किताब का नाम- 'इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस', लेखक-ऑस्पेंसकी
आज मैं आपसे जिस किताब के बारे में बात करने जा रहा हूँ उसका नाम है ‘इन द
सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस’, इस किताब को विश्व
प्रसिद्द पुस्तक ‘Tertium Organum’ के लेखक पी.डी ऑस्पेंसकी ने लिखा है| ऑस्पेंसकी
ने जार्ज गुरजिएफ, जोकि पिछली सदी के सात सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक
थे, के श्री चरणों में बैठ कर जो कुछ भी आत्मसात किया, उसे इस किताब में लिखा है| यह
किताब इस अस्तित्व की तरफ से मनुष्य को दिया हुआ एक अनुपम भेंट है| पश्चिम में
पैदा हुआ पहला उपनिषद है| अस्तित्व के तमाम रहस्यों की कुंची है| साधना पथ पर चल
रहे साधकों के लिए पाथेय है| अस्तित्व के किसी अलौकिक लोक से उतरी आकाशसंहिता है|
सन 2014 के सितम्बर महीने में, बंबई में एक पब्लिकेशन
हाउस में काम करते हुए, इस किताब को मैंने पीडीऍफ़ में पढ़ना शुरू किया था| 60 पेज
पढ़ने के बाद, मैंने किताब को आगे नहीं पढ़ा| एक सच्चा रीडर किसी भी किताब का दस पेज
पढ़ कर, यह समझ जाता है कि किताब को कहाँ, कब और कैसे पढ़ना चाहिए| किताब को पढ़ने
के लिए जितनी पात्रता चाहिए, उस वक़्त उतनी पात्रता मुझ में नहीं थी| नवंबर में,
मैंने नौकरी से अवकाश लिया और गुजरात के एक आश्रम में आकर रहने लगा| किताब पढ़ने के
लिए जैसा माहौल और स्थान चाहिए था, वो मुझे आश्रम में मिल गया| प्रकृति का सानिध्य, मौन वातावरण,
पक्षियों का अविरल कलरव, कहीं जाने और कुछ करने की आपाधापी से मुक्ति, यानि तनाव
रहित जीवन, सब साज सही बैठ गया था| मैंने दूबारा किताब पढ़ना शुरू किया, लेकिन कुछ
ही पृष्ट पढ़ने के बाद, मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा कि अभी भी कुछ कमी है| जल्दी ही समझ
आ गया कि सही स्थान और माहौल के साथ-साथ, इस किताब को पढ़ने के लिए एक ख़ास प्रकार की
भीतरी भाव दशा की भी ज़रूरत है|
एक साल के तवील इंतजार के बाद वो मुबारक घड़ी आई, जब मुझे लगा
कि अब मैं सब तरह से इस किताब को पढ़ने के लिए तैयार हूँ| मैंने फिर से किताब पढ़ना
शुरू किया| लेकिन आश्चर्य, इस बार फिर मुझे किसी अहम् चीज़ की कमी महसूस होने लगी|
मैंने 10 पेज पढ़ कर फिर किताब पढ़ना बंद कर दिया| बहुत सिर खपाने के बाद भी कुछ समझ
में नहीं आया कि क्या चीज़ missing है|
11 दिन बाद 2 अक्टूबर को मेरा जन्म दिन था| आप यकीन
नहीं करेंगे, उस दिन यह किताब मुझे मेरे एक बेहद अज़ीज़ मित्र ने गिफ्ट दिया| मेरे लिए
यह बहुत ही हैरानी की बात थी| अपने अलावा मैंने यह बात किसी से नहीं बताई थी कि
पिछले 13 महीने से मैं इस किताब को पढ़ने के लिए जद्दोजहद कर रहा हूँ| मैंने आज तक यह किसी को नहीं बाताया कि 'इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस' पढ़ने के लिए, मैं मुंबई से जॉब छोड़ कर
गुजरात आश्रम में रहने आया था| पहली बार इस ब्लॉग पर यह सब शेयर कर रहा हूँ| शायद इससे
पहले यह सब किसी को कहता भी, तो कोई नहीं समझता|
गिफ्ट रैप हटा कर, जब मैंने किताब हाथ में लिया तो
तक्षण एक बात बिजली की तरह मेरे भीतर कौंध गई| मुझे सब साफ़ हो गया कि सब कुछ ठीक
होते हुए भी, क्या ठीक नहीं लग रहा था| इस किताब को पीडीऍफ़ में पढ़ना पाप था| इस
किताब क्या किसी भी किताब को पीडीऍफ़ में पढ़ना पाप है| एक ग्रंथ को पीडीऍफ़ में पढ़ने की
भूल कैसे कर रहा था मैं? अपनी मुर्खता पर मुझे हंसी आने लगी| उस दिन के बाद से आज
तक मैंने कोई भी किताब पीडीऍफ़ में नहीं पढ़ी, जो भी पढ़ना होता है, उसे अमेज़न,
फ्लिप्कार्ट या फिर दूकान से खरीद कर लाता हूँ|
आधी किताब ख़त्म होते-होते, मुझे फिर कुछ गड़बड़ लगने
लगी| इस बार भी मुझे कुछ समझ में नहीं आ
रहा था कि कहाँ भूल हो रही है| मैंने किताब पढ़ना बंद नहीं किया| दिन में 2-3 पेज
ही सही, लेकिन पढ़ता ज़रूर था| इसी दौरान, मैंने एक प्रयोग करना शुरू किया| किताब को अलग-अलग
जगह, और भिन्न-भिन्न भावदशा में पढ़ कर देखने लगा| कभी ट्रेन में सफर करते हुए, कभी
किसी पेड़ के नीच बैठ कर, कभी खाने की टेबल पर, कभी एक हाथ में मोबाइल तो एक हाथ
में किताब लेकर| लेकिन, हर बार निराशा ही हाथ लगती थी| सब तरह से कोशिश कर के देख लिया| हर तरह से निराशा ही हाथ लग रही थी| किताब किसी लज्जावान स्त्री की तरह अपने को मुझसे छिपा ले रही थी| जहाँ भी घूमने जाता था, मैं किताब को अपने साथ लेकर जाता
था| बहुत सी जगहों पर, बहुत से लोगों के साथ, और बहुत से अलग-अलग मनोदशा में मैंने पढ़ कर
देखा| कहीं कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली| जितना मैं किताब के रहस्य को खोलने की कोशिश करता था, उतना ही कछुये की तरह किताब ख़ुद को अपने में बंद कर लेती थी| अंत में निराश
होकर मैंने पढ़ना बंद कर दिया| उम्मीद का आखरी तारा भी डूब गया था|
लास्ट इयर, जब मैं ध्यान करने मनाली जा रहा था, तो
किसी अज्ञात प्रेरणा से एक बार फिर से किताब को अपने साथ ले लिया| सोचा दिल्ली से मनाली जाते समय बस में बैठकर पढ़ने की कोशिश करूँगा| जैसे अज्ञेय
पहाड़ो में बैठ कर लिखते थे, सोचा शायद उसी तरह पहाड़ों में पढ़ने से मेरी भी बात बन जाए| लेकिन, बस में
बैठने के बाद एक बार भी किताब पढ़ने का मन नहीं हुआ| एक पन्ना कभी पलट कर नहीं
देखा| खिड़की के किनारे बैठकर, जब तक रोशनी में बाहर देख सकता था, मैं दृश्यों में
उलझा रहा| मनाली पहुँच कर भी, एक बार भी किताब का ध्यान नहीं आया|
ध्यान शिविर के तीसरे दिन, सुबह का ध्यान करने के बाद,
जब सब लोग ध्यान हॉल से चले गये| तब पता नहीं किस अन्तः प्रेरणा से, मैं अपने कमरे, जो ध्यान हॉल के पास ही था, में गया, बैग से किताब निकाला, और उसे ले कर ध्यान हॉल में वापिस आ गया| सब लोग जा चुके थे|
पूरे हॉल में गहन शांति पसरी हुई थी| हॉल के एक कोने में रखे कुशन की ढेर में से, मैंने तीन कुशन
उठाया और हॉल के ठीक मध्य में आ कर बैठ गया|
जहाँ मैं बैठा था वहां मेरे आगे,
खिड़की की नीचे, ओशो की बड़ी सी तस्वीर रखी थी| उसी तस्वीर के नीचे बुद्ध की एक छोटी-सी प्रतिमा रखी हुई थी| सामने हिमाच्छादित हिमालय अपनी पूरी गरिमा में ध्यानस्त
खड़ा था| सूरज की पहली किरण खिड़की के कांच से छन कर कमरे में आ रही थी| पूरे हॉल
में मौन बर्फ की तरफ जमा हुआ था| धड़कन के साथ-साथ, मैं अपने रगों में दौड़ते लहू की
आवाज़ को भी सुन सकता था| मैं थोड़ी देर तक पहाड़ो को देखता रहा, फिर पहाड़ो से नज़रे हटा
कर ओशो की तस्वीर पर ले आया, दो तीन मिनट तक टकटकी लगा कर ओशो को देखते रहने के
बाद, मैंने नज़रे नीचे की और बुद्ध को देखने लगा| तांबे की प्रतिमा सूरज की भांति
चमक रही थी| थोड़ी-देर तक मेरी आँखे बुद्ध पर ही गड़ी रही| फिर अहिस्ता से नज़रें
समेट कर, मैं अपनी दृष्टि को सामने पड़ी किताब पर ले आया| किताब पर बनी तस्वीर को एक मिनट
तक देखता रहा| पहली बार किताब के मुख्य पृष्ट को मैं इतने गौर से देख रहा था| कई
तस्वीरें बनी हुई थी| उन तस्वीरों को थोड़ी देर देखने के बाद ऐसा लगने लगा, जैसे
तस्वीरें जिवंत हो उठी हों, और मुझसे कुछ कह रही हो| एक पल के लिए लगा कि एलिस की तरह मैं किसी रहस्य
लोक में प्रवेश कर रहा हूँ| किताब को उठा कर नाक के पास ले आया और उसके पन्नो से
आती खुशबू को सूंघने लगा| नासापुट एक मुधुर सुवास से भर गया| मैंने इससे पहले बहुत
बार किताब को सुंघा था| किसी भी किताब को खरीदने के बाद मैं दो काम जरूर करता हूँ,
एक किताब पर डेट लिख कर दस्तखत कर देना, और दूसरा उसको सूंघना| लेकिन ऐसी गंध
मैंने पहले कभी नहीं सूंघी थी| थोड़ी देर तक सूंघने के बाद, किताब को आज्ञा-चक्र
के पास ले गया| काफी देर से वहां खिचाव महसूस कर रहा था| फिर मैंने किताब को माथे
से लगाया| यह सब प्रक्रिया अपने आप ही हो रही थी| कुछ भी सोच विचार कर नहीं कर
था| माथे से लगाने के बाद, मैंने किताब को बीच से खोला और जो पृष्ट सामने आ गया
उसे पढ़ने लगा| 10 मिनट बाद, ना वहां कोई पढ़ने वाला था, ना ही किताब थी|
इस किताब के बारे में कुछ भी कहना व्यर्थ है| क्योंकि
इसको आप ऐसे ही नहीं पढ़ सकते हैं| जैसे आम किताब को हम कहीं भी, टीवी देखते हुए,
बात करते हुए, खाना खाते हुए, टॉयलेट में, मोबाइल चालू रख कर, कैसे भी पढ़ लेते हैं,
वैसे आप इसको नहीं पढ़ सकते हैं| पहली तो मुसीबत सही जगह, सही समय, और सही माहौल की
है| यह सब अगर आपने जुटा भी लिया तो, फिर आपको अपने भीतर सही भाव दशा पैदा करनी
होगी| जब तक हृदय अहोभाव से भरा ना हो, आप इसे आत्मसात नहीं कर सकते हैं| यदि आप इसे
प्राथनापूर्ण हृदय से नहीं पढ़ते हैं, तो कुछ भी आपको समझ नहीं आएगा| यह किताब
स्त्री जैसी है, अगर स्त्री के आत्मा से सम्बन्ध बनना हो, उसे पूरा पाना हो, तो
आपको बहुत ही प्रेमपूर्वक उसके पास जाना होगा| जबरदस्ती करके आप सिर्फ उसकी देह को
पा सकते हैं, उसकी आत्मा को नहीं| अगर आपने जरा भी अधर्य दिखाया, जरा भी जल्दी की, तो आप इस किताब से चूक जाएंगे|
दो ही लोग इस कताब को पढ़ने के पात्र हैं, एक वे जिनका, किसी करणवश, मृत्यु-बोध सघन हो गया है| जिन्होंने मृत्यु की सार्थकता और जीवन की
निरर्थकता को समझ लिया हो| और दूसरे वे जो जीवन से पूरी तरह से निराश हो गए हैं|
असफलता के बाद वाली निराशा नहीं, उस निराशा से कुछ नहीं होगा| सफलता की व्यर्थता
को समझ लेने के बाद जो निराशा पकड़ती है, उस निराशा के क्षण में यदि कोई इस किताब
को पढ़े तो बात बन सकती है| अन्यथा, आप बस पृष्ट पलट सकते हैं| मिलेगा कुछ भी नहीं|
किताब से कोई भी बात या कोई उद्धरण मैं यहाँ शेयर
नहीं करूँगा| ना ही किताब में क्या लिखा है, इसके ही संबंध में आपसे कुछ कहूँगा| किताब
के शब्दों में कुछ भी नहीं, सारे शब्द थोथे होते हैं| शब्द का अपना कोई अर्थ नहीं
होता है, अर्थ हम देते हैं| यहाँ मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, वो सब शब्द भले ही
मेरे हैं, लेकिन उनका जो अर्थ आप देंगे, उस पर मेरा कोई वश नहीं है| इसीलिए शब्दों
को आँखों के आगे से गुज़ार लेने में कोई सार नहीं है| किताब को ग्रहण करने के लिए
आपको तैयारी करनी होगी| अमेज़न पर किताब का नाम सर्च करना, फिर एक हजार के क़रीब दाम देख कर
चौंकना, फिर झिझकते हुए आर्डर देना, फिर बेसब्री से किताब के आने का इंतजर करना,
फिर पैकेट खोल कर उसे ऐसे देखना जैसे कोई प्रेमी अपनी बिछड़ी हुई प्रेमिका को देखता है,
फिर उसके पृष्ठों को पलटना, फिर सफहों को पलटते हुए उसे सूंघना, फिर समय निकाल कर
उसे पढ़ना| यह सब तैयारी का हिस्सा है| इसमें अगर आपने कहीं भी जल्दबाजी दिखाई, तो फिर आप किताब से कुछ भी नहीं पाएँगे| किताब पढ़ना एक प्रकार की साधना है| जैसे आप
मंदिर में नाहा-धोकर प्राथना करने जाते हैं, वैसे ही और उतनी ही पवित्रता से अगर
आप इस किताब के पास नहीं जाते हैं, तो आप इस किताब को कहीं से भी नहीं समझ पाएंगे|
-इक्क्यु केंशो तजु

Can't say anything.....i am speechless...i will start this book asap..
ReplyDelete:)
Deleteउनकी एक नज़र ही काफ़ी है
ReplyDeleteखुद का जिक्र मिटाने के लिए।
यूँ किताबों के के पन्नों में
न उलझाओ मुझे....
वाह
Deleteआपके इस तहरीर ने न सिर्फ़ किताब की अहमियत पुनर्स्थापित की है बल्कि क़ुतुबनवाज़ों को क़िताब पढ़ने का सच्चा शऊर भी सिखाया है।शुक्रिया।
ReplyDeleteआपने नया सूत्र दे दिया।
Delete🙏
धन्यवाद्...!
DeleteInteresting write up
ReplyDeleteDhanyawad ji
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