किताब का नाम- नदी के
द्वीप, लेखक- हीरानंद सचिदानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’
“संतान को
पढ़ा-लिखा कर फिर अपनी इच्छा पर चलाना चाहने का मतलब है स्वयं अपनी दी हुई
शिक्षा-दीक्षा को अमान्य करना, अपने को अमान्य करना, क्योंकि बीस बरस में माँ-बाप संतान
को स्वतंत्र विचार करना भी न सिखा सके तो उन्होंने क्या सिखाया?”- नदी के द्वीप
काफी दिनो से मैं ‘नदी के
द्वीप’ बारे में लिखना चाह रहा था, लेकिन कोई सिरा ही नहीं मिल रहा था कि बात कहाँ
से शुरू करूँ| टॉलस्टॉय, दोस्तोवस्की, कामू और काफ्का की किताबों के बारे में
लिखना मेरे लिए सहल है, लेकिन अज्ञेय के बारे में बात करना मेरे लिए ख़ुद के बारे
में बात करने जैसा है| किसी के बारे बात करने के लिए थोड़ी दूरी चाहिए होती है| थोड़ा
फालसा चाहिए, अवलोकन करने के लिए| अज्ञेय और ख़ुद के बीच मैं इंच भर का भी फासला
नहीं पाता हूँ| और अपने बारे में बात करने में आदमी हमेशा ही बड़ा असहज महसूस करता
है|
“तुम मुखातिब
भी हो और क़रीब भी, तुम को देखूं कि तुमसे बात करूँ”
जैसे ही अज्ञेय के बारे
में कुछ लिखता हूँ, वैसे ही ऐसा महसूस होने लगता है कि जैसे अज्ञेय से मेरी दूरी
बढ़ रही, और मैं बेचैन होने लगता हूँ, फिर लिखना बंद कर देता हूँ| इसी कशमकश में
चार दिन से रोज़ लिख-लिख कर मिटाता रहा हूँ| कल तो मैंने यह तय किया कि अभी ‘तब्सिरा’
नहीं लिखूंगा, कुछ दिन पढ़ने पर जोर देता हूँ, फिर कभी लय बंधा तो लिखना शुरू
करूँगा| लेकिन कल एक मित्र ने एक कहानी भेज दी, उस कहानी को पढ़ने के बाद, बिना
लिखे रह नहीं पा रहा हूँ| कहानी ने जैसे भीतर कोई झरोखा खोल दिया हो, द्वन्द के
सारे बादल छंट गए हैं, और खिड़की के सलाखों के उस पार अज्ञेय पूर्णिमा की चाँद की
तरह चमक रहे हैं| मैं खिड़की के इस तरफ खड़ा हूँ, और अज्ञेय उस तरफ से मुझे आवाज़ दे
कर बुला रहे है, “इधर मेरे पास आओ, आओ आकाश को छूते हैं, उसका व्यास नापते हैं”|
उनके इसी निमंत्रण को स्वीकार करके मैंने लिखने का निर्णय लिया है| क्योंकि मैं
चाहता हूँ, आप भी मेरे साथ आए और अज्ञेय की ऊँगली पकड़ कर आकाश की सैर करें, उसको
छुएँ, और उसके व्यास को नापें|
इससे पहले कि मैं आपसे ‘नदी
के द्वीप’ के बारे में कहूँ, मैं आपको वह कहानी सुना दूँ, जिसे पढ़ कर यह सब घटना
घटी है| कहानी- “डिप्रेशन से ग्रस्त व्यक्ति एक बड़े डाक्टर के
पास गया| डाक्टर ने उसकी जांच की और पाया कि उसे कुछ भी नहीं है | डाक्टर बोला, मुझे तुम्हारे
शरीर में कुछ भी गलत दिखाई नहीं पड़ता, और मैं तुम्हें
किसी दवा का सुझाव नहीं दूँगा| बल्कि शहर में एक
प्रसिद्ध कॉमेडियन ग्रिमाल्डी का कॉमेडी शो हो रहा है, तुम वह देखने चले
जाओ| कॉमेडी शो में जी भर के हंसो| यदि तुम हंस सको
तो तुम्हारी सारी उदासी, सारा विषाद, सारा डिप्रेशन
गायब हो जाएगा| और उसका असर तुम पर किसी
भी दवा से ज्यादा गहरा होगा क्योंकि तुम्हारे शरीर में कुछ भी गलत नहीं है| तुम केवल एक चीज
भूल गए हो, और वह यह है कि कैसे हंसा
जाए| तुम हंसने की भाषा ही भूल गए हो| और वह यह कि
कैसे हंसा जाए| तुम्हें यह भाषा फिर से
सीखनी होगी| तुम्हें किसी
उपचार की जरूरत नहीं है| बस ग्रिमाल्डी के
शो में जाओ और हंसों| वह व्यक्ति बोला, "अरे मैं ही तो
ग्रिमाल्डी हूं"|
“मैं जागती हूँ
कि सोती हूँ? तुम हो, कि स्वप्न हो? मुझे लगता है कि मैं जागती हूँ, जाग कर तुम्हे
देखती हूँ, और आश्वस्त हो कर सो जाती हूँ| लेकिन शायद सोती हूँ सोते में देख कर
जाग उठती हूँ...”- नदी के द्वीप
इस कहानी को पढ़ते ही मुझे
एकदम से समझ आया कि वो क्या था, जो अज्ञेय के बारे में मैं कहना चाह रहा था, और
नहीं कह पा रहा था| और इसी वजह से इतने दिनों से ‘तब्सिरा’ लिख नहीं पा रह था| ‘अज्ञेय
ग्रिमाल्डी नहीं हैं, और हमारे 99 फीसदी लेखक, कवि, और कलाकार ग्रिमाल्डी हैं|
बस यही भेद है, अज्ञेय और दूसरे लेखकों में| अज्ञेय दुःखवादी नहीं हैं| ना ही कामू
और दोस्तोवस्की की तरह जीवन उनके लिए ‘absurd(बेहूदा)’ है| अपने
समसामयिकों की तरह अज्ञेय बुद्ध के पहले आर्य सत्य ‘जीवन दुःख है’ पर खुट्टा गाड़
कर नहीं बैठे हैं| अज्ञेय बुद्ध के दूसरे, तीसरे और चौथे आर्य सत्य से भी भलीभांति
परिचित हैं| और इसीलिए मेरा अज्ञेय से मेल बैठता है|
“भविष्य की बात
नहीं सोचनी चाहिए-वर्तमान ही सब-कुछ है, भविष्य केवल उसका एक प्रस्फुटन है| सोचने
को तो हम बहुत कुछ सोचते हैं, पर जब जांच कर के देखते हैं तो यही मानना पड़ता है कि
हाँ, वर्तमान ही सब-कुछ है|” –नदी के द्वीप
वे लेखक जो बचपन में अपनी
दादी और नानी से कहानी सुन कर बड़े होते हैं, वे कभी भी अच्छे लेखक नहीं बन सकते
हैं| अच्छा लेखक वही हो सकाता है जिसने अपने बाप से कहानी सुनी हो, असली कहानी बाप,
दादा और नाना के पास होती है, नानी और दादी के पास नहीं| जिनको बचकानी कहानियां
पढ़नी और सुननी हो, अज्ञेय उनके लिए नहीं है| और चूँकि अज्ञेय ग्रिमाल्डी नहीं
हैं, इसीलिए फूहड़ बातें करके न तो उन्हें अपना गम ग़लत करना है, और न ही आपका|
अज्ञेय मनोभंजन के लिए लिखते हैं, मनोरंजन के लिए नहीं| इसीलिए लिए उनकी कहानी ‘केवल
बौद्धिक रूप से व्यस्कों के लिए’ है|
“जीवन एक बार का
वरण नहीं है, वह अनंत वरण है; प्रत्येक क्षण हम स्वीकार और परिहार करते चलते हैं” –
नदी के द्वीप
हिंदी जानने की सर्थकता
इसी में है कि आपने ‘नदी के द्वीप’ पढ़ी हो| अगर आपने अभी तक यह किताब नहीं पढ़ी है,
तो हिंदी जानने का कोई मतलब नहीं है| फिर अभी तक आप हिंदी के सिर्फ अपशब्दों से
परिचित हैं, शब्द को आपने अभी तक नहीं जाना है|
‘नदी के द्वीप’ पढ़ते समय
दो तीन बातों का ख़ास ध्यान रखें, तभी आप इस किताब का पूरा आनंद ले सकते हैं| पहला
यह कि इस किताब को किसी पहाड़ पर पढ़े| अज्ञेय ने अपना ज्यादातर लेखन पहाड़ों में बैठ
कर ही किया है, इसीलिए उनकी कहानी में एक विशालता है, जो पहाड़ों से उसमें आई है|
बंद कमरे में आप इस उपन्यास को नहीं पढ़ सकते हैं, अगर आपने कोशिश की तो मारे घुटन
के आपकी जान भी जा सकती है| दूसरा जब भी किताब पढ़ने बैठें कॉफ़ी का मग साथ लेकर
बैठे| कॉफ़ी और पहाड़ दो सहयोगी शर्तें हैं, इनको पूरा करके ही आप किताब को पढ़, समझ
और आत्मसात कर सकते हैं| तो, अगली बार, जब कभी शिमला, मनाली, या फिर नैनीताल जाना हो,
तो यह किताब साथ लेते जाइएगा|
-इक्क्यु केंशो तजु

😁😁😁
ReplyDeleteआ
शुक्र है मुझे पहाड़ों पा नहीं जाना और न ही पहाड़ जैसी किताब को पढ़ना है....वैसे अपने अंत विवेचना करके अज्ञेय और ख़ुद को अलग कर दिए है...
वैसे मेरे पास उन किताबों की भी लिस्ट है जिन्हें खेत में और समुंदर किनारे पढ़ा जा सकता है... :)
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