Wednesday, 23 May 2018

‘तमन्ना तुम अब कहाँ हो’ (विवेचन)

किताब का नाम- ‘तमन्ना तुम अब कहाँ हो’, लेखक- निधीश त्यागी|

“हमसे अलग और दूर रह रहे पिता से मैंने कहा कि आई लव हिम, ताकि वे मुझे कार खरीदने का पैसा दे सकें|”

अभी-अभी आपने जो ऊपर पढ़ा, वह निधीश त्यागी की किताब ‘तमन्ना तुम अब कहाँ हो’ की एक कहानी है| एक ब्लॉगर मित्र से मैंने इस किताब के बारे में सुना था| ब्लॉगर मित्र ने अपने एक ब्लॉग पोस्ट में लिखा था कि यह उनकी पसंदीदा किताबों में से एक है| उन्ही की बातों से प्रभावित हो कर मैंने यह किताब 30% डिस्काउंट पर 175 रुएये में, अमेज़न से मंगाई| 200 सौ पेज की इस किताब में छोटी-बड़ी कोई 100 कहानियां है| ट्विंकल खन्ना की किताब 'मिसेज फनीबोन्स' की तरह इस किताब को भी पेंगुइन ने छापा है, और इस किताब में भी बहुत से कोरे पृष्ट हैं| पृष्ठों को कोरा छोड़ने के पीछे क्या राज़ है, यह मैं नहीं समझ पता हूँ| क्या पेंगुइन यह चाहता हैं कि किताब पढ़कर पाठकों के दिमाग में जो कूड़ा भर जाता है, उसको खाली करने के पाठक 'कोरे पृष्ट पर ध्यान करे? अगर यही उदेश्य है, तो सराहनीय है| फिर तो इस तरह की किताबों में हर तीसरे पृष्ट के बाद एक पृष्ट ज़रूर कोरा होना चाहिए| 

“अगर अबार्शन के लिए नहीं गई होती, तो मैं इन दिनों माँ बनने वाली होती”- यह भी एक कहानी है|

वक़्त काटने के लिए एक बार किताब को पढ़ा जा सकता है| कुछ कहानियां बहुत ही अच्छी हैं| अच्छी से मेरा मतलब है- सुखद एहसास देने वाली| अगर आप इन दिनों प्यार में हैं, तो कुछ कहानियों को पढ़कर आपको गुदगुदी लग सकती है| लेकिन ज्यादातर कहानियां ऐसी हैं, जिनको कहानी कहा भी नहीं जा सकता है| मैंने एक बार इम्तियाज अली की एक फिल्म देखी थी, जिसके सारे दृश्य बहुत ही सुन्दर व मनमोहक थे, लेकिन फिल्म की कहानी में कोई दम नहीं था| वैसी ही निधीश त्यागी की अधिकतर कहानियां है, जिसके शब्द तो बहुत ही सुन्दर है, लेकिन वे शब्द आपको कहीं पहुंचाते नहीं है| त्यागी जी ने सुन्दर-सुन्दर शब्दों और अच्छे-अच्छे जुमलों की मायाजाल में पाठकों फ़साने की अच्छी कोशिश की है|

“अपने पिरीयड आने की ख़ुशी पहले कभी नहीं हुई, जैसे आज|”- यह भी एक कहानी है|

जिस तरह की कहानियां और बातें इस किताब में है, उन्हें किसी ब्लॉग़ पर, या फेसबुक और ट्वीटर स्टेटस में पढ़ना सुखद एहसास दे सकता है| लेकिन किताब में इन्हें पढ़कर रोष उत्पन्न होता है| पैसे, पहचान और एजेंट की मदद से लोग आजकल कुछ भी छपवा ले रहे हैं| आजकल जिस तरह की किताबें छप रही है, उन्हें देखकर मुझे बड़ी हैरानी होती है| नाम और पैसा कमाने के चक्कर में कोई भी कुछ भी छपवा ले रहा है| अगर आप सिर्फ ख़ुद के पढने के लिए किताब छपवा रहे हैं, तब तो बात ठीक है| लेकिन अगर आप पाठक तलाशते हैं, तो फिर बतौर लेखक आपको आपनी जिम्मेवारी का एहसास होना चाहिए| किताब छपवाने से पहले एक ईमानदार लेखक को ख़ुद से यह पूछना चाहिए कि ‘लोगों को उसकी किताब क्यों पढ़नी चाहिए? पाठक, जो कि इसे पढ़ने के लिए पैसा और समय खर्च करेगा, को इस किताब से क्या मिलेगा?’ सिर्फ अपने लेखक बनने की खुजली शांत करने के लिए किताब छपवा कर बेचना पाप है| अपने लेखक बनने की खुजली को आप ब्लॉग लिखकर या फिर फेसबुक पर कथा-कहानी लिखकर भी शांतकर सकते हैं| इसके लिए किताब छपवाने की कोई ज़रूरत नहीं है| ऐसे ही आजकल लोगों ने किताब पढ़ना कम कर दिया है| अगर इसी तरह की किताबें छपती रही तो निकट भविष्य में लोग किताबों से बिलकुल ही मुंह मोड़ लेंगे| 

मैं एक व्यक्ति को फेसबुक के माध्यम से जानता हूँ ‘शशिकांत ‘सदैव’, आप डायमंड पॉकेट बुक में बतौर एडिटर काम करते हैं| एक बार इन्होने मुझे फेसबुक पर मेसेज करके कहा, ‘मैंने एक किताब लिखी है, आप उसे एक बार पढ़िये|” किताब का नाम था ‘कौन हैं ओशों’| मैंने किताब मंगा कर पढ़ी और हैरान रह गया| किताब के ऊपर लेखक का नाम था ‘शशिकांत सदैव’ और किताब में सारी बातें ओशो की थी| ओशो ने अलग-अलग प्रवचनों में अपने बारे में जो बातें कहीं है, उन बातों को उठाकर, क्रमबद्ध तरीरे से डाल दिया गया था| यह ‘कहीं से ईंट और कही से रोड़ा भानुमती ने कुनमा जोड़ा’ वाले कृत करके, शशिकांत जी ने कैसे ख़ुद को लेखक कह दिया, यह देखकर मैं बहुत ही अचंभित था| 

एक और महानुभाव, जिनका नाम स्वामी प्रेम वेदांत है, ने भी इसी तरह का खेल किया है| उनकी किताब का नाम है ‘ध्यान और प्रेम के ओजस्वी ऋषि ओशो’, उन्होंने भी यहाँ-वहां से ओशो की बातें उठाकर, उनको सुव्यवस्थित तरीके से रख दिया है, और बीच-बीच में कनेक्टर के रूप में दो चार अपनी बातें लिख दी है| इतने से ही वो इस किताब के लेखक हो गए| 

इस गोरखधंधे में, एक गुजराती महानुभाव ने तो सब को पीछे छोड़ दिया है(वैसे गुजरातियों ने आजकल सब चीज़ों में साबको पीछे छोड़ दिया है)| जनाब को लेखक बनने की ऐसी खुजली थी कि बम्बई में ख़ुद का पब्लिकेशन हाउस खोल लिया| शुरुआत उन्होंने ने ओशो की बातों को तोड़-मरोड़ कर लोगों को प्रवचन देने से किया था| आजकल प्रवचन भी देते हैं, और किताब भी बेचते हैं| पैसे और प्रचार के दम पर आज उनकी किताब ‘अमेज़न बेस्टसेलर है’| अमेज़न पर यदि आप हिंदी बेस्टसेलर किताबों की लिस्ट ढूंढते हैं, तो उस लिस्ट में एक उनकी भी किताब है| 

लोग ‘ऑथर’ बनने के लिए पागल हैं| कुछ भी करने के लिए तैयार हैं| 'ऑथर या फिर ऑथोरिटी' यह 'शब्द' ऐसा है कि इससे अहंकार को बड़ा पोषण मिलता है| आजकल हर कोई कुछ भी कूड़ा-कचड़ा लिख कर ऑथर बनना चाहता है| कुकुरमुत्ते की तरह ‘सेल्फ पब्लिकेशन’ हाउस खुल रहे है| लोग ख़ुद ही पैसा देकर किताब छपवाते हैं, फिर ख़ुद ही उसका प्रचार करते हैं| कुछ तो ऐसे हैं कि ख़ुद पैसा देकर किताब छपवाते हैं, फिर ख़ुद ही अपनी किताब को 50% डिस्काउंट पर पब्लिकेशन से ख़रीदकर दोस्तों को गिफ्ट देते हैं| फिर, दोस्तों से कहते हैं, ‘किताब के साथ एक ‘सेल्फी’ भेजना, फेसबुक पर लगानी है|” इस तरह से आज कल लोग लेखक बन रहे हैं| अमेज़न पर पैसा देकर प्रचार करवाइए, फिर 50 कॉपी बिक जाए तो किताब पर ‘ए नेशनल बेस्टसेलर’ लिख दीजिए| गजब की दुनिया है यह|  

बात करते-करते, मैं कहाँ-से-कहाँ पहुँच गया| लेकिन क्या करूँ पैसा और समय खर्च करके किताब पढता हूँ, फिर वो किताब अर्थहीन निकले तो गुस्सा तो आता है| सब से पहले लेखक पर गुस्सा आता है कि ‘इस बकवास को तुमको छपवाने की ज़रूरत क्या थी?’ फिर गुस्सा पब्लिकेशन हाउस पर आता है| ‘सेल्फ पब्लिकेशन’ हाउस को मैं निर्दोष मानता हूँ| उनको पैसे से मतलब है, जो भी पैसा देगा उसकी किताब वे छाप देंगे| लेकिन ये जो  प्रतिष्ठित पब्लिकेशन हाउस हैं, जिनका नाम बिकता ‘पेंगुइन, रूपा और पता नहीं क्या-क्या’, इनके ऊपर बड़ा गुस्सा आता है|  
खैर, जाने दीजिए इन सब बातों को, इन सब से ज्यदा फर्क नहीं पड़ता है| देर-अबेर सही किताब अपने सही पाठक को खोज ही लेती है| और किताब के इसी खोज को आसान बनाने के लिए मैंने यह ब्लॉग लिखना शुरू किया है|

अंत में ‘तमन्ना तुम अब कहाँ हो’ से एक कहानी ख़ास आपके लिए|

कहानी का नाम- उसने मुझे बास्टर्ड कहा!


‘बास्टर्ड!’ क्या??’ ‘बास्टर्ड!!’ और दोनों हंसने लगे| उसके पेट में यकायक सारी तितलियाँ उड़ने लगी| उसकी हथेलीयां उन तितलियों की पुकार सुनती रहीं| बहुत रोज़ बाद तक|

-इक्क्यु केंशो तजु

6 comments:

  1. आपकी समीक्षा में समीक्षा कम और शब्दों की जादूगरी ज्यादा है। जैसे इस किताब के अलावा आपकी समीक्षा कोई दूसरी किताब है जो रहस्यों और रोमांचों से भरी पड़ी हो......

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  2. सही कहा है आपने। हैरत तो तब होती है जब लोग समीक्षा की भी समीक्षा करने लगते है। वास्तविकता यही है कि आजकल थोथी लोकप्रियता के दौर आदमी अपने अहंकार को संतुष्ट करने में लगा है कोई प्रधानमंत्री बनकर तो कोई लेखक बनकर,फिर उसका परिणाम चाहे कुछ भी हो।

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    1. सही फ़रमाया है आपने :)

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  3. बहुत सटीक समीक्षा।आभासीय दुनियां में भी कुछ चर्चा योग्य कहानियां हैं कृपया उनके लिंक सहित उनकी समीक्षा करें।

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    1. जल्द ही शुरू करूँगा सर...:)

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