किताब- ब्रदर्स कर्माज़ोव, लेखक- दोस्तोवस्की
“I think if the devil doesn’t exist, but man has created him, he has created him in his own image and likeness.”
ब्रदर्स कर्माज़ोव पढ़ना किसी ‘तीर्थ यात्रा’ पर जाने जैसा है| ‘तीर्थ’ जाने और ‘तीर्थ यात्रा’ पर जाने में बड़ा भेद है| बिना ‘यात्रा’ किए, हवाई जहाज से सीधा ‘तीर्थ’ पहुँच जाने में वो सुख नहीं है, जो महीनों लम्बी पद-यात्रा करके ‘तीर्थ’ पहुँचने में है| जिसने ‘यात्रा’ के सुख को नहीं जाना, वो कभी ‘तीर्थ’ की महिमा को नहीं समझ सकता है| प्लेन, ट्रेन या फिर कार से तीर्थ जाना, व्यर्थ का जाना है| लेकिन कुछ लोग ऐसे ही जाते हैं, दो दिन में ‘तीर्थ’ को धप्पा मार कर आ जाते हैं, और समझते हैं कि बड़ा पुण्य का काम करके आए हैं| यह पुण्य नहीं नासमझी है| अगर आप इसी तरह की नासमझी में जीते हैं, तो फिर दोस्तोवस्की आपके लिए नहीं हैं| फिर ‘ब्रदर्स कर्माज़ोव’ आपके लिए नहीं लिखी गई है|
“People talk sometimes of bestial cruelty, but that’s a great injustice and insult to the beasts; a beast can never be so cruel as a man, so artistically cruel.”
संभोग और साहित्य का आनंद हड़बड़ी में नहीं लिया जा सकता है| एक सार्थक साहित्य को जीने के लिए ‘समय-तैयारी-और-धर्य’ की आवश्कता होती है| 811 पृष्ट की इस किताब में कई ऐसे पड़ाव आएँगे, जहाँ आपको मंजिल पर पहुँच जाने का भ्रम हो सकता है| हर पड़ाव पर आप को ऐसा लग सकता कि इससे आगे अब और क्या हो सकता है, बात ख़त्म हो गई, जो कहना सुनना था, कह दिया गया, अब आगे और क्या कहने को शेष रह गया है? लेकिन यही तो ‘यात्रा’ का सुख है| हर पड़ाव पर ठहरते, सुस्ताते, शनै-शनै मंजिल की और बढ़ते जाना| जिसे मंजिल पर पहुँचने के जल्दी हो, उसे अच्छा यात्री नहीं कहा जा सकता है| जिसकी निगाह हमेशा मील का पत्थर तलाशती हो, वो अभी चलना नहीं जानता है|
“It’s not God that I don’t accept, Alyosha, only I most respectfully return him the ticket."
हर पड़ाव पर पहुँच कर आप का मन रुक जाना चाहेगा, लेकिन दोस्तोवस्की आपको कहीं ठहरे नहीं देंगे| एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, हर पड़ाव के बाद, वे आपको एक नई ऊंचाई पर ले जाएँगे| और अंत में, जब आप गौरीशंकर की चोटी पर पहुँचने ही वाले होंगे, आप के पैर मंजिल पर पहुँच कर नाचने के लिए बेचैन होंगे, शरीर एक लम्बी यात्रा के बाद अनंत विश्राम में जाना चाह रहा होगा, मन मंजिल पाने की ख़ुशी में आह्लादित हो झूम रहा होगा, कि तभी दोस्तोवस्की दबे पावं आपके पीछे आएँगे और आपको, दुनियां की सबसे ऊँची चोटी से, महाशुन्य में धक्का दे देंगे| उस ऊंचाई पर ले जाकर वे आपको धक्का देंगे, जहाँ से गिरने के बाद किसी को ज़मीन नसीब नहीं होती है| फिर आप त्रिशंकु की तरह कहीं शून्य में लटके रहेंगे| इस लटकन से अब आपको कभी मुक्ति नहीं मिल सकती है, क्योंकि दोस्तोवस्की के अलावा और कोई आपको शून्य से खीच कर वापिस नहीं ला सकता है| और दोस्तोवस्की ‘ब्रदर्स कर्माज़ोव’ का दूसरा पार्ट लिखे बिना ही दुनिया-ए-फानी से रुखसत कर गए थे| इसीलिए, अगर आपको शून्य में लटके रहने से डर लगता हो, तो फिर दोस्तोवस्की आपके लिए नहीं है|
“But Thou didst not know that when man rejects miracle he rejects God too; for man seeks not so much God as the miraculous.”
दोस्तोवस्की वर्तमान वादी हैं, इसीलिए उन का सभी पात्र वर्तमान में जीता है, कहानी सदा-सर्वदा वर्तमान में चलती हैं| आप किताब को कभी-भी कहीं से भी पढ़ना शुरू कर सकते हैं, और कहीं भी पढ़ना बंद कर सकते हैं| हर पृष्ट अपने आप में परिपूर्ण है, हर पृष्ट सार्थक और स्वतंत्र है|
हर महान आत्मा की तरह दोस्तोवस्की स्वाभाव से विद्रोही हैं| उनका हर पात्र पूरे किताब में आग उगलता है| पूर्वाग्रहों और मान्यताओं से भरा चित इस किताब को नहीं पचा सकता है| किताब का एक पात्र जो कि एक इसाई सन्यासी है, एक बातचीत के दौरान, सन्यास की नई परिभाषा गढ़ते हुए कहता है, “For monks are not a special sort of men, but only what all men ought to be.” इसी तरह उनका एक पात्र बाइबल का उपहास करते हुए अपने टीचर से पूछता है, “God created light on the first day, and the sun, moon, and stars on the fourth day. Where did the light come from on the first day?”
कहानी का एक पात्र बैठ कर शराब पी रहा है, और उसी समय अपने सन्यासी बेटे से कहता है, “For I mean to go on in my sins to the end, let me tell you. For sin is sweet; all abuse it, but all men live in it, only others do it on the sly, and I openly. And so all the other sinners fall upon me for being so simple. And your paradise, Alexy, is not to my taste, let me tell you that; and it’s not the proper place for a gentleman, your paradise, even if it exists.”
‘पाप मीठा है’, दोस्तोवस्की से पहले यह कहने की हिम्मत पूरे मनुष्य जाती की इतिहास में किसी ने नहीं किया था| एक और जगह यही पात्र अपने बेटे से कहता है, “Sir, in Russia men who drink are the best. The best men amongst us are the greatest drunkards.” अगर आज भारत में 150 साल बाद भी कोई ऐसा कह दे, तो हम उसे देशनिकाला दे देंगे|
मनुष्य के बहुचितवान होने की घोषणा करते हुए किताब का एक पात्र कहता है, “Pine trees are not like people, Alexey, they don’t change quickly. किताब में हर पर पृष्ट पर कोई न कोई कालजयी उद्घोष है, सब को यहाँ साझा नहीं किया जा सकता है, फिर भी आपके आनंद के लिए में कुछ शेयर कर रहा हूँ|
“I have a longing for life, and I go on living in spite of logic.”
“Love life more than the meaning of it.”
“The stupider one is, the closer one is to reality.”
“Men reject their prophets and slay them, but they love their martyrs and honour those who they have slain.

I am speechless and looking forward to read this book soon.
ReplyDeleteDo share your review after reading...
DeleteJust like a beautiful nazm.jaldi padhungi
ReplyDeleteशुक्रिया... पढ़ कर बताइयेगा कि कैसा लगा...
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