Friday, 9 March 2018

प्रेम का सुमन अर्पित करता हूँ

आज, महिला दिवस के पावन अवसर पर, मैं, इक्क्यु केंशो तजु, इश्क़ और इबादत की प्रतिमूर्ति मीरा, भक्ति और श्रधा की पराकाष्ठा सहजो और दया बाई, ममता की देवी मरियम, मेगदालिन, महामाया, एनी बेसेंट, क्रांतिकारी स्त्री लल्ला, मैडम ब्लावट्स्की, ओशो की छाया माँ विवेक, बुद्ध की धर्म पत्नी यशोधरा, मौन की मंदिर संत भूरीबाई, सुकरात की पत्नी जेंथीप, बौध भिक्षुणी आम्रपाली, बुद्धि की मीनार-ए-आजम गार्गी, सहनशीलता की उतुंग शिखर पर बैठी तीन चोटी की स्त्री सीता, द्रोपदी और अहिल्या, पैगम्बर मोहम्मद की पहली पत्नी हजरत ख़दीजा, जुदास की वंशज माँ आनंद शीला, गाँधी की पत्नी बा कस्तूरबा, कृष्णमूर्ति की अनाम प्रेमिका, ब्रह्मवादिनी माँ मदालसा, पहली औरत देवी हव्वा, मेरी वकील माँ धर्मज्योति, तीर्थंकर मल्लीबाई, और अंत में वो तमाम औरत जिन्होंने मनुष्य की चेतना को नई उंचाई दी है, उन सबके चरणों में श्रधा और प्रेम का सुमन अर्पित करता हूँ.
चित्र साभार-गूगल

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Wednesday, 7 March 2018

बुद्ध पुरुष का भी दुबारा जन्म होता है.! (बुद्धत्व बंधन है-2)


पत्थर और परमात्मा के होश में सिर्फ मात्रा का भेद है. ना तो पत्थर पूर्ण बेहोशी में है, और ना ही परमात्मा पूर्ण होश में. 'पूर्ण' जैसा अस्तित्व में कुछ है ही नहीं. पत्थर भी इतना बेहोश नहीं है कि होश में ना आ सके, और परमात्मा भी इतने होश में नहीं है कि बेहोश ना हो सके. अस्तित्व में सब कुछ एक वर्तुल में घूमता है, पत्थर यात्रा करके परमात्मा हो जाता है, और फिर परमात्मा गिरते-गिरते पत्थर हो जाता है. पांच अध्यात्मिक झूठ है जो लोगों से कहा जाता है. 1. बुद्ध पुरुष जन्म-और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं. 2. बुद्धत्व की अवस्था है 3. ज्ञान स्थाई चीज है. 4. ज्ञान अनंत है. 5. हर कोई ज्ञानी हो सकता है. 

पदार्थ से लेकर परमात्मा तक सब एक वर्तुल में घूमते हैं, इस वर्तुल से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है. और बुद्धत्व कोई अवस्था नहीं है..ऐसी कोई स्थिथि नहीं आती जहाँ पहुंच कर कोई यह कह दे कि 'अब मैं पहुँच गाया मंजिल पर, इससे आगे अब कोई यात्रा नहीं होगी' ऐसा कभी नहीं होता है. 

जागरण के एक पॉइंट पर पहुँचने के बाद, परमात्मा फिर से पदार्थ की तरफ गिरने लगता है. यात्रा सदा जारी रहती है. और ज्ञान/जागरण हमेशा सिमित है. ऐसा कभी नहीं होगा कि एक साथ और एक समय पर लाखों लोग ज्ञान को उपलब्ध हो जाएँगे. एक समय में ज्यादा-से-ज्यादा आठ लोग जाग सकते हैं. और पूरा ज्ञान कभी किसी पर नहीं उतरता है. 
चित्र साभार- गूगल 
अगर आप नोटिस करेंगे तो पाएँगे कि यदि तीस की उम्र में कोई व्यक्ति ज्ञान की घोषणा करता है, और 60 की उम्र तक जिंदा रहता है, तो उसकी जीवन को यदि आप गौर से देखेंगे तो आप उसकी चेतना में स्पष्ट गिरावट पाएँगे. और यदि वही व्यक्ति 100 की उम्र तक जिन्दा रहता है, तो गिरावट इतना स्पष्ट हो जाएगा कि आपको यकीन ही नहीं आएगा कि 30 की उम्र में जो चेतना का स्तर था, और 100 के उम्र में जो चेतना है, वह दोनों एक ही व्यक्ति के हैं. 
उदाहण के लिए ओशो को लीजिये, उनके 60 और 70 के दशक के प्रवचनों को सुनिये, फिर आप 85 के बाद उनको सुनिये, एक स्पष्ट अंतर पाएंगे आप. यही सब के साथ होता है, कृष्णमूर्ति, गुरजिएफ. बुद्ध, महावीर, कृष्ण सबके जीवन में आप ऐसा ही पाएँगे.यही सनातन नियम है.

Tuesday, 6 March 2018

'बुद्धत्व बंधन है'

आप से यह तो सबने कहा कि पत्थर में भी परमात्मा है, लेकिन परमात्मा भी पत्थर है यह किसी ने नहीं कहा. सदियों से इसे छुपाया गया है. अगर इस जगत में कुछ भी पूरा अचेतन नहीं है, तो वो जो पूरा चेतन है, जिसे आप 'परमात्मा' कहते हैं, वह भी पूरा चेतन नहीं हो सकता है. अगर पत्थर पूरा बेहोश नहीं है, तो इस यह अर्थ हुआ कि 'बुद्ध' भी पूरे होश में नहीं है. यह मैं आपसे नई बात कह रहा हूँ, जो लोग ज्ञान, ध्यान, और बुद्धत्व का धंधा लगा कर बैठे हैं, वे कभी आप से यह नहीं कहेंगे.
इसको ठीक से समझिये, अनुभव सदा विपरीत का होता है, पूर्ण का कोई अनुभव नहीं हो सकता. और 'अस्तित्व' में कुछ भी पूर्ण नहीं है, सब कुछ प्रोसेस में है. 'मुक्ति' संभव नहीं है, मुक्त होने या बुद्ध होने की चाह असंभव की चाह है. मुक्ति का अनुभव ही तभी हो सकता है जब कुछ बंधन शेष हो. और यदि हमें बंधन का अनुभव होता है, तो वो सिर्फ इसलिए क्योंकि हम पूरे बंधे हुए नहीं है, कुछ है हम में जो मुक्त है.
चित्र साभार- गूगल
इसीलिए, बुद्ध, महावीर, ओशो, कृष्ण, और शिव कोई भी पूर्ण मुक्त नहीं है. और ना ही हो सकते हैं. जो भी आपसे यह कह रहा कि मैं बुद्ध हूँ, मुक्त हूँ, स्वतंत्र हूँ, वो सब आपको बेवक़ूफ़ बना रहे हैं. और आप भी जब यह कहते हैं कि मैं बंधा हूँ, अज्ञानी हूँ, अबुद्ध हूँ, अन्धकार में हूँ, तब आप ख़ुद को और दूसरे को ठग रहे हैं. 'मैं बुद्धू हूँ और मैं बुद्ध हूँ' दोनों ही स्टेटमेंट नासमझी की है. न तो यहाँ कोई बुद्ध है और ना ही कोई बंधा हुआ है.

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...