किताब का नाम- दी इडियट’, लेखक- दोस्तोवस्की
‘दी इडियट’ दोस्तोवस्की की सबसे से कम चर्चित किताबों में से एक है| लेकिन, मेरी दृष्टि में ‘द इडियट’ दोस्तोवस्की की सबसे उत्कृष्ट कृति है| अगर मुझे दुनियां की सबसे बेहतरीन दस किताबों की फेहरिस्त बनानी हो, तो मैं ‘द इडियट’ को शीर्ष पर रखूँगा| ‘द इडियट’ उस ऊंचाई की किताब है, जिस उंचाई को देखने में ‘उपनिषदों’ की भी गर्दन टूट जाए| अगर इस किताब को भारत के किसी ऋषि ने लिखा होता, तो हिन्दू बेझिझक किताब को ही ईश्वर का अवतार मान लेते| जैसे बाल्मिकी ने राम के जन्म से सैकड़ो साल पहले रामायण लिखी थी, वैसे ही संभवतः दोस्तोवस्की ने यह कथा लिखी है|
यह किताब लिखकर दोस्तोवस्की ने अस्तित्व की सृजनात्मक क्षमता को चुनौती दी है| अभी तक इस पृथ्वी पर जितने भी बुद्ध पुरुषों का जन्म हुआ है| उन सभी का जन्म पुरुष के वीर्य और स्त्री के गर्भ से हुआ है| इससे इतर घटना सिर्फ एक बार घटी है| कहा जाता है कि जीसस का जन्म कुवारी माँ से हुआ था, मतलब बिना किसी पुरुष से संबंध बनाए मरियम गर्भवती हो गई थी| जन्म के मामले में यह अब तक की सबसे ज्यादा चमत्कृत करने वाली घटना है|
लेकिन, दोस्तोवस्की ने जो चमत्कार पैदा किया है, उस के सामने अभी तक के सभी चमत्कारों की आभा मंद पड़ जाती है| दोस्तोवस्की ने ‘कलम’ की नोक से बुद्ध पैदा कर दिया| इस तरह के चमत्कार का इतिहास में इससे पहले कोई उल्लेख नहीं है| यह अघट पहली बार दोस्तोवस्की की कलम से घटा है|
दोस्तोवस्की का इडियट कोई साधारण इडियट नहीं है, वह ‘सम्बुद्ध’ है| किताब का नाम ‘इडियट’ रख कर दोस्तोवस्की ने मनुष्य की मूढ़ता का गहरा मजाज़ उड़ाया है| अगर यह दुनिया सम्यक व स्वस्थ्य होती तो निश्चित ही दोस्तोवस्की अपनी किताब का नाम ‘सेज’ रखते| लेकिन यह दुनिया एक बड़ा पागलखाना है| यहाँ हर कोई शीर्षासन किए हुए है| वेदों ने ठीक ही कहा है कि यह दुनिया एक ऐसे वट वृक्ष के समान है, जिसकी जड़ ऊपर की ओर, और शाखाएं नीचे की ओर है| यहाँ मुर्ख पंडित बने बैठे हैं, और पंडित मुर्ख बन मारा-मारा फिर रहा है| यहाँ बुद्धो को सूली दी जाती है, और बुद्धुरामों को पूजा जाता है|
किताब की शुरुआत में ही इडियट अपने बुद्धत्व की घोषणा करते हुए कहता, “What kind of idiot am I now, when I myself am aware of the fact that people consider me an idiot? They regard me as an idiot, but I’m intelligent, and they don’t realize It.” किताब अद्वितीय है| सदियों में ऐसी सुन्दर किताब लिखी जाती| किताब का नायक एक सीधा, सरल और बच्चो सा निर्दोष चित का व्यक्ति है| उसकी सरलता साधी हुई नहीं है, वह एकदम एफर्टलेस है| उसके आस-पास के लोग उसकी सरलता को उसकी मुर्खता समझते हैं, और उसे ‘इडियट’ कह कर पुकारते हैं| उसके परिचित और कुटुम्ब उसका मजाक उड़ाते हैं, उस पर हँसते हैं| लेकिन बड़े मजे की बात है कि जब लोग उस पर हँसते हैं, तो वह भी लोगों के साथ हँसने लगता है| वह बालचित जरूर है, लेकिन बचकाना नहीं है| उसकी जीवन दृष्टि सागर से भी ज्यादा गहरी है| प्रौढ़ उसकी बातों से चिढ़ते हैं, लेकिन बच्चों को उससे प्रेम है| उसे भी बच्चों का संगसाथ पसंद है| बड़ों का संग उसे जरा भी रुचता नहीं है| उसका मानना है कि, “Through children the soul is healed.”
पूरी किताब में आत्म-शुद्धिकरण के सैकड़ो सूत्र हैं| इडियट का पूरा जीवन अनुकरणीय है|
“To kill murder is an immeasurably greater evil than the crime itself. Murder by judicial sentence is immeasurably more horrible than murder committed by bandit.”
“And then it seemed to me that even in prison one might discover an immense life.”
“Nothing should be hidden from children on the pretext that they’re too young and it’s too soon for them to know.”
“Adults don’t realize that even in the most difficult matter a child can give extremely useful advice.”
एक जगह इडियट अपने एक दूर के परिचित, जो कि काफी अमीर व्यक्ति है, से मिलने जाता है| वह आदमी पहले तो उसे पहचान ही नहीं पाता है, फिर जब इडियट उसे अपना परिचय देता है, तो उसे बिठाता है, और फिर चाय-पानी के लिए पूछता है| चाय-पानी के बाद वह इडियट से उसके मिलने आने के कारण के बारे में पूछता है| इस पर इडियट कहता है, “कोई कारण नहीं है, मैं बस आपसे यूं ही मिलने आया हूँ, बस मिलने के आनंद के लिए मिलने आया हूँ| (“I had a feeling’, the prince interrupted, that you would be bound to see some special purpose in my visit. But to be quite honest, apart from the pleasure of making your acquaintance, I have no private purpose.”) लेकिन अमीर व्यक्ति को यकीन नहीं आता है| वह बार-बार हर तरह से इडियट के मिलने आने का कारण पता करने की कोशिश करता है| लेकिन हर बार इडियट उसे यही समझाता है कि वह उससे अकारण मिलने आया है| लेकिन जिस आदमी ने अपनी पूरी ज़िन्दगी में एक भी कृत्य बिना हेतु के नहीं किया हो, उसे इडियट का अकर्म कैसे समझ आए| यह दृश पढ़ कर मुझे बहुत सी बातें याद आ गई| बहुत बार ऐसा होता था कि मैं अपने किसी दोस्त, संबंधी या किसी पुराने परिचित को यूं ही कॉल कर लेता था(यह मैं आपको तब की बात बता रहा हूँ, जब कॉल करने का प्रति मिनट 2.50 पैसा लगता था), या फिर कभी किसी के यहाँ मिलने चला जाता था| मैं बड़ा असहज महसूस करता था| सामने वाला हमेशा यही पता करने की कोशिश में दिखता था कि आख़िर मैंने उन्हें क्यों कॉल किया है, या फिर मैं क्यों उनके घर पर उनसे मिलने आया हूँ| अब मैं कॉल करने से पहले या फिर मिलने जाने से पहले कोई तर्कसांगत कारण पहले से सोच कर रखता हूँ| किसी से मिलना हो तो पहले कारण दूंढता हूँ, फिर मिलने जाता हूँ| इसी तरह की एक और घटना याद आ रही है| 2012 की बात है, मैं बम्बई में अपने एक दोस्त के साथ रह रहा था| एक बार मैंने अपने दोस्त से बम्बई में रह रहे हमारे एक परिचित से मिलने के लिए चलने को कहा| तो मेरे दोस्त ने मुझसे पूछा, “क्या उससे मिल कर हमें ख़ुशी मिलेगी?”, मैंने कहा, “हाँ मिलेगी|”, फिर उसने पूछा “क्या उसे हमसे मिलकर ख़ुशी मिलेगी|” मैंने कहा ‘शायद’| तो, वह कहने लगा फिर हम नहीं जाएंगे| ‘शायद’ किसी से मिलने जाने का बहुत ही कमज़ोर रीज़न है| “याद रखो, हमेशा ऐसे ही व्यक्ति से मिलने जाना चाहिए, जिसे मिल कर हमें ख़ुशी मिले है, और जिसको हमसे मिल कर ख़ुशी मिले’’, मेरे दोस्त ने उपदेश देते हुए मुझ से कहा था| आज मेरा वह इस दुनिया से जा चुका है, लेकिन ‘द इडियट’ पढ़ते हुए मैंने उसे कई बार याद किया| उसे भी लोगों से अकारण मिलने और बात करने में ख़ुशी मिलती थी| कारण दूंढने वाले व्यक्ति के पास वह नहीं जाता था, और यदि कोई सकारण उससे मिलने की कोशिश करता, तो वह जल्दी मिलता भी नहीं था|
किताब के कुछ सूत्र जो मुझे बेहद पसंद है, आपके साथ शेयर करता हूँ|
“You are so pretty that one is afraid to look at you.”
“You always hurt the one you love.”
“The vilest and hateful thing about money is that it even imparts talent.”
“Human beings are created in order to torment one another.”
“Sir, we know him for the simple reason that he’s well known.”
-इक्क्यु केंशो तजु

Great oberservation.....
ReplyDeleteथैंक्स ! :)
Deleteकिसी किताब को परत दर परत वही व्यक्ति खोल सकता है जो या तो उसमें डूब गया हो या फिर उसने खुद लिखी हो। किताब की समीक्षा करते समय हमें कहीं भी ओस नहीं लगा कि किसी अन्य लेखक ने इसे लिखी है। आपको पढ़ते समय मुझे न कोई लेखक दिखा, न कोई किताब और न ही समीक्षक। मानों सभी एक हो गए हो....बहुत खूब....
ReplyDeleteइतनी गहराई से पढ़ने के लिए शुक्रिया... :)
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