“मैं स्वर्ग की ओर तभी आँख उठा कर देखता हूँ, जब
मुझे छींकना होता है,” -बज़ारोव (फादर्स एंड संस)
किताब-फादर्स एंड
संस, लेखक-इवान तुर्गनेव
पिछले दस दिनों से कामू (‘द
फॉल’ और ‘द मिथ ऑफ़ सिसीफस’) और पी.डी ऑस्पेंसकी (Tertium Organum) को पढ़ने में
इतना उलझा रहा कि ‘तब्सिरा’ लिखने का ख्याल ही नहीं आया| ‘द फॉल’ पढ़ने के बाद सोचा
था कि इसके बारे में लिखूं, लेकिन अगले ही दिन कामू की दूसरी किताब ‘द मिथ ऑफ़
सिसीफस’ शुरू कर दिया, और फिर उसमे इतना खो गया कि लिखने का कोई होश ही न रहा| इसके अलावा इन दिनों फेसबुक पर प्रश्नों के उत्तर देने में भी काफी समय खर्च हो जा
रहा था| इसीलिए कुछ दिनों से लिखना हो नहीं पा रहा था| और इस सब के अलावा मेरे साथ
‘निरंतरता’ की समस्या हमेशा से रही है| मेरे लिए हर चीज़ का एक मौसम होता है| कभी
मुझ पर घूमने का भूत चढ़ता तो फिर घूमने के अलावा कुछ और नहीं सूझता है| फिर कभी
पढ़ने का सुर चढ़ता फिर दिन-रात एक करके पढ़ने में जुट जाता हूँ| इसी तरह कभी जब
लिखने का मौसम आता है, दिन भर खोपड़ी में लोल बजने लगता है, उठते, बैठते, जागते,
सोते, सदिखन लिखने का ही धुन सवार रहता है| और फिर कभी जब फिल्म देखने के पीछे पगलाता
हूँ, तो फिर एक दिन में चार-चार, पांच-पांच फिल्म देख देता हूँ| इसी तरह कभी ग़ज़ल
सुनने, शेर पढ़ने, और योग करने का भी भूत चढ़ता है| सब चीज़ का ज्वर मौसम की तरह आता
जाता रहता है, कुछ भी ज्यादा दिन नहीं टिकता है, और अगर कभी जबरदस्ती किसी टिकाने
की कोशिश करता हूँ, तो घुटन होने लगती है| फिर, वो सुख मिलना बंद हो जाता है, जो सहज
प्रवाह में बहने से मिलता है| इसीलिए आज तक मैं अपनी जिंदगी में कोई भी ढंग का काम
नहीं कर पाया(ऐसा मेरे आस-पास वाले लोग मुझे कहते हैं), चला बहुत लेकिन पहुंचा
कहीं नहीं| लेकिन मैं पूछता हूँ वे लोग लो लकीर के फ़कीर बने एक ही राग को हमेशा
आलापते रहते हैं, वे कहाँ पहुँच गए हैं? मेरी दृष्टि में निरंतरता प्रकृति के
अनुकूल नहीं है, प्रकृति सीधी लकीर पकड़ कर नहीं चलती है| यहाँ सब कुछ एक वर्तुल
में घूमता है, इसीलिए लकीर पीटने वालों को मैं मुर्ख मानता हूँ| कहीं पहुँचने के
लिए जो चलता है, वो सिवाय कब्र के कहीं और नहीं पहुंचता है| जीवन सूफियों की
दरवेशी नृत्य की तरह है, सिर्फ गोल-गोल घूमना है, घूमने में ही आनंद है| दरवेशी इस
लिए नहीं घूमता है कि घूम कर उन्हें कहीं पहुंचना है, नहीं कहीं पहुंचना नहीं है,
बस घूमने में आनंद आ रहा है| जो कोई भी कहीं पहुँचने की भाषा में सोचेगा वो कभी
नाच ही नहीं पाएगा| इसीलिए पढ़े लिखे और सभ्य लोग नाच नहीं पाते हैं| आदिवासीयों को
देखिये कैसे आग के चारो ओर गोल-घूम-घूम कर नाचते हैं| गोल-गोल घूमने में बड़ा सुख
है, छोटे बच्चे को देखिए जब भी वे मौज में आते हैं, गोल-गोल घूमने लगते हैं|
बच्चों को छोड़िये अपने चाँद और सूरज को देखिए, अनंत काल से ये गोल-गोल घूम रहे
हैं| इस जगत में जो भी सुन्दर है, वो या तो गोल है या गोल घूम रहा है| सिर्फ चैत
का गधा और आदमी सीधा चलने पर जोर देता है|
इस जगत में जो भी सुन्दर
है, वो सब वर्थ है, उनकी कोई उपयोगिता नहीं है| पोएट्री की क्या उपयोगिता है?
संगीत की क्या उपयोगिता है? अगर रवीन्द्रनाथ गीतांजलि नहीं भी लिखते तो क्या
नुकसान हो जाता? आज मैं आपसे जिस किताब के बारे में बात करने जा रहा हूँ, उसका
एक चरित्र जिसकी बुद्धि उपयोगितावादी है, एक जगह कहता है, “A good chemist’s twenty times more
useful than a poet.” बात बिलकुल सही
है, तर्कसंगत है| एक कवि से समाज को क्या फायदा है? लेकिन फिर भी हम जानते हैं, कि
जीवन सिर्फ रोटी कपड़ा और मकान का नाम नहीं है, ये सब जिंदा रहने के लिए ज़रूरी
है, जीने के लिए नहीं| और जिंदा रहने और जीने में ज़मीन आसमान का भेद है| सो,
इसी भेद को समझने में इतने दिनों से मैं मुब्तिला था| आज फेसबुक पर एक मित्र ने
याद दिलाया कि काफ़ी दिनों मैं कुछ नहीं लिख रहा हूँ, तो सोचा एक किताब जिसके बारे
में बहुत दिनों से आपसे बात करना चाह रहा था, उसी के बारे में आज लिखूं|
देख कर प्यार
होना, या फिर देखते ही प्यार हो जाना, या पहली नज़र में प्यार हो जाना, यह सब तो आपने निश्चित ही सुना होगा, इन फैक्ट कभी-न-कभी अनुभव भी किया होगा, लेकिन ‘किसी के
बारे में सिर्फ सुन कर प्यार हो जाना’, यह थोड़ा रेयर मामला है, है कि नहीं? मैंने नहीं कहता कि
ऐसा नहीं होता है, होता है, अगर नहीं होता, तो मुझे कैसे हो जाता, मैं बस इतना कह
रहा हूँ कि कम होता है| ‘तुर्गनेव की किताब ‘फादर्स और संस’ के बारे में मैंने
2006 में सुना था, और मुझे सुनते ही इस किताब इसे प्यार हो गया था| और बिना पढ़े ही
मैंने इस किताब को अपने पसंदीदा किताबों की लिस्ट में शामिल कर लिया था| हवा
देकर अपने कई दोस्तों को यह किताब खारीवा भी दिया था| जब मैंने दिल्ली में था तो ऐसा खूब किया करता था, जो किताब मुझे पढ़ना होता था, उसकी इतनी तारीफ करता था कि मेरे दोस्तों में से कोई न कोई उसे ज़रूर खरीद लेता था| और फिर बाद में मैं उससे किसी बहाने से लेकर पढ़ता था| अक्सर तो ये होता था कि समझ न आने की वजह से वो ख़ुद ही किताब मुझे दे जाता था| किताबों के मामले में मैं बहुत ही फरेबी हूँ| मैंने बहुत सी किताबों की चोरी की है| किताबों को लेकर मैं किसी भी स्तर तक गिर सकता हूँ| इसीलिए ज़रा सतर्क रहिएगा, आँख मूँद कर तब्सिरा मत पढिएगा, हो सकता कि बिना पढ़े ही मैं किताबों की रिव्यु लिख रहा
होऊं| दो चार रिव्यु(तब्सिरा) पर तो मुझे ख़ुद ही शक़ है| बहुत संभावना है कि मैंने
उन किताबों को नहीं पढ़ा है| जैसे, टॉलस्टॉय की ‘रेज़रेक्शन’ और दोस्तोवस्की की ‘द इडियट’ इन दोनों किताबों के बारे
में मुझे कुछ भी याद नहीं है कि इनमे क्या लिखा है| बहुत संभावना है कि मैंने इन दोनों किताबों को नहीं पढ़ा है, क्योंकि ऐसा हो
नहीं सकता है कि आपने कोई किताब पढ़ी हो और उसमे क्या लिखा है, ये आपको बिलकुल भी
पता न हो| इसी तरह मुझे अज्ञेय की ‘नदी के द्वीप’ और ऑस्पेंसकी की ‘'इन द सर्च
ऑफ़ मिरैक्युलस' पर भी शक है|
खैर, क्या सच है
क्या झूठ है इसका फैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ, क्योंकि मुझे कुछ भी ठीक से याद नहीं
है| आज जिस किताब की बात मैं आपसे कर रहा हूँ, उसे मैंने लास्ट इयर ही पढ़ा था,
इसीलिए मुझे ठीक-ठीक याद है कि किताब में क्या लिखा है(अभी तक मैं किताब को तीन
बार पढ़ चुका हूँ)| किताब में एक जगह लिखा है, “Young
people when they are frequently together as friends tend constantly to have
identical thoughts.” जब इस पंक्ति को पढ़ा था तो मुझे मेरे भाई गोविन्द की याद आ
गई थी| बचपन में हम दोनों के साथ यह खूब होता था| हमें हैरानी होती थी कि हमारे
विचार इतने क्यों टकराते हैं| विचार तो विचार हम दोनों बीमार भी साथ-साथ पड़ने लगे
थे| उन दिनों यह सब जादू जैसा लगता था, लेकिन अब समझ आ रहा है कि यह सब 24 घंटे साथ रहने
की वजह से होता था| साथ रहना बड़ा संक्रमणकारी होता है, कई बार आप देखेंगे कि पति-पत्नी,
या फिर प्रेमी-प्रेमिकाओं की शक्लें में साथ रहने के कारण एक जैसी दिखने लगती है|
कामू ने अपनी किताब ‘अजनबी’ में यहाँ तक लिख दिया है कि एक आदमी जो आठ साल से अपने
कुत्ते के साथ रह रहा था, उसकी शक्ल उसके कुत्ते से मिलने लगी थी|
“I have already told you that I don’t believe in anything.”
किताब में एक जगह
जब तुर्गनेव ये कहते हैं, “Is there anything more attractive in the world
than a pretty young mother with a healthy child in her arms?” तो पता नहीं कितनी
लड़कीयों की याद आई मुझे| अब तक मुझे लगता है था कि शादी के बाद शायद साड़ी पहनने की
वजह से लड़कियां सुन्दर लगने लगती है, लेकिन अब याद आया कि शादी के बाद मुझे वो ही
लड़कियां सुन्दर लगी थीं, जो माँ बन गई थी| माँ बनने के बाद हर स्त्री अभूतपूर्व
रूप से सुन्दर हो जाती है|
“A nihilist is a man who doesn’t acknowledge any
authorities, who doesn’t accept a single principle on faith, no matter how much
that principle may be surrounded by respect.”
किताब के बारे में आपसे
ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि पहले ही इस ब्लॉग पर मैं किताब के नायक बज़ारोव के
बारे में काफी बार बात कर चुका हूँ| यह किताब हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो किसी
का बाप है, या फिर किसी का बेटा है| रूसी लेखकों की मैंने अब तक जितनी भी किताबें
पढ़ी है, उनमे यह किताब सब अधिक सरल(इजी रीड) है| ‘फादर्स एंड संस’ एक मात्र किताब
है जिसे एक साल में मैं 3 बार से अधिक बार पढ़ चुका हूँ| एक यह किताब और दूसरा
बच्चन की मधुशला मैं कभी भी लेकर बैठ जाता हूँ| मधुशाला को मैं 2000 से पढ़ रहा
हूँ, आज तक नहीं उबा, इसी तरह इस किताब को भी मैं कितनी बार भी पढ़ सकता हूँ|
“Death
may be an old joke, but for each of us it’s as new as ever.”
पुनश्च- किताब को पढ़ने
के बाद यदि आप कभी मुझसे मिलते हैं, तो आपको ऐसा नहीं लगेगा कि आप मुझसे पहली बार
मिल रहे हैं|
इक्क्यु केंशो
तजु
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