकिन आप ख़ुद भी तो यही सब कर रहे हैं| अगर गुरु
की ज़रूरत नहीं है, तो आप फिर प्रवचन क्यों देते हैं? आप अगर ऑर्गेनाइजेशन के खिलाफ हैं, तो फिर
कृष्णमूर्ति फाउंडेशन क्यों चलाते हैं?"
लॉरा हक्सले के ये प्रश्न बहुतों के प्रश्न थे, कृष्णमूर्ति को जो
लोग सुनते थे, उन में से बहुतों के मन में इस तरह के प्रश्न
उठते थे| किसी ने अभी तक पूछने की हिम्मत नहीं की थी,
लेकिन लॉरा ने पूछ लिया, उसके मन में भी बहुत
दिनों से ये सब बातें घूम रही थी| जे. कृष्णमूर्ति ने जो
लॉरा से कहा उसी में आपके प्रश्न का भी जवाब है|
कृष्णा जी ने ज़ोर देकर लॉरा से कहा, "I don't do it on purpose." मतलब "मैं यह सब किसी उद्देश्य से नहीं करता हूँ|" क्या अर्थ हुआ इसका? इसका अर्थ हुआ 'मैं जो कर रहा हूँ उसको करना मेरा आनंद है, इससे कोई
फल मिले, इसका का कोई परिणाम हो ऐसी किसी आशा के साथ मैं ये
सब नहीं करता हूँ|' इसको हमें इस तरह से समझें| सुबह पंछी गीत गाते हैं, फूल खुशबू बिखेरते हैं,
क्या उद्देश्य है इस सब का? क्या पंछी पैसा
कमाने के लिए गाते हैं? या इस लिए गाते हैं कि कोई उनको सुने?
यदि ऐसा होता तो पंछी कब के डिप्रेश होकर गाना बंद कर दिए होते|
वे गाते हैं क्योंकि गाना उनका आनंद है, इसके
पीछे कोई हेतु नहीं| कोई हेतु अपने आप सिद्ध हो जाता हो,
ये हो सकता है, लेकिन पंछीयों के तरफ से कोई
नहीं है| आप उनके गीत सुनकर आनंदित हो सकते हैं, कोई ध्यानी उनके गीत सुनकर समाधि को उपलब्ध सकता है, कोई कवि कविता रच सकता है, कोई संगीतकार धुन तैयार
कर सकता है, कुछ भी हो सकता है, लेकिन
चिड़िया इन में से किसी भी कारण के लिए नहीं गाती है| कृष्णमूर्ति,
रमण, ओशो, बुद्ध, कृष्ण
या महावीर इसीलिए नहीं बोलते हैं कि उन्हें लोगों को बदलना है, नहीं ऐसा उद्देश्य रखकर वे नहीं बोलते हैं| अगर ऐसा
होता तो वे कबके निराश होकर बोलना बंद कर देते| बुद्ध चालीस
साल अहर्निश बोलते रहे, और उन चालीस साल में मुश्किल से
चालीस लोग उनकी बातों से बदले होंगे| और मैं कहता हूँ अगर
चार लोग भी यदि नहीं बदले होते तब भी बुद्ध बोलते ही रहते|
आप पूछती हैं " कैसे जाने कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?" बहुत ही सरल
है| देखें कि आपके जीवन में ऐसा क्या है जो आप बिना किसी
परिणाम के चिंता किए बगैर कर सकती हैं, वही आपके जीवन का
उद्देश्य है| अगर आप कहती हैं कि आपको गीत गाना पसंद है,
तो क्या आप तब भी गा सकती है जब आपको एक आदमी भी न सुने? और अगर कभी सुने भी तो तारीफ न करे? और कभी तारीफ भी
कर दे, तो आपको गाने के लिए कोई इनाम या पैसा न दे? क्या तब भी आप उसी आनंद से गा सकती हैं? यदि हाँ तो
गाना आपके जीवन का उद्देश्य है| फिर संगीत के प्रति ख़ुद को
समर्पित पर दीजिए| बिना मांगे, बिन
चाहे आप को वो सब मिल जाएगा, जिसकी तलाश में योगी और ध्यानी
वर्षों तक हिमालय में तपस्या करते हैं, और उन्हें नहीं मिलता
है|
कभी इस तरह से सोच कर देखें कि यदि दुनिया में पैसा, प्रसिद्ध और पॉवर
जैसी चीज़ें नहीं होती, तो मैं करती??? क्या
वही करती जो अभी कर रही हूँ, या फिर वही करना चाहती जो अभी
करना चाह रही हूँ, यदि हाँ तो आपने अपने जीवन का उद्देश्य पा
लिया है| यदि आपका जावाब नहीं है, तो
फिर आपने उद्देश्य की तलाश कीजिए, मेहनत कीजिए, खोजिए कि वो क्या चीज़ है जिसको आप सिर्फ करने के आनंद के लिए कर सकती हैं|
उसको करने में ही आपको इतना मजा आ रहा है कि आप उस से कुछ मिले ऐसी
कोई उम्मीद नहीं बांधती हैं| भूखे पेट भी आप उसको कर सकती
हैं| ग़ालिब का एक शेर है, "न
सताइश की तमन्ना न सिले की परवा, गर नहीं हैं मिरे अशआर में
मअ'नी न सही " मतलब न तो मुझे किसी की तारीफ़ चाहिए,
न ही शिकायत से मुझे दुःख होता है, यदि मेरे
शेर में कोई अर्थ नहीं है, तो न सही, मुझे
कहने में मजा आता है, इसलिए मैं तो कहता रहूँगा|
डच चित्रकार हुआ वानगोग, उसका छोटा भाई थिओ उसे पैसे भेजता था, महीने का| वह एक दिन खाता था और दूसरे दिन उपवास
करता था| भूखे रह कर पैसे बचाता था, फिर
उस पैसे से रंग और कागज़ खरीद कर चित्र बनाता था| ख़ुद को गोली
मारने से पहले उसने अपने भाई को लिखा, "मैं जो करना
चाहता था, वो मैंने कर दिया, जैसी
तस्वीर मैं बनाना चाहता था, मैंने बना दी, अब बेमतलब का जीने में मुझे मजा नहीं आ रहा है|" जब तक वानगोग जिंदा रहा उसकी एक पेंटिंग नहीं बिकी| लेकिन
वह आनंदित था, किसी ने उसके चित्रों की तारीफ नहीं की लेकिन
वह आनंदित था|
उसी बातचीत में लॉरा ने कृष्णा जी से पूछा, "आपके आनंद का क्या राज़
है", तो कृष्णमूर्ति ने कहा, "I don't mind
what happens." (क्या होता है उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है|)
यही राज़ की बात है-फर्क नहीं पड़ना चाहिए| कुछ
लोग ऊपर-ऊपर से ऐसा बोलते हैं- अरे लोग पसंद करे या न करे, पैसा
मिले या न मिले मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता| यदि ऊपर-उपर से ऐसा
कहना पड़े, लोगों को दिखाने के लिए मुस्कुराना पड़े तो समझिये
आप जो कर रहे हैं, वह गलत है| वह वो
काम नहीं है जिसको करने के लिए आपका जन्म हुआ है| आप न सिर्फ
लोगों धोखा दे रहे बल्कि अपना भी जीवन नष्ट कर रहे हैं| ऐसा
कोई काम जिसको करने के बाद मन में तारीफ़ पाने, पैसा पाने,
या कुछ भी पाने का ख्याल उठे, तो उस काम को
करना बंद कर दीजिए, वह काम आपकी आत्मा को घुन की तरह खा
जाएगा| उस काम को करने से अच्छा है भीख मांग कर गुजारा कर
लेना|
ढूंढिए अपने जीवन में, कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होगा, सबके जीवन
में होता है, कुछ लोग खोज लेते कुछ नहीं खोज पाते हैं,
लेकिन होता सबके जीवन में है| आपके जीवन में
भी कुछ ऐसा होगा जिसके बारे में आप कह पाएंगी, "स्वान्तः
सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा"| अभी जो आपका प्रश्न है,
एक दिन मेरा भी था, 7 वर्ष लगे मुझे ढूँढने
में, आपको भी वक़्त लग सकते हैं, क्योंकि
समाज और शिक्षा ने हमारे आत्मा के ऊपर बहुत धूल चढ़ा दिए हैं, उनको हटाने में वक्त लग सकता है, लेकिन उद्देश्य
मिलेगा ज़रूर| इसलिए, जब तक अपना
उद्देश्य नहीं मिल जाता है, तब तक अपने उद्देश्य को खोजने को
ही उद्देश्य मानकर आगे बढ़िये|
-इक्क्यु केंशो तजु
नोट-प्रश्नकर्ता ने जवाब पाने के लिए 500
रूपये
डोनेट किये हैं| यदि आपके कोई प्रश्न हैं तो आप उसे ikkyutzu@gmail.com
पर
मेल करके पूछ सकते हैं| जवाब पाने के लिए डोनेट करना अनिवार्य है|

